सोंदूर जलाशय में डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग तकनीक का उपयोग करके अवसादन का आंकलन

Submitted by HindiWater on Sat, 01/18/2020 - 12:56
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रुड़की 

सारांश

मानव समाज के निरंतर विकास के लिए बांध या जलाशय बहुत उपयोगी साबित हुए हैं। जलाशय की उपयोगिता जल को संग्रहित करने की उसकी क्षमता पर निर्भर करती है। अवसादन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें जलग्रहण क्षेत्र की मृदा क्षय होकर बहते जल के साथ जाकर बांध के डूब क्षेत्र में जम जाती है। जलाशयों की क्षमता के लिए अवसादन बहुत हानिकारक साबित हुआ है। इस के कारण जलाशयों की भंडारण क्षमता में भारी कमी के परिणामस्वरुप जलाशय का जीवन कम हो जाता है। जलाशय अवसादन को मापने के लिए कई विधियाँ विकसित हुई हैं जैसे हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण, इनफ्लो-आउटफ्लो विधि, सुदूर संवेदन विधि आदि। इनमें से सुदूर संवेदन विधि की व्यापक रुप से उपयोग किया जाता है क्योंकि यह बहुत सरल है, और इसमें बहुत कम मानव सर्वेक्षण का आवश्यकता होती है, जिससे त्रुटि की संभावना कम हो जाती है। वर्तमान अध्ययन छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित सोंदूर जलाशय में IRS-P6, LISS-III (Dadoria er al., 2017) के बहु तिथि उपग्रह डेटा का इस्तेमाल संशोधित क्षमता का अनुमान लगाने के लिए किया गया है। प्रसामान्यकृत विभेदी जल सूचकांक (NDWI) बैंड अनुपात तकनीक (BRT) औार फाॅल्स कलर कम्पोजिट (FCC) का उपयोग करके उपग्रह से प्राप्त मानचित्र से जल के क्षेत्र को अलग किया गया है। चूंकि मृत भंडारण स्तर (DSL) और पूर्ण जलाशय स्तर (FSL) पर संशोधित जल क्षेत्रफल उपलब्ध नहीं था, इसलिए इन स्तरों पर संशोधित प्रसार क्षेत्र प्राप्त करने के लिए बेस्ट फिट व्रक का उपयोग किया गया है। विश्लेषण से यह देखा गया है कि सोंदूर जलाशय में 28 वर्षो (1988-2015) के दौरान 198.1 x 106 घन मीटर की कुल क्षमता के मुकाबले 12.45 x 106 घन मीटर सकल भंडारण कम हो गयी है।

Abstract

Dams or reservoirs have proven to be very beneficial for the sustained development of human beings since its evolution. The usefulness of dam depends upon its capacity to store water. Sedimentation is a process which involves deposition of silt carried by flowing water from erosion of soil of upstream catchment area. Sedimentation has proven to be very detrimental for the capacity of dams or reservoirs. Sedimentation results in huge loss of storage capacity of dams or reservoirs thus reducing its life. Many methods have developed to measure the reservoir sedimentation like hydrographic survey, inflow- outflow approaches, remote sensing method etc. Out of these, remote sensing method is widely used as it is very simple and involves very less human survey thus reducing the chances of error. In remote  method, revised water spread area at different levels of reservoir is calculated and used for computation of loss of capacities between these levels. The present study has been carried out on  Sondur reservoirs situated in Chhattisgarh state. Multi–date satellite data of IRS-P6, LISS-III is used for Sondur dam to estimate revised capacity. The normalized difference water index (NDWI), band ratioing technique (BRT) and false color composite (FCC) along with field truth verification were used to  differentiate water pixels from rest of image.As the revised water spread at dead storage and full levels were not available, best –fit curve has been used to get revised spreads on these levels. From the analysis, it has been observed that Sondur reservoir has lost 12.45 MCM of gross storage against its total capacity of 198.1MCM during 28years(1988-2015).The average rate of sedimentation in Sondur reservoir is 8.58Ha-m per 100 sq.km. per year.

Key words: Sedimentation, NDWI, BRT, FCC, Remote Sensing.

