सुंदरबन क्षेत्र में मिट्टी-पानी के मुद्दे और संभावित प्रबंधन

Submitted by HindiWater on Mon, 01/27/2020 - 15:15
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संसथान रूड़की, राजारहाट प्रसारी, ब्रिटिश जियोलाजिकल सर्वे, यू. के. ICAR-CSSRI कोलकाता

सारांश

सुंदरवन की ग्रामीण आबादी की आजीविका अनिश्चित है और पानी की समस्या से जूझ रहे हैं । ताजे पानी के एक्वीफर गहरे हैं, और अत्याधिक शोषण से पीडि़त हैं। सिंचाई के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले पानी की उपलब्धता जल स्तर में गिरावट के कारण एक समस्या है। किसान शुष्क मौसम में सिंचाई के लिए मानसून के दौरान भरे तालाबों का उपयोग करते हैं, लेकिन इनकी सीमित क्षमता होती है। पानी की समस्या के अतिरिक्त संपूर्ण क्षेत्र मिट्टी की लवणता से प्रभावित है। खरीफ सीजन के दौरान लीचिंग के कारण लवणता कम होती है लेकिन रबी मौसम में मुख्य रूप से जनवरी के बाद शुष्क मौसम शुरू होने से लवणता बढ़नी शुरू होती है और गर्मियों में नमक के जमाव वाले टुकड़ों को देखा जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में एसिड सल्फेट और एसिड खारा मिट्टी पाई जाते हैं। एसिड सल्फेट मिट्टी उप सतह परतों में पाई जाते हैं ये मिट्टी खोदने के बाद सामने आती है, इससे फसलों पर असर पड़ता है, यह तालाबों में मछलियों की वृद्धि पर असर डालती है और इससे मछलियों की मृत्यु दर बढ़ जाती है। जलवायु परिवर्तन के कारण चक्रवात जैसी चरम घटनाओं और बदलते वर्षा वितरण आदि का उदय होता है। प्रस्तावित प्रबंधन उपायों में से कुछ इस तरह से हैं-खेतों में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाना; मल्चिंग; नमक सहिष्णु फसलों का चयन; एसिड मिट्टी के लिए लाइमिंग; वर्षा जल संचयन और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन। एक्विफर स्टोरेज रिकवरी (एएसआर) दृष्टिकोण, मीठे पानी के एक्विफर्स के प्रबंधन में पानी की आपूर्ति प्रणाली में एक कारगर उपाय है।

Abstract

The livelihoods of the rural population of the Sundarbans are precarious, freshwater aquifers are deep, expensive to exploit and suffering over-exploitation. Farmers use ponds, filled during the monsoon for dry season irrigation, but these have limited capacity. Entire area is affected by soil salinity. During kharif season salinity is less due to leaching but high in rabi season mainly from January onwards when drying starts. With onsets of summer patches of salt deposits can be seen. In some areas acid sulphate and acid saline soils are found. The soils have high acidity with salinity. Acid sulphate soils are found in sub surface layers. These soils are exposed after digging in addition to this affect crops, fish growth in ponds is poor with high mortality rates. Availability of good quality water for irrigation is a problem due to the depletion in water levels as well as deterioration in quality. There are rise of extreme events like cyclone; changing rainfall distribution etc. Some of the proposed measurement measures are -addition of organic matter in the fields; mulching; growing salt tolerant crops; liming for acid soils; rain water harvesting and organization of awareness programmes. An Aquifer Storage Recovery (ASR) approach that utilises saline aquifers adds resilience to the water supply system, without the challenges inherent in the management of the freshwater aquifers.

परिचय

पश्चिम बंगाल राज्य का सुंदरवन क्षेत्र उन द्वीपों का एक उदाहरण है जहां की जनसंख्या जल आपूर्ति और सिंचाई हेतु भूजल पर निर्भर करती है। खेत के तालाबों द्वारा भूजल संसाधनों को पुनःपूरित किया जाता है, बड़े जलाशयों के निर्माण हेतु उत्पादक कृषि भूमि की अत्यधिक आवश्यकता होती है इस लिए यहाँ बड़े जलाशयों का निर्माण नहीं किया जा सकता है। एक बहु-स्तरित जलभृत उपलब्ध होने के बावजूद; ऊपरी असीमित और सीमित परतें आमतौर पर खारी होती हैं। इसलिए गहरे एवं मीठे जलभृतों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है, जिसके कारण फसल की पैदावार एवं जल की गुणवत्ता दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। संपूर्ण क्षेत्र मिट्टी की लवणता से प्रभावित है। खरीफ के मौसम के दौरान लीचिंग के कारण लवणता कम होती है लेकिन मुख्य रूप से रबी मौसम में जनवरी के बाद से नमी सूखने के कारण नमक जमा हो जाता है जो गर्मियों में पैच के साथ देखा जा सकता है। कुछ क्षेत्रों में अम्लीय सल्फेट और अम्लीय लवणता युक्त मृदा पायी जाती है। मृदा में लवणता के साथ उच्च अम्लता भी है। एसिड सल्फेट मृदा की उप सतह परतों में पाए जाते हैं। इन मृदा को खोदने के बाद ये उजागर होते है, ये फसलों को प्रभावित करने के साथ साथ तालाबों में मछली के विकास की दर पर बुरा प्रभाव डालने के अतिरिक्त उच्च मृत्यु दर का भी कारण बनते हैं। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले जल की कम उपलब्धता, जल स्तर में गिरावट के साथ साथ गुणवत्ता में गिरावट के कारण जल का संकट उत्पन्न हो रहा है। इस क्षेत्र में चक्रवात एवं बदलते वर्षा वितरण जैसी चरम घटनाओं आदि की भी समस्या है

