ऊपरी गंगा बेसिन में बादलों के फटने की संभावना एवं संवेदनशीलता का आकलन

Submitted by UrbanWater on Sat, 03/14/2020 - 16:36
Source
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रूडकी

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सारांश

उत्तराखंड राज्य के ऊपरी गंगा बेसिन (यू.जी.बी) में बादल फटने से अत्यधिक वर्षा, अचानक बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएं बारंबार हो रही हैं, जिनसे अंततः भूस्खलन सक्रिय होता है और बड़े पैमाने पर तलछट नदियों में बह कर आता है। 20-30 वर्ग कि.मी.के छोटे क्षेत्र में अचानक आई भारी वर्षा को बादल फटने की घटना के रूप में परिभाषित किया जाता है। बादल फटना और इससे जुड़ी आपदाएं ऊपरी गंगा बेसिन में हर साल होने वाली मानवीय हानि, आजीविका के नुकसान, बुनियादी ढांचे के ढहने, पर्यावरण समस्या और लोगों के पलायन का मुख्य कारण है।वर्तमान अध्ययन में 2010 से 2018 की अवधि के दौरान प्रतिवेदित बादलों के फटने की घटनाओं को जी.आई.एस और रिमोट सेंसिंग तकनीकों द्वारा संकलित, समानुक्रमित एवं भू-चिन्हित किया गया ताकि इन घटनाओं के स्थानिक और सामयिक स्वरूप का विश्लेषण करके इन घटनाओं के लिए अतिसंवेदनशील हॉटस्पॉट्स की पहचान की जा सके। इसके अलावा, यू.जी.बी में बादल फटने की घटनाओं का विश्लेषण करने के लिए वर्षा के प्रभाव, भूमि की सतह के तापमान, ऊंचाई, प्रभावित जनसंख्या के आधार पर गांवों को स्थानिक रूप से एकीकृत किया गया। वर्ष 2010 से 2018 के दौरान कुल 40 बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। घटना के स्थानिक स्वरूप का विश्लेषण 20 कि.मी अंतराल के प्रोफाइल आलेखन के माध्यम से किया गया। बादल फटने की घटनाओं की आवृत्ति के आधार पर बहुत उच्च, उच्च, मध्यम और कम संवेदनशील क्षेत्रों वाले प्रोफाइलों की पहचान की गई। बादल फटने की घटनाओं के लिए चमोली, ऊखीमठ, पोखरी, चिन्यालीसौड़, पाबो, नरेंद्र नगर और भटवारी ब्लॉक सबसे अधिक असुरक्षित हैं। घटनाओं के घटने के मध्य संबंधों का विश्लेषण स्थलाकृति के अनुसार किया गया।यह पाया गया कि अधिकांश घटनाएं (लगभग 70%) 2000 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्र में हुई। बादल फटने की घटनाओं के संबंध में स्थानिक वर्षा और भूमि की सतह के तापमान (LST) का विश्लेषण किया गया। वर्षा के वितरण के विश्लेषण से पता चलता है कि कम वर्षा के साथ यू.जी.बी. के मध्य और पूर्वी हिस्सों में बादल फटने की घटनाएं अधिक देखी जा रही हैं। घटनाओं वाले अधिकांश क्षेत्रों में भूमि की सतह का तापमान आम तौर से 200C सेs 300 C के मध्य था। बादल फटने की घटनाओं से आसानी से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों और जनसंख्या का 2 कि.मी., 5 कि.मी और 10 कि.मी. के बफ़र ज़ोन में विश्लेषण किया गया। घटनाओं के क्षेत्र क¨ घेरते हुए 2 कि.मी, 5 कि.मी और 10 कि.मी त्रिज्या के तीन बफर रिंग खींचे गए। इन घटनाओं के कारण प्रभावित होने की संभावना वाले गाँवों की संख्या और जनसंख्या के आकलन हेतु प्रत्येक बफ़र ज़ोन के अंतर्गत आने वाले गाँवों की पहचान की गई और तदनुसार उनकी जनसंख्या नोट की गई। यह पाया गया कि बादल फटने की घटनाओं के स्थान से 10 कि.मी की त्रिज्या के बफर में 3000 गांवों में बसे लगभग 80 लाख लोग बादल फटने की घटनाओं की संभावना वाले क्षेत्र में रहते हैं।

