कटाल्डी खनन प्रकरण: खनन माफियाओं के साथ न्यायपालिका से भी संघर्ष

Submitted by Hindi on Thu, 07/14/2011 - 16:06
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नैनीताल समाचार 05 मार्च 2010
टिहरी गढ़वाल के कटाल्डी खनन विरोधी आन्दोलन से जुड़े वन पंचायत सरपंच कलम सिंह खड़का, स्व. कुँवर प्रसून व मेरे सिर पर पाँच साल से न्यायालय की कथित अवमानना के जुर्म की सिविल जेल की सजा लटकती रही, जिसे जिला न्यायाधीश टिहरी गढ़वाल ने अन्ततः 25 अक्टूबर 2009 को निरस्त कर दिया।

2002 के आरंभ में खनन विरोधी आन्दोलन जब तेजी से चलने लगा तो खान मालिक पर्वतीय मिनरल इंडस्ट्री ने न्यायालय का रास्ता सरल समझकर कटाल्डी वन पंचायत सरपंच कलम सिंह खड़का, विजय जड़धारी एवं कुँवर प्रसून को विपक्षी पार्टी बनाकर उन पर जिला न्यायालय में मुकदमा ठोंक दिया और न्यायालय ने बिना सुनवायी के ही तीनों आन्दोलनकारियों के खनन क्षेत्र में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। न्यायालय के आदेश का सम्मान करते हुए तीनों लोग खनन क्षेत्र के अन्दर नहीं गये, किन्तु स्थानीय जनता ने रोज ही जुलूस-प्रदर्शन एवं धरना कर खनन रोके रखा। आन्दोलनकारियों ने जवाब दावा भी प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने कहा कि खनन पट्टे के लिये जो एन.ओ.सी. दिया गया है वह फर्जी है और खनन क्षेत्र चोटी की तरह है। उसके ठीक नीचे कटाल्डी गाँव है। साथ ही यहाँ सुन्दर जंगल एवं पानी का स्रोत है। लोगों की आजीविका एवं पर्यावरण बचाने के लिये खनन पर रोक लगायी जाये।

लोगों की एक भी बात नहीं सुनी गयी, किंतु खान मालिक के पक्ष में न्यायालय ने अंतरिम फैसला दे दिया। अब सफेद चूने की काली कमाई ने स्थानीय पुलिस का सहारा लेकर लोगों को डराने-धमकाने एवं आतंक फैलाकर जोर-शोर से खनन करना आरम्भ किया। आन्दोलनकारियों पर दो और मुकदमे ठोंक दिए, एक शांति भंग का और दूसरा न्यायालय की अवमानना का। खनन रोकने के लिये अब आन्दोलनकारियों के पास उच्च न्यायालय जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। तीनों आन्दोलनकारी उच्च न्यायालय सीधे न जा सकें, इसके लिये उच्च न्यायालय में पहले ही ‘कैवियेट’ बिठा दिया गया। किंतु आन्दोलनकारियों ने भी नई रणनीति अपनायी और एक स्वयंसेवी संस्था के आर. श्रीधर एवं स्थानीय महेश लखेड़ा की ओर से उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने मामले की गम्भीरता देखते हुए एवं सरकारी पक्ष को सुनकर खनन को अवैध करार देते हुए, खनन पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया। बाद में उच्च न्यायालय में भी इस मुकदमे में न्यायाधीशों के बदलते रहने पर अनेक मोड़ आये और अन्त में यह मामला अब उच्च न्यायालय ने जिलाधिकारी के सुपुर्द कर रखा है। किंतु तब से अब तक खनन पर रोक लगी हुई है।

लेकिन खनन माफियों ने इसके बावजूद भी आन्दोलनकारियों का उत्पीड़न बंद नहीं किया। नवम्बर 2002 में जिस जिला न्यायाधीश ने खनन को कानूनी रूप से सही मानते हुए खनन करने का अन्तरिम आदेश दिया था। कुछ माह बाद उनका स्थानान्तरण हो गया। नये न्यायाधीश ने इस मुकदमे पर सुनवाई शुरू की और जनता की सच्चाई को गम्भीरता से समझते हुए जिला न्यायाधीश श्री आर. पी. पाण्डे ने पर्वतीय मिनरल इंडस्ट्री के मूल मुकदमे को 7 नवम्बर 2003 को खारिज कर दिया। पट्टा धारक के हौसले पूर्व न्यायाधीश के जाते-जाते ही पस्त हो गये थे, किंतु आन्दोलनकारियों ने इसे सच्चा न्याय कहा।

