क्षरित भूमि और कृषि विकास : कुछ महत्त्वपूर्ण पहलू (Soil erosion and Agricultural Development: Some Important Aspects )

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योजना, 26 जनवरी 1991

जमीन के खराब होने को भारत की गरीबी का मूल कारण बताते हुए लेखक इस बात पर जोर देता है कि हमारी जमीन को जो भी नुकसान हो चुका है उसकी भरपाई के लिये समग्र रूप से कारगर और उपयोगी एक ऐसी नीति बनायी जानी चाहिये जिससे मिट्टी और पानी का संरक्षण किया जा सके। लेखक का सुझाव है कि हमें एक ओर अच्छी जमीन को नुकसान होने से बचाना है तथा दूसरी ओर खराब हो रखी जमीन को पारिस्थतिकीय विकास के माध्यम से सुधारना है। लेख में जमीन, पानी, कृषि, रसायन, वनशृंखलाओं और वानिकी इत्यादि से सम्बद्ध मसलों पर भी प्रकाश डाला गया है।

परन्तु यदि समग्र रूप से देखा जाए तो भारत में जमीन के खराब होने की समस्या, अंग्रेजों के शासन की स्थापना के बाद 19वीं सदी में बड़े पैमाने पर भू-क्षरण और पानी की कमी के कारण उत्पन्न हुई।

भारत की 76 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण है जो 5,76,000 गाँवों में रहती है। लगभग 40 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं। जिसका मुख्य कारण यह है कि उसकी शश्य-श्यामला भूमि अब खराब होती जा रही है। कृषि, पशुपालन तथा भूमि पर आधारित अन्य व्यवसाय जीवन निर्वाह के साधन जुटाने में अक्षम हो गये हैं। इसलिये इस ओर ध्यान देना आवश्यक हो गया है।

सामाजिक समस्याएँ


यद्यपि सामन्तवादी प्रथा समाप्त हो गयी है, फिर भी गाँवों के लोगों को सामाजिक और आर्थिक अन्याय का सामना करना पड़ता है। इससे बेरोजगारी पैदा होती है और गाँव के गरीब हताश होकर जीविका कमाने के लिये बड़े-बड़े शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं। ये ग्रामीण गरीब दरअसल ‘परिस्थितियों के मारे शरणार्थी’ हैं। बड़े-बड़े शहरों में उन्हें भुखमरी का सामना करना पड़ता है और इस तरह वह गरीबी के एक और दुष्चक्र में फँस जाते हैं, जिसमें उनके पास न तो रहने का कोई ठिकाना होता है और न ही कोई आधारभूत सुविधा। उन्हें भयावह, कष्टदायी और अमानवीय परिस्थितियों में रहना पड़ता है। इसके साथ ही उन्हें इन परिस्थितियों से जुड़ी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है। भारत में 2 करोड़ 50 लाख लोग ऐसी परिस्थितियों के शिकार हैं इन शरणार्थियों में काफी संख्या बाल मजदूरों की है जोकि अक्सर बंधुआ होते हैं उनके पास पूँजी नाम की कोई चीज मुश्किल से होती है और आजीविका कमाने तथा परिवार की आय में योगदान करने के लिये वे गलियों में घूमने वाले छोटी-छोटी फेरी वाले बन जाते हैं। इस पृष्ठभूमि में ग्रामीण क्षेत्र की गरीबी को दूर करने के लिये वहाँ की खराब जमीन को सुधारने का कार्य विशेष महत्त्व रखता है।

भारत में सदियों से जमीन खेती के काम लाई जाती रही है। प्राचीन समय में उसने अनेक सम्पन्न सभ्यताओं के फलने फूलने में अहम भूमिका निभाई है। उस समय लोगों के मन में जमीन के प्रति आदर की भावना थी। वैदिक साहित्य में मानव कल्याण के लिये भूमि के महत्त्व का काफी बखान किया गया है। जल के उद्गम स्थलों की देख-रेख तथा खेतों में सिंचाई का प्रचलन बहुत पहले से ही चला आ रहा है, परंतु भारत में अच्छी जमीन के खराब होने की समस्या करीब 100 से 150 वर्ष पुरानी है। इस समस्या के कारणों को समझने से खराब जमीन को सुधारने में काफी मदद मिलेगी।

शुरुआत


मुगलों के समय पंजाब में शिवालिक की शृंखला शिकार खेलने के लिये सुरक्षित कर दी गयी थी। परन्तु महाराजा रणजीत सिंह के शासन के दौरान वहाँ जमींदारों को बड़े-बड़े भूखण्ड दिये गये और किसानों को जमीन छोड़ने के लिये बाध्य होना पड़ा। उन्हें पशुओं को चराकर तथा जंगलों की लकड़ी बेचकर गुजारा करना पड़ता था। इस तरह जंगलों की बर्बादी शुरू हुई। परन्तु यदि समग्र रूप से देखा जाए तो भारत में जमीन के खराब होने की समस्या, अंग्रेजों के शासन की स्थापना के बाद 19वीं सदी में बड़े पैमाने पर भू-क्षरण और पानी की कमी के कारण उत्पन्न हुई। अंग्रेजों का विरोध करने वालों से जमीन छीन ली गयी, जंगलों की जमीन उन भारतीयों में बाँट दी गयी जो अंग्रेजों के वफादार थे। इसी प्रक्रिया में 1850 में अंग्रेजों ने अजमेर-मारवाड़ क्षेत्र (जो अब राजस्थान राज्य में है) के जंगलों की जमीन लोगों में बाँट दी। परिणामस्वरूप यह क्षेत्र लकड़ी की कटाई और अनियंत्रित चराई के कारण पेड़ पौधों से खाली हो गया। बीहड़ों के आर-पार तटबंधों के निर्माण से बने तालाबों से फसलों में सिंचाई की जाती थी, परन्तु पेड़ पौधों के कटने से और मूसलाधार वर्षा होने पर तटबंध पानी के वेग को सम्भालने में असमर्थ होने लगे। दो दशक के भीतर ही पूरे क्षेत्र की जमीन खराब हो गयी। हालात कैसे हो गये थे, उसका विवरण इन शब्दों में दिया गया है : ‘‘पशु मर गये, लोग भाग गये, बड़े-बड़े गाँव भी एकदम वीरान हो गये तथा पूरा इलाका तकरीबन जनसंख्या विहीन हो गया।’’ मुम्बई प्रेसीडेन्सी के पश्चिमी तट, पूर्वी और पश्चिमी घाट, दक्षिण पठार इत्यादि क्षेत्रों में भी यही हालत हो गयी।

अन्य कारण


अंग्रेजी शासन की 1984 की वन नीति जंगलों पर सर्वाधिक कुठाराघात करने वाली साबित हुई, क्योंकि उसमें वनों को कृषि से कम महत्त्व दिया गया था और इन्हें महज आय कमाने का एक साधन माना गया था। आज भारत में मुश्किल से कोई ऐसा क्षेत्र होगा जो जमीन के कटाव, पानी की कमी, शुष्क मौसम में अनावृष्टि तथा बरसात में बाढ़ तथा पानी इकट्ठा होने के खतरों से मुक्त हो।

