सारे जहाँ से गन्दा

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शुक्रवार, 1-15 नवम्बर 2015
महान शायर इक़बाल आज होते तो अपनी नज्म की ऐसी दुर्गति पर सिर पीट लेते। भारत के एक पीछड़े, अर्थशास्त्रियों की भाषा में कहें तो बीमारू राज्य की राजधानी के सबसे गए गुजरे मोहल्ले का एकमात्र बौद्धिक व्यक्ति बौका अपने बाथरुम में जोर-जोर से गा रहा था :

सारे जहाँ से गन्दा
है मोहल्ला हमारा
हम सब सुअर उसके
वो सूअरबाड़ा हमारा
कूड़ा है सबसे ऊँचा
पर्वत जैसा फैला
सीवर लाइन फट कर
देती हमें फुहारा
गोदी में खेलती हैं
बदबूदार नालियाँ
कीड़े कीटाणु सब आकर
पाते यहाँ सहारा
मोहल्ला नहीं सिखाता
आपस में बैर रखना
गन्दे है हम, गन्दे है हम
सूअर हैं, सूअरबाड़ा हमारा
सारे जहाँ से गन्दा।


कालापानी में स्वच्छता कार्यक्रम होने वाला था। मुख्यमंत्री मोहल्ले की सफाई करने वाले थे। उसे लेकर तरह-तरह की चर्चा थी। कई लोगों को लग रहा था कि उनका भाग्य पलटने वाला है। अब मोहल्ले का कायाकल्प हो जाएगा। मुख्यमंत्री, वगैरह आएँगे तो मोहल्ले की समस्याओं के बारे में बात होगी। हो सकता है, सब कुछ ठीक हो जाये। उनका जीवन बदल जाये। लोगों को यह बात रोमांचित कर रही थी कि आखिर सरकार की नजर काला पानी पर पड़ ही गई नहीं तो सब भूल ही गए थे कि इस धरती पर कालापानी भी कहीं है।इसमें जिस मोहल्ले की चर्चा हो रही थी, उसका नाम था- कालापानी। हालांकि उसका मूल नाम एक समाजवादी नेता के नाम पर था, जिसका ज़िक्र सरकारी दस्तावेज़ों के अलावा शायद ही कहीं होता था। वैसे कालापानी नाम पड़ने की कोई और वजह नहीं, बस यही थी कि मोहल्ले के बीचों-बीच सात-आठ महीने कालापानी बहता रहता था यह पानी शहर के कई नालों से होकर यहाँ पहुँचता था। इसमें बरसात का पानी भी मिल जाता था। और जब तक बरसात रहती यह बेरोकटोक घरों में भी घूस जाता था। तब पूरी कॉलोनी को देखकर लगता था कि काला सागर पर छोटे-छोटे जहाज़ खड़े हो।

जब पानी सूख जाता, तब मकान की दोनों कतारों के बीच कीचड़-ही-कीचड़ दिखता था। मोहल्ले के एक हिस्से में लम्बी घास उग आती थी और तब वह क्षेत्र पशु प्रजनन केन्द्र के रूप में विकसित हो जाता था। वहाँ कुत्तों और सुअरों की कई पीढ़ियाँ पैदा हुईं। मच्छरों, मक्खियों का तो कोई हिसाब ही नहीं। पानी में रहने वाले विषहीन साँपों का भी यह डेरा था।

एक तरफ मकानों की कतार में कुछ हिस्सा खाली था, जहाँ कूड़ा जमा होते-होते एक टीले जैसा बन गया था। वहाँ भी प्रायः झाड़ियाँ उगी रहती थीं। कभी-कभार उस जगह की सफाई कर या उसे समतल कर मैदान के रूप में उसका सार्वजनिक इस्तेमाल भी होता था। काला पानी में हैजा, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ अक्सर फैली रहती थीं इस कारण मौतें होती रहती थीं।

समाजवाद के सिद्धान्त पर चलने वाली एक राज्य सरकार ने अपने चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों को सस्ती दर पर मकान उपलब्ध कराने की योजना के तहत यह छोटी-सी कॉलोनी बनवाई थी, जिसमें समाज के कमजोर वर्ग को विशेष तरजीह दी गई थी। फ्लैट के लिये एक मामूली मासिक किस्त तय की गई थी। पूरा मूल्य चुकता हो जाने पर मकान उस व्यक्ति को सौंप दिया जाना था, लेकिन बहुत से लोगों ने तो मासिक किस्त ही नहीं जमा की। फिर भी वे उसमें डटे हुए थे। कई लोग तो दुनिया छोड़ चुके थे, अब उनके बेटे उसमें रह रहे थे।

इसे जिस पार्टी की सरकार ने बनाया था, वह सत्ता से बाहर हो गई थी बाद की सरकारों की इसमें कोई रुचि न थी। शहर के लोग भी इसे भुला चुके थे। नगर निगम को भी इसकी परवाह नहीं थी। यहाँ सप्लाई का पानी आना बिल्कुल बन्द हो चुका था लोग पास के एक पाठ में लगे नल से नहाने या पीने के लिये पानी लाते थे। बिजली आती थी लेकिन बिल ना देने के कारण अधिकतर लोगों का कनेक्शन काट दिया गया था। पर उन्होंने कटिया लगाकर बिजली का इन्तजाम कर लिया था

इस कॉलोनी के फ्लैटों के रिटायर मालिकों को थोड़ी-बहुत पेंशन मिलती थी, जिनसे उनका गुजारा चलता था। उनमें से कुछ के बच्चे पढ़ लिख गए थे। दिल्ली-मुम्बई में नौकरियाँ कर रहे थे। ऐसे घरों की हालत थोड़ी अच्छी थी। वे लोग यहाँ (वीआईपी) कहे जाते थे। वे लोग अक्सर इस मोहल्ले को छोड़कर कहीं और बसने की बात किया करते थे, हालांकि जाते नहीं थे। उनमें से एक ने तो सेकेंड हैंड कार भी खरीद ली थी, जो हफ्ते में एक आध दिन कालेपानी को उड़ाती हुआ छप-छप करके चलती थी। ऐसे कुछ परिवारों को छोड़कर ज्यादातर परिवारों के बच्चे ड्रॉप्टआउट थे। किसी ने चौथी में पढ़ाई छोड़ दी तो किसी ने आठवीं में। कोई दुकान में काम करने लगा था, तो कोई पंचर बना रहा था। कई लोगों को कुछ काम नहीं मिल पा रहा था उनमें से कुछ शराब, गांजा के आदी हो गए थे या ड्रग्स लेने लगे थे।

कुछ परिवारों को छोड़कर लड़कियों की शादी 15-16 साल में ही कर दी जाती थी। हालांकि कुछ लड़कियों ने शादी करने से इनकार किया और शहर में नए खुलने वाले डिपार्टमेंटल स्टोरों में काम करने लगी थीं। वे सुबह निकलती और देर रात में आतीं। मोहल्ले के लोग उन्हें सन्देह की नजर से देखते और उनके बारे में कहानियाँ बनाते।

