पानी की समस्या से जूझ रहा, कैसे हुआ पानीदार कुरूम गांव

Submitted by UrbanWater on Thu, 04/23/2020 - 13:02
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साभार - अप्रैल 2018, आदिवासी साप्ताहिक, जनसंपर्क विभाग, रांची, झारखंड

‘गंगा क्वेस्ट-2020’

यह कहानी पानी की समस्या से जूझ रहे कुरूम गांव की कहानी है। कहा जाता है कि जिस जगह पर समस्या होती है वहीं पर समाधान भी होता है। लेकिन इसके लिए प्रयास करने की जरूरत होती है। नगर हो या गांव पानी की कमी कोई नई समस्या नहीं है। पर कोशिश महत्त्वपूर्ण होती है।

झारखंड के गुमला जिले का पालकोट प्रखंड का कुरूम गांव दूसरे गांवों से अलग है। आदिवासी बहुल इस गांव में कभी पीने के पानी की काफी समस्या हुआ करती थी, पास में कोई नदी नहीं होने के कारण महिलाओं को कोसों दूर बर्तन या घड़ी में ढोकर पानी लाना पड़ता था। यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। इस वजह से दूसरे तरह के कार्यों में कई तरह की बाधाएं आती थीं। बच्चों को छोड़कर पानी लाने से उनकी देखभाल पर काफी असर पड़ता था। लेकिन इसके अलावा कोई उपाय भी नहीं था। जब पीने के पानी का यह हाल था, तो खेती की बात ही अलग थी। इसके लिए तो सिर्फ वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था। इसलिए खेती बहुत कम होती थी। जबकि जीने के लिए सिर्फ भोजन ही नहीं बल्कि आय के साधन भी जरूरी थी। लेकिन यहाँ खेती के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसलिए अधिकतर युवा काम की खोज में बाहर चले जाया करते थे। यानी पलायन यहां आम बात थी। इसी दौरान गांव में एक स्वयंसेवी संस्था के सदस्यों का आगमन हुआ।

गांव के विकास के लिए संस्था के लोग गांवों का दौरा कर रहे थे, उन्हें यहां की स्थिति देखकर काफी हैरत हुई। उन्होंने यहां की स्थिति का अध्ययन कर समस्याओं पर विचार किया। समस्या पानी को लेकर थी। यानी एक समस्या से कई तरह के समाधान हो सकते थे। इसलिए उन्होंने गांव के लोगों के साथ मिलकर पानी के उपाय पर चर्चा करना आरंभ कर दिया। इसका समाधान उन्हें गांव के पहाड़ पर नजर आया।

दरअसल पहाड़ पर से हमेशा पानी गिरता रहता था। वहां से पानी गिर कर एक नाले के जरिए नीचे गड्ढे में गिरता था। फिर वहां से आगे बढ़ जाता था यानी पानी बर्बाद हो जाता था। हालांकि गांव की कुछ महिलाएं यहां से पानी ले जाती थीं लेकिन पानी साफ नहीं होगा होने के कारण इस पानी को पीने से स्वास्थ्य समस्याएं होती थीं।तो उन लोगों ने यहीं से पानी की समस्या का समाधान करने का रास्ता खोजा।

गांव के रितया खड़िया कहते हैं कि संस्था के लोगों की मदद से हम लोगों ने ‘फ्लो एरिगेशन’ की तकनीक अपनाई हम लोगों को इस बारे में विस्तार से बताया गया। इसके लाभ बताए गए। इस तकनीक के जरिए पहाड़ पर ही बांध बनाया गया। वहां पर कई फुट लंबी पाइप लगाई गई। उसके सहारे पानी नीचे लाया गया, इससे जो काफी हम जो पानी हम से काफी दूर था वह नीचे हम तक पहुंच गया। हम लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जिस पानी के लिए हम लोग सालों से तरस रहे थे, वह काफी जल्दी हमें मिल गया।

