मत-अभिमत: बयान नहीं, संजीदा कोशिश से ही होगा पानी आबाद

Submitted by admin on Wed, 11/23/2011 - 11:50

संदर्भ: आर्गनाइजर में छपी दिल्ली मुख्यमंत्री को चेतावनी- पानी दंगे करा सकता है।


पानी का निजीकरणपानी का निजीकरणदिल्ली में पानी के निजीकरण की कोशिश के खिलाफ चेतावनी देते हुए मुख्यमत्री श्रीमती शीला दीक्षित को कहा गया है कि पानी दंगे भी करा सकता है।

14 नवंबर 2011 को हिंदी दैनिक पंजाब केसरी ने ’आर्गनाइजर’ के हवाले से यह खबर छापी। ’आर्गनाइजर’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र है। लिहाजा इसमें छपी चेतावनी को आरआरएस की चेतावनी मान लेने से भला किसे गुरेज हो सकता है? मुखपत्र ने पानी के निजीकरण के फलस्वरूप बोलिविया के शहर कोचावम्बा में हुए भयानक दंगों को नजीर के रूप में पेश किया है। पत्र में यह भी राय है कि बोलीविया को पानी के निजीकरण के लिए विश्वबैंक ने प्रेरित किया।

यह समाचार पढते ही मेरे मन में सबसे पहला सवाल यही आया कि आरएसएस अब तक कहां था ? पानी के निजीकरण का रास्ता तो 11 वर्ष पहले इस सदी की शुरुआत में ही खुल गया था। जब तीसरे विश्व जल सम्मेलन में जापन के शहर क्योटो में भारतीय प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि ने भारत में पानी के निजीकरण हेतु स्पष्ट तौर सहमति दे दी थी। ऐसा पहली बार हुआ था। अटल जी तब भारत के प्रधानमंत्री थे। इससे पहले न भाजपा ने और न ही किसी और पार्टी की केंद्र सरकार ने किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इस बाबत् सहमति दी थी। अलबत्ता 1992 में रियो-डि-जिनेरियो के पृथ्वी शिखर सम्मेलन में बतौर प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने भारत में पानी का व्यापार खोलने की खुद और खुले तौर मुखालफत की थी। जबकि नरसिम्हा सरकार की आर्थिक नीतियों ने ही भारत में कई क्षे़त्रों का निजीकरण खोले। किंतु पानी के मामले में उन्होंने भी संजीदगी दिखाई।

इन 11 वर्षों में निजीकरण को बढाने वाली राष्ट्रीय जलनीति व प्रादेशिक नीतियां बनीं। पानी का शुद्धता का ढोल बजाकर बोतलबंद पानी का बाजार खड़ा कर ही दिया गया है। सार्वजनिक स्थलों पर नल व हैंडपंप हटाकर लोगों को बोतलबंद पानी खरीदने पर मजबूर किया ही जा रहा है। नदी जोड़ व निजी जलविद्युत परियोजनाओं के रास्ते निजीकरण को मौका देने की कोशिश चल ही रही हैं। जलनियामक आयोगों के जरिए पानी पर प्रशासनिक नियंत्रण किया ही जा रहा है; ताकि निजी हाथों को सौपने के अधिकार को वैधानिक तौर पर चुनौती न दी जा सके।

दूसरा सवाल यह उठा कि जब आरएसएस यह अच्छी तरह समझता है कि इस सभी के पीछे विश्व बैंक जैसी कर्जदाता एजेंसियां हैं, तो वह कम से कम भाजपानीत सरकारों में आसीन अपने काडरों से तो कह ही सकता था कि वे ऐसी एजेंसियों से बचकर रहें। विश्वबैंक, एशियाई विकास बैंक, डीएफआईडी, डब्ल्यूटीओ से लेकर गैट तक सभी तो भारत में पानी का बाजार खड़ा करने में लगे हैं। आरएसएस ने पानी के लिए दंगे जैसी शीर्ष चेतावनी देने से पहले ऐसी एजेंसियों से जमकर बहस-मुबाहिसों के मौके तक बनाने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की?

