विभिन्न स्तरों पर जल संरक्षण

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पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

ड्रिप सिंचाईड्रिप सिंचाई आपने पहले से ही जान चुके हैं कि जल सभी जीवित प्राणियों के अस्तित्व के लिये कितना महत्त्वपूर्ण है। आपने यह भी जानकारी प्राप्त कर ली होगी कि प्रयोग करने योग्य पानी की कमी होती जा रही है। इस पाठ में आप पानी के संरक्षण के कुछ महत्त्वपूर्ण उपाय, प्रत्येक व्यक्ति, समुदाय तथा जल संरक्षण में सरकार का योगदान की भूमिका के बारे में जान जायेंगे।

उद्देश्य

इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात आपः

1. पानी की कमी से बचने के लिये विभिन्न उपाय के बारे में चर्चा कर सकेंगे (पानी के उपयोग दक्षता की अवधारणा की चर्चा भी शामिल है।) ;
2. जल संभर प्रबंधन के विषय में वर्णन कीजिए ;
3. जल की कमी को रोकने के लिये व्यक्तिगत चेष्टाओं के उदाहरण दीजिये (वृत्त अध्ययन) ;
4. अलवण जल संसाधनों के संरक्षण के लिये समुदाय की भूमिका की चर्चा भी करेंगे ;
5. स्वच्छ जल के संरक्षण के लिये सरकारी कार्यवाही (मौजूद और आवश्यक) का वर्णन करेंगे और उनकी सूची बना पायेंगे ;
6. जल संरक्षण के लिये एक व्यक्ति की भूमिका का वर्णन कर सकेंगे।

31.1 जल संरक्षण के विभिन्न तरीके (उपाय)
31.1.1 संरक्षण एवं प्रबंधन


भारत एक विकासशील देश है, जिसका क्षेत्र विशाल है, जटिल स्थलाकृति है, परिवर्तनशील जलवायु है और एक बड़ी आबादी है। देश में अवक्षेपण तथा प्रवाह न केवल असमान रूप से वितरित है परन्तु वर्ष के दौरान में भी पानी के वितरण के समय भी असमान है। जल्दी-जल्दी आने वाली बाढ़, सूखा तथा अस्थिर कृषि उत्पादन हमेशा से एक गंभीर समस्या रही है। भारतीय मौसम विभाग (Indian Metrological Department आई.एम.डी.) के अनुसार भारत में वर्षा के केवल चालीस दिन होते हैं और फिर लंबी अवधि के लिये शुष्क मौसम होता है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है, इसका आर्थिक विकास कृषि से जुड़ा हुआ है। कृषि के लिये मुख्य सीमित कारण जल है। बढ़ती हुई जनसंख्या और परिणामस्वरूप खाद्य-उत्पादन में वृद्धि, कृषि क्षेत्र और सिंचाई क्षेत्र में वृद्धि के कारण जल का अधिक उपयोग हो रहा है। जल संसाधनों के अत्यधिक उपयोग के कारण, देश के कई भागों में पानी की कमी हो रही है। कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत के आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास के लिये जल संरक्षण बहुत महत्त्वपूर्ण है।

31.1.2 संरक्षण तकनीक

भारत में जल का प्राथमिक (मुख्य) स्रोत है दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी मानसून। तथापि मानसून अनिश्चित होती है और जैसा कि आपने अध्ययन किया है, वर्षा की अवधि और मात्रा हमारे देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग पायी जाती है। इसलिये सतह पर प्रवाह के संरक्षण की आवश्यकता है। सतही जल के संरक्षण की तकनीकें हैं :

(क) भंडारण द्वारा सतह के पानी का संरक्षण

विभिन्न जलाशयों का निर्माण करके उनमें जल संग्रह करना जल संरक्षण का सबसे पुराना उपाय है। भंडारण की संभावना एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पानी की उपलब्धता और स्थलाकृतिक दशाओं पर निर्भर करती है। इस भंडारण के लिये वातावरण के अनुकूल नीति विकसित करने के लिये पर्यावरणीय प्रभाव के जाँच की आवश्यकता है।

(ख) वर्षाजल का संरक्षण

प्राचीन काल से हमारे देश के विभिन्न भागों में वर्षाजल संरक्षण करके कृषि के लिये प्रयोग में लाया जाता रहा है। यदि एक बड़े क्षेत्र में विरल वर्षा संग्रहित की जाये तो उससे काफी मात्रा में जल प्राप्त हो सकता है। समोच्च खेती (Contour farming) एक उदाहरण है ऐसी उपज- तकनीक का जिसमें बहुत साधारण स्तर पर पानी और नमी का नियंत्रण किया जा सकता है। प्रायः इसमें समोच्च के कटाव के साथ रखी चट्टानों की कतारें शामिल हैं। इन बाधाओं द्वारा रोका गया जल प्रवाह भी मिट्टी को रोकने में सहायता करता है जिससे कि कोमल ढलानों के लिये कटाव नियंत्रण का तरीका बन जाता है। जिन क्षेत्रों मे बहुत अधिक तेजी से वर्षा होती है तथा जो बहुत बड़े क्षेत्रों में फैली होती है- जैसे हिमालय क्षेत्र, उत्तर पूर्वी राज्यों अंडमान तथा निकोबार द्वीप-उनमें यह तकनीक विशेष रूप से उपयुक्त होती है।

जिन क्षेत्रों में वर्षा थोड़ी कम अवधि के लिये होती है, ये तकनीकें प्रयास के योग्य हैं क्योंकि सतही प्रवाह को फिर भंडारित किया जा सकता है।

(ग) भूमिगत संरक्षण
भूमिगत जल की विशेषताएँ


1. सतह जल की तुलना में अधिक भूमिगत जल है।
2. भूमिगत जल कम खर्चीला है तथा आर्थिक संसाधन है एवं लगभग प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध हैं।
3. भूमिगत जल, पानी की आपूर्ति के लिये, अधिक टिकाऊ संपोषणीय तथा विश्वसनीय स्रोत है।
4. भूमिगत जल प्रदूषण के प्रति अपेक्षाकृत कम संवेदनशील है।
5. भूमिगत जल रोगजनक जीवों से मुक्त है।
6. भूमिगत जल का प्रयोग करने से पहले थोड़े से उपचार की आवश्यकता होती है।
7. भूमिगत आधारित पानी आपूर्ति में वाहनों का कोई नुकसान नहीं है।
8. भूमिगत जल को सूखे से कम खतरा है।
9. भूमिगत जल शुष्क और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों के लिये जीवन की कुंजी होता है।
10. भूमिगत जल सूखे मौसम में नदियों और धाराओं के प्रवाह का स्रोत है।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, भारत में कुल 4000BCM (अरब घन मीटर) प्रवाह के लगभग 45 mhan (लाख हेक्टेयर मीटर) भूमिगत जल प्रवाह के रूप में रिस जाता है। सम्पूर्ण भूमिगत जल संसाधनों का दोहन संभव नहीं हो सकता। भूमिगत क्षमता केवल 490BCM (अरब घन मीटर) है। जैसे कि हमें सीमित जल उपलब्ध है, यह अत्यंत आवश्यक है कि हम इसका प्रयोग बहुत मितव्ययता तथा विवेकपूर्ण ढंग से करें और अधिकतम संरक्षण करें। नीचे भूमिगत जल प्रबंधन और जल संरक्षण की कुछ तकनीकें वर्णित हैं: -

(i) कृत्रिम पुनर्भरण (Artificial Recharge)

जिन क्षेत्रों में पानी दुर्लभ (कमी) है, वहाँ भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ रही है। कम और अनिश्चित वर्षा के कारण, जल तालिका में जल्दी गिरावट आती है। कृत्रित उपायों से भूमिगत जल को भरना ही एकमात्र विकल्प है। जैसा कि आपने पिछले पाठ में पढ़ा है कि भूमिगत जल का कृत्रिम रूप से प्रबंधन और विकसित करने की कई तकनीकें हैं। इनमें से एक उपाय है जिसमें पानी फैले हुए क्षेत्र में और अधिक समय के लिये मिट्टी के संपर्क में रहता है जिससे कि पानी को मैदान में प्रवेश करने का अधिकतम अवसर मिल सके। भूमिगत जल पुनर्भरण के अन्य तरीकों को याद करने का प्रयत्न करिए।

(ii) टपकन टैंक विधि (Percolation tank method)

टपकन टैंक कृत्रिम पुनर्भरण के लिये जल कोर्स (across water course) बनाये जाते हैं। महाराष्ट्र में किया गया अध्ययन दर्शाता है कि औसतन 1.2 किमी2 की टपकन से प्रभावित क्षेत्र में औसतन भूमिगत जल वृद्धि 2.5 मीटर तथा भूमिगत के प्रत्येक टैंक से वार्षिक कृत्रिम पुनर्भरण 1.5 hec.m (हेक्टे. मी.) थी।

(घ) जलग्रहण क्षेत्र संरक्षण, कैप (Catchment area protection CAP)

