...तो क्या हमारे पास ज़मीन की कमी है

Submitted by HindiWater on Thu, 01/15/2015 - 12:52
रासायनिक खादों के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल से पहले कुछ साल तो दुगनी-तिगुनी पैदावार मिली, फिर उसके बाद भूमि बंजर हो रही है। यही नहीं जल समस्या के निराकरण के नाम पर मनमाने ढँग से रोपे जा रहे नलकूपों के कारण भी जमीन कटने-फटने की शिकायतें सामने आई हैं। सार्वजनिक चरागाहों के सिमटने के बाद रहे बचे घास के मैदानों में बेतरतीब चराई के कारण भी जमीन के बड़े हिस्से के बंजर होने की घटनाएँ मध्य भारत में सामने आई हैं। सिंचाई के लिए बनाई गई कई नहरों और बाँधों के आस-पास जल रिसने से भी दल-दल बन रहे हैं। कई सालों तक बहस-विमर्श हुए फिर सितम्बर 2013 में कोई 120 साल पुराने भुमि अधिग्रहण कानून-1894 को समाप्त कर अधिग्रहण, पुनर्वास पर नया अधिनियम आया जिस पर 27 सितम्बर 2013 को राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर देश भर में लागू भी कर दिया। कुछ ही महीने बीते कि जनता ने सरकार बदल दी और नई सरकार ने अध्यादेश लाकर उस अध्यादेश में भी बदलाव कर दिए।

इसकी सबसे बडी विडम्बना है कि नए अध्यादेश के बाद बहुफसलीय खेतों के अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो गया। याद करें पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने भी किसानों की जमीन के अधिग्रहण के मामले में कुछ तल्ख टिप्पणी की थी। देश के हर छोटे-बड़े शहरों में जहाँ आज अपार्टमेंट बनाने का काम चल रहा है, वहाँ एक साल पहले तक खेती होती थी।

गाँव वालों से औद्योगिकीकरण के नाम पर औने-पौने दाम पर जमीन छीन ली गई और उसे हजार गुणा दर पर बिल्डरों को दे दिया गया। गंगा और जमुना के दोआब का इलाका सदियों से देश की खेती की रीढ़ रहा है। यहाँ की जमीन सोना उगलती है। विकास के नाम पर सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी की कहानी दुहराई जाने लगी - खेत को उजाड़ कर कंक्रीट के जंगल रोप दिए।

मुआवजा बाँट दिया और हजारों बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी गई। इससे पहले सिंगूर, नन्दीग्राम, पास्को, जैतापुर, भट्टा, पारसौल--- लम्बी सूची है, विकास के नाम पर सरकार ने जमीन ली-उपजाऊ जमीन जहाँ अन्न उगता था। देश में स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाए जा रहे है, सड़क, पुल, कालोनी- सभी के लिए ज़मीन चाहिए और वह भी ऐसी जिस पर किसान का हल चलता हो।

एकबारगी लगता है कि क्या हमारे देश में अब जमीन की कमी हो गई है, जो आधुनिकीकरण की योजनाओं के लिए देश की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार रहे खेत को उजाड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है?

इस तकलीफ को लोग लगातार नजरअन्दाज कर रहे हैं या फिर लापरवाह हैं कि जमीन को बरबाद करने में इंसान कहीं कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। जबकि जमीन को सहेजने का काम कर रहे किसान के खेत पर सभी की नजर लगी हुई है। विकास के लिए सड़कें, हवाई अड्डे बन रहे हैं, महानगरों की बढ़ती संख्या और उसमें रहने वालों की जरूरतों से अधिक निवेश के नाम पर बनाई जा रही बहुमंजिली इमारतों का ठिकाना भी उर्वर जमीन ही है।

हजारों घटनाएँ गवाह हैं कि कारखानों के लिए जमीन जुटाने की फिराक में खेतों को ही उजाड़ा जाता है तो लोगों का गुस्सा भड़कता है। यदि नक्शे और आँकड़ों को सामने रखें तो तस्वीर तो कुछ और ही कहती है।

देश में लाखों-लाख हेक्टेयर ऐसी जमीन है जिसे विकास का इन्तजार है। अब पका पकाया खाने का लालच तो सभी को होता है, सो बेकार पड़ी जमीन को लायक बनाने की मेहनत से बचते हुए लायक जमीन को बेकार बनाना ज्यादा सरल व फायदेमन्द लगता है। विदित हो देश में कुछ 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर भूमि में से 12 करोड़ 95 लाख 70 हजार बंजर है।