तीसरा आम आदमी के मन का सवाल यह आया कि निजीकरण की कोशिशें तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, उडीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, बिहार, प. बंगाल.... सभी जगह जारी है। निजी जल-विद्युत परियोजनायें भी हिमाचल, उत्तराखण्ड से लेकर उत्तरपूर्व तक इंसान व प्रकृति.. दोनों का विनाश कर ही रही हैं। फिर यह चेतावनी की गाज दिल्ली सरकार के सिर ही क्यों गिराई जा रही है? भाजपा के जलप्रकोष्ठ की बैठकों में जाकर पार्टी के नीति निर्धारकों को क्यों समझाया जा रहा कि पानी के निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलायें। काश! वे यात्रा पर निकले आडवाणी जी तक यह संदेश पहुंचा पाते। निष्पक्षता और राष्ट्रीयता तो तब होती, जब आरएसएस ऐसी कोशिशों को नापाक ठहराते हुए सभी संबंधित सरकारों के विरोध का बिगुल बजाता।

जब तक इन तीन सवालों के जवाब नहीं मिल जाते, शंका उठना स्वाभाविक है। कोई कैसे विश्वास करे कि पानी के निजीकरण पर दंगे की चेतावनी, महज राजनैतिक लाभ की कोशिश नहीं? हम कैसे माने कि आरएसएस इसे लेकर वाकई संजीदा है या वह अपने संघर्ष के मुद्दे को बदल रहा है?

एक पल को मान लेते हैं कि कई राज्यों में भाजपानीत सरकारों के कारण आरएसएस पानी के निजीकरण के खिलाफ व्यापक मोर्चा खोलने में संकोच कर सकता है। केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार है। सरकार नई राष्ट्रीय जलनीति लाने की तैयारी कर रही है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि आने वाली जलनीति निजीकरण के रास्तों को और नहीं खोलेगी। आखिरकार पिछले आठ वर्षों में मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार ने भी तो पानी का निजीकरण बढ़ाया ही है। यदि आरएसएस इसके लिए भी कोई अड़चन महसूस करती हो. तो चलिए, अन्ना की भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी जंग के समर्थन का नारा लगा रहा आरएसएस या भाजपा कोई भी दिल्ली जल बोर्ड की धांधली के खिलाफ एक छोटी सी जंग से भी शुरुआत कर ही संकेत दे दे कि वे जनहित में वाकई ही संजीदा है। पानी के मेरे जैसे छोटे कार्यकर्ता इसी से संतोष कर लेंगे।

दिल्ली में मीटर पठन के काम में की जा रही यह धांधलेगर्दी भी अब लोगों की जेब पर बहुत भारी पड़ रही है। इसकी एक बानगी मैं यहां रख रहा हूं। बिल की आखिरी रीडिंग अगले बिल की प्रथम रीडिंग बनकर हर बिल में एक यूनिट का इजाफा करती है। मसलन प्रथम बिल रीडिंग-955 से 1060 और दूसरा बिल रीडिंग- 1061 से शुरु होने की बजाय 1060 से 1122। दिल्ली में कनेक्शनधारी आबादी की संख्या के हिसाब से प्रत्येक बिल चक्र में कई करोड़ की सुनियोजित बेईमानी है।

दूसरी बेईमानी मीटर रीडर द्वारा वास्तविक रीडिंग की घर बैठे ऐसी रीडिंग दर्ज कर की जा रही है, जो बिल को हायर स्लैब में ले जाती है। यह कैसे हो सकता है कि एक बिल चक्र में 10.5 किलोलीटर पानी की खपत करे और अगले बिल चक्र में खपत 20 किलोलीटर हो जाये। साथ ही मीटर भी ओके रहे। इस घपले का खामियाजा उपभोक्ताओं में बढ़े हुए बिल के रूप में देना पडता है। जिस खपत का भुगतान उसे रुपये 3.30 प्रति किलो लीटर करना चाहिए था, उसका भुगतान उसे रुपये 16.50 प्रति किलोलीटर की दर से करना पड़ता है।

यह तो सीधे-सीधे सरकारी लूट है। यह पैसा किसी निजी की जेब में नहीं जा रहा। यह तो सीधे दिल्ली जल बोर्ड के खजाने में जा रहा है। क्या इसके लिए सीधे-सीधे बोर्ड को ही कटघरे में नहीं खडा किया जाना चाहिए। क्या इसके लिए भी दिल्ली की जनता को किसी चुनाव का इंतजार करना होगा या अब जनता को कह दिया जाये कि वह अब ऐसे संगठन या बयान पर यकीन करने की बजाय खुद अपने सरोकारों के लिए आवाज बुलंद करे।

इस लेख में कई ऐसे बिंदु हैं जिससे लोगों की असहमति हो सकती है। लेखक को सीधे ईमेल लिखें। amethiarun@gmail.com
 

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