परिशिष्ट : जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Pollution Prevention and Control) Act, 1974 in Hindi)

Submitted by Hindi on Sun, 06/25/2017 - 12:57
Source
‘जल प्रदूषण’ केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 2011

जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम 1974 (जिसे बाद में जल अधिनियम कहा गया है) संविधान का एक अनिवार्य भाग है, जिसको जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण के प्रयोजन के लिये विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य जल की स्वास्थ्यपरकता को बनाए रखना है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों की पुष्टि करने के लिये जल अधिनियम 1988 में संशोधन किया गया था। यह केंद्रीय अधिनियम हो जो कि जल प्रदूषण को आम जनता के लिये हानिकारक मानता है। जल अधिनियम के बनने से केंद्रीय और राज्य स्तरीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, अधिनियम के अंतर्गत नदियों और कुँओं की सफाई को बढ़ावा देने तथा जल प्रदूषण का निवारण तथा नियंत्रण करने में सक्षम हो गये हैं। केंद्रीय बोर्ड केंद्र सरकार को जल प्रदूषण से संबंधित मामलों पर सलाह दे सकता है, राज्य बोर्डों के क्रियाकलापों को समन्वित कर सकता है, जल प्रदूषण से संबंधित जाँच और अनुसंधान कर सकता है तथा जल की गुणवत्ता के मानक निर्धारित कर सकता है और जल प्रदूषण के नियंत्रण तथा निवारण के लिये विस्तृत योजनाएँ तैयार कर सकता है। अधिनियम की धारा 16 के तहत केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किये जाने पर केंद्रीय बोर्ड राज्य बोर्ड के कार्यों को भी कर सकता है। केन्द्रीय बोर्ड और राज्य बोर्ड के बीच कोई विवाद उत्पन्न होने पर केन्द्रीय बोर्ड का निर्णय ही मान्य होगा।

जल अधिनियम के प्रावधान नदियों, अन्त:स्थलीय जल, भूजल और समुद्री या ज्वारीय जल पर लागू होते हैं। नालों में जल निकासी और औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों या प्राप्त जल की गुणवत्ता के लिये अनुमेय मानक इस अधिनियम में स्पष्ट नहीं है। तथापि, अधिनियम राज्य बोर्डों को ये मानक निर्धारित करने के लिये प्राधिकृत करता है। इस अधिनियम में नदियों, कुँओं और नालों या भूमि पर राज्य बोर्डों द्वारा निर्धारित मानकों से अधिक प्रदूषित पदार्थों के उत्सर्जन पर प्रतिबंध है। अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत इस प्रावधान का उल्लंघन करने पर दण्डात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति द्वारा उद्योग स्थापित करने, उसको चलाने या इस प्रकार की किसी भी कार्रवाई से पूर्व राज्य बोर्ड से सहमति प्राप्त करना आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति द्वारा अपशिष्ट पदार्थों का निपटान करने के लिये या जल शोधन संयंत्र लगाने के पूर्व राज्य बोर्डों से सहमति प्राप्त करना आवश्यक है (खण्ड 25)। राज्य बोर्ड का यह दायित्व है कि वह सभी सहमति आदेशों को एक रजिस्टर में दर्ज करे। जनता को भी इस रजिस्टर को देखने का अधिकार है। यदि किसी सहमति आदेश में किसी कार्य को निष्पादित किया जाना अपेक्षित है और यदि वह कार्य निष्पादित नहीं किया गया है तो राज्य बोर्ड प्रदूषक को 30 दिन का नोटिस देकर स्वयं वह कार्य निष्पादित कर सकता है और उस पर आने वाला व्यय प्रदूषक से वसूल कर सकता है (धारा 30)।

वर्ष 1988 में जल अधिनियम में किए गए संशोधन से इस अधिनियम में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। इस अधिनियम में 33 अ नामक एक नई धारा जोड़ी गई जिसमें राज्य बोर्डों को यह अधिकार प्रदान किया गया कि वे किसी भी व्यक्ति, अधिकारी या प्राधिकरण को बंद करने, प्रतिबंधित करने या किसी भी उद्योग अथवा उसके प्रचालन या प्रक्रिया को रोकने के आदेश जारी कर सकते हैं तथा उसे पानी, बिजली या किसी भी अन्य सेवा की आपूर्ति को रोकने के निर्देश जारी कर सकते हैं। राज्य बोर्ड प्रदूषक द्वारा जल प्रदूषण रोकने के लिये न्यायालय से भी आदेश प्राप्त कर सकते हैं। जल का प्रदूषण रोकने हेतु बोर्ड, न्यायालय से भी आदेश प्राप्त कर सकते हैं। जल का प्रदूषण रोकने से संबंधित बोर्ड पर न्यायलयों के आदेशों या निर्देशों का उल्लंघन करने पर दण्डात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। वर्ष 1988 में जल अधिनियम में किए गए संशोधन की धारा 49 के अंतर्गत नागरिक भी जल अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई कर सकते हैं। शिकायत करने वाला नागरिक राज्य बोर्ड की संबंधित रिपोर्टों को देख सकता है। बोर्ड के भी उन रिपोर्टों को जनता के लिये अवश्य उपलब्ध कराना चाहिये जब तक कि उनको उपलब्ध कराना जनहित के विरुद्ध न हो।

अधिनियम के संबंध में जानकारी
धारा 1- संक्षिप्त नाम :-


इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 है।

धारा 2- परिभाषाएँ :-


क. बोर्ड से केन्द्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड का अभिप्राय है।

ख. केन्द्रीय बोर्ड से अधिनियम की धारा 3 के अधीन गठित केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से आशय है।

ग. सदस्य से बोर्ड का सदस्य जिसके अंतर्गत अध्यक्ष भी आते हैं, से अभिप्राय है।

घ. अधिष्ठाता से अभिप्राय है, ऐसा व्यक्ति जिसका उस परिसर के कामकाज पर नियंत्रण है।

ङ. निकास के अंतर्गत मल या व्यावसायिक बहिस्राव वहन करने वाली कोई खुली, बंद नाली से है, प्रणाली से है या अन्य कोई जमा व्यवस्था से है, जिससे प्रदूषण होता है।

च. प्रदूषण से जल का ऐसा संदूषण या जल के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों का ऐसा परिवर्तन या किसी अन्य द्रव, गैसीय या ठोस पदार्थ का जल में ऐसे निस्सरण से आशय है जो न्यूसेंस उत्पन्न करे जिससे न्यूसेंस होना संभावित है।

छ. ‘विहित’ से यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गये नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है।

ज. ‘मल बहिस्राव’ के किसी मल वहन प्रणाली से निकला बहिस्राव अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत खुली नालियों से निकला मैला पानी भी है।

झ. मलजल से मल या व्यावसायिक बहिस्राव वहन करने वाली कोई खुली या बंद तारनाली या प्रणाली अभिप्रेत है।

ञ. राज्य बोर्ड से धारा 4 के अधीन गठित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अभिप्राय है।

ट. व्यावसायिक बहिस्राव के अंतर्गत कोई ऐसा द्रव, गैसीय या ठोस पदार्थ है जो घरेलू मल से भिन्न किसी उद्योग, संक्रिया या प्रक्रिया को चलाने के लिये प्रयुक्त किसी परिसर से निकलता है।

धारा 3- केन्द्रीय बोर्ड का गठन


1. यह धारा केन्द्रीय बोर्ड के गठन के संबंध में है जिसके अंतर्गत केन्द्र सरकार एक केंद्रीय बोर्ड का गठन करेगी।

