वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भूमि प्रबंधन की आवश्यकता

Submitted by birendrakrgupta on Mon, 08/25/2014 - 22:13
Source
कुरुक्षेत्र, मार्च 2013
भारत का भूमि उपयोग का ढांचा काफी दोषपूर्ण है। देश में भूमि का उपयोग पर्याप्त एवं सही ढंग से नहीं किया गया है। चूंकि भूमि एक बहुमूल्य परिसम्पत्ति है और इसकी मात्रा सीमित है। इसीलिए समुचित ढंग से इसका उपयोग आवश्यक है। इस संबंध में हमें अपनी जरूरतों को ध्यान में रखना होगा और यह भी देखना होगा कि भूमि संबंधित जरूरतों को पूरा करने के रास्ते में क्या कठिनाइयां हैं एवं इनको कैसे दूर किया जा सकता है।भारत एक विशाल देश है। इसकी लंबाई उत्तर से दक्षिण 3,214 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम 2,933 किलोमीटर है। इसकी स्थल-सीमा की लंबाई 15,200 किलोमीटर है तथा समुद्र तट की लंबाई 6,100 किलोमीटर है। भारत में कुल भूमि का क्षेत्रफल 32 लाख 87 हजार 263 वर्ग किलोमीटर है, जिस पर भारत की 121.02 करोड़ जनसंख्या निवास करती है। जिसका घनत्व वर्ष 2011 के अनुसार 382 प्रति वर्ग किलोमीटर है। भारत के पास विश्व के क्षेत्रफल की 2.4 प्रतिशत भूमि है जिस पर विश्व की 17.5 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। भारत का क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवां स्थान है, जबकि जनसंख्या की दृष्टि से यह दूसरा बड़ा राष्ट्र है।

भारत का जो क्षेत्रफल है उसमें से 306.1 मिलियन हेक्टेयर भूमि के ही आंकडे़ उपलब्ध हैं जिसका विवरण तालिका-1 में दर्शाया गया है।

तालिका-1 : भारत में उपलब्ध भूमि संसाधन

क्र.

भूमि का वर्गीकरण

मिलियन हेक्टेयर में

1

कुल भूमि

328.7

2

उपलब्ध आंकडे़

306.1

(अ)

ऊसर व कृषि के लिए अप्राप्त भूमि

42.4

(ब)

वन भूमि

69.0

(स)

चारागाह व चराई भूमि

11.0

(द)

बेकार पड़ी कृषि भूमि

19.4

(इ)

परती भूमि

24.9

(ई)

शुद्ध कृषित भूमि

141.2



इस प्रकार भारत में 306 मिलियन हेक्टेयर भूमि में से मात्र 141.2 मिलियन हे. भूमि पर ही खेती की जा रही है जो कुल ज्ञात स्रोतों का 46 प्रतिशत है। शेष भूमि आवास, सड़कें आदि के उपयोग में आ रही है।

जहां तक जरूरतों का प्रश्न है, हमें कृषि और गैर-कृषि कार्यों के लिए अधिकाधिक मात्रा में भूमि की आवश्यकता है। देश में तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या तथा विकास संबंधी जरूरतों के सन्दर्भ में जहां एक ओर हमें रेल, सड़क, कारखाने व निवास स्थान आदि गैर-कृषि कार्यों के लिए अधिक भूमि चाहिए वहीं दूसरी ओर भूमि खेती, वन, चारागाह, आदि कृषि सम्बन्धी कार्यों के लिए अधिक भू-भाग की आवश्यकता है।

वन और गैर-कृषि के उपयोगों के लिए व्यवस्था-भूमि आकार के रूप में हम अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर सकते। मूल रूप से उपलब्ध भूमि के श्रेष्ठतम उपयोग एवं भूमि के वर्तमान उपयोग ढांचे में समुचित परिर्वतन लाकर ही हमें भूमि के सम्बन्ध में अपनी आवश्यकता को पूरा करना होगा। लेकिन भूमि-उपयोग के सम्बन्ध में हम चाहे जैसी योजना बनाए हमें वन और गैर-कृषि प्रयोजनों के लिए तो अतिरिक्त भूमि की व्यवस्था करनी ही होगी। वर्तमान वनक्षेत्र बहुत अपर्याप्त है। कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का यह लगभग 22 प्रतिशत भाग है जबकि राष्ट्रीय वन नीतियों के अन्तर्गत वन क्षेत्र के लिए निर्धारित लक्ष्य 33 प्रतिशत है। अतः वन क्षेत्र का विस्तार किया जाना आवश्यक है। इसी प्रकार रेल, सड़क, इमारत, आदि गैर-कृषि उद्देश्यों के सम्बन्ध में बढ़ती हुई जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त भूमि की व्यवस्था आवश्यक है।

