टिहरी बाँध के मायने 

Submitted by UrbanWater on Mon, 11/30/2020 - 11:32

इसके अतिरिक्त विद्युत उत्पादन का अन्य स्रोत अक्षय ऊर्जा भी है अक्षय ऊर्जा अर्थात सौर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा द्वारा कारखानों के बिना आज हमारी जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं। हम फोन, फैक्स, मेल आदि संचार साधन, गाड़ी, रेल, हवाई जहाज आदि यातायात के साधन तथा दैनिक प्रयोग में आने वाले ए०सी०, कम्प्यूटर, मिक्सर, वाशिंग मशीन, पंखे, कूलर आदि अवश्यक उपकरणों के बिना रहने की कल्पना कल्पना नहीं कर सकते। और इन सबको संचालित करने के लिये आवश्यक है ऊर्जा अर्थात विद्युत ऊर्जा। 

विद्युत ऊर्जा मुख्यतः चार स्रोतों से मिलती है-जल ऊर्जा (Hydro Power), ताप ऊर्जा (Thermal Power), डीजल उर्जा ( Diesel Station Power), और परमाणु ऊर्जा (atomic Power)। इसके अतिरिक्त विद्युत उत्पादन का अन्य स्रोत अक्षय ऊर्जा भी है अक्षय ऊर्जा अर्थात सौर ऊर्जा (सोलर प्लांट) एवं पवन ऊर्जा (विंडमिल) द्वारा। 

ताप विद्युत ऊर्जा के लिए जलाऊ लकड़ी और कोयला आवश्यक है। जबकि सच्चाई यह है कि लकड़ी व कोयले के भंडार धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। साथ ही ताप विद्युत ऊर्जा उत्पादन में प्रदूषण भी अत्यधिक है। डीजल स्टेशन अर्थात डीजल के प्रयोग से विद्युत उत्पादन होता है, किंतु डीजल महंगा होने के कारण यह आज व्यावहारिक नहीं है। परमाणु ऊर्जा के लिए पर्याप्त परमाणु भंडार हमारे पास नहीं है। फिर परमाणु उर्जा के क्षेत्र में चेरनोबिल परमाणु दुर्घटना व जापान के फुकुशिमा में हुए परमाणु विकिरण को अनगेखा नहीं किया जा सकता। अक्षय ऊर्जा से विद्युत उत्पादन के लिए ढांचागत वह काफी अधिक है, जबकि उत्पादन अपेक्षाकृत कम है। अतः जल विद्युत ऊर्जा ही एक ऐसा स्रोत है जहां से पर्याप्त मात्रा में विद्युत उत्पादन हो सकता है। प्रारंभिक लागत के अतिरिक्त इसके रखरखाव पर बहुत कम खर्च होता है और पर्यावरणीय प्रदूषण भी बहुत कम है बशर्ते जनहित को ध्यान में रखते हुए ईमानदारी से योजनाएं बनाई जाएं


वर्तमान समय में देशभर में अनेक जल विद्युत परियोजनाएँ विद्युत उत्पादन कर रही हैं। और सैकड़ों पर काम चल रहा है या प्रस्तावित है। एक अनुमान के अनुसार उत्तराखंड में ही 18,000 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है जिसमें से 2400 मेगावाट की टिहरी बांध जल विद्युत परियोजना भी सम्मिलित है।  

टिहरी बांध का परिचय 

एशिया में सबसे ऊँचे टिहरी बाँध की अजब-गजब कहानी है। टिहरी बाँध जल विद्युत परियोजना तीन चरणों में पूरी की जा रही है, लगभग सात हजार करोड़ रुपये लागत का पहला चरण (1,000 मेगावाट) का कार्य सन्‌ 2005 में तथा लगभग चार सौ करोड़ रुपये लागत का दूसरा चरण (400 मेगावाट) ,कोटेश्वर परियोजना भी सन्‌ 2000 में पूर्ण हो गया है। अंतिम चरण 1000 मेगावाट क्षमता के पी०एस०पी० (पम्पिंग स्टोरेज पावर प्लांट) पर कार्य प्रस्तावित है जो कि सन् 2016 तक तैयार किया जाना है। प्रतिदिन करोड़ों रुपये का विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त टूरिज्म, फिशिंग, सिंचाई, पेयजल और वाटर स्पोर्ट्स जैसी बहुआयामी-टिहरी बाँध परियोजना सरकार के लिए कामधेनु गाय से कम नहीं है।

