वसंत लेकर आया है सूखा

Submitted by Hindi on Fri, 04/26/2013 - 16:34
Source
नेशनल दुनिया, 25 अप्रैल 2013
आधुनिक सभ्यता में रची-बसी हमारी जीवनशैली बिजली के बिना सांस भी नहीं ले सकती है। रोशनी और पावर की प्यास और पानी की प्यास के बीच चुनाव जैसा कुछ बचा ही नहीं है। जालना में लोहे के कारखाने कुकुरमुत्तों की तरह उगे हैं और ये सारे नगर के पानी को जरूरत से ज्यादा पीते हैं। इनकी पानी भी रोका नहीं जा सकता है क्योंकि अगर ये उद्योग बंद हुए तो इनमें काम कर रहे 50 हजार से ज्यादा कामगार न केवल बेरोजगार हो जाएंगे बल्कि अपने गांव-नगर पहुंच कर पानी की ज्यादा मांग भी करेंगे।अकाल... सूखा... बाढ़...महामारी... आदि-आदि सब पहले कुछ खास प्रांतों की किस्मत में लिखे होते थे। जबसे सबकी समझ में यह आ गया है कि ये सब बेहिसाब कमाई के प्राकृतिक अवसर होते हैं, तब से ये जहां चाहें वहां आ जाते हैं। इन दिनों सूखा महाराष्ट्र में डेरा डाले हुए है। महाराष्ट्र सरकार इस मेहमान से बेहद चिंतित है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण अपना एक माह का वेतन सूखा राहत कोष में दे रहे हैं। मंत्रियों से भी ऐसा ही करने को कह रहे हैं। लेकिन मंत्रियों में कोई उत्साह नहीं दिखा। मंत्रियों की तरफ से बता दिया गया है कि हम अपना वेतन दे-देकर तो इस सूखे का मुकाबला नहीं कर सकते हैं। उपमुख्यमंत्री अजित पवार तो मंत्रियों से भी आगे निकल गए। केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने तो जो मुंह में आया बोल दिया। कह दिया कि वे पेशाब कर-कर के भी सूखी नदियों को नहीं भर सकते हैं। सूखे से घिरे महाराष्ट्र में यह बयान सूबे की राजनीति में तूफान बरपा गया है।

यह है महाराष्ट्र के अभूतपूर्व सूखे का मुकाबला करने वाली राजनीति का चेहरा। लेकिन सूखा है कि पूरे मराठवाड़ा को कसता जा रहा है। आज यह सिंचाई परियोजना के घोटालों से आक्रांत है। राज्य के 35 में से 16 जिलों के चार करोड़ से ज्यादा लोग सूखे की चपेट में हैं। यह महाराष्ट्र का अपेक्षाकृत कम बारिश वाला इलाक़ा है, जहां 500-700 मिलीमीटर बारिश होती है। पिछले साल इसकी आधी बारिश हुई और इस साल तो जैसे इंद्र ने मुंह ही फेर लिया। महाराष्ट्र में आलम यह है कि ज़मीन के नीचे के पानी पर टैंकर माफ़िया का क़ब्ज़ा है। टैंकरों की यह फौज किसी न किसी राजनेता की छत्रछाया में काम करती है। राज्य के बांधों में केवल 35 फीसद पानी बचा है। जयकवादी और उज्जैनी बांधों में अब पानी है ही नहीं। उस्मानाबाद में 30 किलोमीटर दूर से पानी लाया जा रहा था। अब वह भी संभव नहीं रहा।

वैज्ञानिक सरकार को बता रहे हैं कि जहां पर्याप्त पानी है वहां से पानी लाकर इन सूखे इलाकों को नहीं पहुंचाया जाएगा तो लोग ज़मीन की छाती तोड़ने-खोदने में जुट जाएंगे। नुकसान ऐसा होगा जिसकी दशकों तक भरपाई नहीं हो सकेगी। ताज़ा खबर यह है कि कर्नाटक की सीमा से लगने वाले सांगली जिले के कोई 50 सूखाग्रस्त गाँवों ने प्रति गांव 15-20 बोरवेल खोद डाले हैं। ये बोरवेल किसानों को बहुत महंगे पड़ रहे हैं। सांगली जिले का सौभाग्य यह है कि महाराष्ट्र की राजनीति के चार महा-खिलाड़ी यहीं से आते हैं। इनमें सरकारी खिलाड़ी गृहमंत्री आरआर पाटील और राहत व पुनर्वास मंत्री पतंगराव कदम भी शामिल हैं। लेकिन इन्हें अपने इलाके की सुध लेने की फुर्सत नहीं है। दूसरा खतरा यह सामने खड़ा है कि सांगली, बीड़ आदि जिलों के लाखों लोग कमाई के लिए पश्चिम महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सतारा से लेकर पुणे, मुंबई तक जाते हैं।

