पर्यावरण प्रदूषण (Environmental Pollution in Hindi)

Submitted by Hindi on Sat, 05/07/2011 - 12:16

.पर्यावरण को प्रत्यक्ष अथवा परोक्षरूप से प्रदूषित करने वाला प्रक्रम (process) जिसके द्वारा पर्यावरण (स्थल, जल अथवा वायुमंडल) का कोई भाग इतना अधिक प्रभावित होता है कि वह उसमें रहने वाले जीवों (या पादपों) के लिए अस्वास्थ्यकर, अशुद्ध, असुरक्षित तथा संकटपूर्ण हो जाता है अथवा होने की संभावना होती है। पर्यावरण प्रदूषण सामान्यतः मनुष्य के इच्छित अथवा अनिच्छित कार्यों द्वारा पारिस्थितिक तंत्र में अवांक्षित एवं प्रतिकूल परिवर्तनों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है जिससे पर्यावरण की गुणवत्ता में ह्रास होता है और वह मनुष्यों, जीवों तथा पादपों के लिए अवांक्षित तथा अहितकर हो जाता है। पर्यावरण प्रदूषण को दो प्रधान वर्गों में रखा जा सकता हैः- 1. भौतिक प्रदूषण जैसे स्थल प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि, और 2. मानवीय प्रदूषण जैसे सामाजिक प्रदूषण, राजनीतिक प्रदूषण, जातीय प्रदूषण, धार्मिक प्रदूषण, आर्थिक प्रदूषण आदि। सामान्य अर्थों में पर्यावरण प्रदूषण का प्रयोग भौतिक प्रदूषण के संदर्भ में किया जाता है।

आधुनिक परमाणु, औद्योगिक, श्वेत एवं हरित-क्रान्ति के युग की अनेक उपलब्धियों के साथ-साथ आज के मानव को प्रदूषण जैसी विकराल समस्या का सामना करना पड़ रहा है। वायु जिसमें हम साँस लेते हैं, जल, जो जीवन का भौतिक आधार है एवं भोजन जो ऊर्जा का स्रोत है- ये सभी प्रदूषित हो गए हैं। प्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिक इ.पी. ओडम (E.P. Odum) ने प्रदूषण (pollution) को निम्न शब्दों में परिभाषित किया हैं-

“Pollution is an undesirable change in the physical, chemical or biological characteristics of air, water and land (i.e., environment) that will be, or may be, harmful to human & other life, industrial processes, living condition and cultural assets.”

अर्थात- “प्रदूषण का तात्पर्य वायु, जल या भूमि (अर्थात पर्यावरण) की भौतिक, रसायन या जैविक गुणों में होने वाले ऐसे अनचाहे परिवर्तन हैं जो मनुष्य एवं अन्य जीवधारियों, उनकी जीवन परिस्थितियों, औद्योगिक प्रक्रियाओं एवं सांस्कृतिक धरोहरों के लिये हानिकारक हों।”

Pollution शब्द के ग्रीक मूल का शाब्दिक अर्थ है defilement अर्थात दूषित करना, भ्रष्ट करना। प्रदूषणकारी वस्तु या तत्व को प्रदूषक (pollutant) कहते हैं। कोई भी उपयोगी तत्व गलत मात्रा में गलत स्थान पर होने से वह प्रदूषक हो सकता है। उदाहरणार्थ, जीवधारियों के लिये नाइट्रोजन एवं फास्फोरस आवश्यक तत्व है। इनके उर्वरक के रूप में उपयोग से फसल-उत्पादन तो बढ़ता है किन्तु जब ये अधिक मात्रा में किसी-न-किसी तरह से नदी या झील के जल में पहुँच जाते हैं तो अत्यधिक काई पैदा होने लगती है। आवश्यकता से अधिक शैवालों के पूरे जलाशय में एवं जल-सतह पर जमा होने से जल-प्रदूषण होने की स्थिति बन जाती है। प्रदूषक सदैव व्यर्थ पदार्थ के रूप में ही नहीं होते। कभी-कभी एक स्थिति को सुधारने वाले तत्व का उपयोग दूसरी स्थिति के लिये प्रदूषणकारी हो सकता है। प्रदूषक पदार्थ प्राकृतिक इकोतंत्र से तथा मनुष्य द्वारा की जाने वाली कृषि एवं औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्पन्न होते हैं। प्रकृति-प्रदत्त प्रदूषक पदार्थों का प्राकृतिक तरीकों से ही उपचार हो जाता है, जैसा कि पदार्थों के चक्रों में आप पढ़ चुके हैं। किन्तु मनुष्य की कृषि या औद्योगिक गतिविधियों से उत्पन्न प्रदूषक पदार्थों के लिये न तो प्रकृति में कोई व्यवस्था है एवं न ही मनुष्य उसके उपचार हेतु पर्याप्त प्रयत्न कर पा रहा है। फलस्वरूप, बीसवीं सदी के इन अन्तिम वर्षों में मनुष्य को एक प्रदूषण युक्त वातावरण में रहना पड़ रहा है। यद्यपि हम वातावरण को शत-प्रतिशत प्रदूषणमुक्त तो नहीं कर सकते, किन्तु ऐसे प्रयास तो कर ही सकते हैं कि वे कम-से-कम हानिकारक हों। ऐसा करने के लिये प्रत्येक मनुष्य को पर्यावरण-संरक्षण को उतनी ही प्राथमिकता देनी होगी जितनी कि अन्य भौतिक आवश्यकताओं को वह देता है।

विषय सामग्री (इन्हें भी पढ़ें)

1

पर्यावरण प्रदूषण (Environmental pollution)

2

पर्यावरण प्रदूषण (Environment Pollution)

3

पर्यावरण प्रदूषण : नियंत्रण एवं उपाय

4

पर्यावरण प्रदूषण : प्रकार, नियंत्रण एवं उपाय

5

पर्यावरण, प्रदूषण एवं आकस्मिक संकट

6

पर्यावरण प्रदूषण : कानून और क्रियान्वयन

7

पर्यावरण प्रदूषण एवं उद्योग

8

पर्यावरण-प्रदूषण और हमारा दायित्व

 

प्रदूषकों के प्रकार (Types of Pollutants)


प्रदूषक पदार्थ तीन प्रकार के हो सकते हैं-

(अ) जैव निम्नीकरणीय या बायोडिग्रेडेबल प्रदूषक- (Biodegradable Pollutants)

जिन प्रदूषक पदार्थ का प्राकृतिक क्रियाओं से अपघटन (decompose) होकर निम्नीकरण (डिग्रेडेशन) होता है, उन्हें बायोडिग्रेडेबल प्रदूषक कहते हैं। उदाहरणार्थ, घरेलू क्रियाओं से निकले जल-मल (domestic sewage) का अपघटन सूक्ष्मजीव करते हैं। इसी प्रकार मेटाबोलिक क्रियाओं के उपोत्पाद (by products) जैसे CO2 नाइट्रेट्स एवं तापीय प्रदूषण (thermal pollution) से निकली ऊष्मा आदि का उपचार प्रकृति में ही इस प्रकार से हो जाता है कि उनका प्रभाव प्रदूषक नहीं रह जाता।

