पर्यावरण संरक्षण, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है हरेला

Submitted by HindiWater on Fri, 07/16/2021 - 15:27
Source
इंडिया हिंदी वाटर पोर्टल

 पर्यावरण संरक्षण, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है हरेला,फोटो:देव चौहान

श्रावण मास में पावन पर्व हरेला उत्तराखंड में धूमधाम से मनाया जाता है। आज से इस पर्व की शुरुआत हो गई है। मानव और प्रकृति के परस्पर प्रेम को दर्शाता यह पर्व हरियाली का प्रतीक है। सावन लगने से नौ दिन पहले बोई जाने वाली हरियाली को दसवें दिन काटा जाता है और इसी दिन इस पावन पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

2016 के बाद से कुमाऊं के सांस्कृतिक हरेला पर्व को प्रदेश में एक व्यापक स्तर के पौधरोपण अभियान का रूप दिया गया और लोगों ने भी इस पहल को हाथों-हाथ लिया और अब हरेला एक तरह से प्रदेश में सामाजिक स्तर पर व्यापक पौधारोपण अभियान का पर्याय बन गया है।

हरेला पर्व सौरमास श्रावण के प्रथम दिन यानि कर्क संक्रान्ति को मनाया जाता है।परम्परानुसार पर्व से नौ अथवा दस दिन पूर्व पत्तों से बने दोने या रिंगाल की टोकरियों में हरेला बोया जाता है। जिसमें उपलब्धतानुसार पाँच, सात अथवा नौ प्रकार के धान्य यथा- धान, मक्का, तिल, उड़द, गहत, भट्ट, जौं व सरसों के बीजों को बोया जाता है। देवस्थान में इन टोकरियों को रखने के उपरान्त रोजाना इन्हें जल के छींटों से सींचा जाता है। दो-तीन दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरेले तक सात-आठ इंच लम्बे तृण का आकार पा लेते हैं।

हरेला पर्व की पूर्व सन्ध्या पर इन तृणों की लकड़ी की पतली टहनी से गुड़ाई करने के बाद इनका विधिवत पूजन किया जाता है। कुछ स्थानों में इस दिन चिकनी मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश-कार्तिकेय के डिकारे (मूर्त्तियाँ) बनाने का भी रिवाज है। इन अलंकृत डिकारों को भी हरेले की टोकरियों के साथ रखकर पूजा जाता है।

हरेला पर्व के दिन देवस्थान में विधि-विधान के साथ टोकरियों में उगे हरेले के तृणों को काटा जाता है। इसके बाद घर-परिवार की महिलाएँ अपने दोनों हाथों से हरेले के तृणों को दोनों पाँव, घुटनों व कन्धों से स्पर्श कराते हुए और आशीर्वाद युक्त शब्दों के साथ बारी-बारी से घर के सदस्यों के सिर पर रखती हैं।

इस दिन लोग विविध पहाड़ी पकवान बनाकर एक दूसरे के यहाँ बाँटा जाता है। गाँव में इस दिन अनिवार्य रूप से लोग फलदार या अन्य कृषिपयोगी पेड़ों का रोपण करने की परम्परा है। लोक-मान्यता है कि इस दिन पेड़ की टहनी मात्र के रोपण से ही उसमें जीवन पनप जाता है।

ही अब सवाल ये भी है कि जितना जोश पूरा प्रदेश वृक्षारोपण को लेकर हरेला पर्व पर दिखाता है अगर इसका एक फीसदी प्रयास भी साल में प्रदेशवासी दो से 4 बार करते तो शायद आज जंगलो की स्तिथि पहले से बेहतर होती हाल ही में इस पर्व पर राजकीय अवकाश घोषित किया गया जबकी पहले इस अवसर पर कोई राजकीय अवकाश नही हुआ करता था ।

वही इस दिन वृक्षारोपण को बेहद अहमियत दी जाती है लेकिन मुसीबत ये है कि व्यापक स्तर पर पौधारोपण होने के बावजूद प्रदेश को इसका फायदा बेहद कम मिल रहा है। कारण ये है कि रोपे गए पौधों की मृत्यु दर अधिक है। यह प्रदेश सरकार के लिए भी चिंता का सबब है वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक कुल मिला कर यह तय है कि लोगों की ओर से रोपे जा रहे पौंधों का सरवाइवल रेट बहुत ही कम है