घर में टीवी था। लोगों ने केबल कनेक्शन ले रखे थे। महिलाएँ टीवी पर सास-बहू के सीरियल देखतीं और उस पर बहस करतीं। वे नई लड़कियों को कोसती कि वे बात नहीं सुनतीं। उनके पर लग गए हैं। वे सारे संस्कार भूल चुकी हैं।

काला पानी के लोग जब शहर में निकलते तो उन्हें अपने ऊपर शर्म आती थी। सिटी बस में, डाकघर, अस्पताल, कोर्ट या दफ्तर में जब बताते कि वे कालापानी से हैं तो लोग उन पर हँसते या मुँह घुमा लेते। कुछ तो नाक पर रूमाल रख लेते। पुलिस को जब मुस्तैदी दिखानी होती तो वह कालापानी आकर कुछ लड़कों को पकड़कर ले जाती थी।

अपने बुरे हालात से बाहर निकलने की बेचैनी हर किसी में थी, पर किसी को कुछ सूझता नहीं था कि वह करें क्या? अपने को जीवित रखना ही सब के लिये एक बड़ी चुनौती थी।

जब बौका तैयार होकर बाहर आया तो देखा कि मोहल्ले में अच्छी-खासी चहल-पहल थी। कालापानी में ऐसी रौनक वह बहुत दिनों के बाद देख रहा था यहाँ आमतौर पर लोग तभी बाहर निकलकर खड़े होते थे जब किसी की मौत होती थी या पुलिस आकर किसी को ले जाती थी। लेकिन आज मामला कुछ और था। उसने लोगों के करीब जाकर समझने की कोशिश की। काला पानी के लोग उससे बात करने से कतराते थे, इसलिये वह थोड़ी दूरी से कान लगाकर बातें सुन रहा था। वैसे मोहल्ले के बच्चों से उसकी बातचीत होती थी। वह उनसे पूछ सकता था, पर वे इस वक्त नजर नहीं आ रहे थे।

कुछ मिनटों में माजरा समझ में आ गया। कालापानी में स्वच्छता कार्यक्रम होने वाला था। मुख्यमंत्री मोहल्ले की सफाई करने वाले थे। उसे लेकर तरह-तरह की चर्चा थी। कई लोगों को लग रहा था कि उनका भाग्य पलटने वाला है। अब मोहल्ले का कायाकल्प हो जाएगा। मुख्यमंत्री, वगैरह आएँगे तो मोहल्ले की समस्याओं के बारे में बात होगी। हो सकता है, सब कुछ ठीक हो जाये। उनका जीवन बदल जाये। लोगों को यह बात रोमांचित कर रही थी कि आखिर सरकार की नजर काला पानी पर पड़ ही गई नहीं तो सब भूल ही गए थे कि इस धरती पर कालापानी भी कहीं है। कई लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर मुख्यमंत्री क्यों सफाई करेंगे। सफाई के लिये मंत्री जैसी हस्ती की क्या जरूरत। यह तो कोई भी कर सकता है। कुछ बच्चों और कुछ एक महिलाओं को यह लगा कि अब से रोज मुख्यमंत्री जी ही कालापानी की सफाई किया करेंगे।

अगले दिन काला पानी के लोगों ने वह देखा था जो वे कभी-कभार सपने में देखा करते थे। दो ट्रैक्टर खड़े थे, जिन पर रेत और ईंटें लदी थीं। साथ में कुछ मज़दूर भी आये थे। सड़क से लेकर मोहल्ले के बीच के टीले तक के रास्ते में कीचड़ के ऊपर रेत डाली गई फिर ईंटें बिछाई जाने लगी। लोग हैरत से सब कुछ देख रहे थे। वे सिर्फ कल्पना किया करते थे कि यहाँ का कभी सड़क हुआ करेगी। लेकिन ईंटें सड़क बनाने के लिये नहीं आईं थीं। बस एक कच्चा रास्ता बन गया जिससे बह रहा कालापानी छुप गया।कुछ समय पहले ही केन्द्र में सत्ता बदली थी फिर कुछ दिनों बाद इस राज्य में नई सरकार आई। अरसे बाद संयोग बना कि केन्द्र और राज्य में एक ही दल की सरकार हो। मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से अपनी नज़दीकी दिखाना चाहते थे सो प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान की घोषणा करते ही राज्य में इसे लागू करने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि सबसे गन्दे मोहल्ले से शुरुआत करेंगे ताकि लगे की स्वच्छता को लेकर वे गम्भीर हैं कालापानी इलाके के नए विधायक ने इसे अपने लिये अवसर के रूप में देखा। उसका नज़रिया पुराने एमएलए से अलग था। वह असल में एक बिल्डर था। उसे यह बात अटपटी लगती थी कि इतने बड़े इलाके में इतने कम लोग रहते हैं। यह तो जगह की बर्बादी है। उसके दिमाग में एक दीर्घकालिक योजना कुलबुला रही थी। वह सोचता था कि क्यों न यहाँ की ज़मीन लेकर उस पर बड़ा अपार्टमेंट खड़ा किया जाये लेकिन इसके लिये स्थानीय लोगों को विश्वास में लेना जरूरी था इसकी शुरुआत स्वच्छता अभियान से हो सकती थी। पर यह योजना बगैर सीएम को साथ लिये अमल में नहीं लाई जा सकती थी, लेकिन विधायक ने सोचा कि समय आने पर वह उन्हें बताएगा, फिलहाल तो उसने यही बताया कि उसमें दलित हिन्दू और मुसलमान ज्यादा हैं। इस पर उसकी आशा के विपरीत सीएम साहब प्रसन्न हुए। उनकी मुख मुद्रा से लगा कि काला पानी को मुख्यमंत्री जी अपने रडार पर लेना चाहते हैं। विधायक से पहले पार्टी के कार्यकर्ता कालापानी पहुँचे उन्होंने ही जाकर सबको बताया कि यहाँ क्या होना है।

मोहल्ले के (वीआईपी) कहे जाने वाले रामफल चौधरी, जामुन प्रसाद और टेनी मियाँ कुछ इस अन्दाज में हिलते हुए नजर आ रहे थे जैसे मुख्यमंत्री ने सीधे इन्हें ही फोन करके स्वच्छता अभियान के संचालन की जवाबदेही सौंपी हो। रामफल चौधरी ने बौका को देखकर कहा, ‘अरे तुम क्यों मुँह लटकाए हुए हो। पता है न मोहल्ले में मुख्यमंत्री आने वाले हैं।’

‘तो...’ बौका ने गम्भीर होकर कहा।
‘अरे, तुम्हें कोई खुशी नहीं हुई?’
‘खुशी क्यों होगी।’ बौका ने जवाब दिया।
‘यह बहुत बड़ी बात है कि यहाँ चीफ मिनिस्टर आएँगे। और झाड़ू से खुद सफाई करेंगे।’
‘उसके बाद?’ बौका ने निर्विकार भाव से पूछा।
चौधरी जी थोड़ा सकपकाए। उन्हें तुरन्त इसका जवाब नहीं सूझा। उन्होंने एक क्षण रुककर कहा ‘उसके बाद हो सकता है भाषण दें।’

‘फिर उसके बाद?’
‘उसके बाद क्या चले जाएँगे।’
‘उसके बाद?’