जलग्रहण सुरक्षा योजना को सामान्यतया जल संरक्षण की योजना या प्रबंधन कहा जाता है। ये जलागम (वाटरशेड) जल संरक्षण और जल की गुणवत्ता की रक्षा करने के महत्त्वपूर्ण उपाय हैं। पहाड़ी क्षेत्रों की नदियों के ऊपर चेक-बाँध (Check Band) का निर्माण अस्थायी रूप से जल के प्रवाह की मदद करता है ताकि जल को भूमि में रिसने के लिये अधिक से अधिक समय मिल जाये। ये उपाय उत्तर-पूर्वी राज्यों और पहाड़ी क्षेत्र के आदिवासी बेल्ट में उपयोग में लाये जाते हैं।

यह तकनीक मृदा संरक्षण में भी सहायता करती है। जलग्रहण क्षेत्र में वनरोपण भी मृदा संरक्षण के लिये काम में लिया जाता है।

(घ) जल का अंतः बेसिन स्थानान्तरण

जल का विस्तृत विश्लेषण एवं भूमि संसाधन एवं हमारे देश के विभिन्न नदी बेसिनों की संख्या की सांख्यिकी इस बात का खुलासा करती है ऐसे क्षेत्र जो पश्चिमी एवं पठारी क्षेत्रों, जिनमें कम जल संसाधन उपजाऊ भूमि का अनुपात तुलनात्मक रूप से कम हैं। उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्रों में गंगा एवं ब्रह्मपुत्र द्वारा जल प्रवाह से इन क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में जल संसाधन उपलब्ध हैं।

इस प्रकार, पानी को इन क्षेत्रों से दूसरे जगह ले जाने वहाँ पानी अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध है, वहाँ से कम जल क्षेत्रों में ले जाने के लिये गंगा कावेरी लिंक के माध्यम से जल की बहुत बड़ी मात्रा गंगा बेसिन से भेजने का काम करते हैं जो अंत में पश्चिमी एवं दक्षिण-पश्चिमी भारत के समुद्र में गिरती हैं। गंगा जल की अधिक मात्रा का परिवहन नियमित रूप से पानी की कमी को दूर करने के लिये सोन, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियों में भेज दिया जाता है। राष्ट्रीय ग्रिड कमीशन पटना के निकट भयंकर बाढ़ की अवधि के दौरान गंगा के अधिकतम बहाव का रास्ता बदल देने का काम करता है।

(च) ड्रिप छिड़काव सिंचाई का अपनाना

सतही सिंचाई पद्धतियाँ, जिनका प्रयोग परंपरागत रूप से हमारे देश में किया जाता है, वे कम पानी वाले क्षेत्रों के लिये सर्वदा से अनुपयुक्त हैं क्योंकि जल की एक बड़ी भारी मात्रा वाष्पीकरण और रिसाव के कारण नष्ट हो जाती है। ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation), सिंचाई का एक उपयुक्त तरीका है। संयंत्र के पास एक सीमित क्षेत्र में ड्रिप जल से सिंचाई होती है। यह किसी भी क्षेत्र के लिये उपयुक्त तरीका हो सकता है- विशेष रूप से पानी के लिये दुर्लभ क्षेत्रों में। यह पद्धति विशेष रूप से पंक्तिबद्ध फसल के लिये उपयोगी है। इसी प्रकार की छिड़काव पद्धति भी कम पानी वाले क्षेत्रों के लिये उपयोगी है। इस पद्धति से लगभग 80 % पानी की खपत कम की जा सकती है। बल्कि छिड़काव सिंचाई पद्धति 50% से 70 % पानी की खपत कम कर सकती है।

(छ) फसल उगाने के तरीकों का प्रबंधन

जल की कमी वाले क्षेत्रों में, फसल का चयन पानी की उपयोग दक्षता पर आधारित होना चाहिए। कम जल-क्षेत्रों के लिये जो पौधे उपयुक्त है वे (i) विकास के लिये कम अवधि वाले पौधे (ii) बहुत उपज प्रदान करने वाले पौधे जिनको पानी की आपूर्ति में वृद्धि की कोई आवश्यकता नहीं। (iii) बहुत गहरी और अंदर तक फैली जड़ों वाले पौधे (iv) वे पौधे जो सतह सिंचाई नहीं सहन कर सकते हैं।

(i) फसल की किस्मों का चयन

फसल का प्रदर्शन तथा उपज जीनोटाइप अभिव्यक्ति करके पर्यावरण के साथ लगातार पारस्परिक क्रिया करने के परिणाम होता है। प्रायः फसल की नयी किस्मों को पुरानी किस्मों से अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती हैं। यद्यपि इनको ठीक समय पर पानी की आपूर्ति की आवश्यकता है क्योंकि इनकी उत्पादकता अधिक है। उच्च पैदावार प्राप्त करने के लिये बड़े अंतराल पर भारी प्रवाहकीय सिंचाई की तुलना में निरंतर दी जाने वाली हल्की सिंचाई अधिक लाभदायक है।

(ii) पोषाहार प्रबंधन

पोटेशियम, तनाव परिस्थितियों में एक प्रमुख भूमिका निभाता है। यह परासरणीय नियंत्रण द्वारा ऊतकीय जल के उपयोग की क्षमता में सुधार लाता है अतः पानी के उपयोग की क्षमता बढ़ती है। जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, कोयम्बटूर में आयोजित प्रयोग ने संकेत किया है कि 0.5 प्रतिशत पोटेशियम क्लोराइड के फॉलियर विशिष्टता सोयाबीन, चारा (सोरघम) और मूंगफली में नमी के तनाव को कम कर सकते हैं।

(iii) प्रतिवाष्पोत्सर्जकों का प्रयोग

प्रतिवाष्पोत्सर्जकों (Antitranspirants) का प्रयोग वाष्पोत्सर्जन प्रक्रिया को कम कर देता है जिससे कि ऊतक जल-क्षमता (स्थैतिकी) बनी रहती है। जब पौधे भूमि से कम पानी लेते हैं, प्रतिवाष्पोत्सर्जक भूमिगत जल की कमी को धीरे करके सिंचाई के अंतराल को लम्बा कर सकते हैं। कायोलीन (3 %) और लाइम वाश (2 %) पौधों का जल संतुलन बनाये रखता है। परिणामस्वरूप नमी से संबंधित तनाव की स्थिति के बावजूद भी चारे की सामान्य उपज हो जाती है। कुछ वृद्धि नियामकों द्वारा भी पौधों का जल तनाव के प्रति संवेदनशीलता कम हो जाती है। साइसोइयोल (Cycole) का प्रयोग जिबरेलिक (Gibberellic) अम्ल का उत्पादन कर कर देता है जो रंध्रों को बंद करता है। जल के वाष्पोत्सर्जन का नुकसान कम हो जाता है।

(ज) उद्वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन कम करना

उद्वाष्पोत्सर्जन की कमी, पौधों की सतह से वाष्पोत्सर्जन एवं मिट्टी से उद्वाष्पन को कम करके कम से कम किया जा सकता है। शुष्क क्षेत्रों में, भूमि की सतह से उद्वाष्पन में काफी मात्रा में पानी उड़ जाता है। यह सब पानी को नमी अवरोध (barriers) लगाकर अथवा धरती की सतह पर जलरोधी मुल्च रखने से रोका जा सकता है। कागज, एस्फाल्ट, प्लास्टिक, या धातु जैसी अछिद्रित सामग्रियाँ भी वाष्पीकरण हानि को रोक सकती हैं। वाष्पोत्सर्जन घाटे को कम किया जा सकता है- फसलों के ऊपर हवा की गति को कम करने से, वायु रोधक (Wind break) लगाने से तथा ऐसी फसलों को उगाने से जो मरुद्भि अनुकूलन के योग्य हैं।

(झ) विभिन्न जल निकायों से उद्वाष्पन को कम करना

हमारे देश के बहुत से क्षेत्रों में उद्वाष्पन के द्वारा जल की काफी बड़ी मात्रा की क्षति हो जाती है। ऐसे अनुमान हैं कि 10000 हेक्टेयर भूमि से लगभग प्रतिवर्ष 160 mm3 जल की क्षति होती है। संग्रह टैंकों, जलाशयों, सिंचाई टैंकों, नदियों एवं नहरों से उद्वाष्पन द्वारा होने वाली जल की क्षति को कम करके उस पानी का उपयोग अन्य कामों में किया जा सकता है। ऐसी विधियाँ जिनसे जल निकायों से उद्वाष्पन कम किया जा सकता है- वायु रोधकों को लगाना, उद्वाष्पन के लिये उपलब्ध ऊर्जा को कम करके, कृत्रिम जलभृतों का निर्माण करके, जलाशय नियंत्रक द्वारा सतह को कम उद्भाषित करके, क्षेत्र का जल निकायों का अनुपात कम करके, उच्च ढालों पर जलाशय का निर्माण करके एवं एकल आण्विक फर्म का प्रयोग करके।

(ट) पानी का पुनर्चक्रण

औद्योगिक अथवा घरेलू स्रोतों से निकले अपशिष्ट जल को उचित उपचार के पश्चात सिंचाई, भूमिगत जल पुनर्भरण, और औद्योगिक या नगर निगम के इस्तेमाल के लिये प्रयोग में लाया जा सकता है। यदि कृषि भूमि शहरों के पास उपलब्ध होती है तो नगर निगम के अपशिष्ट जल को सिंचाई के काम में लाया जा सकता है।

