रूठीं गंगा मइया

Submitted by Hindi on Tue, 12/04/2012 - 10:34
गंगा के साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा है। उसका सिर्फ जल ही नहीं बदल रहा बल्कि उससे जुड़ी तमाम चीजों में बदलाव आ रहा है।

चचरी पुलचचरी पुलगंगा रूठ गई हैं। पतित पावनी के साथ उनके पुत्रों द्वारा किया जा रहा व्यवहार इस नाराजगी का कारण है। प्रतिदिन हजारों टन कचरा डाले जाने से गंगा घाटों के पास की सतह ऊंची होती चली गई और अब गंगा ने पटना शहर से दूरी बना ली है। अधिकांश घाटों पर गंगा दो से तीन किलोमीटर दूर चली गई। घाटों के किनारे बने मंदिर सूने हो गए हैं। पुजारी रोज पूजा की रस्म तो निभाता लेकिन दिनभर बजने वाली घंटियां अब खामोश हैं। आरती के वक्त भक्तों की भीड़ नहीं जुटती।

हर-हर गंगे की गूंज भी अब त्योहारों के मौके पर ही सुनाई पड़ी है। गंगा घाटों से गंगा की बढ़ती दूरी के कारण ही प्रशासन ने छठ के दौरान चचरी पुल बनाया था जिसके टूटने से भगदड़ मची और 17 श्रद्धालुओं की जान चली गई।

बिहार सरकार भी इस संकट पर गंभीर हुई है। अब गंगा घाटों को केंद्र सरकार की मदद से संवारा जाएगा। पटना के कलेक्ट्रेट घाट से नौजर घाट तक साढ़े छह किलोमीटर तक के घाटों के सौंदर्यीकरण की योजना केंद्र को भेजी गई है। इस पर 115 करोड़ 55 लाख रुपए खर्च होंगे। बिहार सरकार इस योजना को वर्तमान वित्तीय वर्ष स्वीकृत कराने के प्रयास में जुटी है। इस योजना के तहत 17 घाटों को विकसित किया जाना है। इनमें अंटा घाट, बीएन कॉलेज घाट, अदालतगंज घाट, मिश्री घाट, टीएन बनर्जी घाट, काली घाट, बहरवा घाट, रानी घाट, घराहा घाट, चौधरी टोला घाट, पथरी घाट, हनुमान घाट, राजा घाट, भद्र घाट, महावीर घाट और नौजर घाट शामिल हैं। घाटों से गंगा के दूर चले जाने के कारण छठ व्रतियों को इस बार पटना के आधे से अधिक घाटों पर गंगा तक पहुंचने के लिए दो-तीन किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी। पटना पश्चिम के दीघा से लेकर पहलवान घाट और पटना मध्य के कलेक्ट्रेट घाट, अदालत घाट एवं अन्य घाटों पर गंगा की मुख्य धारा इतनी दूर चली गई है। वैसे दरभंगा हाउस घाट, पटना कॉलेज घाट, चौधरी टोला घाट, महेंद्रू घाट आदि पर गंगा की मुख्यधार अब भी करीब है लेकिन यहां गंदगी का अंबार लगा है। इन्हें अक्षुण्ण रखना चुनौती है।

दीघा से समाहरणालय के बीच स्थित घाटों पर दो-तीन किलोमीटर पैदल चलकर घाट तक पहुंचा जा सकता है लेकिन लोगों को समाहरणालय और अदालत घाट पर मुख्यधारा तक जाने के लिए सबसे ज्यादा परेशानी होती है क्योंकि इन दोनों घाटों पर बहते नाले को नाव से पार करना पड़ता है। दूसरा संकट यह है कि पटना गंगा के किनारे अब ऊंची इमारतों का निर्माण भी हो रहा है। गंगा बांध के उत्तर पुरानी नौ अपार्टमेंटों के अलावा भी लोग नई-नई इमारतों का निर्माण कर रहे हैं। मुख्यधारा की घाटों से बढ़ रही दूरी के कारण उससे निकलने वाली ज़मीन पर इमारतों का निर्माण किया जा रहा है। बिल्डर नगर निगम से नक्शा भी पास करा लेते हैं। कुर्जी में ही गंगा बांध के उत्तर की ओर बन रहे दो अपार्टमेंटों के अलावा भी गंगा की ज़मीन पर चहारदीवारियां खड़ी की गई हैं। यहां भी निर्माण की तैयारी है।