अंग्रेजों ने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक रेल की पटरियों का जाल बिछा दिया और अनेक छावनियाँ स्थापित कर दी। उन्होंने यह इसलिये किया, जिससे कि भारत के किसी भी हिस्से में उनके विरुद्ध बगावत होने पर वे उसे दबाने के लिये तेजी से फौज भेज सकें। इससे लकड़ी के स्लीपरों, रेल के डिब्बों और क्रेटों के लिये लकड़ी तथा फौज के लिये तारकोल और जलाऊ लकड़ी की माँग में अचानक ही जबर्दस्त वृद्धि हो गयी। क्लेगर्न (1861) ने रेल पटरियों के जाल बिछाने से उत्पन्न स्थिति का वर्णन इन शब्दों में किया है: ‘‘लकड़ी की भारी माँग से उन जिलों का स्वरूप एकदम बदल जाता है, जिनसे होकर रेल लाइनें जाती हैं। मैं पालघाट, शेवराई पहाड़ियों और उत्तर अर्काट की पहाड़ियों के उदाहरण देना चाहूँगा। इन सभी स्थानों में लकड़ी की माँग को पूरा करने के लिये पुराने जंगल काट दिये गये हैं।’’ क्लेगर्न ने आगे लिखा है ‘‘सभी यूरोपीय राष्ट्रों में अंग्रेज जंगलों के महत्त्व के प्रति सबसे ज्यादा लापरवाह रहे हैं। कुछ हद तक तो उनके देश की जलवायु इसके लिये जिम्मेदार ठहराई जा सकती है पर उनकी लापरवाही का खास कारण यह है कि इंग्लैंड में कोयला भारी मात्रा में मिलता है और वहाँ से जो लोग अमेरिका गये उन्होंने वहाँ जंगलों को अनाप-शनाप काटकर इस मामले में लापरवाही बरती और अब वे भी इस ओर ध्यान देने की जरूरत महसूस करने लगे हैं।’’

जमींदारों ने तेजी से पैसा कमाने के लिये अपनी जमीन की लकड़ी को बेच दिया। अंग्रेजी शासन की 1984 की वन नीति जंगलों पर सर्वाधिक कुठाराघात करने वाली साबित हुई, क्योंकि उसमें वनों को कृषि से कम महत्त्व दिया गया था और इन्हें महज आय कमाने का एक साधन माना गया था। इस तरह जंगलों की बर्बादी शुरू हुई और इससे जमीन भी खराब होने लगी। जानवरों को झुण्डों में पालना, जोकि पहले जीवन-यापन का सिर्फ एक जरिया था, अब लाभदायक साबित होने लगा और पशुओं, विशेषकर बकरियों के झुण्ड बिना रोकटोक के बड़ी संख्या में पहाड़ियों पर चरने लगे। इससे उन पौधों का उगना रुक गया जो जमीन की सतह को सुरक्षित रखने के लिये आवश्यक होते हैं।

इसके अलावा ब्रिटेन को लकड़ी, (टीक, देवदार और पाईन) कपास, चाय, पटसन, नील आदि का निर्यात होने लगा। वहाँ इन वस्तुओं की काफी माँग थी। टीक के पौधों के विनाश का अनुमान इन शब्दों से लगाया जा सकता है:‘‘टीक के जंगलों को उन्हें काटने के इच्छुक लोगों या ठेकेदारों को सौंपने से सर्वाधिक बर्बादी हुई है। वे जो कुछ भी उनके सामने आता है, उसे एकदम काट देते हैं, यदि जंगलों की विशाल शृंखला भी उनके रहम पर छोड़ दी जाती है तो वह उसे भी निर्ममता से काट देते हैं। पौधे लगाने के बारे में तो वह कभी सोचते भी नहीं, उनका मकसद तो केवल एक ही है कि इस समय अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जाए। उन्हें इसकी बिल्कुल चिन्ता नहीं कि वे आने वाली पीढ़ियों को उस आनंद से वंचित कर रहे हैं। जिससे वे इस समय लाभान्वित हो रहे हैं। मुझे बताया गया है कि मालाबार के टीक के जंगलों की यही दुर्दशा हो रही है।’’ इस तरह अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में जंगलों के विनाश और जमीन के खराब होने की स्थिति तथा उसके परवर्ती परिणामों ने खतरनाक रूप धारण कर लिया।

खतरनाक स्थिति


आजादी के बाद बड़ी जोतों के स्वामित्व को समाप्त कर दिया गया। जमीन से वंचित किये गये जमींदारों ने अतिरिक्त जमीन को सरकार को सौंपने से पहले उस पर उगे जंगलों को काट दिया। जमीन के उपयोग तथा जंगलों से सम्बन्धित कमजोर कानूनों, पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक बड़ी-बड़ी विकास परियोजनाओं तथा खाद्यान्न के उत्पादन पर अपेक्षाकृत अधिक जोर दिये जाने के कारण स्थिति और भी खराब हो गयी। आजादी से पहले और बाद में घटनाओं का कुल मिलाकर यह असर हुआ कि आज भारत में मुश्किल से कोई ऐसा क्षेत्र होगा जो जमीन के कटाव, पानी की कमी, शुष्क मौसम में अनावृष्टि तथा बरसात में बाढ़ तथा पानी इकट्ठा होने के खतरों से मुक्त हो।

कृषि मंत्रालय के प्रथम राष्ट्रीय सकल आकलन (कृ.मं. 1968) के अनुसार भारत के 3.29 करोड़ हेक्टेयर के भौगोलिक क्षेत्र में से 1.45 करोड़ हेक्टेयर जमीन में भू-संरक्षण तथा जल-संरक्षण के उपाय लागू करने की आवश्यकता थी। वर्ष 1975 में बाली के आकलन के अनुसार 1.75 करोड़ हेक्टेयर जमीन खराब हो गयी थी। 6.9 करोड़ हेक्टेयर की हालत चिन्ताजनक थी और 10.6 करोड़ हेक्टेयर काफी हद तक खराब हो गयी थी। इस मामले में पानी और हवा से हुए क्षरण और खारेपन आदि से हुए नुकसान का विशेष उल्लेख किया गया था। जमीन के उपयोग की दृष्टि से 1.75 करोड़ हेक्टेयर निम्न कोटि के जंगलों और चरागाह, 8.7 करोड़ हेक्टेयर खेती की जमीन 2.3 करोड़ हेक्टेयर परती जमीन तथा 1.7 करोड़ हेक्टेयर खेती के काम लायी जा सकने वाली बेकार जमीन थी।

 

तालिका-1

विभिन्न प्रकार के क्षरण से प्रभावित क्षेत्र

क्षरण का कारक

क्षेत्रफल (लाख हेक्टेयर)

पानी

111.3

हवा

38.7

नमकीन क्षारीय मिट्टी (तटीय बलुई मिट्टी सहित)

8.0

दलदली मिट्टी

6.0

बीहड़ और खड्ड

4.0

जगह बदलकर की जाने वाली खेती

4.3

नदी नाले

2.4

कुल

175.0

स्रोत कृषि मंत्रालय 1985

 

ऐसा अनुमान है कि इस जमीन में से 80 करोड़ हेक्टेयर खारी और क्षारीय होने के कारण खराब हुई। बाकी क्षेत्रों का क्षरण मुख्य रूप से पानी और हवा के कारण हुआ।

कंवर के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष पानी से 6 अरब टन मिट्टी बह गयी। पाँचवे दशक के लिये यह मिट्टी के बहाव के बारे में पहला सकल राष्ट्रीय आकलन था। उसके बाद नारायण और रामबाबू (1983) इस नतीजे पर पहुँचे कि क्षरण के कारण प्रति वर्ष 533.4 करोड़ टन मिट्टी (16.4 मी. हेक्टेयर) बह जाती है और देश की नदियाँ लगभग 205 करोड़ टन बहा ले जाती हैं। इसमें से लगभग 48 करोड़ टन विभिन्न जलाशयों में जमा हो जाती है और 157 करोड़ टन बहकर समुद्र में चली जाती है। दूसरे शब्दों में कुल क्षरित मिट्टी का लगभग 29 प्रतिशत समुद्र में जाकर बेकार हो जाता है, 10 प्रतिशत जलाशयों में जमा होकर प्रतिवर्ष 1 से 2 प्रतिशत की भण्डारण क्षमता कम कर देता है और 61 प्रतिशत एक स्थान से दूसरे स्थान पर चला जाता है।

