खिजूरा का जल-कुम्भ

Submitted by admin on Thu, 03/13/2014 - 16:35
Source
तरुण भारत संघ

‘नीमी’ से सीख मिली


जीवन के लिए जल जरूरी है और इसकी प्राप्ति तभी संभव है जब मानव और प्रकृति के बीच सह अस्तित्व अक्षुण्ण रहे। इस हेतु जरूरी है कि नदियों को शुद्ध-सदानीरा बनाएं; जहां बैठकर सर्वत्र हरियाली की आशा-आकांक्षा के साथ अपना वर्तमान व साझे भविष्य को संवारने वाली सर्वहितकारी नीति-निर्माण की जा सके। नीति-निर्माण से पूर्व समूचे देश में नदियों के किनारे छोटे-छोटे कुम्भ आयोजित किए जाएं, जहां प्रकृति संरक्षण से जुड़े सभी सवालों पर सार्थक बहस हो। डाँग क्षेत्र के लोगों को जल-कुम्भ करने की प्रेरणा भी जयपुर जिले के नीमी गांव में हुए जल-सम्मेलन को देख कर ही मिली थी। नीमी गांव के लोगों ने अपने गांव में तरुण भारत संघ के आंशिक सहयोग से पानी के कई अच्छे काम किए थे। पानी के कारण उनकी खेती की पैदावार में आशातीत वृद्धि हुई थी। अचानक आई इस समृद्धि की खुशी में तथा देशभर के अन्य लोगों को प्रेरणा देने के उद्देश्य से उन्होंने तरुण भारत संघ के सहयोग से एक विशाल जल-सम्मेलन का आयोजन रखा था।

उल्लेखनीय है कि इसी सम्मेलन से जल-बिरादरी जैसे राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े संगठन का भी जन्म हुआ था। डाँग क्षेत्र के खिजूरा गांव के कल्याण बाबा को भी गांव के लोगों द्वारा प्रतिबंधित नीमी का विशाल जल-सम्मेलन देख कर मन में विचार आया था कि क्या हमारे गांव में भी ऐसा जल-सम्मेलन हो सकता है? यह सोच ले कर कल्याण बाबा जब अपने घर आए तो खिजूरा गांव में कार्यरत कार्यकर्ता चमन सिंह से भी उन्होंने अपने मन की बात बताई।

चमन सिंह ने कहा कि नीमी गांव में तो वहां के लोगों का बहुत बड़ा सहयोग था; सम्मेलन की पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी वहां के लोगों ने ही ली थी। क्या यहां ऐसा सहयोग होना संभव है? कल्याण बाबा ने उत्साहित हो कर कहा कि गांव के सब लोग मिलजुल कर प्रयास करेंगे तो संभव क्यों नहीं? यह कर कर वह अपने स्तर पर प्रयास करता रहा। चमन सिंह ने गांव में किसी से भी कुछ नहीं कहा, वह गांव वालों को पक्का करना चाह रहा था। गांव वालों का विचार दृढ़ होता गया।

इसी दौरान एक बार जब मैं एक मीटिंग में शरीक होने श्योपुर (मध्य प्रदेश) जा रहा था, तब जाते वक्त खिजूरा गांव में रुका था। गांव के लोगों से बातचीत हुई। बातचीत के दौरान गांव के लोगों ने, विशेष रूप से कल्याण बाबा ने, फिर वही जल-सम्मेलन करने की बात दोहराई। उसका आग्रह सुनकर मैंने उसे गांव की तरफ से आवश्यक सहयोग तथा व्यवस्था संबंधी पूरी ज़िम्मेदारी लेने को कहा। उसने तुरंत ही गांव की तरफ से पूरी ज़िम्मेदारी स्वयं ले ली। मैंने कहा कि अगर इतनी ही तैयारी है, तो सम्मेलन की कोई भी तारीख तय कर लो यह कह कर मैं श्योपुर चला गया। गांव के लोगों ने मीटिंग कर के सब की सहमति ली और सम्मेलन की तारीख तय कर ली। सम्मेलन का नाम ‘जल-कुम्भ’ रखा गया।