प्रारम्भ

टिहरी बाँध परियोजना की अवधारणा प्रधानमंत्री नेहरू जी के कार्यकाल की है। सन्‌ 1961 में प्रारम्भिक अन्वेषण कार्य पूर्ण हुआ और सन्‌ 1972 में डिजाइन बन कर तैयार हो गया। सिंचाई विभाग, उ०प्र० द्वारा निर्माण कार्य सन्‌ 1978 में शुरू किया गया और उसी दौरान टिहरी में उनके कार्यालय व आवास बनने शुरू हुये। 

भिलंगना व भागीरथी पर दो-दो सुरंगों का निर्माण हुआ। प्रभावित क्षेत्र की भूमि के ब्यौरे इकट्ठे किये जाने लगे। ब योजना आयोग द्वारा स्वीकृत कुल 600 मेगावाट की टिहरी बाँध परियोजना की लागत मात्र 97.2 करोड़ रुपये रखी गयी थी। किन्तु टिहरी बाँध निर्माण कार्य वित्तीय संकट, पर्यावरणीय अवरोध आदि कारणों से गति नहीं पकड़ सका | वर्ष 1986 में भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी व रूस के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के बीच हुए समझोते के अनुसार रूस ने टिहरी बांध परियोजना के लिए तकनीकी व वित्तीय सहायता देना स्वीकार किया। कंपनी अधिनियम-1956 के अंतर्गत एक लिमिटेड कंपनी के रूप में निर्माण के लिए जुलाई 1988 में एक स्वतंत्र प्रतिष्ठान टीएचडीसी (टिहरी जल विद्युत निगम लिमिटेड) का गठन किया गया व आवश्यक संशोधन के बाद वर्तमान डिजाइन तैयार किया गया। परन्तु विकास नि आए किया गया। परन्तु सोवियत संघ के विघटन के बाद  भारत सरकार ने 75 प्रतिशत व उप्र० सरकार ने 25 प्रतिशत की हिस्सेदारी मानकर वित्तिय सहायता दी। और बांध निर्माण कार्य पूरा करवाया। 

तकनीकी तौर पर यह बाँध नदी की वास्तविक सतह से 260.5 मीटर (855 फीट) ऊँचा है जिसे मिट्टी व पत्थरों से भर कर तैयार किया गया है। नदी के समानन्तर इसका आधार 1128 मीटर चौड़ा है, जबकि टॉप पर बाँध की चौड़ाई मात्र 20 मीटर है और लम्बाई 575 मीटर। बाँध जलाशय लगभग 52 किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। 

जनपक्षीय पहलू

तकनीकी पहलू के अतिरिक्त टिहरी बाँध का दूसरा पहलू यह भी है कि टिहरी बाँध को लेकर प्रारम्भ से ही तरह-तरह के प्रश्न उठते रहे। महानतम भूवैज्ञानिकों में शुमार प्रोफेसर के०एस० वाल्दिया जी ने इसे सक्रिय भ्रंश श्रीनगर प्रक्षेप के निकट बताया है। उनके अनुसार “श्रीनगर प्रक्षेप से पऋथ्वी में कई बार गतिशील स्पंदन पैदा हो चुके हैं। ये पर्वत श्रंखलायें मात्र 11 हजार वर्ष पुरानी हैं। जिसके कारण ये निरंतर ऊपर उठ रही हैं। यह प्रक्षेप भ्रकम्प छोटे-छोटे झटकों के नाभिकीय केंद्र हैं तथा छाम- भल्डियाना के पास स्थित हैं, जिससे इस भ्रंश क्षेत्र में काफ़ी भीषण मात्रा का दबाव जमा है। 

