पानी के पादरी

Submitted by admin on Sun, 12/07/2008 - 07:45

फादर बैंजामिनफादर बैंजामिनयह पूरा इलाका खारे पानी से भरा है। कुदायूं (केरल) के पास राष्ट्रीय राजमार्ग १७ के आसपास का यह इलाका मीठे पानी के लिए मुश्किल जगह है। लेकिन ७० साल के फादर बेंजामिन डीसूजा ने ऐसा अभिनव प्रयोग किया है कि सबके लिए मीठे पानी तक पहुंच का रास्ता खुल गया है। चर्च के अपने पास चार एकड़ जमीन है। फादर बेंजामिन ने तय किया कि वे इस भूभाग पर बरसनेवाली हर बूंद को रोकेंगे और इस खारे पानी के इलाके में कुओं को मीठे पानी से भर देंगे। उन्होंने पांच कुओं को मीठे पानी से लबालब कर दिया। अब मीठे स्वभाव और व्यवहार ही नहीं, मीठे पानीवाले पादरी है।

तल्लूर के इस सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च में फादर बेंजामिन कोई छह साल पहले आये थे। वे बताते हैं कि जब वे आये थे तो परिसर का पानी 15 रास्तों से बाहर चला जाता था। सबसे पहले उन्होंने उन १५ रास्तों को बंद किया। पानी को रोकने के अपने प्रयोग को लागू करने से पहले सबसे पहले उन्होंने खुद पानी के स्वभाव धर्म को समझा फिर इस विषय पर एक गोष्ठी बुलाई। गोष्ठी से तो कोई खास नतीजा नहीं निकला लेकिन वे चुपचाप अपने काम में लगे रहे। उन्होंने मान लिया कि यह काम भी अब उनकी प्रार्थना का हिस्सा है। उन्होंने तय किया परिसर में जितना भी पानी गिरता है उसे रोक लेना है। चर्च के आंगन में दो कुएं थे जिनमें से एक पूरी तरह सूख चुका था। दूसरा कुआं था जो थोड़ा बड़ा था। वह भी मार्च महीना आते-आते दम तोड़ देता था।

..सबसे पहले चर्च की इमारत के ऊपरी हिस्से में गिरने वाले वर्षाजल को सूखे कुएं की ओर मोड़ दिया गया। बाकी आंगन में बरसने वाले पानी को गडढे की तरफ मोड़ दिया गया है। यहां पानी सरल तरीके से छनकर जमीन में पहुंच जाता है। इसके अलावा परिसर में कई छोटे-छोटे गडढे बनाये गये हैं। इन सबमें भी वर्षा का बहता पानी जमा होता है। और फिर धीरे-धीरे नीचे उतरकर भूजल को संवर्धित करता है। गिरजाघर में एक नारियल का बाग है। यहां अच्छी तरह से मेड़ बना दी गयी है। अब यहां आनेवाला पानी भी बहने के बदले नीचे जमीन में उतरता है।

चर्च के अलावा इस परिसर में दो और बड़ी इमारते हैं। परिसर में सामने की ओर सड़क से लगा हुआ सेंट किलोमीना उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है। परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार के बाईं ओर स्कूल का सभाकक्ष है। इन दोनों इमारतों की छतों पर एक तालाब में जाकर इकट्ठा होता है। छत के एक हिस्से का पानी १५ हजार लीटर की पक्की टंकी में जमा कर दिया जाता है। शुरू के वर्षों में जब कुआं सूखा हुआ था तो इसी टंकी का पानी परिसर की जरूरतों को पूरा करता था। मंगलोर की एक सामाजिक और आर्थिक संस्था ने इसे बनाने में जरूरी तकनीकि और आर्थिक मदद भी की थी।

 

 

फादर का ‘कृष्ण सागर’


