मध्य गंगा घाटी में घटता भू-जल विकास स्तर: समस्याएं एवं समाधान

Submitted by HindiWater on Fri, 01/10/2020 - 10:26
Source
अमरनाथ मिश्र पी.जी. कालेज, दूबेछपरा, बलिया (उ.प्र.) और अ.प्र.ब. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड,

सारांश 

पृथ्वी तल के नीचे स्थित किसी भूगर्भिक स्तर की सभी रिक्तियों में विद्यमान जल को भू-जल कहा जाता है। अपने देश में लगभग 300 लाख हेक्टोमीटर भू-जल उपलब्ध है, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हम उपयोग कर चुके हैं। यदि भू-जल विकास स्तर की दृष्टि से देखा जाए तो अपना देश धूमिल सम्भावना क्षेत्र से गुजर रहा है, जो शीघ्र ही सम्भावनाविहीन क्षेत्र के अन्तर्गत आ जायेगा। यही स्थिति मध्य गंगा घाटी के उ.प्र. के जिलों में एवं अध्ययन हेतु चयनित उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के 10 जिलों (आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, संत रविदासनगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र) की है। उत्तर प्रदेश में भू-जल का वार्षिक पुनर्भरण 68757 मिलियन घनमीटर शुद्ध दोहन 49483 मिलियन घनमीटर एवं भू-जल विकास 72.17 प्रतिशत है। यदि मध्य गंगा घाटी के नगरीय क्षेत्रों में भू-जल दोहन की स्थिति को देखा जाए तो यह खतरनाक स्थिति पर पहुंच चुका है। केन्द्रीय भू-जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में अलीगढ़, मुरादाबाद, गाजियाबाद, मेरठ, लखनऊ, बरेली, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर एवं आगरा जल दोहन में नगरीय क्षेत्रों में शीर्ष पर है, जहां भू-जल दोहन की दर क्रमशः 373, 308, 203, 246, 239, 232, 201, 149, 102 एवं 93 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है, जबकि सुरक्षित सीमा मात्र 70 प्रतिशत है। इस प्रकार अध्ययन क्षेत्र में निकट भविष्य में घोर जल संकट उत्पन्न हो सकता है। अतः इस संकट से बचने हेतु इस क्षेत्र के लिए एक समन्वित जल विकास आयोजना क्रियान्वित करने की आवश्यकता है। मुख्य शब्द-भूमिगत जल, भू-जल, भू-जल पुनर्भरण, भू-जल विकास स्तर, भू-जल उपलब्धता, भू-जल उपभोग, संरक्षण।

Abstract

The water present in all the vacancies of a geological level below the earth plane is called ground water.
There are about 300 lakh hectometers of ground water available in our country, about 80 percent of  which we have used. If seen from the point of view of ground water development level, then our country is passing through a foggy possibility area, which will soon fall under the possibility less area. The same situation is in the districts of Uttar Pradesh in the Middle Ganga Valley and 10 districts (Azamgarh, Mau, Ballia, Jaunpur, Ghazipur, Chandauli, Varanasi, Sant Ravida Nagar, Mirzapur and Sonbhadra) of Purvanchal in Uttar Pradesh selected for study. The annual recharge of ground water in Uttar Pradesh in 68757 millions cubic meters. Net exploitation is 49483 million cubic meters and ground water  development is 72.17 percent. If the under ground water exploitation of state is seen in the urban areas of the Middle Ganga Valley, then it has reached a dangerous situation. According to the latest report of central ground water board. Aligarh, Moradabad, Ghaziabad, Meerut, Lucknow,  Barelly,  Varanasi,  Prayagraj, Kanpur and Agra are at the top in Urban areas in water tapping in Uttar Pradesh, where the rate of ground water exploitation are 373, 308, 203, 246, 239, 232, 201, 149, 102 and 93 respectively reached. While the safe limit is only 70 percent. Thus, a severe water crisis may arise in the study area in the near future. Therefore, to avoid this crisis, there is a need to implement an integrated water development plan for this area. 