2. इस उपबंध के अंतर्गत केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष एवं सदस्यों की संख्या निर्धारित की गई है एवं नियुक्ति के संबंध में बताया गया है। इसके अंतर्गत एक पूर्णकालिक अध्यक्ष एवं सदस्य सचिव भी शामिल है, जिन्हें केन्द्रीय सरकार नियुक्त कर सकती है।

धारा 4- राज्य बोर्ड का गठन


1. यह धारा राज्य बोर्ड के गठन से संबंधित है। जिसके अंतर्गत राज्य सरकार एक राज्य बोर्ड का गठन करेगी जिसका नाम अधिसूचना के अनुसार होगा।

2. इस उपबंध के अंतर्गत राज्य सरकार एक अध्यक्ष, सदस्य सचिव सहित राज्य बोर्ड में कुछ सदस्यों को नियुक्त करेगी। अध्यक्ष पूर्णकालिक या अंशकालिक हो सकता है जबकि सदस्य सचिव पूर्णकालिक होना चाहिये इन्हें पर्यावरण संरक्षण से संबंधित विभिन्न विषयों का ज्ञान होना चाहिये।

धारा 5- सदस्यों की सेवा शर्तें


1. इस अधिनियम के द्वारा या अधीन सदस्य सचिव को छोड़कर मंडल के अन्य सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्षों का होगा, लेकिन कोई सदस्य अपनी अवधि समाप्त होने के बाद तब तक अपने पद पर रह सकता है जब तक कि उसका उत्तराधिकारी उसका पद ग्रहण न कर ले।

2. इस उपधारा के अंतर्गत नामांकित बोर्ड के सदस्य की पदावधि उसी समय समाप्त हो जायेगी जब वह यथा स्थिति केंद्र सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में उस पद पर नहीं रह जाता है जिसके आधार पर उसे नामांकित किया गया था।

3. केंद्र सरकार या राज्य सरकार यदि ठीक समझे तो किसी भी सदस्य को उसकी पदावधि खत्म होने के पूर्व ही युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात उसे उसके पद से हटा सकती है।

4. सदस्य सचिव से भिन्न बोर्ड का कोई भी सदस्य अध्यक्ष की दशा में केंद्र सरकार या राज्य सरकार को तथा किसी दशा में बोर्ड के अध्यक्ष को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा किसी भी समय अपना पद त्याग सकता है।

5. यदि सदस्य सचिव से भिन्न बोर्ड का सदस्य बोर्ड की राय में पर्याप्त कारण के बिना बोर्ड की 3 लगातार बैठकों में अनुपस्थित रहेगा या उस पद पर नहीं है जिस आधार पर उसे नामांकित किया गया है तो यह समझा जायेगा कि उसने अपना स्थान रिक्त कर लिया है।

6. बोर्ड में कोई आकस्मिक रिक्ति में यदि किसी सदस्य का नामांकन किया जाता है तो वह सदस्य केवल उस अवधि के शेष भाग के लिये ही पद धारण करेगा।

7. बोर्ड का सदस्य पुन: नामांकित होने का पात्र होगा।

8. अध्यक्ष तथा सदस्य सचिव से भिन्न बोर्ड के सदस्य की सेवा शर्तें वही होंगी जो निर्धारित की जायेंगी।

9. अध्यक्ष की सेवा शर्तें वही होंगी जो केंद्र या राज्य सरकार निर्धारित करेगी।

धारा 6- निहर्ताएँ


1. कोई ऐसा व्यक्ति बोर्ड का सदस्य नहीं होगा जो दिवालिया हो, विकृतचित हो, किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध किया जाए या किया जा चुका है एवं जिसका किसी मल या व्यावसायिक बहिस्राव की अभिक्रिया के लिये मशीनरी संयंत्र उपकरण या फिटिंग के विनिर्माण विक्रय या भाड़े पर देने का कारोबार करने वाले किसी फर्म या कंपनी में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं या किसी भागीदार द्वारा कोई अंश या हित है।

2. केंद्र सरकार या राज्य सरकार इस धारा के अधीन किसी सदस्य को हटाने का आदेश तभी दे सकती है जब उस सदस्य को युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो।

धारा 7- सदस्यों द्वारा स्थानों की रिक्ति


यदि बोर्ड का कोई सदस्य धारा 6 में विनिर्दिष्ट निरहर्ताओं में से किसी से ग्रस्त हो जाए तो उसका स्थान रिक्त हो जायेगा।

धारा 8- बोर्ड के अधिवेशन


बोर्ड का अधिवेशन प्रत्येक तिमाही में कम से कम एक बार होगा और वह अपने अधिवेशनों में काम-काज करने के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विहित किये जाएँ। परंतु यदि अध्यक्ष की राय में कोई अतिआवश्यक प्रवशत्ति का कार्य किया जाना है तो वह ऐसे समय पर बोर्ड का अधिवेशन बुला सकता है जो उपयुक्त प्रयोजन के लिये ठीक समझे।

धारा 9- समितियों का गठन


बोर्ड ऐसे प्रयोजन या प्रयोजनों के लिये पूर्णत: सदस्यों से या पूर्णत: अन्य व्यक्तियों से या अंशत: सदस्यों से और अंशत: अन्य व्यक्तियों से गठित होने वाली इतनी समितियों का गठन कर सकेगा जो वह ठीक समझे।

धारा 10- बोर्ड के साथ व्यक्तियों का विशेष प्रयोजनों के लिये अस्थायी रूप से सहयुक्त किया जाना


बोर्ड ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिये जो विहित किये जाए, अपने साथ किसी ऐसे व्यक्ति को सहयुक्त कर सकेगा जिसकी सहायता या सलाह लेने के लिये वह इस अधिनियम के अधीन अपनी कृत्यों में से किसी का पालन करने की इच्छा करता है।

धारा 11- बोर्ड में रिक्ति का कार्यों या कार्यवाहियों को अविधिमान्य न करना


बोर्ड या उसकी किसी समिति का कोई कार्य कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जा सकेगी, कि यथा स्थिति बोर्ड या ऐसी समिति में कोई रिक्ति विद्यमान थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी।

धारा 11 (क)- अध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोजन


बोर्ड का अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्य का पालन करेगा, जो विहित किये जाए या बोर्ड द्वारा समय-समय पर उसे प्रत्यायोजित किये जाएँ।

धारा 12- बोर्ड के सदस्य सचिव तथा अधिकारी और अन्य कर्मचारी


सदस्य सचिव की सेवा और उसके शर्तें वही होंगी जो विहित की जाएँ। सदस्य सचिव ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्य का पालन करेगा, जो विहित किये जाएँ या उसके अध्यक्ष द्वारा समय-समय पर उसे प्रत्यायोजित किये जाएँ। ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए केंद्र या राज्य सरकार इस हेतु बनाती है, बोर्ड ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा। जो अपने कर्तव्यों के पालन के लिये आवश्यक समझे।

धारा 13- संयुक्त बोर्ड गठन


इस अधिनियम के अंतर्गत संयुक्त बोर्ड के गठन का प्रावधान किया गया है। दो या अधिक समीपस्थ राज्यों की सरकारों द्वारा या केंद्र सरकार और ऐसे संघ या संघ राज्य क्षेत्रों के समीपस्थ या अधिक राज्यों की सरकारों द्वारा संयुक्त बोर्डों का गठन किया जा सकता है।

धारा 14- संयुक्त बोर्ड की संरचना


इस धारा में संयुक्त बोर्ड की संरचना बतायी गई है। जिसमें एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, एक पूर्णकालिक सदस्य सचिव व कुछ अन्य सदस्य जिनका की उल्लेख धारा के प्रावधान में किया गया है शामिल होंगे।