मुख्य शब्दः बादल फटना, अत्यधिक वर्षा, ऊपरी गंगा बेसिन, सुस्पष्टता, भेद्यता

 Abstract

In Uttarakhand state, the Upper Ganga Basin (UGB) is frequently witnessing natural disasters like extreme rainfall in the form of cloudbursts, flash floods, which ultimately triggers landslides, and large sediment flow into rivers. The cloudburst phenomena define as sudden heavy deluge of rainfall in a short duration over a very small area 20–30 km2. The cloudburst and its associated disaster is one of the main cause of human causality, livelihood loss, infrastructure collapse, environment issue and migration of the people every year in Upper Ganga Basin. In the present study, reported cloudburst events during the period 2010-2018 were compiled, collated, and geotagged to make an assessment of the spatial and temporal patterns of occurrence, to identify the hotspots susceptible to these events using GIS and remote sensing. Further, the influence of rainfall, land surface temperature, elevation, population susceptible, villages were spatially integrated to analyses the cloudburst events in the UGB.A total of 37 cloudburst events have been reported during 2010-2018. The spatial pattern of occurrence analyzed through plotting 20 km interval profiles. The profiles with very high, high, medium and less vulnerable areas were identified based on the frequency of occurrence of cloudburst events. The blocks viz. Chamoli, Ukhimath, Pokhri, Chinyalisaur, Pabo, Narender Nagar and Bhatwari are most vulnerable from cloudburst events. The correlation between occurrences of event with relief (topography) was analysed. It was seen that majority of the events (about 70%) were reported in elevation zone less than 2000 m. The spatial rainfall and land surface temperature (LST) w.r.t. occurrence of cloudburst events were also analyzed. Rainfall distribution indicates central and eastern parts of UGB with less rainfall are witnessing higher cloudburst events. The average LST of 20oC to 30oC was common in most of the areas where events were reported. Susceptible villages and population with a buffer zone w.r.t the reported cloudburst event at 2 km, 5 km, and 10 km radius were analyzed. Three buffer rings were drawn surrounding the reported events at a buffer radius of 2 km, 5 km and 10 km proximity. The villages lying under each buffer zones were identified and their corresponding populations noted to measure the number of villages and population likely to be affected due to these events. It was found that about 8 million people spreadover in 3000 villages are prone to cloudburst events with a buffer radius of 10 km from the point of occurrence of reported cloudburst events. Key words:Cloudburst, Extreme precipitation, Upper Ganga basin,Susceptibility, Vulnerability

1. परिचय

हाल के वर्षों में भारतीय हिमालय में अत्यधिक वर्षा से जुड़ी ‘‘बादलों के फटने’’ की घटनाओं की सूचना आती रहती है। हिमालय की पार्वतिकी (ओरोग्राफी) और इसकी स्थलाकृति के बीच की परस्पर क्रिया बादलों के फटने की घटना के लिए एक उपयुक्त स्थिति बनाती है (थेय्येन इत्यादि, 2012; डिमरी इत्यादि, 2017)। समूचा उपरी गंगा बेसिन (यू.जी.बी) वर्षा से जुड़े स्तरों जैसे बादल फटना, भूस्खलन आदि की चपेट में है। यह हिमालय की सीधी खड़ी और अस्थिर ढलानों वाली विशिष्ट स्थलाकृति के कारण हो सकता है। विभिन्न शोधकर्ताओं ने कुछ घटनाओं के स्थान, परिमाण और तीव्रता का पता लगाने का प्रयास किया है, लेकिन सटीक कारण निश्चित करना चुनौती का विषय है। ‘‘बादलों के फटने’’ की घटना स्थानीय रूप से बहुत कम समय में भारी वर्षा (20 से 1000 मि.मी/घंटा) की घटनाएं हैं (डेउजा इत्यादि, 1991)। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, ‘‘बादलों के फटने’’ की घटना एक ऐसी मौसमीघटना है, जिसमें 20-30 वर्ग कि.मी के भौगोलिक क्षेत्र में तेज हवाओं और बिजली के साथ 100 मि.मी/घंटा से अधिक की अप्रत्याशित वर्षा होती है। साधारणतया बादल फटने की घटनाएं तब होती हैं जब अत्यधिक नमी के साथ ऊष्मागतिक रूप से अस्थिर वातावरण (क्यूम्लोनिम्बस या गरजने वाले बादल) खड़ी स्थलाकृतियों के बीच फंसा हुआ होता है (उपाध्याय, 1995; दास इत्यादि, 2006)। कई बार सिंटॉपिक-स्केल सर्कुलेशन और जलीय चक्र के बीच अंतःक्रिया का विशेष रूप से पहाड़ी क्षेत्र में मौसमी प्रभाव में बादल फटने की घटनाओं को सक्रिय करता है (बोरगा, 2014)। भान इत्यादि 2004 के शोध के अनुसार बादल फटने की अधिकांश घटनाएं मानसून के मौसम के दौरान होती हैं। पूर्व मानसून की अवधि के दौरान पश्चिम मानसून प्रणाली और पूर्वी हवाओं के बीच अंतःक्रिया के कारण प्रायः मध्य हिमालय पर अत्यधिक वर्षा होती है (ठाकुर, 2000 सिक्का इत्यादि, 2015; इत्यादि 2015)। ऐसी चरम घटनाओं के अनुकूलन और शमन पर कार्रवाई करने के लिए भेद्यता और अतिसंवेदनशीलता का आकलन आवश्यक है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आई.पी.सी.सी) तीन घटकों, अनुकूलन क्षमता, संवेदनशीलता और एक्सपोजर के रूप में भेद्यता को परिभाषित करता हैः (आई.पी.सी.सी, 2007)। जलवायु परिवर्तन पृथ्वी के साथ-साथ वायुमंडल के लिए एक बड़ी समस्या है, जलवायु परिवर्तन का प्रभाव क्षेत्र से क्षेत्र, देश सेदेश, सेक्टर से सेक्टर और समुदाय से समुदाय पर भिन्न-भिन्न होता है (अड्गेर इत्यादि 2009; कापेरसों इत्यादि 2003)। विशेष रूप से हिमालय में बादल फटने की लगातार घटनाएं जलवायु परिवर्तन से जुड़ी एक घटना हो सकती है। पूरे हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तापमान वैश्विक औसत से अधिक है जो चिंता का विषय है (आई.पी.सी.सी, 2007)। जलवायु परिवर्तन की भेद्यता की गतिशील प्रकृति बायोफिज़िकल और सामाजिक प्रक्रियाओं दोनों पर निर्भर करती है ( ओब्रिएन 2005; आई.पी.सी.सी2)।