भारत में बंजर भूमि के ठीक-ठीक आकलन के लिए अभी तक कोई विस्तृत सर्वेक्षण तो हुआ नहीं है, फिर भी केन्द्रीय ग्रामीण विकास मन्त्रालय का फौरी अनुमान है कि देश में सर्वाधिक बंजर जमीन मध्यप्रदेश में है, जो दो करोड़ एक लाख 42 हेक्टेयर है। उसके बाद राजस्थान का नम्बर आता है जहाँ एक करोड़ 99 लाख 34 हेक्टेयर, फिर महाराष्ट्र जहाँ एक करोड़ 44 लाख एक हजार हेक्टेयर बंजर जमीन है।

आन्ध्रप्रदेश में एक करोड़ 14 लाख 16 हजार हेक्टेयर, कर्नाटक में 91 लाख 65 हजार, उत्तर प्रदेश में 80 लाख 61 हजार, गुजरात में 98 लाख 36 हजार, उड़ीसा में 63 लाख 84 हजार तथा बिहार में 54 लाख 58 हजार हेक्टेयर जमीन, अपने जमीन होने की विशिष्टता खो चुकी है। पश्चिम बंगाल में 25 लाख 36 हजार, हरियाणा में 24 लाख 78 हजार, असम में 17 लाख 30 हजार, हिमाचल प्रदेश में 19 लाख 78 हजार, जम्मू-कश्मीर में 15 लाख 65 हजार, केरल में 12 लाख 79 हजार हेक्टेयर जमीन, धरती पर भार बनी हुई है।

पंजाब सरीखे कृषि प्रधान राज्य में 12 लाख 30 हजार हेक्टेयर, उत्तर-पूर्व के मणिपुर, मेघालय और नागालैंड में क्रमशः 14 लाख 38 हजार, 19 लाख 18 हजार और 13 लाख 86 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर है। सर्वाधिक बंजर भूमि वाले मध्य प्रदेश में भूमि के नष्ट होने की रफ्तार भी सर्वाधिक है। यहाँ गत् दो दशकों में बीहड़ बंजर दो गुने हो कर 13 हजार हेक्टेयर हो गए हैं।

धरती पर जब पेड़-पौधों की पकड़ कमजोर होती है तब बरसात का पानी सीधा नंगी धरती पर पड़ता है और वहाँ की मिट्टी बहने लगती है। जमीन के समतल न होने के कारण पानी को जहाँ भी जगह मिलती है, मिट्टी काटते हुए वह बहता है। इस प्रक्रिया में नालियाँ बनती हैं और जो आगे चल कर गहरे होते हुए बीहड़ का रूप ले लेती है।

एक बार बीहड़ बन जाए तो हर बारिश में वो और गहरा होता चला जाता है। इस तरह के भूक्षरण से हर साल लगभग चार लाख हेक्टेयर जमीन उजड़ रही है। इसका सर्वाधिक प्रभावित इलाका चम्बल, यमुना, साबरमती, माही और उनकी सहायक नदियों के किनारे के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात है। बीहड़ रोकने का काम जिस गति से चल रहा है उसके अनुसार बंजर खत्म होने में 200 वर्ष लगेंगे, तब तक ये बीहड़ ढाई गुना अधिक हो चुके होंगे। बीहड़ों के बाद, धरती के लिए सर्वाधिक जानलेवा, खनन-उद्योग रहा है।

पिछले तीस वर्षों में खनिज-उत्पादन 50 गुना बढ़ा लेकिन यह लाखों हेक्टेयर जंगल और खेतों को वीरान बना गया है। नई खदान मिलने पर पहले वहाँ के जंगल साफ होते हैं। फिर खदान में कार्यरत श्रमिकों की दैनिक जलावन की जरूरत पूर्ति हेतु आस-पास की हरियाली होम होती है। तदुपरान्त खुदाई की प्रक्रिया में जमीन पर गहरी-गहरी खदानें बनाई जाती है, जिनमें बारिश के दिनों में पानी भर जाता है। वहीं खदानों से निकली धूल-रेत और अयस्क मिश्रण दूर-दूर तक की जमीन की उर्वरा शक्ति हजम कर जाते हैं।

खदानों के गैर नियोजित अन्धाधुन्ध उपायोग के कारण जमीन के क्षारीय होने की समस्या भी बढ़ी है। ऐसी जमीन पर कुछ भी उगाना नामुमकिन ही होता है। हरितक्रान्ति के नाम पर जिन रासायनिक खादों द्वारा अधिक अनाज पैदा करने का नारा दिया जाता है, वे भी जमीन की कोख उजाड़ने की जिम्मेदार रही हैं।