चौधरी जी इस बार झुंझलाए, ‘अरे तुम भी न।’ वह यह कहकर चले गए। बौका उन्हें देखता रह गया। उसके ऐसे ही सवालों के कारण लोग उससे बचते थे। वह अक्सर विचित्र प्रश्न उठा देता या लोगों का उत्साह के गुब्बारे में पिन मार देता। लोग हैरत में पड़ जाते थे कि वह क्या चीज है वैसे तो बौका मुँह बनाए रहता, लेकिन गानों की मजेदार पैरोडी बनाता जिन पर खूब हँसी आती। उसका ‘सारे जहाँ से गन्दा’ काफी पॉपुलर हो गया था। बच्चे तो उसे गाते ही, बुजुर्ग भी अकेले में उसे गुनगुनाने लगते। एक आध बार तो शादी में भी औरतों ने यह गाना गाया पुरानी पीढ़ी की कई औरतों ने इसे बौका के मौलिक गीत के रूप में स्वीकार किया था। उन्हें क्या पता कि इकबाल नामक महान शायर ने हिन्दुस्तान की प्रशंसा में इस जैसी कोई नज्म लिख रखी है।

बौका का मतलब स्थानीय भाषा में गूंगा और बेवकूफ़ दोनों होता था उसे यह नाम इसलिये मिला कि उसने देर से बोलना शुरू किया। वह दफ्तरी रामलाल का बेटा था। पढ़ने में वह शुरू से अव्वल था, लेकिन रामलाल को तीन-तीन बेटियाँ ब्याहनी थी, सो वह अपने बेटे की पढ़ाई के लिये कुछ खास नहीं कर पाये। उन्हें कई लोगों ने समझाया था कि बौका अगर प्राइवेट स्कूल में पढ़े तो बहुत बड़ा आदमी बन सकता है। पर एक दफ्तरी के लिये अपने बच्चे को पब्लिक स्कूल में पढ़ाना औकात से बाहर की चीज थी। उनकी दलील थी कि बौका की किस्मत में बड़ा आदमी बनना होगा तो वह गरीबी में भी बन जाएगा। खैर बौका ने तमाम विघ्न बाधाओं के बीच सरकारी स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई की और ग्रैजुएट हो गया राज्य की नौकरियों की कई लिखित परीक्षा उसने पास की, लेकिन इंटरव्यू में वह फेल हो जाता था क्योंकि साक्षात्कार लेने से पहले डेढ़-दो लाख की माँग कर दी जाती थी, जिसे जुटाना उसके लिये असम्भव था। मजबूरन वह एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाने लगा था। जब वह सचिवालय के सामने से होकर गुजरता और तेजी से बैग लिये किसी बाबू को बड़े से गेट में घूसते देखता तो वह सोचता कि इसकी जगह वह हो सकता था। जब वह किसी काम से सरकारी हाईस्कूल जाता और वहाँ चल रही किसी कक्षा में झाकता तो उसे लगते कि सामने खड़े मास्टर साहब की जगह उसे होना चाहिए था। इसी तरह कई बार रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर की सीट पर या बैंक में मैनेजर की कुर्सी पर वह खुद को देखता और फिर परेशान हो जाता।

ऐसे समय में वह अपनी कोई पैरोडी गुनगुनाने लगता। अब भी उसने यही किया। गुनगुनाने लगा, ‘सारे जहाँ से गन्दा...’ वह मोहल्ले से निकलने ही वाला था कि देखा कि एक बड़ी सी एसयूवी गाड़ी चली आ रही है। वह पलटा। गाड़ी ने रुकते-रुकते एक हल्की सी फुहार पास खड़े लोगों पर छोड़ी। लेकिन उसकी परवाह किये बगैर लोग गाड़ी को घेरकर खड़े हो गए। उसमें से विधायक बाहर आया। उसे देखकर मोहल्ले के वीआईपी तेजी से दौड़े। बाकी लोग थोड़ी दूर से ही सब कुछ देख रहे थे। विधायक के साथ गाड़ी में उसके वही चमचे थे जो पहले एक बार आ चुके थे। उनमें से एक ने मोहल्ले वालों से कहा, ‘ये हैं माननीय विधायक श्री।’ विधायक ने गाड़ी से उतरते ही भाषण देने लगा जैसे वह उसकी रिहर्सल करके आया हो, ‘कालापानी के भाई-बहनों, आप सबको जानकर खुशी होगी कि आपके मोहल्ले में अगले हफ्ते स्वच्छता का कार्यक्रम होगा। माननीय मुख्यमंत्री जी खुद आकर सफाई की शुरुआत करेंगे। आप सबको उस दिन सफाई करनी होगी और यह वचन लेना होगा कि आप मोहल्ले को कभी गन्दा नहीं होने देंगे हमेशा साफ-सुथरा रखेंगे...’किसी ने जोर से कहा, ‘यह हम सबके बस का नहीं है।’ सबने चौंककर देखा। यह बौका की आवाज़ थी। लोगों को आश्चर्य हुआ। अरे, बौका बोलता भी है ज्यादातर लोगों ने अब तक उसे ‘हाँ हूँ’ कहते या गाना गाते सुना था। पर इस तरह से।

विधायक ने भी उस ओर देखा जहाँ, बौका खड़ा था। बौका थोड़ा आगे आकर बोला, ‘आपको क्या लगता है कि हम लोग जानबूझकर गन्दे रहते हैं। हमें शौक है गन्दगी के बीच रहने का? हम चाह कर भी साफ नहीं रह सकते। हमारा मोहल्ला साथ नहीं रह सकता।’

इस बार विधायक के साथ आये उसके एक चमचे ने जोर से कहा ‘क्यों नहीं रह सकता?’ बौका ने उसी के अन्दाज में जवाब दिया, ‘क्योंकि यह कालापानी है। इस पर किसी की नजर ही नहीं जाती शहर के कई पुराने नाले यहाँ आकर खत्म हो जाते हैं। इन नालों का पानी जिस नहर में जाकर मिलता था, वह भी दी गई है। उस पर बिल्डरों ने डिलाइट कॉलोनी खड़ी कर दी है, जहाँ शहर के बड़े-बड़े लोग रहते हैं हमारे चारों ओर के छोटे बड़े वालों की कभी सफाई नहीं होती। उनमें पॉलीथिन जमा हो रहा है। जगह-जगह बन रही नई कॉलोनीयों की रेत और सीमेंट उनमें जम रही हैं। नगर निगम के सफाई कर्मचारी हमारे मोहल्ले के ठीक 50 मीटर दूर तक आते हैं और चले जाते हैं। कई बार तो न जाने रात के अन्धेरे में कई ट्रैक्टर आते हैं। यहाँ बीच सड़क पर कूड़ा डालकर चले जाते हैं। हमारा मोहल्ला कूड़ेदान है इस शहर का कालापानी में मुश्किल से डेढ़-दो सौ लोग रहते हैं। क्या वह कर लेंगे इतनी सफाई। किसके पास समय है। सबको काम करना है। रोटी कमानी है। हम तो मजबूरी में यहाँ रहते हैं। गन्दगी से यहाँ बीमारी फैलती है। डेंगू, मलेरिया से हर महीने कोई-ना-कोई मर जाता है यहाँ। आप कहते हैं कि हम सफाई करें।’

