तालाबों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष

Submitted by RuralWater on Thu, 01/19/2017 - 11:44

पाचस वर्ष पहले तक तालाब ही जल का प्रमुख स्रोत होते थे, तब तालाबों का रख-रखाव एक देवता मानकर किया जाता था। तालाबों और जलाशयों के देखरेख का काम पूरा समाज करता था। तालाब निर्माण से लेकर उसकी रक्षा में लोक अपनी जिम्मेदारी समझता था। नल, ट्यूबवेल आदि के आने से पानी के परम्परागत स्रोतों की उपेक्षा हुई। लोग वर्षाजल संग्रह का पुराना तरीका भूलते गए जिससे नए-नए तरह के खतरे हमारे सामने आने लगे। अब सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर फिर से तालाबों के महत्त्व को समझ कर उसके लिये काम शुरू हुआ है। भारतीय संस्कृति में नदियों, जलाशयों, झीलों, तालाबों एवं कुओं का बहुत महत्त्व है। भारतीय समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पक्षों से नदियाँ और दूसरे जलस्रोत काफी गहरे से जुड़े हैं। विश्व की सारी सभ्यताएँ नदियों किनारे ही विकसित हुई हैं। भारत की सभ्यता भी इसका अपवाद नहीं हैं।

नदियों और झीलों जैसे जल के प्राकृतिक स्रोतों का तो भारतीय संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव है। लेकिन तालाब, पोखर और कुएँ जैसे जल के कृत्रिम स्रोत भी भारतीय समाज और संस्कृति से बहुत गहरे जुड़े हैं। इसका अन्दाजा ऐसे लगा सकते हैं कि जीवन के अधिकांश पक्ष जलाशयों के किनारे ही पूरे होते हैं। शादी-ब्याह, मेले ठेले, पूजा-उत्सव और अन्तिम संस्कार तक तालाबों के किनारे होते हैं।

पुराने समय में कुआँ और तालाब एक ओर जहाँ पीने का पानी और फसलों के सिचाईं के लिये काम आता था वहीं पर उसके किनारे स्थित मठ-मन्दिर पूजा के लिये भी काम आता था। भारत के सम्पूर्ण भाग में जहाँ नदी है वहाँ नदी के किनारे और जहाँ पर नदी नहीं है वहाँ पर तालाबों के किनारे प्रात: कालीन नित्य क्रिया, स्नान, भोजन, पशुओं के लिये पानी और गृह निर्माण कार्य तालाब के पानी सेें सम्पन्न होते हैं।

ग्रामीण जीवन में तालाबों की अनिवार्यता प्रत्येक सामाजिक संस्कारों एवं दैनिक जीवन में अपरिहार्य है। पूर्वांचल में शादी-ब्याह के समय तालाबों और कुओं का पूजन होता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में विवाह संस्कार के पहले वर एवं वधू को तालाब के किनारे ले जाकर पूजा किया जाता है।

इसी तरह विवाह के लिये बनने वाले भोजन आदि के लिये जिस मिट्टी के चूल्हे का प्रयोग होता है उसकी मिट्टी किसी तालाब से ही निकाल कर बनाई जाती है। शादी के दिन शुभ मुर्हूत में घर एवं गाँव की महिलाएँ गीत गाती हुई तालाब जाती हैं तथा कुछ वैवाहिक संस्कार से जुड़ी हुई क्रियाएँ सम्पन्न करती हैं। इसमें तालाब के जल का उपयोग किया जाता है।

पूर्वी भारत से लेकर दक्षिण भारत तक में तालाब सामाजिक जीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया है। तालाब जहाँ अपने जीवन के लिये मानसून एवं प्रकृति पर निर्भर रहते हैं वहीं समाज अपने अस्तित्व के लिये तालाबों पर निर्भर रहता था। तब उसे बाढ़, सूखा और अकाल प्रभावित नहीं करता था। क्योंकि तालाबों में पानी का पर्याप्त भण्डार रहता था।

उससे ग्रामीण पेयजल और सिचाईं के लिये पानी उपलब्ध रहता था। पहले हमारा समाज प्रकृति के रहस्यों और उसकी शक्तियों के ईद-गिर्द घूमता था। पानी, वायु, धूप को वह दैवीय कृपा मानकर उसकी पूजा करता था। इसका अभिप्राय यह था कि वह मानव जीवन के लिये उपयोगी प्राकृतिक चीजों में भगवान को देखता था। इसलिये वह उसे गन्दा करने या जरूरत से अधिक इस्तेमाल करने का विरोधी था।