दुष्परिणाम


मिट्टी के बहने का परिणाम व्यापक रूप से हानिकारक होता है। मिट्टी बहने से प्राकृतिक पारिस्थितिक प्रणालियों (पारिस्थितिक प्रभाव), उत्पादन के आधार (आर्थिक प्रभाव) और लोगों के रहन-सहन (सामाजिक प्रभाव) पर बुरा असर पड़ता है। पोषक तत्वों की दृष्टि से मिट्टी के बहने से प्रतिवर्ष 53.7 लाख से 82.4 लाख टन वनस्पति जन्य पोषक तत्व भी बर्बाद हो जाते हैं। जमीन, जो कि उत्पादन का आधार है, खराब हो जाती है, उसमें गड्ढे पड़ जाते हैं, जिसके कारण खेती का काम बंद कर देना पड़ता है।

इसके अलावा इससे पौधों को जड़ जमाने में कठिनाई होने लगती है, जल संसाधनों की क्षति हो जाती है, तलछट जमने लगती है, बाढ़ अधिक आने लगती है तथा बिजली उत्पादन और मछली पालन के काम में रुकावट पैदा हो जाती है। जमीन के दुरुपयोग और कुप्रबंध, बढ़ती जनसंख्या के कारण जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटने तथा पर्यावरण की दृष्टि से नुकसानदायक विशालकाय विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन से जमीन तेजी से खराब हो जाती है। खास तौर पर जल के ऊपरी स्रोतों वाले क्षेत्रों में प्रति वर्ष लगभग 13 लाख हेक्टेयर भूमि जंगलों से विहीन हो जाती है। यह जानवरों की चराई, जलाऊ लकड़ी के कटने, लकड़ी और जंगल के अन्य पदार्थों के अधिक दोहन होने, जंगल में आग लगने और जंगल की भूमि का अतिक्रमण होने से होता है।

जमीन की ऊपरी सतह के नाश होने, पानी जमा होने और खारापन आने तथा 40 करोड़ पशुओं द्वारा चराई जैसे औद्योगिक कृषि-जनित नुकसान से स्थिति और भी बिगड़ जाती है। सार्वजनिक जमीन पर पशुओं द्वारा अधिक चराई किये जाने से जमीन पर पौधों की परत नहीं उग पाती, जिससे जमीन की उत्पादन क्षमता समाप्त हो जाती है।

दुर्लभ जमीन


देश में विकास के स्तर और खेती की अच्छी जमीन तथा जंगलों से भरपूर दीर्घावधि की पारिस्थितिकी सुरक्षा के बीच एक विपरीत पारस्परिक सम्बन्ध है। जैसाकि आमतौर पर माना जाता है, विकास का स्तर जितना कम होता है, पारिस्थितिकी सुरक्षा उतनी ही लम्बी अवधि के लिये सुनिश्चित होती है।

पर्यावरण की दृष्टि से नुकसानदेह सड़कों के बनने, जनसंख्या की बसाहट औद्योगिकीकरण और खदानों के कारण जमीन के दुर्लभ संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ गया है। जमीन के उपयोग से सम्बन्धित कानून कमजोर होने से हालात और भी बिगड़ गये हैं। इन सब के परिणाम स्वरूप जमीन के उपयोग में प्रति वर्ष 10 लाख हेक्टेयर की कमी हो जाती है। भारत में प्रति व्यक्ति लगभग 0.1 हे. भूमि में जंगल है जबकि विश्व का औसत 1.0 हे. है। कनाडा में यह 14.2 हे. है। कनाडा उच्चतम औसत वाले देशों में से है। भारत में प्रति व्यक्ति कृषि की भूमि 0.2 हे. है। वह दुनिया के न्यूनतम औसत वाले देशों में से है। केवल जापान (0.04 हे) तथा इंगलैंड (0.1 हे.) में इससे कम औसत है (एम.ओ.ई.एफ. 1987)। परन्तु यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ कृषि के मुकाबले प्रति व्यक्ति जंगलों की भूमि के औसत का अनुपात कम है, बाकी सब देशों में स्थिति इसके विपरीत है। इसका कारण जनसंख्या का दबाव है। 90 के दशक में इन सब आंकड़ों में उल्लेखनीय रूप से गिरावट आयेगी। डा. एम.एस. स्वामीनाथन के अनुसार इस शताब्दी की समाप्ति पर कृषि के लिये प्रति व्यक्ति जमीन की उपलब्धि 0.15 हे. से अधिक नहीं होगी और इसी से हमें एक अरब जनसंख्या और आधा अरब खेती के काम आने वाले पशुओं का भरण पोषण करना पड़ेगा।

इस सबका परिणाम यह हुआ है कि भारत में खुष्क मौसम में बारिश न होने और बरसात में बाढ़ आने का प्रकोप बढ़ गया है। ये दोनों परिस्थितियाँ गाँवों में गरीबी के दुष्चक्र को जन्म देती हैं। इसमें गरीब जिन्दा रहने के लिये कृषि सम्पदा (अगर उसके पास हो तो) और उसके गाँव के आस-पास के प्राकृतिक संसाधनों का इतना दोहन कर देते हैं कि वे फिर उपयोगी नहीं रह जाते। इससे जमीन और भी खराब हो जाती है।

विपरीत पारस्परिक सम्बन्ध


भारत जैसे विकासशील देश का खास दुश्मन जमीन का खराब हो जाना और उससे उत्पन्न गरीबी है। भारत की भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के शब्दों में ‘गरीबी सबसे बड़ा कलंक है’! परन्तु मुख्य रूप से कृषि प्रधान देश होने के कारण भारत में सबसे सशक्त और व्यापक रूप से जोड़ने वाली कड़ी जमीन है। देश में विकास के स्तर और खेती की अच्छी जमीन तथा जंगलों से भरपूर दीर्घावधि की पारिस्थितिकी सुरक्षा के बीच एक विपरीत पारस्परिक सम्बन्ध है। जैसाकि आमतौर पर माना जाता है, विकास का स्तर जितना कम होता है, पारिस्थितिकी सुरक्षा उतनी ही लम्बी अवधि के लिये सुनिश्चित होती है। उदाहरण के लिये जहाँ भी जनजाति समाज को अलग रहने दिया जाता है, वहीं उस पर ‘आधुनिक’ सभ्यता का असर नहीं पड़ता। वे प्रकृति से उतना ही लेते हैं जितनी उन्हें आवश्यकता होती है, अधिक कभी भी नहीं। उनके मल इत्यादि विसर्जन का उपयोग जैविक प्रक्रिया में ही हो जाता है। इस प्रक्रिया में एक प्रजाति के जीव का मल दूसरी प्रजाति के जीव का भोजन बन जाता है।

इस प्रक्रिया में कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होता, यहाँ उस पारिस्थितिकीय प्रणाली को नुकसान नहीं पहुँचता, जिसके जनजाति के लोग अभिन्न अंग होते हैं। इस तरह पारिस्थितिकीय सुरक्षा को किसी प्रकार की हानि नहीं होती। इसके विपरीत विकास का स्तर जितना ही ऊँचा होता है पारिस्थितिकीय सुरक्षा उतनी ही कम होती है।

हमारे देश को ऐसी मान्यताओं को तोड़कर ऐसी विकास प्रक्रिया अपनानी होगी जो अपने आप आगे बढ़ने में सक्षम हो और भारत की मौजूदा स्थिति में प्रासंगिक हो। हमें ग्रामीण समाज और अर्थव्यवस्था में नयी शक्ति का संचार करना होगा जो हमारी जमीन से जुड़ी हो और जिसका आधार जैविक हो। यहाँ यह स्पष्ट है कि जिस देश को अपने करोड़ों लोगों को गरीबी के दलदल से मुक्ति दिलानी है उसे विकास के ऐसे रास्ते पर चलना होगा जिसका आधार जैविक प्रक्रिया हो। विकास की इस प्रणाली को न केवल जमीन को फिर से उसकी उत्पादक क्षमता लौटानी होगी और उसे उस क्षमता को बनाए रखने में सहायक होना पड़ेगा, बल्कि उसे विभिन्न प्रकार के ऐसे जैविक पदार्थों का उत्पादन भी करना होगा जिनसे गाँव के गरीबों की बुनियादी आवश्यकताएँ जैसे भोजन, पशुओं के लिये चारा, जलाऊ लकड़ी, खाद, मत्स्य-पालन, सूत, लकड़ी तथा जड़ी-बूटियाँ इत्यादि पूरी हो सके।