The main objective of the study is to present suggestions for the solution of problems arising from the exploitation of ground water by highlighting the availability of ground water, consumption and ground water development level of selected 10 districts of the Middle Ganga Valley.

In the presented study, analysis of ground water data obtained from secondary sources using analytical and critical method mechanisms has been completed.

प्रस्तावना 

हम जानते हैं कि जल सृष्टि का आदि तत्व है। वह न केवल जीवन को धारण करता है, बल्कि स्वयं जीवन प्राण है। जल से ही जीवन की उत्पत्ति हुई। तभी से जल प्राण के जैसे ही समाहित हो गया, जैसे मनुष्य की शिराओं में अनजाने ही रक्त प्रवेश कर जाता है। हमारी पृथ्वी पर जो जल विद्यमान है, उसमें से मात्र 0.8 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। शेष 97.4 प्रतिशत जल खारा जल के रूप में समुद्रों एवं 1.8 प्रतिशत जल ध्रुवों पर बर्फ के रूप में विद्यमान है। प्रकृति में विद्यमान 1.5 विलियन क्यूसेक किमी जल में से मात्र 15500 से 19000 बिलियन लीटर जल ही प्रति वर्ष मानवीय उपयोग हेतु उपलब्ध है। इस तरह एक तिहाई जनसंख्या शुद्ध जल से वंचित है और सन 2025 तक कुल 48 देशों की 2.4 बिलियन जनसंख्या तथा सन 2050 तक 54 देशों की 4 बिलियन जनसंख्या को पेयजल संकट का सामना करना पड़ेगा, जो कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत होगा। यदि वर्तमान जल संकट को देखा जाए तो विश्व की 1.1 बिलियन जनसंख्या को पर्याप्त जल आपूर्ति नहीं हो पा रही है। इस तरह विश्व के प्रत्येक 6 व्यक्तियों में से 1 व्यक्ति जल संकट से जूझ रहा है। यदि भारत के संदर्भ में जल उपलब्धता को देखा जाए तो सन 1951 में 40 करोड़ जनसंख्या के लिए 5000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष उपलब्ध था जबकि सन 2001 में 110 करोड़ जनसंख्या के लिए जल उपलब्धता घटकर 2000 घनमीटर प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष हो गई। एक अनुमान के अनुसार 2025 में 139 करोड़ जनसंख्या के लिए प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष मात्र 1500 घनमीटर जल उपलब्ध होगा, जबकि सन 2050 में 160 करोड़ जनसंख्या के लिए मात्र 1000 घनमीटर प्रति व्यक्ति, प्रति वर्ष उपलब्ध होगा, जो घोर जल संकट की ओर इंगित करता है। वाटर एड इण्डिया एवं अन्य स्रोतों के अनुसार 2000 से 2010 के मध्य भारत में भू-जल दोहन 23 प्रतिशत बढ़ा है। भारत भू-जल का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है, जो कुल वैश्विक भू-जल निर्यात का 12 प्रतिशत है। विश्व में प्राप्त कुल भू-जल का 24 प्रतिशत अकेले भारत उपयोग करता है। इस प्रकार भू-जल उपयोग में विश्व में भारत का प्रथम स्थान है। अपने देश के लगभग 1 अरब लोग पानी से कमी वाले क्षेत्रों में रहते हैं, जिनमें से 60 करोड़ लोग तो गम्भीर संकट वाले क्षेत्रों में हैं। उनके लिए 88 प्रतिशत घरों के निकट स्वच्छ जल प्राप्त नहीं है, जबकि 75 प्रतिशत घरों के परिसर में पीने का पानी नहीं है। 70 प्रतिशत पीने का पानी दूषित है और तय मात्रा से 70 प्रतिशत अधिक जल का उपयोग किया जा रहा है। सन 2030 तक 21 नगर डेन्जर जोन में आ जायेंगे। अपने देश में 1170 मिलीमीटर औसत वर्षा होती है, जिसमें से 6 प्रतिशत ही हम संचित कर पाते हैं और 91 प्रमुख जलाशयों में क्षमता का 25 प्रतिशत ही जल बचा है। 