31.3.3 घरेलू उपयोग में पानी का संरक्षण

घरेलू स्तर पर जल के संरक्षण की काफी संभावना है। जल और उसकी उपलब्धता के महत्त्व के बारे में लोगों में एक जागरूकता तथा जल संरक्षण काफी सीमा तक क्षति को न्यूनतम करने में सहायता कर सकते हैं। पानी की आपूर्ति के दौरान जो घाटा रिसाव (टपकन) से होता है, उसे कम करने की आवश्यकता है। घर में पानी के प्रयोग के स्तर की दक्षता में सुधार के लिये कुछ उपाय ये हैं : -

1. पाइप से रिसाव में कम बर्बादी करने के अर्थ हैं कि बहुत सारा पानी लोगों तक पहुँचता ही नहीं है। दिल्ली शहर में अनुमानित घाटा 35-40 % है।
2. प्रयोग न करते समय नलकों को बंद करना।
3. बेहतर सिंचाई तकनीकें- सिंचाई प्रणाली में प्रयोग किये जाने वाले जल का 70 % पानी बर्बाद हो जाता है। ड्रिप सिंचाई में पानी का नुकसान सार्थक रूप से कम होता है।
4. हर बार शौचालय को फ्लश करने के लिये कम पानी वाले कम फ्लश वाले शौचालयों (low flush toilet) का प्रयोग करें।
5. लैटरीन तथा कॉम्पैक्ट शौचालय छोटे बनायें जो मानव-अपशिष्टों को स्वच्छ, उपयोगी खाद में बदल सकें- यह उपाय शौचालयों को सीवेज लाइन से जोड़ने के मुकाबले में बहुत सस्ता होता है।
6. सब्जियाँ, बर्तन आदि को बहते हुए नलों के नीचे धोने के बजाए कटोरों में भरे पानी से धोने चाहिए।
7. घरों में पुनर्चक्रित पानी ‘गंदे पानी’ का अधिक उपयोग करें। पेयजल अथवा फिल्टर किये हुए पानी के बजाये पौधों को स्नान किये हुए जल से सींचें।
8. कपड़े धोने की मशीन या डिश-वाशर का प्रयोग तभी करें जब यह पूरी तरह से भरी हुई हो।

31.3.4 पानी की कमी को कम करना

ऐसे कई उपाय हैं जिनसे उद्वाष्पन के कारण हुए जल के घाटे को कम कर सकते हैं तथा मिट्टी की नमी को सुधार सकते हैं। उनमें से कुछ नीचे सूचीबद्ध किये गये हैं :-

1. मल्चिंग (Mulching) अर्थात जैविक या अकार्बनिक पदार्थों के प्रयोग से पौधों के मलवे, खाद आदि, सतह पर चलने को धीमा करना, मिट्टी की नमी में सुधार लाना, वाष्पीकरण की हानियों को कम करना तथा मिट्टी की उर्वरता को बेहतर बनाना है।

2. फसलों से ढकी मिट्टी, धीमे जल वाह (Slow down runoff), कम वाष्पीकरण से होने वाली हानियाँ- अतः खेतों को बहुत लंबे समय तक के लिये खाली नहीं छोड़ना चाहिये।

3. जुताई धरती को हिलाकर ढीला कर देती हैं। परिणामस्वरूप धरती ज्यादा पानी सोख लेती हैं जिससे कि वाष्पीकरण कम हो जाता है।

4. कृषि क्षेत्रों की बढ़त के साथ-साथ लगी हुई वृक्षों और झाड़ियों की बेल्ट हवा की गति को कम कर देती है तथा वाष्पीकरण और क्षरण कम कर देती है।

5. वृक्षों का रोपण, घास और झाड़ियाँ वर्षा की तेजी को रोकता है और वर्षा के जल को मिट्टी के अंदर धंसने में सहायता करते हैं।

6. कोहरा और जल ओस में पर्याप्त मात्रा में जल होता है जो अनुकूलित संयंत्र प्रजातियों द्वारा सीधे इस्तेमाल किया जाता है। कृत्रिम सतहों, जैसे कि सतह जाल या पॉलीथीन शीट-कोहरे और ओस के सामने उजागर किया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप पानी का प्रयोग फसलों के लिये किया जा सकता है।

7. समोच्च खेती (Contour farming) पहाड़ी क्षेत्रों में और धान की खेती के लिये तराई क्षेत्रों में अपनाया गया है। मृदा और जल संरक्षण जो, समोच्च खेती पर आधारित होता है, उस प्रणाली कुशलता को पहचानता है।

8. फसलों की नमक प्रतिरोधी किस्मों को भी हाल में विकसित किया गया है क्योंकि ये नमक के क्षेत्रों में पैदा होती है, कुल मिलाकर कृषि-उत्पादकता अलवण पानी के स्रोतों पर बिना अतिरिक्त मांग किये बढ़ जाती है। अतः यह जल संरक्षण की एक अच्छी नीति है।

9. ऐसी विलवणीकरण (Desalination) तकनीकें जैसे कि आसवन, विद्युत-डायलिसिस तथा उत्क्रम परासरण (reverse osmosis) भी उपलब्ध हैं।

31.1.5 अपशिष्ट जल का पुनः प्रयोग

अपशिष्ट जल (बर्बाद जल) में पोषक तत्व बहुत सारे पाये जाते हैं। सिंचाई के लिये पानी का प्रयोग करने पर भी ये पोषक तत्व बच जाते हैं। इनसे मिट्टी की उर्वरता और फसलों के उत्पादन में सुधार होता है। अपशिष्ट जल का सामान्य प्रयोग जो उसके पुनः प्रयोग और पुनःचक्रण करके होता है, उससे पानी की उपयोग दक्षता में सुधार होता है। वास्तव में केवल अपशिष्ट जल न होकर एक संसाधन होता है क्योंकि इसके अंदर पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश होते हैं। स्थिरीकरण तालाब, मछली और जलीय कृषि के लिये काम आ सकते हैं। बहिर्वाह (निस्सारी) को भी अल्पकालिक और दीर्घकालिक, सजावटी, वाणिज्यिक और चारा फसलों की खेती के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है।

पुनः प्रयोग के लाभ

व्यावहारिक अनुभव ने दिखा दिया है कि अपशिष्ट (बर्बाद) जल का पुनः प्रयोग केवल अलवण जल की आवश्यकता को कम कर देता है बल्कि वातावरण की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं। अपशिष्ट जल के पुनः प्रयोग से निम्नलिखित लाभ हैं:

1. पानी की आपूर्ति की कमी को पूरा करें (अच्छी गुणवत्ता वाले पानी की मांग को कम करें)
2. अपशिष्ट जल के निर्वहन को कम करके जल प्रदूषण में कमी लायी जा सकती है।
3. परिणामस्वरूप लागत में कमी आती है।

साफ किये गये अपशिष्ट जल के पुनर्प्रयोग के मुख्य स्थैतिक लाभ (Potential application) निम्नलिखित क्षेत्रों या दिशाओं में हैं:

1. फसलों की सिंचाई के माध्यम से कृषि उपयोग तथा नदियों से मिलने वाली सुविधाओं में सुधार।
2. औद्योगिक ठंडा करने वाली-विशेषकर बड़े औद्योगिक उपक्रमों में ठंडा करना।
3. नगर निगम के सार्वजनिक क्षेत्रों में, जैसे कि लॉनों में पानी देना, पार्क, खेल के मैदान तथा वृक्षों में जल का पुनः प्रयोग करना।
4. होटलों तथा आवासीय स्थानों में फ्लश करने वाले शौचालयों का होना।
5. शहरी परिदृश्य परियोजनाओं के लिये साफ किये गये अपशिष्ट जल का पुनः प्रयोग।
6. भूमिगत रिचार्जिंग के लिये भी उपचारित अपशिष्ट जल का प्रयोग किया जा सकता है।
अनउपचारित जलः का पुनःप्रयोग सबसे प्रभावीय ढंग से ऑन साइट (on site) या लघु उपचार प्रणालियों पर होता है।

अपशिष्ट जल (ग्रे वाटर) की परिभाषा है अनौपचारित घरेलू अपशिष्ट जल (untreated household waste water) जो अपशिष्ट के साथ संपर्क में नहीं आया है। यह स्नान, नहाने, स्नानघर, हाथ-मुँह धोने के बेसिन, कपड़े धोने की मशीन और लाउंड्री ट्रफ (Laundry trough) धोने के काम आता है।

हमारे देश में लगभग आधा अपशिष्ट जल सिंचाई के लिये प्रयोग किया जाता है। कई नगर पालिकाएँ अपना अपशिष्ट जल किसानों को बेच देती हैं। कई उद्योग वाले अपशिष्ट जल खरीद रहे हैं और उनका प्रयोग कर रहे हैं।

पाठगत प्रश्न 31.1

1. जल संरक्षण क्यों आवश्यक है? कम से कम तीन कारणों की सूची बनाइये।
2. दो सिंचाई पद्धति के विषय में बताइये जो जल की आवश्यकता को कम करती है।
3. जल के पुनः प्रयोग के दो लाभ सूची में बताइये।
4. वाष्पोत्सर्जनीय घाटा कैसे कम किया जा सकता है?
5. समोच्च खेती के क्या लाभ होते हैं?