प्रस्तावना

बारिश और हवा के कारण मिट्टी का क्षरण होता है, जिसके परिणामस्वरुप बहने वाले जल प्रवाह में तलछट की गति बढ़ जाती है। जलग्रहण क्षेत्र में क्षरण प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाले तलछट के कण होतें हैं। मृदा अपरदन, परिवहन और बाद में जमाव प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं जो जलाशय से उपयोगी भंडारण, जल की उपलब्धता, संचालन और समग्र लाभों को कम करती है। भारतीय नदियों द्वारा जलाशयों, झीलों, नदियों, खण्डों, और महासागरों में प्रतिवर्ष भारी मात्रा मे तलछट पहुंचाई जाती है। जब किसी नदी के प्रवाह को जलाशय में संग्रहित किया जाता है, तो तलछट जलाशय में जमा जाता है और इसकी क्षमता कम हो जाती है। एक जलाशय में तलछट से भरे प्रवाह के आने के बाद प्रवाह के वेग में कमी के कारण जलाशय की ऊपरी पहुंच क्षेत्र में बड़े कण पहले जम जाते हैं। बाद में महीन तलछट सामग्री आगे और जलाशय के अंतिम स्तर पर जमा हो जाती है। जल एकत्रित करने के लिए निर्मित जलाशयों में तलछट जमाव के कई प्रमुख हानिकारक प्रभाव होते हैं, जिनमें भंडारण क्षमता का नुकसान, जल विघुत उपकरणों की क्षति, तटीय अपरदन और अस्थिरता, प्रतिप्रवाह, अतिवृद्धि, तल लोचन शामिल हैं। जलाशयों में आने वाला तलछट जल की गुणवत्ता, नहरों की वाहक क्षमता, जैविक जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है। संशोधित क्षमता का आंकलन, जो कि तलछट के जमाव का सूचक है, जल की वर्तमान उपलब्धता, जलाशय संचालन में संशोध, जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी संरक्षण की आवश्यकता और तीव्रता का निर्धारण करने के लिए आवश्यक है। जलाशय के अवसादन का अनुमान लगाने के लिए हाइड्रोग्राफी सर्वेक्षण, इनफ्लो-आउटफ्लो विधि, बैथिमैट्रिक सर्वेक्षण जैसी पारंपरिक तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जो समय लेने वाली, श्रमसाध्य और जोखिमपूर्ण होती हैं। पारंपरिक तरीकों के विकल्प रुप में सुदूर संवेदन आंकड़ों के डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग का उपयोग किया जाता हैं। इस तकनीक में कम समय, श्रमशक्ति, जोखिम होता है और किफायती होती है। संशोधित क्षमता आंकलन की सुदूर संवेदन (आरएस) आधारित तकनीक अनिवार्य रूप से इस सिद्धांत पर आधारित है कि तलछट का निक्षेपण किसी भी स्तर पर फैले जल क्षेत्रफल को कम करता है, जिसे भौगोलिक सूचना प्रणाली में मल्टी.बैंड सुदूर संवेदन डेटा को इमेज प्रोसेसिंग की मदद से सीमांकित किया जा सकता है। इमेज प्रोसंसिंग और जलाशय में जलस्तर से निर्धारित संशोधित जल-प्रसार क्षेत्रों का उपयोग जल की कम मात्रा की गणना करने के लिए किया जाता है, जो अंततः इन स्तरों पर संशोधित संचयी क्षमता प्रदान करता है। इन स्तरों के बीच क्षमता में परिवर्तन और प्रतिशत के नुकसान का पता लगाने के लिए मूल क्षमता के साथ गणना की गई संशोधित क्षमताओं की तुलना से की जा सकती है। 