उत्तरकाशी टिहरी क्षेत्र में पृथ्वी के नीचे अत्यंत दबाव बना हुआ है। सन 1828 में यहां 7.6 स्केल तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था, तत्पश्चात 20 अक्टूबर 1991 को आए 6.1 स्केल के भूकंप से भी दबाव पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकल पाया। अतः इस क्षेत्र में अब जो भी दबाव है, वह बहुत भयंकर है। गुरुत्व शक्ति 8 या उससे अधिक स्केल की तीव्रता वाले भूकंप से ही ऊर्जा फूटकर बाहर आ सकती है, टिहरी बांध इसे झेल पाएगा या नहीं कहना मुश्किल है।
  
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘ऊंचा बांध विनाश का सबसे क्रूर तरीका और विस्थापन मानवीय यातना का नृशंस तरीका है। आर्थिक वृद्धि वाले विकास ने मानव की मानव को अर्धपिशाच  बना दिया है और उसने दया, मैत्री व करुणा के मानवीय गुणों तथा सृजन करने वाले प्रवृत्तियों को रौंद डाला है।  हमारा सारा समाज यांत्रिक बन गया है, विस्थापन के बदले पुनर्वास इसी सोच का परिणाम है। यदि प्राकृतिक विपदा के कारण विस्थापन हो तो वह मजबूरी है। किंतु जब बांध, हवाई पट्टी, बड़े कारखाने, पंचतारा होटल और गोल्फ मैदान के लिए विस्थापन होता है तो वह शांत नागरिकों पर सुनियोजित आक्रमण है। इस आक्रमण में अपना बचाव करने वाले पक्ष को भय और लालच से नपुंसक बना दिया जाता है और इसलिए व प्रतिरोध की बजाय आत्मसमर्पण की तैयारी करते हैं। टिहरी बांध विस्थापन इसका ज्वलंत उदाहरण है।

बांध निर्माण में हुई गड़बड़ियों की कथा भी अनन्त है। डूब क्षेत्र के भीतर ने वाले लोगों का विस्थापन किया गया परन्तु टिहरी बाँध प्रभावित क्षेत्र के लोगों का विस्थापन नहीं हुआ उन्हें बाँध के नियमों ने मार डाला। विस्थापन की शर्तें अजब कहानी बयां करती हैं;

अठारह वर्ष के वयस्क को एक परिवार माना जाना चाहिए था किन्तु परिवार को परिभाषा में वह शामिल किया गया जिसके सर पर पिता का साया नहीं था। एक माह का अबोध अनाथ बच्चा बाँध विस्थापन के नियमों में परिवार था और 60-65 साल का बुजुर्ग व्यक्ति परिवार की परिभाषा में नहीं आया क्योंकि उसके सिर पर पिता का साया था। अर्थात अनेक मामलों में 80-85 साल आयु के पिता जीवित होने की दशा में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त बेटे भी पृथक परिवार की श्रेणी में नहीं आ पाये। इसका परिणाम यह हुआ कि बांध प्रभावित क्षेत्र के ऐसे परिवारों में बुजुर्ग पिता के प्रति वैमनस्य बढ़ा। 

 डूब क्षेत्र से इतर प्रभावित क्षेत्र में विस्थापन की पात्रता के लिए पचास प्रतिशत भ्रम का डूब क्षेत्र के भीतर आना आवश्यक माना गया। इस नियम की बानगी देखने लायक है। जैसे कि यदि किसी परिवार की सौ नाली (उत्तराखंड में भूमि माप की इकाई, एक नाली 200 वर्ग मीटर) भूमि है, और केवल 48 नाली भूमि ही डूब क्षेत्र के अंतर्गत आयी, जो कि 50 फीसद से कम है, तो वह परिवार विस्थापित श्रेणी में नहीं रखा गया।  किंतु सी कपड़े पड़ोसी यदि कुल 2 नाली भूमि का स्वामी है और सहयोग से एक नाली भूमि डूब क्षेत्र की परिधि में आ गई तो अभी विस्थापन का पात्र माना गया। 

