खतरे में पर्यटन नगरी का वजूद

Submitted by Hindi on Mon, 08/06/2012 - 15:35
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जनसत्ता रविवारी, 05 अगस्त 2012
नैनीताल देश के गिने-चुने पर्यटन स्थलों में है। यह सुंदर पहाड़ों और झीलों के लिए मशहूर है। लेकिन शासन और प्रशासन की उपेक्षा और लापरवाही की वजह से इस नगरी का वजूद खतरे में है। इसका जायजा ले रहे हैं प्रयाग पांडे।

नैनीताल झीलनैनीताल झीलकहते हैं कि सियासत जब जन सरोकारों से दूर हो, सत्ता की प्यासी हो जीती है तो नौकरशाही की बन आती है। अपनी सुविधा और मर्जी से संचालित नौकरशाही कुछ भी गुल खिला सकती है। नैनीताल की हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति इस बात का जिंदा सबूत है। नैनीताल की कमजोर पहाड़ियों की हिफाजत और यहां के सुंदर तालाब और नालातंत्र की देख-रेख और रखरखाव की मंशा से पच्चासी साल पहले बनी हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति सरकारी मशीनरी के नाकारेपन की वजह से अपनी अहमियत गवां चुकी है। अलग राज्य बनने के बाद अफसरशाही ने इस विशेषज्ञ समिति का वजूद खत्म कर दिया है। पिछले एक दशक से इस कमेटी की बैठक नहीं बुलाई जा रही है। इस उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति के बारे में सरकारी अमले के फौरी और टालू रवैए की वजह से आज विश्वविख्यात इस पर्यटन नगरी के वजूद के ऊपर खतरे के बादल मड़राने लगे हैं। हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति के पहले अध्यक्ष और कुमाऊं के उपायुक्त सीएल विवियन की यहां के बारे में सितंबर 1928 की समीक्षात्मक रिपोर्ट और समिति ने नैनीताल के तालाब, पहाड़ियों और नालों के रखरखाव के लिए 1930 में जारी स्थायी आदेशों को ठंडे बस्ते के हवाले कर देने से आज यह नगर असुरक्षा के कगार पर जा पहुंचा है।

नैनीताल भूगर्भीय नजरिए से बेहद कमजोर मानी जाने वाली पहाड़ियों पर बसा है। यह नगर बसने के बाद से अब तक दर्जनों छोटे-बड़े भूस्खलनों को झेल चुका है। नैनीताल में 1840 में बसाहट शुरू हुई थी। बसाहट के सत्रह साल बाद यहां पहला भूस्खलन हुआ। 1867 में शेर का डांडा नाम की पहाड़ी में हुए इस भूस्खलन ने तब की ब्रिटिश सरकार को यहां की पहाड़ियों के कमजोर होने का अहसास करा दिया था। ब्रिटिश हुकूमत इस बारे में सचेत भी हो गई थी। 1867 के भूस्खलन के फौरन बाद तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने भूस्खलन की वजहों की जांच के वास्ते इंजीनियरों की एक समिति बनाई। इसके छह साल बाद 1873 में इंजीनियरों की एक और समिति बनी। इन समितियों ने यहां की पहाड़ियों की हिफाजत और तालाब की सेहत के मद्देनजर यहां नालों और सुरक्षा दीवारें बनाने का सुझाव दिया।

नैनीताल की बसाहट के चालीस साल बाद 18 सितंबर, 1880 में यहां एक और जबरदस्त विनाशकारी भूस्खलन हुआ। इसमें 151 लोग मारे गए। तब एशिया का सबसे भव्य समझा जाने वाले विक्टोरिया होटल समेट इसके आसपास के कई मकान मलबे में दब गए। तालाब का एक कोना मलबे से पट गया। स्नोव्यू के पास बने तबके गवर्नमेंट हाउस समेत पहाड़ी में स्थित दूसरे मकानों में जबरदस्त दरारे आ गईं। इस भूस्खलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने यहां के लिए भूवैज्ञानिक आरडी ओल्हाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई। इस कमेटी ने यहां की पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए चौदह सूत्रीय उपाय सुझाए। इसी साल तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर सर हेनरी रामजे की अध्यक्षता में भी एक और ‘रामजे कमेटी’ बनी। ब्रिटिश सरकार ने 1882 में आरई फौरबेस की अध्यक्षता में एक समिति बनाई। 1883 में हैंस लोव की अध्यक्षता में एक और समिति बनी।