इस बीच जिला न्यायालय से आन्दोलनकारियों पर चल रहे न्यायालय की अवमानना के मुकदमे की फाइल जिला त्वरित न्यायालय में कब स्थानान्तरित हुई, पता ही नहीं चला। जहाँ एक ओर मूल मुकदमा खारिज हो गया, वहीं दूसरी ओर अपर जिला न्यायाधीश, त्वरित न्यायालय के न्यायाधीश श्री मगन लाल ने मूल वाद समाप्त होने के तीन माह से भी लम्बे समय बाद 26 फरवरी 2004 को न्यायालय की अवमानना के लिये कथित रूप से दोषी 18 आन्दोलनकारियों के वाद पर बिना उन्हें सुने इकतरफा फैसला देते हुए 15 आन्दोलनकारी स्त्री, पुरुष व बच्चों को तो यह कहते हुए बरी कर दिया कि ये लोग अनजान थे, असली दोषी तीन व्यक्ति कलम सिंह खड़का, कुँवर प्रसून व विजय जड़धारी हैं। जज महोदय ने अपने आदेश में लिखा है, ये तीनों न्यायालय की अवहेलना के लिये आदेश 39 नियम 2 ए सी.पी.सी. के अन्तर्गत 15 दिन के सिविल कारावास के दण्ड से दण्डित किये जाते हैं।

सजा के आदेश की भनक आन्दोलनकारियों के अधिवक्ता को जब लगी तो उन्होंने आन्दोलनकारियों को न्यायायालय में बुलाया। तब कुँवर प्रसून जेल जाने के लिये खूब उत्सुक हो गये। वयोवृद्ध कलम सिंह और मैं भी जेल जाने को तैयार थे, किन्तु हमारे अधिवक्ता दिनेश सेमवाल एवं राजेन्द्र भट्ट ने इस सजा को पूरी तरह असंवैधानिक करार देते हुए अपील करने का निर्णय लिया। मजेदार बात यह है कि सजा सुनाने वाले न्यायाधीश श्री मगन लाल स्वयं अपील लेने को राजी हो गये। यह मुकदमा कुछ समय बाद जिला न्यायाधीश के यहाँ चला गया और वहाँ चलता रहा।

लगभग दो साल से भी अधिक समय तक यह मुकदमा जिला न्यायालय में लम्बित रहा। नये जिला न्यायाधीश जब इस पर सुनवाई करने लगे तो उन्होंने इस पर तकनीकी कमी यह निकाली कि अपील तो सिर्फ उच्च न्यायालय में होनी चाहिए थी, इसलिये ये मुकदमा उच्च न्यायालय में जाना चाहिए। पुनः आन्दोलनकारी मुकदमे की फाइल लेकर उच्च न्यायालय नैनीताल गये। उच्च न्यायालय के नियमानुसार अपील के लिये निर्धारित समय सीमा निकल गई थी। अपील को एक साल लेट कहकर एक बार तो न्यायालय ने अपील लेने से मना कर दिया, किंतु आन्दोलनकारियों के अधिवक्ता सिद्धार्थ साह ने जब सच्चाई सामने रखी कि अपीलकर्ताओं की अपील तो निर्धारित समय सीमा से पहले ही एक साल से भी लम्बे समय तक जिला अदालत में लम्बित रही, इसमें अपीलकर्ताओं का क्या दोष है ? बड़ी मशक्कत के बाद 6 जुलाई 2005 को उच्च न्यायालय में अपील दायर हो पायी।

उच्च न्यायालय में भी आन्दोलनकारियों की सजा की यह अपील दो साल तक लम्बित रही। बीच में इस पर सुनवायी भी चली, किन्तु उच्च न्यायालय भी अंतिम फैसला नहीं दे सका और अंत में 8 अगस्त 2007 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेश टंडन ने इस टिप्पणी के साथ कि यदि मूल वाद पहले खारिज हो चुका तो उसके बाद प्रकीर्ण वाद का महत्व नहीं रह जाता है। किंतु अंतिम आदेश के लिये यह फाईल पुनः निचली अदालत यानी जिला न्यायालय टिहरी को भेज दी। जिला न्यायालय में भी किसी ने इस पर दिलचस्पी नहीं दिखायी। आन्दोलनकारियों को जेल की सजा दिलाने वाला पर्वतीय खनिज उद्योग लापता हो गया। अन्त में 25 अक्टूबर 2009 को जिला न्यायाधीश टिहरी गढ़वाल ने तीनों आन्दोलनकारियों, कलम सिंह खड़का, विजय जड़धारी एवं स्वर्गीय कुँवर प्रसून को सजा के आदेश से मुक्त कर दिया। किंतु यदि संयोग से इसमें इन्हें सजा होती तो न्यायालय को स्व. कुँवर प्रसून की तलाश करनी पड़ती। पाँच साल तक सजा की तलवार इनके सर लटकती रही।

कटाल्डी खनन वाद यद्यपि बहुत बड़ा मामला नहीं है, किंतु न्यायपालिका की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह जरूर खड़े होते हैं। यद्यपि न्यायाधीशों ने न्यायपालिका की रक्षा भी की है। 20 दिसम्बर 2002 को उच्च न्यायालय ने जब खनन रोकने का अस्थाई आदेश दिया तो इससे निःसंदेह स्थानीय लोगों की आजीविका जल, जंगल एवं जमीन भी बची। किंतु आगे चलकर यह अन्तिम छोर तक अब भी नहीं पहुँचा और इस बीच निचली अदालतों में इसी मामले में यहाँ के निवासियों व आन्दोलनकारियों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा ? न्यायाधीश के साथ न्याय आना और उनके तबादले के साथ न्याय जाना। इसी तरह अन्याय का आना-जाना भी न्यायालयों में लोगों के अपने अनुभव हैं।

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