रासायनिक खादों के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल से पहले कुछ साल तो दुगनी-तिगुनी पैदावार मिली, फिर उसके बाद भूमि बंजर हो रही है। यही नहीं जल समस्या के निराकरण के नाम पर मनमाने ढँग से रोपे जा रहे नलकूपों के कारण भी जमीन कटने-फटने की शिकायतें सामने आई हैं। सार्वजनिक चरागाहों के सिमटने के बाद रहे बचे घास के मैदानों में बेतरतीब चराई के कारण भी जमीन के बड़े हिस्से के बंजर होने की घटनाएँ मध्य भारत में सामने आई हैं।

सिंचाई के लिए बनाई गई कई नहरों और बाँधों के आस-पास जल रिसने से भी दल-दल बन रहे हैं। जमीन को नष्ट करने में समाज का लगभग हर वर्ग और तबका लगा हुआ है, वहीं इसके सुधार का जिम्मा मात्र सरकारी कन्धों पर है। 1985 स्थापित राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड ने 20 सूत्रीय कार्यक्रम के 16 वें सूत्र के तहत् बंजर भूमि पर वनीकरण और वृक्षारोपण का कार्य शुरू किया था।

आँकड़ों मुताबिक इस योजना के तहत् एक करोड़ 17 लाख 15 हजार हेक्टेयर भूमि को हरा-भरा किया गया। लेकिन इन आँकड़ों का खोखलापन सेटेलाईट द्वारा खींचे गए चित्रों से उजागर हो चुका है। कुछ सालों पहले बंजर भूमि विकास विभाग द्वारा बंजर भूमि विकास कार्य बल के गठन का भी प्रस्ताव था। कहा गया कि रेगिस्तानी, पर्वतीय, घाटियों, खानों आदि दुर्गम भूमि की गैर वनीय बंजर भूमि को स्थाई उपयोग के लायक बनाने के लिए यह कार्य-बल काम करेगा। लेकिन यह सब कागजों पर बंजर से अधिक साकार नहीं हो पाया।

प्राकृतिक और मानव-जनित कारणों की संयुक्त लापरवाही के चलते आज खेती, पशुपालन, गोचर, जंगल सभी पर खतरा है। पेयजल संकट गहरा रहा है। ऐसे में केन्द्र व राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कब्जे में पड़ी ढेर सारी अनुत्पादक भूमि के विकास के लिए कोई कार्यवाही नहीं किया जाना एक विडम्बना ही है। आज सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को तो बंजर भूमि सुधार के लिए आमन्त्रित कर रही है, लेकिन इस कार्य में निजी छोटे काश्तकारों की भागीदारी के प्रति उदासीन है।

विदित हो हमारे देश में कोई तीन करोड़ 70 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि ऐसी है, जो कृषि योग्य समतल है। अनुमान है कि प्रति हेक्टेयर 2500 रुपए खर्च कर इस जमीन पर सोना उगाया जा सकता है। यानि यदि 9250 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँ तो यह जमीन खेती लायक की जा सकती है, जो हमारे देश की कुल कृषि भूमि का 26 प्रतिशत है। सरकारी खर्चाें में बढ़ोतरी के मद्देनज़र जाहिर है कि इतनी राशि सरकारी तौर पर एकमुश्त मुहैया हो पाना नामुमकिन है।

ऐसे में भूमिहीनों को इसका मालिकाना हक देकर उस जमीन को कृषि योग्य बनाना, देश के लिए क्रान्तिकारी कदम होगा। इससे कृषि उत्पाद बढ़ेगा, लोगों को रोजगार मिलेगा और पर्यावरण रक्षा भी होगी। यदि यह भी नहीं कर सकते तो खुले बाजार के स्पेशल इकोनॉमी जोन बनाने के लिए यदि ऐसी ही अनुपयोगी, अनुपजाऊ जमीनों को लिया जाए।

इसके बहुआयामी लाभ होंगे - जमीन का क्षरण रुकेगा, हरी-भरी जमीन पर मँडरा रहे संकट के बादल छँटेंगे। चूँकि जहाँ बेकार बंजर भूमि अधिक है वहाँ गरीबी, बेरोजगारी भी है, नए कारखाने वगैरह लगने से उन इलाकों की आर्थिक स्थिति भी सुधरेगी। बस करना यह होगा कि जो पैसा जमीन का मुआवजा बाँटने में खर्च करने की योजना है, उसे समतलीकरण, जल संसाधन जुटाने, सड़क-बिजली मुहैया करवाने जैसे कामों में खर्च करना होगा।

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