उद्गम से संगम तक यमुना

Submitted by Hindi on Mon, 03/25/2013 - 12:56
Source
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 23 मार्च 2013
नदी का स्वभाव जाने बिना यमुना को अहमदाबाद की साबरमती नदी की तरह रिवर फ्रंट बनाकर नदी को सुंदर करने की बात बार-बार हो रही है। रिवर फ्रंट बनाने के पीछे सरकार व शहरी नियोजकों की मंशा अहमदाबाद, दिल्ली, मथुरा, आगरा जैसे शहरों में भी हजारों एकड़ ज़मीन नदी से छीन लेने की है। अपने उद्गम से इलाहाबाद संगम तक बहने वाली नदी यमुना, गंगा की सहायक नदी है। यमुना की कुल लंबाई लगभग 1370 किमी. है। भू- भौतिकी के हिसाब से यमुना को लगभग पांच हिस्सों में किया जा सकता है।

पहला हिस्सा यमुनोत्री (उत्तराखंड) से हथिनीकुंड बैराज (यमुनानगर) तक 177 किमी
दूसरा हिस्सा हथिनीकुंड बैराज से वजीराबाद (दिल्ली) तक 224 किमी
तीसरा हिस्सा वजीराबाद बैराज से ओखला बैराज (दिल्ली) तक 22 किमी
चौथा हिस्सा ओखला बैराज से चम्बल नदी के यमुना में मिलने तक (इटावा के पास) 490 किमी
पांचवा हिस्सा चम्बल नदी संगम से गंगा संगम तक (इलाहाबाद) 468 किमी।

संरक्षा मुहाने से शुरू की जाए


यमुना के पहले हिस्से के पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्र को हमें समग्रता से देखना होगा। घाटियों में हरियाली कम हो रही है। पेड़ कटते जा रहे हैं। पहाड़ का जलग्रहण क्षेत्र संकटग्रस्त होता जा रहा है। यमुना के गाद-गदेरे सूखते जा रहे हैं। एक तो यमुना का पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्र काफी सिमटा हुआ है। इससे यमुना के पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्र का महत्व काफी बढ़ जाता है। यह भी जरूरी हो जाता है कि यमुना की प्राकृतिक वनों की रक्षा हो, मिट्टी व जल स्रोतों का संरक्षण हो। इस ओर ध्यान करने के बजाय मनमाने तरीके से बांध व पनबिजली परियोजना बनाई जा रही है। मूल समस्या तो यह है कि यमुना का प्राकृतिक प्रवाह काफी कम हो गया है। जो थोड़ा-बहुत प्राकृतिक प्रवाह बचा भी है, उसे यदि नहरों-बांधों में डाला गया तो समस्या और गंभीर होती जाएगी। एक तो पहले ही यमुना के ऊपरी क्षेत्र में 13-14 हाइड्रो-इलेक्ट्रिक परियोजनाएं पहले से ही हैं। कोढ़ में खाज की स्थिति यह है कि 10-12 और नई बननी हैं। एक अच्छे उछलते-कूदते पानी को बार-बार बांधों में कैद कर दीजिए। फिर कहिए कि इसकी चंचलता नहीं जाती, करंट नहीं जाता तो यह बेवकूफी होगी।

पहाड़ में सहायक नदियों का तो कोई पूछनहार ही नहीं है। मनमाने ढंग से बांध-बैराज, छोटे बांध बनाते जा रहे हैं। छोटी नदियां तो किसी वृंदावन या मथुरा तो जाती नहीं, फिर उनके लिए क्यों कोई राधे-राधे गाएगा। रेणुका बांध यमुना की सहायक नदी गिरी पर 16 लाख पेड़ों को काट कर बन रहा है। इस बांध में इकट्ठा सारा पानी हर अंतर्देशीय समझौते को ठेंगा दिखाकर दिल्ली लेगी। हथिनीकुंड बैराज जहां यमुना का पहला हिस्सा खत्म होता है। वहां से ‘पूर्वी और पश्चिमी’ यमुना नहर से लगभग 90 फीसद पानी यमुना से निकाल लिया जाता है, 1994 के एक समझौते का नाम लेकर। यमुना के हिस्से के पानी की तो किसी को याद भी नहीं रहती।