चारों और सन्नाटा पसर गया था। लोग हतप्रभ बौका को देख रहे थे। विधायक ने स्थिति को सम्भालने की कोशिश करते हुए कहा, ‘आप एकदम सही कर रहे हैं मेरे भाई। यह सब पिछली सरकारों की लापरवाही का नतीजा है लेकिन अब यह सब नहीं चलेगा हमारी सरकार ग़रीबों की सरकार है, दबे कुचलों की सरकार है हम यह अन्याय अब और नहीं होने देंगे। स्वच्छता अभियान के साथ आप सबकी हर समस्या का निपटारा हो जाएगा।’ यह कहकर विधायक बौका के पास आया और उसकी पीठ ठोंकी। लेकिन मौका के चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह हमेशा की तरह कहीं खोया सा लग रहा था। पर मोहल्ले के नौजवान उसे अपने नायक की तरह देख रहे थे। चौधरी जी और दूसरे वीआईपी मन-ही-मन पछता रहे थे कि ये बातें उन्होंने क्यों नहीं कही। वह बेकार ही डर रहे थे। विधायक आदमी ही तो है, खा थोड़े जाता।

तभी चौधरी जी ने माहौल बदलने की कोशिश की, ‘सर, आप लोगों के लिये हमारे घर पर चाय पानी की व्यवस्था है। आइए ना चलते हैं।’ विधायक ने पहले कुछ सोचा फिर उनके साथ चल पड़ा। भीड़ का एक हिस्सा उनके पीछे चला। दूसरे वीआईपी जामुन प्रसाद, टेनी मियाँ भी साथ में चले। उन्हें लग रहा था कि वे मात खा गए हैं वह विधायक के सामने चाय पानी का प्रस्ताव रखने में चुक गए। पर उन्होंने विधायक को छोड़ा नहीं। साथ-साथ लगे रहे। पर बौका किधर गया किसी को समझ में नहीं आया।

बार-बार वही समस्या रही थी। हर बच्चे की जुबान पर सारे जहाँ से गन्दा चढ़ा हुआ था। ज्योंही ‘सारे जहाँ से’ की शुरुआत होती सब उसके आगे गन्दा बोलते बड़ी मुश्किल से तीनों वीआईपी ने बच्चों की जुबान से पैरोडी को हटाया। दो दिन बाद विधायक रिहर्सल देखने पहुँचा तीनों वीआईपी भी वहाँ उपस्थित थे। उनकी साँस अटकी पड़ी थी कि बच्चे कोई गड़बड़ ना कर दें। लेकिन विधायक के इशारा करते ही बच्चों ने ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा’ का बेहतरीन गायन किया।रामफल चौधरी के घर पर विधायक अपने चमचों के साथ बैठा वहाँ उसने एक बार चारों और नजरें घुमाकर देखा कि कहीं बौका तो यहाँ भी नहीं पहुँचा। फिर उसने नए सिरे से भाषण दिया जिसका लब्बोलुआब यह था कि कालापानी की किस्मत बदलने वाली है। यह सरकार अब इस कॉलोनी को नया रूप देगी जिसकी शुरुआत सफाई अभियान से होने वाली है। उसने बताया कि आज से एक हफ्ते बाद कार्यक्रम होगा। मुख्यमंत्री आएँगे और 10 मिनट तक यहाँ रहेंगे। यहाँ एक छोटा-मोटा कार्यक्रम होना चाहिए। और नहीं तो यह वाला गाना होना चाहिए- ‘सारे जहाँ से अच्छा।’ यह कहकर विधायक थोड़ा गुनगुनाया फिर चुप होकर बोला, ‘बहुत बड़े कवि का लिखा हुआ है ये। मुसलमान होकर भी भारत का तारीफ किया है।’ यह कहकर विधायक ने टेनी मियाँ की तरफ देखा। इस पर एक चमचे ने कहा, ‘हाँ, भाई जी, बहुत अच्छा गाना है। सारे जहाँ से अच्छा।’

अचानक रामफल चौधरी ने उछाल कर कहा, ‘यह तो हमको पूरा याद है।’ विधायक जी ने कहा, ‘अरे तो हो जाये एक बार।’रामफल चौधरी ने गाना शुरू किया सारे जहाँ से गन्दा, है मोहल्ला हमाराहम सब सुअर इसके, यह सूअरबाड़ा हमारा।

विधायक ने अजीब सा मुँह बनाया और बोला, ‘मेरे ख्याल से तो यह गाना इस तरह नहीं है। उसके एक चमचे ने कहा, हाँ भाई जी यह कुछ दूसरे ढंग का है।’ विधायक ने कहा ‘हाँ, तो सुनाओ ना।’ चमचे ने सिर ऊपर करके यह नज्म याद करने की कोशिश की, पर उसे याद नहीं आया। विधायक उखड़ गया, ‘तुम लोग किसी काम के नहीं हो।’ एक दूसरे चमचे ने गुनगुनाया- ‘सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्तान हमारा।’ फिर वह ठहर गया। विधायक ने पूछा, ‘आगे?’ तो उसने भी हथियार डाल दिये तभी विधायक ने अपने सेल फोन से एक नम्बर मिलाया और बोलना शुरू किया, ‘हाँ, बेटी वो क्या है। सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा।’ तभी उधर से उसे जवाब मिला तो विधायक खुश होकर बोला, ‘हाँ, पता चला गया। सारे जहाँ से अच्छा ये हिन्दोस्तां हमारा। हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा।’ विधायक इसे दोहरा कर इस तरह खुश हुआ जैसे उसके चुनाव जीतने की खबर आई हो।

उसे प्रसन्न देख रामफल चौधरी, टेनी मियाँ और जामुन प्रसाद भी मुस्कुराए लेकिन अचानक विधायक सीरियस होकर उनकी ओर घूमा और बोला, ‘लेकिन आप लोग को यह सब कौन सीखा दिया? आप क्या गा रहे थे अंट-संट हम सब सुअर इसके। कहाँ से सीखे भाई आप लोग।’