इस सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव


1. वह भू-भाग जो कृषि के लिए उपलब्ध नहीं है और जो मुख्य रूप से बंजर है, उसे वनों के विस्तार एवं कृषि -भिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयोग मे लाया जाना चाहिए।
2. लगभग 7 प्रतिशत भू-भाग के सम्बन्ध में अभी तक जानकारी प्राप्त नहीं है। इसका सर्वेक्षण करके यथासंभव भाग को इन कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।
3. भूमि उपयोग की योजना इस प्रकार बनाई जाए कि जहां उत्तम कोटी की भूमि खेती के लिए इस्तेमाल हो, वहां निम्न कोटी की भूमि नई सड़कें, रेल व नहरें आदि बनाने के काम में लाई जाएं।
4. कुछ समय से देश में विशेष रूप से महानगरों के आसपास की अच्छी भूमि को गैर-कृषि उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जाने लगा है। यह कुप्रवृत्ति देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहितकर है। इसे रोकना बहुत जरूरी है।

भूमि प्रबंधन में शासकीय नीतियां


भूमि प्रबंधन के सम्बन्ध में शासन ने विभिन्न प्रकार की योजनाओं को अपनाया है ताकि बंजर भूमि एवं परती भूमि का उपयोग किया जा सके। इस सम्बन्ध में शासन ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं-

बंजर भूमि का उपयोग- उपलब्ध भूमि संसाधन की पूर्ण शाक्यता को उपयोग में लाने तथा इसे आगे और अवक्रमित होने से रोकने के लिए बंजर भूमि के विकास का बहुत अधिक महत्व है। अवक्रमित भूमि तथा इसके प्रबंधन की समस्या एक जटिल बहु-आयामी समस्या है। तथा इसके विकास के लिए एक वैज्ञानिक, व्यापक और परिवर्तनकारी पद्धति अपेक्षित है।

बंजर भूमि/अवक्रमित भूमि के विकास की गति को बढ़ाने तथा इस सम्बन्ध में लक्ष्यबद्ध रूप में कार्यवाही करने के लिए सरकार ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अन्तर्गत वर्ष 1985 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड की स्थापना की थी। बाद में वर्ष 1992 में ग्रामीण विकास एवं गरीबी उपशमन मंत्रालय में बंजर विकास विभाग के नाम से एक अलग विभाग बनाया गया था। और राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड को इस विभाग को अन्तरित कर दिया गया था। अप्रैल 1999 में भूमि संसाधन प्रबंधन के लिए एक नोडल एजेंसी के रूप मे कार्य करने के लिए बंजर भूमि विकास विभाग का नाम बदलकर भूमि संसाधन विभाग कर दिया गया था। परिणामस्वरूप भूमि आधारित सभी विकास कार्यक्रमों तथा भूमि सुधार प्रभाग को इस विभाग के अन्तर्गत लाया गया था।

समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम- समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम आईडब्ल्यूडीपी, जो केंद्र द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम है, वर्ष 1989-90 से कार्यान्वित किया जा रहा है। एक अप्रैल, 1995 से इस कार्यक्रम को वाटरशेड विकास के लिए सामान्य मार्गदर्शी सिद्धान्तों के अन्तर्गत वाटरशेड पद्धति के जरिए कार्यान्वित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत बंजर भूमि और अवक्रमित भूमि के विकास से सभी स्तरों पर लोगों की भागीदारी को बढ़ाए जाने के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों के सृजन में वृद्धि होने की आशा की जाती है जिससे भूमि के सतत विकास और लाभों के सामान्य वितरण में सहायता मिलती है।

समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम आईडब्ल्यूडीपी के अन्तर्गत देश में वनेतर बंजर भूमि को विकसित करने की परिकल्पना की गई है। इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन की मूल क्रियाविधि को 1.04.1995 से उस समय संशोधित किया गया है जब वाटरशेड पद्धति के जरिए वाटरशेड विकास के लिए मार्गदर्शी सिद्धांत लागू हुए थे। तब से बंजर भूमि को विकसित करने हेतु परियोजनाएं माइक्रो वाटरशेड के आधार पर स्वीकृत की गई हैं।

सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम


सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (डीपीएपी) सबसे पुराना क्षेत्र विकास कार्यक्रम है जिसे केंद्र सरकार ने उन क्षेत्रों जहां पर लगातार भयंकर सूखे की स्थिति बनी रहती है, की विशेष समस्याओं को हल करने के लिए वर्ष 1973-74 में शुरू किया था। इन क्षेत्रों की विशेषता यह है कि यहां पर मानव जनसंख्या और पशुओं की संख्या अधिक होने के कारण भोजन, चारे तथा ईंधन के लिए यहां के उन प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार काफी अधिक दबाव पड़ रहा है जो पहले से ही कम हैं। यहां पर मुख्य समस्याएं वनस्पतिक आच्छादन का सतत् रूप से क्षीण होना, भूमि-कटाव में वृद्धि होना तथा भूमि के नीचे के जलभंडार को पुनः भरने के लिए कोई प्रयास किए बिना इसका लगातार दोहन किए जाने के कारण भू-जल के स्तर में गिरावट आना है।

उद्देश्य


कार्यक्रम का मूल उद्देश्य फसलों के उत्पादन, पशुधन तथा भूमि की उत्पादकता, जल और मानव संसाधनों पर पड़ने वाले सूखे के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना है तथा इसके द्वारा अंततः प्रभावित क्षेत्रों को सूखे के प्रभाव से मुक्त कराना है। कार्यक्रम का लक्ष्य कार्यक्रम क्षेत्रों में निवास करने वाले संसाधनहीन गरीब लोगों और उपेक्षित वर्गों के समग्र आर्थिक विकास को संसाधन आधार के सृजन, इसे व्यापक बनाकर और समान वितरण के द्वारा तथा रोजगार के अवसरों में वृद्धि करके बढ़ावा देना और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है। कार्यक्रम के इन उद्देश्यों को सामान्यतया भूमि विकास, जल संसाधन विकास और वनीकरण/चारागाह विकास के लिए विकासात्मक कार्यों को वाटरशेड पद्धति के आधार पर शुरू करके पूरा किया जा रहा है।

मरुभूमि विकास कार्यक्रम


मरुभूमि विकास कार्यक्रम (डीडीपी) को राजस्थान, गुजरात और हरियाणा के गर्म मरुभूमि क्षेत्रों तथा जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के शीत मरुभूमि क्षेत्रों, दोनों में ही वर्ष 1977-78 में शुरू किया गया था। वर्ष 1995-96 से इसकी कवरेज को आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ और जिलों के लिए बढ़ा दिया गया है।

एक तकनीकी समिति द्वारा इस कार्यक्रम की वर्ष 1994-95 में समीक्षा की गई थी। समिति द्वारा इस कार्यक्रम के तहत संतोषजनक परिणाम प्राप्त न होने के लिए पता लगाया गया। मुख्य कारण क्षेत्र विकास कार्य को वाटरशेड आधार पर कार्यान्वित न करना और कार्यक्रम के आयोजन और कार्यान्वयन, दोनों में ही स्थानीय लोगों की भागीदारी वास्तव में नगण्य होना था। इसके अलावा निधियों की अपर्याप्तता, प्रशिक्षित कर्मिकों का उपलब्ध न होना, एक साथ ऐसे बहुत से कार्यकलापों को शुरू करना जिन्हें न तो उचित रूप से समेकित किया गया था और न ही उन्हें कार्यक्रम के उद्देश्यों से आवश्यक रूप से सम्बद्ध किया गया था, ऐसे कारण पाए गए थे, जो कार्यक्रम के असर को कम करने में सहायक रहे थे।