पर्यावरणीय प्रवाह की अनदेखी


आगे यमुना के दूसरे हिस्से में युग-युगांतर से अविरल बहने वाली पवित्र यमुना नदी बरसात के बाद एकदम सूखी पड़ी रहती है। पानीपत और दिल्ली के बीच पड़ने वाले सोनीपत और बागपत यमुना खादर में बिल्कुल एक बूंद का भी प्रवाह नहीं है। वास्तविकता यह है कि सरकारें पूरी तरह से यमुना के पर्यावरणीय प्रवाह की अनदेखी कर रही हैं। करीब 10-12 सालों से गर्मियों में यमुना में पानी बिल्कुल रोक दिया गया है। बागपत और सोनीपत के पूरे यमुना खादर में पूरी गर्मियों में एक इंच का भी प्रवाह नहीं होता है। यमुना में पानी नहीं छोड़े जाने से काफी बड़े इलाके में पेयजल समस्या उत्पन्न हो गई है। करोड़ों वर्षों का मिथक टूटा गया कि यमुना की धार को कोई रोक नहीं सकता। जलाभाव से ग्रसित मानव तो किसी प्रकार अपना काम चला रहा है परंतु वन्य प्राणी, पशु और पक्षी घोर संकट में है। यमुना नदी का जल प्रवाह रुक जाने से जल स्तर बहुत नीचे चला गया है। परिणामत: यमुना नदी के आसपास के सभी ट्यूबवेल ठप हो गए हैं। इससे कृषि उपज बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

दूसरे हिस्से में हरियाणा का पानीपत भी है। यहां कपड़ा रंगाई का काम होता है। कभी-कभी तो इस काम में इतना ज्यादा रसायन डाल देते हैं कि वजीराबाद बैराज से दिल्ली को पानी की सप्लाई कई-कई दिन तक रोकनी पड़ती है। इसी हिस्से में तीन नए बैराज की बात बार-बार उठती है। करनाल, पानीपत तथा पल्ला (वजीराबाद से ऊपर) पानी और रोके जाने की जरूरत जताई जाती है।

तीसरा हिस्सा संकटग्रस्त


यमुना अब दिल्ली पहुंच जाती है। दिल्ली में यमुना का प्रदूषण तो जगजाहिर है ही। दिल्ली व आसपास के क्षेत्र में नदी की स्थिति के बारे में राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (नीरी) नागपुर ने अपनी वर्ष 2005 की रिपोर्ट में साफ कह दिया था ‘ऊपर से ताज़ा पानी न मिलने के कारण नदी अपनी प्राकृतिक मौत मर चुकी है।’ नदी का तीसरा हिस्सा बुरी तरह संकटग्रस्त है। यही वह हिस्सा है जिसमें यमुना को 90 फीसद गंदगी मिलती है। दिल्ली में तीन बैराज हैं पर दिल्ली को और कई बैराज चाहिए। हां, एक चीज जरूर होती है कि हथिनीकुंड से वजीराबाद तक सूखी यमुना में दिल्ली काफी मल वाला जल मिलाती है, जिससे यमुना में काला पानी ही सही पर पानी दिखता है। यह अलग बात है कि दिल्ली उसमें कई जहरीले रसायन मिलाकर यमुना को जानलेवा बना देती है।