(ब) अनिम्नीकरणीय या नॉन-डिग्रेडेबल प्रदूषक (Non-biodegradable Pollutants)

ये प्रदूषक पदार्थ होते हैं जिनका प्रकृति में प्राकृतिक विधि से निम्नीकरण नहीं हो सकता। प्लास्टिक पदार्थ, अनेक रसायन, लम्बी शृंखला वाले डिटर्जेन्ट (long chain detergents) काँच, अल्युमिनियम एवं मनुष्य द्वारा निर्मित असंख्य कृत्रिम पदार्थ (synthetic material) इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। इनका हल दो प्रकार से हो सकता है- एक तो इनका पुनः उपयोग अर्थात पुनर्चक्रण (recycling) करने की तकनीकों का विकास तथा दूसरे इनकी अपेक्षा वैकल्पिक डिग्रेडेबल पदार्थों का उपयोग।

(स) विषैले पदार्थ (Toxicants)


इस श्रेणी में भारी धातुएँ (पारा, सीसा, कैडमियम आदि) धूमकारी गैसें (smog gases), रेडियोधर्मी पदार्थ, कीटनाशक (insecticides) एवं ऐसे अनेक कृषि एवं औद्योगिक बहिःस्राव (effluents) आते हैं जिनकी विषाक्तता के बारे में अभी जानकारी नहीं है। इस श्रेणी के अनेक प्रदूषकों का एक विशेष गुण होता है कि ये आहार-शृंखला में प्रवेश करने के पश्चात हर स्तर पर सांद्रित (concentrate) होते जाते हैं। इस श्रेणी के प्रदूषक वास्तव में मानव एवं अन्य जीवधारियों के स्वास्थ्य के लिये अत्यधिक हानिकारक हैं।

प्रदूषण के प्रकार - Types of pollution


उपरोक्त प्रकार के प्रदूषक तथा ध्वनि जैसे अन्य कारणों से उत्पन्न प्रदूषण मुख्य रूप से निम्न प्रकार के होते हैं-

(1) जल-प्रदूषण
(2) वायु- प्रदूषण
(3) महानगरीय प्रदूषण
(4) रेडियोधर्मी-प्रदूषण
(5) शोर-प्रदूषण

इनमें से पाठ्यक्रमानुसार जल, वायु एवं मृदा-प्रदूषण का अध्ययन करोगे।

जल-प्रदूषण (Water Pollution)


‘जल के बिना जीवन सम्भव नहीं’ – यह वाक्य ही जल के महत्त्व को पर्याप्त रूप से दर्शाता है। दुर्भाग्य से आज हम शुद्ध पेयजल को तरस रहे हैं। जल-प्रदूषण अशुद्धियों की जानकारी दी जा रही हैं।

जल में उपस्थिति अपद्रव्य पदार्थों को निम्न श्रेणियों में विभक्त किया जाता है-

(अ) निलम्बित अपद्रव्य (Suspended impurities)


इन पदार्थों के कण 1μ से अधिक व्यास के होते हैं। इन्हें छानकर अलग किया जा सकता है। रेती, मिट्टी, खनिज-लवण, शैवाल, फफूँद एवं विविध अजैव पदार्थ इस श्रेणी के अपद्रव्य पदार्थ हैं। इनकी उपस्थिति से जल मटमैला दिखता है।

(ब) कोलॉइडी अपद्रव्य (Colloidal impurities)


इन अपद्रव्य पदार्थों के कण कोलॉइड रूप में होते हैं। ये कण अतिसूक्ष्म होते हैं। (एक मिली माइक्रोन से एक माइक्रोन के बीच) अतः इन्हें छानकर अलग करने सम्भव नहीं होता। जल का प्राकृतिक रंग इन्हीं के कारण दिखता है। सिलिका एवं विभिन्न धातुओं के ऑक्साइड (जैसे- Al2O3, Fe2O3 आदि) बैक्टीरिया आदि इसी श्रेणी के अपद्रव्य हैं।

(स) घुलित अशुद्धियाँ (Dissolved impurities)


प्रारकृतिक जल जब विभिन्न स्थानों से बहता है तो उसमें अनेक ठोस, द्रव एवं गैस घुल जाती हैं। जल में घुलित ठोस पदार्थों की सान्द्रता को पीपीएम (ppm-part per million) इकाई में मापा जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल हेतु कुछ मानक निर्धारित किये हैं। यदि किसी जल में उक्त पदार्थों की मानक मात्रा से अधिक है तब उसे प्रदूषित जल कहेंगे।

जल-प्रदूषण के स्रोत (Sources of water Pollution)


जल प्रदूषण के दो प्रमुख स्रोत होते हैं-

(अ) प्राकृतिक स्रोत- प्राकृतिक रूप से भी जल का प्रदूषण होता रहता है। इसका कारण भू-क्षरण, खनिज-पदार्थ पौधों की पत्तियाँ, ह्यूमस तथा जन्तुओं के मलमूत्र का जल के प्राकृतिक स्रोतों में मिलना है। यह प्रदूषण बहुत धीमी गति से होता है किन्तु अवर्षा की स्थिति में जलाशयों में कम पानी रहने पर इनके दुष्प्रभाव गम्भीर हो सकते हैं।

जल में कुछ विषैली धातुएँ भी घुली होती हैं- आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, पारा, निकल, बेरीलियम, कोबाल्ट, मॉलीब्डेनम, टिन, वैनेडियम ऐसी ही धातुएँ हैं।

(ब) मानवीय स्रोत- मानव द्वारा जल-प्रदूषण निम्न कारणों से होता है-

1. घरेलू बहिःस्राव (Domestic effluents)


घरेलू कार्यों में उपयोग किया जल अन्य अपशिष्ट पदार्थों के रूप में बहिःस्राव (effluent) के रूप में बहा दिया जाता है। इस बहिःस्राव में सड़े फल, तरकारियाँ, चूल्हे की राख, कूड़ा-करकट, डिटर्जेन्ट पदार्थ आदि होते हैं। इनमें से डिटर्जेन्ट पदार्थ जिन रसायनों से बने होते हैं उनका जल में उपस्थित बैक्टीरिया भी निम्नीकरण (degradation) नहीं कर पाते। अतः इन पदार्थों का प्रभाव स्थायी होता है।

2. वाहित मल (Sewage)


जल-प्रदूषण का यह सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। इसमें मानव के मलमूत्र का समावेश होता है। अधिकांश स्थानों पर ये पदार्थ बिना उपचारित किये ही नदी, नालों या तालाबों में बहा दिये जाते हैं। वाहित मल में कार्बनिक एवं अकार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ होते हैं। कार्बनिक पदार्थों की अधिकता से विभिन्न सूक्ष्म जीव, जैसे-बैक्टीरिया, वायरस, अनेक एक कोशिकीय पौधे एवं जन्तु, फफूँद आदि तीव्रता से वृद्धि करते हैं, एवं वाहित मल के साथ पेयजल स्रोतों में मिल जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि मनुष्य की आँत में रहने वाले ई. कोलाई बैक्टीरिया की जल में उपस्थिति को जल-प्रदूषण का सूचक माना जाता है।