धारा 15- निर्देश देने के संबंध में विशेष उपबंध


इस अधिनियम के अंतर्गत यदि संयुक्त बोर्ड गठित किया जाता है तो निर्देश देने के संबंध में कुछ विशेष उपबंध किये गए हैं।

धारा 16- केंद्रीय बोर्ड के कृत्य


इस अधिनियम के उपबंधों में केंद्रीय बोर्ड के मुख्य कृत्यों का वर्णन किया गया है। जैसे जल प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण से संबंधित किसी विषय पर केंद्र सरकार को सलाह देना, राज्य बोर्ड के क्रिया-कलापों में सविनय करना, राज्य बोर्ड को तकनीकी सहायता देना और उसका मार्गदर्शन करना और जल प्रदूषण के निवारण तथा नियंत्रण के बारे में जनसंपर्क के माध्यम से व्यापक कार्यक्रम बनाना इत्यादि।

धारा 17- राज्य बोर्ड के कृत्य


इस अधिनियम के उपबंधों में राज्य बोर्ड के मुख्य कृत्यों का वर्णन किया गया है। जैसे राज्य में नदियों एवं कुँओं के प्रदूषण निवारण, नियंत्रण या उपशमन के लिये व्यापक कार्यक्रम की योजना बनाना व उसका क्रियान्वयन, जल प्रदूषण के संबंध में राज्य सरकार को सलाह देना। मल या व्यावसायिक बहिस्राव का मल और व्यावसायिक बहिस्राव की अभिक्रिया के लिये संकर्म का निरीक्षण करना इत्यादि।

धारा 18- निर्देश देने की शक्ति


इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय बोर्ड ऐसे लिखित आदेशों या निर्देशों से आबद्ध होगा जो केन्द्र सरकार उसे दे तथा हर राज्य बोर्ड, ऐसे लिखित आदेशों या निर्देशों से आबद्ध होगा जो राज्य सरकार या केंद्रीय बोर्ड उसे दे।

धारा 19 - राज्य सरकार की इस अधिनियम के लागू होने को कतिपय क्षेत्रों तक निर्बंधित करने की शक्ति


इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य बोर्ड के परामर्श से या उसके सिफारिश पर राज्य सरकार की यह राय बनती है कि इस अधिनियम के उपबंध संपूर्ण राज्य में लागू होने आवश्यक नहीं है, तो वह राजपत्र में अधिसूचना के द्वारा ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों तक इस अधिनियम के लागू होने से निर्बंधित कर सकते हैं।

धारा 20 जानकारी अभिप्राप्त करने की शक्ति


राज्य बोर्ड या उसके द्वारा इस हेतु सक्षम कोई अधिकारी किसी क्षेत्र का सर्वेक्षण कर सकेगा और ऐसे क्षेत्र में किसी नदी या कुएँ के प्रवाह तथा अन्य विशेषताओं को नाप सकेगा और अभिलेख रख सकेगा। राज्य बोर्ड या उसके द्वारा इस निमित्त सक्षम किसी अधिकारी को यह अधिकार होगा कि वह किसी उद्योग को जो परिसर से मल या व्यावसायिक बहिस्राव निस्सारित कर रहा हो एवं यह किसी नदी या कुएँ में मिल रहा हो तो वह उस व्यक्ति या संस्थान को तत्काल निर्देश जारी कर सकता है।

धारा 21 - बहिस्रावों के नमूने लेने की शक्ति और उसके संबंध में अपनायी जाने वाली प्रक्रिया


राज्य बोर्ड या उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किसी अधिकारी को यह शक्ति होगी कि वह किसी भी नदी या कुएँ के जल-मल अथवा व्यावसायिक तत्वों के जो किसी संयंत्र या किसी स्थान से निकल रहा हो नमूने ले सकता है।

धारा 21-22 के अधीन लिये गये नमूने के विश्लेषण के परिणाम की रिपोर्ट


जहाँ किसी मल या व्यावसायिक बहिस्राव का नमूना यथास्थिति केंद्रीय या राज्य बोर्ड द्वारा स्थापित, मान्यता प्राप्त या प्रयोगशाला को विश्लेषण के लिये भेजा गया है वहाँ बोर्ड विश्लेषक नमूने का विश्लेषण करेगा और विहित प्रारूप में ऐसे विश्लेषण के परिणाम की रिपोर्ट तीन प्रतियों में केंद्रीय और राज्य बोर्ड को भेजेगा।

धारा 23 प्रवेश व निरीक्षण की शक्ति


राज्य बोर्ड या उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किसी व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह किसी भी समय ऐसी सहायता से जो वह आवश्यक समझे उसे सौंपे गये बोर्ड के कार्यों में से किसी का पालन करने के प्रयोजन से किसी भी स्थान में प्रवेश करने और निरीक्षण करने का अधिकार है। जैसे किसी संयंत्र, अभिलेख, रजिस्टर, दस्तावेज या किसी अन्य सारवान पदार्थ की जाँच के प्रयोजन से।

धारा 24 - प्रदूषक पदार्थ आदि के व्ययन के लिये नदियाँ या कुएँ के प्रयोग पर प्रतिबंध


इस धारा के अंतर्गत राज्य बोर्ड यह सुनिश्चित करायेगा कि कोई भी व्यक्ति जानबूझकर किसी विषाक्त या प्रदूषक पदार्थ को जो कि मानकों के अनुरूप न हो किसी भी नदी, कुएँ या सार्वजनिक जलस्रोत में नहीं छोड़ सकेगा।

धारा 25 नये निकासों और नये निस्सरणों पर प्रतिबंध


राज्य बोर्ड यह सुनिश्चित कराए कि उसके पूर्ण सहमति के बिना कोई भी व्यक्ति, कोई भी ऐसा उद्योग, संक्रिया, प्रक्रिया या कोई ऐसी अभिक्रिया और व्ययन प्रणाली, उसमें विस्तार या परिवर्तन न तो स्थापित करेगा और न स्थापित करने की कोई कार्यवाही करेगा।

धारा 26 - मल या व्यावसायिक बहिस्राव के विद्यमान निस्सारण के बारे में उपबंध


जहाँ इस अधिनियम के प्रारंभ होने के कोई व्यक्ति किया नदी या कुएँ या किसी भूमि पर कोई मल या व्यावसायिक बहिस्राव का निस्सारण कर रहा था, वहाँ धारा 25 के उपबंध जहाँ तक हो सके ऐसे व्यक्ति के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसा कि वे उस धारा में निर्दिष्ट व्यक्ति के संबंध में लागू होते हैं।

धारा 27 राज्य बोर्ड द्वारा सहमति देने से इनकार करना या सहमति का वापस लिया जाना


राज्य बोर्ड धारा 25 के अधीन कोई उद्योग संक्रिया, प्रक्रिया या अभिक्रिया और व्ययन प्रणाली, उसमें विस्तार, परिवर्तन स्थापित करने के लिये या कोई नया परिवर्तन विकास को प्रयोग करने के लिये अपनी सहमति तब तक नहीं देगा जब तक कि उद्योग द्वारा उन शर्तों का पालन न हो जाए जो बोर्ड को बहिस्राव के नमूने लेने के अधिकार का प्रयोग करने के लिये समर्थ बनाने के निमित्त बोर्ड द्वारा अभिरोपित की गयी हो।

धारा 28 - अपीलें


धारा 25, 26 या 27 के अधीन राज्य बोर्ड द्वारा किये गये किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति या उस तारीख से जिस तारीख से आदेश सूचित किया गया है 30 दिन के भीतर ऐसे अधिकारी को अपील कर सकेगा, जिसे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया गया हो।