इस मीटिंग के बाद गांव के मुखिया लोग रायबेली गांव में गए; वहां भी लोगों से राय ली तो वे लोग भी तैयार हो गए। इसके बाद एक बड़ी मीटिंग खिजूरा गांव में पुनः रखी गई, जिसमें आसपास के गाँवों के मुखिया लोगों को बुलाया गया था। उनसे भी जब ‘जल-कुम्भ’ की बात की गई तो वे लोग भी सहयोग करने के लिए तैयार हो गए। उसी मीटिंग में सबने सहयोग व व्यवस्था संबंधी कामों को भी गाँवों के अनुसार अलग-अलग बांट लिया।

तय हुआ कि खिजूरा और रायबेली गाँवों के तो सभी लोग व्यवस्था में रहेंगे और अन्य गाँवों में से प्रत्येक गांव में से कम से कम 10 जिम्मेदार लोग व्यवस्था को संभालने के लिए पूरे समय ‘जल-कुम्भ’ में तैनात रहेंगे। सहयोगी गाँवों में से अलग-अलग गाँवों ने अलग-अलग कामों की व्यवस्था की जिम्मेदारी ली। जैसे-एक गांव ने केवल मैदान की सफाई करने की पूरी जिम्मेदारी ले ली, एक गांव ने भोजनार्थियों को पत्तल परोसने की, एक ने पूरी परोसने की, एक ने सब्जी परोसने की, एक ने दाना (बूंदी) परोसने की, एक ने पानी परोसने की, एक ने झूठी पत्तलें उठाने की तथा एक गांव ने आगंतुक लोगों को सम्भालने की जिम्मेदारियां ले लीं। गांवों के मुखिया व बुजुर्ग लोगों की जिम्मेदारी रसोई-स्थल व भंडार-गृह में हो रहे कार्यों की देखरेख करने की थी। ‘जल-कुम्भ’ के दौरान सभी ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियां पूरी तरह से निभाई। कुल मिलाकर इस सम्मेलन (जल-कुम्भ) में भंडारे की व्यवस्था बहुत अच्छी रही। भंडारे में न तो कोई चीज कम पड़ी और न ही बहुत ज्यादा बची। जूठन भी बेकार नहीं गई और सबसे बड़ी बात यह कि यहां पर आए सामान में से एक भी बर्तन गुम नहीं हुआ।

‘जल-कुम्भ’ में मीटिंग की व्यवस्था संस्थागत तौर पर हमने स्वयं सम्भाली थी। कुम्भ में देश भर के जाने माने लोग तथा स्थानीय लोग काफी संख्या में आए थे। खिजूरा गांव में आोजित इस ‘जल-कुम्भ’ का मूल उद्देश्य यही था कि हमारे देश की सभी नदियों को समाज सदैव शुद्ध, सदानीरा, निर्मल व पवित्र बनाए रखे तथा गंगा, गोदावरी व शिप्रा जैसी पवित्र नदियों के किनारे सदियों से होते आ रहे बड़े कुम्भों में भी इससे सीख लेकर प्राचीन काल में होने वाले कुम्भों की तरह से विचार-मंथन व ज्ञान-मंथन शुरू किया जा सके।

हमारे यहां प्राचीन काल से ही तीर्थ स्थानों पर ‘कुम्भ’, ‘अर्धकुम्भ’ व ‘महाकुम्भों’ के मेलों की पावन परंपरा रही है। परंपरागत रूप से होने वाले इन कुम्भों से यह तो प्रामाणिक तौर पर सिद्ध होता है कि भारत का समाज प्रारम्भ से ही नदियों को मान्यता व सम्मान देता रहा है। इन नदियों के किनारे साधना करने वाले ऋषि-महर्षियों व महात्माओं को नदियों में जहर मिलाने वालों की तथा इसे अमृत की तरह शुद्ध, निर्मल व पवित्र बहाने वालों की सम्यक् पहचान थी। तभी तो ये लोग इन प्रमुख नदियों के किनारे करोड़ों की संख्या में विचार-मंथन के लिए एकत्र होते थे। इस ज्ञान-मंथन के कुम्भ में घुले हुए विष और अमृत को नीर-क्षीर की तरह अलग-अलग करने की प्रक्रिया पर तथा इसमें विष को न घोला जाए इस बात पर चिंतन चलता था।