3. औद्योगिक बहिःस्राव (Industrial effluents)


उद्योगों के जो संयंत्र लगाए जाते हैं उनमें से अधिकांश में जल का प्रचुर मात्रा में उपयोग होता है। प्रत्येक उद्योग में उत्पादन प्रक्रिया के उपरान्त अनेक अनुपयोगी पदार्थ शेष बचते हैं। ये पदार्थ जल के साथ मिलकर बहिःस्राव के रूप में निष्कासित कर समीप की नदी या अन्य जलस्रोत में बहा दिये जाते हैं।

औद्योगिक बहिःस्राव में अनेक धात्विक तत्व तथा अनेक प्रकार के अम्ल, क्षार, लवण, तेल, वसा आदि विषैले पदार्थ होते हैं जो जल-प्रदूषण कर देते हैं। लुगदी तथा कागज-उद्योग, शकर-उद्योग, कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग, मद्य-निर्माण, औषधि-निर्माण, रसायन-उद्योग एवं खाद्य-संसाधन उद्योगों से विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट पदार्थ बहिःस्राव (effluent) के रूप में नदी नालों में बहाए जाते हैं।

इन प्रदूषक पदार्थों से जल दुर्गन्धयुक्त एवं गन्दे स्वाद वाला हो जाता है। इनमें से कुछ अपशिष्ट पदार्थ ऐसे भी होते हैं जो पेयजल शोधन में उपयोग में ली जाने वाली क्लोरीन के साथ मिलकर ऐसे यौगिक बना देते हैं जिनका स्वाद एवं गन्ध मूल पदार्थ से भी अधिक खराब होता है।

कुछ विषैली धातुएँ जैसे आर्सेनिक खदानों से वर्षा के जल के साथ मिलकर जलस्रोत में मिल जाती हैं। औद्योगिक बहिस्राव में सर्वाधिक खतरा पारे से होता है। पारे के घातक प्रभाव का सबसे बड़ा उदाहरण जापान की मिनीमेटा (minimata) खाड़ी के लोगों को 1950 में हुई एक भयानक बीमारी है। रोग का नाम भी मिनिमेटा रखा गया। खोज करने पर विदित हुआ है कि ये लोग जिस स्थान की मछलियों को खाते थे उनके शरीर में पारे की उच्च सान्द्रता पाई गई। इस खाड़ी में एक प्लास्टिक कारखाने से पारे का बहिःस्राव होता था।

4. कृषि बहिःस्राव (Agricultural effluents)


आजकल अपनाई जाने वाली कृषि प्रणालियों को दोषपूर्ण तरीके से उपयोग में लेने से मृदा-क्षरण होता है, फलस्वरूप मिट्टी पेयजल में लाकर उसे गन्दा करती है। इसके अलावा अत्यधिक रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों के प्रयोग से कृषि बहिःस्राव में अनेक ऐसे पदार्थ होते हैं जो पेयजल में मिलने से उसे प्रदूषित करने में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में सहायक होते हैं।

अधिकांश उर्वरकों में नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस होता है। अधिक मात्रा में जलाशयों में पहुँचने पर ये शैवाल उत्पन्न करने में सहायक होते हैं। अत्यधिक शैवाल जमा होने से जल पीने योग्य नहीं रह पाता तथा उनके अपघटक बैक्टीरिया की संख्या भी अत्यधिक हो जाती है। इनके द्वारा की जाने वाली अपघटन क्रिया से जल में ऑक्सीजन की मात्रा घटने लगती है एवं जल प्रदूषित हो जाता है।

कीटनाशकों एवं खरपतवारनाशकों के रूप में उपयोग में लिये जाने वाले रसायन पारा, क्लोरीन, फ्लोरिन, फॉस्फोरस जैसे विषैले पदार्थों से बने होते हैं। ये पदार्थ निम्न प्रकार से कार्बनिक एवं अकार्बनिक रसायनों से बनते हैं-

(अ) अकार्बनिक- (1) आर्सेनिक यौगिक (2) पारे के यौगिक एवं (3) गंधक के यौगिक

(ब) कार्बनिक- (1) पारा या क्लोरीन युक्त हाइड्रोकार्बन एवं (2) तांबा, फॉस्फोरस के कार्बो-धात्विक यौगिक।

कुछ कीटनाशक पदार्थ जो जल में मिल जाते हैं, जलीय जीवधारियों के माध्यम से विभिन्न पोषी-स्तरों में पहुँचते हैं। प्रत्येक स्तर पर जैविक क्रियाओं से इनकी सान्द्रता में वृद्धि होती जाती है। इस क्रिया को जैविक-आवर्द्ध (biomagnification) कहते हैं।

5. तैलीय-प्रदूषण (Oil Pollution)


यह प्रदूषण नदी-झीलों की अपेक्षा समुद्रीजल में अधिक होता है। समुद्री जल का तैलीय प्रदूषण निम्न कारणों से होता है-

(1) जलायनों द्वारा अपशिष्ट तेक के विसर्जन से।
(2) तेल वाहक जलयानों की दुर्घटना से।
(3) तेल वाहक जलयानों में तेल चढ़ाते या उतारते समय।
(4) समुद्र किनारे खोदे गए तेल कुओं से लीकेज के कारण।

जल-प्रदूषण के दुष्प्रभाव (Harmful effects of water pollution)


(अ) मनुष्य पर प्रभाव
(ब) जलीय वनस्पति पर प्रभाव
(स) जलीय जन्तुओं पर प्रभाव
(द) विविध प्रभाव

(अ) मनुष्य पर प्रभाव - Effects on Humans


(1) पेयजल से- प्रदूषित जल के पीने से मनुष्य के स्वास्थ्य पर अनेक हानिकारक प्रभाव होते हैं। प्रदूषित जल में अनेक सूक्ष्म जीव होते हैं जो विभिन्न प्रकार के रोगों के या तो कारण बनते हैं या रोगजनक का संचरण करते हैं। प्रदूषित जल से होने वाले रोग निम्नानुसार हैं-

बैक्टीरिया जनित- हैजा, टाइफॉइड, डायरिया, डिसेन्ट्री आदि।

वाइरस जन्य- पीलिया, पोलियो आदि।

प्रोटोजोआ जन्य- पेट तथा आँत सम्बन्धी अनेक विकार जैसे- अमीबिक डिसेन्ट्री, जिएर्डिसिस आदि।

कृमि जन्य-


आँत के कुछ परजीवी जैसे एस्केरिस का संक्रमण पेयजल के द्वारा ही होता है। नारू के कृमि भी पेयजल में उपस्थित साइक्लोप्स के कारण मनुष्य में पहुँचते हैं।

(2) जल-सम्पर्क से- प्रदूषित जल के शरीर-सम्पर्क होने पर अनेक रोग-कारक परजीवी मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। या फिर रोगी मनुष्य के शरीर से निकलकर जल में मिल जाते हैं। नारू इसका एक उदाहरण है।