वर्तमान अध्ययन में यू.जी.बी में रिपोर्ट की गई बादलों के फटने की घटनाओं के घटित होने और आवृत्ति, क्षेत्र के लिए उनकी भेद्यता और संभावित नुकसान को समझने और आकलन करने का प्रयास किया गया है। भेद्यता और अतिसंवेदनशीलता का मूल्यांकन योजनाकारों और नीति निर्माताओं को निवारक उपायों की योजना बनाने के लिए एक पूर्व जानकारी प्रदान करता है ताकि क्षति की मात्रा पर अंकुश लगाया जा सके। विशेष रूप से, भेद्यता को सामाजिक आर्थिक स्थितियों के एक सेट के रूप में समझा जाना चाहिए जो विशेष रूप से जोखिम वाले जोखिमों के संबंध में पहचाने जाने योग्य हैं, और इसलिए एक पूर्वानुमानात्मक भूमिका निभाते हैं जो जोखिम को कम करने में सहायता कर सकते हैं (कैनन, 2008)। भेद्यता तीन घटकों से जुड़ी है। क्षेत्र की अनुकूलन क्षमता, इसकी संवेदनशीलता, और एक्सपोजर घटनाओं के परिमाण और लोगों की उनसे लड़ने की क्षमता का निर्धारण करते हैं (IPCC 2007)। एक्सपोजर प्रणाली के बाहरी कारकों, जैसे कि चरम मौसम की घटनाओं सहित परिवर्तन या औसत जलवायु परिस्थितियों में बदलाव की दर सहित जलवायु परिवर्तनशीलता को दर्शाता है। संवेदनशीलता और अनुकूलन क्षमता प्रणाली के आंतरिक गुणों, लचीलापन और मुकाबला करने की विशेषताओं को दर्शाती है। एक समुदाय की अनुकूलन क्षमता आर्थिक, सामाजिक और तकनीकी कारकों के संयोजन पर निर्भर करती है जैसे कि बुनियादी ढांचे का विकास और संसाधनों के वितरण की सीमा। प्रणाली और क्षेत्रीय अंतर के आधार पर, ये कारक काफी गतिशील हैं और काफी भिन्न होते हैं।

कुछ मामलों में, उच्च स्तर के एक्सपोज़र मान, उच्च अनुकूलन क्षमता द्वारा बेअसर हो सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भेद्यता मान का मान कम हो सकता है। लेकिन यूजीबी जैसा क्षेत्र, तुलनात्मक रूप से कम अनुकूलन क्षमता के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रति स्वाभाविक रूप से अधिक संवेदनशील माना जाता है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से पहाड़ी हिस्सा है जो कृषि पर निर्भर करता है जिसमें 50% कृषि जोत औसतन 0.5 हेक्टेयर से कम और लगभग 70% के पास 1 हेक्टेयर से कम है, जिससे जीविका के प्रमुख साधनकृषि के बारे में पता चलता है (भट्ट 2006)। अधिक ऊंचाई पर समग्र सामाजिक आर्थिक स्थिति निम्न है, जिसमें 37% आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, और सड़क संपर्क खराब है। अध्ययन में बादल फटने की घटनाओं को संकलित किया गया तथा क्रमवार लगाया गया, और घटना के स्थानिक और सामयिक पैटर्न का आकलन करने के लिए जियोटैग किया गया, ताकि जीआईएस और रिमोट सेंसिंग का उपयोग करके इन घटनाओं के लिए अतिसंवेदनशील हॉटस्पॉट की पहचान की जा सके। इसके अलावा, यूजीबी में बादल फटने की घटनाओं क¨ समझने के लिए वर्षा का प्रभाव, भूमि की सतह का तापमान, ऊंचाई, आबादी, अतिसंवेदनशील के अनुसार गांवों को स्थानिक रूप से एकीकृत किया गया। वर्ष 2010 से 2018 के दौरान कुल 39 बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। घटना के घटित होने के स्थानिक पैटर्न का विश्लेषण20 कि.मी अंतराल के प्रोफाइल के माध्यम से किया गया। इसके अलावा बादल फटने की घटनाओं के अतिसंवेदनशील गांवों और आबादी की पहचान 2 किमी, 5 किमी और 10 किमी के दायरे के बफर जोन के साथ में भी की गई है। इन घटनाओं के लिए अतिसंवेदनशील हॉटस्पॉट की पहचान की गई है। इसके अलावा, वर्षा का प्रभाव, भूमि की सतह का तापमान, ऊंचाई, जनसंख्या, अतिसंवेदनशील गाँवों को स्थानिक रूप से एकीकृत किया गया ताकि यू.जी.बी में बादल फटने की घटनाओं का विश्लेषण किया जा सके।