उपरोक्त स्थिति को ध्यान में रखते हुए, मिट्टी की लवणता का आकलन करने और कुछ उपचारात्मक उपायों का सुझाव देने के लिए एक अध्ययन किया गया।

अध्ययन क्षेत्र

भौगोलिक रूप से, भारतीय सुंदरवन 21032’ से 22040’ उत्तरी अक्षांश और 88005’ से 88000’ से पूर्वी देशांतर तक सीमित है यह पश्चिम में हुगली नदी, दक्षिण में बंगाल की खाड़ी द्वारा सीमांकित है, पूरब की ओर इचमाती-कालिंदी-रायमोंगल नदियाँ और उत्तर में एक काल्पनिक रेखा डंपियर एंड हॉज लाइन के मध्य स्थित है (बनर्जी, 1998)। अध्यन क्षेत्र चित्र 1 में दर्शाया गया है

आंकड़े संग्रहण एवं विधि

भूमि उपयोग/भू-आच्छादन में परिवर्तन के आंकलन हेतु सीएसएसआरआई के इकाई आईसीएआर द्वारा किए गए कार्य को आधार रूप में लिया गया। इस जानकारी के अलावा वर्षा और तापमान डेटा भी प्रदान किया गया था। भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के सुंदरबन के दो ब्लाक यथा गोसाबा और संदेशखली II के लिए आंकड़े लेने हेतु ग्रामीण स्तर पर जल-भूवैज्ञानिकों के कौशल का उपयोग करते हुए एक सहभागिता भूजल प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाया गया। लवणीय तंत्र की सीमा में जल गुणता एवं जलभृत की विशेषता मापने के लिए वर्तमान कूपों का उपयोग किया गया। लवण युक्त जलभृत पर आकंडे गहरे ताजे पानी के जलभृतों के लिए उपलब्ध आंकड़ों के साथ एकीकृत आंकड़े बताते हैं की अत्यधिक भूजल दोहन के कारण जल की उपज एवं गुणवत्ता दोनों में गिरावट आई है।

परिणाम और चर्चा

वर्षा के आंकड़ों (1966-2014) से यह पाया गया कि 36 वर्षों तक सामान्य वर्षा प्राप्त हुई थी; 6 वर्ष वर्षा की कमी के थे और 8 वर्ष अत्यधिक वर्षा के थे। बारिश के दिनों की संख्या औसतन 84 है जो प्रत्येक वर्ष कम हो रही है और पिछले 10 वर्षों के दौरान वर्षा के दिनों की संख्या 78.8 दिन प्रतिवर्ष थी। 25 प्रतिशत वर्षा दिवसों का लगभग 70% वर्षा में योगदान पाया गया। इस प्रकार भारी से अत्यधिक वर्षा की घटनाएं कुल वर्षा में बड़ा योगदान देती हैं। मानसून पूर्व और बाद की बारिश वाष्पोत्सर्जन के 46 और 53% से मिलती है, जबकि मानसून के महीनों के दौरान वाष्पोत्सर्जन की तुलना में 2.8 गुना अधिशेष वर्षा होती है। सामूहिक केंद्रित चर्चा के माध्यम से, यह पाया गया कि इस क्षेत्र का मुख्य व्यवसाय कृषि है एवं खरीफ और रबी दो फसले बोई जाती हैं। खरीफ में धान मुख्य फसल है और रबी के दौरान सब्जियां उगाई जाती हैं।

