खाद्य सुरक्षा का सहारा

Submitted by birendrakrgupta on Fri, 06/27/2014 - 08:53
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डेली न्यूज एक्टिविस्ट, 27 जून 2014
भुखमरी मापने वाले सूचकांक ग्लोबल हंगर इंडेक्स ने अपनी रिपोर्ट में भारत को 63वें स्थान पर रखा है। इससे समझा जा सकता है कि देश में कितने ही ऐसे गरीब और असहाय लोग होंगे, जिनके नसीब में दो वक्त की रोटी नहीं है। योजना आयोग ने गरीबी का आकलन करने का जो पैमाना तय किया था, उस पर पिछली सरकार में काफी हो-हल्ला हुआ था। उस फार्मूले से नाममात्र के ही लोग गरीब थे।

इन विवादों को भूल भी जाया जाए तो जाते-जाते यूपीए सरकार ने लाख अड़चनों के बीच भी खाद्य सुरक्षा कानून लागू कर गरीबों के दिलों में जगह जरूर बनानी चाही थी, लेकिन राज्यों की इसमें रुचि न होने के कारण पिछली सरकार का यह सपना पूरा नहीं हो सका था। दिल्ली का निजाम बदला तो अब खाद्य सुरक्षा कानून को मुकम्मल तौर पर पूरे देश में अमलीजामा पहनाने की सक्रियता सामने आई है।

यूपीए सरकार की बोई फसल को प्रधानमंत्री मोदी की एनडीए सरकार काटने की तैयारी कर रही है। लेकिन इससे भी ज्यादा मोदी सरकार पर संभवत: महंगाई, कमजोर मानसून और आशंकित सूखे का दबाव व चिंता है। इस कानून के जरिए देश की बहुसंख्य आबादी को सस्ते में अनाज मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा...केंद्र की मोदी सरकार का लक्ष्य अगले तीन महीने में इस कानून को पूरे देश में लागू करवाने का है। इसके लिए राज्य की सरकारों को कहा जाएगा। दरअसल, महंगाई की मार, सूखे के अंदेशे और कमजोर मानसून के बीच खाद्य सुरक्षा कानून से गरीबों को राहत मिल सकेगी, इसकी उम्मीद की जा सकती है। बाकी तो अपने प्रशासन तंत्र की ही मर्जी है।

दरअसल, यह कानून 5 जुलाई, 2013 से लागू है। सितंबर में इस संबंध में अध्यादेश जारी हुआ था। वैसे तो सभी राज्य सरकारों से कहा गया था कि वे 365 दिन यानी सालभर के भीतर इसको लागू कर दें, लेकिन अब तक सिर्फ हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र राज्य ही इसे पूरी तरह लागू कर पाए हैं। दिल्ली, हिमाचल, कर्नाटक, चंडीगढ़, मध्य प्रदेश और बिहार में अभी यह आंशिक रूप से लागू है। खाद्य सुरक्षा पर सभी राज्यों को 5 जुलाई, 2013 तक लिस्ट सौंपनी थी, लेकिन अब तक सिर्फ 11 राज्यों ने लाभार्थियों की सूची सौंपी है। सरकार की मंशा है कि तीन महीने के भीतर यह कानून उन राज्यों में भी लागू हो जाए, जहां अभी तक लागू नहीं है। हालांकि इसे लागू करने पर 60 से 80 लाख टन अनाज अतिरिक्त देना होगा और सब्सिडी का भार 25 हजार करोड़ रुपए बढ़ जाएगा। इस प्रकार कुल सब्सिडी एक लाख 31 हजार रुपए की हो जाएगी।

पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के एक-आध सहयोगियों के हल्के-फुल्के विरोध के बीच मानसून सत्र में ही खाद्य सुरक्षा बिल लाना चाह रही थी, लेकिन उसे पता था कि अगर बिल ले भी आती है तो विपक्ष उसे लटकाने की कोशिश करेगा। इसी वजह से अपने अहम खाद्य सुरक्षा कानून को अमल में लाने के लिए मनमोहन सरकार ने आखिरकार अध्यादेश का रास्ता अपनाने का फैसला किया था। एक बार अध्यादेश लागू होने के बाद सरकार को इससे जुड़ा बिल प्राथमिकता के आधार पर संसद में रखना होता है।

बहरहाल यूपीए सरकार की बोई फसल को प्रधानमंत्री मोदी की एनडीए सरकार काटने की तैयारी कर रही है। लेकिन इससे भी ज्यादा मोदी सरकार पर संभवत: महंगाई, कमजोर मानसून और आशंकित सूखे का दबाव व चिंता है। तीन माह के अंदर अगर राज्य सरकारें केंद्र की मंशा के मुताबिक इस कानून को लागू नहीं करती हैं तो मोदी सरकार को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि अमुक राज्य सरकार गरीब विरोधी है, इसलिए कानून पर अमल नहीं कर रही है। जाहिर है कि राज्य सरकारें ऐसी तोहमत से दूर रहना चाहेंगी। यानी कि इस कानून के जरिए देश की बहुसंख्य आबादी को सस्ते में अनाज मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा। मनरेगा की तर्ज पर खाद्य सुरक्षा कानून भी क्रांतिकारी साबित हो सकता है।

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