अपने पैतृक भूमि से पूरी तरह उखड़ने और देहरादून-हरिद्वार में पुनर्वास क्षेत्र के रूप में बने नए ठिकानों पर कई पीढ़ियों से जमी गृहस्थी (जी हां, सभी सदस्यों के कपड़े, किताबें, पूरी रसोई, बिस्तर, फर्नीचर, बक्से, संग्रहित अन्न, खेती-बाड़ी के औजार व पालतू पशु आदि लेकर पहुंचने के लिए विस्थापन अर्थात स्थानांतरण भत्ता के तौर पर सरकार द्वारा दिया गया कुल 2,400 रुपया। जबकि रैका के पुनसाड़ा, हटवालगांव,  डोभ, रामपुर, धारमंडल के बिल्यासौंड़, कण्ल, खान औदि गांव रोड-हेड से पहाड़ी-पथरीले रास्ते वाले व 5-6 मील दूरी पर भी थे, जहाँ से पूरी गृहस्थी उठाने और अपने नए ठिकानों पर पहुंचाने में विस्थापितों को प्राप्त विस्थापन भत्ता का 10 से 20 गुना तक खर्च करना पड़ा। 

टिहरी नगर क्षेत्र के उन लोगों ( जिनमें से वे लोग भी थे जिन्होंने सड़कें, पार्क या अन्य सरकारी जगह घेरकर झोपड़ियाँ/ दुकानें खड़ी की या उन लोगों को जो स्थानीय निवासियों के मकान पर वर्षों से बतौर दो-तीन रुपये मासिक किरायेदार रहते हुए लाखों का व्यापार करते थे, को 1.5 लाख- 4 लाख तक  भवन सहायता के रूप में वर्ष 2002, 2003 में मिले और जो टिहरी के आसपास के गाँवों के विस्थापित अपनी जड़ों में कई पीढ़ियों से जमे थे, उन्हें भवन सहायता के नाम पर ढेला भी नहीं मिला। 

समुद्रतल से 845 मीटर की ऊँचाई तक ही डूब क्षेत्र माना गया व उसके भीतर की भूमि या मकान का भुगतान सरकार द्वारा विस्थापन के नियमों के अनुसार कर दिया गया है। जबकि झील का जलस्तर 835 मीटर ऊंचाई तक रखा जाना प्रस्तावित है। अनेक स्थानों पर 15 से 30 डिग्री तक का ढाल लिए तथा भूकम्पीय दृष्टि से अति संवेदनशील इस पर्वतीय भूभाग में विशाल झील और डूब रेखा के बीच कुल दस मीटर ऊंचाई का फासला। ऊपर वाला ही जाने कि अतिवृष्टि और भूकंप में जाने कितने मकान, कितने परिवार जमींदोज हो जाएंगे। 

भिलंगना व भागीरथी नदी के उत्तर में अर्थात झील के उस पार सैकड़ों गांव हैं, जो विस्थापित नहीं हुए परंतु बुरी तरह प्रभावित हैं। इन नदियों पर एक भारी वाहन पुल के अलावा, 7-8 झूला पुल थे। झील बनने के बाद अब दो हल्का वाहन पुल के अलावा आवागमन का कोई साधन नहीं है और जो है उनसे अपने घरों तक पहुंचने में पहले की बनिस्बत समय व धन कई गुना अधिक लग रहा है। 

टिहरी नगर के आसपास के की ग्रामीणों की टिहरी पर निर्भरता तो थी ही किंतु कुछ किसान झंगोरा मड़ुवा, चौलाई, मौसमी, सब्जी, तंबाकू, मिर्च, दूध आदि टिहरी शहर में बैठकर आजीविका चलाते थे उनसे वह छिन गया है। कुछ ब्राह्मण बाहर जनों की वृत्ति (आजीविका) टिहरी नगर व बांध के कारण ण डूब गए गांव में थी, किंतु वे भी अब भाग्य को कोस रहे हैं। 

विस्थापित होकर जो देहरादून, हरिद्वार के पुनर्वास स्थलों पर चले गए उनमें से कुछ अनपढ़ व सीधे-साधे लोग सामंजस्य नहीं बिठा पाये। या दलालों द्वारा ठगे गए और अपनी जमीनें औने-पौने दामों में बेचकर कई-कई व्यसन पाल लिए। उनके बेटे बेटियां कुसंगति में पड़ गए हैं।

