साफ माथे का पानी

Submitted by Hindi on Fri, 06/01/2012 - 11:32
Source
कादम्बिनी, जून 2012

आज का विज्ञान और तकनीकी की बात करने वाला नदियों से अलग-थलग पड़ा यह समाज जल-चक्र को ही नकार रहा है। इस नई सोच का मानना है कि नदियां व्यर्थ में ही पानी समुद्र में बहा रही हैं। ये लोग भूल रहे हैं कि समुद्र में पानी बहाना भी जल-चक्र का एक बड़ा हिस्सा है। नदी जोड़ परियोजना पर्यावरण भी नष्ट करेगी और भूगोल भी। नदियों को मोड़-मोड़ कर उल्टा बहाने की कोशिश की गई तो आने वाली पीढ़ियां शायद ही हमें माफ कर पाएंगी।

दृष्टि, दृष्टिकोण, दर्शन, विचार और उसकी धारा में पानी खो रहा है। पानी के अकाल से पहले माथे का अकाल हो चुका है; अच्छे कामों और विचारों का अकाल हो चुका है। नदी समाजों से खुद को जोड़ने की बजाय सरकारें समाज को नदियों से दूर करना चाहती है। आजादी से अब तक की सरकारी योजनाओं में सबसे खतरनाक और अव्यावहारिक नदी-जोड़ योजना की कोशिश हो रही है। भूगोल को कुछ लोग ‘ठीक’ करना चाहते हैं। कानून से पर्यावरण बचाना और पेड़ लगाना चाहते हैं। बड़े-बड़े बांध बांधकर लोगों की प्यास बुझाना चाहते हैं। कहना ना होगा कि ये बड़े- बड़े विचार लोगों की प्यास तो बिल्कुल नहीं बुझा पा रहे हैं। उदाहरणों के लिये इतिहास में ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। अभी पिछले साल ही मध्य प्रदेश के कई शहरों में पानी के वितरण के लिए सीआरपीएफ लगानी पड़ी। नदी की बाढ़ से ज्यादा माथे की बाढ़ दुखदायी बन गई है। पानी की रिपोर्टों की बाढ़ है। सरकारी माथों में इन्हीं रिपोर्टों की बाढ़ है। सरकारें बदहवास हैं क्या करें, कहां जाएं। साफ माथे का पानी पसीना बनकर बहता है। उससे काम चलाया जाता तो पानी के लिए पैसा बहाने की जरूरत नहीं पड़ती। पर पैसे से पानी बचा लेने का अहंकार पीछा छोड़े तब न।

सात भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों ( 7 आइआइटीज) का एक समूह बनाया गया है, जो गंगा को गंगा बनाने के लिए तकनीकी मदद के साथ बजटिंग और मॉनीटरिंग का भी काम करेगा। इन सात आइआइटीज के सहयोग से चलाई जा रही गंगा नदी बेसिन प्रबंधन योजना का संयोजन आइआइटी, कानपुर के एक प्रोफेसर साहब कर रहे हैं। उनका मानना है कि गंगा के लिए 70 हजार करोड़ दे दो हम गंगा साफ कर देंगे। अब जनाब, इतने पैसे चाहिए तो अपने संसाधनों से तो काम चलेगा नहीं, फिर ऐसे में विश्वबैंक या किसी अन्य ऐसी संस्था से कर्ज लेना तो, बनता है। पैसे से पानी बचाने की कोशिश, माफ करना भाई! कहीं पानी से पैसा बनाने की कोशिश न बन जाए। इसके लिये हमेशा अपने माथे को साफ रखकर समझाते रहना होगा कि ‘पानी का धन पानी में ही जाता है’।

सरकारें समितियां बनाने का काम बहुत जल्दी करती हैं, 18 अक्टूबर 2008 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी के नेतृत्व में एक बैठक हुई। प्रधानमंत्री ने ‘गंगा जी तो मेरी भी मां हैं’ ‘गंगा जी तो भारत की आत्मा हैं’ जैसे भाव प्रकट करते हुए गंगा के संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता जतायी। 19 अक्टूबर 2008 को बैठक के ‘मीनट्स’ जारी किए गए। उसमें गंगा के लिए एक विशेष प्राधिकरण की बात की गई थी। साथ ही ‘गंगा को राष्ट्र नदी घोषित किये जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है’।

