उपजाऊ मिट्टी खाते शहर

Submitted by Hindi on Fri, 07/13/2012 - 16:53
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, जुलाई 2012

वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

रासायनिक खेती, नदियों और भूजल स्तर जैसे पर्यावरणीय विषयों पर लिखना किसी अंधेरे में चीख की तरह लगता है। टी.वी. और समाचारपत्रों में बढ़ता तापमान प्रतिदिन हेडलाइन्स बनता है। उसके साथ ही पंखों, कूलरों और एयरकंडीशनर के विज्ञापन भी बढ़ जाते हैं और उनकी बिक्री भी। परन्तु ओजोन-परत और घटता वन क्षेत्र हमारी चिन्ता का विषय नहीं बनता। शहरों और गांवों में नित नई खुलती दवाई की दुकानें अब हमें नहीं डरातीं। सिने अभिनेता आमिर खान ने 24 जून के ‘सत्यमेव जयते’ कार्यक्रम में रासायनिक खेती के ‘अभिशापों’ और जैविक खेती के ‘वरदानों’ को देश के सम्मुख रखा। लेकिन अभी तक समाज और सरकार की ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है कि कोई रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से चितिंत हो। पंजाब को आधुनिक कृषि का मॉडल मानकर उसका अनुकरण करने से पूरे देश में भी रासायनिक और यांत्रिक खेती के दोष फैल गए हैं। किसी भी राज्य के आन्तरिक, आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक चरित्र को समझे बिना उसका अनुगमन करना खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुओं और ताकत की दवाईयों की तरह पंजाब की खेती भी एक झूठा विज्ञापन है। पंजाब में व्यास नदी के ऊपर का क्षेत्र जो पाकिस्तान की सीमा के पास है मांझा कहलाता है। व्यास नदी और सतलुज नदी के बीच का क्षेत्र दोआब कहलाता है। पंजाब के दक्षिण-पश्चिम का क्षेत्र मलवा या मालवा कहलाता है। यहां के फिरोजपुर, फरीदकोट, मुक्तसर, बठिंडा, मांसा और संगरुर जिले रासायनिक खेती और प्रदूषित जल से सर्वाधिक प्रभावित हैं। अब यह रोग पटियाला और अमृतसर की ओर फैल रहा है। वैसे पूरा पंजाब ही रसायनों से अटा पड़ा है।

गठन के समय पंजाब में 12 जिले थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 22 हो गई है। दोआब क्षेत्र में विदेशों में रहने वाले भारतीयों (एनआरआई) की संख्या सबसे अधिक है और यहीं रसायनों और कीटनाशकों के उपयोग को सर्वाधिक प्रोत्साहन भी मिला है। एनआरआई द्वारा विदेशों से भेजे गये धन से आई समृद्धि को भी पंजाब में खेती से आयी समृद्धि समझने की भूल भी होती है। यहां ठेके पर खेती की नई परम्परा में बड़े किसान छोटे-छोटे किसानों की जमीन ठेके पर लेते हैं खेती की बढ़ती लागत भी इसके लिए जिम्मेदार है। जमीन के मालिक अपनी ही जमीन पर मजदूरी करने को बाध्य हैं। एक आश्चर्यजनक सत्य ही जानकारी हुई कि यहां जानबूझकर आलू की फसल बड़े पैमाने पर लेकर इसके दाम गिरा दिये जाते हैं। आलू से नकली ग्रीस बनाने का धंधा बड़े पैमाने पर होता है। आलूओं को गलाकर उसमें मोबिल-आईल के मिश्रण से नकली ग्रीस बनता है। मैं अभी पंजाब की यात्रा पर था। पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों का नया स्वरूप देखकर दुख ही होता है। यहां ग्रामीण क्षेत्रों में मुश्किल से 2 घंटे खेतों को बिजली उपलब्ध होती है।

मेरी यात्रा तीन रिश्तेदारों की मृत्यु से होने वाले भोगों और अंतिम-अरदास से जुड़ी थी। इनमें दो की मृत्यु खेती के पर्यावरणीय खतरों से घटित हुई थी। बरनाला शहर में एक लोकप्रिय शिक्षिका रिश्तेदार की मृत्यु कैंसर से हुई थी। बरनाला शहर में ठाठ गुरुद्वारे में 18 जून को सम्पन्न अंतिम अरदास में पंजाब और हरियाणा के अकाली, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, स्थानीय दलों के प्रतिनिधियों के साथ-साथ लेखक संघ के प्रतिनिधि भी श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित थे। प्रारंभ में ही श्रद्धांजलि सभा के तेज तर्रार संचालक ने रासायनिक खेती और जल प्रदूषण से होने वाली मौतों का विवरण दिया। कार्यक्रम के संचालक ने कहा ‘‘हम इसी तरह हर दूसरे-तीसरे दिन किसी न किसी की कैंसर से हुई मृत्यु पर एकत्रित होते है। हम स्वर्गवासी को श्रद्धांजलि देकर अपने-अपने घर चले आते हैं, पर खेती और पानी के प्रदूषण पर चर्चा भी नहीं करते हैं।’’