अध्ययन का उद्देश्य 

प्रस्तुत अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य मध्य गंगा घाटी के चयनित 10 जनपदों (आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चन्दौली, वाराणसी, संत रविदासनगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र) के भूमिगत जल की उपलब्धता, उपभोग एवं भू-जल विकास स्तर को प्रकाश में लाते हुए भू-जल दोहन से उत्पन्न समस्याओं को सामने लाकर इनके समाधान हेतु सुझाव प्रस्तुत करना है। 

अध्ययन की विधितंत्र 

प्रस्तुत अध्ययन में विश्लेषणात्मक एवं विवेचनात्मक विधि तंत्रों का प्रयोग करते हुए द्वितीयक स्रोतों से प्राप्त भू-जल आंकड़ों का विश्लेषण कर एवं उनकी विवेचना कर तथा मानचित्र तैयार कर अध्ययन को पूर्णता प्रदान की गई है। 

विश्लेषण एवं व्याख्या 

पृथ्वी तल के नीचे स्थित किसी भूगर्भ स्तर की सभी रिक्तियों में विद्य़मान जल को भू-जल कहा जाता है। भू-जल वर्षा की मात्रा एवं गति, वर्षा के समय वाष्पीकरण की मात्रा, तापमान, भूमि का ढाल, वायु की शुष्कता, शैलों की सरंध्रता एवं अभेद्यता, वनस्पति आवरण एवं मृदा जल की अवशोषण की क्षमता से नियंत्रित होता है। प्रकृति में उपलब्ध कुल जल संसाधन का 11.58 प्रतिशत भू-जल से तथा सम्पूर्ण जलीय राशि में शुद्ध जलीय भाग का 22.21 प्रतिशत है। पृथ्वी पर विद्यमान जल की कुल मात्रा 138,41,20000 घन किमी है, जिसमें से 80,00042 घन किमी ही भू-जल है। वर्तमान समय में अपने देश में लगभग 300 लाख हेक्टेयर मीटर भू-जल उपलब्ध है, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हम उपयोग कर चुके हैं, अर्थात 240 लाख हेक्टेयर मीटर भू-जल का उपयोग किया जा चुका है। इस दृष्टि से देखा जाए तो भविष्य में स्थिति खतरनाक हो सकती है और जल संकट उत्पन्न हो सकता है। क्योंकि जिस गति से भू-जल का दोहन हो रहा है, उस गति से पुनर्भरण नहीं हो रहा है। क्योंकि वन-विनाश एवं जलवायु परिवर्तन के चलते दिन-प्रतिदिन वर्षा की मात्रा कम होती जा रही है। यदि भू-जल विकास स्तर को देखा जाये तो 65 प्रतिशत से कम दोहन वाले क्षेत्रों को सुरक्षित क्षेत्र, 65 से 85 प्रतिशत दोहन वाले क्षेत्र को धूमिल सम्भावना क्षेत्र, 85 से 100 प्रतिशत दोहन वाले क्षेत्र को सम्भावना विहीन क्षेत्र एवं 100 प्रतिशत से अधिक दोहन वाले क्षेत्र को अति दोहन क्षेत्र के अंतर्गत रखा जाता है।