बार-बार अहमदाबाद की साबरमती नदी की तरह यमुना को भी रिवर फ्रंट बनाकर नदी को सुंदर करने की बात हो रही है। नदी का स्वभाव जाने बिना अहमदाबाद की साबरमती नदी रिवर फ्रंट डेवलपमेंट को उदाहरण की तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है। नदी के दोनों किनारों पर ऊंची पक्की दीवार बनाकर और नदी के ज़मीन का काफी हिस्सा कब्ज़ा कर उसे होटल, मॉल्स, शॉपिंग सेंटर तथा महंगे रेस्टोरेंट को आवंटित कर पैसा कमाने का ज़रिया है। रिवर फ्रंट बनाने के पीछे सरकार व शहरी नियोजकों की मंशा अहमदाबाद, दिल्ली, मथुरा, आगरा जैसे शहरों में हजारों एकड़ जमीन नदी से छीन लेने की है।

चौथे चरण में गंदगी की ठेलमठेल


यमुना के चौथे हिस्से में आगरा, मथुरा जैसे धार्मिक, ऐतिहासिक महत्व के नगर हैं। हर शहर दूसरे शहर को मल-मूत्र सौंपने में लगा हुआ है। यमुना नगर का मल-मूत्र करनाल- कुरुक्षेत्र को; करनाल-कुरुक्षेत्र का मल-मूत्र पानीपत, सोनीपत और बागपत को; पानीपत, बागपत आदि का मल-मूत्र दिल्ली को; दिल्ली का मल-मूत्र मथुरा-आगरा को; और मथुरा-आगरा अपने मल-मूत्र को इटावा- इलाहाबाद आदि शहरों को देने पर आमादा हैं। हरियाणा जहां अपने कारखानों के कचरे को दिल्ली को दे रहा है। वहीं दिल्ली अपने मल-मूत्र को यूपी में बहाने पर लगी हुई है। हालांकि नालों में गिर रहे मल-मूत्र और रासायनिक जहर को साफ करने में हजारों करोड़ रुपये सीवेज ट्रीटमेंट पर खर्च किया जा चुके हैं पर स्थानीय स्तर पर यमुना के किनारे स्थित मल-जल को खाद में बदला जा सकता है। इस सलाह के लिए कभी विश्व बैंक कहे तो शायद सरकार सोचे। मल-जल मिले हुए पानी को ट्रीट कर सिंचाई में उपयोग हो सकता है, यह जानने के लिए निश्चय ही बाहरी एजेंसी का सहारा लेना पड़ेगा।

यह चौथा हिस्सा भी सूखा ही रहता है। ताजमहल को कभी यमुना के किनारे बनाने वालों की मंशा रही होगी कि ताज से यमुना की दीदार सुखद एहसास देगी। पर अब तो यमुना को ताज के लिए खतरनाक बताने की होड़-सी लगी हुई है। हां, इस चौथे हिस्से के बाद ज़रूर यमुना की हालत उसकी बहनें चम्बल, सिंध, केन, बेतवा आदि के मिलने से थोड़ी ठीक होती है। पर अब तो यमुना की बहनों को भी सूली पर चढ़ाने की कोशिश चालू हो गई है। नदी जोड़ के नाम पर केन-बेतवा लिंक करके नदी-तोड़ का काम ज़रूर किया जाएगा।

आखिरी मिलन क्या अंतिम दर्शन भी


सहायक नदियों के मिलने से यमुना थोड़े हौसले से गंगा के गले लगने की आखिरी में कोशिश करती है। संगम पर गंगा से ज्यादा पानी यमुना में दिखता है। पर जल्दी ही वह भी पानी उड़न-छू होने वाला है। कुछ कंपनियों की संगम से पहले थर्मल पावर कारख़ानों के लिए यमुना की पेटे में पंप स्टेशनों के फ़ाउंडेशन बन चुके हैं। 24x7 गति से यमुना से थर्मल पावर कारखानों को पानी जाएगा तो यमुना का पेटा खाली हो जाएगा, जिससे संगम की गरिमा और सौंदर्य को धक्का ही लगेगा। यमुना प्रदूषण और यमुना जीवन के सवाल पर हिन्दू और मुस्लिम धर्म गुरुओं का खड़ा होना, सुखद है।

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