(3) जलीय रसायनों से- जल में उपस्थित अनेक रासायनिक पदार्थों की आवश्यकता से अधिक मात्रा में से स्वास्थ्य पर अनेक प्रभाव होते हैं।

(ब) जलीय वनस्पति पर प्रभाव - Effects on aquatic vegetation


प्रदूषित जल से जलीय वनस्पति पर निम्न प्रभाव होते हैं-

(i) बहिःस्रावों में उपस्थित अधिक नाइट्रोजन एवं फॉस्फोरस से शैवाल में अतिशय वृद्धि होती है। सतह पर अधिक मोटी काई के कारण सूर्य-प्रकाश अधिक गहराई तक नहीं पहुँच पाता।

(ii) प्रदूषित जल में अन्य सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है। ये सूक्ष्म जीव समूह में एकत्रित हो जाते हैं, जिन्हें मल-कवक (sewage fungus) के रूप में जाना जाता है।

(iii) प्रदूषक तत्व धीरे-धीरे तलहटी पर जमा होते जाते हैं, फलस्वरूप जड़ वाले जलीय पौधे समाप्त होते जाते हैं एवं जलीय खरपतवार (जल हायसिंथ, जलीय फर्न, जलीय लेट्यूस आदि में वृद्धि होती है।

(iv) तापीय प्रदूषण से जल का तापमान बढ़ता है जिससे प्लवक एवं शैवालों की वृद्धि होने से जलीय ऑक्सीजन में कमी आती है।

(स) जलीय जन्तुओं पर प्रभाव - Effects on aquatic organisms


जलीय वनस्पति पर ही जलीय जन्तुओं का जीवन आधारित होता है। अतः जल-प्रदूषण से जलीय वनस्पति के साथ ही जलीय जन्तुओं पर भी प्रभाव होते हैं। संक्षेप में निम्न प्रभाव होते हैं-

(i) ऑक्सीजन की कमी से अनेक जन्तु, विशेषकर मछलियाँ मरने लगती हैं। 1940 में जल के एक लीटर नमूने में सामान्यतया 2.5 घन सेमी. ऑक्सीजन होती थी, वही अब यह मात्रा घटकर 0.1 घन सेमी. रह गई है।

(ii) जन्तुओं में विविधता लगभग समाप्त हो जाती है। कुछ बैक्टीरिया खाने वाले जन्तु (जैसे-कॉल्पीडियम, ग्लॉकोमा, काइरोनोमिड, ट्यूबफीट आदि) ही बचे रहते हैं। निर्मल जल में पाये जाने वाले जन्तु प्रायः समाप्त हो जाते हैं।

(iii) कृषि एवं औद्योगिक बहिःस्राव में आने वाले अनेक रासायनिक पदार्थ न केवल जलीय जन्तुओं के लिये घातक होते हैं वरन अन्य चौपायों (गाय, भैंस आदि) द्वारा उसे पीने पर उन पर घातक प्रभाव होते हैं।

(द) अन्य प्रभाव


(i) निलम्बित रासायनिक प्रदूषकों से जल गन्दा दिखता है।

(ii) जल बेस्वाद एवं दुर्गन्ध युक्त हो जाता है।

(iii) सुपोषण (Eutrophication)- घरेलू जल-मल (सीवेज), खाद्य पदार्थों से सम्बन्धित फैक्टरियों से निकले कार्बनिक व्यर्थ-पदार्थ एवं खेतों के ऊपर से बहकर आने वाला पोषक तत्वों से भरपूर जल जब जलाशयों में मिलता है तब उस जल की उर्वरकता में अतिशय वृद्धि होती है। इस कारण से उनमें जलीय शैवालों की इतनी वृद्धि होती है कि जलाशय की पूरी सतह शैवाल से ढँक जाती है। शैवाल आक्सीजन का भी उपयोग कर लेते हैं, फलस्वरूप जल में रहने वाले जन्तुओं (मछली, कीट आदि) को ऑक्सीजन की कमी का सामना करना पड़ता है एवं उनकी मृत्यु हो जाती है। इधर शैवालों की वृद्धि से जलाशय सूखने लगते हैं।

(iv) जल में उपस्थित प्रदूषक तत्वों की वजह से जल एवं टंकियों में क्षरण होने लगता है।

(v) घरेलू बहिःस्राव में उपस्थित डिटर्जेन्ट पदार्थों के कारण जलाशयों के जलशोधन में कठिनाई आती है।

(vi) वाहित मल के विघटन से अनेक ज्वलनशील पदार्थ बनते हैं। जिससे कभी-कभी भूमिगत नालियों में विस्फोट होते हैं।

(vii) खरपतवार में वृद्धि से जलाशय के विभिन्न उपयोगों में (जैसे- मछली पकड़ना, सिंचाई, नौका-विहार आदि) में बाधा होती है।

किसी नदी में मिलने वाले बहिःस्राव का मिलने के स्थान के नीचे की धारा (down stream) तक बहते-बहते उनमें उपस्थित कार्बनिक प्रदूषकों के द्वारा होने वाले भौतिक, रासायनिक एवं जैविक प्रभावों को साथ में दिये रेखाचित्र 4.1 में देखें। इस ग्राफ-चित्र में क्षैतिज- अक्ष नीचे की धारा की दूरी प्रदर्शित करता है। जैसे जल नीचे की धारा की ओर बढ़ता है उसमें बैक्टीरिया एवं काइरोनॉमस लार्वा जैसे जीवों की संख्या घटती जाती है तथा आक्सीजन की मात्रा बढ़ती जाती है। किसी जल की शुद्धता नापने के लिये BOD इकाई का उपयोग होता है जिसका मतलब Bio chemical oxygen demand है। इस चित्र में यह भी देख सकते हो कि BOD भी निरन्तर घटता जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा औद्योगिक तथा नगरीय घटता जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा औद्योगिक तथा नगरीय अपशिष्ट जल को प्राकृतिक सतही जल में छोड़ने के लिये एक सीमा निर्धारित की है जो कि 10 ppm से कम होनी चाहिए।

जल-प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण - Water pollution prevention and control


जल-प्रदूषण की रोकथाम के लिये जल-उपचार एवं जल का पुनर्चक्रण (recycling) किया जाना चाहिए।

अपशिष्ट जल का उपचार - Waste Water Treatment


वाहित जल एवं औद्योगिक बहिःस्रावों को जलस्रोतों में बहाने से पहले ही साफ किया जाना चाहिए। अपशिष्ट जल के प्राथमिक एवं द्वितीयक उपचार से अनेक प्रदूषक पृथक किये जा सकते हैं। प्राथमिक उपचार-क्रिया में सूक्ष्म-जीवों की गतिविधियों से व्यर्थ पदार्थों का अपघटन एवं ऑक्सीकरण किया जाता है।