31.2 जलसंभर क्षेत्र प्रबंधन (WATER SHED MANAGEMENT)

जल संभर क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसके माध्यम से एक जल निकाय को बाह्य या भूमिगत मार्ग से पानी मिलता है। यह वह क्षेत्र है जिसमें सतही जल को नदियों, झीलों, आर्द्र भूमि या अन्य जल निकायों से लिया जाता है जिससे इसे जल या ड्रेनेज बेसिन (Drainage basin) कहा जाता है। जल संभर क्षेत्र प्रबंधन जल और मिट्टी के संरक्षण के लिये तकनीक है। पौधों तथा वनस्पतियों के लिये मिट्टी के संरक्षण के लिये तकनीक है। वनों तथा वनस्पतियों के लिये मिट्टी में जल की मौजूदगी आवश्यक होती हैं। वन और उनके संबंद्ध मिट्टी और कूड़े की परतें उत्कृष्ट फिल्टर और स्पंज होती हैं और जो पानी इस प्रणाली से निकलता है, वह अपेक्षाकृत शुद्ध होता है। विभिन्न प्रकार के वनों के अवरोधन इस प्रणाली को लेकर, पानी की गति तेज कर देते हैं और परिणामस्वरूप पानी छनने की प्रक्रिया कम हो जाती है।

पहाड़ी क्षेत्रों में वन मृदा अपरदन (भूमि-कटाव) की रोकथाम में एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। अपरदन का खतरा नित्य ढकाव के अनुरक्षण के द्वारा हल किया जा सकता है। आदर्श रूप से यह एक एकल स्टेम संचयन द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसमें केवल एक समय में एक वृक्ष ही काटा जाता है और जो छोटा छेद बन जाता है, वह उसके आस-पास अन्य वृक्षों के विकास से भर जाता है।

पानी के लाभ और हानि के अनिश्चित संतुलन के बावजूद भी, वन जल प्रबंधन नीतियों के लिये सबसे अधिक कवर प्रदान करते हैं। इसके विपरीत, तेज प्रवाह वाले, कम समय में उगने की विशेषता वाली वनस्पति से ढकी भूमि को जल की कम आवश्यकता, विश्वसनीय तथा एक से वन होते हैं। वन विहीन भूमि तेजी से पानी को झाड़ता है जिससे कि नीचे बहती हुई नदियों का स्तर अचानक बढ़ जाता है। एक बड़ी नदी प्रणाली में जैसा कि गंगा और यमुना नदी का है, वनों के निश्चित रूप से लाभ हैं क्योंकि वे बाढ़ के खतरे को कम करते हैं। वे वन विहीन भूमि की अपेक्षा अधिक मछलियाँ पकड़ने और नौसंचालन के लिये बेहतर अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं।

सारी प्राकृतिक नदियों में अलग-अलग मात्रा में घुले और छितरे हुए पदार्थ होते हैं तथापि बिना अवरोध वाले जल ग्रहण क्षेत्रों (Undisturbed watershed) से निकली हुई नदियों में सामान्यतः उच्च गुणवत्ता पाई जाती है। वन क्षेत्रों से निकला जल न केवल ‘विदेशी’ तत्वों में कम होता है। वरन उनमें अपेक्षाकृत ऑक्सीजन अलग होती है और अवांछित रसायनों की मात्रा कम होती है।

यह विश्वास कि वनों के कारण वर्षा अधिक होती है, इसकी पुष्टि वैज्ञानिक जाँच द्वारा नहीं हो पायी है। तथापि स्थानीय प्रभाव, विशेष रूप से अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में जहाँ वर्षा के प्रत्येक मिलीमीटर की गिनती होती है, इस बात की पुष्टि हो सकती है। चरागाहों के विपरीत, वनों के ऊपर वाली हवा गर्म दिनों में ठंडी और नम रहती है जिससे कि वर्षा जल्दी-जल्दी होती है। जब जंगल पाये जाते थे तो भारत के कई क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण वर्षा होती थी। वे ही अब अनाच्छादन के कारण (उदाहरणार्थः राजस्थान मरुस्थल) भीषण सूखे का सामना कर रहे हैं।

पाठगत प्रश्न 31.2

1. जल संभर (वाटरशेड) क्या है?
2. वन बाढ़ के खतरे को कैसे कम करते हैं?
3. कोई दो उपाय बताइये जिनसे वन पानी की गुणवत्ता को बनाये रखने में सहायता करते हों।
4. एकल स्टेम कटाई से क्या लाभ होता है?

31.3 पानी की कमी पर काबू पाने में व्यक्ति तथा समुदाय की भूमिका
31.3.1 पानी की कमी पर काबू पानी के प्रयासों के व्यक्ति और समुदाय के लिये उदाहरण


हमारे देश में प्रत्येक व्यक्ति तथा समुदाय के जल संरक्षण के प्रयासों के कई उदाहरण हैं। उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं।

वर्षों से, हर गर्मियों में सौराष्ट्र और कच्छ के ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र दोनों पानी की कमी से जूझते हैं। तटीय क्षेत्रों में यह समस्या, भूमिगत जलभृतों में लवणता के अंतः प्रवेश से और भी बढ़ रही है। सरकारी मशीनरी इस स्थिति को पानी के ट्रकों या गाड़ियाँ देकर संभाल रही है। यद्यपि लोगों की एक बड़ी संख्या ‘वर्षा परमेश्वर’ या सरकारी जल टैंकों पर निर्भर करती जा रही है तथापि कुछ क्षेत्रों में लोगों ने इस मामले को अपने हाथों में लेना आरंभ कर दिया है।

 

वृत्त अध्ययन

 

(i) गाँधीग्राम, कच्छ जिले के एक तटीय क्षेत्र में, पिछले दस बारह वर्षों से गाँव वाले पीने के पानी के संकट का सामना कर रहे थे। भूमिगत जल की जल तालिका अत्यधिक निष्कर्षण के कारण समुद्र स्तर तक नीचे चली गयी है ओैर समुद्री जल भूमिगत जलभृतों में रिसकर चला गया है। ग्रामीण लोगों ने गाँव के एक विकास समूह,ग्राम विकास मंडलकी स्थापना की। मंडल ने बैंक से ऋण लिया तथा गाँव वालों ने स्वैच्छिक श्रम (श्रमदान) का योगदान किया। एक मौसमी नदी, जो गाँव के पास बहती थी, उस पर चेक बाँध बनाया था। इस बाँध के अतिरिक्त गाँव वालों ने एक लघु जल परियोजना भी शुरू की- इन जल प्रतिधारण संरचना के कारण गाँव वालों के पास पर्याप्त पेय जल है तथा 400 हेक्टेयर भूमि, जो पहले बंजर थी, अब सिंचाई के अन्तर्गत गई है। ऐसे ही वर्षा जल संचयन के आयोजन के लोगों द्वारा किये गये अन्य प्रयासों के उदाहरण सौराष्ट्र के भावनगर जिले के दो गाँवों खोपला (Khopala) और झुनका (Jhunka) में भी देखे जा सकते हैं।

 

(ii) छात्रों के सहयोग का उल्लेखनीय प्रयास 1955-98 में भावनगर में प्रो- विद्युत जोशी जो भावनगर यूनीवर्सिटी के उप कुलपति थे, उनके मार्गदर्शन में किया था। भावनगर के तटीय क्षेत्र को पीने के पानी की गंभीर कमी का सामना करना पड़ रहा था। प्रो. जोशी ने विश्व विद्यालय के परिसर में एक टपकन टैंक की खुदाई शुरू की। लगभग 650 छात्रों, अध्यापकों तथा विश्वविद्यालय के अन्य कर्मचारियों ने स्वैच्छिक श्रमिक के रूप में काम किया। इसके बाद आने वाली मॉनसून में विश्व विद्यालय के सभी बोर किये कुएँ तथा आस-पास के क्षेत्रों के कुओं में भी पुनर्भरण हो गया था।

 

सफलता की इन कहानियों ने सिद्ध कर दिया है कि जल संसाधनों का प्रबंधन यदि उपयोगकर्ता स्वयं ही करें तो उनको स्थायी लाभ हो सकते हैं। ऐसे समुदाय आधारित संसाधन प्रबंधन प्रणाली किसी भी समाज के लिये नई चीज नहीं है। पूरे संसार में कई परंपरागत समुदायों ने इनका अभ्यास किया है। किन्तु धीरे-धीरे संसाधन प्रबंधन का स्थान आधुनिक केंद्रीकृत व्यवस्था द्वारा किया जा रहा है।


31.3.2 भूमिगत जल के कृत्रिम पुनर्भरण
भूमिगत जल कृत्रिम पुनर्भरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा भूमिगत जल जलाशय, प्राकृतिक परिस्थितियाँ या पुनः पूर्ति की तुलना में अधिक दर से अंतर्गत प्राप्त कर लेते हैं। मानव द्वारा बनायी गई कोई योजना या सुविधा जो रिसाव के द्वारा जलभृतों में पानी जमा करती है, उसे कृत्रिम पुनर्भरण प्रणाली माना जा सकता है।