समिति की सिफारिशों के आधार पर कार्यक्रम के तहत नए ब्लॉकों/जिलों को शामिल किया गया था। वाटरशेड विकास के लिए विस्तृत मार्गदर्शी सिद्धांत, जो विभिन्न क्षेत्र विकास कार्यक्रमों के लिए समान रूप से लागू हैं, अक्टूबर 1994 में जारी किए गए थे और 1 अप्रैल, 1995 से लागू किए गए थे। तत्पश्चात् विभिन्न भागीदारों से प्राप्त सूचना के आधार पर संशोधित किए गए मार्गदर्शी सिद्धांत सितम्बर, 2001 में परिचालित किए गए थे। ये मार्गदर्शी सिद्धांत वर्ष 2000-01 के दौरान या इसके बाद स्वीकृत की गई परियोजनाओं के लिए लागू थे। वर्ष 2003 में इन मार्गदर्शी सिद्धांतों को संशोधित किया गया था और तब से हरियाली मार्गदर्शी सिद्धांत लागू हैं। वाटरशेड विकास परियोजनाओं के लिए समान मार्गदर्शी सिद्धांत 1 अप्रैल, 2008 से लागू हैं।

उद्देश्य


इस कार्यक्रम की परिकल्पना भूमि, जल, पशुधन और मानव संसाधनों के संरक्षण, विकास और इन्हें उपयोग में लाकर पारिस्थितिकीय संतुलन की बहाली के लिए एक दीर्घकालिक उपाय के रूप में की गई थी। इसका उद्देश्य ग्रामीण समुदाय के आर्थिक विकास को बढ़ाना और ग्रामीण क्षेत्रों में समाज के संसाधनहीन गरीब लोगों में उपेक्षित वर्गों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है। इस कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य निम्नानुसार हैं-

1. फसलों, मानव और पशुधन पर मरुस्थलीकरण और विपरीत जलवायु परिस्थितियों के प्रतिकूल प्रभावों को कम करना और मरुस्थलीकरण को रोकना।
2. प्राकृतिक संसाधनों अर्थात भूमि, जल, वानस्पतिक आच्छादन का उपयोग, संरक्षण और विकास करके पारिस्थितिकीय संतुलन को बहाल करना और भूमि की उत्पादकता बढ़ाना।
3. भूमि के विकास, जल संसाधनों के विकास और वनीकरण/चरागाह विकास के लिए विकासात्मक कार्यों को वाटरशेड पद्धति के जरिए कार्यान्वित करना।

भूमि सुधार


संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-2 (राज्य सूची) की प्रविष्टि संख्या 18 में की गई व्यवस्था के अनुसार भूमि और भू-धृतियां आदि पूर्णतया राज्यों के विधायी और प्रशासनिक क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आती हैं। तथापि, केंद्रीय सरकार प्रथम पंचवर्षीय योजना के आरंभ से ही भूमि सुधारों के क्षेत्र में सलाहकारी और समन्वयकारी भूमिका अदा कर रही है। वास्तविक कृषकों और भूमिहीन ग्रामीण गरीबों के लिए सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने तथा इसके द्वारा हमारी अर्थव्यवस्था के औद्योगिक और अन्य संबद्ध क्षेत्रों की समग्र संवृद्धि के लिए सतत् धारणीय आधार तैयार करने के एक साधन के रूप में भूमि सुधार ग्रामीण पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भूमिहीन ग्रामीण गरीबों को भूमि की अधिक प्राप्ति को गरीबी उपशमन के लिए लक्षित प्रयासों का एक महत्वपूर्ण संघटक माना जाता है।