2. अध्ययन क्षेत्र

पूरे गंगा बेसिन में तीन अलग-अलग विस्तार हैं जो कि ऊपरी विस्तार, मध्य विस्तार और निचलाविस्तार हैं। वर्तमान अध्ययन ऊपरी गंगा बेसिन (ऊपरी विस्तार) तक सीमित है, जो भारत के उत्तराखंड राज्य में 30038' सेs 31024' उत्तरी अक्षांश और 78029' सेks 79022' पूर्वी देशांतर के मध्य तक स्थित है। ऊपरी गंगा बेसिन में ऊंचाई और जलवायु में व्यापक भिन्नता है। ऊंचाई निचले हिस्से में 90 मीटर से लेकर ऊंचे पहाड़ों में 7500 मीटर तक बदलती है। यूजीबी का भौगोलिक क्षेत्र 22,580 वर्ग किमी है। नदीय और हिम नादिय परिदृश्य यूजीबी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। क्षेत्र में वार्षिक औसत वर्षा लगभग 550 से 2500 मिमी होती है। यूजीबी में मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय तापमान क्षेत्र हैं। ऊपरी गंगा को दो प्रमुख उप-घाटियों में विभाजित किया गया है, जिसमें अलकनंदा और भागीरथी नदी शामिल हैं (चित्र 1)। वर्षा और झरनों (बेस फ्लो) द्वारा पोषित इन नदियों के अपवाह में हिमनद और हिम गलन की भी बेसिन महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

 चित्र 1 ऊपरी गंगा बेसिन (यूजीबी) का स्थल मानचित्र चित्र 1 ऊपरी गंगा बेसिन (यूजीबी) का स्थल मानचित्र

यूजीबी में पांच प्रमुख प्रशासनिक जिले उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, टिहरी गढ़वाल और पौड़ी गढ़वाल हैं। यूजीबी के 5000 से अधिक गांवों में लगभग 25.69 मिलियन आबादी निवास करती है। अधिकांश गांव 1000 मीटर से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्र में पाए जाते हैं। यूजीबी में ऊंचाई-वार गांवों की संख्या और आबादी चित्र 2 में दर्शाई गई है। यूजीबी में जनसंख्या का घनत्व तुलनात्मक रूप से कम है। उत्तराखंड के दोनों गढ़वाल क्षेत्र (टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल) यूजीबी में आते हैं। भारत का सबसे ऊँचा बाँध (260.5 मीटर) टिहरी बाँध टिहरी गढ़वाल जिले में भागीरथी नदी पर स्थित है।

 चित्र 2 यूजीबी में गांवों और आबादी की ऊंचाई-वार संख्या चित्र 2 यूजीबी में गांवों और आबादी की ऊंचाई-वार संख्या

3. प्रयुक्त आंकड़े

हिमालयन इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन ;( NMSHE) के तहत, एक बहु-विषयक टीम यूजीबी में जल जनगणना और हॉटस्पॉट विश्लेषण के काम में लगी हुई है। यूजीबी में बादल फटने की घटनाओं की उच्च आवृत्ति को देखते हुए, इस क्षेत्र में बादल फटने की घटनाओं की एक सूची तैयार करने की आवश्यकता महसूस की गई। तदनुसार, ऑनलाइन और माध्यमिक स्रोतों सहित स्थानीय और राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में सूचित से सभी घटनाओं का अनुसरण किया गया और 2010 के बाद की घटनाओं की पहचान की गई (परिशिष्ट-1)। जीआईएस और स्थानिक मानचित्र का उपयोग करके सूचितवृत्ति के आधार पर इन घटनाओं को जियो टैग किया गया (चित्र 3)। कुछ घटनाओं को प्रमाणित करने के लिए टीम ने गांव स्तर पर यात्रा भी की। इसके अलावा, यह अध्ययन स्थानिक आवरण और एकीकरण के माध्यम से संबंधित घटनाओं के साथ वर्षा, भूमि की सतह के तापमान, ऊंचाई, आबादी की अतिसंवेदनशीलता के स्थानिक सहसंबंध का विवरण प्रस्तुत करता है। इसके लिए निम्नलिखित आंकडों का उपयोग किया गया हैः