धारा 29 - पुनरीक्षण


राज्य सरकार या तो स्वप्रेरण से या उसे इस निमित्त किये गये आवेदन पर ऐसे किसी मामले के जिसमें राज्य बोर्ड द्वारा धारा 25, 26 या 27 के अधीन कोई आदेश दिया गया हो, किसी अभिलेख को किसी ऐसे आदेश की वैधता या औचित्य के बारे में अपना समाधान करने के उद्देश्य से किसी भी समय माँग सकेगी या इस संबंध में ऐसा आदेश कर सकेगी।

धारा 30 - कतिपय संक्रमों को क्रियान्वित करने की राज्य बोर्ड की शक्ति


यदि किसी व्यक्ति पर धारा 25-26 के अधीन सहमति देने के दौरान कोई शर्तें अधिरोपित की गई हैं और ऐसे शर्तों के अधीन ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षित है कि वह उनके संबंध में कोई कार्य निष्पादित करे और ऐसे कार्य समय के भीतर नहीं किया गया है, वहाँ राज्य बोर्ड संबंधित व्यक्ति पर यह अपेक्षा करने वाली सूचना शामिल कर सकेगा कि वह 30 दिन के भीतर जो समय सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, उसमें विनिर्दिष्ट कार्य निष्पादित करे।

यदि संबंधित व्यक्ति निर्दिष्ट सूचना में अपेक्षित कार्य निष्पादित करने में असफल रहता है, तो उक्त सूचना में विनिर्दिष्ट समय के अवसान के पश्चात राज्य बोर्ड ऐसा कार्य स्वयं निष्पादित कर सकेगा या निष्पादित करा सकेगा।

धारा 31 - कतिपय दशाओं में राज्य बोर्डों और अन्य अभिकरणों की जानकारी देना


यदि किसी स्थान पर जहाँ कोई उद्योग संक्रिया, प्रक्रिया, कोई अभिक्रिया और व्ययन प्रणाली, उसमें विस्तार, परिवर्तन किया जा रहा है, दुर्घटना के कारण किसी नदी, कुएँ, भूमि पर कोई विषाक्त या प्रदूषक पदार्थ निस्सारित कर रहा है या उसका निस्सारण संभव है और ऐसे निस्सारण के परिणामस्वरूप नदी-कुएँ का जल प्रदूषित हो रहा है या प्रदूषण होना संभव है तो ऐसे स्थान का प्रभारी व्यक्ति ऐसी दुर्घटना, कार्य या घटना के होने की सूचना राज्य बोर्ड को और ऐसे अन्य अधिकारियों या अभिकरणों को जो विहित किये जाएँ, तुरंत देगा। जहाँ कोई स्थानीय प्राधिकारी कोई मलवहन पद्धति या मलवहन संकर्म चलता है वहाँ इस धारा के उपबंध ऐसे स्थानीय प्राधिकारी को भी उसी प्रकार से लागू होंगे जैसे वे उस स्थान के भार साधक व्यक्ति के संबंध में लागू होते हैं, जहाँ कोई उद्योग या व्यापार चलाया जाता है।

धारा 32 - नदी या कुएँ के प्रदूषण की दशा में आपात उपाय


जहाँ राज्य बोर्ड को यह प्रतीत हो कि नदी-कुएँ में या भूमि पर ऐसे विषाक्त या प्रदूषक पदार्थ के निस्तारण के कारण कोई दुर्घटना या घटना घटित हो सकती है और राज्य बोर्ड की यह राय हो कि तत्काल कार्यवाही करना आवश्यक है तो वह ऐसे कारणों सो जो लेख बद्ध किये जाएंगे, ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जो वह निम्नलिखित सभी या उनमें से किन्हीं प्रयोजनों के लिये आवश्यक समझें अर्थात-

1. नदी या कुएँ में या भूमि पर उस पदार्थ को हटाना और उसका ऐसी रीति से व्ययन करना जो बोर्ड समुचित समझे।

2. नदी-कुएँ या भूमि पर उस पदार्थ के मौजूद होने के कारण हुये किसी प्रदूषण का उपचार करना या उसमें कमी करना।

3. संबंधित व्यक्ति को नदी-कुएँ या भूमि पर किसी विषाक्त या प्रदूषक पदार्थ का निस्सारण, नदी-कुएँ के अस्वास्थ्यकर उपयोग करने से तुरंत रोकने या उपचार करने वाले आदेश जारी करना।

धारा 33 - नदियों या कुओं के जल के आशक्ति प्रदूषण को कम करने के लिये बोर्ड के न्यायालयों को आवेदन करने की शक्ति


जहाँ बोर्ड को यह आशंका हो कि किसी नदी या कुएँ का जल ऐसी नदी-कुएँ, किसी मल नाली में, किसी भूमि पर किसी पदार्थ के व्ययन, संभावित व्ययन के कारण या अन्यथा प्रदूषित होने की संभावना है वहाँ बोर्ड ऐसे व्यक्ति को जिसके द्वारा ऐसा प्रदूषण होने संभव हैं, ऐसे प्रदूषण कारित करने से अवरुद्ध करने से ऐसे न्यायालय को आवेदन दे सकेगा जो मेट्रोपॉलिटिन मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी से कम न हो। आवेदन प्राप्ति पर न्यायालय ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह उचित समझे। न्यायालय अपने आदेश में यह निर्देश दे सकता है कि वह व्यक्ति जिसके द्वारा नदी या कुएँ के जल में प्रदूषण कारित होना संभावित है या पारित किया गया है यथास्थिति ऐसा करना बंद करे और नदी या कुएँ से ऐसे प्रदूषक पदार्थ को हटाए। न्यायालय बोर्ड को अधिकृत कर सकेगा कि यदि न्यायालय के निर्देश का वह व्यक्ति जिसे निर्देश जारी किया गया है पालन नहीं कर रहा हो तो वह ऐसी रीति से जो न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट किये जाए उस पदार्थ को हटाए और व्ययन करे।

धारा 33 - (क) निर्देश देने की शक्ति


इस अधिनियम के उपबंधों या किन्हीं नियमों जो केंद्र सरकार द्वारा इस निमित्त के अधीन रहते हुए बोर्ड इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का पालन करने में किसी व्यक्ति, अधिकारी या प्राधिकारी को लिखित रूप में कोई निर्देश दे सकेगा और ऐसा व्यक्ति, अधिकारी या प्राधिकारी ऐसे निर्देशों का पालन करने के लिये आबद्ध होगा। इसे इस प्रकार भी स्पष्ट किया जा सकता है कि इस धारा के अधीन निर्देश देने की शक्ति के अंतर्गत निम्नलिखित के संबंध में निर्देश देने की भी शक्ति भी है-

1. किसी उद्योग संक्रिया या प्रक्रिया का बंद किया जाना या विनियमन।

2. विद्युत, जल का प्रदाय या किसी अन्य सेवा का बंद किया जाना या विनियमन।

धारा 34 - केंद्रीय सरकार द्वारा अभिदाय


केन्द्रीय सरकार संसद के विधि द्वारा इस हेतु किये गये सम्यक विनियोग के पश्चात हर एक वित्तीय वर्ष में केंद्रीय बोर्ड को ऐसे अभिदाय कर सकेगी जो वह उस बोर्ड को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन को समर्थ बनाने के लिये आवश्यक समझे।

धारा 35 - राज्य सरकार द्वारा अभिराय


राज्य सरकार राज्य के विधान मंडल की विधि द्वारा इस निमित्त किये गये सम्यक विनियोग के पश्चात हर एक वित्तीय वर्ष में राज्य बोर्ड को ऐसे अभिदाय कर सकेगी जो वह उस बोर्ड को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन को समर्थ बनाने के लिये आवश्यक समझे।