भूमिगत दोहन शहरी क्षेत्रों में अपरिहार्य है। किन्तु भूमिगत क्षमता शहरीकरण के कुछ प्रतिकूल प्रभावों के कारण, कम होती जा रही है। ये हैं :

i. पानी की मांग में वृद्धि।
ii. भूमिगत जल के प्रयोग पर अधिक निर्भरता।
iii. भूमिगत जल के अधिक दोहन पर।
iv. वाह में वृद्धि, कुओं के पानी में कमी, जल के स्तर में गिरावट।
v. खुली मृदा सतही क्षेत्रों में कमी।
vi. निस्यंदन (infiltration) में कमी तथा जल की गुणवत्ता में कमी।

अतः भूमिगत पुनर्भरण को लागू करने के लिये, एक बड़े पैमाने पर, भिन्न-भिन्न सरकारी अथवा गैर सरकारी एजेन्सियां और जनता को कोई नीति अपनानी चाहिये जिससे जल तालिका का स्तर बढ़ जाए (ऊपर चला जाये) और भूमिगत जल संसाधन, शहरों में रहने वाले लोगों की जल की आपूर्ति की आवश्यकता को पूरा करने का एक विश्वसनीय और स्थायी स्रोत बन जाये।

त्वरित वाह (Storm run off) के माध्यम से भूमिगत जल का पुनर्भरण और छत वाले पानी के संग्रह, मोड़ तथा वाह का सूखे टैंकों में जल संग्रह, खेल के मैदान, पार्क तथा अन्य खाली स्थानों को शहर पंचायतों/नगर पालिकाओं/ नगर निगम एवं अन्य सरकारी संस्थान अपना सकेंगे।

शहर पंचायत/नगर पालिका/ नगर निगमों ने नागरिकों तथा बिल्डरों की अपने घरों में या अन्य इमारत प्रदर्शन और सामग्री के प्रोत्साहन देने के लिये सब्सिडी के माध्यम द्वारा, यदि संभव हो सकेगा, उपयुक्त पुनर्भरण विधि अपना सकेंगे।

कृत्रिम पुनर्भरण की विधियां शहरी क्षेत्रों में:

i. पानी का फैलाव (फैलाना)।
ii. गड्ढों, खाइयों, कुओं और शाफ्ट (Shafts) के माध्यम से पुनर्भरण।
iii. छतों पर वर्षा के जल का संग्रह करना।
iv. सड़कों के ऊपर वर्षाजल का संग्रह।
v. जल निकायों की सतह से अंतःपनुर्भरण।

छत पर वर्षाजल के संग्रह के कृत्रिम पुनर्भरण के कारणों की गणनाः
गणना के लिये कारक-


i. व्यक्तिगत घरों की छतों के लिये 100 sq और बहुमंजिला घरों की छतों के लिये 500 sq क्षेत्र तय किया।
ii. औसतन वार्षिक मॉनसून वर्षा = 780 mm
iii. प्रभावी वार्षिक वर्षा जो पुनर्भरण को योगदान देती है 70% = 500 mm

 

व्यक्तिगत मकान

बहुमंजिले मकान

छत का ऊपरी क्षेत्र

100 sq.m

500 sq.m.

पुनर्भरण के लिये प्रतिवर्ष कुल मात्र उपलब्ध

55 sq.m

275 sq.m

5 सदस्यों के लिये उपलब्ध जल (दिनों में)

100 दिन

500 दिन


शहरी क्षेत्रों में कृत्रिम पुनर्भरण के लाभ
i. छानने के काम में सुधार और वाह में कमी।
ii. भूमिगत स्तर तथा पैदावार में सुधार।
iii. नगर पंचायतों/नगर पालिका/नगर निगम जल की आपूर्ति पर तनाव कम कर देता है।
iv. भूमिगत जल गुणवत्ता में सुधार।
v. अतिरिक्त पुनर्भरण की अनुभाषत मात्र 100 sq.m छत के ऊपर क्षेत्र से 55,000 लीटर है।

31.3.3 जल संरक्षण पर सरकारी प्रयास
जल संरक्षण पर निम्नलिखित मुख्य प्रयास देखे जा सकते हैं :


i. राष्ट्रीय जल नीति 2002, जोरदार पानी के संरक्षण पर जोर।
ii. विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जमीन पर वर्षाजल को बनाये रखने के प्रयास किये गये।
iii. विभिन्न नदियों प्रणालियों पर बड़ी संख्या में बांधों के निर्माण।
iv. नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव।
v. गाँवों के स्तर पर बांधों का संवर्धन।
vi. वर्षाजल संचयन के संवर्धन।
vii. बर्बाद जल के पुनः प्रयोग और पुनर्चक्रण का संवर्धन।
viii. जल की गुणवत्ता को बचाने के लिये कदम उठाना।
ix. भविष्य में सूखे से आरक्षित करना।

अस्थायी कटौती या स्थायी ऑपरेटिंग समायोजन सहायता से जल संरक्षण कर सकते हैं। स्थायी संरक्षण के अन्तर्गत ये उपाय हो सकते हैं :-

i. आर्थिक सहायता द्वारा कुशल प्रयोग से टोंटी, शौचालय तथा गुसलखानों का प्रयोग।
ii. सार्वजनिक शिक्षा और उपयोगों में स्वैच्छिक कमी।
iii. ऐसी बिलिंग प्रथाएँ जो जल के अधिक उपयोग के लिये उच्च दरों का प्रयोग।
iv. बिल्डिंग कोड जिन्हें पानी के कुशल जुड़ाव या उपकरणों की आवश्यकता है।
v. रिसाव से पता लगाने के सर्वेक्षण, मीटर जाँच, मरम्मत और प्रतिस्थापन उपयोग में कमी और औद्योगिक पानी के पुनर्चक्रण में वृद्धि।

अस्थायी कटौती यह होती है : -

i. व्यापक ऑपरेटिंग दबाव व्यवस्था की कमी।
ii. पानी के प्रयोग पर रोक, प्रतिबंध और राशन।

स्थानीय या नगर निकायों का सुदृढ़ीकरण, शहर में पानी की कमी, और उसके प्रबंधन के मुद्दे का हल निकाल सकते हैं। भारत की राष्ट्रीय जल नीति पीने के पानी को प्राथमिकता देती है। शहरी विकास परियोजनाओं के लिये पीने के पानी के लिये प्रावधान करने की आवश्यकता है। भारत जमीन और सतह दोनों के जल संसाधन विकसित कर रहा है। वर्तमान नीतियाँ, भूमिगत जल खनन को रोकने के लिये, भंडारण को प्राथमिकता दे रही है। किन्तु भूमिगत जल खनन का विकास देश के कई भागों में बहुत गहन रूप से चल रहा है।

राजस्थान के मल्लाह- राजेन्द्र सिंह द्वारा अरावली नदी बेसिन के पुनरुद्धार की सफलता की कहानियाँ पहले से ही बहुत प्रसिद्ध हैं। कर्नाटक के सूखा प्रवण बारिश क्षेत्रों को अब सूखे से अभेद्य किया जा रहा है। खलिहानों के तालाब तथा पेड़ कृषि को पुनः अपनाने से सूखे के समय में वर्षा का जल खींचने वाले पेड़ों का उत्पादन सुनिश्चित कर देती है।

वहाँ इस भूमिका पर भी चर्चा थी कि केंद्रीय और राज्य भूमिगत बोर्ड देश भर में जल संचयन की सफलताओं की संभावनाओं में सुधार लाने में योगदान दे सकते हैं। जो लोग भूमिगत पर कार्य करने की योजना बना रहे हैं, उनके लिये इन निकायों का पुस्तकालयों तथा जल संसाधन केन्द्र बना देना चाहिये। किसी भी नयी परियोजना की घोषणा करने से पहले, सरकार को देश भर में जल संरक्षण उपक्रमण का समर्थन करना चाहिये। छोटे स्थानीय प्रयासों को भव्य योजनाओं की तुलना में अधिक समर्थन मिला, देश में एक बड़ी संख्या में तालाबों और टैंकों के पुनरुद्धार से सूखे महीनों के लिये पानी के भंडारण को उपलब्ध कराने तथा गड्ढों में नदियों का अधिक जल भंडारणों के द्वारा बाढ़ को रोकने के काम आ सकता है। छोटे संरचनाओं में, चाहे वे टैंक हों, अथवा चेक-बांध या झीलें हों, उनमें भूमिगत पुनर्भरण की उच्च पारिस्थितिक क्षमता है।