  • ऊपरी गंगा बेसिन को ऊंचाई के चार वर्गीकरण ज़ोन (<1000 मीटर, 1000 से 2000 मीटर, 2000 से 3000 मीटर, >3000 मीटर), में विभाजित करने के लिए के लिए 30 मीटर स्थानिक रिज़ॉल्यूशन के उन्नत अंतरिक्ष उत्पन्न थर्मल उत्सर्जन और परावर्तन रेडियोमीटर (ASTER) डीईएम का उपयोग किया गया
  • 0.25 डिग्री के रिज़ॉल्यूशन के आईएमडी (इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट) के ग्रिड वर्षा आंकड़े,
  • ट्रॉपिकल रेनफॉल मेजरमेंट मिशन (TRMM) के 0 0.25° x 0.250 के स्थानिक रिज़ॉल्यूशन के साथ व्युत्पन्न वार्षिक वर्षण आंकड़े (बुकघन इत्यादि, 2006),
  • 0.05° के स्थानिक रिज़ॉल्यूशन के साथ MODIS&MOD11C3 मासिक भूमि सतह तापमान आंकड़े,
  • सर्वे ऑफ इंडिया से कैडस्ट्रल मैप, और
  • 2011 के जनगणना आंकड़े।

 4. दृष्टिकोण और पद्धति

वर्ष 2010 से 2018 के दौरान कुल 39 बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। पूरे यूजीबी को घटनाओं की प्रोफाइल-आधारित आवृत्ति विश्लेषण करने के लिए ऊंचाई नक्शे पर 20 किमी x 20 किमी ग्रिड आकार में विभाजित किया गया है। साथ ही 20 किमी के 10 प्रोफाइल (वर्टिकल) विकसित किए गए। जहां बादलों के फटने की घटनाओं की आवृत्ति अधिक थी, वहां सबसे महत्त्वपूर्ण प्रोफाइल/हॉटस्पॉट की पहचान करने के लिए घटनाओ को ओवरले किया गया। घटना की आवृत्ति के आधार पर सबसे अधिक भेद्य प्रोफाइल की पहचान पांच भेद्यता मानदंड¨ यथा बहुत उच्च संवेदनशील क्षेत्र, उच्च संवेदनशील क्षेत्र, मध्यम संवेदनशील क्षेत्र, कम संवेदनशील क्षेत्र और जोखिम वाले क्षेत्र के रूप में की गई थी (चित्र 4)। अध्ययन में स्थानिक वर्षा, भूमि सतह तापमान, अतिसंवेदनशील गांवों, आदि के साथ इन घटनाओं के घटित होने के संबंधो के बारे में भी बताया गया है। 2 किमी, 5 किमी, और 10 किमी के दायरे के बफर क्षेत्र में बादल फटने की घटनाओं के लिए अतिसंवेदनशील गांवों को पहचान कर जनसंख्या की सूचना के साथ आर्कजीआईएस का उपयोग करके उनका नक्शा बनाया गया। प्रत्येक बफर जोन के अंतर्गत आने वाले गांवों की पहचान की गई और उनकी संबंधित आबादी का पता लगाया गया।

 चित्र 3 यूजीबी में 2010  से 2018  के दौरान सूचित बादल फटने की जियो-टैगेड घटनाएं चित्र 3 यूजीबी में 2010 से 2018 के दौरान सूचित बादल फटने की जियो-टैगेड घटनाएं  चित्र 4 यूजीबी की स्थलाकृति पर 20 किमी ग्रिड परबादल फटने की घटनाओं का ओवरले चित्र 4 यूजीबी की स्थलाकृति पर 20 किमी ग्रिड परबादल फटने की घटनाओं का ओवरले

 चित्र 5 घटनाओं की प्रोफाइल आधारित आवृत्ति चित्र 5 घटनाओं की प्रोफाइल आधारित आवृत्ति

5. परिणाम और चर्चा

5.1 बादल फटने का भेद्यता मूल्यांकन

 5.1.1 बादल फटने की घटनाओं का पैटर्न (प्रोफाइल-आधारित; घटनाओं की आवृत्ति)

दास इत्यादि (2006) के अनुसार, भारत में बादल फटने की घटना तब होती है जब कम दबाव के क्षेत्र से जुड़े मानसून के बादल बंगाल की खाड़ी से उत्तर की ओर गंगा के मैदानों से होते हुए हिमालय पर जाते हैं और भारी वर्षा करते हैं। बादल फटने की घटना नितांतस्थानीय घटना है और इसकी सीमित सामयिक और स्थानिक सीमा है। भू-आकृति विज्ञान का व्यापक अनुमान लगाने के लिए, उन क्षेत्रों का चयन किया गया जहाँ पर हाल ही में बादलों के फटने की घटनाएं हुई हों, ताकि उनके उन्नयन के साथ स्थानीय स्थलाकृति की भूमिका को समझा जा सके। बादलों के फटने की घटनाओं को ऊंचाई के वर्गीकरण के अनुसार वितरित किया जाता है जो 1000 मीटर से 3000 मीटर से अधिक तक हैं (चित्र 2)। 20.02 मिलियन की कुल आबादी के साथ लगभग 71% गाँव 1000 मीटर से 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले बैंड में स्थित हैं। इसलिए, इस ऊंचाई वाले क्षेत्र में होने वाली कोई भी घटना संपत्तियों और जीवन के लिए नुकसान के मामले में विनाशकारी होगी। इसी तरह का एक पैटर्न तब देखा गया था जब पानी से संबंधित घटनाओं और हिमालय पर्वत में इन घटनाओं की चपेट में आने वाले लोगों/गांवों की घटना का विश्लेषण किया गया था। जब रिपोर्ट की गई चरम घटनाओं के गाँव के स्थान को नक्शे पर अंकित किया जाता है, तो यह पता चलता है कि अधिकांश घटनाएं मानसून के अग्रभाग के समान एक विशेष पैटर्न का अनुसरण करती हैं, और मुख्य रूप से 500 से 2000 मीटर के बीच ऊंचाई बैंड में केंद्रित रहती हैं (चित्र 6)। इसकी घटना के घटित होने एवं रिलीफ के बीच प्रोफाइल प्लॉटिंग (P1) में भी पुष्टि की गई है, जहां सभी पांच घटनाएं 1500 मीटर से नीचे की ऊंचाई पर हुई थी। (चित्र 7)। 2010 से 2018 के दौरान रिपोर्ट की गई कुल 37 घटनाओं में से दो-तिहाई घटनाएं 2000 मीटर से कम की ऊंचाई पर हुईं (चित्र 8)। चूंकि अधिकतर गाँव 1000 मीटर से 2000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं, इसलिए अधिक लोग बादल फटने की घटनाओं से प्रभावित होते हैं जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों और जीवन को काफी नुकसान होता है।