कृषि पारिस्थितिकी प्रणालियाँ


इस तरह बुनियादी आवश्यकता आमतौर पर समझे जाने वाले विकास की नहीं बल्कि खराब हो गई जमीन के पारिस्थितिकीय विकास की है। इसका अभिप्राय विकास की ऐसी प्रक्रिया से है जो पारिस्थितिकी के सिद्धान्तों पर खरी उतरे और अपने आप आगे बढ़ सकने में सक्षम हो। इस सिलसिले में कृषि की मौजूदा स्थिति का संक्षेप में अवलोकन किया जा सकता है। भारत में अलग-अलग सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों में दो प्रकार की खेती की जाती है। एक जिससे हरित क्रान्ति आयी है और दूसरी जो सिर्फ गुजर-बसर का साधन बनी हुई है। जिस खेती से हरित क्रान्ति आयी है वह उत्तम बीजों तथा अकार्बनिक खादों और कीटनाशकों जैसे रसायनों को उपयोग में लाने वाली प्रौद्योगिकी पर निर्भर करती है। इस प्रकार की खेती के चमत्कारी परिणाम हुए हैं।

भारत को, जिसे पहले बार-बार खाद्यान्न का आयात करना पड़ता था, अब पिछले कई सालों से इसका आयात नहीं करना पड़ रहा है। इस प्रकार की खेती पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में की जाती है। इसमें आधुनिक तथा उत्तम उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है, किसानों को उनकी पैदावार के वाजिब दाम दिलाए जाते हैं तथा पानी और बिजली रियायती दरों पर उपलब्ध करायी जाती है। बुनियादी बात यह है कि जहाँ एक ओर फसल के दाम नियंन्त्रित रखे जाते हैं, वहीं खेती के काम आने वाले अनेक साधन रियायती दरों पर उपलब्ध कराए जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसान, जो आमतौर पर काफी सम्पन्न होते हैं, जमीन और मजदूरों के अधिक उपयोग के बजाए अन्य साधनों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करते हैं।

ऐसी स्थिति में किसान मिट्टी और पानी के रख-रखाव पर ध्यान नहीं देते। बल्कि वे मिट्टी में ऐसे अन्य तत्व मिला देते हैं जिनसे वह अधिक उत्पादन देने वाली फसलों को उगाने लायक बन जाती है। यह एक ऐसा तरीका है जिसके जरिए कम से कम समय में मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाकर खेती की जाती है। इन परिस्थितियों में कृषि वैज्ञानिक अधिक उपज देने वाली किस्मों को विकसित करने पर ध्यान देते हैं, जिनके लिये बाहरी साधनों के अधिकाधिक उपयोग की आवश्यकता होती है। इसका परिणाम यह होता है कि जहाँ उत्पादन बढ़ जाता है वहीं मिट्टी और पानी जैसे पर्यावरण संसाधन खराब और दूषित हो जाते हैं।

गुजर बसर की खेती


गुजर बसर के लिये की जाने वाली खेती देशभर में की जाती है। यह वर्षा पर निर्भर होती है। ऐसी खेती में लगे लोग गरीब होते हैं और हरित क्रान्ति लाने वाले साधनों को उपयोग में लाने में असमर्थ होते हैं, फिर भी खराब हो गई जमीन का इस्तेमाल भूमि को फिर से उपयोगी बनाने तथा साधनहीन किसानों के पुनर्वास की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।

हमें एक ऐसी कार्य-प्रणाली की आवश्यकता है जिसमें पर्यावरण की दृष्टि से कम कीमत चुकानी पड़े, परन्तु जिस पर चलने से अन्न का उत्पादन अधिक हो और आमदनी भी अच्छी हो। यह इसलिये जरूरी है ताकि गरीब तथा सम्पत्ति-विहीन किसान ‘परिस्थितियों के मारे शरणार्थी’ न बनें।

यहाँ बुनियादी सोच का आधार कुछ भिन्न है। यह संसाधनों की बेहतर प्रबंध व्यवस्था पर निर्भर करता है। इसके अंतर्गत नीतियों और अनुसंधान तथा साधनों को खरीदने के लिये भारी रियायतों के प्रति किसानों के रुझान में परिवर्तन लाना होगा और ऊर्जा का उपयोग बेहतर ढंग से करना होगा। इस तरह, संक्षेप में, हमें एक ऐसी कार्य प्रणाली की आवश्यकता है जिसके अंतर्गत बीज की किस्म किसी खास किस्म की मिट्टी के अनुसार तैयार करनी होगी, न कि मिट्टी किसी खास किस्म के बीज के अनुसार, जैसा कि हरित क्रांति वाली खेती में किया जाता है। इस वैकल्पिक कार्य प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि गाँव के गरीबों को उनकी मेहनत का लाभ मिले, संसाधनों का संरक्षण किया जाए और उन्हें बर्बाद न होने दिया जाए।

इस कार्य प्रणाली के अन्तर्गत पारिस्थितिकी के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन करना होगा, दूसरे शब्दों में, हमें एक ऐसी कार्य-प्रणाली की आवश्यकता है जिसमें पर्यावरण की दृष्टि से कम कीमत चुकानी पड़े, परन्तु जिस पर चलने से अन्न का उत्पादन अधिक हो और आमदनी भी अच्छी हो। यह इसलिये जरूरी है ताकि गरीब तथा सम्पत्ति-विहीन किसान ‘परिस्थितियों के मारे शरणार्थी’ न बनें। लेखक का मानना है कि किसी भी क्षेत्र-विशेष की कृषि तथा पारिस्थितिकीय प्रणालियों को विकसित करने से यह किया जा सकता है। इस प्रणाली पर चलने से एक ऐसी स्थिति हमारे सामने आयेगी जिसके अंतर्गत खाद्यान्न का भरपूर उत्पादन स्थानीय रूप से होने लगेगा, अनुसंधान और विकास स्थानीय समस्याओं को ध्यान में रखकर किया जाएगा, इस्तेमाल की गयी ऊर्जा को नवीकृत किया जा सकेगा तथा जीवित रहने के लिये एक विकेंद्रीकृत प्रणाली विकसित की जा सकेगी और इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह होगी कि लोगों का रहन-सहन जैविक और पारिस्थितिकीय सिद्धान्तों के अनुकूल होगा।

इस तरह यह स्पष्ट है कि चूँकि भारत में जमीन की कमी महसूस की जा रही है, इसलिये हमें कृषि-पारिस्थितिकीय प्रणाली विकसित करके खराब हो गई जमीन को उपयोग में लाना होगा। इसके लिये हमें कृषि वन, पशु-पालन और मत्स्य पालन साथ-साथ हो सके, ऐसा तरीका अपनाना होगा। इस मार्ग पर चलने से हम अपनी आजीविका भी सुनिश्चित कर सकेंगे।

