नैनीताल की सेंट- लू पहाड़ी में राजभवन

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नैनीताल एक धरोहर

1870 में लंदन और भारत के बीच समुद्री तार व्यवस्था कायम हो गई। तार की सुविधा से लंदन से भारत का शासन चलाना पहले के मुकाबले और आसान हो गया। 1871 में अमरिकन एपिस्कोपल मैथोडिस्ट मिशन ने नैनीताल में एक डिस्पेंसरी खोली। इसके साथ ही यहाँ ऐलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की शुरुआत हो गई। 1872 में मिस्टर टॉम मरे ने मालरोड में एक छोटा सा होटल बनाया, जिसका नाम था ‘मेयो होटल’। यह नैनीताल का पहला होटल था। कुछ समय बाद मिस्टर मरे बैंकरप्ट (दिवालिया) हो गए। यह होटल कई हाथों बिका। बाद में इसका नाम ‘अलबियॉन होटल’ हो गया। मल्लीताल का इलाका अपेक्षाकृत समतल था। लिहाजा शुरुआती दौर में मल्लीताल क्षेत्र में ही ज्यादा बंगले बने। पिलग्रिम लॉज, नैनीताल क्लब, विलायथ कॉटेज, सनी साइड और साईप्रस कॉटेज आदि भवन 1872 से पहले बन चुके थे।

‘मेयो होटल’ बेलवेडियर, मैट्रोपॉल, रॉयल, स्विस और वेलड्रोफ होटल आदि नैनीताल के शुरुआती दौर के होटलों में शामिल थे। 1872 में आत्मा पहाड़ी में सड़क बन गई थी। इस काम में दो हजार रुपए खर्च हुए। कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर कैप्टन सर हेनरी रैमजे की 19 जुलाई, 1872 की रिपोर्ट के आधार पर 6 अगस्त, 1872 को सरकार ने ‘नॉर्थ इंडिया कुमाऊँ आयरन वर्क्स कंपनी’ को बंद करने के आदेश जारी कर दिए। परिणाम स्वरूप आयरन कंपनी बंद हो गई। 1873 में नैनीताल की पहाड़ियों की भू-गर्भिक पड़ताल के लिए कर्नल ब्राउनलो की अध्यक्षता ने एक कमेटी बनी। 13 जून, 1873 को कर्नल ब्राउनलो कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में पहाड़ियों को बरसाती पानी सोखने से बचाने के लिए माकूल उपाय किए जाने का सुझाव दिया गया। उस दौर में ब्रिटिशर्स नैनीताल को इंग्लैंड का ही एक टुकड़ा मानते थे। ईसाई मिशनरी शिक्षा और स्वास्थ्य के जरिए यहाँ अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिशों में जुटे थे। उधर सामाजिक सुधारों के माध्यम से पराधीन आर्यावर्त को स्वतंत्र कराने की विचारधारा भी जन्म ले रही थी। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के देशभक्ति के विचारों से प्रभावित होकर गजानंद छिमवाल की पहल पर रामदत्त त्रिपाठी, रामलाल शाह, राम प्रसाद वर्मा, सोहन लाल कंसल, उत्तमसिंह वर्मा, बलदेव प्रसाद, मिश्रीलाल और रामलाल गुप्त के सामूहिक प्रयासों से 20 मई, 1874 को नैनीताल में ‘सत्यधर्म प्रकाशनी सभा’ का गठन हुआ।

1874 में नैनीताल में स्टेट्स की संख्या 210 के आस-पास पहुँच गई थी। तब तक इन स्टेटों को करीब एक हजार एकड़ जमीन आवंटित की जा चुकी थी। 1874 तक नैनीताल की आबादी इतनी अधिक हो गई कि ‘सेंट जॉन्स इन द विल्डर्नेस चर्च’ में बैठने और प्रार्थना करने के लिए जगह कम पड़ने लगी। दिसम्बर 1875 में चर्च का विस्तार करने के लिए सरकार को एक प्रस्ताव भेजा गया। सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। तय हुआ कि चर्च का विस्तार चर्च के ही फण्ड से किया जाएगा। सितम्बर 1875 को चर्च के विस्तारीकरण का कार्य प्रारम्भ हुआ। इस काम में 16 हजार रुपए खर्च हुए। इसमें अधिकांश धनराशि चर्च फण्ड से ही दी गई। इसी वर्ष तारा हॉल बनकर तैयार हुआ। 1875 में रामपुर के नवाब मोहम्मद हामिद अलीखान बहादुर ने अपनी ब्रुक हिल, ब्रुक हिल लॉज और ब्रुक हिल कॉटेज की जमीन से तीन एकड़ जमीन डायोसेजन बॉयज स्कूल को दे दी। हालांकि यहाँ स्कूल नहीं बना। नैनीताल में यूरोपियन बेहद खुश थे। उन्हें नैनीताल अपने वतन जैसी ही लगता था। यहाँ उन्हें एक ही चीज की कमी कचोटती थी, वह थी शराब। शराब की तलब उन्हें बेचैन कर देती थी। तब नैनीताल में रह रहे यूरोपियन अपने परिचितों को भेजे निजी पत्रों में भी नैनीताल में शराब उपलब्ध नहीं होने का जिक्र किया करते थे। उस दौर में बरेली से यहाँ शराब आती थी।