अमृत रूपी निर्मल जल की खोज करने वालों को देवता और इसमें जहर घोलने वालों को राक्षस कहा जाता था। ये देवता और राक्षस पहले भी थे और आज भी है। फर्क इतना है कि आज के देवता विष बन चुके अमृत को पुनः अमृत बनाने के लिए ज्ञान-मंथन के बजाए अज्ञानतावश विष को ही अमृत मानते हुए सिर्फ स्नान ही करते हैं और अनजाने में खुद भी उसमें विष (जहर) ही घोल देते हैं और आज के राक्षस लोग तो राहू-केतू की तरह वेष बदल कर देवता का रूप धारण करके स्वार्थवश जान बूझकर नदी के विष बन चुके पानी को शुद्ध करने के बहाने उसमें और अधिक विष (जहर) ही घोल रहे हैं। हमारे देश के इन प्रमुख तीर्थों पर होने वाले इन कुम्भों की प्राचीन अवधारणा को ध्यान में रखते हुए ही चर्मण्यवती (चम्बल) नदी की सहायक ‘महेश्वरा नदी’ के उद्गम-स्थल पर खिजूरा गांव में हमने ‘जल-कुम्भ’ का आयोजन रखा था।

इस जल-कुम्भ में बड़े-बड़े संतों के अलावा सर्व श्री पी.वी. राजगोपाल, डॉ. सुनंदा पंवार, एल.आर.सविता वोरा, डी. आर. पाटिल, एस.एन.सुब्बाराव, के.जी. व्यास तथा भारत की पेयजल आपूर्ति की सचिव शांताशीला नायर व अन्य गणमान्य लोग भी उपस्थित थे। इनके अलावा तीन दिनों तक चलने वाले इस ‘जल-कुम्भ’ में डांग क्षेत्र के व आसपास के कुल मिलाकर लगभग ग्यारह हजार लोग भी शामिल हुए थे। सभी वक्ताओं ने जल-संरक्षण व जल-निर्मलीकरण पर अपने-अपने विचार रखे।

इन सभी लोगों ने बादल से निकली बूंदों को पकड़ कर धरती के पेट में बैठाने का तथा सूरज के द्वारा की जाने वाली चोरी को रोकने का संकल्प भी लिया। जिस काम को यहां के लोग कई सालों से कर रहे थे, उस पर भी उन्होंने गहराई से अपने-अपने विचार रखे। इस काम को कैसे और अधिक विस्तार दें? इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई। इस ‘जल-कुम्भ’ में भारत के जलसंकट के समाधान के लिए सामुदायिक जल-संरक्षण व विकेंद्रित जल-प्रबंधन पर न केवल वैचारित चिंतन-मनन किया गया, बल्कि जल-संरक्षण व जल के अनुशासित उपयोग को व्यावहारिक रूप में लाने की योजना भी बनाई गई।

जिसे यहां के 30 गाँवों के लोगों ने अपनाया। इसी का परिणाम है कि पांच साल बाद आज 2013 में भी यहां की ‘महेश्वरा नदी’ शुद्ध सदानीरा बन कर बह रही है। पानी के काम से पूर्व यह नदी सूखी व मरी हुई थी। यह यहां पर हुए ‘जल-कुम्भ’ का ही प्रताप है कि डांग क्षेत्र के लोग अपने-अपने गाँवों में पानी के काम के लिए जी-जान से जुट गए। परिणाम स्वरूप महेश्वरा नदी सदानीरा हो गई।

डांग की धरती पर अब पर्याप्त धान, गेहूं, चना व सरसों की पैदावार होने लगी है। यहां के लोग ‘जल-कुम्भ’ ने लोगों की बिखरी हुई खुशियों को जोड़ने का काम किया है। जिन किसानों ने अपने गांव में, अपने खेत में, पानी का अच्छा काम किया था, उन्होंने इस जल-कुम्भ में अपने अच्छे कामों का वर्णन आत्मगौरव व आत्मविश्वास के साथ किया। उन्होंने अपने श्रीमुख से बोल कर समझाया कि पानी के साझे काम में हमें तन की मेहनत करने की भी आदत बनानी चाहिए। एक तरह से इस ‘जल-कुम्भ’ ने राज, समाज, संत व सामाजिक कार्यकर्ताओं को ‘जल-दर्शन’ व ‘जल-संस्कृति’ का अहसास करा के इन्हें जल-संरक्षण के कार्यों में जोड़ने का आभास कराने में सफलता प्राप्त की है।