धारा 36 - केंद्रीय बोर्ड की निधि


केंद्रीय बोर्ड स्वयं अपनी निधि रखेगी और वे सभी राशियाँ जो समय-समय पर उसे केंद्रीय सरकार द्वारा प्रदान की जाए तथा उस बोर्ड की सभी अन्य प्राप्ति उस बोर्ड की निधि में जमा की जाएँगी और उस बोर्ड द्वारा सभी संदाय उसी में किये जाएँगे। केंद्रीय बोर्ड इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिये ऐसी राशियाँ व्यय कर सकेगा, जो वह ठीक समझे और ऐसी राशियाँ उस बोर्ड की संदेय व्यय मानी जाएँगी।

धारा 37 - राज्य बोर्ड की निधि


राज्य बोर्ड स्वयं अपनी निधि रखेगा और वे सभी राशियाँ जो समय-समय पर उसे राज्य सरकार द्वारा प्रदान की जाएँ तथा उस बोर्ड की सभी अन्य प्राप्ति उस बोर्ड की निधि में जमा की जाएँगी और बोर्ड द्वारा सभी संदाय उसी में किये जाएँगे। राज्य बोर्ड इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिये ऐसी राशियाँ व्यय कर सकेगा, जो वह ठीक समझे और ऐसी राशियाँ उस बोर्ड की संदेय मानी जाएँगी।

धारा 37 - (क) बोर्ड की धन उधार लेने की शक्ति


बोर्ड यथास्थिति, केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार की सहमति से, उसके द्वारा उसको दिये गये साधारण, विशेष प्राधिकार के निबंधनों के अनुसार उधार के रूप में, बंधपत्र, डिवेंचर या ऐसी अन्य लिखतों को जो वह ठीक समझें निर्गमित करके, इस अधिनियम के अधीन अपने सभी या किन्हीं कृत्यों के पालन के लिये किसी भी स्रोत से धन उधार ले सकेगा।

धारा 38 - बजट


यथास्थिति, केंद्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड हर-एक वित्तीय वर्ष के दौरान आगामी वित्तीय वर्ष के बावत ऐसे प्रारूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए, बजट तैयार करेगा। जिसमें प्राक्कलित प्राप्तियाँ और व्यय दर्शित होंगे तथा उसकी प्रतियाँ यथा स्थिति, केन्द्र सरकार या राज्य सरकार को प्रेषित की जाएँगी।

धारा 39 - वार्षिक रिपोर्ट


1. केंद्रीय बोर्ड, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान ऐसे प्रारूप में जो विहित किया जाए, एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा। जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान इस अधिनियम के अधीन उसके क्रियाकलापों का पूरा विवरण दिया होगा और उसकी प्रतियाँ पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की अन्तिम तारीख से चार मास के भीतर केंद्रीय सरकार को प्रेषित की जाएगी और वह सरकार ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट को पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की अन्तिम तारीख से नौ मास के भीतर संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएँगे।

2. प्रत्येक राज्य बोर्ड, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान ऐसे प्रारूप में जो विहित किया जाए, एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा। जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान इस अधिनियम के अधीन उसके क्रियाकलापों का पूरा विवरण दिया होगा और उसकी प्रतियाँ पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की अन्तिम तारीख से चार मास के भीतर राज्य सरकार को प्रेषित की जाएगी और वह सरकार ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट को पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की अन्तिम तारीख से नौ मास के भीतर राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगी।

धारा 40 - लेखा और लेखा परीक्षा


प्रत्येक बोर्ड समुचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा तथा लेखाओं का वार्षिक विवरण ऐसे प्रारूप में तैयार करेगा जो, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए।

बोर्ड के लेखाओं की लेखा परीक्षा ऐसे लेखापरीक्षकों द्वारा की जायेगी जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 के अधीन कंपनियों के लेखापरीक्षा के रूप में कार्य करने के लिये सम्यक रूप में अर्हित हैं। उक्त लेखापरीक्षक, यथास्थिति केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक की सलाह पर नियुक्त किया जाएगा।

इस अधिनियम के अधीन बोर्ड के लेखाओं की लेखापरीक्षा करने के लिये नियुक्त प्रत्येक लेखापरीक्षक की बहियों, लेखाओं, संबंध वाउचरों और अन्य दस्तावेजों तथा कागजपत्रों के पेश किये जाने की माँग करने का और बोर्ड के कार्यालयों में से किसी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकारी होगा।

प्रत्येक ऐसा लेखापरीक्षक लेखाओं की लेखापरीक्षा रिपोर्ट की प्राप्ति के पश्चात, यथाशीघ्र, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के समक्ष रखवाएगी। केंद्रीय सरकार उपधारा (5) के अधीन लेखापरीक्षा रिपोर्ट की प्राप्ति के पश्चात यथाशीघ्र उसे राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगी। राज्य सरकार उपधारा (5) के अधीन लेखापरीक्षा रिपोर्ट की प्राप्ति के पश्चात यथाशीघ्र उसे राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगी।

धारा 41


धारा 20 के अधीन निर्देशों या धारा 32 के अधीन जारी किये गये आदेशों या धारा 33 क के अधीन जारी किये गये निर्देशों का अनुपालन करने में असफलता। जो कोई धारा 20 के अधीन दिये गये निर्देश का पालन ऐसे समय के भीतर, जो निर्देश में विनिर्दिष्ट किया जाए, करने में असफल रहता है वह दोष सिद्धि पर कारावास से जिसकी अवधि तीन मास तक ही हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दस हजार रुपये तक हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा और यदि असफलता जारी रहती है, तो ऐसी अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम असफलता जारी रहती है, तो हजार रुपये तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा। जो कोई धारा 32 के अधीन जारी किये गये किसी आदेश का या धारा 33 के अधीन किसी न्यायालय द्वारा जारी किये गये किसी निर्देश का या धारा 33 के अधीन जारी किये गये किसी निर्देश का पालन करने में असफल रहेगा, वह प्रत्येक ऐसी असफलता के संबंध में ऐसी दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष और छह मास से कम की नहीं होगी, किन्तु जो छह वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से दण्डनीय होगा और यदि असफलता जारी रहती है तो ऐसी अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम असफलता के लिये दोषसिद्ध किये जाने के पश्चात ऐसे प्रत्येक दिन के लिये जिसके दौरान ऐसी असफलता जारी रहती है, पाँच हजार रुपये तक का दण्डनीय होगा।

यदि निर्दिष्ट असफलता दोषसिद्धि की तारीख के पश्चात एक वर्ष की कालावधि से परे जारी रहती है तो अपराधी कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, दण्डनीय होगा। यदि निर्दिष्ट असफलता दोषसिद्धि की तारीख के पश्चात एक वर्ष की कालावधि से परे जारी रहती है तो अपराधी कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, दण्डनीय होगा।

धारा 42 - कतिपय कार्यों के लिये शास्ति


यह धारा बोर्ड के कार्यों में व्यवधान डालने के कारण दंड से संबंधित है। जो कोई बोर्ड के प्राधिकारी द्वारा या अधीन भूमि पर लगाए गये किसी स्तंभ, थम्ब, खूटे को या प्रस्तुत, अन्तर्लिखित या रखी गई किसी सूचना या अन्य पदार्थ को नष्ट करेगा, गिराएगा, हटाएगा, क्षति पहँचायेगा या विरूपित करेगा, अथवा बोर्ड के आदेशों या निर्देशों के अधीन कार्य करने वाले किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का पालन करने में बाधित करेगा, अथवा बोर्ड के किसी संकर्म या सम्पत्ति को नुकसान पहुँचायेगा, अथवा बोर्ड के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को ऐसी कोई जानकारी देने में असफल रहेगा जिसकी वह इस अधिनियम के प्रयोजन के लिये अपेक्षा करे, अथवा धारा 31 अधीन किसी दुर्घटना या अन्य अकल्पित कार्य या घटना के होने की सूचना उस धारा द्वारा यथा अपेक्षित बोर्ड और अन्य प्राधिकारियों या अभिकरणों को देने में असफल रहेगा, अथवा कोई ऐसी जानकारी देने में, जिसका दिया जाना उससे इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित है, जानते हुये या जानबूझकर ऐसा कथन करता है जिसका कोई महत्त्वपूर्ण अंश मिथ्या है, अथवा धारा 25-26 के अधीन कोई सहमति प्राप्त करने के प्रयोजन के लिये जानते हुये या जानबूझकर ऐसा कथन करता है जिसका कोई महत्त्वपूर्ण अंश मिथ्या है, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा।