खामियाँ अनेक हैं और अनगिनत पीड़ाएँ हैं। कह सकते हैं कि टिहरी बाँध विकास है सरकार के लिए या उनके लिए जो लाभान्वित हुए। परन्तु जो पीड़ा भोग हैं, वे ही जानते हैं कि बाँध के मायने क्या हैं, विस्थापन के मायने क्या है। गाँवों, शहरों को बसते हुए तो देखा किन्तु डूबते गाँव, शहर का दर्द कैसे बयाँ करें! और वह दर्द बढ़ता ही जायेगा। वर्ष दर वर्ष, पीढ़ी दर पीढ़ी। जब तक जीवन रहेगा।

विशेषज्ञों की चेतावनी और जनता के व्यापक विरोध के बावजूद भी 29 अक्टूबर 2005 को ऐतिहासिक शहर टिहरी और दो दर्जन से अधिक गांवों को सदा के लिए डुबो दिया गया। इस प्रकार 28 दिसम्बर सन् 1815 में पँवार वंश के पचपनवें शासक महाराजा श्री सुदर्शन शाह (शासनकाल: 1815-1859) द्वारा बसायी गयी टिहरी को मात्र 190 वर्ष की अल्पायु में जल में डुबोकर मार दिया गया। 

टिहरी अब एक याद भर

प्रतिदिन करोड़ों रुपये का विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त टूरिज्म, फिशिंग, सिंचाई और वाटर स्पोर्ट्स जैसी बहुआयामी टिहरी बाँध परियोजना सरकार के लिए कामधेनु गाय से कम नहीं है। किन्तु टिहरी बाँध परियोजना का दूसरा पक्ष पीड़ादायक है। कम से कम उनके लिए तो है ही जो वहाँ से उजड़ गए अपनी जड़ों से उखड़ गये। इस दूसरे पक्ष को जानने के लिए हमें थोड़ा टिहरी के इतिहास व भूगोल को जानना होगा।

सन 1803 में राजधानी श्रीनगर सहित पूरे गढ़वाल पर गोरखों के आक्रमण और 1804 में गढ़वाल के पंवार वंश शासक राजा प्रद्युम्न शाह की वीरगति के बाद गढ़वाल व कुमाऊं पर संपूर्ण रूप से गोरखों का आधिपत्य हो गया (सर्वविदित है कि गारखों के शासनकाल में गढ़वाल-कुमाऊं की जनता पर जो अत्याचार किए गए, वे  अत्यंत क्रूर और अमानवीय थे)। अंग्रेजों के साथ संधि के उपरांत अंग्रेजों द्वारा गोरखों को मार भगाया गया किंतु बदले में अंग्रेजों ने वर्तमान टिहरी उत्तरकाशी के भूभाग को छोड़कर पूरा गढ़वाल व कुमाऊं अपने अधीन ले लिया। दिसंबर 1815 में तब राजा प्रद्युम्न शाह के पुत्र सुदर्शन शाह ने टिहरी को भागीरथी और भिलंगना नदी के संगम तट पर स्थित चौड़ी रमणीक घाटी को राजधानी बनाया। 

टिहरी में महाराजा सुदर्शन शाह( शासनकाल 1815 से 59) के बाद महाराजा भवानीशाह (शासनकाल 1859 से 1871),  महाराजा प्रतापशाह (शासनकाल 1871 से 86), महाराजा कीर्तिशाह (शासनकाल 1886 से 1913) और अंतिम शासक के तौर पर 59वीं पीढ़ी में महाराजा नरेंद्र शाह (शासनकाल 1913 से 1948 गद्दी नशीन हुए)। महाराजा मानवेंद्र शाह जीवनकाल 1918 से 2007 को शासन करने का अवसर नहीं मिल पाया वे राजा घोषित हुए किंतु तब तक आजादी के बयार बहने लगी थी। और वे विद्रोह नहीं दवा पाए। अतः महाराजा नरेंद्र को शासन अपने हाथों में लेना पड़ा। टिहरी राजधानी बनी तो सुविधाएं भी बढ़ीं और आसपास की बस्तियां घनी  होती गईं। 14 जनवरी 1948 को टिहरी रियासत संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में विलय हो गई। टिहरी की जनता पर राज परिवार का इतना अधिक प्रभाव है कि टिहरी लोकसभा क्षेत्र से महाराजा नरेंद्र शाह की पत्नी कमलेंन्दुमति शाह एक बार महाराजा मानवेंद्र शाह 8 बार सांसद चुने गए। 