उन तीनों की चेहरों की बत्ती अचानक गुल हो गई। वे स्कूल में डाँट खाते बच्चों की तरह लग रहे थे। विधायक गरजा, ‘अरे आप लोग एकदम चौपट हैं क्या जी। अरे इ गन्दा सुअरबाड़ा साला ये सब इस गाना में कहाँ से आ गया। इसीलिये आप लोगों का कुछ नहीं होता है। आप लोग का सोच गड़बड़ है। आप लोग नाला, गन्दगी से बाहर आ ही नहीं पाते। अरे ये फीलगुड का समय है। अच्छा सोचिए बड़ा सोचिए। हमारी सरकार ऊँचा सोचती है। बड़ा-बड़ा फ्लाईओवर बन रहा है। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बन रहा है। मल्टीप्लेक्स और माल बन रहा है, पार्क बन रहा है और आप लोग हैं कि नाला और गन्दगी सोच रहे हैं अच्छा सोचिएगा तभी आगे बढ़िएगा नहीं तो सड़ते रहिएगा सूअरबाड़ा में खैर कोई बात नहीं।’ तभी टेनी मियाँ ने कहा हम लोगों को असली गाना भी पता है लेकिन प्रॉब्लम है कि यहाँ सबको दूसरे ढंग से गाने का आदत पड़ गया है। विधायक थोड़ा नरम पड़ा। उसने उत्सुक होकर पूछा, ‘लेकिन क्यों?’ जामुन प्रसाद बोले, ‘वो बौका ऐसे ही गाता है।’‘कौन है बौका?’
विधायक ने आश्चर्य से पूछा? रामफल चौधरी थोड़ा सकुचाते हुए बोले, ‘वही लड़का.. जो अभी आपसे कह रहा था कि कालापानी का कभी सफाई नहीं हो सकता।’ विधायक के चेहरे का रंग बदलता उसने कहा ‘अच्छा, अच्छा मुझे तो पहले से ही सन्देह था। कौन है वो? किस पार्टी का है?’

जामुन प्रसाद ने कहा, ‘ये तो हमें पता नहीं। वो टीचर है। वही ये गाना हर समय गाता रहता है।’‘अरे अजीब आदमी हैं आप लोग। वो कुछ भी गाएगा तो आप लोग सिख लीजिएगा कल वह कहेगा कि आप लोग कुआँ में कूद जाइए तो क्या कूद जाइएगा?’ विधायक ने खिसियानी मुँह बनाकर कहा।

नहीं, नहीं हम लोग नहीं कूदेंगे।’ टेनी मियाँ बोले तीनों वीआईपी समझ नहीं पा रहे थे कि बोका के बारे में क्या स्टैंड लिया जाये?

‘वो यहाँ का नेता है?’ विधायक के इस सवाल पर भी तीनों को कुछ नहीं समझा। चौधरी जी ने कहा, ‘नहीं नहीं। वो नेता नहीं है।’

‘फिर आप लोग उसकी तरह गाना क्यों गाए?’ विधायक ने डपट कर कहा।

‘गलती हो गई। अब नहीं गाएँगे।’ जामुन प्रसाद ने कहा विधायक ने कुछ देर तीनों को ऊपर से नीचे देखा और बोला, ‘यह गाना खोज कर लाइए और मोहल्ला में जो लड़का-लड़की सुरीला गाता है उसको तैयार करवाइए। कल से रिहर्सल शुरू करवा दीजिए।’ यह कहकर विधायक अपने लाव लश्कर के साथ चला गया उसके जाते ही टेनी मियाँ ने पूछा, ‘भाई साहब, हम लोग ये गाना अब तक गलत कर रहे थे?’

‘हाँ।’ जामुन प्रसाद ने मुँह बनाकर कहा इस पर रामफल चौधरी ने कहा, ‘देखिए, अब जो हो गया सो हो गया। अब जो हो रहा है उस पर ध्यान दीजिए गाना सुधार लीजिए, तभी कालापानी में सुधार होगा। जामुन प्रसाद ने बताया कि शायद उनकी पोती की किताब में यह वाला गाना लिखा हुआ है।

अगले दिन से जामुन प्रसाद की पोती डॉली की अगुवाई में रिहर्सल शुरू हुई हालांकि पहली बार डॉली ने भी पैरोडी ही गाई। उस पर जामुन प्रसाद ने कई डांट लगाई और कहा कि असली गाना कुछ और है। वह किताब से निकालकर उसे याद करले। डॉली ने कागज पर वह गाना उतार लिया। फिर मोहल्ले के अपने कुछ दोस्तों को साथ लेकर गाने की प्रैक्टिस शुरू कर दी।

बार-बार वही समस्या रही थी। हर बच्चे की जुबान पर सारे जहाँ से गन्दा चढ़ा हुआ था। ज्योंही ‘सारे जहाँ से’ की शुरुआत होती सब उसके आगे गन्दा बोलते बड़ी मुश्किल से तीनों वीआईपी ने बच्चों की जुबान से पैरोडी को हटाया।दो दिन बाद विधायक रिहर्सल देखने पहुँचा तीनों वीआईपी भी वहाँ उपस्थित थे। उनकी साँस अटकी पड़ी थी कि बच्चे कोई गड़बड़ ना कर दें। लेकिन विधायक के इशारा करते ही बच्चों ने ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा’ का बेहतरीन गायन किया। विधायक ने प्रसन्न होकर बच्चों की पीठ ठोंकी और उन्हें एक-एक टॉफी दी। जामुन प्रसाद ने मुग्ध होकर कहा कि यह सब डॉली का कमाल है। वह स्कूल में भी संगीत में इनाम जीतती रहती है।

विधायक ने डॉली की पीठ थपथपाई और एक बार फिर गाने को कहा। बच्चे ज्योंही गाने को हुए तभी वहाँ बौका आया और सामने खड़ा हो गया। बौका डॉली को देखकर मुस्कुराया। डॉली गम्भीर बनी रही, लेकिन उसने ज्योंही गाना शुरू किया इस बार गाना बदल गया। वह गा रही थी :

सारे जहाँ से गन्दा ये मोहल्ला हमारा। और बच्चे भी उसी पटरी पर आगे बढ़े।

विधायक और तीनों वीआईपी आवाक रह गए। उन्होंने एक स्वर में डाँटा, ‘ये क्या गा रहे हो तुम लोग?’ विधायक ने इस बार धमकी के स्वर में कहा ‘अगर ये गाना फिर किसी ने गाया तो मैं प्रोग्राम कैंसिल करवा दूँगा। मुख्यमंत्री जी नहीं आएँगे यहाँ।’

जामुन प्रसाद के कमरे में सन्नाटा छा गया। तीनों वीआईपी एक दूसरे का मुँह देखने लगे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें। तभी विधायक ने विषय बदलते हुए कहा, ‘आप लोगों ने सोचा है कि कार्यक्रम कहाँ होगा? आपके मोहल्ले में तो एक कदम भी रखना मुश्किल है।’ रामफल चौधरी ने कहा, ‘यहाँ तो जो भी होता है वह उसी ऊँची जगह पर होता है।’

