थाली में जहर

Submitted by Hindi on Mon, 06/25/2012 - 15:47
Source
सत्यमेव जयते, 24 जून 2012

देश की एक बड़ी आबादी धीमा जहर खाने को मजबूर है। हम बात कर रहे हैं भोजन के साथ लिए जा रहे उस धीमे जहर की, जो सिंचाई जल और कीटनाशकों के जरिए अनाज, सब्जियों और फलों में शामिल हो चुका है।अब सब्जियों में जहां एंडोसल्फान, एचसीएच एवं एल्ड्रिन जैसे कीटनाशक मौजूद हैं, वहीं केडमियम, सीसा, कॉपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं भी शामिल हैं। ये कीटनाशक और धातुएं शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं। सब्जियां तो पाचन तंत्र के जरिए हजम हो जाती हैं, लेकिन कीटनाशक और धातुएं शरीर के संवेदनशील अंगों में एकत्र होते रहते हैं।

साभार


दैनिक भास्कर ईपेपर, 26 जून 2012
जयप्रकाश चौकसे
आमिर खान के शो 'सत्यमेव जयते' की आठवीं कड़ी में ज्वलंत मुद्दा था कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से हानियां तथा जैविक खेती के लाभ। इसमें जैविक खेती से जुड़ी कुछ भ्रांतियों पर भी प्रकाश डाला गया। पहली भ्रांति तो यह है कि पैदावार बहुत कम हो जाती है और लागत के बढऩे से मुनाफा नहीं होता। कार्यक्रम में मौजूद झालावाड़, राजस्थान के हुकुमचंद ने बताया कि केवल दस प्रतिशत कम पैदावार पहले वर्ष होती है। उन्होंने यह भी बताया कि कीटनाशक दवा से माइक्रोन्यूट्रॉन नष्ट हो जाते हैं, जबकि जैविक ढंग से की गई खेती में इनके अक्षुण्ण रहने से इस अनाज के खाने वालों को बीमारियां कम होती हैं। सिक्किम में कीटनाशक के उपयोग पर प्रतिबंध है और वहां के मुख्यमंत्री ने बताया कि जमीन की उर्वरा शक्ति की रक्षा के लिए यह आवश्यक है।

खेतों में कीटनाशक के छिड़काव से अधिकांश दवा धरती पर गिरती है और उसका जहरीला प्रभाव दशकों तक कायम रहता है। आश्चर्य की बात यह है कि भारत में प्रयुक्त कीटनाशक दवाओं में 67 प्रतिशत दवाएं अन्य देशों में वर्षों पूर्व प्रतिबंधित की जा चुकी हैं और भारत में भी कई प्रतिबंधित कीटनाशकों का उत्पादन होता है और बेचे जाते हैं। कार्यक्रम के प्रारंभ में रश्मि सांघी ने स्पष्ट किया कि मां के दूध में भी कीटनाशक का प्रभाव पाया गया है। क्या हम नवजात शिशुओं को जहर पिला रहे हैं और मां के दूध जैसी पावन वस्तु में भी कीटनाशक का जहर जाने दे रहे हैं? केरल के कासरगोड नामक इलाके में 1976 से 2000 तक 15000 हजार एकड़ जमीन पर 22 लाख लीटर एंडोसल्फान के छिड़काव के कारण अनेक लोग असाध्य बीमारियों से ग्रस्त हैं।

डॉ. मोहन कुमार के अनुसार क्षेत्र में विकलांगता इसी कारण बढ़ी है और पांच हजार पीड़ितों का इलाज हो रहा है। वर्ष 2000 में न्यायालय ने इस कीटनाशक के छिड़काव पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके बाद विकलांगता और अन्य बीमारियों में कमी आई है। कार्यक्रम में यह बात भी उभरकर आई कि नासिक में अपने परिवार के खाने के लिए जैविक ढंग से अंगूर की खेती की जाती है, परंतु बाजार में बेचने के लिए कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। पंजाब के मास्टर जरनैल सिंह ने बताया कि 1970 के दशक से हरितक्रांति के दिनों ही कीटनाशक दवाओं का प्रयोग प्रारंभ हुआ और नतीजा यह है कि आज अस्पतालों में 'मरीजों का मेला लग गया' है। डॉ. वंदना शिवा ने बताया कि पैसा कमाने के लालच में तिलहन और दलहन का उत्पादन कम हो गया है और हम खाने के तेल का आयात कर रहे हैं। महंगाई बढ़ने का एक कारण यह भी है। उनका कहना है कि गेहूं के साथ दाल के पौधे रोपने से गेहूं और दाल दोनों की गुणवत्ता बढ़ती है।

आंध्र में महिला संगठन कीटनाशक के खिलाफ सक्रिय रहे हैं। वहां के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीवी रमनजनेयुलु ने बताया कि कीड़े दो प्रकार के होते हैं - एक, पत्तियां और फसल खाने वाले और दूसरे, जो कीड़ों को खाकर जीवित रहते हैं। अत: हम इनका प्रयोग करके फसल बचा सकते हैं। यह रिवर्स प्रक्रिया धरती की उर्वरता और पर्यावरण की रक्षा भी करती है। उनके द्वारा ईजाद पंद्रह रुपए के नेट में कीड़े फंस जाते हैं और अत्यंत कम लागत में फसलों को बचाया जा सकता है।

यह कितनी भयावह बात है कि पंजाब में कीटनाशक द्वारा उत्पन्न वस्तुओं के सेवन से होने वाले कैंसर के मरीज इलाज के लिए जिस ट्रेन से बीकानेर जाते हैं, उस ट्रेन को अवाम कैंसर ट्रेन के नाम से ही पुकारता है। आज दूध, सब्जी, फल, अनाज इत्यादि सभी चीजों में मिलावट के कारण बीमारियां फैल रही हैं। दूसरी ओर दवा बनाने वाली कंपनियों ने माल बेचने की महंगी विधि के कारण दाम बढ़ा दिए हैं। धरती की उर्वरता को कायम रखें तो वह बहुत कुछ देती है, परंतु मनुष्य के लोभ को वह पूरा नहीं कर सकती। हमारी विचारहीनता ही धरती पर जीवन का संकट खड़ा कर रही है। आमिर खान जीवन और आने वाली पीढिय़ों से जुड़े मुद्दे उठा रहे हैं, जिसके लिए उन्हें बधाई।

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