जहाँ धारा 25-26 के उपबंधों के अनुसरण में सहमति देने के लिये मीटर या प्रमापी या अन्य नापने या माॅनीटर करने की युक्ति अपेक्षित है और ऐसी युक्ति का प्रयोग उन उपबंधों के प्रयोजनों के लिये किया जाता है। वहाँ कोई व्यक्ति, जो जानते या जानबूझकर ऐसी युक्ति को परिवर्तित करता या उसमें हस्तक्षेप करता है जिससे वह सही मॉनीटर या नाप न कर सके तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो (दस हजार रुपये) तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा।

धारा 43 - धारा 24 के उपबंधों के उल्लंघन के लिये शास्ति


जो कोई धारा 24 के उपबंधों का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष और छह मास से कम न होगी, किन्तु जो छह वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, दण्डनीय होगा।

धारा 44- धारा 25 के उल्लंघन के लिये शास्ति


जो कोई धारा 25 या धारा 26 के उपबंधों का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष और छह मास से कम न होगी, किन्तु जो छह वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, दण्डनीय होगा।

धारा 45 - पूर्व दोषसिद्धि के पश्चात वर्धित शास्ति


यदि कोई व्यक्ति, जो धारा 24-25 या धारा 26 के अधीन किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध किया गया है, पुन: उस उपबंध के उल्लंघन के किसी अपराध का दोषी पाया जाता है तो वह द्वितीय और प्रत्येक पश्चातवर्ती दोषसिद्ध पर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष से कम न होगी, किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, दण्डनीय होगा। परन्तु इस धारा के प्रयोजन के लिये उस अपराध के जिसके लिये दण्ड दिया जा रहा है, किये जाने से दो वर्ष से अधिक पूर्व की किसी दोषसिद्धि का संज्ञान नहीं किया जायेगा।

धारा 45 क, अधिनियम के कुछ उपबंधों के उल्लंघन के शास्ति


जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा या इस अधिनियम के अधीन दिये गये किसी आदेश या निर्देश का अनुपालन करने में असफल रहेगा जिसके लिये इस अधिनियम में अन्यत्र किसी शास्ति का उपबंध नहीं किया गया है, वह ऐसे कारावास से, जो तीन मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से जो दस हजार रुपये तक का हो सकेगा या दोनों से दण्डनीय होगा और उल्लंघन या असफलता जारी रहने की दशा में, ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से प्रथम उल्लंघन या असफलता के लिये दोषसिद्ध किये जाने के पश्चात ऐसे प्रत्येक दिन के लिये जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन या ऐसी असफलता जारी रहती है, पाँच हजार तक हो सकेगा दण्डनीय होगा।

धारा 46- अपराधियों के नामों का प्रकाशन


यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अधीन किसी अपराध के लिये दोषसिद्धि किया गया कोई व्यक्ति बाद में उसी प्रकार का कोई अपराध करता है तो न्यायालय के लिये यह विधिपूर्व होगा कि वह द्वितीय या पश्चातवर्ती दोषसिद्धि होने के पूर्व अपराधी का नाम और निवास स्थान, अपराध और अधिरोपित शास्ति अपराधी के खर्चे पर ऐसे समाचार पत्रों में और ऐसी अन्य रीति में प्रकाशित कराए गये जैसा न्यायालय निर्देश करे और ऐसे प्रकाशन का खर्चा दोषसिद्धि में होने वाले खर्चे का भाग समझा जायेगा और वह उसी रीति से वसूलनीय होगा जैसा जुर्माना वसूल किया जाता है।

धारा 47 - कंपनियों द्वारा अपराध


जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया हो, वहाँ प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के लिये जाने के समय उस कंपनी के कारोबार के संचालन के लिये उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी उस अपराध के दोषी समझे जायेंगे और तदनुसार अपने विरुद्धकार्यवाही किये जाने की दण्डित किये जाने के भागी होंगे, परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के लिये जाने का निवारण करने के लिये सब सम्यक तत्परता बरती था। इस उपधारा में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या अपराध का किया जाना उसकी किसी अपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहाँ ऐसा निदेशक प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जायेगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने का भागी होगा।

स्पष्टीकरण


इस धारा के प्रयोजनों के लिये कंपनी से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यक्तियों का अन्य संगम भी है, तथा फर्म के संबंध में निर्देश से ऐसे फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।

धारा 48 - सरकारी विभागों द्वारा अपराध


जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी सरकारी विभाग द्वारा किया गया है वहाँ विभागाध्यक्ष को अपराध का दोषी समझा जायेगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने का भागी होगा, परंतु इस धारा की कोई बात इस विभागध्यक्ष को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर दे कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के लिये जाने का निवारण करने के लिये सम्यक तत्परता बरती थी।

धारा 49 - अपराधों का संज्ञान


कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान ऐसे परिवाद पर करने के अरिरिक्त नहीं होगा- जो बोर्ड अथवा इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा किया जाए, अथवा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बोर्ड अथवा उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी को विहित रीति से ऐसे अपराध की एवं उसके लिये परिवाद प्रस्तुत करने के आशय की लिखित सूचना जो साठ दिन से कम की नहीं होगी, देकर किया जाए और महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट से एवं कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध पर विचार नहीं करेगा। जहाँ कोई परिवाद उपधारा 1 के खण्ड अ के अधीन किया जाता है, बोर्ड ऐसे व्यक्ति को, उसके द्वारा माँग किये जाने पर वे सारी सुसंगत रिपोर्ट उपलब्ध करायेगा जो उसके कब्जे में है, परंतु यह कि बोर्ड ऐसे व्यक्ति को ऐसी रिपोर्ट उपलब्ध कराने से इनकार कर सकेगा, यदि उसकी राय में ऐसा किया जाना लोकहित में है।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 29 में किसी बात के होते हुए भी, किसी प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिये इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध किये गये किसी व्यक्ति पर दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के लिये या दो हजार रुपये से अधिक जुर्माने के लिये दण्डादेश पारित करना विधिपूर्ण होगा।

धारा 50 - बोर्ड के सदस्यों, अधिकारियों और सेवकों का लोक सेवक होना


बोर्ड के सभी सदस्य, अधिकारी और सेवक जब वे इस अधिनियम और तदधीन बनाए गये नियमों के किसी उपबंध के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या जब उनका कार्य करना तात्पर्यिक हो, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जायेंगे।