 चित्र 6 डीईएम के ऊपर अंकित बादल फटने की घटनाएं चित्र 6 डीईएम के ऊपर अंकित बादल फटने की घटनाएं

 चित्र 7 घटनाओं के घटने के स्थान और रिलीफ के बीच प्रोफ़ाइल प्लॅाटिंग p1 चित्र 7 घटनाओं के घटने के स्थान और रिलीफ के बीच प्रोफ़ाइल प्लॅाटिंग p1

 चित्र 8 बादल फटने की घटनाओं और रिलीफ (स्थलाकृति) के बीच सहसंबंध चित्र 8 बादल फटने की घटनाओं और रिलीफ (स्थलाकृति) के बीच सहसंबंध

5.1.2 सूचित बादल फटने की घटनाओं और वर्षा के बीच संबंध

किसी स्थान का भूगोल उसे बादल फटने की घटनाओं, जो कि एक छोटे क्षेत्र पर अचानक उच्च तीव्रता की बारिश पैदा करने वाली एक घटना है, के लिए अतिसंवेदनशील बनता है। स्थलाकृति, भूविज्ञान, टेक्टोनिक गतिविधि के लिए प्रवृत्ति और पारिस्थितिक नाजुकता के कारण, ऊपरी गंगा बेसिन सूक्ष्म पैमाने पर तेजी से बदलता मौसम प्रवृत्ति क्षेत्र है। अध्ययन में इन घटनाओं के घटित होने और यूजीबी में हुईबारिश के बीच स्थानिक सहसंबंध की जांच की। यू.जी.बी में वर्ष 1901-2015 के दौरान वार्षिक औसत वर्षा ज्ञात करने के लिए 0.250x 0-250 डिग्री के रिज़ॉल्यूशन वाले इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट के ग्रिड वर्षा के आंकड़ों को उपयोग में लाया गया। जब रिपोर्ट की गई घटनाएं स्थानिक वर्षा के नक्शे पर देखी गई, तो यह पाया गया कि कम वर्षा वाले क्षेत्रों का घटनाओं के होने से एक मजबूत संबंध है (चित्र 9)।

 चित्र 9 बादल फटने की घटनाओं और वर्षा के बीच संबंध चित्र 9 बादल फटने की घटनाओं और वर्षा के बीच संबंध

बूखागेन (2000) ने 1998 से 2009 की अवधि के लिए ज्त्डड वर्षा डेटा का उपयोग करते हुए मध्य हिमालय की दो-चरण वाली स्थलाकृति की व्याख्या की है। चित्र 10 में भी यह बताया कि T2, और T3 प्रोफाइलों में, जिनमें कम वर्षा होती है, बादलों के फटने की घटनाओं की आवृत्ति अधिक होती है।

 5.1.3 सूचित बादल फटने की घटनाओं और भूमि की सतह के तापमान (LST) के बीच संबंध

आमतौर पर, अधिकांश बादल फटने की घटनाएं ज्यादातर जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में 20 ⁰C से 30⁰C के भूमि सतह तापमान की सीमा में होती हैं, (चित्र = 11) के महीनों में होती हैं। इस क्षेत्र में, जिसमें व्यापक एंटीकलाइन और सिंकलाइन है, गर्मियों में घाटियों में तापमान लगभग 20⁰C तक पहुंच जाता है जो उच्च ऊंचाई पर 5⁰C तक पहुंच जाता है। पतन दर (लैप्स रेट) से प्रभावित गर्म हवाएं ढलान पर चढ़ती है और आसपास की मौसम के कारण अचानक वर्षा करती हैं।

 चित्र 10 प्रोफ़ाइल p1 के लिए घटनाओं के घटने और रिलीफ के बीच प्रोफ़ाइल प्लाॅटिंग चित्र 10 प्रोफ़ाइल p1 के लिए घटनाओं के घटने और रिलीफ के बीच प्रोफ़ाइल प्लाॅटिंग