खिजूरा गांव में आयोजित यह ‘जल-कुम्भ’ आज की प्रदूषण वर्धक परिपाटी से बिल्कुल अलग था। गांव के लोगों के द्वारा पहले से ही यह तय किया हुआ था कि इस कुम्भ के दौरान किसी भी तरह की जो भी गंदगी फैलेगी, उसे हम तुरंत साफ करेंगे। इस संकल्प को उन्होंने पूरी तरह से निभाया। ‘जल-कुम्भ’ के समापन के तुरंत बाद, कुम्भ के शुरू होने से पूर्व जैसा साफ-सुथरा स्थल था वैसा ही साफ-सुथरा कुम्भ-स्थल को पुनः कर दिया गया। इस ‘जल-कुम्भ’ में प्लास्टिक का उपयोग बिल्कुल भी नहीं किया गया। भोजन के लिए दोने-पत्तल भी वहा के स्थानीय पेड़ों के पत्तों से ही बनाए हुए उपयोग में लिए गए थे।

कुम्भ-स्थल पर प्रतिदिन सात हजार लोगों के लिए दोपहर के भोजन की व्यवस्था तैयार रहती थी। इस कुम्भ की विशिष्टता यह थी कि आसपास के व बाहर से आए हुए लोग कुम्भ-स्थल पर केवल एक वक्त (दोपहर) का ही भोजन करते थे। शाम का भोजन वे इस गांव में तथा आसपास के गाँवों के लोगों के साथ जा कर उनके घरों पर ही अलग-अलग घरों में करते थे। रात्रि विश्राम भी वे वहीं पर करते थे। प्रबंधन व्यवस्था पूरी तरह से गांव के लोगों के द्वारा संचालित थी।

कुम्भ-स्थल पर भी गांव के लोगों ने ही सबको भोजन परोसा था। कुम्भ के आयोजन से बालक, बूढ़े, जवान व महिलाएं सब आनंदित थे। कुम्भ की यादें आज भी लोगों के मन-मानस में बसी हुई हैं। जल-कुम्भ का संयोजन, संचालन व प्रबंधन पूरी तरह से व्यवस्थित था। कुम्भ में किए गए अंतिम निर्णय भी बहुत ही सार्थक थे। इन निर्णयों की पालना लोगों ने अपने-अपने गाँवों में जा कर पूरी तरह से निभाई।

यह पुस्तक इस जल-कुम्भ के पांच साल बाद लिखी जा रही है, इन पांच सालों में लोगों को यह समझ में आया है कि गंगा, गोदावरी व शिप्रा जैसी नदियों पर परंपरागत रूप से होने वाले कुम्भ,सिर्फ स्नान कर लेने मात्र से ही सफल नहीं माने जा सकते; बल्कि यह तो समाज को संगठित व संस्कारित रखने की एक सतत प्रक्रिया है।

संस्कार-निर्माण की यह मंथन-प्रक्रिया हजारों सालों तक बखूबी चलती रही थी, पर बीच के एक लंबे दौर में इस का मूल उद्देश्य ही पूर्णतः विस्मृत हो गया। लोग भूल ही गए कि ऐसा भी कभी होता था। इसी विचार-मंथन प्रक्रिया को पुनः याद कराने के लिए ही इस पुस्तक का लेखन किया गया है। इस प्रक्रिया से समाज अपने सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विकास के पथ पर अग्रसर हो सकता है।

खिजूरा में किया गया यह ‘जल-कुम्भ’ भारत के तीर्थ स्थलों पर होने वाले कुम्भों से गहरा रिश्ता रखता है, पर यह ‘जल-कुम्भ’ उन कुम्भों की अपेक्षा ज्यादा अच्छे परिणाम दिखाने वाला सिद्ध हुआ है। इसी जल-कुम्भ से प्रेरणा लेकर डांग के लोगों ने ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ कर दिखलाया है।