धारा 51 - केंद्रीय जल प्रयोगशाला


केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किये गये केंद्रीय जल प्रयोगशाला स्थापित कर सकेगी, या इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय जल प्रयोगशाला को सौंपे गये कृत्य करने के लिये किसी प्रयोगशाला या संस्थान को केंद्रीय जल प्रयोगशाला के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकेगी। केंद्रीय सरकार, केंद्रीय बोर्ड से परामर्श करने के पश्चात निम्नलिखित को विहित करने के लिये नियम बना सकेगी- केंद्रीय जल प्रयोगशाला के कृत्य जल या मल या व्यावसायिक बहिस्राव के नमूने विश्लेषक या परीक्षण के लिये उक्त प्रयोगशाला को भेजने के लिये प्रक्रिया, पर उस प्रयोगशाला की रिपोर्ट का प्रारूप और ऐसी रिपोर्ट की बाबत संदेय फीस, ऐसे अन्य विषय जो उस प्रयोगशाला को अपने कृत्य करने के लिये समर्थ बनाने की दृष्टि से आवश्यक या समीचीन हों।

धारा 52- राज्य जल प्रयोगशाला


राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किये गये राज्य जल प्रयोगशाला स्थापित कर सकेगी, या इस अधिनियम के अधीन राज्य जल प्रयोगशाला के रूप में निर्दिष्ट कर सकेगी। राज्य सरकार, राज्य बोर्ड से परामर्श करने के पश्चात निम्नलिखित को विहित करने के लिये नियम बना सकेगी- राज्य जल प्रयोगशाला के कृत्य जल-मल या व्यावसायिक बहिस्राव के नमूने विश्लेषण या परीक्षण के लिये उक्त प्रयोगशाला को भेजने के लिये प्रक्रिया, उसपर प्रयोगशाला की रिपोर्ट का प्रारूप और ऐसी रिपोर्ट की बाबत संदेय फीस, ऐसे अन्य विषय जो उस प्रयोगशाला को अपने कृत्य करने के लिये समर्थ बनाने की दृष्टि से आवश्यक या समीचीन हों।

धारा 53 - विश्लेषक


केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझे और विहित अर्हताएँ रखते हैं, धारा 51 की उपधारा 1 के अधीन स्थापित या विनिर्दिष्ट किसी प्रयोगशाला के विश्लेषण के लिये भेजे गये जल या मल या व्यावसायिक बहिस्राव के नमूनों के विश्लेषण के प्रयोजन के लिये सरकारी विश्लेषण नियुक्त कर सकेगी। राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे व्यक्तियों को जिन्हें वह ठीक समझे और विहित अर्हताएँ रखते हैं, धारा 52 की उपधारा 1 के अधीन स्थापित या विनिर्दिष्ट प्रयोगशालाओं को विश्लेषण के प्रयोजन के लिये सरकारी विश्लेषण नियुक्त कर सकेगी।

धारा 12 की उपधारा 3 उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यथास्थिति केंद्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के अनुमोदन से, ऐसे व्यक्तियों को, जिन्हें वह ठीक समझे और जो विहित अर्हताएँ रखते हैं, यथास्थिति धारा 16 या धारा 17 के अधीन स्थापित या मान्यता प्राप्त किसी प्रयोगशाला को विश्लेषण के लिये भेजे गये जल या मल या व्यावसायकि बहिस्रावों के नमूनों के विश्लेषण के प्रयोजन के लिये बोर्ड विश्लेषक नियुक्त कर सकेगा।

धारा 54 - विश्लेषकों की रिपोर्ट


कोई दस्तावेज जिसका, यथास्थिति, सरकारी विश्लेषक या बोर्ड विश्लेषक द्वारा हस्ताक्षरित रिपोर्ट होना तात्पर्यित है, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में उसमें कथित तथ्यों के साक्ष्य के रूप में उपयोग की जा सकती है।

धारा 55 - स्थानीय प्राधिकारियों द्वारा सहायता किया जाना


सभी स्थानीय प्राधिकारी बोर्ड को ऐसी मदद तथा ऐसी जानकारी देंगे जिसकी वह अपने कृत्यों के निर्वहन के लिये अपेक्षा करे और बोर्ड को निरीक्षण तथा परीक्षा के लिये ऐसे अभिलेख, मानचित्र, योजनाएँ और अन्य दस्तावेज उपलब्ध कराएँगे जो उसके कृत्यों के निर्वहन के लिये आवश्यक हों।

धारा 56 - राज्य बोर्ड के लिये भूमि का अनिवार्य अर्जन


इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्ष पालन के लिये राज्य बोर्ड द्वारा अपेक्षित भूमि लोक प्रयोजन के लिये आवश्यक समझी जायेगी और ऐसी भूमि राज्य बोर्ड के लिये भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के उपबंधों के अधीन या तत्मसमय प्रवृत्त किसी अन्य तत्स्थानी विधि के अधीन अर्जित की जाएगी।

धारा 57 - विवरणियाँ और रिपोर्ट


केंद्रीय बोर्ड केंद्रीय सरकार को और राज्य बोर्ड राज्य सरकार को और केंद्रीय बोर्ड को अपनी निधि या क्रियाकलापों की बाबत ऐसी रिपोर्ट, विवरणियाँ, सांख्यकीय, लेखाएँ और अन्य जानकारी देगा जिनकी यथास्थिति, वह सरकार या केंद्रीय बोर्ड समय-समय पर अपेक्षा करे।

धारा 58 - अधिकारिता का वर्जन


किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे मामले की बाबत कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी जिसका अवधारण करने के लिये इस अधिनियम के अधीन गठित किसी अपील प्राधिकारी को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन सशक्त किया गया है, और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्यवाही की बाबत कोई न्यायालय या अन्य प्राधिकारी कोई आदेश नहीं देगा।

धारा 59 - सदभावपूर्वक की गई कार्यवाही के लिये संरक्षण


कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में जो इस अधिनियम या तदधीन बनाए गये नियमों के अनुसरण में सदभावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिये आशयित हो, सरकार या सरकार के किसी अधिकारी या बोर्ड के किसी सदस्य या अधिकारी के विरुद्ध न होगी।

धारा 60 - अध्यारोही प्रभाव


इस अधिनियम के उपबंध, इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमित में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।

धारा 61 - केंद्रीय सरकार की केंद्रीय बोर्ड और संयुक्त बोर्डों को अतिष्ठित करने की शक्ति


यदि किसी समय केंद्रीय सरकार की यह राय हो कि केंद्रीय बोर्ड ने इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अपने को अधिरोपित कृत्यों के पालन में बार-बार व्यतिक्रम किया है, या कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनमें ऐसा करना लोकहित में आवश्यक है, तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यथास्थिति केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड को एक वर्ष से अनाधिक की ऐसी कालावधि के लिये, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अतिष्ठित कर सकेगी, परंतु खण्ड (क) में उल्लेखित कारणों के लिये इस उपधारा के अधीन अधिसूचना जारी करने के पूर्व, केंद्रीय सरकार यथास्थिति केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड को यह हेतु दर्शित करने के लिये युक्तियुक्त अवसर देगी कि क्यों उसे अतिष्ठित न किये जाए और यथास्थित केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड के स्पष्टीकरण और आक्षेपों पर, यदि कोई हो, विचार करेगी।