बीसर्वी सदी के आठवें दशक तक टिहरी पूरे यौवन पर थी। टिहरी जिला मुख्यालय नहीं था तथापि वहाँ पर चार महाविद्यालय, दो इण्टर कॉलेज, अनेक जूनियर व प्राइमरी स्कूल, जिला न्यायालय, सेवायोजन कार्यालय,  पीडब्ल्यूडी डिवीजन व सर्किल कार्यालय, फॉरेस्ट डिविजन ऑफिस आदि अनेक सरकारी कार्यालय व कई बैंक खुल चुके थे। टिहरी राजा के समय बना विशाल पोलो फील्ड (प्रदर्शनी मैदान), हजारों की क्षमता वाला आजाद मैदान, मॉडल स्कूल व प्रताप इंटर कॉलेज का फील्ड विकास के नमूने थे। टिहरी एक व्यावसायिक केंद्र ही नहीं बल्कि लगभग 20,000 की आबादी वाले टिहरी शहर निवासियों तथा आसपास से ऊपु सिंराईं, जुए, अठूर, सारजुला, मखलोगी, खास, कोटि, फैगुल, मंदार, ढंग, धारमंडल, रैका ऐदि पट्टियों के सैकड़ों गांव का शैक्षणिक व सांस्कृतिक केंद्र भी था। हर साल कृष्णलीला, रामलीला तथा विभिन्न आकर्षणों के साथ टिहरी में प्रदर्शनी/नुमाइश, रीजनल रैली, साधुराम फुटबॉल टूर्नामेंट, जनरल करियप्पा फुटबॉल टूर्नामेंट के अतिरिक्त मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, शिवरात्रि आदि के पारम्परिक मेले भी प्रमुख थे। और ऐसे में जब 2005 में टिहरी को डुबो दिया गया तो भावनात्मक रूप से टिहरी से जुड़े लोग फूट-फूटकर रो पड़े। एक विस्थापित भावुक होकर यहां तक कहता है ‘अब हमारा मूल गांव नहीं रहा, याद आते ही शरीर सिहर उठता है, आंखों से आंसू आने लगते हैं। लगता है जैसे मां-बाप का साया एकाएक सिर से उठ गया हो।’

और व्यथा गांवों की 

अब सरकार टिहरी बांध की विशालता व बहू-उपयोगिता के लिए भले ही अपनी पीठ क्यों न थपथपाए, किंतु इसे विशालतम बनाने के लिए टिहरी शहर के अतिरिक्त 23 गांवों को डुबोया गया और 116 गांवों को त्रासदी झेलनी पड़ रही है। वहां हजारों परिवार आज अधोगति में हैं। उनके दुखों व आंसुओं का हिसाब आज किसी के पास नहीं है। कहते हैं कि एक किसान के लिए उसके खेत खलिहान व घर-आंगन सबसे बड़ा सुख होता है। अपने खेतों में उपजा अन्न ही उसे तृप्ति देता है। प्रकृति चाहे उसके साथ कैसा भी मजाक क्यों न करे। किंतु किसान को अपने खेतों की जुताई-बुवाई में जो आत्मिक आनंद मिलता है उसे शब्दों में तो बयां नहीं किया जा सकता। यह विडंबना ही तो है कि टिहरी से हजारों किसानों को राष्ट्रहित की दुहाई देकर विकास के झूठे सब्जबाग दिखाकर अपनी जड़ों से उखाड़ दिया गया है। उन जमीनों से बेदखल किया गया जो उनके पुरखों की थाती थी। जो भूमि पीढ़ी दर पीढ़ी उन्हें हस्तांतरित होती आ रही थी। जिन पर उनकी कई पीढ़ियां अभाव में रहते हुए भी स्वाभिमान के साथ गुजर-बसर कर रही थीं, उस भूमि ने सैकड़ों वर्षो से उनका हौसला बनाए रखा था, परंतु टिहरी बांध परियोजना के कर्ताधर्ताओं ने, उन्हें पुरखों की जमीन से उखाड़ कर उनके वनचर, परचर,  सार्वजनिक उत्सवों के मैदा,न मंदिर व मुर्दा घाटों की भूमि से उन्हें वंचित करते हुए दूरदराज क्षेत्रों में भी विस्थापित किया। जहां की आबोहवा के वे आदि ही नहीं थे। जहां पर उनकी नेकनीयत, ईमानदारी, मेहनत तो क्या, इंसानों तक का ही मोल नहीं है। कोई उनके आंसू पोंछकर पूछे क्या वे वहां पर खुश हैं? क्या वे वहां उसी भाईचारे व उसी सम्मान से जी रहे हैं, जैसे वे अपने पैतृक भूमि पर थे? आज किन परिस्थितियों में हैं कम लोग ही जानते हैं। 