बांथ्रा का उदाहरण


जमीन को सुधारना एक गम्भीर समस्या है, इसलिये यह अनुसंधान और विकास में लगे विशेषज्ञों के लिये चुनौती है। इस सिलसिले में यहाँ बांथ्रा की क्षारीय भूमि के पारिस्थितिकीय विकास के उदाहरण का उल्लेख प्रासंगिक होगा। वहाँ पर समग्र रूप से अनुकूल प्रणाली का अनुसरण किया गया था जो पारिस्थितिकीय मापदंड से साफ-सुथरी थी। जिसमें कम ऊर्जा तथा इंजीनियरी के कम साधन इस्तेमाल किये गये थे और मानव शक्ति का उपयोग स्वैच्छिक आधार पर किया गया था। इसके अन्तर्गत किया गया काम बहु आयामी था। इसका उद्देश्य केवल अपना गुजर-बसर कर सकने वाले किसानों की सहायता करना था। उन किसानों की सहायता अनाज, चारा, ईंधन, धागा, खाद, जलीय, कृषि, दवा-दारू की उपलब्धि और ग्रामीण स्तर के जैविक पदार्थों पर आधारित छोटे उद्योगों को शुरू करके की गयी थी। इस प्रकार की कार्य-प्रणाली का एक पहलू यह भी है कि इससे जैविक दृष्टि से पर्यावरण में सौन्दर्य की वृद्धि होती है, सूक्ष्म स्तर पर मौसम में सुधार हो जाता है और एक विशाल बियाबान जंगल का निर्माण किया जा सकता है।

इस मामले में एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी थी कि सिंचाई के लिये पानी की उपलब्धि काफी अच्छी थी, उसकी गुणवत्ता तथा मात्रा दोनों ही अच्छी थी (59,020 लीटर प्रतिघंटा)। बांथ्रा में शुरू में ऐसे पौधे उगाये गये जो क्षार को सहन कर सकते थे, परन्तु समय बीतने के साथ-साथ वहाँ जैविक पदार्थ पैदा होने लगे, जिससे वहाँ की मिट्टी में सुधार हो गया। वहाँ केंचुओं सहित और भी मिट्टी के कीड़ों की वापसी हो गयी। बाद में वहाँ ऐसे पौधे भी लगाये गये जिन्हें क्षार को सहन करने में कठिनाई होती थी। अनेक प्रकार के पौधे जो वहाँ उगाये गये थे, बाद में लागत और लाभ के अनुपात की दृष्टि से फायदेमंद साबित हुए। इससे उस क्षेत्र के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय वातावरण में उल्लेखनीय परिवर्तन आ गया।

फालतू पानी बाहर निकालने तथा पानी इकट्ठा होने से रोकने के लिये बनाये गये पोखर तथा नहर इत्यादि जैसे कृत्रिम जल-वाहकों में पानी में उगने वाले पौधे लगाये गये। ये पौधे जंगली और आर्थिक दृष्टि से लाभदायक दोनों ही किस्म के थे। आर्थिक दृष्टि से लाभदायक पौधों में सैलिक्स, ट्रापा, स्क्राइपस, टाइफा और नेलम्बो भी थे। जलीय जैविक पदार्थों के उत्पादन की मात्रा का आकलन तो नहीं किया गया, पर आमतौर पर कहा जा सकता है कि सभी पौधे खूब फले-फूले। उनसे मिट्टी की किस्म में सुधार हुआ हो यह तो नहीं कहा जा सकता। फिर भी यह कहा जा सकता है कि इस प्रक्रिया से दो प्रकार की कृषि-पारिस्थितिकीय प्रणालियाँ उभरकर सामने आयीं। ये प्रणालियाँ थीं- निचले व छिछले क्षेत्रों में वन-हँस-मछली-कृषि पारिस्थितिकीय प्रणाली तथा पोखरों में कमल-हँस-मछली कृषि पारिस्थितिकीय प्रणाली। मनुष्य द्वारा बनाये गये इस छोटे से कृत्रिम जंगल में उपयोग में लाये जाने वाली खाद्य-सामग्री का विवरण भी इकट्ठा किया गया।

कोई भी कृषि-पारिस्थितिकी प्रणाली वास्तव में मनुष्य द्वारा बनायी गयी पारिस्थितिकीय प्रणाली है जिसका उपयोग भोजन, चारा, ईंधन, खाद, धागा, लकड़ी, दवा-दारू, पानी में की जाने वाली खेती, फसलें और इनके साथ ही, कुछ लाभ की प्राप्ति के लिये किया जाता है।

यह स्पष्ट है कि क्षारीय जमीन लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये उपयोग में ही नहीं लायी गयी। बल्कि उसका उपयोग एक ऐसा क्षेत्र बनाने के लिये भी किया गया जिसमें मनुष्य द्वारा निर्मित एक कृत्रिम जंगल बनाया गया। इस जंगल में अनेक किस्म के जानवरों ने अपने लिये घर बनाये। इनमें सबसे उल्लेखनीय प्राणी केंचुआ है जो 15 साल की कड़ी मेहनत के बाद यहाँ पैदा हुआ, यह मिट्टी में सुधार का स्पष्ट लक्ष्य था क्योंकि केंचुआ ह्यूमस मिट्टी में ही पैदा हो सकता है। इसके अलावा पारिस्थितिकी के विकास के और भी उदाहरण हैं जिनमें खराब हो गई भूमि को सुधार करके कृषि-पारिस्थितिकीय प्रणाली को परिवर्तित कर दिया गया। यहाँ मूल उद्देश्य यही रहा कि पारिस्थितिकी का सामंजस्य लोगों के दीर्घ-कालीन हितों के साथ बैठाया जाए। इससे लोगों में उसे बनाये रखने में स्थायी रूप से दिलचस्पी हो जाती है। यहाँ पंजाब की शिवालिक पहाड़ियों में सुखामजारी का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा, जिनकी पहले भी चर्चा हुयी थी।

पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण


इसलिये खराब हो गई जमीन के उपयोग के अनुकूल अनुसंधान और विकास पर आधारित प्रणालियों की दीर्घावधि योजना, शिक्षा और प्रशिक्षण तथा पारिस्थितिकी कृषि का प्रदर्शन और विस्तार शुरू करने की आवश्यकता है। हमारा उद्देश्य यह होना चाहिये कि क्षेत्र-विशेष की परिस्थितियों के अनुकूल कृषि पारिस्थितिकीय प्रणालियों का विकास करें। इस कार्य में न केवल पारिस्थितिकीय के बारे में जागरुक कृषि वैज्ञानिकों के सभी वर्गों, बल्कि पारिस्थितिकी-विदों तथा समाज-अर्थ-विदों को भी शामिल किया जाना चाहिए। कोई भी कृषि-पारिस्थितिकी प्रणाली वास्तव में मनुष्य द्वारा बनायी गयी पारिस्थितिकीय प्रणाली है जिसका उपयोग भोजन, चारा, ईंधन, खाद, धागा, लकड़ी, दवा-दारू, पानी में की जाने वाली खेती, फसलें और इनके साथ ही, कुछ लाभ की प्राप्ति के लिये किया जाता है। उद्देश्य यह है कि उत्पादन निर्बाध गति से होते रहना चाहिए और सेवाओं में किसी भी प्रकार की रुकावट नहीं आनी चाहिए।

कृषि-उत्पादन के प्रति ऐसा दृष्टिकोण उस परिकल्पना पर आधारित है जिसका उद्देश्य ऐसी प्रणालियों को विकसित करना है, जिन पर चलने से जमीन की उत्पादकता बनाये रखी जा सके, संसाधन संरक्षण की क्षमता हो तथा जिनमें कम खतरे वाले खेतों के पारम्परिक तरीकों तथा जीव विज्ञान की खोजों का सामंजस्य बिठाया गया हो और उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य पक्ष, जैसे भूमि का स्वामित्व, खेत का आकार, मूल्य नीति, स्थानीय बाजार तथा खेती के आधुनिक उपकरणों और रसायनों पर कम निर्भरता। यह प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो खाद्यान्न के उत्पादन को लगातार उतना बनाये रख सके जितना कि वह अधिकाधिक सम्भव हो तथा जिससे लम्बे समय तक आमदनी होती रहे। जमीन पर किये जाने वाले इस प्रकार के प्रयोगों के लिये वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों, सामाजिक अर्थशास्त्रियों, सामुदायिक कार्यकर्ताओं इत्यादि का पूल बनाने की आवश्यकता है।