अवसादन अध्ययन में सुदूर संवेदन तकनीक का उपयोग 

इस अध्ययन के लिए अपनाई गई कार्यप्रणाली में उपग्रह डेटा का पूर्व-प्रसंस्करण, जल के पिक्सल की पहचान और जलाशय की क्षमता की गणना शामिल है। भारत में जलाशयों में जल स्तर मानसून (सितंबर/अक्टूबर) के अंत तक पूर्ण जलाशय स्तर के पास होने की संभावना होती है। यह धीरे धीरे जलावतलन चक्र के अंत में (मई/जून)  निचले स्तर तक कम हो जाता है। जलाशय में तलछट के जमाव के कारण विभिन्न ऊंचाई पर स्थित जल प्रसार क्षेत्र घट जाता है। (Goel et al., 2002)। सुदूर संवेदन विधि का उपयोग करते हुए जल प्रसार क्षेत्र को जलाशय के विभिन्न स्तर पर मापा जा सकता है और एक संशोधित ऊंचाई क्षमता वक्र तैयार किया जा सकता है (चित्र 1)। मूल और संशोधित ऊंचाई क्षमता वक्र की तुलना करके अवसादन द्वारा कम हुई क्षमता का आंकलन किया जा सकता है। उच्च विभेदन उपग्रह डेटा की उपलब्धता के साथ सुदूर संवेदन तकनीक द्वारा जलाशयों के क्षमता सर्वेक्षण को मान्यता और स्वीकृृति मिल रही है। उपग्रह से प्राप्त इमेजरी का विश्लेषण दृष्य या डिजिटल तकनीकों द्वारा किया जा सकता है, ताकि जल प्रसार क्षेत्र का निर्धारण किया जा सके। सुदूर संवेदन आंकड़ों के डिजिटल इमेज प्रोसेंसिंग द्वारा जलाशयों के विभिन्न स्तरों पर संशोधित जल प्रसार क्षेत्र के निर्धारण द्वारा जलाशय में क्षमता की कमी का पता लगाया जा सकता है। दो लगातार स्तरों के बीच जलाशय की क्षमता को प्रिज्माभीय सूत्र का उपयोग करके गणना की जाती है और एक संशोधित ऊंचाई क्षमता तालिका उत्पन्न की जाती है (Vishwakarma et al., 2015)। संशोधित और मूल ऊंचाई क्षमता तालिकाओं की तुलना जलाशय के विभिन्न क्षेत्रों में अवसादन के कारण क्षमता में हुई कमी को दर्शाता है। 

चित्र 1 - डिजिटल वर्गीकरण तकनीक में तलछट के मूल्यांकन का सिद्धांत

सोंदूर जलाशय

सोंदूर जलाशय छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित है और वर्ष 1988 में इसका संचालन शुरू किया गया था। सोंदूर नदी पर जलाशय क्षेत्र के साथ 169.54 Mm3 की सकल भंडारण क्षमता वाले बांध की लंबाई 3130 मीटर है। यह बांध महानदी जलाशय परियोजना परिसर के तहत दुधवा और रविशंकर जलाशय में आपूर्ति बढ़ाने के अलावा धमतरी जिले की नगरी तहसील में 12260 हेक्टेयर में खरीफ फसल की सिंचाई के लिए बनाया गया था।

चित्र 2 (a) सोंदूर जलाशय की स्थिति

 

चित्र 2 (b) सोंदूर जलाशय का चित्रात्मक दृश्य

डेटा की उपलब्धता

इस अध्ययन में भारतीय उपग्रह के IRS LISS IIIdk  उपयोग किया गया था और इसके सामायिक रेसोलुशन और दृश्य की गुणवत्ता के आधार पर उपग्रह के निकलने की (Pass) की अलग अलग तारीख राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र (NRSC) की वेब साइट से प्राप्त की गई थी। जलाशय के स्तर और गुणवत्ता के आधार पर सोंदूर (तालिका-1) के लिए मार्ग 101 और पंक्ति 57 का चयन किया गया। ये चयनित डेटा NRSCIs खरीदे गए और विश्लेषण में उपयोग किए गए थे, सोंदूर जलाशय का क्षेत्र IRS P6 एवं RS2 उपग्रहों के लिए मार्ग 101 एवं पंक्ति 57 प्रस्तावित है। आयात करने के बाद सभी छवियों को टाॅपो शीट/मैप्स की मदद से भू-संदर्भित किया गया, ताकि उन्हें एक दूसरे के ऊपर रखा जा सके और अक्षांश और देशांतर के साथ जोड़ा जाकर भौगोलिक क्षेत्र भी निर्धारित किया जा सके। भू-संदर्भित के बाद जलाशय और उसके आसपास के जल प्रसार क्षेत्र को कवर करने के लिए सभी छवियों को छोटे आकार में काटा जा सकता है।