यह भी मान्यता है कि ग्रामीण और शहरी जल संकट बहुत ही निकट से संबंधित है। शहरी केन्द्रों के पास राजनैतिक तथा आर्थिक ताकत होती है जिसके द्वारा वह ग्रामीण संसाधनों को शहरी केन्द्रों की ओर मोड़ देती है। अतः छत वर्षाजल संचयन की तकनीकों की तरह ग्रामीण क्षेत्रों को प्रभावित किये बिना ऐसे शहरी केन्द्रों में बढ़ावा देना चाहिये। वाणिज्यिक मीडिया के प्रचार और राष्ट्रीय चैनलों पर नियमित प्रसारण अवधि (air time) के उपयोग की जल प्रबंधन के मुद्दों पर चर्चा करके जल संरक्षण को बढ़ावा देते हैं। प्रचार और सरकार की सफलता की कहानियों के प्रति समर्थन जनता को जल संरक्षण के विषय में सोचने को प्रेरित करेगा। शहरी युवाओं में जल संरक्षण के विषय में जागरूकता पैदा करने की बहुत आवश्यकता है।

शहरी जल अर्थव्यवस्था को बेकार और उच्च प्रदूषण देने वाली कहा जाता है। शहरी क्षेत्रों में यह भी पहचानना चाहिए कि प्रदूषण करने वाले को घरेलू उपयोगकर्ता को इसकी महत्ता बताने के लिये एक सिद्धांत बनाना होगा।

हमारे देश के कई भागों में पानी घरेलू अथवा औद्योगिक बहिर्साव के निर्वहन द्वारा प्रदूषित होता है। वहाँ तत्काल एक प्रदूषण-विरोधी कानून को लागू करने की आवश्यकता है। भूमिगत जल की गुणवत्ता बहुत महत्त्वपूर्ण चिंता का विषय है क्योंकि आज भी 50 प्रतिशत से अधिक कृषि इसी पर निर्भर करती है।

30.3.4 पारंपरिक समाधानों पर पुनः ध्यान देना

एक लंबे समय से भारतीय समुदाय को पता है कि उनके जीवन की निर्भरता उनके आस-पास के प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित है। जब बेईमान व्यापारी वृक्ष काट रहे थे, स्थानीय लोग, पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में तन कर ‘चिपको आंदोलन’ कर रहे थे। इसमें स्थानीय लोग शारीरिक रूप से वृक्षों के गले लग रहे थे जिससे कि लकड़ी संग्रह करने वाले लोग वृक्षों को काट न सकें।

भारत के पास जल संचयन प्रौद्योगिकियाँ और इन तरीकों की समृद्ध विरासत है। आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर यह इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकता है। सरल शब्दों में, वर्षाजल संचयन (rain water harvesting) जल को वापिस मिट्टी में डालने को कहते हैं जहाँ यह भूमिगत नदियों और जलाशयों में संग्रहित है तथा जहाँ से यह आवश्यकता पड़ने पर निकाला जा सकता है। शहरों में, वर्षाजल संचयन, केवल सबसे ऊपर छतों पर निर्मित बड़े टैंकों में वर्षाजल का संग्रह करके आवश्यकता पड़ने पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

पारंपरिक बारिश संचयन प्रणालियों के पुनरुद्धार ने कई क्षेत्रों को आर्थिक पिछड़ेपन से बहुतायत के क्षेत्रों में बदल दिया है। ये भी बेहद संपोषित तथा दीर्घोपयोगी हैं।

विकास तथा शहरीकरण के कारण पर्यावरणीय संकट साथ-साथ बढ़ते जायेंगे। हमें अपने पारंपरिक ज्ञान को फिर से जीवंत कर और संसाधनों के प्रबंधनों की पारंपरिक प्रणालियों का दोहन अपनी वर्तमान आवश्यकता के अनुरूप करना चाहिये। बुनियादी साधारण ज्ञान ने भारत में और दुनिया के अन्य भागों ने धरती के संसाधनों के प्रबंधन के रूप में पारंपरिक तरीकों द्वारा प्राप्त सफलता का महत्त्व दिखा दिया है। विश्व भर के आधुनिक समुदाय को प्रोत्साहित करना चाहिये कि वे परीक्षण किये हुए संसाधन प्रबंधन के पारंपरिक उपायों को देखें।

पानी का संरक्षण करने के कई उपाय हैं जिनके द्वारा महत्त्वपूर्ण कटौती हो सकती है। उदाहरण के लिये आवासीय पानी की खपत में कटौती की जा सकती है। यदि जल सक्षम स्थिरीकरण (टोंटी, शौचालय और नहाने वाले हाथ-फव्वारे) और उपकरणों तथा बेहतर प्रबंधित पानी लानों में लगाया जाये।

30.3.5 पानी बचाने के कुछ सरल उपाय इस प्रकार हैं
(i) पानी के संरक्षण के लिये एक व्यक्ति क्या कर सकता है?


पानी के मुद्दों का समाधान खोजने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सबसे महत्त्वपूर्ण कदम लोगों के अपने व्यवहार तथा आदतों को बदलना है। इसमें हम सब शामिल हैं। जल का संरक्षण करना सही बात है। हम लोग कुछ साधारण, बातें जो नीचे सूचीबद्ध हैं, उनके द्वारा जल संरक्षण में योगदान दे सकते हैं :-

i. याद रखिए कि आप उतनी ही राशि इस्तेमाल करेंगे जिसकी आपको आवश्यकता होगी।
ii. देख लीजिये कि आपके शौचालय की टंकी से जल तो नहीं टपक रहा है। यह आप टंकी में रंग डालकर देख सकते हैं। यदि टपकन होगी तो 30 मिनट में रंग शौचालय के कटोरे में दिखाई पड़ेगा। (यह परीक्षण होते ही फ्लश खींच दीजिये वरना खाने वाले रंग के धब्बे रह जायेंगे।
iii. जब आप दाँत साफ कर रहे हों अथवा साबुन से मुँह धो रहे हों तो आप नल खुला न छोड़ें।
v. शौचालयों में पानी बिना आवश्यकता के न बहायें।
vi. एक ईंट या अन्य किसी उपकरण को रखो जिससे कि एक फ्लश के लिये आवश्यक पानी की मात्रा में कटौती हो सके।
vii. कार को धोते समय, पाइप से पानी डालने के बजाये बाल्टी में भर कर कार साफ कीजिए।
viii. जिस पानी से सब्जियाँ, चावल और दाल आदि धोये हों, उस पानी को फेंकिये मत। उसका प्रयोग पौधों को पानी देने के लिये अथवा फर्श आदि पर पोछा लगाने के लिये करें।
ix. सुनिश्चित करें कि आपका घर टपकन से मुक्त है। कई घरों में पाइपों में टपकन होती है जो दिखाई नहीं देती।
x. अपने परिवार को प्रोत्साहित कीजिये कि वे अपने और अपने आस-पास के घरों में जल संरक्षण के नये-नये उपाय ढूंढे।
xi. एक बात हर दिन ऐसी करो कि जल की बचत हो। चिंता मत करो कि बचत कितनी कम है। प्रत्येक बूँद महत्त्वपूर्ण होती है। आप थोड़ा सा अंतर ला सकते हो।
xii. आप जल संरक्षण के लिये समूह बना सकते हैं जिसमें आप अपने मित्र एवं पड़ोसी शामिल करके उन्हें जल संरक्षण करने के लिये प्रोत्साहित कर सकते हैं। आप समुदाय समाचार पत्र या बुलेटिन बोर्ड पर जल संरक्षण के मुद्दे को बढ़ावा दे सकते हैं। अपने मित्रों, पड़ोसी एवं साथियों को इस काम में सहयोग देने के लिये प्रोत्साहित करें।
xiii. आप पानी का संग्रहण कई प्रकार से कर सकते हैं। सबसे सरल उपाय है एक ऊँचा चबूतरा जहाँ वर्षा का जल संग्रहित होता हो, उसके ऊपर डोल रखकर उसमें वह जल भरें।

आप एक निस्यंदक पानी की बोतल हौज टंकी में रखिये जिससे उसका बहाव (डिस्चार्ज) एक लीटर कम हो जाये। 7 लीटर ठोस कचरे के लिये पानी का केवल 1.5 लीटर आवश्यक होता है। जबकि मौजूदा टंकी का आकार 12 लीटर होता है। वाश बेसिन के नल में एक सादी छननी लगाने से हवाई जहाज की भांति इस नल से बाहर जाने वाले पानी में 50 प्रतिशत पानी की कमी हो सकती है। चलते हुए नल के नीचे शेव करने के विपरीत एक मग में पानी भरकर शेव करने से 17.5 लीटर प्रति शेव पर बच सकता है।

गतिविधि

तरीका अपनाया

मात्रा उपयोग लीटर

तरीकों को अपनाया जायेगा

मात्रा आवश्यक लीटर

मात्रा बचत लीटर

दाँत साफ करना

नल को पाँच मिनट चलाना

45

गिलास या टम्बलर

0.5

44.5

हाथ धोने

नल को दो मिनट चलाना

18

आधा भरा बेसिन

2.0

16.0

दाढ़ी बनाना

नल को दो मिनट चलाना

18

शेविंग मग

0.25

17.75

फव्वारा

नल को साबुन लगाते समय भी चलने देना। देरी तक स्नान करना

90

गीले हो, नल बंद करो, साबुन लगाओ, धोते समय बंद करो

20.00

70.00

शौचालय

पुराने जमाने के बड़े गड्ढे का उपयोग करना

13.5 या अधिक

दुहरी प्रणाली, कम समय के लिये फ्लश, द्रव अपशिष्ट, ठोस अपशिष्टों के लिये पूरा फ्लश