फादर बेंजामिन ने इमारत की छत से आनेवाले पानी को अंतिम रूप से जमीन में उतारने के पहले उसे नारियल के बागीचे से होकर निकालने का बंदोबस्त किया। इस प्रक्रिया ने बगीचे की मिट्टी को नम बनाया और इससे नारियल के पेड़ों को भी काफी लाभ पहुंचा है। अब नारियल और काली मिर्च की पैदावार भी बढ़ गयी है। भूजल स्तर काफी ऊपर आ गया है। फादर बेंजामिन का कहना है कि छत के पानी को संरक्षित कर भूजल ऊपर लाने, जमीन पर नमी बढ़ाने का यह तरीका पड़ोस के लोगों को दिखाने-समझाने के लिहाज से बहुत उपयोगी है। परिसर के सबसे निचले क्षेत्र में एक नाला तैयार किया गया है। यह नाला ऊपर से बह जानेवाले पानी को अपने में समेट लेता है। इसे यहां मड़का कहते हैं। फादर इसे ‘कृष्ण सागर’ भी कहते हैं। मड़का नाला या बंड समुद्र के किनारे के क्षेत्रों में जल संरक्षण करने, पानी को धरती में उतारने का काम ठीक वैसे ही करते हैं जैसे देश के दूसरे हिस्सों में जौहड़ और तालाब। फादर जिस कृष्णसागर की उपाधि अपने मड़का को दे रहे हैं वह कृष्ण सागर कावेरी नदी पर बना दक्षिण का सबसे बड़ा बांध है।

फादर बैंजामिन गिरजाघर के बड़े आंगन की एक दिशा की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि कोई दस बरस पहले यहां गिरनेवाला सारा पानी पूरी तरह बाहर बह जाया करता था। अब आईये मेरे साथ। मैं आपको दिखाता हूं कि अब उस पानी को हम किस तरह रोक रहे हैं। आंगन को कोने में एक नया गड्ढा खोदा गया है। डेढ़ एकड़ के खेल के मैदान का पूरा पानी इसी गड्ढे में आता है। इस तरह इसमें कम से कम ढाई करोड़ लीटर पानी इकट्ठा हो जाता है। वे अपने मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि अब हमारी ये जमीन बारिश के पानी को पीने की अभ्यस्त हो गयी है। पूरा परिसर अब लगभग पूरे साल हरी घास और हरियाली से ढंका रहता है। इससे गिरनेवाले पत्तों ने जमीन को उपजाऊ बना दिया है। एक काम ने दूसरे को और दूसरे ने तीसरे को सहारा दिया है। उपजाऊपन ने जल रोकने और सोखने की क्षमता बढ़ाई है।

 

 

 

 

पास-पड़ोस भी खुश


केवल गिरजाघर का कुआं ही तरल नहीं हुआ। पड़ोस के कुओं में भी पानी आ गया। परेरा का कुआं भी उनमें से एक है जिसमें पानी न होने के कारण परेरा न जाने कहां-कहां भटकते थे। लेकिन फादर के प्रयासों से उनके कुओं का पानी भी ऊपर आ गया। पिछले दो साल से अपने खेत को सींचने के लिए परेरा अपने कुआं छोड़कर कहीं गये नहीं। लेकिन जैसा आमतौर पर होता है फादर बैंजामिन के साथ भी हुआ। शुरू में लोगों ने कहा कि यह सब काम करना किसी पादरी के लिए ठीक नहीं है। लोगों ने उनके इस काम में उनका साथ नहीं दिया। लोगों का कहना था पानी तो खूब गिरता है, फिर जल संरक्षण जैसी बातों का क्या मतलब? लेकिन काम के नतीजों ने सबकी राय बदल दी।

अब फादर बैंजामिन ने यहां लगभग १०० किस्म के औषधीय पौधे भी लगा दिये हैं। वे परिसर में ही एक छोटा सा जंगल खड़ा करना चाहते हैं। अब वे चाहते हैं कि मीठा पानी आया है तो सरस पर्यावरण भी आये। पशु-पक्षी इस जगह को अपना निवास बनायें। केवल चर्च परिसर में ही नहीं बल्कि पड़ोस में भी। उनकी प्रेरणा से मीठे पानी को जोड़ लेने की जुगत और भी कुछ लोगों ने शुरू की है। आखिर क्यों न हो? ईसा ने भी तो यही कहा था- अपने पड़ोसी को प्यार करो। अब आप जिसे प्यार करते हैं, उसको कष्ट में कैसे देख सकते हैं?

लेखक संपर्क - श्रीपद्रे-shreepadre@gmail.com, editors@indiatogether.org
फादर बैंजामिन संपर्क - Tallur Church Tel : (08254) 238 380

साभार – visfot.com, indiatogether.org

 

 

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