इसके बाद अकाली दल के एक क्षेत्रीय बडे़ नेता ने अपने उद्बोधन में डपटते हुए कहा ‘‘यह अवसर ‘राजनीति’ करने का नहीं है। हमें मृत्यु के अवसर पर मृत-आत्मा के गुणों और कामों के बारे में ही बोलना चाहिए।’’ इसके बाद उन्हीं के आदेशानुसार सभा चलती रही। वर्तमान एवं पूर्व विधायक और सांसद अपनी-अपनी बात कह चलते बने। सभी ने मृतका को गौरवान्वित किया लेकिन जीवन शर्मिन्दा सा बैठा रहा। गुरुद्वारे के हॉल में लंगर चल रहा था और सभी आर.ओ. के कन्टेनरों से पानी पी रहे थे। रिवर्स-आस्मोसिस (आर.ओ.) के पानी के साथ चलता लंगर आधुनिक पंजाब का एक दृश्य बना रहा था। पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आर.ओ. सिस्टम से साफ किया पानी पीना समृद्ध और पढ़ा-लिखा होने की निशानी है। क्या यही है हमारा पंजाब?

वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आर.ओ. पद्धति से भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, क्रोमियम, लोहा आदि की तरह यूरेनियम को दूर भी नहीं किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कई गांवों में आर.ओ. सिस्टम लगाये हैं जहां गरीबों को न्यूनतम मूल्य पर पीने का पानी दिया जाता है। पर पशु तो वही पानी पीते हैं जो तीन सौ फुट नीचे से खींचा जाता है। पशुओं के दूध में दूषित पानी का असर लोगों तक भी पहुंचता रहता है। फरीदकोट के बाबा फरीद मंदबुद्धि बच्चों के संस्थान में भरती होने वाले बच्चों के शरीर में ये धातुएं और यूरेनियम पाये गये हैं। मां के दूध के साथ प्रदूषित पानी बच्चों तक पहुंच रहा है। सतलुज नदी लुधियाना जैसे महानगर के औद्योगिक क्षेत्र से होकर मालवा में पहुंचती हुई जल प्रदूषण के कारण काली पड़ जाती है।

पंजाब के कई जिलों विशेषकर जालंधर और लुधियाना के आसपास के कई गांवों के खेतों में कई-कई फुट गहरे खेत मिलते हैं। बढ़ते शहरीकरण और आधुनिक गांवों में पक्के मकानों के लिए करोड़ों की संख्या में ईंटों की आवश्यकता होती है। जमीनें बहुत महंगी होने के कारण चिमनी-भट्टे तो एक निर्धारित स्थान पर हैं। पर ईंट बनाने के लिए मिट्टी खेतों से प्राप्त की जाती है। यहीं पंजाब के ईंट-उद्योग की परम्परा है। खेतों की एक बित्ता (करीब 12 इंच) गहरी एक एकड़ में फैली मिट्टी 3 वर्ष के लिए एक लाख रु. में बिकती है। अधिकांश खेत तीन से चार फीट गहरे कटे मिलते हैं। इस प्रकार ऊँचे-नीचे खेतों से सिंचाई की समस्या भी उत्पन्न होती है। अधिकांश छोटे किसान अपने खेत ईंट बनाने के लिए ठेके पर दे देते हैं। किसानों को यह समझाया जाता है कि तीन-चार फीट गहरी मिट्टी हटा लेने से नयी और अधिक उपजाऊ मिट्टी मिलती है जिससे फसल अधिक होती है। जबकि प्रमाण इसके विरुद्ध हैं।

बरनाला से टैक्सी द्वारा अमृतसर की ओर जाते हुए जीरा नामक कस्बे में सैकड़ों ट्रैक्टर सड़क मार्ग पर दोनों तरफ खड़े थे। ये ट्रैक्टर किश्त न चुका पाने के कारण और लागत बढ़ने से खेती महंगी होने के कारण बिकने और नीलाम होने के लिए खड़े थे। किसान अपने पशु और ट्रैक्टर बेचकर कर्ज चुकाने को बाध्य हैं। इस वर्ष जून माह तक वर्षा न होने से धान की बोनी उतनी ही जमीन पर हो सकी है जितनी 2 घंटे में प्राप्त बिजली से खेत पानी से भरे जा सकते हैं। पंजाब की कृषि के अनुभव से लगता है कि पंजाब के किसान किसी बड़े संकट की तरफ बढ़ रहे हैं। पंजाब की आधुनिक कृषि-क्रान्ति के इस असफल मॉडल से हम सीख सकते हैं कि झूठ पर आधारित व्यवस्था अधिक दिन नहीं चल पाती है। पंजाबी संस्कृति का उद्घोष वाक्य ‘सत् श्री अकाल’ अर्थात सत्य की विजय हर समय (काल) में होती है। प्रश्न है पंजाब के किसानों को और कितनी अग्नि- परीक्षाएं देनी होगीं?

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