नीतिगत मसले


भारत जैसे देश के लिये जहाँ जमीन की उपलब्धि दुर्लभ है, खराब हो गई जमीन को सुधारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं। इसी के माध्यम से कृषि वानिकी, पशु-पालन और मत्स्य पालन सम्बन्धी आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। यह भी सम्भव है कि इसी के जरिये जनसंख्या की बसावट तथा उद्योगों को लगाने के का में भी मदद मिलेगी।

भारत जैसे देश में जहाँ जनसंख्या सहित अनेक प्रकार के दबावों के कारण जमीन की उपलब्धि दुर्लभ हो गयी है, जमीन सुधारने के लिये दो प्रकार की प्रणालियाँ अपनानी होंगी। एक प्रणाली तो ऐसी होनी चाहिए जो अच्छी जमीन को नुकसान होने से बचाये। इससे गरीबी से जुड़े कारणों की रोकथाम की जा सकेगी तथा जैविक पदार्थों को, उनसे होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा। इससे यह आशा की जा सकती है कि किसी भी जमीन को जितना नुकसान हो गया है, उसे और अधिक नुकसान न हो। दूसरी प्रणाली, उस जमीन का पारिस्थितिकीय विकास करेगी जो विगत में हुए विकास तथा अन्य कारणों से खराब हुई है। मकसद यह है कि पहले जितना भी पारिस्थितिकीय नुकसान हुआ है उसकी भरपाई की जाए। दोनों ही प्रणालियों में प्राणियों के लिये आवश्यक चार तत्व-जमीन, पानी, जंगल और मछलियों की रक्षा सुनिश्चित की जाएगी। इन सब में निकट का सम्बन्ध है और इनकी समन्वित प्रबंध व्यवस्था के जरिये ही वांछित परिणाम पाये जा सकेंगे। भारत जैसे देश के लिये जहाँ जमीन की उपलब्धि दुर्लभ है, खराब हो गई जमीन को सुधारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं। इसी के माध्यम से कृषि वानिकी, पशु-पालन और मत्स्य पालन सम्बन्धी आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। यह भी सम्भव है कि इसी के जरिये जनसंख्या की बसावट तथा उद्योगों को लगाने के का में भी मदद मिलेगी। इसके लिये देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नीतिगत निर्णय लेने होंगे जिनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया जा रहा है।

सामान्य


- सभी लोगों और विशेष रूप से साधनहीन गरीबों, भूमिहीन किसानों और खराब हो गयी जमीन पर आश्रित चरवाहों के लिये ‘आजीविका की सुरक्षा’ को न्यूनतम बुनियादी आवश्यकता घोषित कर दिया जाए।

- कृषि-वन-चरागाह-मत्स्य पालन को संरक्षण देने की प्रणाली के बारे में पारिस्थितिकीय दृष्टि से लाभदायक जैविक पदार्थ के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाए जिससे मनुष्य द्वारा निर्मित कृषि-पारिस्थितिकीय प्रणालियों का विकास हो सके। इसके जरिये समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम के अंतर्गत खराब हो गई जमीन का उपयोग किया जा सकेगा।

- जैविक पदार्थों का उत्पादन तथा ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को चिरस्थायी बनाकर उन्हें पारिस्थितिकीय तथा आर्थिक कार्यक्रमों से सम्बद्ध कर दिया जाए।

- पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन तथा स्वस्थ पर्यावरण को चिरस्थायी बनाने की योजना को पारिस्थितिकीय सुधार परियोजना के निर्माण कार्यान्वयन तथा निगरानी के कार्यक्रम का अभिन्न अंग बना दिया जाए। उससे भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा।

भूमि


- सभी भूमि संसाधनों का आकलन करने के लिये आधुनिक उपकरणों का उपयोग किया जाए। आकलन में जमीन के विकेन्द्रीकरण, उपयोग, क्षमता तथा उत्पादकता का मूल्यांकन और जनसंख्या के संदर्भ में उसकी वहन क्षमता का समावेश किया जाए।

- पारिस्थितिकीय दृष्टि से उपयोगी जमीन के इस्तेमाल की नीति विकसित की जाए। यह नीति मिट्टी की गुणवत्ता तथा वहन क्षमता और कृषि तथा गैर-कृषि दृष्टि से उसकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर बनायी जाए।

- भूमि सुधार और छोटे तथा भूमिहीन किसानों और महिलाओं (जहाँ वे घर की मालिक हों) के पक्ष में जमीन, पानी, पशु और वृक्षों जैसे संसाधनों का न्यायसंगत वितरण किया जाए।

- जमीन का वितरण दीर्घावधि के लिये किया जाए और ऐसा करते समय मालिकाना हक की स्पष्ट तथा सुनिश्चित व्याख्या की जाए। उद्देश्य यह होना चाहिये कि छोटे और भूमिहीन किसानों के हितों की रक्षा हो सके। इससे जमीन के संरक्षण में उनकी दिलचस्पी बढ़ेगी, खराब हो गई जमीन में सुधार होगा तथा उसमें स्थानीय वातावरण के अनुकूल अच्छी किस्म के वृक्ष उगेंगे और बेहतर नस्ल के पशु पैदा होंगे।

- जमीन के स्वामित्व की गारण्टी दी जाए। साथ में सिंचाई के लिये पानी, पशु और पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जिससे भूमि के संरक्षण में किसान (विशेषकर भूमिहीन किसान) की दिलचस्पी बढ़ेगी और वह स्वेच्छा से जमीन को उसकी क्षमता लौटाने वाले पारिस्थितिकीय कार्यों में योगदान करने को तैयार हो जाए।

- गाँवों की खराब हो गई सांझी परिसम्पत्तियों (जंगल, चरागाह, जलस्रोत इत्यादि) को सहकारिता के आधार पर सुधारा जाए जिससे गाँवों में किसानों को उनके उपयोग का हक मिल सके।

- मिट्टी के बहाव तथा अमलीकरण और मिट्टी की उत्पादकता में गिरावट को रोकने के प्रयास किये जाएँ, साथ ही जंगलों को वृक्षों से विहीन होने, भूमि को रेगिस्तान बनने और भूमिगत जल को नाइट्रेट और फासफोरस के प्रदूषण से बचाया जाए।

- भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिये कम लागत वाले जैविक तरीके खोजे जाएँ। जमीन को उसकी खोयी क्षमता लौटाने वाली सभी पारिस्थितिकीय परियोजनाओं में जैविक प्रणाली पर आधारित ऐसी कीट नियंत्रक प्रणालियों का पता लगाया जाए जो कारगर होने के साथ-साथ कम लागत वाली हों।

- सूखे तथा तटीय क्षेत्रों, बेकार भूखण्डों, अधिक खुदी हुई खदानों वाले क्षेत्रों और रेगिस्तानी इलाकों को उपयोगी बनाकर भूमि का विकास किया जाए। इस तरह की जमीन को क्षेत्र-विशेष की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उपयोग में लाया जाए। लकड़ी/घास जैसी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये उन्हें काम में लाया जाए, ताकि खेती योग्य दुर्लभ जमीन पर अन्यथा पड़ने वाला दबाव न पड़े।

- स्थान बदलकर खेती करने वाली जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये फसलों, वृक्षों और पशु-पालन का मिला-जुला सुसंगत परिवेश तैयार किया जाए।

जल


- आधुनिक प्रौद्योगिकी की सहायता से जल संसाधनों का आकलन किया जाए। इसमें पानी की उपलब्धता, गुणवत्ता तथा उपयोग के पारिस्थितिकीय जैविक, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की जानकारी शामिल की जाए।

- जल संरक्षण और प्रबंध की राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए। यह नीति ऐसे सतही और भूमिगत जल स्रोतों के लिये होनी चाहिये। जहाँ जल हर साल घटता-बढ़ता है। इसका उद्देश्य उन्हें पारिस्थितियकीय दृष्टि से चिरस्थायी बनाना है।