केंद्रीय बोर्ड या किसी संयुक्त बोर्ड को अतिष्ठित करने वाली उपधारा 1 के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन पर अतिष्ठित की तारीख से सभी सदस्य उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे। ऐसी सभी शक्तियाँ, कृत्य और कर्तव्य, जो इस अधिनियम द्वारा उसके, अधीन केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड द्वारा प्रयोग, पालन या निर्वहन किये जा सकते हैं, यथास्थिति केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड की उपधारा (3) के अधीन पुनर्गठित नहीं किया जाता है तब तक, ऐसा व्यक्ति या ऐसे व्यक्तियों द्वारा प्रयोग. पालन या निर्वहन किये जाएँगे जिसे या जिन्हें केंद्रीय सरकार निर्देश दे, केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड के स्वामित्वाधीन या उसके नियंत्राधीन सभी सम्पत्ति जब तक, यथास्थिति केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड को उपधारा (3) के अधीन पुनर्गठित नहीं किया जाता है, केंद्रीय सरकार में निहित होगी। उपधारा के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठित की अवधि की समाप्ति पर केंद्रीय सरकार अतिष्ठित की कालावधि को छह मास से अनाधिक की ऐसी और अवधि के लिये बढ़ा सकेगी जो वह आवश्यक समझे या यथास्थिति केंद्रीय बोर्ड या ऐसे संयुक्त बोर्ड को, यथास्थिति नए नाम निर्देशन या नियुक्त के लिये अनर्हित नहीं समझा जायेगा, परंतु केंद्रीय सरकार अतिष्ठिति की कालावधि की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय, चाहे वह कालावधि उपधारा (1) के अधीन आरम्भ में विनिर्दिष्ट हो या इस उपधारा (क) अधीन जैसी बढ़ाई गई हो, इस उपधारा के खण्ड (ब) के अधीन कार्यवाही कर सकती है।

धारा 62 - राज्य सरकार की राज्य बोर्ड को अतिष्ठित करने की शक्ति


यदि किसी समय राज्य सरकार की यह राय हो कि राज्य बोर्ड ने इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अपने अधिरोपित कृत्यों के पालन में बार-बार व्यतिक्रम किया है या कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान है, जिनमें ऐसा कानून लोकहित में आवश्यक है तो राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, राज्य बोर्ड को एक वर्ष से अनाधिक की ऐसी कालावधि के लिये, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए। अतिष्ठित कर सकेगी, परंतु खण्ड (क) में उल्लेखित कारणों के आधार इस उपधारा के अधीन अधिसूचना जारी करने के पूर्व राज्य सरकार, राज्य बोर्ड को इस हेतु दर्शित करने के लिये समुचित अवसर देगी कि क्यों उसे अतिष्ठित न किया जाए और राज्य बोर्ड के स्पष्टीकरणों और आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी। राज्य बोर्ड को अतिष्ठित करने वाली उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन पर, धारा 61 की उपधारा 2 और उपधारा 3 के उपबंध राज्य बोर्ड की अतिष्ठित के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे केंद्रीय सरकार या संयुक्त बोर्ड की अतिष्ठित के संबंध में लागू होते हैं।

धारा 63 - केंद्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति


केंद्रीय सरकार, उपधारा 2 में विनिर्दिष्ट विषयों का बाबत नियम केंद्रीय बोर्ड के गठन के साथ-साथ बना सकेगी, परंतु जब केंद्रीय बोर्ड गठित कर दिया गया हो तब उस बोर्ड से परामर्श किये बिना ऐसे कोई नियम न तो बनाया जायेगा और न परिवर्तित, संशोधित या निरसित किया जायेगा। विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी विषय के संबंध में उपबंध कर सकेंगे, अर्थात धारा 5 की उपधारा (8) के अधीन केंद्रीय बोर्ड के (अध्यक्ष और सदस्य सचिव से भिन्न) सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें, वे अंतराल तथा वह समय और स्थान जिन या जिस पर केंद्रीय बोर्ड के या इस अधिनियम के अधीन गठित उसकी किसी समिति के अधिवेशन किये जाएंगे, तथा ऐसे अधिवेशनों पर अनुसारित की जाने वाली प्रक्रिया जिसके अंतर्गत धारा 8 के अधीन और धारा 9 की उपधारा 2 के अधीन कामकाज करने के लिये आवश्यक गणपूर्ति भी है, केंद्रीय बोर्ड की किसी समिति के ऐसे सदस्यों को, जो धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन बोर्ड के साथ व्यक्ति सहयुक्त किये जा सकेंगे और ऐसे व्यक्तियों को संदेश फीस भत्ते, धारा 5 की उपधारा (9) और धारा 12 की उपधारा (4) के अधीन केंद्रीय बोर्ड का परामर्शी-इंजीनियर नियुक्त किया जा सकेगा, केंद्रीय बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्य सचिव द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियों और पालन किये जाने वाले कर्तव्य।

धारा 22 की उपधारा (1) के अधीन केंद्रीय बोर्ड विश्लेषक की रिपोर्ट या प्रारूप, धारा 22 की उपधारा (3) के अधीन सरकारी विश्लेषक का रिपोर्ट या प्रारूप, वह प्रारूप जिसमें और वह समय जिसके भीतर केंद्रीय बोर्ड का बजट धारा 38 के अधीन तैयार किया जा सकेगा और केंद्रीय सरकार को अग्रेषित किया जा सकेगा। वह प्रारूप जिसमें केंद्रीय बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट धारा 39 के अधीन तैयार की जा सकेगी, वह प्रारूप जिसमें केंद्रीय बोर्ड के लेखे धारा 40 की उपधारा (1) के अधीन रखे जा सकेंगे, वह रीति जिसमें धारा 49 के अधीन परिवाद करने की आशय की सूचना केंद्रीय बोर्ड या उसके द्वारा प्राधिकृत अधिकारी को दी जायेगी, केंद्रीय बोर्ड के संबंधित कोई अन्य विषय जिनके अंतर्गत संघ राज्यक्षेत्रों के संबंध में उस बोर्ड की शक्तियाँ और कृत्य भी हैं। अन्य कोई विषय जो विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए। इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिये रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक पत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिये सहमत हो जाएँ तो तत्पश्चात वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएँ कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिये तो तत्पश्चात वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

धारा 64 - राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति


राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिये उन विषयों की बाबत जो धारा 63 की परिधि में नहीं आते नियम, राज्य बोर्ड के गठन के साथ-साथ बन सकेगी, परंतु जब राज्य बोर्ड गठित कर दिया गया हो तब ऐसा कोई नियम उस बोर्ड से परामर्श किये बिना न तो बनाया जाएगा और न परिवर्तित, संशोधित या निरसित किया जाएगा। विशिष्ठतः और पूर्वगामी शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम राज्य सरकार बना सकती है, जिनमें राज्य बोर्ड के सदस्यों की सेवा की शर्तें, राज्य बोर्ड के अन्वेषण और स्थान तथा ऐसे अधिवेशन पर अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया राज्य बोर्ड की किसी समिति के ऐसे सदस्यों को जो बोर्ड के सदस्य न हो, प्रदान की जाने वाली फीस और भत्ते, राज्य बोर्ड के अध्यक्ष व सदस्य सचिव की शक्तियाँ, कर्तव्य व सेवा शर्तें, राज्य बोर्ड विश्लेषण के रिपोर्ट का प्रारूप, सरकारी विश्लेषक के रिपोर्ट का प्रारूप, वह प्रारूप और रीति जिसमें अपीलें फाइल की जा सके, ऐसे अपीलों के बाबत संदेय फीस, राज्य बोर्ड का बजट, वार्षिक रिपोर्ट तथा अन्य कोई विषय शामिल हो सकते हैं।

 

जल प्रदूषण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पुस्तक भूमिका : जल और प्रदूषण

2

जल प्रदूषण : कारण, प्रभाव एवं निदान

3

औद्योगिक गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण

4

मानवीय गतिविधियों के कारण जल प्रदूषण

5

भू-जल प्रदूषण

6

सामुद्रिक प्रदूषण

7

दूषित जल उपचार संयंत्र

8

परिशिष्ट : भारत की पर्यावरण नीतियाँ और कानून (India's Environmental Policies and Laws in Hindi)

9

परिशिष्ट : जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (Water (Pollution Prevention and Control) Act, 1974 in Hindi)

 

 

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