4.5- 9.0

4.5 या अधिक

पौधों को पानी देना

हौज को 5 मिनट चलाना

120

जल के डिब्बे से

5.0

115.00

फर्श साफ करना

हौज को 10 मिनट चलाना

200

पोछा और बाल्टी

18.0

182.00

कार धोना

हौज को 10 मिनट चलाना

400

बाल्टियां (दो)

18.0

382.00


वृत्त अध्ययन
तरुण भारत संघ


तरुण भारत संघ (TBS) के कार्य और उसके राजस्थान के जिलों के संस्थापक राजेन्द्र सिंह के कार्यों को सरल रूप से जल भरण प्रबंधन (Watershed management) कह सकते हैं। वास्तव में यह एक क्रांति है जिसने निरावृत और रेतीले क्षेत्रों में जीवन और समाज को संजीवित कर दिया है।

देखने में यह सादा ‘दो कदम’ प्रोग्राम प्रतीत होता है। सबसे पहले बंजर पहाड़ी ढलानों में वनस्पति उगाना तथा दूसरा, घाटियों और मैदानों में छोटे-छोटे जल ग्रहण क्षेत्र बनाना।

प्रयासों के परिणामस्वरूपः
i. मृत (सूखी) नदियों के प्रवाह शुरू।
ii. पूरे वर्ष कृषि संभव हो सकती है।
iii. निर्धन ग्रामीण लोग, शहरों में श्रम करने वाले वापिस आ जाते हैं, परिवार एकजुट हो जाते हैं।
iv. पानी भरकर लाने जैसा थकाने वाला श्रम, सकारात्मक विकास के काम करने का रास्ता दिखाता है।
v. पर्याप्त पानी और चारा होने के कारण, पशुपालन से आय होनी शुरू हो जाती है।
vi. पोषण स्तर में वृद्धि तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार।
vii. वन्य पहाड़ियाँ वन्यजीव का स्वागत करती हैं जिससे जंगलों में सम्पूर्णता छा जाती है।
viii. लोगों को असुरक्षा की भावना से छुटकारा, एक साथ मिलकर जीवन के अन्य मुद्दों – जैसे शिक्षा और स्थानीय प्रशासन आदि पर विचार प्रकट कर सकते हैं।
ix. जागरूकता तथा आत्म विश्वास सूक्ष्म ऋण योजनाओं को बढ़ावा देती हैं जिनसे घर के काम की कीमतें कम हो जाती हैं और छोटे उद्यम शुरू हो जाते हैं।
x. अवकाश प्राप्त लोग शिल्पकला की ओर मुड़ते हैं जिससे कि शाकीय औषधि और सामुदायिक कल्याण लोक व्यवहार में पुनर्जीवित हो सकें।
xi. जब इस तरह के छोटे समुदायों को सफलता मिलती है, सरकार स्वयं भी जागरूक हो उठती है, विकास का कार्य हो जाता है, जितना उसे होना चाहिए।

यह कैसे हुआ?

खैर, यह राजस्थान में 15 वर्ष के अन्तराल में हुआ। अलवर जिले के छोटे से गाँव भीकमपुरा से शुरू होकर, लोगों का केन्द्रित विकास मॉडल संपूर्ण राजस्थान में फैल रहा है। आज हम यह देख सकते हैं कि अरावली नदी जो पिछले चालीस वर्षों से सूखी हुई थी, फिर से बह रही है। इसी प्रकार रूपारेल, जहजाजवाली तथा अन्य कई छोटी नदियाँ भी। यदि हम अलवर जिले की यात्र करें तो प्रयास किये बिना ही हमें पूर्ण रूप से बंजर पहाड़ दिखेंगे जिनके साथ-साथ वो पहाड़ियाँ भी दिखेंगी जो हरी भरी होती जा रही हैं। आपको विश्वास होने लगेगा कि और अधिक पहाड़ी ढलान भी हरे भरे हो जायेंगे। आप एक क्षेत्र देखेंगे जहाँ शांति का राज्य हो रहा होगा। वहाँ वातावरण में संतोष दिखाई देता है।

जोहड़ की फिर से खोज

1985 में यह सब एक युवक राजेन्द्र सिंह से शुरू हुआ। अपने को तुच्छ समझने वाला आदमी परन्तु इस्पात की भावनाएँ लिये हुए। जैसा कि वह स्वयं चाहते हैं, चलिये पहले हम उनके तरुण भारत संघ के कार्यों की बातें करें और फिर उनकी व्यक्तिगत कहानी की ओर देखेंगे।

तरुण भारत संघ (TBS) ने खोज की कि केवल लोगों का पूर्ण सहयोग ही इन उद्देश्यों को पूर्ण कर सकता है। कितनी भी धन की राशि, सरकारी कार्यवाही अथवा कानून इसे प्राप्त नहीं कर सकती। इसलिये डिजाइन, स्थान और प्रत्येक जल संग्रहण ढांचे के निर्माण के विषय में ग्राम सभा में अंतहीन चर्चा तब तक होती है जब तक सब किसी आम सहमति पर नहीं पहुँच जाते हैं। सच्ची सहमति तब मानी जाती है जब समुदाय का प्रत्येक सदस्य या तो धन, अथवा एक जोहड़, एक चेक बांध या बंधिका बनवाने के लिये श्रमदान करेगा।

एक गाँव में निष्कर्ष में पहुँचने में पूरे पाँच वर्ष लगे। आधुनिक सोच के अनुसार, एक सिविल कार्य, जिसके बनाने में केवल 6 महीने लगे थे, यह समय काफी अधिक था। किन्तु एक बार यदि सबकी सहमति से निर्माण हो गया, सब इसको अपना समझकर इसकी देखभाल करते हैं तथा संरक्षित रखते हैं। निर्माण से पहले ही उपयोग और साझापन के मुद्दे तय कर लिये जाते हैं- बाद में नहीं। ऐसे कार्य सदा के लिये होते हैं और विवेचना के पाँच वर्षों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता।

फिर, पहाड़ों का वनस्पति पुनर्जनन में सबकी भागीदारी होती है। पहाड़ पुनर्जीवित तब होते हैं जब मनुष्य उनको अकेला छोड़ देता है, जब परिपक्व पेड़ नहीं कटते तथा पशु अंकुरित होते छोटे वृक्षो को चबाकर नहीं खा जाते। टीबीएस (TBS) कई महीनों में हुई सैकड़ों घंटों की मीटिंग के बाद चुने गये पहाड़ी क्षेत्रों के विषय में गाँव वालों को समझाते हैं जब तक कि वे सब सहमत हो जाते हैं कि गायों को 3 वर्ष के लिये, बकरियों को 5 वर्ष के लिये तथा ऊँटों को 7 वर्षों के लिये कोपलें नहीं चबाने देंगे।

यह समझौता TBS द्वारा ‘सामाजिक बाढ़’ कहलाता है जो आँखों से दिखने वाली बाढ़ों के विपरीत केवल मस्तिष्क में ही है। बड़ी धूमधाम के साथ, बुजुर्ग गाँव वालों को सहमत की गई पूरी ‘सामाजिक बाढ़’ के किनारे चलाते हैं। यह पवित्र जल तथा दूध के मिश्रण से छिड़काव करके पवित्र करते जाते हैं। एक बार, इस प्रकार अधिसेचित किये जाने पर, TBS को पता चल जाता है कि ग्रामीण इसका आदर करेंगे और चौकीदारी करेंगे। क्या सरकारी धन और फियेट (fiats) इस लक्ष्य को कभी भी प्राप्त कर सकते हैं?

TBS का विकास तक जाने वाले केंद्रित लोगों का दृष्टिकोण हैः

i. हर बोधगम्य मुद्दे पर अंतहीन चर्चा।
ii. एक आम सहमति पर पहुँचना, चाहे इसके लिये कितना समय भी लगे।
iii. ग्रामीणों के साथ, सेवा, पैसा या सामग्री की भागीदारी।
iv. सरकार की अवज्ञा, यदि अवहेलना दिखाने की आवश्यकता पड़े तो।
v. और अंत में, सूची में नीचे संतुलित धन को एकत्रित करके कार्यों का वास्तविक क्रियान्वयन करना।

यह ज्ञान राजेन्द्र सिंह को कहीं से मिला नहीं था। राजेन्द्र सिंह ने आगे लोगों को दिया। वर्षों लोगों के साथ मिलकर उन्होंने काम किया तथा नियमों को बनाया। 1985 में, 28 वर्ष का नवविवाहित पुरुष, वह एक सरकारी नौकरी के साथ आराम से जयपुर में रह रहा था। परन्तु महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण का भूत उसे कुछ करने को प्रेरित कर रहा था। बुद्ध के समान उसने अपनी पत्नी और घर को छोड़ दिया और दो वर्ष तक उसका कोई पता नहीं चला। अपने चार मित्रों के साथ वह किशोरी गाँव पहुँचा तथा आश्चर्यचकित गाँव वालों से कहा कि वह कुछ करना चाहता था। वे हैरान थे, परेशान थे और तंग आ चुके थे।