- दो पूर्ण सिंचाई परियोजनाओं से होने वाले पानी के जमाव और उससे उत्पन्न लवणीकरण तथा क्षारीकरण, जो कृषि उत्पादन के लिये खतरा है, को रोकने के उपाय किये जाएँ।

- बड़ी-बड़ी नदी-घाटी परियोजनाओं और बड़े बाँधों को पारिस्थितिकीय दृष्टि से उपयोगी बनाने के तरीके खोजे जाएं। इसके लिये पर्यावरण तथा परियोजनाओं पर होने वाले व्यय और पानी के उद्गम स्थलों, बाँध निर्माण स्थलों के साथ-साथ विस्थापितों पर होने वाले आर्थिक प्रभाव, जंगलों व मत्स्य संसाधनों के डूबने, मिट्टी को होने वाले नुकसान, इत्यादि की समीक्षा की जाए। जलाशयों की आयु बढ़ाने के तरीकों का पता लगाया जाए। जल के उद्गम स्थलों में मिट्टी वृक्षारोपण से संरक्षण किया जा सकता है। बिना लागत बढ़ाये पनबिजली की सप्लाई और सिंचाई क्षमता को बढ़ाया जाए।

- कम लागत के छोटे बाँधों और नदी के बहाव से पैदा होने वाली बिजली परियोजनाओं को क्रियान्वित करने की संभावनाओं का पता लगाया जाए। इनमें जल निकासी की व्यवस्था भी की जाए। उद्देश्य यह हो कि छोटे किसानों के हित सुरक्षित रहें तथा जमीन, पानी और लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े।

कृषि रसायन


कृषि रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल रिसाव तथा खाद के बहाव और पोषक तत्वों की बर्बादी को रोककर मिट्टी को उनसे बचाने के लिये आधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाए। पोषक तत्वों की रक्षा का कार्यक्रम क्षेत्र-विशेष की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाए। यह एक समेकित पोषक तत्व संरक्षण कार्यक्रम के जरिये किया जा सकता है। इससे खनिज पदार्थों इत्यादि पर आधारित खाद की कम से कम आवश्यकता होगी।

- क्षेत्र विशेष की परिस्थिति के अनुकुल समेकित कीट नियंत्रण प्रणाली का पता लगाया जाए। इससे पर्यावरणीय दृष्टि से उपयोगी वस्तुओं तथा भोज्य पदार्थों में कीड़ों के प्रवेश तथा उससे होने वाले नुकसान को रोका जा सकेगा। इससे फसलों, पशुओं और उनसे मिलने वाले उत्पादों तथा लोगों (विशेषकर श्रमिकों) के स्वास्थ्य में सुधार होगा। कीट नियंत्रण प्रणालियों में जैविक माध्यम से उपयोग में आ सकने तथा वनीकृत होने योग्य जैविक पदार्थों के अधिकाधिक काम में लाने के भरसक उपाय किये जाने चाहिए।

वन-शृंखला और वानिकी


- वन शृंखलाओं की देख-रेख के उपाय किये जाएँ। ये विशेष रूप से बारिश और बाहरी क्षेत्रों के लिये उपयोगी हैं। इनमें पेड़-पौधों, मिट्टी, जल, पशुओं के स्वास्थ्य तथा कृषि और पशु-पालन सम्बन्धी आवश्यकताओं का सामंजस्य पारिस्थितिकी के साथ बैठाना होगा।

- उष्ण कटिबंधीय-अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय जंगल वाले क्षेत्रों को हो रहे पारिस्थितिकीय, सामाजिक और आर्थिक नुकसान का गहराई से अध्ययन किया जाए। उनकी देखभाल तथा संरक्षण के लिये कारगर उपाय किये जाएँ। खराब हो रखी जमीन को उपयोगी बनाने के लिये औद्योगिक तथा कृषि वानिकी प्रणालियों की एक मिली-जुली विकास प्रक्रिया विकसित की जाए। इससे दीर्घावधि पारिस्थितिकीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। मिट्टी तथा पानी को खराब होने से बचाया जा सकेगा, लोगों को निर्बाध गति से वस्तुएँ और सेवायें मिल सकेंगी तथा गाँव के लोगों (विशेषकर गरीबों) को जल व लकड़ी उपलब्ध हो सकेगी।

- जहाँ तक हो सके गाँव के लोगों को उनके आस-पास के वातावरण को सुधारने और मनोरंजन, पर्यटन, वन्य प्राणियों की रक्षा तथा अन्य सुविधाएँ जुटाने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। आवश्यक समझें तो उन्हें इस कार्य के लिये पुरस्कार दिए जा सकते हैं।

- जो लोग खदानों का दोहन करने में लगे हुए हैं उनके लिये कानूनन अनिवार्य कर दिया जाए कि वे खदानों के बेतहाशा दोहन से खराब हुई जमीन को उपयोगी बनाएँ। यह कार्य क्षेत्र विशेष के प्राकृतिक परिवेश तथा कृषि पारिस्थितिकीय प्रणालियों के अनुसार किया जाना चाहिए।

- स्थानीय लोगों के सहयोग से पौधशालाओं को आधुनिक बनाया जाए। इनमें बढ़िया किस्म के पौधे लगाए जाएँ जो क्षेत्र विशेष के लिये लाभकारी हों।

- जल-उद्गम स्थलों के प्रबंध के लिये समग्र रूप से उपयोगी दृष्टिकोण अपनाया जाए। उसमें पारिस्थितिकीय सामाजिक और आर्थिक सभी पक्षों का समावेश होना चाहिए। इससे चिरकाल तक जल सुरक्षित रह सकेगा।

- जल-उद्गमस्थलों, वनों जैविक अभयारण्यों और विरल पारिस्थितिकीय प्रणालियों की रक्षा की जाए। जहाँ-जहाँ उन्हें नुकसान हुआ हो उसकी भरपाई की जाए।

- उन्नत किस्म के जंगलों की कटाई रोकी जाए, उनमें स्थान बदलकर की जाने वाली खेती को रोकने के उपाय किये जाएँ, क्योंकि इससे पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिये कृषि-वानिकी की परियोजनायें क्रियान्वित की जाएँ।

जैविक विभिन्नता


- क्षेत्र विशेष के लिये उपयोगी फसलों तथा आर्थिक दृष्टि से उपयोगी अन्य पदार्थों, लकड़ी, पशु और मछलियों की प्रजनन प्रणालियों की रक्षा के लिये पूरे जन समुदाय का सहयोग लिया जाए। गाँव, जिला, राज्य, राष्ट्रीय-विभिन्न स्तरों पर इसके लिये कार्यक्रम चलाये जाएँ। सुरक्षित क्षेत्रों (अभयारण्यों) की सुरक्षा लम्बे समय तक के लिये सुनिश्चित की जाए। उन्हें उनकी आवश्यकता अनुसार जैविक पदार्थ उपलब्ध कराये जाएँ।

- संरक्षण की योजनाएँ जनसंख्या आनुवांशिकी और विकासात्मक जीव-विज्ञान के सिद्धान्तों के अनुसार बनायी जाएँ ताकि कालांतर में होने वाले आनुवांशिक नुकसान से बचा जा सके।

ग्रामीण विकास


- समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम में पारिस्थितिकीय समस्याओं को सुलझाने के प्रयास किये जाएँ। जमीन, पानी, फसलों और वृक्षों की किस्म सुधारने के तरीके खोजे जाएँ। गाँव की कृषि पारिस्थितिकीय प्रणालियों को चिरस्थायी बनाने के उपाय किये जाएँ।

अनुसंधान और शिक्षा


- खराब हो रखी जमीन में जैविक उत्पादन के लिये अनुसंधान और विकास, शिक्षा, प्रशिक्षण और पाठ्यक्रमों के विकास तथा विस्तार के काम में तेजी लायी जाए। प्रशिक्षित जनशक्ति लोगों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता पैदा करेगी। इस मामले में युवा, बच्चों और महिलाओं का खास ध्यान रखा जाए। ऐसे कृषि-वैज्ञानिकों और विस्तार कार्यकर्ताओं का केडर तैयार किया जाए जो पारिस्थितिकीय सिद्धान्तों के बारे में जानकारी रखते हों।