इन समितियों की सस्तुतियों के आधार पर ‘नार्थ वैस्टन प्रोविंसेज अवध’ के सचिव ने 15 जुलाई 1890 को कुमाऊं के अधिशासी अभियंता और जिला इंजीनियर को यहां की पहाड़ियों की सुरक्षा के लिए कारगर उपाय सुझाने और प्रदेश सरकार को जमीनी हालात से समय-समय पर वाकिफ कराने के आदेश दिए। आदेश में लोक निर्माण विभाग से खास पुस्तक में यहां की पहाड़ियों में आ रही दरारें, भूस्खलन, पहाड़ियों में हो रहे बदलाव और खतरनाक जगहों पर मौजूद बोल्डरों का सालाना रिकार्ड कायम करने को भी कहा गया।

नैनीताल के अस्तित्व से जुड़े सवालों के मामले में समिति ने खुद को अप्रासंगिक ही नहीं बना दिया है। बल्कि इसके भविष्य से जुड़े मसलों को भी हाशिए पर धकेल दिया है। एक दशक पहले तक हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति नैनीताल के वजूद का डर दिखाकर सरकार से ज्यादा से ज्यादा रकम हासिल करने की कोशिशें जरूर करती थी। अब वह भी बंद हो गया है।

1894 में सरकार ने यहां के बारे में एक और कमेटी बनाई। इस समिति को शेर का डांडा पहाड़ी में स्थित तबके राजभवन की सुरक्षा के बारे में रिपोर्ट देनी थी। समिति को मार्च 1895 से पहले रिपोर्ट देने को कहा गया। यह भी निर्देश दिए गए कि अगर यह इलाका कमजोर पाया गया तो 1895 की बरसात से पहले राजभवन को खाली करा लिया जाए। 22 अप्रैल, 1895 को इसी मकसद से एक और कमेटी बनी। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के तबके निदेशक ग्रीस बैग और भूवैज्ञानिक ओल्हाम को इस कमेटी का मेंबर बनाया गया। 1896 में मिस्टर ओल्हाम और भूगर्भ विज्ञान विभाग ने समूचे नैनीताल की गहराई से भूगर्भीय जांच की। यह रिपोर्ट इसी साल भारत सरकार ने सार्वजनिक की। इसी साल सरकार ने जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के कार्यवाहक अधीक्षक थॉम्स एच हौलेंड से नैनीताल का सर्वे करवाया।

17 अगस्त 1898 को नैनीताल की जड़ से लगे बलियानाले में जबरस्त भूस्खलन हुआ। इसमें सत्ताईस लोग मारे गए। यहां की शराब बनाने वाली फैक्ट्री समेत आसपास के अनेक घर मलबे में दब गए। इस भूस्खलन की जांच के लिए सरकार ने भूगर्भ विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक हौलेंड की अध्यक्षता में 1898 में फिर एक समिति बनाई। 1907 में ब्रिटिश सरकार ने यहां के ब्रेमार और सेंटलू पहाड़ी के सर्वेक्षण के वास्ते हौलैंड की अगुआई में जांच कमेटी बनवाई। 1915 में यहां के पहाड़ियों के बारे में जिला अभियंता ओ ओलिफ और अधिशासी अभियंता एचजे ओलिफैंट ने सालाना रिपोर्ट छपाई। 1916 में चढ़ता हिल के बारे में एक समिति और बनी।

ब्रिटिश सरकार ने यहां की पहाड़ियों और तालाब की सुरक्षा के लिहाज से नैनीताल में एक नायाब नालातंत्र विकसित किया। इसे रखरखाव के लिहाज से बड़ा नाला सिस्टम, अयारपाटा नाला सिस्टम, शेर का डांडा नाला सिस्टम और तालाब के बाहर गिरने वाला नाला सिस्टम नाम से चार हिस्सों में बांटा। 1880 से 1928 के बीच यहां 56 बड़े और 229 छोटे ब्रांच नाले बनवाए। ये नाले करीब 53 किलोमीटर लंबे थे। नालों की ऊंचाई, चौड़ाई और गहराई का भी ब्यौरा रखा गया। कौन नाला किस जगह से बना और किस इंजीनियर ने बनवाया, इसका भी पूरा-पूरा ब्यौरा रखा जाता था। शेर का डांडा नाला सिस्टम के तहत 1880 से 1928 के बीच 22 बड़े और 111 छोटे नाले बने। बड़ा नाला सिस्टम में 1880 से 1900 के बीच 11 बड़े और 71 छोटे नाले बनाए गए। अयारपाटा नाला सिस्टम में 1899 से 1904 के बीच नौ बड़े और पांच छोटे नाले बनाए गये। जबकि तालाब से बाहर गिरने वाले चार छोटे और 14 बड़े नाले बने। इन नालों का निर्माण 1900 से 1924 के बीच हुआ। 1903 से 1908 के बीच शहर में दस बड़े और 11 छोटे नाले और बनाए गए।