दुर्घटना ने उसके लिये अच्छा स्थान चुना था। तीस के दशक में अरावली पहाड़ियों की हरी भरी घाटियों में बसा अलवर जिला एक समृद्ध प्रदेश था। परन्तु एक लालची राजकुमार ने, जिसकी दृष्टि अपनी श्रेष्ठता को बनाने पर लगी हुई थी, और जो भारत की स्वतंत्रता का विरोधी था, पहाड़ियों पर लकड़ियों के अपने अधिकार को बेच दिया। दस तेजी से बीतने वाले वर्षों में, ठेकेदारों ने भूमि को पेड़ विहीन कर दिया। वर्षा नंगी पहाड़ियों से ढेर सारी मिट्टी नीचे ले आयी जिससे कि जल के क्षेत्र भर गये। जल तीव्र गति से बिना कुओं और खेतों को पानी दिये बह गया। अक्सर (प्रायः) जल संगमरमर की गहरी खानों से टकरा कर व्यर्थ वहीं पड़ा रह गया। जमीन मालिकों ने भूमिहीन श्रमिकों को साथ लेकर दिल्ली और आगरा पैदल यात्र की जिससे कि वे परिश्रम करके थोड़ी रकम अपने घर भेज सकें। परिवार टूट गये।

चालीस साल तक सारी नई पीढ़ियां जान नहीं पायी कि कोई आशा होगी और उनके चारों ओर एक बार हरियाली फिर दिखेगी।

एक जल संरक्षण मॉडल

मंगू राम जैसे कुछ लोगों को पुराने दिन याद थे। वह राजेन्द्र सिंह तथा उसके मित्रों को एक स्थान पर ले गया जहाँ उन्हाेंने खोदना आरम्भ किया। चालीस वर्षों में यह पहला जोहड़ था। जोहड़ एक खुला तालाब होता है जो बहुत बुद्धिमानी से स्थानीय ज्ञान के साथ चुना जाता है। वर्षा के दौरान, अपनी याददाश्त से एक जल प्रवाह पैटर्न बनाया जाता है। वर्षा के बाद भी, इसमें जल महीनों तक टिका रहता है और कुओं को रीचार्ज कर देता है। पहले जोहाद की सफलता ने लोगों के अन्दर सामूहिक स्मृति जगा दी। बुजुर्गों के नेतृत्व में, उत्साही निर्माण कार्य चारों ओर शुरू हो गया।

सूखी हुई अरावली के नदी तट पर जब 650 वाँ जोहाद खोदा गया तो अगली वर्षा ऋतु में अरावरी नदी बहने लगी और वह लगातार बह रही है और इस क्षेत्र के लोगों को जल और जीवन दे रही है। हमीरपुरा में यह नदी चौड़ी होकर पूरे वर्ष बहती है और अपने किनारों लगी हुई कृषि को सीचंती है। आज पूरे राजस्थान में TBS मॉडल जिसका बीड़ा राजेन्द्र सिंह ने उठाया था, खूब फैल रहा है। मनुष्यों द्वारा बनाये गये लगभग 3500 जल संरक्षण संरचनायें बन रही हैं। इनके निर्माण में गाँव वाले लगभग एक तिहाई भाग देते हैं। बाकी सब TBS आयोजित कर रही है। सरकार ने अब बाधाऐं डालना बंद कर दिया है तथा वह सुविधाएँ प्रदान करती है। राष्ट्रपति नारायनन विमान द्वारा हमीरपुर गये थे और उन्होंने गाँव वालों को श्रद्धांजलि दी।

यह और कुछ नहीं बल्कि अत्यन्त सुखद बात है कि एक विनीत व्यक्ति ने, निरक्षर और भोले लोगों को एकजुट कर इतना बड़ा परिवर्तन कर दिया तथा जिसने उपदेश किया कि पर्वत प्रकृति के स्तन होते हैं तथा उनमें बहती नदियों का पानी दूध होता है।

पाठगत प्रश्न 31.3

1. आप अपने व्यक्तिगत स्तर पर पानी कैसे बचा सकते हैं? सूची में कम से कम छः तरीके बताइये।
2. गुजरात में व्यक्तिगत और समुदाय कार्यवाही के वर्षाजल संचयन के कई उदाहरण मिलते हैं। ऐसी दो गतिविधियों की सूची बनाइये।
3. सरकार पानी के संरक्षण को बढ़ावा दे रही है- ऐसा करने के कोई दो कारण बताइये।
4. जल संरक्षण के संदर्भ में तरुण भारत संघ की उपलब्धियों की सूची बनाइये।

आपने क्या सीखा

i. पानी एक दुर्लभ संसाधन है। इसको संरक्षित करने की आवश्यकता है।
ii. संरक्षण कई विधियों के माध्यम से पूरा किया जा सकता है।
iii. घरेलू तथा कृषि के स्तर पर पानी के कुशल उपयोग से हम काफी जल बचा सकते हैं।
iv. बेहतर सिंचाई तकनीकें जल संरक्षण के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।
v. अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण जल संरक्षण में बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके कई लाभ होते हैं।
vi. जल भरण क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसके बीच में से जल निकायों को पानी मिलता है।
vii. वनों और वनस्पतियों का संरक्षण जल भरण (Water shed) में जल-संरक्षण की सहायता करता है।
viii. वन, मृदा-कूड़ा पानी के लिये एक अच्छा छानने वाला उपाय है।
ix. यह पानी की अधिकांश अशुद्धियों को दूर कर देता है।
x. जो जल वन के जल भरण (Water shed) से निकल कर आता है, वह साधारणतः साफ होता है।
xi. पानी के संरक्षण पर व्यक्तिगत, समुदाय और सरकार के कई उदाहरण हैं।
xii. राजस्थान की सूखी हुई अरावली नदी को पुनर्जीवित करने के लिये, श्री राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में तरुण भारत संघ के प्रयास विश्व भर में जल संरक्षण का बहुत बड़ा उदाहरण है।
xiii. व्यक्तिगत तथा सामूहिक स्तर पर गुजरात में किये गये जल संरक्षण भी काफी प्रसिद्ध हैं।
xiv. बहुत बड़ी संख्या में वर्षाजल संग्रहण तथा जल संग्रहण जो देश भर में बनाये गये हैं, वे सरकारी प्रयासों के जल संरक्षण के बहुत अच्छे उदाहरण हैं।
xv. सरकार ने नई नीतियां एवं नियामक बनाये हैं जिनसे कि वर्षाजल संग्रहरण तथा जल संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है।

पाठान्त प्रश्न

1. जल संरक्षण भारत में क्यों महत्त्वपूर्ण है?
2. जल संरक्षण के कुछ महत्त्वपूर्ण तरीकों के नाम लिखिये।
3. एक व्यक्ति घर के स्तर पर जल संरक्षण के लिये क्या कर सकता है?
4. जल ग्रहण प्रबंधन, जल संरक्षण को बढ़ावा देने में कैसे सहायता कर सकता है?
5. वर्षाजल संचयन क्या है? यह कैसे जल संरक्षण में सहायता करता है?
6. गुजरात से वर्षा जल संचयन का एक संक्षिप्त उदाहरण दीजिये।
7. वर्षाजल संचयन के क्या लाभ हैं?
8. जल संरक्षण की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
9. जल संरक्षण के नाम पर सरकार के कुछ पहल के नाम बताइये।
10. तरुण भारत संघ ने कैसे राजस्थान के कुछ गाँवों का चेहरा बदला?

पाठगत प्रश्नों के उत्तर
31.1

1. पाठ देखें।
2. छिड़कना, ड्रिप सिंचाई।
3. पानी और खनिजों की बचत होती है।
4. प्रतिवाष्पोत्सर्जक, K+ का उपयोग करें।
5. दो लाभः 1. यह खेतों में लंबे समय के लिये जल संरक्षित कर सकता है। 2. क्योंकि यह जल बहाव को बहुत तेजी से बहने से रोकता है, इसलिये यह मृदा क्षरण को बचाता है।

31.2
1. एक ऐसा क्षेत्र जिसके बीच में से जल निकाय को जल मिलता है या तो वह बहाव होता है नहीं तो वह भूमिगत मार्ग में जाता है।
2. वन बारिश और उत्कृष्ट भराव को रोकते हैं तथा अतिरिक्त जल पेड़ों की जड़ों के माध्यम से अवशोषित हो जाता है।
3. जल मृदा में से गुजरता है और छोटी पतली परतें जंगल के वनों की जड़ों के लिये उत्कृष्ट फिल्टर और अपेक्षाकृत शुद्ध होता है।
4. सिर्फ एक वृक्ष को एक बिंदु पर काटा जाता है और उसके उखाड़ने से जो छेद हो जाता है वह इतना छोटा होता है कि ऊपर से जल्दी ही अपने आस-पास के वृक्ष को बाहर आते ही, भर जाता है।

31.3
1. भाग 31.3 देखें।
2. भाग 31.3 देखें।
3. भाग 31.3 देखें।
4. भाग 31.3 देखें।

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