सड़क बनने के दौरान तीनों वीआईपी चौड़े होकर घूमते रहे बात-बात में विधायक जी का नाम आता। ऐसा लग रहा था कि स्वच्छता कार्यक्रम इन्हीं तीनों की वजह से हो रहा है लेकिन अगले दिन एक विचित्र घटना घटी। टीले के ऊपर गाने की रिहर्सल चल रही थी। ज्योंही बच्चों ने गाना शुरू किया, उसी समय बौका उधर से गुजर रहा था। बच्चे सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा गा चुके थे। लेकिन अगली लाइन में वे भटक गए। उन्होंने गाना शुरू किया, गोदी में बहती है बदबूदार नालियाँ।‘लेकिन वहाँ तो कूड़े के ढेर हैं। फिर मोहल्ले में घुसने का कोई रास्ता भी नहीं है। जो है उस पर अब भी पानी लगा है।’ यह कहकर विधायक कुछ सोचने लग गया फिर उसने कहा, चलिए ‘थोड़ा बहुत सफाई करवा देते हैं कम-से-कम मुख्यमंत्री जी घुस तो सकें और कुछ देर खड़े तो रह सकें अभी तो हालात है कि विधायक ने यह कहकर अजीब सा बनाया। तीनों वीआईपी झेंप गए।

अगले दिन काला पानी के लोगों ने वह देखा था जो वे कभी-कभार सपने में देखा करते थे। दो ट्रैक्टर खड़े थे, जिन पर रेत और ईंटें लदी थीं। साथ में कुछ मज़दूर भी आये थे। सड़क से लेकर मोहल्ले के बीच के टीले तक के रास्ते में कीचड़ के ऊपर रेत डाली गई फिर ईंटें बिछाई जाने लगी। लोग हैरत से सब कुछ देख रहे थे। वे सिर्फ कल्पना किया करते थे कि यहाँ का कभी सड़क हुआ करेगी। लेकिन ईंटें सड़क बनाने के लिये नहीं आईं थीं। बस एक कच्चा रास्ता बन गया जिससे बह रहा कालापानी छुप गया। अब सड़क से सीधे टीले तक पहुँचा जा सकता था यह भी काला पानी वालों के लिये किसी चमत्कार से कम न था। टीले से कूड़ा हटाया गया लेकिन उसे फेंकने की कोई और जगह ना मिलने के कारण मोहल्ले के दूसरे कोने में डाल दिया गया। तय हुआ कि टीले पर ही भाषण आदि होगा। और मुख्यमंत्री जी ईंट की सड़क पर झाड़ू लगाते हुए चलेंगे। इसके लिये कार्यक्रम के दिन सड़क पर सूखे पत्ते डाल दिये जाएँगे।

सड़क बनने के दौरान तीनों वीआईपी चौड़े होकर घूमते रहे बात-बात में विधायक जी का नाम आता। ऐसा लग रहा था कि स्वच्छता कार्यक्रम इन्हीं तीनों की वजह से हो रहा है लेकिन अगले दिन एक विचित्र घटना घटी। टीले के ऊपर गाने की रिहर्सल चल रही थी। ज्योंही बच्चों ने गाना शुरू किया, उसी समय बौका उधर से गुजर रहा था। बच्चे सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा गा चुके थे। लेकिन अगली लाइन में वे भटक गए। उन्होंने गाना शुरू किया, गोदी में बहती है बदबूदार नालियाँ।

टेनी मियाँ डाँटकर बच्चों को चुप कराया। बौका के जाते ही गाना फिर सुधर गया। शाम में विधायक सारी चीजों की मुआयना करने आया जामुन प्रसाद ने प्रस्ताव रखा कि वह गाने की रिहर्सल देख लें क्योंकि गाना बहुत ही शानदार तैयार हो गया है। विधायक ने कहा टीले पर ही रिहर्सल हो क्योंकि वहीं फाइनल प्रोग्राम होना है। रिहर्सल देखने पूरा मोहल्ला जमा हो गया। विधायक ने बताया कि वह सबसे पहले मुख्यमंत्री के लिये स्वागत भाषण पेश करेगा फिर बच्चे मुख्यमंत्री जी को माला पहनाएँगे। फिर विधायक यह घोषणा करेगा कि अब गाना होने वाला है। उसने सबको हिदायत दी कि सबको हँसते हुए गाना है क्योंकि सामने कैमरा होगा। यह सब बताने के बाद बच्चों से गाने को कहा गया विधायक और भीड़-भाड़ देखकर बच्चे नर्वस थे। उन्होंने पहले इधर-उधर देख फिर गाना शुरू किया : सारे जहाँ से गन्दा...

गन्दा शब्द सुनकर विधायक चिखा, ‘बन्द करो।’

अचानक रामफल चौधरी ने पलटकर भीड़ की तरफ देखा। सबसे सामने बौका खड़ा था। वह तेज कदमों से उसके पास पहुँचे और उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे लगभग खींचते हुए दूसरी तरफ ले गए।

विधायक ने झुंझला कर कहा, ‘तुम जाहिलों से मैंने बेकार ही उम्मीद की। रहने दो इसे। अब कोई गाना-वाना नहीं होगा। टेनी मियाँ और जामुन प्रसाद के चेहरे लटक गए। जामुन प्रसाद को लगा कि उनकी पोती ने इतनी मेहनत से गाना तैयार किया है सब बेकार हो जाएगा। कालापानी में उनके और परिवार की खिल्ली उड़ेगी उन्होंने घिघियाते हुए कहा, ‘एक मौका और दे दीजिए। अरे बच्चे हैं। घबरा जाते हैं। कमरे में तो सही ही गा रहे थे सब। पहली बार बाहर गा रहे हैं तो सो थोड़ा...।’

‘क्या मौका दें। परसों प्रोग्राम होना है। अब एक दिन में क्या सुधार होगा। अगर इन्होंने मुख्यमंत्री जी के सामने वह गन्दा-सन्दा बोल दिया तो मेरा तो कबाड़ा हो जाएगा। कुछ नहीं होगा फिर यहाँ।’ यह कहकर विधायक चला गया वहाँ मौजूद लोगों में खुसर-फुसर होने लगी।

तीनों वीआईपी एकांत में मिले। रामफल चौधरी ने एक बड़ा रहस्योद्धाटन किया, भाई मुझे सब समझ में आ गया।’ टेनी मियाँ ने आँखें नचाते हुए पूछा, ‘क्या?’

