पानी का सामुदायिक प्रयोग हो

Submitted by RuralWater on Tue, 03/24/2015 - 12:32
विश्व जल दिवस पर विशेष
. जब मानवजाति का विकास नहीं हुआ था तब जीवन पूरी तरह प्रकृति पर ही निर्भर थी। जैसे-जैसे विकास की गति तेज होती गई प्रकृति का दोहन शुरू हो गया। हवा, जल, मिट्टी और यहाँ तक कि आकाश पर मानव अपना एकाधिकार जताने लगा। पहले पर्यावरण अपने आप में इतनी सन्तुलित थी कि शायद ही कभी किसी बीमारी या प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा रहा हो।

आज यह सन्तुलन इतना बिगाड़ गया है कि पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी से लोग दो-चार हो रहे हैं। पहले पानी सामुदायिक इस्तेमाल की चीज होती थी। लोग पानी के स्रोत के पास जाकर पानी भरते थे लेकिन अब पानी आपके पास आ जाता है। ‘प्यासा कुआँ के पास जाता है’ जैसे कहावत उल्टे हो रहे हैं।

दुनिया में जल ही एकमात्र ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जो प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद गरीबों को आसानी से उपलब्ध नहीं है। भारत में तो स्थिति और बदहाल है। यहाँ देश की राजधानी में गरीब इलाकों की लगभग 90 प्रतिशत आबादी सुबह से देर रात तक पानी की भागमभाग में लगी रहती है, लेकिन दिल्ली के ही पाश इलाकों में पैसे वाले लोग आराम से पानी फेंकते हैं। क्योंकि उनके पास धन अधिक है। वे राजनीतिक और सामाजिक रूप से ताकतवर हैं। जिनके घरों में नल नहीं है वे आज भी भटक रहे हैं।

दिल्ली ही नहीं सारे देश में पानी के लिए आम आदमी का यह संघर्ष बदस्तूर जारी है। इन सारी विसंगतियों के बावजूद सारी दुनिया में विश्व जल दिवस मनाया जाता है। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। इनमें सबसे बड़ी तादाद भारतीयों की है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रकृति जीवनदायी सम्पदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है। मानव इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अतः इस चक्र को गतिमान रखना मानव की जिम्मेदारी है। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी ले रहे हैं, यदि उतना वापस नहीं किया तो यह चक्र टूट जाएगा।

हर वर्ष दुनिया भर में 22 मार्च को जल दिवस मनाया जाता है। पानी को बचाने के लिये बड़े-बड़े नारे लगाए जाते हैं। परन्तु पूरी दुनिया में पानी का सामान वितरण हो और किसी को पानी के लिए भटकना न पड़े, ऐसा संकल्प किसी विश्वशक्ति ने लिया हो, देखने सुनने को नहीं मिला। पानी की कमी भारत में बड़ी तेजी से भयानक रूप लेती जा रही है।

विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार, जब जनसंख्या 2025 में बढ़कर 140 करोड़ हो जाएगी, पानी की बढ़ी हुई जरूरत को पूरा करने के लिए देश की सभी जल स्रोतों का उपयोग करना पड़ेगा। बढ़ती आबादी का दबाव, आर्थिक विकास और नकारा सरकारी नीतियों ने जल स्रोतों के अत्यधिक प्रयोग तथा प्रदूषण को बढ़ावा दिया है। पुनर्भरण से दुगुनी दर पर जमीनी पानी बाहर निकाला जा रहा है जिससे कि जलस्तर हर साल 1 से 3 मीटर नीचे गिर जाता है।

कल-कारखानों में भी अधिकतर भूजल का ही इस्तेमाल हो रहा है। फिर उनसे दूषित जल का प्रवाह या तो सीधे नदियों में होता है या फिर जमीन के अन्दर। जिस कारण आज जल प्रदूषण एक गम्भीर समस्या बन गई है। जल मन्त्रालय के अनुसार, भारत का 70 फीसदी सतही जल व बढ़ते हुए जमीनी जल के भण्डार जैविक एवं जहरीले रसायनों से प्रदूषित हैं। वर्ल्ड वाटर इंस्टीट्यूट के अनुसार गंगा नदी, जो कि अनेकों भारतीयों का मुख्य जल स्रोत है, में हर मिनट 11 लाख लीटर गन्दे नाले का पानी गिराया जाता है। यूनेस्को द्वारा दी गई विश्व जल विकास रिपोर्ट में भारतीय पानी को दुनिया के सबसे प्रदूषित पानी में तीसरे स्थान पर रखा गया है।