जल का रिसाइक्लिंग - Water recycling


जल प्रदूषण को रोकने के लिये यह एक अच्छा उपाय है। प्रदूषित जल में उपस्थित अनेक प्रदूषक तत्वों, अपशिष्ट पदार्थों की रिसाइक्लिंग की जा सकती है। इन उपोत्पादों का उचित उपयोग भी किया जाता है। गोबर गैस प्लान्ट इसका एक उदाहरण है। व्यर्थ पदार्थों को पुनः उपयोग का उदाहरण नारियल रेशे एवं कृषि अपशिष्ट पदार्थों का पेपर मिलों में उपयोग करना है।

वायु-प्रदूषण (Air Pollution)


.वायुमण्डल में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन, 20-21 प्रतिशत ऑक्सीजन, 0.03 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड तथा बहुत सूक्ष्म मात्रा में अन्य गैसें एवं वाष्प रूप में जल होता है। इस वायुमण्डल में कोई भी अन्य पदार्थ के मिलने पर यदि उसका हानिकारक प्रभाव होता है, तब उसे वायु-प्रदूषण कहेंगे। वायुमण्डल में उपरोक्त गैसों का अनुपात इन गैसों के चक्र के द्वारा बना रहता है। किन्तु कृषि एवं औद्योगिक गतिविधियों से अनेक गैसों की अतिरिक्त मात्रा वायुमण्डल में जा मिलती है, फलस्वरूप वायु-प्रदूषण हो जाता है।

वायु-प्रदूषण के स्रोत (Sources of Air Pollution)
वायु-प्रदूषण के स्रोतों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है-

(अ) प्राकृतिक स्रोत - Natural sources


ज्वालामुखी पर्वतों के फटने से निकले लावा के साथ निकली राख, आँधी-तूफान के समय उड़ती धूल तथा वनों में लगने वाली आग से वायु-प्रदूषण होता है। दलदली क्षेत्रों में होने वाली अपघटन क्रियाओं से निकली मीथेन गैस तथा वनों में पौधों से उत्पन्न हाइड्रोजन के विभिन्न यौगिकों तथा परागकणों से भी वायु प्रदूषित होती है।

किन्तु प्राकृतिक स्रोतों से होने वाले इस प्रदूषण का प्रभाव मनुष्य पर नगण्य ही है।

(ब) मानवीय स्रोतों - Human resources


मनुष्य द्वारा की जाने वाली अनेक गतिविधियाँ वायु-प्रदूषण की मुख्य स्रोत हैं। इन गतिविधियों की निम्न श्रेणी में विभक्त किया जा सकता है-

1. दहन-क्रियाएँ
2. औद्योगिक गतिविधियाँ
3. कृषि-कार्य
4. विलायकों का प्रयोग
5. परमाणु ऊर्जा सम्बन्धी गतिविधियाँ

1. दहन-क्रियाएँ (Combustion)


मनुष्य की दैनिक आवश्यकताओं, जैसे-भोजन पकाना, वस्त्र, भवन-निर्माण सामग्री (ईंट, सीमेंट, चूना आदि) आवागमन, बर्तन आदि को तैयार करने में आवश्यक ऊर्जा विभिन्न प्रकार के ईंधन के दहन (combustion of fuel) से प्राप्त होती है।

घरेलू कार्यों में दहन-क्रियाओं से जहाँ एक ओर CO2, CO (कार्बन मोनोक्साइड), SO2 जैसी गैसें उत्पन्न होती हैं, वहाँ इस क्रिया में वायुमण्डल की ऑक्सीजन उपयोग में ली जाती है। इससे वातावरण में ऑक्सीजन की कमी होती है। एक मोटे अनुमान के अनुसार एक टन तेल जलने के लिये 10,300 घन मीटर, एक टन कोयले का दहन के लिये 1,15,00 घन मीटर तथा एक टन कुकिंग गैस के जलने में 15,600 घन मीटर वायु आवश्यक होती है।

इसी प्रकार अनेक विद्युत-ग्रहों में पत्थर का कोयला जलाने से अन्य गैसें तथा धुँआ उत्पन्न होता है। कोयले की राख व्यर्थ पदार्थ के रूप में उड़कर वायुमण्डल में मिलती है। दिल्ली में इन्द्रप्रस्थ स्थित विद्युत तापगृह में प्रतिदिन 45 लाख टन कालिख, 60 लाख टन SO2 एवं 85 टन राख उत्पन्न होती है।

दहन-क्रियाओं में होने वाले प्रदूषण में सर्वाधिक हानि वाहनों के जलने वाले ईंधन से होती है। डीजल वाहनों के धुएँ में अनेक हाइड्रोकार्बन तथा सल्फर एवं नाइट्रोजन के ऑक्साइड आदि होते हैं। पेट्रोल से चलने वाले वाहनों के धुएँ में CO2 के अलावा सीसा (Pb) भी होता है। आजकल सीसा रहित पेट्रोल उपलब्ध होने लगा है।

2. औद्योगिक गतिविधियाँ - Industrial activities


उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषकों की प्रकृति इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें लगने वाला कच्चा माल किस प्रकार का है तथा मुख्य उत्पादन के साथ उपोत्पाद क्या निकलते हैं। कपड़ा-उद्योग, रासायनिक-उद्योग, तेल-शोधक कारखाने, गत्ता-उद्योग एवं शक्कर-उद्योग, वायु-प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं। H2S, SO2, CO2, CO धूल, सीसा, एस्बेस्टस, आर्सेनिक, फ्लोराइड, बेरीलियम तथा अनेक हाइड्रोकार्बन पदार्थ इन उद्योगों से निकले मुख्य वायु-प्रदूषक हैं। औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास इतना धुँआ होता है कि वहाँ साँस लेना दूभर हो जाता है एवं दूर की वस्तुएँ दिखाई नहीं पड़ती।

वायु-प्रदूषण की दृष्टि से हमारे देश में औद्योगिक शहर सर्वाधिक प्रदूषित हैं।

3. कृषि-कार्य - agricultural operation


कृषि में निरन्तर भारी मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग होता है। इनके छिड़काव में वायु-प्रदूषण होता है जिससे नेत्र तथा श्वसन-अंग प्रभावित होते हैं।

4. विलायकों का प्रयोग (Use of Solvents)


आजकल प्रयुक्त होने वाले स्प्रे पेन्ट तथा फर्नीचर आदि की पॉलिश बनाने में अनेक प्रकार के कार्बन उड़नशील विलायकों का प्रयोग होता है। विलायकों के सूक्ष्म कण वायु में मिलकर वायु प्रदूषित करते हैं।

5. परमाणु ऊर्जा सम्बन्धी गतिविधियाँ - Nuclear power-related activities


परमाणु ऊर्जा प्राप्त करने के लिये अस्थायी प्रकृति के रासायनिक तत्वों का उपयोग होता है। ये तत्व उत्पन्न होने के साथ-साथ विघटित होने लगते हैं। इसके फलस्वरूप रेडियोधर्मी गामा किरणों का विकिरण होता है। ये किरणें सभी जीवधारियों के लिये घातक होती हैं।

रेडियोधर्मी तत्व एटॉमिक रिएक्टरों एवं बम विस्फोटों से निकलते हैं एवं वायु-प्रदूषित करते हैं।

