रंगा का जंगल: नदियों के पुनर्जीवन का प्रकाश स्तंभ

Submitted by HindiWater on Mon, 09/28/2020 - 12:01

मध्यप्रदेश के जबलपुर में नर्मदा और नरई नदी  के संगम के आसपास के 3 गांवों में जमीन पर सीना ताने खड़ा करीब 10 लाख वृक्षों का बना निजी जंगल नदियों को फिर से जिंदा करने की सरकारों की योजना का लाइट हाउस बन सकता है। जंगल की इस पाठशाला के टीचर जी हैं नरसिंह रंगा। यह पूरे देश में अपनी तरह की अनूठी मिसालों में से एक है।

सरकारें कलेक्टरों को परिपत्र जारी कर कहती रही है कि वह अपने जिले की नदियों को पुन: जिंदा करें। सभी जानते हैं कि नदियां रातों-रात पुन: जिंदा नहीं हो सकती। मैदानी अमले के पास ना तो इस तरह का अनुभव है और ना ही कार्य योजना के स्पष्ट बिंदु। ऐसे में मध्यप्रदेश के जबलपुर के पास 20 किलोमीटर दूर नर्मदा और नरई नदी के किनारे देवरी, बसनिया और पिपरी कला के गांव की लगभग 900 एकड़ जमीन पर तैयार सागवान और अन्य प्रजातियों का घना जंगल एक मॉडल बन सकता है। नर्मदा नदी के किनारे लगभग 10 किलोमीटर दूर तक हरियाली पट्टी नजर आती है। जबकि सामने वाले किनारे पर गर्मी के दिनों में रेगिस्तान जैसा और वर्षा के दिनों में मिट्टी कटाव का नजारा आसानी से देखा जा सकता है। इस जंगल से प्रतिवर्ष लाखों टन नदियों में बह जाने वाली काली मिट्टी पर रोक लगी है। पेड़-पौधे और घास का फैला विशाल साम्राज्य यहां आने वाली वर्षा जल की बूंदों को सहेज कर रख लेता है। भरी गर्मी में नदी जिंदा रहने की मिसाल कुछ यूं देखी जा सकती है कि जहां-जहां नरसिंह रंगा का जंगल है उस पूरे क्षेत्र में नरई नदी में पानी बहता रहता है।

मिट्टी, जंगल, पानी और नदी प्रबंधन की यह स्टोरी दिलचस्प है। नरसिंह रंगा सुनाते हैं- मूलत: राजस्थानी होने के कारण हम पानी और पेड़ का मोल समझते हैं। नर्मदा जी से शुरू से ही अनुराग रहा है। 28 साल पहले सोचा, नर्मदा संरक्षण के लिए हम क्या कर सकते हैं। सबसे पहले 50 एकड़ की यह बीहड़ और बंजर जमीन ली जिस पर खेती संभव नहीं थी। जो सुनता मेरी हंसी उड़ाता। लेकिन कुछ वन अफसरों की दोस्त टीम ने मेरा साथ दिया और मैंने पूरी मेहनत लगा दी। 50 एकड़ से शुरू जंगल 900 एकड़ तक में फैल चुका है। अभी भी जंगल में पौधारोपण का सिलसिला जारी है।

इस बंजर बीहड़ को जंगल में बदलने की ‘आत्मा’ है- हजारों की संख्या में पत्थरों का बंधान बना कर मिट्टी और पानी को इलाके से बाहर जाने से रोकना। जमीन में नमी और मिट्टी रहने से पौधों को विशाल वृक्ष में तब्दील होने के लिए अवसर अनुकूल होते रहे। श्रीरंगा कहते हैं- इस जंगल को तैयार करने में कई अवरोध सामने आते हैं। रेत माफियाओं के विरोध का भी हम सामना करते हैं। लेकिन नर्मदा के प्रति आस्था व हमारे कार्य में दृढ़ संकल्प हो तो कार्य संपन्न होते जाते हैं।

सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है इसलिए प्राय: अवैध कटाई की किसी की हिम्मत नहीं होती है। यहां देहरादून से प्रशिक्षु आईएफएस अफसर भी ट्रेनिंग लेने आते हैं। भारतीय वन प्रबंधन संस्थान की टीम से लेकर तो भारत के वन महानिरीक्षक तथा पर्यावरणविद् और भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्री रहे स्व. अनिल माधव दवे भी इस जंगल का अवलोकन कर चुके हैं। मध्यप्रदेश के तत्कालीन वन मंत्री सरताजसिंह तो इस जंगल को देखकर अवाक रह गए थे। देश-दुनिया के कई जल और वनस्पति वैज्ञानिक भी यहां आते रहते हैं। रंगा कहते हैं- हम स्वयं स्कूली बच्चों की ट्रिप भी आयोजित करवाते हैं ताकि वह अभी से समग्र पर्यावरण को मौके पर समझ सके।

रंगा के सरकार को सुझाव

- मध्य प्रदेश झाडिय़ों, नदी, नालों का प्रदेश रहा है। इसके मूल स्वरूप को लौटाने के लिए सरकार को वन कानूनों का सरलीकरण करना चाहिए। फिलहाल कड़े नियमों के चलते सागवान व इसी तरह की अन्य प्रजातियों के वृक्ष लगाने से किसान बचते हैं। उनके कटाई व विक्रय के पुराने सरकारी कानून इसकी वजह है।

- रेगिस्तानी प्रदेश राजस्थान में 3000 करोड़ का काष्ठ शिल्प का कारोबार है। प्रदेश सरकार नए सिरे से सोचे तो मध्य प्रदेश का आर्थिक परिदृश्य बदल सकता है।

- निजी क्षेत्र में जनता के सहयोग से प्राकृतिक वनों की कटाई को काफी हद तक रोका जा सकता है।

- प्रदेश के लाखों किसान नदी किनारे पर इसे अमल में लाए तो नदी जिंदा करने के परिपत्र जारी नहीं करने पड़ेंगे। नदी किनारे पड़त भूमि को सुपात्र किसानों को सौंप देना चाहिए ताकि वे नदियों को हरियाली चुनरी ऊढ़ा सके।

- मिट्टी कटाव रुकेगा पानी थमेगा तो सूखा और बाढ़ का संकट खत्म होगा। बांधों की क्षमता प्रभावशाली रहेगी। गैर वनपड़त भूमि नए जंगल तैयार करने के लिए बेहतर हो सकती है।

- नियमों को शिथिल कर टेलीफोन, परिवहन, एयरलाइंस की तरह जंगलों के निजी करण पर आना चाहिए।

 

एक सफल मॉडल 

राजस्थान के जोधपुर जिले से मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में आकर बसे किसान नरसिंह रंगा ने बरगी बांध के आगे और ग्वारीघाट के बीच पडऩेवाले खण्ड में नर्मदा के उत्तरी किनारे देवरी बसनिया गांव में अपनी निजी पड़त भूमि पर लगभग 28 साल पहले यह वृक्षारोपण प्रारंभ किया था।

धीरे-धीरे उन्होंने अपने वृक्षारोपण का काफी बड़े क्षेत्र में विस्तार किया। उनके द्वारा स्वयं अपने हाथों से रोपे गए सागौन, बांस, खमेंर, और अनेक अन्य प्रजातियों के लाखों पौधे आज बड़े वृक्षों के रुप में पहुंचकर एक मानव निर्मित वन का आभास कराते हैं। नर्मदा की एक छोटी सहायिका नरई नदी के पुनर्जीवन में निरंतर योगदान देता श्री रंगा का यह वृक्षारोपण आज वानिकी के माध्यम से नदियों को नया जीवन देने का एक सफल मॉडल बन चुका है।

 

सम्मानों से नवाजे गए

इस अनुकरणीय कार्य के लिए नरसिंह रंगा को निजी वानिकी विस्तार के लिए दिया जाने वाले मध्यप्रदेश सरकार के पहले बसामन मामा पुरस्कार के लिए नवाजा जा चुका है। आपको जबलपुर रत्न की उपाधि से भी विभूषित किया जा चुका है।

 

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