भारत आर्थिक प्रगति के रास्ते पर है लेकिन अगर पानी नहीं रहेगा तो यह विकास की गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी? दो-तीन दशक पहले तक दिल्ली में एक या दो बार हैंडपम्प चलाने से पानी निकल आता था। तब भूजल का स्तर करीब पाँच फीट पर था। लेकिन अब सौ फीट नीचे जाने पर भी पानी नहीं मिल रहा है। ऐसी ही स्थित दूर-दराज इलाकों की भी है। जहाँ बड़ी-बड़ी शीतल पेय की कम्पनियों ने अपने कारखाने लगा रखे हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में लगभग आठ अरब लोगों को साफ पानी नहीं मिल पा रहा। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की एक बड़ी आबादी आज भी रोगों के विषाणुओं और औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों से युक्त पानी पीने पर मजबूर है। इसी का परिणाम है कि दुनियाभर में हर दिन लगभग 4,500 बच्चों की मौत जलजनित बीमारियों के कारण होती है।

यह संख्या एचआईवी-एड्स, मलेरिया और टीबी से मरने वाले बच्चों की संख्या से भी ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया के विभिन्न महानगर रोजाना 150 से 200 मिलियन प्रति गैलन पानी की कमी से जूझते हैं। विश्व शक्ति बनने जा रहे भारत में अब भी करोड़ों लोग साफ पानी से महरूम हैं। हर साल यहाँ पचास लाख से अधिक मनुष्य अशुद्ध पीने के पानी, अस्वच्छ घरेलू वातावरण और मलमूत्र का अनुचित ढंग से निपटान करने से जुड़ी बीमारियों से मर जाते हैं।

मनुष्य में रासायनिक अथवा औद्योगिक अपशिष्ट से दूषित पानी पीने अथवा इस प्रकार के जल के साथ शारीरिक सम्पर्क होने से अनेक संचारी रोग फैलने की सम्भावना अधिक हो जाती है। पानी से होने वाली बिमारियों में हैजा, टाइफाइड, अमीबीय और जीवाणु दस्त एवं अन्य अतिसारीय रोग शामिल हैं।

ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में कम या मामूली आय वाले लोग अपना जीवन पानी के अभाव में गुजारने को मजबूर हैं। उन्हें दिनचर्या के कामों के लिए भी पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसे में उनसे साफ-सफाई और स्वच्छता की उम्मीद करना अति होगा। गरीबी की मार झेल रही आबादी दूषित पानी के कारण होने वाले रोगों की शिकार भी बन रही है।

पानी की समस्या प्रकृतिजनित नहीं बल्कि मानवजनित है। इसका एक बड़ा कारण पानी का व्यावसायीकरण भी है। सरकार ने बड़ी-बड़ी कम्पनियों को भूजल दोहन करने का लाइसेंस दे रखा है। जिस पानी पर सबका समान अधिकार है, ये कम्पनियाँ उसी पानी को बोतलों में बन्द कर अपना मुनाफा कमा रही है।

भारत आर्थिक प्रगति के रास्ते पर है लेकिन अगर पानी नहीं रहेगा तो यह विकास की गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी? दो-तीन दशक पहले तक दिल्ली में एक या दो बार हैंडपम्प चलाने से पानी निकल आता था। तब भूजल का स्तर करीब पाँच फीट पर था। लेकिन अब सौ फीट नीचे जाने पर भी पानी नहीं मिल रहा है। ऐसी ही स्थित दूर-दराज इलाकों की भी है। जहाँ बड़ी-बड़ी शीतल पेय की कम्पनियों ने अपने कारखाने लगा रखे हैं।

ये देशी-विदेशी कम्पनियाँ जमीन से पानी लेकर शीतल पेय बना रही हैं और किसानों के खेत सूख रहे हैं। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में पानी की इतनी कमी है कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। पानी के प्रबन्धन के लिए सरकार अभी तक कोई उचित एवं सर्वस्वीकार्य नीति नहीं बना पाई है। जिस कारण पानी बहुत बड़ा मसला बन गया है। भारत और पूरी दुनिया को इस पर विचार करना चाहिए कि सबको सुगमता से पानी कैसे उपलब्ध करवाया जा सकता है। क्योंकि दुनिया तभी रहेगी जब जीवन रहेगा। इसलिए जरूरी है कि एक बार फिर से पानी के सामुदायिक प्रयोग करने पर बल दिया जाए।

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