मानव द्वारा प्राकृतिक जल स्रोतों से छेड़छाड़ का परिणाम है कृत्रिम वर्षा जल संरक्षण

Submitted by admin on Sat, 05/18/2013 - 11:55

पानी के लगातार दोहन से भूगर्भ जल भंडार खाली होने के कगार पर है। यदि यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ हम से पानी का हिसाब अवश्य मांगेगी। तब हमारा क्या जवाब होगा यह हमें सोचने पर विवश कर देता है। हमें प्रकृति से छेड़छाड़ बंद करनी होगी और जो नुकसान हमने प्रकृति के साथ किया है उसकी भरपाई करनी होगी। अब समय आ गया है हम जितना पानी धरती से लेते हैं उतना ही पानी धरती को किसी न किसी रूप में लौटायें। यह वर्षा जल संरक्षण से ही संभव है।

वर्षा जल का संरक्षण पहले प्रकृति स्वयं करती थी अपने विभिन्न जल स्रोतों के माध्यम से और हम लोगों को इसका अहसास भी नहीं था। लेकिन जैसे ही मानव ने भूजल का अत्यधिक दोहन शुरू किया नदी नालों को प्रदूषित किया, तालाबों, जोहड़ों, पोखरों पर कब्ज़ा कर लिया अपने सभी प्राचीन वर्षा जल के संचयन के स्रोतों को नष्ट कर दिया और पानी की किल्लत होने लगी तब मानव को समझ आया कि ये सब क्या हो गया। तब उसे वर्षा जल संचयन के लिए विवश होना पड़ा तथा इसकी तकनीक के लिए खोज करने लगे और हमें कृत्रिम वर्षा जल संचयन की तकनीक समझ आई और अब आ भी गई तो इसके लिए सरकार के पास बजट के लाले पड़ने लगे। व्यक्तिगत रूप से अपने घरों में करने को लोग तैयार नहीं होते। न तो हम अपनी प्रकृति से छेड़छाड़ करते और न हमें इसकी जरूरत पड़ती। लेकिन अब संकट आया है तो इसका हल भी हमें ही ढूंढना होगा। पहले घरों में कच्ची ज़मीन रहती थी तो पानी रिस-रिस कर वर्षा जल ज़मीन में पहुँचता था इससे ज़मीन में नमी रहती थी। पेड़ पौधे उगते रहते थे। लेकिन अब घरों एवं अन्य जगहों पर पक्का फर्श हो गया। जिस कारण वर्षा जल व्यर्थ में बहता रहता है।

वर्षा के मौसम में जहां एक ओर बाढ़ होती है वहीं दूसरे क्षेत्रों में भयंकर सूखा होता है। पर्याप्त वर्षा के बावजूद लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमने प्रकृति द्वारा प्रदत्त अनमोल वर्षा जल का संचय नहीं किया वह व्यर्थ में बहकर दूषित जल बन गया। वहीं दूसरी ओर मानव ने भू जल का अंधाधुध दोहन किया परन्तु धरती से निकाले गए जल को वापस धरती को नहीं लौटाया इस कारण भूजल स्तर गिरा तथा भीषण जल संकट उत्पन्न हुआ। प्रकृति ने अनमोल जीवनदायी सम्पदा जल को हमें उपहार के रूप में दिया। प्रकृति के खजाने से जो जल हमने लिया है उसे वापस हमें ही लौटाना है क्योंकि स्वयं हम जल का निर्माण नहीं कर सकते। अतः हमारा दायित्व है हम वर्षा जल का संरक्षण करें तथा प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाएं और किसी भी कीमत पर पानी को बर्बाद न होने दें। जल संकट को लेकर पूरा विश्व समुदाय चिंतित है। परन्तु इस समस्या के हल के लिए सभी स्तरों पर पूरी ज़िम्मेदारी व ईमानदारी के साथ प्रयास की आवश्यकता है। जल संकट को लेकर हमें हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ जाना चाहिए। इससे निपटना जरूरी है तभी हमारा वर्तमान और भविष्य सुरक्षित होगा। इसके लिए हमें जगह-जगह सरकारी एवं गैर सरकारी इमारतों में वर्षा जल संरक्षण समुचित प्रबंधन करना होगा क्योंकि ज़मीन के भीतर जो पानी संचित किया जायेगा उसका इस्तेमाल हम भविष्य में कर सकेंगे।