यदि भू-जल विकास स्तर की दृष्टि से देखा जाए तो अपना देश धूमिल सम्भावना क्षेत्र से गुजर रहा है और शीघ्र ही सम्भावना विहीन क्षेत्र के अन्तर्गत आने की तरफ अग्रसर है। ऐसी स्थिति में अपने देश में घोर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। खासतौर से भू-जल शोषण की स्थिति तो और भयावह होती जा रही है। आज देश का एक बहुत बड़ा भू-भाग भू-जल संसाधनों की दृष्टि से अंधकारमय क्षेत्र (Dark Zone) का शिकार हो चुका है। कारण कि जल विदोहन भू-जल पुनर्भरण की अपेक्षा अधिक हो रहा है। (गुर्जर एवं जाट, 2007, पृ. 154)

भू-जल भण्डार के विकास स्तर को ज्ञात करने हेतु निम्नांकित सूत्र का सहारा लिया जाता है -  

यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है कि उपलब्ध शुद्ध भू-जल भण्डार का मान, सकल (वार्षिक) भू-जल भण्डार का 85 प्रतिशत होता है, तो इसे धूमिल क्षेत्र के अन्तर्गत रखा जाता है। भू-जल विकास की दर ज्ञात करने हेतु विगत कई वर्षों से भू-जल उपयोग की सकल वृद्धि का औसत मान ज्ञात किया जाता रहा है। इस औसत को ही ‘‘भू-जल विकास दर’’ कहा जाता है। भू-जल विकास स्तर से ही भविष्य हेतु भू-जल विकास की सम्भावनाओं की मात्रा एवं दिशा ज्ञात की जाती है। भू-जल दोहन की स्थिति से बचाव हेतु भू-जल दोहन स्तर के आधार पर भू-जल विकास स्तर को चार भागों में विभक्त किया जाता है-

तालिका-1 भू-जल विकास स्तर का मापन

उपर्युक्त मानदण्डों के आधार पर अध्ययन क्षेत्र मध्य गंगा घाटी के चयनित 10 जनपदों का भू-जल विकास स्तर ज्ञात किया गया है, जो तालिका-2 से स्पष्ट है। 

तालिका-2 जनपदवार भूमिगत जल उपलब्धता (मिलियन घनमीटर)