सभा के अंत में एक बहुत अच्छी बात यह हुई कि समापन के समय जब मैंने एक कृत्रिम बरसात लाने का अभिनय (खेल) किया, तब संयोग से ही कुछ देर बाद-जब कि बारिश की कोई सम्भावना नहीं थी, अचानक ही बहुत तेज बरसात वास्तव में ही हो गई। टैंट की व्यवस्था होते हुए भी सब लोग भीग गए थे। पर इस भीगने में भी सबको खुशी ही हुई थी, क्योंकि उस समय फसल के लिए बरसात की सख्त जरूरत भी थी। दूसरी बात यह कि कृत्रिम बरसात के खेल के प्रदर्शन के तुरंत बाद वास्तविक बरसात होने से लोगों में ईश्वर के प्रति, संस्था के प्रति तथा जल-कुम्भ के प्रति भी बेहद आस्था बढ़ी और सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि उन्हें अपने आप पर और अपने ही श्रम पर भी अत्यधिक विश्वास बढ़ा।

क्या है कुम्भ?


कुम्भ बेहतर जीवन हेतु मानव और प्रकृति के शुभाशुभ की संभावनाओं को खोजने की एक प्रक्रिया का नाम है, जिसमें भिन्न-भीन्न संस्कृतियों के संघर्ष के शांतिमय समाधान को खोजा जाता है। इसमें जीवन समृद्धि हेतु शांति के रास्ते ढूंढने वाली परिवर्तन की प्रक्रिया संचालित की जाती है। यही नहीं यह सर्व हित को दृष्टिगत रख शुभाशुभ करने वालों को याथोचित सम्मान देने के साथ ही सत्कर्मों को सबल बनाने के लिए शक्ति, श्रद्धाभाव, प्रेम व भक्ति की भावना का संचार करने का माध्यम भी है।



शास्त्रों में उल्लेख है कि गंगा को मानव-कल्याणकारी व उसकी प्राण रक्षिका मानकर उसके प्रति कृतज्ञता भाव प्रकट करने हेतु, संपूर्ण मानव समाज उसके किनारे इस आशय से पहुंचा था कि गंगा की पवित्रता यथावत बनी रहे और इस सम्मेलन के माध्यम से समाज हेतु अनुशाषित व्यवहार और संस्कार सुनिश्चित किए जा सकें। साथ ही मानव और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व की भावना न केवल सुदृढ़ हो; बल्कि वह समृद्ध भी बने।

यह सर्वविदित है कि मानवीय अक्षम विकास का मूल प्रकृति ही है। मानव भी प्रकृति के अंग यथा-प्राणी, वृक्ष आदि की तरह ही है; लेकिन मानवीय जीवन की जटिलताएं व विषमताएं वर्तमान में प्रकृति के अन्य अंगों यथा-जल, जंगल, जमीन और जीवों के लिए संकट बन गई हैं। इसके निवारण हेतु जल, जंगल, जमीन व प्रकृति से मोह, निकटता व उसकी रक्षा हेतु संकल्प को अनुभव किया जाता रहा है। उसमें आज भी कोई बदलाव नहीं आया है। लेकिन मानवीय लोभ ने उसका स्वरूप अवश्य बदल कर रख दिया है। क्योंकि उसने न तो महात्मा गांधी के कथन- ‘जितना तुम प्रकृति से लो, उतना उसे वापस करना भी अपना दायित्व समझो’ - को माना और न ही महावीर बुद्ध-दादू-नानक-यीशू जैसे महापुरुषों व संतों के ‘जियो और जीने दो’ के संदेश को ही महत्व दिया। बल्कि उसने तो प्रकृति-प्रदत्त सभी वस्तुओं पर ही नहीं; अपितु संपूर्ण प्रकृति का ही नियंता बनने का भी पुरजोर प्रयास किया। कारण कि वह प्रकृति का रक्षक नहीं, अपितु नियंता बनने का प्रबल आकांक्षी है; जिसके चलते मानव जीवन पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ेगा।

इसका समाधान विज्ञान, तकनीक और प्रौद्योगिकी से नहीं, बल्कि समाज की आपसी समझ-बूझ से ही संभव है। यह समझ कुम्भ के वास्तविक सम्मेलन से ही बनना संभव है, जिसमें शासन नहीं, अनुशासन चलता है। वहीं से प्रकृति के संरक्षण के संस्कार और व्यवहार भी जन्मते हैं, जो व्यक्ति-निर्माण में भी अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं।