डाकू रास्ते में शराब लूट लिया करते थे। शराब के शौकीन यूरोपियन की यह समस्या भी जल्द ही हल हो गई। 1876 में ‘नैनीताल ब्रेबरी कंपनी’ बन गई। यह कंपनी उम्दा दर्ज की माल्ट शराब और बीयर बनाती थी। यहाँ बनी ज्यादातर शराब सेना को सप्लाई होती थी। नैनीताल में बंगले बनाने के लिए जमीन चाहने वालों की संख्या लगातार बढ़ती चली जा रही थी। किसी व्यक्ति को निश्चित सीमा से अधिक जमीन आवंटित कराना अब सम्भव नहीं था। 1877 में एक बंगला बनाने के लिए चार एकड़ जमीन आवंटित करने का नियम बनाया गया। नैनीताल में बंगलों की संख्या को नियंत्रित करने की मंशा से ‘चार एकड़ रूल’ लागू किया गया था ताकि नैनीताल के पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए एक निश्चित दूरी में ही बंगले बनें और नैनीताल को अति मानव भीड़ से बचाया जा सके। 1877 में ब्रिटिश सरकार ने नैनीताल क्लब परिसर में 20 यूरोपियन परिवार कक्षों का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। नैनीताल क्लब परिसर में ‘सनी साइड’ बंगले का निर्माण कराया। 1878 में नैनीताल में करीब सवा छह सौ एकड़ क्षेत्रफल में छावनी परिषद गठित हुई। इसी दौरान खुर्पाताल को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया गया। खुर्पाताल में सैनिकों के बैरक और सेना के कार्यालय भवन बनाए गए। 1878 में मदर सलेशिया ने नैनीताल में सेंट मेरी कॉन्वेंट की नींव रखी। मदर सलेशिया ने सेंट मेरी स्कूल की स्थापना बेलवेडियर (आवागढ़) मल्लीताल में की। पर स्थानाभाव के कारण यहाँ स्कूल चला पाना सम्भव नहीं था। तल्लीताल में तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर सर हैनरी रैमजे के पास अत्यधिक निजी सम्पत्ति थी। इसमें से एक हिस्से में रैमजे का निजी पार्क था। जिसे रैमनी पार्क के नाम से जाना जाता था। सर हैनरी रैमजे ने अपने रैमनी पार्क को सेंट मेरी स्कूल को दे दिया। 4 जनवरी, 1879 को सेंट मेरी स्कूल रैमनी पार्क में आ गया।

अब तक लेफ्टिनेंट गवर्नर का निवास रहे ‘माल्डन हाउस’ को ‘छोटा घर’ समझा जाने लगा। कहा गया कि माल्डन हाउस का यह छोटा-सा घर नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट गवर्नर एवं चीफ कमिश्नर की हैसियत के लायक नहीं है। तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर जॉर्ज कपूर ने नया राजभवन बनाने की योजना बनाई। नए राजभवन के लिए सेंट-लू की सबसे ऊँची पहाड़ी का चयन हुआ। इस स्थान से सम्पूर्ण नैनीताल और मैदानी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नजर आता था। सेंट-लू की इस ऊँची पहाड़ी में एलिजावेथन पद्धति से एक भव्य राजभवन बनाया गया। इसके निर्माण में 1,54,800 रुपए खर्च हुए। यह दो मंजिला भवन था। भवन की भीतरी दीवारें लकड़ी से बनी थी, ताकि पहाड़ी में कम-से-कम बोझ पड़े। सेंट-लू पहाड़ी के राजभवन के निर्माण के लिए भूमि समतल करते समय ही यहाँ दरारें नजर आने लगी थी। उस वक्त इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। राजभवन के निर्माण के दौरान इसके डिजायन और निर्माण पद्धति पर भी सवाल उठने लगे थे। नवम्बर 1879 में राजभवन बनकर तैयार हो गया था। अप्रैल, 1880 में लेफ्टिनेंट गवर्नर सेंट-लू के नए राजभवन में रहने लगे। सेंट-लू का नवनिर्मित राजभवन नैनीताल में गवर्नर का तीसरा आवास था। सर अलफ्ररेड लॉयल, सर ऑकलैण्ड कॉलविन और सर चार्ल्स क्रोस्थवेट आदि गवर्नर इसी राजभवन में रहे। कई गवर्नर जनरल ने भी इस राजभवन में प्रवास किया।

 

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