अध्ययन से यह तथ्य प्राप्त हुआ है कि उत्तर प्रदेश में वर्ष 2000 के अनुसार शुद्ध जल पुनर्भरण 70183 मिलियन घनमीटर, शुद्ध जल निकास 48784 मिलियन घनमीटर एवं भू-जल विकास स्तर 69.51 प्रतिशत है। तालिका-2 के अवलोकन से स्पष्ट है कि आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चन्दौली, वाराणसी, संत रविदास नगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र जनपदों में से वर्ष 2004 की अपेक्षा 2011 में जौनपुर, गाजीपुर, वाराणसी, संत रविदास नगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र जनपदों में भू-जल विकास स्तर में वृद्धि हुई है, जो क्रमशः 11.62, 3.11, 13.1, 16.42, 13.62 एवं 0.24 प्रतिशत है। जबकि आजमगढ़, मऊ, बलिया एवं चंदौली जनपदों में भू-जल विकास स्तर में गिरावट आयी है, जो क्रमशः 6.6, 10.61, 4.06 एवं 3.69 प्रतिशत है। इस तरह स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र में भू-जल विकास की दृष्टि से भू-जल की उपलब्धता एवं उपभोग की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है और भविष्य में घोर जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। अध्ययन क्षेत्र के 10 जनपदों-आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चन्दौली, वाराणसी, संत रविदास नगर, मिर्जापुर एवं सोनभद्र में वर्ष 2004 में शुद्ध जल पुनर्भरण क्रमशः 1507, 498, 962, 1437, 1216, 699, 516, 331, 495 एवं 279 मिलियन घनमीटर था, जो 2011 में परिवर्तित होकर क्रमशः 1329, 483, 890, 1243, 1251, 717, 486, 400, 578 एवं 211 मिलियन घनमीटर हो गया। शुद्ध जल विकास इन जनपदों में 2004 में क्रमशः 1090, 401, 676, 1112, 795, 292, 378, 266, 241 एवं 120 मिलियन घनमीटर था जो कि 2011 में परिवर्तित होकर क्रमशः 865, 338, 589, 1106, 856, 273, 419, 370, 361 एवं 91 मिलियन घनमीटर हो गया। इन तथ्यों के आधार पर अध्ययन क्षेत्र का भू-जल स्तर ज्ञात किया गया है, जो वर्ष 2004 में क्रमशः 72.30, 80.51, 70.30, 77.36, 65.34, 41.77, 73.18, 75.83, 48.72 एवं 42.88 था, जो वर्ष 2011 में परिवर्तित होकर क्रमशः 65.70, 69.90, 66.24, 88.98, 68.45, 38.02, 86.28, 92.25, 62.38 एवं 43.12 प्रतिशत हो गया। उपर्युक्त तथ्यों के अनुसार जिन क्षेत्रों में भू-जल विकास का स्तर 85 प्रतिशत से अधिक (जैसे-वाराणसी, जौनपुर एवं संत रविदास नगर) है, उन जिलों में भू-जल दोहन के लिए पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इसी तरह धूमिल सम्भावना क्षेत्र (अर्द्धक्रान्तिक) जैसे-आजमगढ़, मऊ, बलिया एवं गाजीपुर जनपदों में भू-जल विकास कार्यों को संतुलित किया जाना चाहिए। संतुलन का उद्देश्य 85 प्रतिशत क्षेत्र से अधिक दोहन की स्थिति को नियोजित विकास द्वारा निर्मित नहीं होने देना है। जबकि चन्दौली एवं सोनभद्र जनपद अभी भी सुरक्षित क्षेत्र में हैं। इस तरह भू-जल विकास स्तर की दृष्टि से जौनपुर, वाराणसी एवं संत रविदास नगर सम्भावना विहीन क्षेत्र (Dark Zone) में आते हैं, जहाँ जल विदोहन करना प्रकृति के साथ खिलवाड़ होगा। जबकि आजमगढ़, मऊ, बलिया एवं गाजीपुर जनपद धूमिल सम्भावना क्षेत्र में आते हैं, जिन्हें संक्रमित क्षेत्र या ‘ग्रे क्षेत्र’ भी कहा जा सकता है। सम्भावना विहीन क्षेत्रों एवं धूमिल सम्भावना क्षेत्रों की स्थिति अत्यंत भयावह हो सकती है। क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में भूमि की विद्यमान नमी शीघ्र ही समाप्त हो जायेगी, जिससे क्षेत्र के सम्पूर्ण बायोमास भी समाप्ति के कगार पर पहुंचकर क्षेत्र को बंजर बना सकता है। 