वर्षा जल एक अनमोल प्राकृतिक उपहार है जो प्रतिवर्ष पूरी पृथ्वी को बिना किसी परिश्रम के मिलता रहता है। परन्तु समुचित प्रबंधन के अभाव में वर्षा जल व्यर्थ में बहता हुआ नदी-नालों से होता हुआ समुद्र में मिलकर खारा हो जाता है। यदि वर्षा जल के संग्रह की समुचित व्यवस्था हो तो न केवल जल संकट से जूझते समाज में अपनी तत्कालीन ज़रूरतों के लिए पानी जुटा पायेंगे बल्कि भूमिगत जल भी रिचार्ज हो सकेगा। अतः शहरों के जल प्रबंधन में वर्षा जल की हर बूंद सहेजकर रखना जरूरी है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही जल संचय की परंपरा थी तथा वर्षा जल संग्रहण करने के लिए लोग प्रयास करते थे। इसलिए कुएँ, बावड़ी, तालाब, नदियां आदि पानी से भरे रहते थे। इससे भूजल स्तर भी उपर आ जाता था तथा सभी जल स्रोत भी रिचार्ज होते थे। परन्तु मानवीय उपेक्षा, लापरवाही, औद्योगिकरण तथा नगरीकरण के कारण ये जल स्रोत मृत प्रायः हो गए। कई जल स्रोत तो कचरे के गड्ढों के रूप में बदल गए। कई जल स्रोतों पर अवैध कब्ज़े हो गए। इस प्रकार के जल स्रोतों को लोगों ने मिट्टी व कूड़े से पाट दिया जिससे इनकी जल ग्रहण क्षमता समाप्त हो गई। अभी भी समय है इन जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करके उन्हें पुनः बचाया जा सकता है। वर्षा जल के संचय से इन जल स्रोतों को सजीव बनाया जा सकता है।

कई सालों से लोग यह मानते थे कि पानी का भंडार असीमित है और हमें पानी ऐसे ही हमेशा मिलता रहेगा। परंतु पानी के लगातार दोहन से भूगर्भ जल भंडार खाली होने के कगार पर है। यदि यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ हम से पानी का हिसाब अवश्य मांगेगी। तब हमारा क्या जवाब होगा यह हमें सोचने पर विवश कर देता है। हमें प्रकृति से छेड़छाड़ बंद करनी होगी और जो नुकसान हमने प्रकृति के साथ किया है उसकी भरपाई करनी होगी। अब समय आ गया है हम जितना पानी धरती से लेते हैं उतना ही पानी धरती को किसी न किसी रूप में लौटायें। यह वर्षा जल संरक्षण से ही संभव है। हमें खेतों एवं घरों से पानी बचाने की शुरूआत करनी होगी। अपने घरों के आंगन में कच्चा रखना होगा। सड़कों, खंड़जों के किनारे कच्चे रखने होंगे ताकि उनका पानी व्यर्थ न बह सके। पेड़ भी अपनी जड़ों के माध्यम से वर्षा जल को हार्वेस्ट करने का काम करते हैं इसलिए पेड़ों की संख्या भी बढ़ानी होगी। स्कूलों में बच्चों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाए ताकि वे अभी से जल के महत्व को समझें। सरकारी स्तर पर भी वर्षा जल संरक्षण के उपाय किए जाएं। व्यक्तिगत रूप से बनाई गई इमारतों में वर्षा जल के संरक्षण का सख़्ती से पालन कराया जाए। अपने प्राकृतिक जल संरक्षण के स्रोतों को पुनर्जीवित किया जाए। तभी हम आने वाली पीढ़ियों के लिए जल बचा सकेंगे।

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