1976 में यहां के बारे में एके सूर की अगुआई में सूर समिति बनी। इस समिति ने यहां के बारे में अनेक अहम सुझाव सुझाए थे, पर उन पर अमल नहीं हुआ। हां, इस समिति के आने के बाद हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति ने भी कागजी खानापूर्ति का काम शुरू कर दिया। इसके बाद समिति ने 1976 से 1984 तक नौ साल लगातार सालाना बैठकें की। बैठकों में कई प्रस्ताव पास किए गए, लेकिन अमल एक पर भी नहीं हुआ।

06 सितंबर, 1927 को गवर्नमेंट के आदेश संख्या 163सी-56 के जरिए नैनीताल के नाला तंत्र, पहाड़ियों और तालाब की हिफाजत की मंशा से हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति बनाई गई। तब के डिप्टी कमिश्नर को इस कमेटी का अध्यक्ष, लोक निर्माण विभाग के कुमाऊं के अधिशासी अभियंता को पदेन सचिव बनाया गया। डिप्टी चीफ इंजीनियर, कार्यवाहक चीफ इंजीनियर, स्वास्थ्य विभाग, सिंचाई विभाग के कुमाऊं डिवीजन के अधिशासी अभियंता और जियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया के सहायक भूवैज्ञानिक इस कमेटी के सदस्य बनाए गए। हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति ने नैनीताल की बसाहट के बाद यहां हुए भूगर्भीय हलचलों और इस बारे में पहले बनी तमाम विशेषज्ञ समितियों की जांच रिपोर्टों और सालाना रिपोर्टों के आधार पर यहां की झील और पहाड़ियों का व्यापक सर्वे किया। समिति के अध्यक्ष और तबके उपायुक्त सीएल विवयन ने 24 सितंबर, 1928 को नैनीताल के बारे में पहली समीक्षात्मक रिपोर्ट सरकार को दी।

28 अगस्त, 1930 को हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ कमेटी के पदेन सचिव डब्लयूएफ वार्नेश ने यहां के बारे में विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट के आधार पर तालाब, पहाड़ियों और नालातंत्र के रखरखाव के लिए आधा दर्जन से ज्यादा स्थायी आदेश जारी किए। इसमें वर्षा का सालाना औसत का रजिस्टर, तालाब के रखरखाव और डिस्चार्ज का लेखा-जोखा, वर्षा और पहाड़ियों की सुरक्षा कार्यों का रिकॉर्ड और रजिस्टर का रिकॉर्ड रखना शामिल था। इस बारे में बाकायदा फार्मों का खाका भी तय किया गया था। यहां के कोने-कोने के ऑब्जर्वेशन पिलर बनाए गए। शहर को निर्माण के लिए सुरक्षित और असुरक्षित दो भागों में बांटा गया। सड़क और नालों की फेहरिश्त बनाई गई। नाले और सड़कों की लंबाई-चौड़ाई वगैरह का रिकॉर्ड कायम किया गया। शहर के नालों, सड़कों, निर्माण के लिए पाबंदी वाले इलाकों, भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की हिफाजत और कार्यों के लिए नियमित मुआयनों की जिम्मेदारियां तय की गई। अवर अभियंता, सहायक अभियंता और अधिशासी अभियंता के मुआयने तय किए गए। मुआयनों के लिए बाकायदा फार्म तय किए गए। आदेश दिया गया कि संबंधित अफसर अपने तयशुदा मुआयनों के बाद इस बारे में बने रजिस्टरों में मुआयना रिपोर्ट दर्ज करेंगे। बाद में इसे सालाना रिपोर्ट के रूप में छापा जाता था। शुरुआत के कुछ सालों में हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति ने यहां के बारे में अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की। इन रिपोटों के आधार पर यहां के लिए सुरक्षात्मक उपाय तय किए जाते थे और उनमें अमल होता था।

