लाॅकडाउनः राजस्थान में जल गुणवत्ता सुधरी

Submitted by HindiWater on Sat, 05/30/2020 - 08:20

पुष्कर झील, राजस्थान। फोटो - Getty Images

इसमें कोई दोराय नहीं है कि कोरोना के कारण लाॅकडाउन का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। गंगा और यमुना जैसी तमाम नदियां और झील व अन्य जलस्रोतों की गुणवत्ता में काफी सुधार देखा गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में भी गंगा का जल 50 प्रतिशत और यमुना नदी का जल 30 प्रतिशत तक साफ होने की बात कही गई है। अब राजस्थान में भी नदियों, नहरों, झीलों और बांधों में जल गुणवत्ता में काफी सुधार आया है। राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में इस बात की जानकारी दी गई है।

सतही जल गुणवत्ता को जानने के लिए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अप्रैल के अंतिम सप्ताह पर नदियों के 14 स्टेशनों, नहरों के चार, झीलों के 16 और बांधों के 11 स्टेशनों पर जल गुणवत्ता के सैंपलों का विश्लेषण किया। जल गुणवत्ता में सुधार जानने के लिए वर्तमान आंकड़ों की तुलना पिछले साल के आंकड़ों से की गई। रिपोर्ट से पता चला कि नर्मदा नदी की मुख्य नहर, आईजीनपी और गंग नहर में पानी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। गैप-सागर झील, कायलाना झील, नक्की झील, बड़ी का तालाब, गोवर्धन सागर, स्वरूप सागर, उदय सागर, पिछोला, पुष्कर झील, छापी बांध, पिपलाज, भवानीमंडी बांध, कोडर बांध, गंभिरी बांध आदि में भी जलगुणवत्ता काफी सुधरी है।

रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2019 में राजस्थान की नदियों और नहरों में बीओडी की मात्रा 1.24 से 5.56 मिग्रा/लीटर के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में यह 1.08 से 4.32  मिग्रा/लीटर के बीच रही है। केवल 8 स्टेशनों को छोड़कर लगभग सभी नदियों एवं नहरों में बीओडी की मात्रा में कमी देखी गई है। अप्रैल, 2019 में राजस्थान की नदियों और नहरों में केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) की सांद्रता 13.94 से 70.89 मिग्रा/लीटर के बीच रही है, जबकि अप्रैल, 2020 में यही 8.28 से 41.20 मिग्रा/लीटर के बीच रही है। केवल 4 स्टेशनों को छोड़कर लगभग सभी नदियों एवं नहरों में सीओडी की मात्रा में कमी देखी गई है। डिजाल्व ऑक्सीजन की सांद्रता अप्रैल, 2019 में 3.09 से 6.39 मिग्रा/लीटर के बीच थी जबकि अप्रैल, 2020 में यह  2.59 से 7.02 मिग्रा/लीटर के बीच रही है। अप्रैल 2019 में कुल  टोटल कोलीफॉर्म की सघनता 7 से 210 एमपीएन / 100 मिलि  तक थी जबकि अप्रैल, 2020 में यह 20 से 210 एमपीएन/100 मिली के बीच है। पार्वती नदी के अलावा अन्य सभी नदियों में कोलीफॉर्म की मात्रा बाढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नदियों में डाले जानेवाले औद्योगिक कचरे की मात्रा में भारी कमी के कारण ऐसा देखा जा रहा है। अप्रैल, 2019 में  राजस्थान की नदियों और नहरों में कन्डक्टिविटी अथवा चालकता 300 से 2100μmho / सेमी  के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में यही 230 से 1250 μmho / सेमी के बीच रही है। कुछ स्थानों को छोड़कर चालकता में कमी देखी गई है। 

राजस्थान की झीलों और बांधों की जल गुणवत्ता पर भी लॉकडाउन का प्रभाव देखा गया है। झीलों और बाधों का पानी भी काफी साफ हुआ है। राजस्थान की झीलों और बांधों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) की मात्रा अप्रैल, 2019 में 0.23 से 12.36 मिग्रा/लीटर के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में वही 0.21 से 12.96 मिग्रा/लीटर के बीच रही है। राजस्थान की झीलों और बांधों में केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) की एकाग्रता अप्रैल, 2019 में 10.89 से 109.37 मिग्रा/लीटरl के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में यही 6.12 से 132.0 मिग्रा/लीटर के बीच रही है। ऐसा लॉकडाउन की वजह से मानवीय गतिविधियों में आई कमी के फलस्वरूप हुआ जान पड़ता है। राज्य में झीलों और बांधों में डिजॉल्व ऑक्सीजन (डिओ) की मात्रा अप्रैल, 2019 में 0.21 से 7.20 मिग्रा/लीटर के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में यही 0.0 से 9.0 मिग्रा/लीटर के बीच रही है। राज्य में झीलों और बांधों में कुल टोटल कोलीफॉर्म की सांद्रता अप्रैल, 2019 में 21 से 210  एमपीएन / 100 मिलि  के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में यही 28 से 210 एमपीएन/100 मिलि के बीच रही है। अधिकांश झीलों में कोलीफॉर्म की मात्रा में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। राजस्थान की झीलों और बांधों में कन्डक्टिविटी अथवा चालकता अप्रैल, 2019 में 220 से 2200 μmho /सेमी  के बीच थी, जबकि अप्रैल, 2020 में वही 160 से 1590 μmho / सेमी  के बीच रही है। कुल मिलकर चालकता में कमी के रुझान देखे जा रहे हैं।

अन्य राज्यों की तरह ही राजस्थान में आमतौर पर जल संकट रहता है, लेकिन राज्य में उपलब्ध जलनिकायों का उपयोग लोगों की पानी की जरूरतों का पूरा करने (घरेलू जलापूर्ति), सिंचाई, मत्स्य पालन और पर्यटन आदि के लिए किया जाता है। लाॅकडाउन के कारण 22 मार्च से पर्यटन बंद होने से जलस्रोतों के पास या विभिन्न स्थानों पर मानवीय गतिविधियों बंद हो गई हैं। तो वहीं, उद्योगों से निकलने वाली कैमिकलयुक्त कचरे में भी काफी कमी आई है। घरों और उद्योग व विभिन्न प्रतिष्ठानों से निकलने वाला सीवेज भी काफी कम हुआ है, जिस कारण जल गुणवत्ता में सुधार हो रहा है। अब देखना ये होगा कि सब कुछ सामान्य होने के बाद सरकार और स्थानीय प्रशासन जल गुणवत्ता को किस प्रकार बनाए रखता है।


हिमांशु भट्ट (8057170025)

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