सेलाकुई, अटक फार्म, देहराखास, कारगी, बंजारावाला, अजबपुर कलां, भानियावाला, रायवाला, रोशनाबाद, पथरी आदि पुनर्वास स्थलों में विस्थापितों की भूमि पर आज बिल्डरों की बड़ी हवेलियां और विशाल अपार्टमेण्ट्स टिहरी बॉँध के विस्थापितों को चिढ़ा रहे हैं, दलाल चांदी काट रहे हैं। पुनर्वास स्थलों पर बाँध विस्थापितों को उन विशाल हवेलियों और बड़े मकानों के बीच ढूंढना पड़ता है। इन जगहों पर अधिकांश विस्थापित, आज विपन्‍न अवस्था में हैं और डरे-सहमे हुए भी हैं। विस्थापितों को पहले सरकार ने छला तथा अब पुनर्वास क्षेत्रों के दलालों, भूमाफियाओं और बिल्डरों ने। इन पुनर्वास स्थलों के बहुत से विस्थापित अपनी भूमि औने-पौने दामों में बेचकर हताश हो वापस टिहरी जाने को हैं। यह कहकर कि ‘वे किसी के ओबरे में जीवन गुजार लेंगे, किन्तु ऐसी निर्मम भूमि में नहीं रहेेगे।‘


पिलखी से धरासू तक भिलंगना व भागीरथी के एक दर्जन से अधिक पुल झील में डूब गए हैं। संपर्क मार्गों की दूरी बढ़ गई है और गांव तक पहुंचने में 4-6 घंटे अधिक लगता है। मार्गों की दूरी बढ़ी तो आने-जाने का किराया भी बढ़ गया। सामान की कीमतें बढ़ गईं। गांव को जोड़ने वाले संपर्क मार्ग जगह-जगह दरक रहे हैं। झील के किनारे के गांवों की स्थिति बद से बदतर हो गई। इन गांव में रहने वाले लोग पूरी तरह प्रकृति की दया पर निर्भर हैं। गांव का झील के आगोश में समा जाए कहा नहीं जा सकता। ऐसे गांव के निवासियों की व्यथा उनके अपार दुख की पराकाष्ठा ही नहीं है। सुविधाएं छीन गईं तो लोग गांव छोड़कर सुविधाजनक स्थान की ओर दौड़ रहे हैं। 

देश के लिए सीमा पर मर-मिटने वाले सैनिकों को शहीदों का दर्जा मिलता है, किंतु सरकार के नुमाइंदों से यह कौन पूछेगा कि जिन्होंने राष्ट्र हित में अपने घर द्वार त्याग दिए या जो दरकते गांव के किनारे रखकर मौत का इंतजार करते हैं। वह कहां रोएं? किससे अपना दुखड़ा सुनाएं? उनका शैक्षणिक, सांस्कृतिक व व्यापारिक केंद्र टिहरी था। परंतु अब उन्हें अपने बच्चों को उच्च-शिक्षा के लिए दूरदराज भेज भेजना पड़ रहा है। जो लोग स्थानीय घी-दूध, फल-सब्जी आदि उत्पाद टिहरी में बेचकर अपनी आवश्यकता का सामान खरीदते थे वह आज लाचारी में जी रहे हैं।

स्रोत:  युगवाणी (अक्टूबर 2012) देहरादून तथा वाकधारा, अप्रैल-जून 2014 देहरादून से प्रकाशित
 

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