मुख्य वायु-प्रदूषक एवं उनके प्रभाव (Chief Air Pollutant & their effects)


उपरोक्त वर्णित विभिन्न स्रोतों से जो प्रदूषक निकलते हैं उनमें मुख्य हैं-

कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO, NO2), एरोसोल्स (aerosols), स्मोग (smog) एवं एथीलीन आदि।

1. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)


यह गैस अनेक प्रकार की दहन प्रक्रियाओं में निर्मित होती है। जन्तुओं एवं पौधों की श्वसन-क्रिया से भी CO2 निर्मुक्त होती है यद्यपि पौधों द्वारा की जाने वाली प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा वायुमण्डल की O2 एवं CO2 में निर्धारित अनुपात लगभग बना रहता है, किन्तु पिछले 100 वर्षों में औद्योगिक प्रक्रमों एवं स्वचालित वाहनों के कारण वायुमण्डल में CO2 की मात्रा में 15 प्रतिशत वृद्धि हो चुकी है। एक जेट वायुयान एटलांटिक महासागर को पार करने में वायुमण्डल की 35 टन ऑक्सीजन का उपयोग करता है तथा 70 टन CO2 वायुमण्डल में छोड़ता है।

वायुमण्डल में CO2 की मात्रा बढ़ने से वातावरण के तापमान में वृद्धि होती है। यदि प्रदूषण की गति यही रही तो अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में 25 प्रतिशत की वृद्धि से पृथ्वी के तापमान में इतनी वृद्धि होगी कि ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ पिघलने लगेगी, फलस्वरूप समुद्री जल-सतह 60 फीट ऊँची हो जाएगी। इस कारण समुद्र किनारे के अधिकांश भू-भाग जलमग्न हो जाएँगे।

2. कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO)


ईंधन के अपूर्ण दहन से CO बनती है। यह गैस स्टील उद्योगों, तेल-शोधक कारखानों, मोटर वाहनों तथा सिगरेट के धुएँ में होती है। यह अत्यन्त विषैली गैस है। साँस के द्वारा अन्दर ली गई यह गैस रक्त में RBC के हीमोग्लोबिन के साथ शीघ्र मिलकर श्वसन-क्रिया में रुकावट उत्पन्न करती है। अधिक मात्रा में CO का शरीर में प्रवेश होने से थकावट, आलस्य, सिरदर्द, दृष्टिदोष जैसे लक्षणों के साथ रक्त-परिवहन एवं तंत्रिका-तंत्र भी प्रभावित होते हैं।

3. सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)


अनेक प्रकार के उद्योगों जहाँ Cu, Zn, Pb, Ni एवं Fe अयस्कों (ores) का उपयोग होता है, इन तत्वों में उपस्थित सल्फर के ऑक्सीकरण से SO2 निकलती है जो वायुमण्डल में मिल जाती है। इसके अलावा मोटर वाहनों, कोयले के दहन एवं तेलशोधक कारखानों से भी SO2 गैस निकलती है।

SO2 के वातावरण में मिलने से सल्फर ट्राइऑक्साइड (SO3), सल्फ्युरस अम्ल (HSO3) एवं गंधकाम्ल (H2SO4) आदि का निर्माण होता है। (चित्र 4.2)। ये विभिन्न पदार्थ पौधों की कोशिकाओं में प्रवेश कर हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। (देखिए चित्र 4.3) पूर्वी अमेरिका उत्तर-पश्चिम यूरोप जैसे क्षेत्रों के आते औद्योगिक क्षेत्रों में इतनी SO2 वायुमण्डल में उपस्थित है कि वर्षा के समय गिरने वाला जल, जल न होकर गंधकाम्ल (H2SO4 सल्फ्यूरिक एसिड) होता है। इस क्रिया को अम्ल वर्षा (एसिड रेन- acid rain) कहते हैं। अम्लीय वर्षा के जल से पत्थरों, संगमरमर आदि की सतह नष्ट हो जाती है, इसे स्टोन लेप्रसी (Stone leprosy) कहते हैं।

SO2 का प्रभाव मनुष्य एवं पौधों पर अत्यधिक हानिकारक होता है, SO2 की अधिक सान्द्रता से पौधों से क्लोरोफिल नष्ट होने लगता है (क्लोरोसिस रोग)। कोशिकाएँ टूटने लगती हैं एवं अन्ततः अंग नष्ट हो जाते हैं या पूरे पौधे की मृत्यु हो जाती है (नेक्रोसिस)। यदि पौधे की मृत्यु न भी हुई तो प्लैजमोलिसिस, मेटाबोलिक क्रियाओं में अवरोधन एवं वृद्धि तथा उत्पादन में कमी हो जाती है।

4. नाइट्रोजन के ऑक्साइड


पेट्रोल चलित वाहनों के धुएँ, दहन-क्रियाओं एवं अनेक उद्योगों से नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO) नाइट्रोजन डाइ (NO2) एवं ट्राइऑक्साइड (N2O3) निकलते हैं। ये पदार्थ सूर्य-प्रकाश में हाइड्रोकार्बनों से क्रिया कर भूरे रंग का बहुत ही घातक धूम कोहरे (photochemical smog) का निर्माण करते हैं। धूम कोहरे में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, ओजोन एवं PAN (Perpxyl acetye nitrate) होते हैं। यह धूम कोहरा मनुष्य के लिये कितना घातक है, इसका उदाहरण 1952 में लंदन शहर की घटना से लगाया जा सकता है। वहाँ पाँच दिनों तक शहर इस प्रकार के धूम कोहरे से ढँका रहा, फलस्वरूप चार हजार लोगों की मृत्यु एवं अनेक हृदय-रोग एवं श्वसन रोग (bronchitis) से पीड़ित हुए।

5. ऐरोसोल्स (Aerosols)


ऐरोसोल्स उन रासायनिक पदार्थों को कहते हैं जो वाष्प एवं धूमिका (mist) के रूप में वायुमण्डल में बहुत अधिक बल के साथ छोड़े जाते हैं। ऐरोसोल्स ध्वनि से तेज गति से सुपर जेटयानों द्वारा निर्मुक्त धुएँ में होते हैं इनमें क्लोरो फ्लोरो कार्बन पदार्थ होते हैं जो हमारे वातावरण की रक्षक ओजोन परत (ozone layer) को नष्ट करते हैं। ओजोन परत के नष्ट होने से सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें (ultra violet rays) हमारे वायुमण्डल में प्रवेश कर जीवधारियों को नुकसान पहुँचाती है।

6. स्मोग (Smog)


धुएँ एवं कोहरे (fog) के मिश्रण को स्मोग (Smog) कहते हैं। पिछले पृष्ठ में वर्णित प्रभावों के अलावा स्मोग से पत्तियों को क्लोरोसिस तथा नेक्रोसिस रोग हो जाते हैं।

7. एथीलिन (Ethylene)