देखिए मैंने एक चीज गौर किया है। आप लोग भी देखे होंगे शायद।... जब, जब बौका सामने रहता है तभी गड़बड़ होता है। उसी को देखकर बच्चा लोग गाना का दूसरा रास्ता पकड़ लेता है। जब वह नहीं रहता तो ऐसा नहीं होता।

रामपाल चौधरी ने जब उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट की तो दोनों सहमत हो गए टेनी मियाँ ने कहा, ‘अगर प्रोग्राम के दिन बौका सामने खड़ा रहा तो कयामत आ जाएगी।’

‘किसी तरह बौका को रोकना होगा। जामुन प्रसाद ने कहा।

टेनी मियाँ ने से रास्ता सूझाया ‘इसका उपाय तो यही है चलकर बौका से कहा जाये कि वह उस दिन कार्यक्रम में ना आये, या आये भी तो पीछे खड़ा रहे।’

‘आपको क्या लगता है कि आप कहेंगे और वह मान लेगा।’ रामफल चौधरी ने कहा।

क्यों नहीं मानेगा। मोहल्ला के इज्जत का मामला है भाई।

अचानक जामुन प्रसाद ने उत्तेजित होकर कहा ‘इ बोका साला हेडक हो गया है। उसी के चलते विधायक हम लोगों को गरिया दे रहा है इसका कुछ परमानेंट इन्तजाम करना होगा।’

‘कैसा इन्तजाम?’ टेनी मियाँ और रामफल चौधरी ने एक साथ पूछा।

‘आइए चलिए।’ जामुन प्रसाद यह कहकर तेजी से आगे बढ़े। बाकी दोनों वीआईपी भी पीछे-पीछे चले। जामुन प्रसाद ने बहुत दिनों बाद अपनी कार निकाली। तीनों उसमें बैठकर विधायक के घर पहुँचे। कालापानी का नाम सुनते ही विधायक ने उन्हें तुरन्त मिलने के लिये बुला लिया। उसे लगा अपने मन की बात कहने का मौका आ गया है वह उन तीनों को देखकर अर्थपूर्ण तरीके से मुस्कुराया। फिर उसने कहा, हमको पता था कि एक दिन आप लोग आएँगे... आखिर आप लोग मोहल्ले का भला सोचते हैं।’ तीनों वीआईपी एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। वह कुछ कहते इससे पहले विधायक ने कहा, ‘आपके कालापानी में 75 दो मंजिला फ्लैट है। अगर सबको तोड़ दिया जाये और आठ मंजिला अपार्टमेंट बनवा दिया जाये तो कितना और फ्लैट बन जाएगा? बताइए?

तीनों वीआईपी की बोलती बन्द थी विधायक बोला, ‘लगता है आप लोग का मैथ कमजोर है। काला पानी में अपार्टमेंट बनाने पर 600 फ्लैट बनेंगे एक-एक फ्लैट की कीमत होगी कम-से-कम 15 लाख रुपए। अगर आप लोगों को एक-एक फ्लैट फ्री में दे दिया जाये तो आप लोगों को कोई दिक्कत है?

तीनों ने समझा कि विधायक ने पी रखी है इसलिये इस तरह की बातें कर रहा है। वे घबराए कि उनके आने का मकसद पूरा होगा की नहीं।

विधायक ने उनके कानों के पास अपना बड़ा सा मुँह ले जाकर कहा, ‘आप लोगों को तैयार कीजिए। किसी तरह एक बार मोहल्ला खाली करवा दीजिए। फिर हम देख लेंगे लोगों से कहेंगे कि हम उन्हें एक-एक फ्लैट देंगे। अपार्टमेंट में रिपेयरिंग के नाम पर उन लोगों को निकाला जा सकता है। आप लोगों को समझाइए। हम नोटिस तैयार करवाते हैं।’

जामुन प्रसाद को स्कीम समझ में आ गई वे समझ गए कि एमएलए उनसे चाहता क्या है। अगले ही पल रामफल चौधरी के दिमाग की बत्ती जल उठी। टेनी मियाँ के जेहन में भी घनघनाहट हुई। तीनों ने एक साथ कहा, ‘हाँ, सर। करवाइए न। बड़ा अच्छा रहेगा।’

सुबह-सुबह जब लोगों की नींद खुली तो सब कुछ रोज जैसा ही था, बल्कि कुछ ज्यादा ही शान्ति थी, छुट्टी के दिनों की तरह। दो तीन दिनों से जो कालापानी नहीं दिखाई दे रहा था, वह आज फिर अपने पूरे बहाव के साथ नजर आ रहा था कुछ ईंटें इधर-उधर बिखरी थीं। अलबत्ता टीला कुछ साफ और खाली-खाली सा दिख रहा था। खदेड़ दिये गए कुत्ते और सुअर वापस आ गए थे। लोग जब घरों से बाहर निकले तो वे एक-दूसरे को सवालिया निगाहों से देख रहे थे।विधायक ने कहा, ‘हमारा भी फायदा आप का भी फ़ायदा। लेकिन अभी इस बात को अपने तक ही रखिए। किसी को पता चल गया तो गुड़-गोबर हो जाएगा। पहले स्वच्छता अभियान सफल करवाइए।

‘उसी के लिये तो हम लोग आये हैं।’ जामुन प्रसाद ने विधायक को समझाया कि बौका इस कार्यक्रम को सफल नहीं होने देना चाहता है। इसलिये जान-बूझकर गाने के समय खड़ा हो जाता है, जिससे बच्चे गलत गाना गाने लगते हैं। कार्यक्रम के दिन भी वह वैसा ही करेगा। विधायक ने उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा कि मुझे तो पहले से ही शक था। लेकिन मैं क्या कर सकता था। अब आप लोग कह रहे हैं तो...

विधायक में तुरन्त एसपी को फोन मिलाया अगले दिन बौका अपने इंस्टीट्यूट से घर लौट रहा था, तब रास्ते में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। कोशिश यह की गई थी कि उसकी गिरफ्तारी इस तरह हो कि किसी को पता ना चले पर उसके छात्र ने देख लिया था। वह दौड़ता हुआ कालापानी आया और उस शोर मचा दिया कि बौका को पुलिस पकड़ ले गई है। शुरू में लोगों ने इस बात को गम्भीरता से नहीं लिया लेकिन जब देर रात लोगों ने बौका के घर पर ताला लटकते देखा तो उन्हें यकीन हो गया। पूरे मोहल्ले में सनसनी फैल गई। स्वच्छता अभियान की वजह से विधायक के आने-जाने से लोगों को लगा था कि प्रशासन का रवैया कालापानी के प्रति बदल रहा है। उन्हें थोड़ी उम्मीद जागने लगा थी, लेकिन बौका की गिरफ्तारी की खबर ने उनकी आशाओं को रौंद डाला। खासकर नौजवानों में बहुत ज्यादा आक्रोश था। उनमें से कुछ को शक था कि कहीं बौका के बाद अब उन्हीं का नम्बर ना हो। लेकिन वे डर नहीं रहे थे। उनके भीतर सरकार के प्रति गहरा आक्रोश भड़क रहा था। एक-एक कर सारे नौजवान बौका के घर के आगे जमा होने लगे। तभी उन्होंने देखा कि दो गाड़ियाँ वहाँ आकर रुकी। उनमें से कुछ पुलिस वाले और कुछ सादे कपड़े में अफसर जैसे दिखने वाले लोग उतरे। एक पुलिस वाले के साथ बड़ा कुत्ता भी था। वे सब टीले की तरफ बढ़ने लगे। वहाँ रुककर थोड़ी देर बाते करते रहे। उन्हें देख एक लड़के को न जाने क्या सूझा। उसने जोर से कहा- ‘बौका को रिहा करो।’ तभी अचानक जामुन प्रसाद प्रकट हुए और उस लड़के की तरफ दौड़े, ‘अरे तुम लोगों का दिमाग खराब हो गया है। क्यों उस बौका के चलते पूरे मोहल्ले के लिये आफत बुलाना चाहते हो।