आंकड़ों से, यह स्पष्ट होता है कि 1975 से 2015 के दौरान खेती योग्य भूमि में लगभग 200% की वृद्धि हुई है और परती भूमि 146% कम हुई है। मैनग्रोव में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं पाया गया, जबकि मिट्टी की लवणता में 37% की वृद्धि हुई। संपूर्ण क्षेत्र मिट्टी की लवणता से प्रभावित है और खरीफ के मौसम के दौरान लवण लीचिंग के कारण कम होता है लेकिन मुख्य रूप से जनवरी के बाद से रबी मौसम में उच्च होता है जब सूखना शुरू होता है और लवण के पैच देखे जा सकते हैं। पानी के बहाव से लीचिंग होती है। कुछ क्षेत्रों में अम्लीय सल्फेट और अम्लीय लवणता युक्त मिट्टी पाए जाती हैं। मिट्टी में लवणता के साथ उच्च अम्लता है। एसिड सल्फेट मिट्टी उप सतह परतों में पाए जाते हैं। ये मिट्टी फसलों पर बुरा प्रभाव डालें के साथ साथ तालाबों में मछली की वृद्धि उच्च मृत्यु दर का भी कारण बनती है।

भूजल सिंचाई का मुख्य स्रोत है और यह पाया गया कि इस क्षेत्र का जल स्तर काफी नीचे जा रहा है। इसलिए, अच्छी गुणवत्ता के साथ-साथ सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता भी कम होती जा रही है। अधिकांश मामलों में पीज़ोमेट्रिक पानी की गहराई जमीनी स्तर से 1.5 मीटर नीचे है, भूजल रिचार्जिंग के सीमित दायरे का संकेत मिलता है। स्थानीय कारक जल में लवणता और जल की गहराई को प्रभावित करते हैं। ज्वारीय नदी के पास स्थित पीजोमीटर नदी के तल से एक मीटर से अधिक में जल की उच्च विद्युत् चालकता को दिखाते हैं। यहां तक कि बरसात के मौसम में कई पीजोमीटर ने विद्युत चालकता का मान 10 dS/m से कम दिखाया है। शुष्क मौसम में पीजोमीटर के पानी की लवणता में वृद्धि हुई थी।

परियोजना के बाढ़ क्षेत्र की गणना की गई और पाया गया कि इस क्षेत्र में जलीय निकाय वाला क्षेत्र लगभग 340 वर्ग किलोमीटर (3.95%) है। 0-2 मीटर की गहराई पर वार्षिक अंतर्देशीय क्षेत्र लगभग 1050 वर्ग किलोमीटर (12.2%) है, फिर अनुमानित बाढ़ क्षेत्र 1305.9 वर्ग किलोमीटर (15.2%) 2-3.3 मीटर (आरसीपी 8.5 समुद्र का स्तर 8070 तक 2070 प्लस 50 सेमी बर्फ की पिघलने के लिए) है। चक्रवात जैसी चरम घटनाओं की वृद्धि के साथ साथ बदलते वर्षा वितरण आदि भी पाए गए।

इसके प्रबंधन के विकल्प हैं यथा जल निकासी चैनल को मजबूत करना, एक तरह से वाल्व, उथले फर। मध्यम रिज को लगभग 50% भूमि का आकार 0.50-0.75 मीटर के उथले फर में आकार दिया जाता है, जो लगभग 4-5 मीटर की दूरी पर और 0.80 के मध्यम लकीरें हैं। फर के साथ 1.00 मी ऊँचा धान सह मछली तकनीक का उपयोग जहां गहरी खाई के बारे में 3 मीटर ऊपर की चौड़ाई ग 1.5 मीटर नीचे चौड़ाई ग 1.5 मीटर एक कोने में छोटी खाई के साथ निर्माण किया जा सकता है और माप के साथ डैक्स-1.5 मीटर शीर्ष चौड़ाई ग 1.5 मीटर ऊंचाई ग 3 मीटर पैंदे की चौड़ाई; खारे पानी एक्वाकल्चर की खेती; सौर ऊर्जा ड्रिप सिंचाई प्रणाली के सुधार और उपयोग में सुधार इत्यादि हैं।

निष्कर्ष

इसके शमन हेतु कुछ प्रस्तावित उपाय हैं-खेतों में कार्बनिक पदार्थ का प्रयोग; नमी को रोकने हेतु सड़ी गली घास की छाद, लवण सहिष्णु फसलों का उत्पादन, अम्लीय मृदा का सीमांकन, वर्षा जल संचयन और जागरूकता कार्यक्रम इत्यादि। एक्विफर स्टोरेज रिकवरी (एएसआर) दृष्टिकोण का उपयोग लाभप्रद रहेगा इसमें लवणता युक्त जलभृत का उपयोग होता है तथा मीठे पानी के जलभृत के प्रबंधन में निहित चुनौतियों के बिना, पानी की आपूर्ति प्रणाली को लचीलापन प्रदान करता है।

Reference

• Banerjee, L. K. (1998). 13. Vegetation and Flora of Sunderbans Tiger Reserve, West Bengal. Plant diversity in the tiger reserves of India, 75.

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