जिन इलाकों में इमारतों बन रही हैं वहां गंगा की मुख्यधारा थी। गंगा के पक्के घाट मौजूद हैं लेकिन धीरे-धीरे गंगा की मुख्यधारा दूर जाने की वजह से जमीन पर स्थानीय लोग खेती करने लगे। बाद में यह भूमि हस्तांतरित भी होने लगी। सुरक्षा कारणों से इन इमारतों के निर्माण पर रोक लगाई गई थी और विधान परिषद की नगर विकास समिति के समक्ष भी इस मामले को रखा गया था। समिति ने इसकी जांच का निर्देश दिया था। मामले पर विवाद चल रहा है।

पटना उच्च न्यायालय ने गंगाघाटों के जीर्णोद्धार को लेकर दोबारा निविदा निकाले जाने पर पटना के जिलाधिकारी एवं निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता से जवाब तलब किया। गंगाघाटों के निर्माण पर पहले ही 25 लाख रुपए खर्च हो चुके थे। फिर से कुल 2.48 करोड़ रुपए की योजना की निविदा निकाली गई। पर्यटन विभाग अपने मद से 2.48 करोड़ रुपए खर्च कर कटैयाघाट, त्रिवेणीघाट, गुरु गोविंद सिंह घाट का निर्माण करा रहा था। पहले चरण में 25 लाख का काम पूरा हो चुका था।

प्रदूषण भी बड़ी समस्या है। गंगा जल को निर्मल बनाए रखने में सहायक बैक्टीरियोफेज (जीवाणुभोजी) जीवाणुओं की संख्या लगातार घटने लगी है। भयावह स्थिति तो यह है कि इस पानी में बढ़ते टोटल कोलोरीफार्म बैक्टीरिया और फीकल कोलोरीफार्म बैक्टीरिया की संख्या बेहद बढ़ गई है। गंगा में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा भी न्यूनतम 5 मि.ग्राम/लीटर नहीं रह गई है। हद तो यह है कि जो बैक्टीरियोफेज नुकसानदायक बैक्टीरिया टोटल कोलोरीफॉर्म तथा फीकल कोलोरीफॉर्म को खत्म करता है कि उसकी संख्या कम होती जा रही है।

अकेले पटना शहर में प्रतिदिन 222.6 मिलियन लीटर गंदा पानी बहाया जाता है। इनमें से 160.6 मिलियन लीटर दूषित पानी बगैर ट्रीटमेंट के ही गंगा में बहाया जाता है। दरअसल, राजधानी में चार सीवेज वाटर ट्रीटमेंट प्लांट हैं, जिनकी क्षमता प्रतिदिन 109 मिलियन लीटर पानी शुद्ध करने की है लेकिन दुर्भाग्य से मात्र 62 मिलियन लीटर सीवेज ही शुद्धिकृत हो पा रहा है। जबकि शहर की महज 10 प्रतिशत आबादी ही सीवरेज सिस्टम से जुड़ी हुई है। इस सिवरेज सिस्टम से जुड़े नालों में बहने वाले मात्र 17 प्रतिशत ही गंदे पानी को ट्रीट किया जाता है। पूरे बिहार में गंगा नदी में 300 मिलियन लीटर गंगा पानी बगैर ट्रीटमेंट के ही बहा दिया जाता है। गंगा को स्वच्छ व निर्मल बनाने के लिए इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने के साथ-साथ राष्ट्रीय नदी एक्ट बनाने की मांग होती रही है लेकिन इस दिशा में काम आगे नहीं बढ़ पाया। 2009 में गंगा नेशनल रिवर बेसिन बनाया गया। इसके तहत 2600 करोड़ रुपए खर्च हुए लेकिन गंगा निर्मल नहीं बन सकी। गंगा के किनारे स्थापित करीबन 700 औद्योगिक इकाइयां एवं इसके किनारे बसी बस्तियां इसे प्रदूषित करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार हैं।

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