जब नीचे पानी आ गया तो इसके बाद खेत तक पानी पहुंचाने पर विचार किया गया। जमीन वहां एक समान नहीं थी। उूंची-नीची जमीन एक बड़ी समस्या थी। लेकिन इसका समाधान खोजने गया खोज लिया गया। इसके लिए फिर से पाइप लाया गया। पाइप का जाल बिछाया गया और हर खेत के करीब पाइप को पहुंचाया गया। जो खेत कभी पानी के लिए सिर्फ मौसम पर निर्भर रहते थे, अब वहां पर पानी पहुंच गया था।

खेतों में सिंचाई के लिए ‘फ्लो एरिगेशन पॉइंट’ बनाया गया। इसे एक जगह से पानी हर खेत तक पहुंचने लगा। खेत में पानी पहुंचने का मतलब था, किसानों की जिंदगी में खुशहाली। जो किसान पहले सिर्फ धान की खेती कर काम की खोज में पलायन करते थे। वे अब यहीं पर खेती करने लगे। वे गेहूं, जौ, मक्का, दलहन और सब्जी भी उगाने लगे। गांव में ही रोजगार के स्थाई साधन हो गए।

बदलाव इतना ही नहीं हुआ बल्कि खाद में भी परिवर्तन किया गया। पहले सिर्फ रासायनिक खाद का इस्तेमाल किया जाता था। ग्रामीणों के इसके दुष्परिणाम के बारे में बताया गया तो वे सचित हो गए। इसके विकल्प पर विचार किया। इसके लिए जैविक खाद को अपनाया गया। यह उनके लिए और भी सरल था। क्योंकि जैविक खाद के लिए सारी चीजें वहां मौजूद थीं। चाहे गोबर हो या केंचुआ यह उनके आसपास ही थे।

गांव में बैठक की गई और रासायनिक खाद को छोड़ देने का फैसला किया गया। सभी लोग केंचुआ खाद का इस्तेमाल करने लगे। इससे न सिर्फ खेत की ताकत बढ़ गई, बल्कि रासायनिक खाद को लेकर हो रहे हो उनके खर्चे भी बंद हो गए। एक तरफ स्वादिष्ट सब्जी मिलने लगी तो दूसरी तरफ आमदनी भी बढ़ गई। महिला किसान फूलमनी का कहना है कि जो किसान कभी खेती से दूर भागते थे। वही अब इसे बेहतर कहने लगे। हर घर में महिलाएं सब्जी की खेती करने लगीं। अब उन्हें पानी के लिए दूर नहीं जाना पड़ता है। इससे समय की बचत तो हुई ही साथ ही साथ रोजगार भी मिल गया।

इसके अलावा एक समस्या पेयजल की भी थी। उसके लिए गांव के स्कूल में एक मीनार बनवाई गई। वहां पानी की 2 टंकियां बनाई गईं। उसे पाइप से जोड़ा गया। एक टंकी में पानी को स्वच्छ करने के लिए कोयला, कंक्रीट और बालू डाला गया। इससे दूसरे टंकी में स्वच्छ जल पहुंचने लगा। इस तरह से स्कूल में बच्चों के साथ ही गांव के लोगों को भी स्वच्छ जल मिलने लगा।

किसानों के सामूहिक प्रयासों से गांव की तस्वीर बदल गई। आज गांव में न सिर्फ हरियाली है, बल्कि हर तरफ खेत में फसल लगी दिखती है। अब गांव में न तो चारे की कमी है, ना जानवर की। इसलिए लोग पशुपालन भी करने लगे हैं। किसान हर तरह से लाभान्वित हो रहे हैं। कुरूम गांव की तरक्की की खबर पास के गांव में पहुंची तो वहां पर भी लोग सामूहिक प्रयास करने लगे हैं। पास के तेतरटोली, अम्बाटोली और रुकडेगा गांव में भी लोग पानी की समस्या के लिए ऐसे ही प्रयास करने लगे हैं। वह भी रासायनिक खाद से तौबा कर, जैविक खाद पर जोर देने लगे हैं। अब तो यहां पर लाह का उत्पादन भी होने लगा है, लाह की प्रोसेसिंग मशीन लगाई है जहां लाह जमा किया जाता है।
 

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