अतः ग्रामीण विकास मंत्रालय में भूमि संसाधन विभाग भूमि सुधारों के संबंध में कारगर उपाय जिनमें 1950 के दशक के प्रारम्भ से चल रही जमींदारी प्रथा और सभी प्रकार के बिचौलियों का उन्मूलन करना, उसी दशक के मध्य में भूमि की अधिकतम पारिवारिक सीमा निर्धारित करना, भूमि की अधिकतम सीमा को कम करना, भूमि जोतों की चकबंदी करना और केंद्रीय सरकार के बीस सूत्री कार्यक्रम के एक भाग के रूप में अधिकतम सीमा से फालतू भूमि के वितरण में प्रगति की मॉनीटरिंग करना शामिल है, आरंभ करने के लिए राष्ट्रीय सहमति तैयार करने हेतु महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। विभाग ने संविधान की नौवीं अनुसूची में 277 भूमि कानूनों को समाविष्ट करने के लिए संविधान में 13 बार संशोधन किया। संविधान का 78वां संशोधन था, जिसके द्वारा उपरोक्त अनुसूची में 27 भूमि कानूनों को समाविष्ट किया गया है।

भूमि संसाधन विभाग में भूमि सुधार प्रभाग भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 42 के अंतर्गत शामिल विषयों सहित भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 के प्रशासन के संबंध में ग्रामीण विकास मंत्रालय के केंद्रीय (नॉडल) प्रभाग के रूप में भी कार्य करता है। यह प्रभाग केंद्र द्वारा प्रायोजित दो योजनाओं भूमि अभिलेखों का कम्प्यूटरीकरण (सीएलआर) और राजस्व प्रशासन को सुदृढ़ बनाना एवं भूमि अभिलेखों को अद्यतन करना (एसआरए एंड यूएलआर) को भी कार्यान्वित करता है। अतः इस प्रभाग के कार्यकलापों को व्यापक रूप से तीन मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है। अर्थात संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करना, भूमि सुधार संबंधी कार्यक्रमों की निगरानी करना और केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं को कार्यान्वित करना।

कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि एवं अधिक कृषि उत्पादन की व्यवस्था


भारत जैसे कृषि-प्रधान देश की विशाल जनसंख्या के लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता कृषित भूमि की है। इस सम्बन्ध में भारत की स्थिति काफी सन्तोषजनक है। परती भूमि को शामिल करते हुए देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में कृषित भूमि का भाग 50 प्रतिशत के लगभग है, जबकि सारे विश्व के लिए कृषि भूमि क्षेत्र का अनुपात केवल 32 प्रतिशत ही है।

अनुकूल स्थिति के बावजूद देश में कृषि उत्पादन की मात्रा पर्याप्त नहीं है। कृषि-उत्पादन में भारी वृद्धि लाया जाना जरूरी हैं, ताकि इसके लिए बढ़ती हुई मांग पूरी की जा सके। इस कार्य के लिए कृषित भूमि क्षेत्र में विस्तार लाना न्यायसंगत होगा। एक तो देश में इसके लिए भूमि बहुत सीमित है। दूसरे, नई भूमि को कृषि योग्य बनाने में बड़े पैमाने पर पूंजी लगानी होगी। यही नहीं बल्कि इस कार्य में बहुत लम्बा समय लगेगा। अतः कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए हमें मूल रूप से भूमि-उत्पादन में तेजी से वृद्धि लानी होगी। इसके लिए एक महत्वूपर्ण उपाय सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि लाने से सम्बन्धित है और भाग्यवश देश में इसके लिए व्यापक क्षेत्र उपलब्ध है। इस सुविधा के फलस्वरूप देश में बहुफसली खेती को बढ़ावा मिल सकेगा। दूसरे, भूमि की उर्वरता बनाए रखने व बढ़ाने के उद्देश्य से अच्छी खाद व पोषक तत्वों के इस्तेमाल, भू-संरक्षण कार्यक्रम आदि को प्रोत्साहन देना होगा। तीसरे, उत्पादकता बढ़ाने के लिए हमें उपयुक्त तकनीक और तौर-तरीकों को अपनाना होगा। इस संदर्भ में हमें छोटे किसानों की ओर विशेष ध्यान देना होगा। इन अनेक सुझावों के आधार पर भूमि प्रंबंधन के द्वारा विकास के नवीन लक्ष्य निर्धारित किए जा सकेंगे।

(लेखक आवसीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बीना, जिला सागर, मध्य प्रदेश के अर्थशास्त्र विभाग में अतिथि विद्वान हैं। ई-मेल: neeraj_gautam76@yahoo.co.in)

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