तभी भीड़ में से आवाज़ आई, तो क्या हम चुप होकर तमाशा देखते रहें। वो लोग जो चाहे करे और हम मुँह पर ताला लगाए रहें। इसीलिये तो हम लोग का ये हाल है। हम अचानक चुप रहे पर अब चुप नहीं रहेंगे।’ भीड़ से एक और आवाज़ आई। अगले ही पल जोर-जोर से नारे लगने लगे :

बौका को रिहा करो,
रिहा करो, रिहा करो।

तभी एक लड़के ने कीचड़ के ऊपर जमाई गई ईंट उठाकर फेंक दी। बस फिर क्या था। वहाँ मौजूद अनेक लड़के ईंटें उठा-उठाकर इधर-उधर फेंकने लगे। वहाँ बनाया गया रास्ता बर्बाद हो गया। तीनों वीआईपी दौड़ते हुए अपने-अपने घर आये। टेनि मियाँ ने जल्दी-जल्दी अपने सामान बाँधे और अपनी पत्नी से कहा, ‘कोई मुझे खोजने आये तो कह देना मेरी खाला का इन्तकाल हो गया है। इसलिये मैं चला गया हूँ।

जामुन प्रसाद ने भी घर छोड़ते हुए अपनी बहु से कहा, ‘कोई पूछे तो कह देना कि चाचा अचानक बीमार पड़ गए सो गाँव जाना पड़ा।’

रामफल चौधरी का बहाना था कि नानी गुजर गई हैं सो जाना पड़ा।

जब वे तीनों चुपचाप मोहल्ले से चम्पत हो रहे थे, कालापानी में यह गाना गाना गूँज रहा था : सारे जहाँ से गन्दा यह मोहल्ला हमारा।

सुबह-सुबह जब लोगों की नींद खुली तो सब कुछ रोज जैसा ही था, बल्कि कुछ ज्यादा ही शान्ति थी, छुट्टी के दिनों की तरह। दो तीन दिनों से जो कालापानी नहीं दिखाई दे रहा था, वह आज फिर अपने पूरे बहाव के साथ नजर आ रहा था कुछ ईंटें इधर-उधर बिखरी थीं। अलबत्ता टीला कुछ साफ और खाली-खाली सा दिख रहा था। खदेड़ दिये गए कुत्ते और सुअर वापस आ गए थे। लोग जब घरों से बाहर निकले तो वे एक-दूसरे को सवालिया निगाहों से देख रहे थे। तभी कहीं से आवाज आई स्वच्छता अभियान टांय-टांय फिस्स। एक दूसरी आवाज़ आई सरकार डर गई बे। बौका भैया भी छुटकर आ गए। हमारा आन्दोलन सफल हुआ। इंकलाब जिन्दाबाद।

बहुत से नौजवान बाहर निकल कर टीले पर जमा हुए। वे एक-दूसरे से गले मिल रहे थे, हाथ मिला रहे थे। सब कह रहे थे कि अब जल्दी ही एक बड़ा आन्दोलन शुरू किया जाये इस मोहल्ले के सुधार के लिये। सड़क बनाने के लिये, वाटर सप्लाई नियमित करने के लिये। मकानों के रिपेयरिंग के लिये।

पूरे कालापानी में जश्न का माहौल बन गया, 3 घरों को छोड़कर। करीब शाम 3 बजे के आसपास एक घर में कुछ लोग टीवी देख रहे थे। उनमें उस घर में रहने वाले परिवार के अलावा पड़ोस के भी कुछ लोग थे। मकान मालकिन ने अचानक समाचार लगा दिया। एक खबर आते ही सबकी साँसे थम सी गईं। एक खूबसूरत एंकर ने सूचना दी शहर में स्वच्छता कार्यक्रम की शुरुआत मुख्यमंत्री ने कालापानी से इसकी शुरुआत की। इस मौके स्थानीय विधायक भी मौजूद थे।

खबर के साथ जो चित्र आ रहा था उसमें मुख्यमंत्री बड़े झाड़ू से सफाई करते दिखे लोगों ने गौर से देखा यह कार्यक्रम दरअसल कालापानी के बगल के पार्क में हो रहा था। लोगों ने उसे उस नलके से पहचाना जिससे वह पानी भर कर लाते थे। खबर में काफी सारे लोग दिख रहे थे पर एक भी काला पानी का नहीं था।

तभी कुछ टीवी दर्शक उठकर बाहर भागे और उन्होंने कुछ और जगहों पर टीवी देख रहे लोगों को इसकी सूचना दी। वह खबर सबने देखी। वे सकते में आ गए। कुछ बुजुर्गों ने उन लड़कों का मजाक उड़ाना शुरू किया, जो आन्दोलन करने की बात कर रहे थे। उनका कहना था कि बौका जरूर छुटकर आ गया है पर दूसरे लोग अब पकड़े जाएँगे। अचानक उत्सव का माहौल जैसे मातम में बदल गया। तीनों वीआईपी अगले ही दिन प्रकट हो गए। उन्हें किसी ने मोबाइल पर सब कुछ बता दिया। उन्होंने भी घूम-घूमकर बयान दिया कि सीआईडी वालों ने उन लड़कों के बारे में पता कर लिया है जिन्होंने स्वच्छता अभियान में बाधा डाली है। इसका नतीजा यह निकला कि कुछ लड़कों को उनके माँ-बाप ने जबरदस्ती अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेज दिया। वीआईपी बड़े उत्साह के साथ एक दिन विधायक के घर पहुँचे लेकिन घंटों इन्तजार के बाद उन्हें बताया गया कि एमएलए साहब कहीं चले गए हैं। दरअसल विधायक अपनी योजना को कुछ दिनों के लिये टाल देने का फैसला किया था। सरकार एक बार फिर इस मोहल्ले से दूर हो गई। धीरे-धीरे सब कुछ पहले जैसा चलने लगा। बौका की आवाज़ उसी तरह सुनाई देती- ‘सारे जहाँ से गन्दा...

लेखक - जानेमाने कवि, कथाकार और पत्रकार। प्रमुख कविता संग्रह : कागज के प्रदेश में, चुप्पी का शोर। कहानी संग्रह : बॉस की पार्टी, हीरालाल। एक उपन्यास : टूटने के बाद।

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