चित्र 11 बादल फटने की घटनाओं और औसत LST की घटना के बीच संबंध चित्र 11 बादल फटने की घटनाओं और औसत LST की घटना के बीच संबंध

5.2 बादल फटने की घटनाओं का फैलाव तथा गाँवों और जनसंख्या की संवेदनशीलता

अधिकतर अतिसंवेदनशील गांव और आबादी 2 किमी, 5 किमी और 10 किमी के दायरे में पाए गए। सूचित घटनाओं के स्थानों को घेरते हुए 2 किमी, 5 किमी और 10 किमी के व्यास तीन बफरगोले खींचे गए (चित्र 12)। प्रत्येक बफ़र ज़ोन के अंतर्गत आने वाले गाँवों की पहचान की गई और गाँवों की संख्या और जनसंख्या को नोट किया ताकि प्रभावित होने की संभावना वाले गावों और उनकी संबंधित आबादी का पता लगाया जा सके (तालिका 1)।

तालिका 1 बादल फटने की आशंका वाले गांवों और आबादी की संख्या

बादल फटने की घटना से निकटता

गांवों की सख्या

जनसंख्या (मिलियन)

2 KM

234

0-75

5 KM

1017

3-09

10 KM

2957

8-37

 चित्र 16 घटना के बिंदु से 2 किमी, 5 किमी और 10 किमी के दायरे में बफ़र चित्र 16 घटना के बिंदु से 2 किमी, 5 किमी और 10 किमी के दायरे में बफ़र

5. निष्कर्ष

ऊपरी गंगा बेसिन (यू.जी.बी) में लगातार बादल फटने और अचानक बाढ़ की घटनाएं हो रही हैं, जिनके कारण अंततः भूस्खलन सक्रिय होते हैं और बड़ी मात्रा में तलछट नदियों में बहता है। बादल फटने और उससे जुड़ी आपदाएं, प्रत्येक वर्ष जान-माल की हानि, आजीविका को नुकसान, बुनियादी ढांचे के ढहने, पर्यावरण के मुद्दे और लोगों के प्रवास का मुख्य कारण हैं। वर्तमान अध्ययन में, वर्ष 2010 से2018 की अवधि के दौरान घटित बादल फटने की घटनाओं को संग्रहित कर, क्रमवार लगाकर, जियो टैग किया गया, जिससे घटी हुई घटनाओं के स्थानिक पैटर्न और रिलीफ (ऊंचाई) वर्षा, और भूमि सतह तापमान के साथ संबंध का आकलन किया जा सके। अध्ययन में 2 किमी, 5 किमी और 10 किमी की बफर त्रिज्या के साथ बादल फटने की संभावना वाले गांवों के बारे में बताया गया है। वर्ष 2010 से 2018 के दौरान कुल 37 बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। अध्ययन में बादल फटने की घटनाओं की आवृत्ति के आधार पर बहुत अधिक, उच्च, मध्यम और कम भेद्यता वाले संकटपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की। यूजीबी में चमोली, ऊखीमठ, पोखरी, चिन्यालीसौड, पाबो, नरेंद्र नगर और भटवारी ब्लॉक बादल फटने की घटनाओं से सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। ऊंचाई-वार जनसंख्या मानचित्रण इंगित करता है कि 1000 मीटर से 2000 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है, जो अध्ययन क्षेत्र में फैले लगभग 5000 गांवों में रहने वाली कुल आबादी का लगभग 80% है। रिपोर्ट की गई चरम घटनाओं (बादल फटने और भारी वर्षा) की मैपिंग इंगित करती है कि अधिकतम घटनाएं 1000 से 2000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हुई हैं। घटनाओं की सूचना वाले अधिकांश क्षेत्रों में आमतौर पर औसत LST 20oC से 30oC के मध्य था। वर्षा परिवर्तनशीलता मानचित्र से पता चलता है कि अधिकता घटनाएं कम वर्षा वाले क्षेत्रों में हुई हैं। घटना घटित होने के बिंदु से 10 किमी की त्रिज्या के बफर क्षेत्र में लगभग 3000 गांव और 8 मिलियन लोग बादल फटने की घटनाओं से ग्रस्त हैं।

6. आभार

लेखक विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST), विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के हिमालयन इक¨सिस्टम (NMSHE) को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन के तहत अध्ययन एवं वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए आभारी हैं।

  बादल फटने की घटनाओं की सूची (2010-2018)