वाहनों के धुएँ प्राकृतिक गैसों तथा कोयले के दहन एवं किसी भी कार्बनिक पदार्थ के अपूर्ण दहन से एथीलीन निर्मुक्त होती है। वातावरण में एथीलिन की अधिकता से आर्किड पौधों तथा कपास जैसे पौधों को हानि होती है।

वायु प्रदूषण की रोकथाम के उपाय - Air pollution prevention measures


वायु-प्रदूषणों को रोकने एवं नियंत्रित करने हेतु दो प्रकार के उपाय किये जा सकते हैः-

(i) प्रदूषक पदार्थों की हानिकारक गैसों को पृथक कर वायुमण्डल में विसर्जित करने के अलावा अन्य विधि से निष्कासित किया जा सकता है।

(ii) प्रदूषकों को अहानिकारक गैसों पदार्थों में परिवर्तित कर फिर उन्हें वायुमण्डल में मिलने दिया जाय।

प्रदूषक पदार्थों के पृथक्करण हेतु अनेक विधियाँ अपनाई जाती है। जैसे- छानकर (filltering), निःसादन (stelling), घोलकर या अधिशोषण (absorption) द्वारा। साथ में दिये चित्र में 4.4 में प्रदूषित वायु के कणों को निःसादन विधि से पृथक करने की विधि बतलाई है। इसमें प्रयुक्त उपकरण को चक्रवात (cyclone) उपकरण कहते हैं।

वायु प्रदूषण के नियंत्रण हेतु निम्न सामान्य उपाय किये जा सकते हैं-

(i) घरेलू कार्यों के लिये धुआँ रहित ईंधनों के उपयोग को बढ़ावा देना।

(ii) मोटरकार जैसे वाहनों के धुएँ निकलने की नली पर उपयुक्त फिल्टर तथा पश्चज्वलक (afterburner) का उपयोग।

(iii) डीजल से संयोजी पदार्थ तथा सीसा (Pb) एवं सल्फर रहित पेट्रोल का उपयोग किया जाय।

(iv) स्वचलित वाहनों के इंजनों में ऐसे आवश्यक सुधार हो जिसमें ईंधन (पेट्रोल, डीजल) का पूर्ण ऑक्सीकरण हो सके।

(v) धुआँ छोड़ने वाले वाहनों पर पूर्ण रोक लगाना।

(vi) रेलों को अधिकाधिक विद्युत-इंजन से चलाना।

(vii) कारखानों की चिमनियों की ऊँचाई ठीक रखना।

(viii) कारखानों के लिये प्रदूषक नियंत्रक उपकरणों का उपयोग करना।

(ix) चिमनियों से निकलने वाले धुएँ का निष्कासन स्थल पर ही उपचारित करने का प्रयास ताकि प्रदूषक पदार्थ वायु में मिलने से पहले पृथक हो जाएँ।

(x) जन-चेतना एवं शासकीय प्रयास।

ग्रीन हाउस प्रभाव (Green House Effect)


अनेक वानस्पतिक उद्यानों, कृषि उद्यानों तथा नर्सरी आदि में ग्रीन हाउस होते हैं। ये ग्रीन हाउस वास्तव में काँच से घिरे ऐसे ग्लास हाउस होते हैं जिनके अन्दर का तापमान बाहर की अपेक्षा अधिक होता है। ग्रीन हाउस के अन्दर तापमान बढ़ने का कारण उसमें रखे पौधों द्वारा मुक्त की गई CO2 एवं जलवाष्प है जो कि बाहर नहीं निकल पाती एवं इनके कारण ग्रीन हाउस के अन्दर का तापमान बढ़ा रहता है। इन ग्रीन हाउसों की उपयोगिता पौधों को शीत के प्रकोप से बचाना होता है।

आजकल पृथ्वी के वातावरण के तापमान में जो वृद्धि हो रही है उसे ग्लोबल वार्मिंग (global warming) कहते हैं। इसका कारण वायु प्रदूषण से हमारे वातावरण में CO2, CH4, CO, CFC एवं N2O (नाइट्रस ऑक्साइड) जैसी गैसों की मात्रा में वृद्धि होना है। जिस प्रकार से ग्लास हाउस में अन्दर का तापमान बढ़ता है उसी प्रकार से यदि पृथ्वी के आसपास के वातावरण को यदि ग्लास हाउस मान लिया जाये तो उक्त गैसों की अधिकता के कारण जो तापमान बढ़ रहा है वह उस ग्रीन हाउस प्रभाव के समान ही है जो उद्यानों में मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से बनाए जाते हैं। अतः ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण पृथ्वी पर ‘ग्रीन हाउस’ प्रभाव माना जाता है। जो गैसें ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ाती हैं उन्हें ग्रीन हाउस गैसें कहते हैं।

मृदा-प्रदूषण (Soil Pollution)


.पृथ्वी की सतह के सबसे ऊपरी भाग को मृदा (soil) कहते हैं। मृदा का निर्माण पृथ्वी की सतह पर जल एवं ताप जैसे अजैविक कारकों तथा पौधों एवं सूक्ष्म जीवों जैसे जैविक घटकों से होता है। इसीलिये यह फसलों की उपज के लिये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

मृदा में ऐसे कोई भी पदार्थ मिलने या मृदा के घटक में से कोई पदार्थ निकलने पर यदि मृदा की उपजाऊ क्षमता, गुणवत्ता एवं भूजल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तब हम उसे मृदा प्रदूषण कहेंगे। यह निम्न कारणों से होता हो सकता है-

(अ) अत्यधिक पेस्टिसाइड्स (Pesticides) का उपयोग-


अधिक उपज की लालच में कृषक फसलों पर अनेक प्रकार के कीटनाशक, कवकनाशक, कृन्तकनाशी एवं खरपतवारनाशी का उपयोग करते हैं। उक्त सभी प्रकार से रसायन जीवनाशक होते हैं इनमें विभिन्न प्रकार के (i) आर्गेनोक्लोरिन या क्लोरिनेटेड हाइड्रोकार्बन होते हैं। (डीडीटी, बी एच सी, एल्ड्रिन आदि) जो अपघटित नहीं होते एवं स्थायी रूप से भूमि का हिस्सा बनते हैं।

खाद्य-शृंखला के द्वारा इनकी मात्रा बढ़ती जाती है उसका कुप्रभाव उच्च स्तर के उपभोक्ता जन्तुओं पर पड़ता है अतः इनका उपयोग हानिकारक है।

(ii) आर्गेनोपेस्टिसाइड्स जिनका अपघटन तो हो जाता है किन्तु जो श्रमिक इन्हें खेतों में डालते हैं उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मिलेथायोन, पेराथायोन एवं कार्बामेट्स इसी श्रेणी में आते हैं।

(iii) अकार्बनिक पेस्टिसाइड्स- इनमें प्रमुख रूप से आर्सेनिक एवं सल्फर का उपयोग होता है जो कि हानिकारक हैं।

(iv) खरपतवारनाशी- ये रसायन भी स्थायी रूप से भूमि में रह जाते हैं एवं हानिकारक होते हैं।