प्राकृतिक शक्तियों और देवी-देवाताओं के प्रति श्रद्धा ने धार्मिक परम्परा का रूप ले लिया है, जो इनके जीवन में विभिन्न पर्व, त्योहारों तथा धार्मिक क्रियाकलापों को तालाबों एवं जलाशयों के करीब ले आया। उत्तर भारत में महिलाएँ तीज त्योहार के अवसर पर तालाब जल का उपयोग करती हैं।

इसी तरह से हरियाली, पोला, गणेश चतुर्थी, दुर्गानवमी, कार्तिक पूर्णिमा और शिवरात्रि जैसे पर्व में तालाबों का बहुत महत्त्व है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में ग्रामीण महिलाएँ आज भी तीज की व्रत रखती हैं। इस दिन महिलाएँ विशेष रूप से तालाबों में स्नान कर तालाबों में स्थित शिव जी के मन्दिर में तालाब-जल अर्पण कर बाल-बच्चों की सुख-शान्ति के लिये ईश्वर से दुआएँ माँगती है। इस प्रकार के धार्मिक कार्यों में उपयुक्त तालाब जल ही होता है।

दुर्गा एवं गणेश पूजा में प्रतिमाओं का विसर्जन जल में ही होता है। जहाँ पर नदी नहीं होती वहाँ पर धार्मिक कार्यों में भी तालाब जल की उपयोगिता महत्त्वपूर्ण होती है।

धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यों के अलावा तालाबों के किनारे अन्तिम संस्कार भी किया जाता हैं। देश में मृतक संस्कार दो प्रकार से किया जाता है। पहला, मृत्यु पश्चात शव शवदाह यानी अग्नि को समर्पित किया जाता है। दूसरा, शव दफनाने का संस्कार। इन दोनों संस्कारों में परिवर्तन भी विभिन्न जातियों में देखने को मिलता है। प्रायः बच्चों में शवों को दफनाने की प्रथा प्रत्येक जाति में पाई जाती है।

शव संस्कारों में विभिन्नता वयस्क व्यक्तियों में पाया जाता है। शव संस्कार की क्रिया गाँव के बाहर स्थित तालाब के नजदीक नियत स्थान पर किया जाता है। मृत्यु संस्कार का कुल कार्य अवधि 13 दिनों में सम्पन्न होता है। दशगात्र एवं 12वें दिन का कार्यपूर्ण समारोह के साथ तालाब में ही सम्पन्न होता है। मृतक संस्कार के पीछे मूल भावना मृतक को इस भौतिक धरातल से पूर्ण से मुक्त करने की अवधारणा निहित है। मृतक संस्कार में भी तालाबों की उपयोगिता स्पष्ट है।

सम्पूर्ण विश्व में मानव-संस्कृति का विकास भौगोलिक स्थिति और जमीन के विभिन्न क्षेत्रों की पर्यावरणीय दशाओं एवं वहाँ के संसाधनों पर निर्भर करता है। संस्कृति भी भूतल के स्वरूप से ही निर्मित होती है। एक अध्ययन के मुताबिक गीत से लेकर नृत्य तक में भौगोलिक स्थिति का प्रभाव होता है। मनुष्य एक क्रियाशील प्राणी है, जो अपने विवेक एवं कार्यकुशलता से उपलब्ध साधनों द्वारा प्राकृतिक परिवेश में निरन्तर परिवर्तन करता रहता है।

जिन स्थानों पर वह प्राकृतिक परिवेश में परिवर्तन करने में समर्थ नहीं होता है, वहाँ वह उसे अपने अनुकूल बनाने की कोशिश करता है। इसी प्रकार प्रकृति के अनुकूलन से मनुष्य का सांस्कृतिक विकास भी होता है। अत: स्थान विशेष के भौतिक स्वरूप एवं संस्कृति को संसाधन के रूप में मान्यता प्राप्त है।

तालाबों के किनारे विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रियाकलाप संचालित होते रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि तालाबों का अस्तित्व एक स्थल रूप में न होकर लोक मानस के जीवन का अविभाज्य अंग है। अभी पाचस वर्ष पहले तक तालाब ही जल का प्रमुख स्रोत होते थे, तब तालाबों का रख-रखाव एक देवता मानकर किया जाता था।

तालाबों और जलाशयों के देखरेख का काम पूरा समाज करता था। तालाब निर्माण से लेकर उसकी रक्षा में लोक अपनी जिम्मेदारी समझता था। नल, ट्यूबवेल आदि के आने से पानी के परम्परागत स्रोतों की उपेक्षा हुई। लोग वर्षाजल संग्रह का पुराना तरीका भूलते गए जिससे नए-नए तरह के खतरे हमारे सामने आने लगे। अब सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर फिर से तालाबों के महत्त्व को समझ कर उसके लिये काम शुरू हुआ है।

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