भू-जल संकट के कारण एवं समस्याएं 

भू-जल का वर्तमान संकट मानव की भोगवादी प्रवृत्ति, विलासितापूर्ण जीवन, शोषणपरक नीति तथा जल का अनियंत्रित एवं अनियोजित उपभोग है, जिसके चलते एक तरफ जहां जल की बर्बादी से जल संकट की स्थिति उत्पन्न होती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ जल प्रदूषण में तेजी से वृद्धि हो रही है। हम अपने स्वार्थ में प्राकृतिक संसाधनों का इस तरह दोहन एवं शोषण कर रहे हैं कि या तो वे समाप्ति के कगार पर हैं या भविष्य में समाप्त हो जायेंगे। जल संकट का विशेष सामाजिक पहलू भी है। विभिन्न सामाजिक स्तर पर जीवन यापन करने वाले लोगों के जल उपभोग की मात्रा भिन्न-भिन्न होती है। यही नहीं हमारी सामाजिक सोच भी जल संकट के लिए जिम्मेदार है। सामरिक दृष्टि से देखा जाए, तो जल स्रोतों का विशेष महत्व है और वह दिन दूर नहीं जब जल के लिए ही युद्ध लड़ा जाएगा और इसकी शुरूआत तो जल विवाद के रूप में हो भी चुकी है। इस प्रकार जल संकट हमारे लिए एक गम्भीर चुनौती है और आगे आने वाले वर्षों में यह चुनौती गम्भीर रूप धारण करेगी तथा स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल विवाद उत्पन्न होगा। अतः जल संकट एवं जल विवाद को दूर करने हेतु प्रादेशिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आपसी मतभेदों को भुलाकर सार्थक पहल करनी होगी। यदि देखा जाय तो जल का अनियोजित एवं अनियंत्रित उपयोग ही जल संकट का मुख्य कारण है। वर्तमान जल संकट को देखते हुए जल का संरक्षण आवश्यक है। जिसमें जन-जन की सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी। जीवनदायिनी जल को यदि नहीं बचाया गया तो मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। कारण कि भू-जल का अधिक उपयोग कृषि कार्यों में सिंचाई हेतु ही होता है। एक अध्ययन के अनुसार गेहूं की खेती 25 प्रतिशत तक भू-जल के नीचे जाने का जिम्मेदार है। कुल वैश्विक सिंचाई 40 प्रतिशत के लिए एवं चावल की खेती 17 प्रतिशत भू-जल के नीचे जाने के लिए जिम्मेदार है। 1 पाउण्ड कपास के उत्पादन के लिए भारत में 17200 गैलन पानी लगता है, 1 किग्रा सतावड़ी के उत्पादन हेतु वैश्विक स्तर पर 215 ली. भू-जल खर्च होता है। फूलों के उत्पादन के लिए भी अधिक भू-जल लगता है। इन सभी कारणों से भू-जल में निरन्तर गिरावट हो रही है। इस तरह भू-जल में गिरावट के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैंः- 

  1. वर्षा वितरण में असमानता एवं वर्षा में कमी का होना। 
  2. अधिकांश क्षेत्रों में सतही जल का अभाव। 
  3. पेयजल आपूर्ति हेतु भू-जल का अधिक दोहन। 
  4. सिंचाई हेतु भू-जल का अत्यधिक दोहन। 
  5. उद्योगों हेतु भू-जल का अत्यधिक दोहन एवं शोषण।

वाटर एड की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भू-जल के नीचे जाने का एक प्रमुख कारण विश्व के कुछ सर्वाधिक गरीब देशों द्वारा निर्यात के लिए वस्तुओं का उत्पादन है। इतना ही नहीं कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए भूमिगत एक्वीफर का प्रयोग किया जाता है और इस एक्वीफर से निकलने वाले भू-जल की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिससे कुंए एवं पम्प भी सूख जाते हैं। बीते दशक में भू-जल के दोहन में 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, क्योंकि भारत-23 प्रतिशत, चीन-102 प्रतिशत एवं अमेरिका-31 प्रतिशत न भू-जल की मांग को व्यापक पैमाने पर बढ़ाया है। 

भू-जल की कमी से उत्पन्न समस्याएं 

  1. भू-जल के अत्यधिक दोहन एवं शोषण से आयी गिरावट से निम्नलिखित समस्याए उत्पन्न हो रही हैंः- 
  2. भू-जल स्तर का निरन्तर नीचे की तरफ खिसकना। 
  3. भू-जल में प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि। 
  4. पेयजल आपूर्ति की समस्या में वृद्धि। 
  5. सिंचाई जल की कमी से कृषि पर प्रभाव। 
  6. भू-जल की गुणवत्ता में कमी। 
  7. भू-जल का अत्यधिक लवणतायुक्त होना। 
  8. भू-जल अत्यधिक नीचे सरकने के कारण हैण्डपम्प, ट्यूबवेल आदि से भू-जल नहीं आने के कारण पेयजल आपूर्ति का घोर संकट उत्पन्न होना। 
  9. नगरीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों में भू-जल की कमी एवं जल का प्रदूषित होना। 
  10. आबादी वाले क्षेत्रों में जल आपूर्ति की कमी का होना। 