जल पिक्सेल की पहचान

सूदूर संवेदन डिजिटल चुंबकीय प्रकारों के रूप में और विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के विभिन्न बैंड में भूमि संसाधन डेटा प्रदान करता है। पृथ्वी पर उपस्थित किसी भी सामग्री के लिए सौर विकिरण की मात्रा जिसे वह प्रतिबिंबित करता है, अवशोषित करता है, प्रसारित करता है या उत्सर्जन करता है, तरंग दैर्ध्य के साथ बदलता रहता है। पदार्थ का यह महत्वपूर्ण गुण विभिन्न पदार्थों या वर्गों की पहचान करना और उन्हे उनके व्यक्तिगत वर्णक्रमीय हस्ताक्षर द्वारा अलग करना संभव बनाती है। स्पेक्ट्रम के दृश्य क्षेत्र (0.4 - 0.7 माइक्रोन) में, जल का संचारण महत्वपूर्ण है और अवशोषण और परावर्तन कम होता है। दृश्य क्षेत्र में जल का प्रतिबिंब 5 % से अधिक बढ़ता हैं। पृथ्वी पर मौजूद विभिन्न वस्तुओं का परावर्तन भिन्न होता है और यह परावर्तन उपग्रह पर लगे सेंसर द्वारा डिजिटल प्रारूप में दर्ज होता है। सेंसर से प्राप्त डिजिटल डेटा का उपयोग विभिन्न स्तरों पर जल के फैलाव को निकालने के लिए किया जा सकता है। छवियों में जल के पिक्सल की पहचान करने के लिए प्रसमान्यकृत विभेदी जल सूचकांक (NDWI) बैंड अनुपात (BR) और स्लाइसिंग का उपयोग किया गया है। जल के पिक्सेल की पहचान के लिए NDWI और बैंड अनुपात (BR) को इस प्रकार लिखा जा सकता है (Jaiswal et al., 2009)

NWDI और बैंड अनुपात छवियों का स्लाइसिंग ऑपरेशन बाकी छवि से जल के पिक्सल को अलग करने के लिए किया जाता है। स्लाइसिंग ऑपरेशन में एफसीसीए, एनडीडब्लूआई और बीआर छवियों की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए, जहां वर्णक्रमीय विशेषताओं और जमीनी सच्चाई की जानकारी जल क्षेत्र वर्गीकरण की ऊपरी सीमा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसके ऊपर सभी पिक्सेल को जल के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

विस्तारित पृष्ठ भाग और चैनल का निर्वहन

जलाशय की पृष्ठ भाग के अंत में मुख्य नदी और इसकी परिधि के आसपास अलग अलग दिशाओं से जलाशय में शामिल होने वाले कई छोटे चैनलों को भी डिजिटल छवि वर्गीकरण के दौरान जल के रूप में वर्गीकृत हो जाता है। हालांकि इन चैनलों और मुख्य नदी में जल की ऊंचाई बारहमासी धाराओं के प्रवाह से प्राप्त होने वाले जलाशय की जल की सतह से थोड़ी अधिक हो सकती है। तो, इन विस्तारित पृष्ठ भाग और चैनलों को प्रसार की समाप्ति के बिंदु से अलग किया जाना चाहिए। ट्रंकेशन बिंदु का निर्धारण व्यक्तिपरक है और इसके लिए वैज्ञानिक समझ आवश्यक है।

संशोधित क्षमता की गणना

इस विधि में पूरे दृश्य से जल क्षेत्र को निकालने के बाद हिस्टोग्राम्स द्वारा सीधे संशोधित जल प्रसार को निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि जलाशय में जल स्तर मृत भंडारण स्तर (डीएसएल) से नीचे नहीं जाता है, वर्तमान अध्ययन में संशोधित जल प्रसार और जलाशय स्तरों के बीच एक वक्र तैयार किया गया है। जलाशय के संशोधित तल का निर्धारण करने के लिए एकफिट वक्र को और पीछे की और बढ़ाया गया था। प्रिज्माभीय सूत्र का उपयोग करके लगातार दो जलाशयों की ऊंचाई के बीच जलाशय क्षमता की गणना की गई थी। 

