श्रीलंका में सूझबूझ का सबूत

Submitted by admin on Fri, 08/06/2010 - 09:18
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‘बूँदों की संस्कृति से साभार’, सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरनमेंट, नई दिल्ली, 1998
1933 में प्रकाशित ए.एल. ब्रोहियर की पुस्तक ‘एन्सिएंट इरिगेशन वर्क्स इन सिलोन’ की प्रस्तावना में डी.एस. सेनानायके ने लिखा था।

“ताकतवर साम्राज्यों के आधुनिक युग में छोटे लोगों की उपलब्धियों पर शायद ही कोई ध्यान देगा। ये लोग भी हताशा वाला रवैया अपनाए रहते हैं मानों ये कोई बड़ा काम कर ही नहीं सकते। लेकिन अपने महान अतीत के स्मृति चिह्नों की जानकारी हमारी धारणाओं को दुरुस्त कर सकती है। हमारी आंखों के सामने है 1.7 करोड़ घनगज का बाँध जिसे बनाने में 13 लाख ब्रिटिश पाउंड खर्च होते जितने से इंगलैंड में 120 मील लंबी रेल पटरी बिछायी जा सकती थी। और याद रहे कि यह बाँध देश के असंख्य जलाशयों में से मात्र एक का है। हमारे सामने आधुनिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञ की यह स्वीकारोक्ति है कि श्रीलंका की विशाल सिंचाई योजनाओं के निर्माताओं के कौशल की तारीफ किए बिना वे नहीं रह सकते। हमें यह भी पता है कि इन योजनाओं में आधुनिक विशेषज्ञों ने जो खोट पाई वे दरअसल खोट नहीं, बल्कि इन योजनाओं के बारे में उनकी नासमझी का प्रमाण थी। हमें यह भी सोचना चाहिए कि इन योजनाओं के निर्माण में जो श्रम लगा वह मिस्र के पिरामिडों को बनवाने में जबरन लगाए गए मजदूरों वाला श्रम नहीं था, बल्कि सबकी भलाई के लिए संकल्पवान सहकारी प्रयासों की संगठित व्यवस्था के तहत लगाया गया श्रम था। हमें याद करना चाहिए कि हमारा पतन इसलिए हुआ क्योंकि हमने उन संगठनों को कमजोर किया जिन पर हमारे समाज का ढांचा टिका था, क्योंकि हमने पुरे समुदाय से संगठित श्रम कराने की व्यवस्था में दखल दिया। हम इन बातों को याद करें और अतीत से सबक लें तो भविष्य को लेकर निराश होने की निश्चित ही नौबत नहीं आएगी।”

इस पुनरावलोकन से स्पष्ट है कि दक्षिण एशिया के लोगों ने समृद्ध और विविधतापूर्ण तकनीक विकसित कर ली थी। जल संग्रह की परंपरा हजारों वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी और सहस्त्राब्दियों तक इसने यहां लोगों का जीवन चलाया और विकास को आगे बढ़ाया।

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