04 नवम्बर 2008 को प्रधानमंत्री कार्यालय ने भारतीय जनमानस के गंगा के प्रति भावनात्मक जुड़ाव का सम्मान करते हुए गंगा को ‘राष्ट्रीय नदी’ घोषित करने की अधिसूचना जारी की। उसके बाद लगा कि गंगा की दशा और दिशा में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। पर यह राष्ट्रीय नदी घोषित किए जाने का पूरा ड्रामा था। क्योंकि ‘गंगा को राष्ट्र नदी घोषित किया जाना आवश्यक है’ इस वाक्य में कहीं भी गंगा राष्ट्र नदी है यह नहीं कहा गया है। राष्ट्र नदी घोषित करने के लिए गजट के साथ ही संसद से कानून भी पारित करना होगा जो कि किया नहीं गया। इसीलिए गंगा के अनादर को दंडनीय नहीं बनाया जा सका जैसा कि राष्ट्रध्वज के मामलों में होता है।

1932 में जन्में 80 वर्षीय प्रो. जीडी अग्रवाल जो अब ज्ञानस्वरूप सानंद हो चुके हैं। कई माह से कभी पानी, तो कभी निर्जल गंगा को बचाने का काम थामे हुए हैं। अपनी मांगों में वे बड़ी प्रमुखता से गंगा को ‘राष्ट्रीय नदी घोषित करने वाला सशक्त बिल’ संसद से पारित किये जाने का विचार रखते हैं।

सरकारें गंगा को राष्ट्रीय नदी वाला सशक्त बिल लाना नहीं चाहतीं। तरह-तरह के बहाने हैं या अनदेखी है, यह तो पता नहीं। पर इसके लिए वो सहर्ष तैयार तो नहीं दिखती हैं। रोज-ब-रोज पर्यावरण की नई संस्थायें खोल देने से ही पर्यावरण नहीं सुधरेगा। कानून और थाने बना देने से अपराध कम नहीं हो जाता। गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिलाने वाला सशक्त बिल गंगा को कितना लोकमानस में ले जाएगा? सोचने की जरूरत है।

गंगोत्री से निकलकर गंगा हरिद्वार, इलाहाबाद, बनारस होते हुए गंगासागर में मिल जाती है। गंगा के तटों पर एकादशी, गंगा दशहरा, कुम्भ और महाकुम्भ के अवसरों पर आने वाले लोगों की संख्या किसी राष्ट्रीय पर्व पर एक मैदान में इकट्ठा होने वाले लोगों की संख्या से ज्यादा ही होती है। जेठ के शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है। गंगा दशहरा के पर्व पर गंगा के किनारों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। गंगाजल से अपने को तृप्त कर ठीक उसके अगले दिन निर्जला एकादशी का व्रत रखते हैं। दशमी को गंगा की विशाल जलराशि से अपने को तृप्त करना, पर इस तृप्ति से संयम न टूट जाये इसलिये ठीक इसके अगले दिन निर्जला एकादशी का व्रत रखना। पर्यावरण का इतना बड़ा पाठ समाज खुद सीख जाता है। किसी कानून की जरूरत नहीं पड़ती।

कानून के जोर पर पर्यावरण की अनिवार्य शिक्षा के लिए माननीय उच्चतम न्यायालय ने शैक्षिक संस्थाओं में अध्ययन संबंधित दिशा निर्देश जारी किये हुए हैं। शैक्षिक संस्थानों ने पर्यावरण शिक्षा को अपने पाठ्यक्रम में शामिल तो कर लिया है पर असलियत में गंभीरता कम मजबूरी ज्यादा नजर आ रही है। कानून के माध्यम से पर्यावरण शिक्षा का सबक यह है कि शायद ही कहीं कोई पर्यावरण का काम हुआ हो।