ग़ौरतलब है कि अपनी कुम्भ परंपरा के कारण ही भारत जगदगुरु बना था, जिसके विचलन व विखंडन से देश के सांस्कृतिक, भौतिक व नैतिक मूल्यों की रक्षा हेतु अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा आवश्यक है। पंच महाभूतों की रक्षा इसलिए जरूरी है, क्योंकि उनकी यौगिक क्रिया से प्राणों का संचार होता है। यदि उसी पर संकट हो तो प्राणों की रक्षा कैसे संभव है? जल को जीवन का आधार माना गया है और जल पर ही संकट है तो प्राणी की सुरक्षा असंभव है।

जल से ही नदी बनती है या यूं कहें कि नदी का मूल जल ही है और जल से ही नदी का जीवन संभव है। पानी का अपना जीवन होता है। जीवित पदार्थों के गुण-धर्म का योग उचित होता है, लेकिन सब एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। यदि उन्हें मिला दिया जाए तो वे आपस में लड़कर खत्म हो जाते हैं। जीवों का यह आपसी घमासान परिवेश और पर्यावरण के लिए अहितकर ही नहीं, घातक भी होता है। यह क्रांति है। इसे कौन प्रभावित करता है? इसकी गति व उसके प्रभाव के बढ़ने का माध्यम क्या है? इन सबके बारे में कुम्भ के माध्यम से ही जाना व समझा जा सकता है।

स्वक्रांति, स्वपरिवर्तन और स्वविकास उक्त कार्यों को करने की मात्र इकाई जरूर है। यह प्रक्रिया इकाई से दहाई और उससे सैकड़ा, हजार, दस हजार, लाख, दस लाख अथवा करोड़ों - अरबों की संख्या बनने से दुनिया का चेहरा बदल सकती है, जो कुम्भ से ही संभव है। वह हमारे जीवन के हर क्षेत्र में है। सच तो यह है कि इसी रास्ते से सृष्टि का संरक्षण संभव है और यह भी कि सृष्टि की रक्षा-संवर्द्धन हेतु सुर-असुर संघर्ष को भी कुम्भ कहा गया है।

यह सर्वविदित है कि हम सभी सृष्टि के मामूली अंग हैं। यदि हम बचेंगे, तो सृष्टि भी बचेगी। इसलिए हम जीवन को सृष्टि का अंग मानकर जीएं। उस दशा में दूसरे को जीने का रास्ता जहां स्वयं निकल आएगा, वहीं सर्वसम्भाव का बोध भी स्वमेव पनप जाएगा। यह जान लेना जरूरी है कि “प्रकृति से जितना लें, उतना उसको वापस भी लौटाएं” - यह नीति भी कभी कुम्भ में ही बनी थी।

देवासुर संग्राम के पीछे भी असुरों द्वारा प्रकृतिजन्य वस्तुओं पर आधिपत्य की भावना ही अहम थी, पर इसमें उसको समान रूप में वापस करने की भावना नहीं थी। इसे ही धर्म-अधर्म के बीच का संघर्ष भी कह सकते हैं।

प्रकृति हमारी मां है, जिसकी उत्पत्ति में प्रभावी व महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे नकारा नहीं जा सकता है। हमारा शरीर जिन तत्वों से बना है, वही तत्व प्रकृति में भी विद्यमान हैं। प्रकृति के तत्वों में दूषण, रोग का कारण बनेगा। जिसके चलते अच्छे-बुरे की पहचान की क्षमता का अभाव रहेगा। प्रकृति के बिना हमारे जीवन की कल्पना ही बेमानी है।

जीवन के लिए जल जरूरी है और इसकी प्राप्ति तभी संभव है जब मानव और प्रकृति के बीच सह अस्तित्व अक्षुण्ण रहे। इस हेतु जरूरी है कि नदियों को शुद्ध-सदानीरा बनाएं; जहां बैठकर सर्वत्र हरियाली की आशा-आकांक्षा के साथ अपना वर्तमान व साझे भविष्य को संवारने वाली सर्वहितकारी नीति-निर्माण की जा सके। नीति-निर्माण से पूर्व समूचे देश में नदियों के किनारे छोटे-छोटे कुम्भ आयोजित किए जाएं, जहां प्रकृति संरक्षण से जुड़े सभी सवालों पर सार्थक बहस हो। यह सार्थक बहस राज और समाज के मानस को इस दिशा में बदलने में सफल हो, ताकि राज को इसमें अपने दायित्व निर्वहन में सुगमता रहे।

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