दिनांक

गांव का नाम

तहसील/ब्लॉक

जिला

अक्षांश

देशान्तर

23.06.2010

रतुरा

रुद्रप्रयाग

रुद्रप्रयाग

30°18’14.04’’N

79° 2’35.94’’E

17-07-2010

घनसाली

घनसाली

टिहरी गढ़वाल

29°5859.17’N

78°31’39.93’’E

19-07-2010

माणा-बद्रीनाथ

जोशीमठ

चमोली

31° 4’17.08’’N

79°24’53.30’’E

03-08-2010

चामी

घनसाली

टिहरी गढ़वाल

30°23’18.37’’N

78°44’33.59’’E

25-08-2010

मटकमाजरी

विकासनगर

देहरादून

30°24’56.03’’N

77°37’55.68’’E

01-09-2010

लिन्गाडी

छेवल

उत्तरकाशी

30° 1’10.39’’N

79°39’51.40’’E

09-06-2011

धिगरटोला

ककोट

उत्तरकाशी

29°49’46.02’’N

79° 2’58.86’’E

07-08-2011

नेताला

मनेरी

उत्तरकाशी

30°45’10.73’’N

78°30’23.21’’E

04-07-2012

कोठर

भिलंगना

उत्तरकाशी

30°15’42.91’’N

78°13’19.17’’E

04-07-2012

खाड़ी

नरेन्द्र नगर

टिहरी गढ़वाल

30°16’47.09’’N

78°22’8.12’’E

03-08-2012

भटवारी

उत्तरकाशी

उत्तरकाशी

30°49’5.77’N

78°37’6.95’’E

03-08-2012

चिन्यालीसौड़

उत्तरकाशी

उत्तरकाशी

30°35’4.92’’N

78°18’53.98’’E

04-08-2012

बकरियाटॉप

भटवारी

उत्तरकाशी

30°50’15.91’’N

78°33’53.44’’E

14-09-2012

उखीमठ

उखीमठ

रूद्रप्रयाग

30°30’53.49’’N

79° 5’45.55’’E

14-09-2012

कपकोट

ककोट

उत्तरकाशी

29°56’16.45’’N

79°54’8.92’’E

16-09-2012

बदमा जाखोली, किरोडामल्ला

जाखोली

रूद्रप्रयाग

30°23’27.99’’N

78°53’46.66’’E

16-09-2012

सेमला

उखीमठ

रूद्रप्रयाग

30°25’5.06’’N

79°22’2.38’’E

16-06-2013

केदारनाथ

उखीमठ

रूद्रप्रयाग

30°44’5.29’’N

 79° 4’0.90’’ E

25-06-2013

बौन्थ

देवप्रयाग

टिहरी गढ़वाल

 30°8’30.06’’N

78°31’44.97’’E

08-07-2013

उर्गम वैली

जोशीमठ

चमोली

30°33’54.35’’N

79°23’29.76’’E

24-07-2013

1-सुनाली

नंदप्रयाग

चमोली

30°16’38.24’’N

79°20’22.29’’E

24-07-2013

2-टेफना बंटोली

नंदप्रयाग

चमोली

30°18’21.77’’N

79°19’43.03’’E

31-07-2013

मैदुनी

नारायनबगड

चमोली

30° 4’42.31’’N

79°23’4.46’’ E

05-08-2013

खादरा

चिन्यालीसौड़

उत्तरकाशी

30°39’39.03’’N

78°13’14.07’’E

16-08-2014

यमकेश्वर

कोटद्वार

पौड़ीगढ़वाल

29°45प्8.81’’N

78°31’36.84’’E

09-07-2015

छानी

पाबो

पौड़ीगढ़वाल

30° 7’31.41’’N

78°50’35.57’’E

09-07-2015

सोनी

देवप्रयाग

टिहरी गढ़वाल

30°11’14.92’’N

78°17’40.57’’E

09-07-2015

सोनी

देवप्रयाग

टिहरी गढ़वाल

30°11’14.92’’N

78°17’40.57’’E

30-06-2016

जौलजीबी

धारचूला

पिथौरागढ़

29°45’9.82’’N

80°22’35.98’’E

07-02-2016

बहुक

चमोली

चमोली

30°16’50.66’’N

79°31’12.00’’E

07-02-2016

संजी

चमोली

चमोली

30°22’27.80’’N

79°26’47.49’’E

16-08-2016

बर्निगड़

बरकोट

उत्तरकाशी

30°43’25.77’’N

78° 9’2.95’’E

20/08/2016

जोशीमठ

जोशीमठ

चमोली

30°33’1.95’’N

79°33’57.24’’E

21-08-2016

पाबो

पौड़ी

पौड़ीगढ़वाल

30° 6’6.36’’N

78°53’3.35’’E

21-08-2017

तमक विलेज

जोशीमठ

चमोली

30°33’2.22’’N

79°33’57.55’’E

02-05-2018

नारायनबगड

नारायनबगड

चमोली

30°7’47.25’’N

79°23’4.45’’E

16-07-2018

रतगाँव

थराली

चमोली

30° 8’9.14’’N

79°32’46.68’’E

16-07-2018

रतगाँव

थराली

चमोली

30° 8’9.14’’N

79°32’46.68’’E

20-07-2018

जलम (निति वैली)

जोशीमठ

चमोली

30°38’9.12’’N

79°46’45.25’’E

20-07-2018

तमक (निति वैली)

जोशीमठ

चमोली

30°38’9.12’’N

79°46’45.25’’E

22-07-2018

कुटी

धारचूला

पिथौरागढ़

30°18’30.37’’N

80°45’38.13’’E

References

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