पर्यावरण शिक्षा अपने इलाके से बिल्कुल कटी हुई है। 100 इंच की बारिश वाले चेरापूंजी से लेकर 8 इंच बारिश वाले जैसलमेर के लिए एक ही पर्यावरण शिक्षा है। स्थान विशेष, उसका पर्यावरण, उसकी अपनी परंपराएं, अकाल में भी जीने की कला, बाढ़ में तैरने की कला, संयम, बुजुर्गों की सीख, उनका ज्ञान, पानी और पर्यावरण की पवित्रता के प्रति आस्था और श्रद्धा यह सब पर्यावरण शिक्षा में स्थान नहीं बना पाये हैं। शिक्षा का जो वातावरण बना हुआ है उसमें पर्यावरण विषय में अच्छे नम्बर आना यह बिल्कुल सुनिश्चित नहीं करता कि पर्यावरण की अच्छी रखवाली भी हो।

पर्यावरण शिक्षा के किसी भी पाठ्यक्रम में कभी यह सवाल नहीं पूछा गया कि ‘ट्यूबवेल समाधान है कि समस्या?’। कम गहराई के ट्यूबवेल सूख गये तो उसका समाधान क्या अधिक गहराई के ट्यूबवेलों में है? अपने गांव के चापाकल के पानी में फ्लोराइड या आर्सेनिक की मात्रा बढ़ गई हो तो 20 कि.मी. दूर से पानी की सप्लाई किया जाना क्या समाधान है? भूजल में आर्सेनिक और नाइट्रेट अपने मानक से 10-100 गुने से भी ज्यादा हो चुके हों तो फिल्टर वाला पानी गांव में उपलब्ध कराना क्या समाधान है? दिल्ली में पीने के पानी की कमी हो जाए तो 300 किमी. दूर हिमाचल की गिरी नदी पर बन रहे रेणुका बांध का पानी लाकर दिल्ली को पिलाना क्या सामाधान है?

पर्यावरण शिक्षा की कोई भी किताब हमें यह नहीं बता पाती कि जिस वर्ष कम पानी बरसा है तो हमें क्या करना है। जिस वर्ष ज्यादा पानी बरसे या बाढ़ की स्थिति हो तो जीवन कैसे चलायें?

पानी-पर्यावरण पर कई पुस्तकों के कालजयी लेखक अनुपम जी बताते हैं कि राजस्थान में और खासकर मरुभूमि में एक शब्द है जमानो। जमाने से बना है। लेकिन वह दुनिया के अर्थ में नहीं है। आने वाली परिस्थिति अच्छी होगी। फसल के दिन अच्छे होंगे। इस शब्द से जमानो शब्द निकलता है। और यह बहुत ही वैज्ञानिक पद्धति थी कि पानी पूरा बरस गया। जिस देश में प्रकृति की तरफ से पानी की एक निश्चित ऋतु या समय तय है। अब उसके बाद बारिश नहीं होने वाली। तो यह एक कितना बड़ा वैज्ञानिक संगठन था समाज का कि हर गांव में सब लोग सितंबर-अक्टूबर में नवरात्रों के आसपास तालाब के पास आएंगे। वहां एक विशेष व्यक्ति तालाब की पाल पर खड़ा होकर उस तालाब में कितना पानी भरा है, यह देख कर अपने सब लोगों को बता सके कि आने वाला दौर अच्छा होगा या आने वाला जमाना खराब होगा। भोपा जी यह भविष्यवाणी करते थे। वे कोई टोटके के रूप में नहीं करते थे। जल स्तर देख कर ही करते थे। तालाब आधा भरा है कि पूरा भरा है। अपरा चल दी, चादर चल दी तो खूब पानी है। खूब पानी का मतलब है फसल भी अच्छी होगी। अब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाए वह अलग बात है। लेकिन कृषि समाज का मुख्य आधार है पानी। उसका इंतजाम हो गया तो फसल अच्छी हो जाएगी। इसलिए भोपा जी इसकी घोषणा करते थे कि जमाना कैसा होगा। आज भी ऐसे लोग बचे हैं। अलवर वगैरह में वहां जमाना देखने वाली परंपरा लोग नहीं भूले थे। भोपा जैसा संगठन नहीं है। लेकिन उनकी स्मृति में इस काम का महत्व है।

आज लोगों को लगता है कि हमारा जीवन तो विज्ञान पर, तकनीक पर है। पानी कम हो तो और गहरे उतर जाएंगे। सब जगह गुजरात, महाराष्ट्र में यही हुआ। पानी कम गिरा हो तो क्या हुआ, हमारा तो ट्यूबवैल है। तालाब तो है नहीं। तालाब से सिंचित तो कोई इलाका है नहीं। इसलिए बटन दबाएंगे, पानी निकलेगा। इस तरह दो-तीन दिन तो पानी निकला। उसके बाद नहीं निकला। इसलिए अब अन्य रूपों में भी भोपाओं को देखना चाहिए। पर नई पर्यावरण शिक्षा में इतना धीरज कहां, जो नए भोपा बना सके, ज्ञान और सम्मान दोनों दिला सके।

सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अधिवेशन में 05 जून को पर्यावरण दिवस मनाने का निर्णय किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने पहली बार तभी पर्यावरण कार्यक्रम के नाम से एक अलग विभाग खोला। हमारे देश में भी पर्यावरण से संबंधित एक मंत्रालय बनाया गया जो कि 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाता है। इस दिन सामान्यतः देश के हर हिस्से में इतनी गर्मी होती है कि वातानुकूलित (एयर-कंडिशंड) सभाकक्षों में ही पर्यावरण दिवस मनाया जा सकता है। अखबारों के लेखों में, रेडियो के उपदेशों में, टीवी के विज्ञापनों और धारावाहिकों में ही इतनी गर्मी में पेड़ लगाये जा सकते हैं और पर्यावरण दिवस मनाये जा सकते हैं। जमीन पर तो शायद ही पेड़ लगाया जाता होगा पर्यावरण दिवस के दिन। एक पुराने वन मंत्री थे। उन्होंने इस गलती को सुधारने की कोशिश की थी। उन्होंने तय किया कि बरसात के मौसम में किसी एक दिन पेड़ लगाये जायेंगे। उस दिन पेड़ लगाने से वह टिकता भी था। लेकिन उस दिन को सरकारी बाबू भूल गये। अब तो उसकी तारीख भी किसी को याद नहीं। शायद यह कोई इतनी बड़ी योजना भी नहीं थी जिसे याद रखा जाता। अब तो सिर्फ वही योजनाएं याद रहती हैं जिसमें इतने बड़े पैमाने पर पैसा लगे कि देख को कर्जा मांगना पड़े। फिर पेड़ लगाने में भला कौन सी बड़ी योजना थी। पेड़ लगाने से भला पानी का बड़ा भंडार थोड़े ही सुरक्षित होने वाला है जैसा कि नदी जोड़ योजना से होगा।

हैरानी हुई जानकर, पर यही सच है। पानी के मामले में नदियां जोड़ने की एक बड़ी बीमारी पैदा हुई है। जिन दिमागों से, जिन कार्यालयों में पर्यावरण शिक्षा की योजना उपजी वे ही अब नदी जोड़ने की योजना बना रहे हैं। देश का भूगोल इसकी इजाजत नहीं देता फिर भी पांच लाख साठ हजार करोड़ रुपये की नदी जोड़ परियोजना की तैयारियां चल रही हैं। धरती के करोड़ों सालों के इतिहास में पर्वत, पठार, मैदान और समुद्र बने। प्रकृति ने जहां जरूरत हुई वहीं नदियों को मिलाया, यह कोई दस-बीस- पचास साल की योजना नहीं बल्कि लाखों करोंड़ों सालों की सृष्टि की योजना है। कुछ पढ़ गए लोग उल्टी गंगा बहाना चाहते हैं। यमुना को साबरमती से जोड़ देना चाहते हैं, जिसमें खुद पहले ही पानी नहीं है। अकेले दिल्ली की भस्मासुरी प्यास बुझाने में असमर्थ हुई यमुना भला साबरमती में नीर कैसे बहा सकती है। यमुना को दिल्ली का दिल कहा जाता है लेकिन उस दिल ने तो खुद ही धड़कना बंद कर दिया है अब तो रेणुका बांध बनाकर दिल्ली को जलापूर्ति की तैयारी हो रही है तो फिर यमुना को साबरमती से जोड़ने का निर्णय करने में भला कौन सी समझदारी दिखाई दे रही है हमारे देश के नीति निर्माताओं को। पता नहीं ऐसी योजनाएं बनाने के पीछे कौन सा साफ माथा काम कर रहा है। नदियां जोड़ कर जिन इलाकों में (राजस्थान को छोड़कर) पानी ले जाने की बात हो रही है वे देश के सबसे ज्यादा वर्षा बहुल इलाके हैं। नदियों को जोड़ने वाला दिमाग शायद ही कभी नदियों से जुड़ा हो। गांधी जी ने ठीक कहा है कि प्रकृति सबकी जरूरत तो पूरा कर सकती है पर किसी एक के लालच के लिए भी कम है। प्रकृति पर श्रद्धा रखना एक वैज्ञानिक सोच है। यह सोच विकसित करनी होगी कि जितना प्रकृति ने दिया है उसके हिसाब से अपना जीवन चलाएं। प्रकृति ने अलग-अलग क्षेत्रों में अलग अलग लम्बाई-चौड़ाई और गहराई की नदियां बहाई हैं। उनके अपने जलचर और जल-जीवन हैं। नदी जोड़ परियोजना ‘ रिप्लम्बिंग ऑफ नेचर‘ की कोशिश है जिसकी अनुमति देश का भूगोल बिल्कुल नहीं देता है। यह काम पर्यावरण भी नष्ट करेगा और भूगोल भी। नदी जोड़ो के बजाए नदियों से जुड़ना ही टिकाउ होगा। जरूरत है साफ माथे की, नदियो की परम्पराओं, उनके समाज से जुड़ने की। नदियों को मोड़-मोड़ कर उल्टा बहाने की कोशिश की गई तो आने वाली पीढ़ियां शायद ही हमें माफ कर पाएंगी। दुनिया की चौथी बड़ी झील ‘अराल सागर’ गलत जल नीतियों की वजह से सूख चुकी है। गलत जल प्रबंधन की वजह से सूखी यह झील पर्यावरण ह्रास के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में कुख्यात हो चुकी है। अराल सागर में गिरने वाली दो नदियों (आमू और साइर) का पानी मोड़कर 1960 में नहरों को उपलब्ध करा दिया गया था। 40 साल बीतते-बीतते अराल सागर झील लगभग सूख चुकी है। जहां कभी नौकाएं चलती थीं अब वहां बड़ा रेगिस्तान पांव पसारे पड़ा है।