आजादी के बाद 1949 में कुमाऊं और उत्तराखंड के आयुक्त की हैसियत से बीआर बोरा ने हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति के मामलों में दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने 6 अप्रैल, 1949 को प्रदेश सरकार को पत्र भेजकर इस समिति में और महकमों को भी सदस्य बनाए जाने की सिफारिश की। इसके बाद इस उच्चस्तरीय विशेषज्ञ कमेटी को तकरीबन भुला-सा दिया गया। 1976 में यहां के बारे में एके सूर की अगुआई में सूर समिति बनी। इस समिति ने यहां के बारे में अनेक अहम सुझाव सुझाए थे, पर उन पर अमल नहीं हुआ। हां, इस समिति के आने के बाद हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति ने भी कागजी खानापूर्ति का काम शुरू कर दिया। इसके बाद समिति ने 1976 से 1984 तक नौ साल लगातार सालाना बैठकें की। बैठकों में कई प्रस्ताव पास किए गए, लेकिन अमल एक पर भी नहीं हुआ। 1987 में नैनापीक में भूस्खलन के बाद कमेटी फिर सक्रिय हो गई। समिति की साल में एक दफा बैठक होने लगी। लेकिन, उनमें तय मुद्दों में अमल करना तो दूर, समिति खुद के पास प्रस्तावों के उलट काम करती रही।

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान तब के उपायुक्त सीएल विवयन की 1928 की रिपोर्ट और 1976 में बनी एके सूर समिति की रिपोर्ट के अलावा हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति बनने के बाद इन 85 सालों के दौरान इसकी दो दर्जन से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं। हरेक बैठक में यहां के तालाब, नाले, पहाड़ियों, सड़क, पीने के पानी, पेड़ और पर्यावरण समेत शहर से जुड़े अहम मसलों पर विचार हुआ। प्रस्ताव बने। पास हुए। पर अमल नहीं हुआ। यहां तक की समिति ने विवयन की 24 सितंबर 1928 की रिपोर्ट और 1867 से 1907 के दरम्यान यहां के बारे में बनी दर्जनों विशेषज्ञ समितियों की राय के आधार पर 28 अगस्त 1930 में हिल साइट सेफ्टी एवं लेक कंट्रोल के बारे में बनाए गए नियमों का पालन नहीं करा पाई। जबकि हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति को यहां के तालाब और पहाड़ियों की हिफाजत के बारे में उच्चस्तरीय दर्जा हासिल है। तालाब और पहाड़ियों की सुरक्षा के बारे में उपाय सुझाने और उन पर अमल कराने की जिम्मेदारी इसी कमेटी की है। यहां किसी भी किस्म के निर्माण काम से पहले हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति की अनापत्ति लेना जरूरी था। कुमाऊं के आयुक्त इस समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं।

पर हाल के वर्षों में इस समिति ने अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कोताही ही नहीं बरती बल्कि नैनीताल की हिफाजत के लिए बनाए गए कायदों को खुद तोड़ा भी है। शेर का डांडा पहाड़ी में जहां 1880 में जबरदस्त भूस्खलन में 151 लोग मरे थे। इस भूस्खलन के बाद यहां स्थित राजभवन को हटाना पड़ा था। इस पहाड़ी को निर्माण के लिए निषिद्ध घोषित किए जाने के बावजूद समिति ने उसी पहाड़ी पर रोप-वे के भारी-भरकम निर्माण की अनुमति दे दी । सियासी दबावों की वजह से पाबंदी वाले अनेक इलाकों को सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। शहर के लिए बतौर खून की नस का काम करने वाले नालों का विस्तार तो दूर पहले से बने नालों का भी सही तरीके से रख-रखाव नहीं किया। समिति के लिए ये नाले महज आमदनी का जरिया बन गए। नतीजतन शहर के दर्जनों नालों के ऊपर मकान और दूसरे निर्माण कार्य हो गए हैं। शहरके ज्यादातर नाले देख-रेख, मरम्मत और रख-रखाव के बिना अपना वजूद ही गवां बैठे हैं।

इस शहर के प्रति जरूरत से ज्यादा उदासीनता और लापरवाही के चलते हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति की मौजूदगी अब महज कागजों तक सिमटकर रह गई है। नैनीताल के अस्तित्व से जुड़े सवालों के मामले में समिति ने खुद को अप्रासंगिक ही नहीं बना दिया है। बल्कि इसके भविष्य से जुड़े मसलों को भी हाशिए पर धकेल दिया है। एक दशक पहले तक हिल साइट सेफ्टी एवं झील विशेषज्ञ समिति नैनीताल के वजूद का डर दिखाकर सरकार से ज्यादा से ज्यादा रकम हासिल करने की कोशिशें जरूर करती थी। अब वह भी बंद हो गया है।

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