समस्याओं के समाधान हेतु सुझाव

भू-जल समस्या का एकमात्र समाधान भू-जल में हो रही कमी को रोकना है, चाहे कृषि क्षेत्र हो, औद्योगिक क्षेत्र हो, नगरीय क्षेत्र हो, घरेलू क्षेत्र हो या अन्य कोई क्षेत्र हो। प्रत्येक जगह पर भू-जल के अनियंत्रित एवं अतिशय दोहन तथा शोषण एवं उपयोग पर रोक लगाना आवश्यक है। साथ ही वर्षा जल का संचयन कर वर्षा जल को व्यर्थ न बहने से रोककर भूमिगत जल कृत्रिम पुनर्भरण की अनिवार्यता लागू करनी होगी। इसके अतिरिक्त खेतों में वर्षा जल को मेढ़बन्दी से रोककर भूमि के अन्दर जल के पुनर्भरण पर बल प्रदान करना होगा। पुराने पेयजल स्रोतों जैसे-कुआँ, तालाब एवं हैण्डपम्प के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा और सबसे आवश्यक यह भी है कि जल ग्रहण क्षेत्रों में अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए ताकि प्राकृतिक रूप से जल का पुनर्भरण होता रहे। साथ ही साथ एक राष्ट्रीय भू-जल दोहन नीति लागू करने की भी आवश्यकता है। आज आवश्यकता इस बात की भी है कि हम जहां हैं, वहीं से जल संरक्षण की बात सोचें। नदी, तालाबों, तालों, नालों एवं झरनों आदि को सूखने से बचाना होगा। नदियों को सतत प्रवाही बनाना होगा। वर्षा जल का संचयन करना होगा और सबसे आवश्यक है कि अपने उपभोग की प्रवृत्ति को बदलना होगा। इसके साथ ही साथ हमें जल संरक्षण हेतु निम्नांकित सिद्धान्तों/उपायों को भी अपनाना होगा- 

  1. बचत प्रक्रिया को अपनाना होगा। 
  2. बर्बादी को रोकना होगा। 
  3. विकल्प की खोज करनी होगी। 
  4. सुरक्षित एवं संरक्षित उपयोग करना होगा। 
  5. जल को प्रदूषण से बचाना होगा। 
  6. वर्षा जल का अधिक से अधिक संचयन करना होगा। 
  7. जल सम्पूर्ति की सुरक्षित एवं संचयित प्रक्रिया अपनानी होगी। 
  8. नदियों पर चेक डैम बनाकर जल को रोकना होगा। 
  9. भूमिगत जल को चिरकाल तक स्थायी रखना होगा। 
  10. कुल वर्षा जल का 31 प्रतिशत जल धरती के अन्दर प्रवेश कराने की व्यवस्था करनी होगी। 
  11. रेन वाटर हार्वेस्टिंग (वर्षा जल संचयन) को बढ़ावा देना होगा। 
  12. लोगों को जल संचयन एवं संरक्षण के प्रति जागरूक करना होगा। 
  13. भू-जल रिचार्ज हेतु वन क्षेत्र का निरन्तर विस्तार करना होगा और इसके तहत मैदानी भाग में 33 प्रतिशत और पहाड़ी भाग में 55 प्रतिशत भूमि को वन-वृक्षों से आच्छादित करना होगा।

संदर्भ

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  • गुर्जर, राम कुमार एवं जाट, बी0सी0 (2007), ‘‘जल संसाधन भूगोल’’, रावत पब्लिकेशन्स, जयपुर, पृ0 34-35.
  • जोशी, दीप (2006), ‘‘भूमिगत जल स्तर में सुधार न हुआ तो स्थिति विकट होगी’’, विज्ञान, विज्ञान परिषद, प्रयागराज, वर्ष-1992, अंक-3, पृ0 43-44.
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Email - drakdwivedi@gmail.com, Email:drgkpathakgeo@gmail.com

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