(ब) रासायनिक खाद - chemical fertilizer


इनके अत्यधिक उपयोग से भूमि में प्राकृतिक रूप से उपस्थित सूक्ष्म जीवों में कमी लाकर भूमि की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव होता है। ये धीरे-धीरे भूमि द्वारा सोख लिये जाते हैं जो कि अन्ततः भूजल को विषाक्त करते हैं। खाद में मिले विभिन्न प्रकार के लवण खाद्य फसलों में मिलकर हानि पहुँचाते हैं। उदाहरण के लिये पत्तियों, फलों एवं जल जब अत्यधिक नाइट्रेट युक्त हो जाते हैं तब ये जन्तुओं की आहार नाल में नाइट्राइट में बदलकर रक्त में प्रवेश करते हैं। रक्त में नाइट्राइट हीमोग्लोबिन से मिलकर ऐसे पदार्थों में बदल जाते हैं जिससे हीमोग्लोबिन की ऑक्सीजन वहन क्षमता कम हो जाती है। बच्चों के लिये तो यह स्थिति अत्यधिक खतरनाक होती है।

(स) औद्योगिक बहिःस्राव - Industrial effluents


इन बहिःस्राव में अनेक विषैले पदार्थ जैसे सायनाइड, क्रोमेट्स, अम्ल, क्षार एवं पारा, तांबा, जिंक, सीसा या केडमियम जैसी धातुएँ आदि मिले होते हैं जो मृदा में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं।

(द) भूमिगत खदानों से निरन्तर धूल के कण निकलकर वातावरण में मिलते रहते हैं जो उसके आसपास की वनस्पति एवं जन्तुओं के लिये अनेक प्रकार से हानिकारक होते हैं।

(इ) भूमि में लवण जमा होना - Salt to be deposited in the Land


विभिन्न कारणों से भूमि की सतह पर लवण एकत्र हो जाते हैं एवं ऊपरी सतह सफेद-सफेद दिखाई देने लगती है इस कारण से भूमि कम उपजाऊ या लगभग बंजर हो जाती है। भूमि का लवणीकरण (salination) निम्न कारणों से हो सकता है-

(i) आसपास की चट्टानों के क्षरण से,
(ii) जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने से,
(iii) भूजल की सतह ऊपर उठने से,
(iv) भूमिगत एवं नहरों के जल में प्रचुर मात्रा में लवणों की उपस्थिति,
(v) रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग।

(ई) मृदा-क्षरण - Soil erosion


अच्छी उपजाऊ भूमि को कम उपजाऊ में परिवर्तित करने वाले कारकों में मृदा क्षरण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मृदा क्षरण बड़ी-बड़ी चट्टानों के टूटने, वर्षा के जल-बहार से (बाढ़ के द्वारा), रेगिस्तान में तेज हवाओं के चलने से, बाढ़ के दौरान नदियों के किनारे टूटने आदि से होता रहता है।

मृदा-प्रदूषण का नियंत्रण एवं रोकथाम के उपाय - Soil pollution control and prevention measures


मृदा-प्रदूषण को रोकने में मनुष्य की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है उनमें से प्रमुख हैं-

(अ) पेस्टिसाइडों का कम से कम उपयोग Minimal use of Pesticide


आजकल ऐसी फसलें विकसित हो चुकी हैं या की जा रही हैं जो रोग प्रतिरोधक होती हैं। अतः उन पर कीटनाशकों, कवकनाशकों आदि का उपयोग नहीं करना पड़ता।

(ब) अधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से बचना एवं अधिकाधिक जैविक खादों (गोबर का कम्पोस्ट) का उपयोग करना जिससे उपजाऊपन यथावत रहे।

(स) छोटे बाँध एवं छोटी नहरों का निर्माण भूमि के लवणीकरण को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। बड़े बाँधों से बड़े जलाशय बनते हैं। अधिक मात्रा में जल संग्रहण एवं बड़ी नहरों के निर्माण से आसपास की भूमि में अत्यधिक लवण जमा होते हैं एवं वाटर लॉगिंग (Water logging) भी हो जाता है।

(द) मृदा-क्षरण के कारणों को जानने के बाद उन पर रोक लगाने के लिये कुछ सिद्धान्त है, जो निम्नानुसार है-

(i) भूमि को वर्षाजल के प्रभाव से बचाना,
(ii) जल-बहाव को अत्यन्त संकरे पथ से नीचे की ओर जाने से रोकना एवं उसकी गति कम करना,
(iii) भूजल की मात्रा बढ़ाने के प्रयास,
(iv) भूमि-कणों के आकार बढ़ाने वाले उपाय करना,
(v) मैदानों में पेड़-पौधे लगाकर हवा, आँधी की गति को कम करना,
(vi) स्थान-स्थान पट्टियों के रूप में ऐसी वनस्पति उगाना जो बहते भूमि (मृदा) कणों को पकड़कर रोक लें।

मृदा संरक्षण के उपाय - (Methods of soil conservations)


उपरोक्त लिखित सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुए मृदा-संरक्षण के उपायों को निम्न श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं-

(i) जैविक विधियाँ इसके अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की कृषि-प्रणालियों का उपयोग होता है। उदाहरण के लिये कंटूर खेती, पलवारना या मल्चिंग, फसल-चक्र, सूखी खेती आदि विभिन्न कृषि-प्रणालियाँ हैं।

(ii) यांत्रिक-विधियाँ कृषि योग्य भूमि में जल संग्रहण हेतु बेसिन बनाना एवं कंटूर टेरेसिंग करने से भी मृदा-संरक्षण हो सकता है।

(iii) अन्य विधियाँ वृक्षारोपण, नालियाँ बनाना, रेगिस्तानों में विशेषकर कोण पर वृक्ष लगाना (जो आँधी की गति को कम करे), मृदा-प्रदूषण को रोकने के प्रयास आदि ऐसी विधियाँ हैं जो मृदा-संरक्षण में लाभदायक हो सकती है।

पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने में मनुष्य की भूमिका - Man's role in maintaining the environment clean


पर्यावरण को प्रदूषित करने में यदि हम मानवीय गतिविधियों को ही जिम्मेदार मानते हैं तो प्रदूषित पर्यावरण के दुष्परिणामों से प्रकृति को बचाने के लिये प्रकृति संरक्षण के उपाय भी मनुष्य को ही करने होंगे। इस हेतु जल, वायु एवं मृदा प्रदूषण के कारण एवं प्रभाव के साथ पिछले पृष्ठों में उनके नियंत्रण एवं रोकथाम के उपायों पर भी चर्चा की गई है। इसी तरह अध्याय-3 में वनों का प्रबन्धन एवं प्रकृति संरक्षण के राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय प्रयासों का भी विस्तार से वितरण दिया गया है। इन सभी प्रयासों में प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं की जिम्मेदारी के अलावा उसे राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर किये जा रहे प्रयासों में भी यथाशक्ति सहायता देनी चाहिए।

साभार - जीव विज्ञान (एनसीआरटी प्रकाशन)

 

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अन्य स्रोतों से

 



 

वेबस्टर शब्दकोश ( Meaning With Webster's Online Dictionary )

हिन्दी में -
 

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