- शहरी और ग्रामीण जनता को शिक्षित करने के लिये गैर-सरकारी संगठनों की सेवाएँ प्राप्त की जाएँ। इनके जरिए खराब जमीन को सुधारने की आवश्यकता के बारे में गाँव के लोगों को बताया जाए। यह कार्य पर्यावरण, मिट्टी संरक्षण, जल संरक्षण और वानिकी जैसे विषय-वस्तुओं के सप्ताह मनाकर या अन्य प्रकार के अभियान चलाकर किया जा सकता है।

अन्य पक्ष


- खराब पड़ी जमीन में पैदा होने वाले कमजोर किस्म के जैविक पदार्थ को शक्ति प्रदान करना आवश्यक है, इसके लिये गाँव स्तर पर ऋण, प्रौद्योगिकी व सिंचाई सुविधाएँ तथा अन्य प्रोत्साहन दिये जाएँ। इससे विशेष रूप से युवाओं और महिलाओं को रोजगार मिलेगा।

- कृषि के कर ढाँचे, कीमत नीति, प्रोत्साहन प्रणाली और व्यापार नीतियों की समीक्षा की जाए ताकि संसाधनों के आधार को कमजोर होने से बचाया जा सके और गरीब तथा भूमिहीन लाभान्वित हो सकें।

- संरक्षण प्रदान करने वाली प्रौद्योगिकी और पूँजी-निवेश को प्रोत्साहित करने के लिये कानून बनाये जाएँ जिनके अंतर्गत उन्हें संरक्षण देने वाले को प्रोत्साहित तथा उनको खराब करने वाले को दंडित किये जाने की व्यवस्था हो।

- मौजूदा कर प्रणाली, मूल्य नीतियों, प्रोत्साहनों तथा सभी प्रकार के वित्तीय अनुदानों और व्यापार के विभिन्न पक्षों की समीक्षा की जाए। उन्हें विकासशील देशों के साधनहीन गरीब लोगों के हित में ढाला जाए।

- शासन की ओर से विभिन्न मंत्रालयों/विभागों/एजेंसियों में परस्पर विचार-विमर्श के लिये कारगर व्यवस्था होनी चाहिए। यह व्यवस्था केंद्रीय, राज्य तथा स्थानीय स्तर पर होनी चाहिए, जिम्मेदारी की व्याख्या स्पष्ट रूप से की जाए, नीतियाँ तथा योजनाएँ पारिस्थितिकीय समस्याओं को सुलझाने में सक्षम होनी चाहिए।

- क्षेत्र विशेष की कृषि, जलवायु तथा कृषि-पारिस्थितिकी परिसम्पत्तियों के अनुसार बीज तथा अन्य साधनों व तरीकों का चयन किया जाए ताकि खराब हो रही जमीन में सुधार हो सके और गाँव के गरीबों को लाभ मिल सके। खराब मौसम की सूचना देने वाले तरीकों व प्रौद्योगिकी को उपयोग में लाया जाए।

- कोई भी प्रौद्योगिकी जिस प्रकार के क्षेत्र में सफल रही हो उसका प्रचार-प्रसार उसी प्रकार के अन्य क्षेत्रों में किया जाए। उसका इस्तेमाल खराब पड़ी जमीन से जैविक उत्पादन और आजीविका जुटाने के लिये किया जाए।

- पर्यावरण प्रभाव तथा उसकी चिरस्थायी क्षमता के आकलन को पारिस्थितिकीय परियोजनाओं के क्रियान्वयन का अभिन्न अंग बनाया जाए। जो परियोजनाएँ पर्यावरण की दृष्टि से अधिक उपयोगी हों उनके लिये वैज्ञानिक और सामाजिक आर्थिक-मापदण्ड तथा मार्गदर्शक सिद्धांत तैयार किया जाए।

उपसंहार


- भारतीय संविधान के अंतर्गत पर्यावरण के तीन प्रमुख अंग-जमीन, पानी और वन-राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। यद्यपि मिट्टी और पानी के संरक्षण के लिये काफी कुछ किया जा चुका है फिर भी इस दिशा में हमें तुरंत और भी कारगर उपाय करने होंगे। आज मानव तथा पशु दोनों की संख्या बढ़ने के कारण, मानव तथा जमीन और पशु तथा जमीन के मामले में भारत का अनुपात सबसे ऊँचा है। इससे गाँव में गरीबी बढ़ती है, जिसका सीधा सम्बन्ध हमारी जमीन के खराब हो जाने से जोड़ा जा सकता है। हमारी जमीन, लकड़ी की कटाई, चरागाहों में पशुओं द्वारा अंधाधुंध चराई तथा जंगलों के बेतहाशा कटने के कारण खराब हुई है। 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से 17.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन कमोबेश खराब पड़ी है। जंगलों के कटने से प्रति वर्ष जंगलों का क्षेत्र 13 लाख हेक्टेयर कम हो जाता है। इसके अलावा कृषि के गलत तरीकों, सिंचाई के दोषपूर्ण साधनों, पानी के जमाव, भूक्षरण, बिना सूझ-बूझ के बनने वाली सड़कों और मैदानों के बहाव से 10 लाख हेक्टेयर भूमि और बेकार हो जाती है। इससे सूखे और बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाता है तथा गाँव में लोग और भी गरीब हो जाते हैं। इसलिये भारत की गरीबी काफी हद तक जमीन के खराब हो जाने की समस्या से जुड़ी है।

- ग्रामीण जनसंख्या के दो मुख्य व्यवसाय-कृषि और पशुपालन हैं। यदि इनके साथ वानिकी को भी जोड़ दिया जाए तो कहा जा सकता है कि कृषि पर आधारित ये तीन गतिविधियाँ हमारे गाँव के बहुसंख्यक लोगों की आजीविका के स्रोत हैं। इसलिये बड़े पैमाने पर हो रही जमीन की खराबी को रोकने के लिये एक समन्वित कार्य योजना चलाने की आवश्यकता है। साथ ही आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके जमीन की देखरेख के लिये विस्तृत कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए। यदि भारत इस मोर्चे पर पीछे हटा तो औद्योगिक क्षेत्र में उसकी अधिकांश उपलब्धियों पर पानी फिर जाएगा। निकट भविष्य में भारत की बेहतरी के लिये अच्छी खेती का महत्त्व बना रहेगा। महात्मा गाँधी का अंत्योदय से सर्वोदय तक जाने वाला दर्शन गरीबी उन्मूलन के लिये जमीन सुधारने की सभी योजनाओं का केन्द्रबिन्दु बना रहेगा। ये योजनायें दरअसल उपजाऊ खेती, चरागाहों तथा जंगलों पर आधारित हैं।

- देश के सम्मुख सर्वाधिक जरूरी कार्य समग्र रूप से उपयोगी मिट्टी और जल संरक्षण की नीति तैयार करना है। दरअसल यह नीति पहले ही बन जानी चाहिए थी। इस नीति में केन्द्र और राज्यों तथा अमीर और गरीब दोनों प्रकार के किसानों की जिम्मेदारियों की स्पष्ट व्याख्या की जानी चाहिये। यह सरकार के पंचायती राज लागू करने के निर्णय से और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसके लिये एक उच्च अधिकार प्राप्त स्थायी समिति भी होनी चाहिये जो इसके क्रियान्वयन पर नजर रख सके तथा समय-समय पर आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन भी कर सके। भारत जैसे कृषि पर आधारित देश के लिये जमीन और पानी का खास महत्त्व है।

- इस प्रकार की व्यापक नीति जब भी तैयार हो सकेगी, उसे क्रियान्वित करने के लिये पर्याप्त धन की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। भारत के करोड़ों गरीबों का उद्धार इसी से हो सकता है।

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