पीपीपी के विवादास्पद अनुभव

Submitted by Hindi on Tue, 08/14/2012 - 13:33

यदि पानी-बिजली के ऐसे बुनियादी क्षेत्र में पीपीपी के भारतीय व विदेशी अनुभवों को ही हम देख लें, तो समझ में आ जायेगा कि बुनियादी ढांचा क्षेत्र में पीपीपी मॉडल का संचालन कितना अनैतिक व खतरनाक तरीके से किया जा रहा है! जमीनी हकीकत पीपीपी मॉडल के बताये जा रहे उद्देश्यों से कितनी जुदा है!!
 

अर्जेटीना


अर्जेटीना के ब्यूनस आयर्स में जलापूर्ति निजीकरण से पूर्व 1991 की फरवरी में 25 फीसदी और अप्रैल में 29 फीसदी दरें बढ़ाईं गईं। एक साल बाद ही अप्रैल,1992 में वस्तु और सेवा शुल्क के नाम पर 18 प्रतिशत जोड़ा गया। निजीकरण से कुछ माह पूर्व इसमें भी 8 फीसदी वृद्धि कर दी गई। बाद में दरों में 27 फीसदी की बनावटी कमी दिखाते हुए दावा किया कि शुल्क दरें कम हुई है; जबकि इस तरह असल में कुल मिलाकर 20 प्रतिशत की वृद्धि ही हुई।

 

बोलीविया


बोलीविया के अल अल्टो, ला पाज और कोचाबाम्बे शहरों में जो हुआ, उसकी कहानी अब पानी के व्यावसायीकरण व उसकी अंतिम परिणति का पर्याय बन चुकी है। अनुबंध के तौर पर भी और नैतिकता के तौर पर भी अल अल्टो और ला पाज शहर में अनुबंधित कंपनी ‘स्वेज’ सभी को पानी पिलाने को बाध्य थी। ‘स्वेज’ की नीयत देखिए! कपनी ने इस बाध्यता से निजात पाने के लिए अनुबंध की भाषा को पुनर्परिभाषित किया। तर्क दिया कि अल अल्टो को झुग्गी बस्तियों को जल वितरण व्यवस्था से जोड़ने के लिए कनेक्शन का मतलब पाइप कनेक्शन नहीं होकर, सार्वजनिक नल तक उनकी पहुंच अथवा टैंकर भी हो सकता है। वादाखिलाफी की पलटमार नीयत का ऐसा उदाहरण पानी के निजीकरण पर सवाल उठाने के लिए काफी नहीं। कोचाबाम्बे शहर में पानी के इसी निजीकरण के खिलाफ दंगे हुए और कंपनी को बोरिया बिस्तर समेटना पड़ा।

 

फिलीपींस

मनीला में भी दरों का ऐसा ही खेल हुआ। कंपनी संघ को भागना पड़ा। घोटाला हुआ, सो अलग। मेट्रो मनीला जलप्रदाय परियोजना के लिए अनुबंधित कंपनियों के संघ - मेनीलाड ने पहले कंपनी चलाने और सेवा लक्ष्य पूरा करने में आर्थिक असमर्थतता जताते हुए हाथ खड़े कर दिए; बाद में व्यय की गई 30 करोड़ धनराशि की मांग कर डाली। फिर एक दिन 10 करोड़ रुपये रियायत शुल्क का भुगतान किए बगैर भाग खड़ी हुई। आगे संचालन के लिए फिलीपींस सरकार को 40-50 करोड़ का चूना और लगा, सो अलग। इस कारनामें के मूल में भी वही स्वेज नामक कंपनी है। न मालूम क्यों हिंदुस्तान में बहुत पूजा जा रहा है।

भारत में भी इस पीपीपी घपले के कई उदाहरण हैं। नागपुर विवाद का उदाहरण आजकल चर्चा में है ही।

 

तिरुपुर


तिरुपुर जलप्रदाय एवम् मलनिकसी परियोजना, भारत की सबसे पहली औघोगिक एवम् घरेलु जलप्रदाय परियोजना है। इसमें कंपनी 20 प्रतिशत तक का सालाना मुनाफा कमा रही है। स्थिति यह है कि औद्योगिक क्षेत्र को आवश्यकता की एक तिहाई जलापूर्ति फिर भी सुनिश्चित नहीं हो पा रही।

 

नागपुर


नागपुर में निजी कंपनी द्वारा काम संभालते ही जलशुल्क बढ़ गया। दिल्ली सरकार ने अनुबंध करने से पहले ही जलशुल्क बढ़ा दिया।

 

हैदराबाद


हैदराबाद की मेट्रो रेल परियोजना निविदा प्रक्रिया से ही विवाद में रही। योजना आयोग ने आपत्ति की। उसने इस परियोजना के पूर्व सलाहकार ई. श्रीधरन के सचेत कराने वाले पत्र का हवाला देते हुए हैदराबाद मेट्रो को गुमराह करने वाला बताया। कहा कि निगेटिव वायोबिलिटी गेप फंडिंग के बदले व्यावसायिक उपयोग के लिए 296 एकड़ की बेशकीमती जमीन बीओटी कंपनी को उपलब्ध करा देना विरासत में मिली पूंजी को मुफ्त में उड़ा देने जैसा है। पत्र में राजनैतिक घोटाले व बीओटी की नीयत पर शंका जताई गई है। बीओटी-मायटास इन्फ्रा लि., नवभारत वेंचर्स लि., थाईलैंड की इटाल-थाई और आईएल एंड एफएस लि. नामक कंपनियों का संघ है। मायटास इन्फ्रा की मूल कंपनी सत्यम कम्पयूटर्स पहले ही घोटालों के पन्नों में दर्ज है।

 

मध्य प्रदेश


इसी तरह अनुबंध से इतर छूट देने का विवाद रिलायंस की अल्ट्रा मेगा पावर परियोजना, सासन (म.प्र.) को लेकर भी है। नियमानुसार बंधक कोयला खाने विशिष्ट उपयोगकर्ता को ही आवंटित होती हैं। इन खदानों से जो भी अतिरिक्त कोयला उत्पादन होता है, वह भारत सरकार की कंपनी-कोल इंडिया लिमिटेड की संपत्ति होता है। किंतु सरकार ने ऐसे अतिरिक्त कोयले को रिलायंस पावर की अन्य परियोजनाओं को बेचने की अनुमति दे दी। टाटा समूह ने इसके खिलाफ अपील भी की थी।

म. प्र. नर्मदा नदी पर महेश्वर बिजली परियोजना पहले नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के पास थी। उसने एक हॉस्टल की देखरेख आदि अपने पास रखी और 1989 में परियोजना म.प्र. विद्युत मंडल को हस्तान्तरित कर दी। 440 मेगावाट की इस परियोजना की लागत 1991 में 456.63 करोड़ आंकी गई। 1996 में विद्युत मंडल ने परियोजना एस. कुमार्स द्वारा प्रवर्तित कंपनी महेश्वर हायडल पावर कार्पोरेशन लि. को सौंप दी। महज इन पांच वर्षों में लागत बढ़ाकर 1569 करोड़ रुपये दिखा दी गई। यह लागत वृद्धि भ्रष्टाचार से संलिप्त होने का गंभीर संदेह पैदा करती है। खेल और भी यह हुआ कि कर्ज वित्तीय संस्थायें देती रहीं और उस पैसे को अन्यत्र लगाकर मजा ठेकेदार कंपनी लूटती रही। ये गंभीर आरोप नियंत्रक एवम महालेखा परीक्षक ने लगाये।

 

 

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