जहां, V दो अनुक्रमिक ऊंचाई के बीच की मात्रा हैए। A1 और Aअनुक्रमिक ऊंचाई पर जल के फैलने वाले क्षेत्र हैं और ऊंचाई में अंतर है। संशोधित संचयी क्षमताओं को अंतराल के बीच संशोधित संस्करणों को जोड़कर गणना की जा सकती है, जो जल संग्रहण क्षमताओं में नुकसान का अनुमान लगाने के लिए उपयोग किया जाता है।

सोंदूर जलाशय सोंदूर जलाशय के मामले में लाइव स्टोरेज जोन को कवर करने वाले आठ अस्थायी रूप से विविध दृश्यों का विश्लेषण किया गया और संशोधित जल प्रसार की गणना की गई। सोंदूर जलाशय के लिए कुछ तारीखों के अलग अलग स्तरों पर FCC (Mukherjee et al.), NDWI और निकाला गया जल प्रसार चित्र-3 में प्रस्तुत किया गया है। संशोधित जल प्रसार और जलाशय के स्तर के बीच एक बिखरा वक्र तैयार किया गया है और सबसे फिट वक्र को पीछे और आगे बढ़ाया गया है। FSLesa संशोधित पानी का पता लगाकर मूल क्षमता तालिका में दिए गए 447.07 मीटर के वास्तविक तल की तुलना में विश्लेषण से यह पाया गया है कि सकल भंडारण का 12.45 MCM (6.3%) 28 वर्षो (1988 से 2015) में खो गया है। सोंदूर जलाशय में जमा होने की दर 0.44 MCM/वर्ष के रूप में गणना की जा सकती है। सोंदूर जलाशय के मृत भंडारण में नुकसान लाइव स्टोरेज क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक है, जो जलाशय की ओर ढलान के कारण हो सकता है। जलाशय में गाद को सीमित करने के लिए सोंदूर जलाशय में मिट्टी संरक्षण के उपाय किए जाने चाहिए।

निष्कर्ष

जलाशय में अवसादन से हाने वाली क्षमता में कमी में सिचाई, जल विद्युत घरेलू उपयोग हेतु उपलब्ध जल की मात्रा पर असर डालता है। इस जलाशय अवसादन अध्ययन में छत्तीसगढ़ राज्य के महानदी बेसिन में सोंदूर जलाशय के लिए जलाशय अवसादन, सुदूर संवेदन डेटा के डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग का उपयोग करके संशोधित क्षमता का अनुमान किया गया है। बहुलौकिक LISS-III डेटा का उपयोग विश्लेषण में लगभग समान अंतराल में पूरे सक्रीय भंडारण को चित्रित करने के लिए किया गया है। डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग से प्राप्त संशोधित जल प्रसार का उपयोग विभिन्न स्तरों पर संशोधित भंडारण और संचयी क्षमता की गणना के लिए किया गया है। विश्लेषण से पता चलता हैं कि सोंदूर जलाशय के सकल भंडारण का 28 वर्षों में (1988 से 2015) में 198.1 मि. घन मी. में से 12.45 मि. घन मी. तलछट के जमाव के कारण कम हो गया है। इस जलाशय में तलछट जमाव की दर 8.58 हेक्टेयर-मी/100 किमी2/वर्ष  है। आभार इस प्रपत्र के लेखक टंकण कार्य के लिए श्री अरूण कुमार आशुलिपिक मध्य भारत जलविज्ञान क्षेत्रीय केन्द्र, भोपाल के विशेष आभारी हैं । 

चित्र 3 - सोंदूर जलाशय के लिए कुछ तारीखों का FCC, NDWI और जल प्रसार क्षेत्र

चित्र 4 - सोंदूर जलाशय के लिए मूल और संशोधित संचयी क्षमता

तालिका 2 - सोंदूर जलाशय के भंडारण में मूल, संशोधित क्षमता और हानि

Reference 

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Sedimentation, NDWI, BRT, FCC, Remote Sensing, NIH, research paper NIh, sondour dam.

 

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