आज का विज्ञान और तकनीकी की बात करने वाला नदियों से अलग-थलग पड़ा यह समाज जल-चक्र के विज्ञान को ही नकार रहा है। नदियों का पानी समुद्र में न जाए इसके लिये उस पर बांध बनाकर पानी को रोकने के उपाय कर रहा है। इस नई सोच का मानना है कि नदियां ‘व्यर्थ में ही पानी समुद्र में बहा रही हैं। ‘ पर्यावरण शिक्षा के ये नए ज्ञानी भूल रहे हैं कि समुद्र में पानी बहाना भी जल चक्र का एक बड़ा हिस्सा है। जब समुद्रतटीय क्षेत्रों में भूजल बड़े पैमाने पर खारा होने लगेगा जब हमें नदी की इस भूमिका का पता चलेगा।

देश में विद्वता की कोई कमी नहीं है। एक शब्द है ‘बेदिया ढोर’। वेदों का बोझ लादे घूमने वाला। एक तरह से गधे जैसा काम है। वेदों को सिर पर या दिमाग पर लाद लेने से वेदों का जानकार हो जाना सुनिश्चित नहीं हो जाता। ये तो बोझा ले जाना ही है। माथे में, भाषा में और कर्म में ज्ञान का इस्तेमाल नहीं तो बोझा ढोने जैसा ही है। आप पर्यावरण की जागरूकता के वेदिया ढोर काफी देख सकते हैं। हमारे ‘दिवसों’ के कोरम् में यह जागरूकता का बोझा तो है। पर आचरण में और व्यवहार में नहीं है। समाज की जागरूकता की पद्धति अलग है। उससे हम अपनी पर्यावरण की चिंता का मेल कैसे कर सकते हैं। यह कभी सोच का विषय नहीं रहा। कुम्भ में इकट्ठा हुये करोड़ों लोगों के प्रति कोई श्रद्धा भाव नहीं है। नदियों के साथ-साथ पुष्पित-पल्लवित और जुड़े समाज के प्रति कोई आस्था नहीं है। परिणामतः एक नदी के दो किनारे बन चुके हैं। विपरीत ध्रुव बन चुके हैं। मिलने की संभावना कहीं दिखाई नहीं पड़ रही।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणीय मुद्दों पर लेखन का कार्य करते हैं)

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