नेता यह मान कर चलते दिखाई देते हैं कि यह सूखा तो आना ही था क्योंकि हर चौथे साल यह महाराष्ट्र के दौरे पर आता है। कोई यह नहीं पूछता कि बिन बुलाए जो मेहमान हर चौथे साल आता है और राज्य को लहूलुहान कर जाता है, उसे रोकने के लिए आप कुछ क्यों नहीं कर पाते। जवाब मिलेगा जब आप महाराष्ट्र के हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्टों की तरफ देखेंगे। राष्ट्रीय जलनीति कहती है कि जब कभी कहीं पानी की समस्या हो तो सबसे पहले हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्टों को दिया जाने वाला पानी बंद कर देना चाहिए। पीने का पानी सबसे पहली प्राथमिकता है जिससे कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। इसके बाद नंबर आता है सिंचाई के लिए दिए जाने वाले पानी का। फिर कहीं जाकर उन उद्योगों का नंबर आता है जो बहुत पानी पीते हैं। हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्ट इसी श्रेणी में आते हैं आज स्थिति यह है कि हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्टों को पानी न देने की हिम्मत कोई सरकार नहीं कर सकती है।

आधुनिक सभ्यता में रची-बसी हमारी जीवनशैली बिजली के बिना सांस भी नहीं ले सकती है। रोशनी और पावर की प्यास और पानी की प्यास के बीच चुनाव जैसा कुछ बचा ही नहीं है। जालना में लोहे के कारखाने कुकुरमुत्तों की तरह उगे हैं और ये सारे नगर के पानी को जरूरत से ज्यादा पीते हैं। इनकी पानी भी रोका नहीं जा सकता है क्योंकि अगर ये उद्योग बंद हुए तो इनमें काम कर रहे 50 हजार से ज्यादा कामगार न केवल बेरोजगार हो जाएंगे बल्कि अपने गांव-नगर पहुंच कर पानी की ज्यादा मांग भी करेंगे। जगजीत सिंह ने गाया है, ‘हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा।’

महाराष्ट्र में भीषण सूखे की चपेट में है किसानमहाराष्ट्र में भीषण सूखे की चपेट में है किसानमहाराष्ट्र सरकार को रास्ता क्यों नहीं मिलता है। जवाब भी इसी महाराष्ट्र में छिपा है। पानी और सिंचाई की इसकी सारी परियोजनाएं भयंकर भ्रष्टाचार में लिपटी हुई है। देश के सार्वजनिक जीवन की आत्मा समान मेधा पाटकर ने अभी-अभी मुंबई में वे सारे कागज़ात सार्वजनिक रूप से जारी किए जो बताते हैं कि केवल एक सिंचाई परियोजना गोसीखुर्द की नहरें बनाने में महाराष्ट्र सरकार के व राजनीति के नामी लोगों ने कैसी लूट की है। सरकारी गलियारों में इसे स्पीडमनी कहते हैं। यानी वह रकम जो आप भर दें तो मंत्रालय में आपकी फाइलें तेजी से दौड़ने लगती हैं। स्पीडमनी की खुली दर है-प्रोजेक्ट की कुल कीमत का 10 फीसद।

मेधा पाटकर ने अखबारों को जो जानकारी दी है उसके मुताबिक गोसीखुर्द परियोजना में से अकेले अजित पवार को 27,50,00,000 की रकम दी गई है। इसमें से कमाई करने वालों में नितिन गडकरी भी हैं, गोपीनाथ मुंडे भी, सुनील देशमुख भी और दूसरे कुछ छुटभैये भी। मेधा पाटकर ने इस खुलासे के साथ मांग की है कि एक ईमानदार न्यायाधीश को सरकार यह मामला सौंपे और इसकी खुली जांच करवाए कि महाराष्ट्र की सिंचाई परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की स्थिति क्या है। सरकार की तरफ से अब तक कोई जवाब नहीं है।

मेधा पाटकर के इस खुलासे से कहीं पहले महाराष्ट्र सरकार के सिंचाई विभाग के चीफ़ इंजीनियर विजय पंधारे ने सरकार को लिखित जानकारी भेजी थी कि 1999-2009 के बीच महाराष्ट्र की 70,000 करोड़ रुपयों की सिंचाई परियोजनाओं में से आधी रकम राजनेताओं व दूसरों की मिलीभगत से डकार ली गई है। इस लिखित शिकायत का भी कोई जवाब सरकार ने नहीं दिया। इतना ज़रूर बताया कि इस घोटाले में जिसका नाम सबसे ऊपर आया था उन अजित पवार के मंत्रालय ने इस आरोप की जांच की और इसे बेबुनियाद पाया। अप्रैल बीतने को है। मई-जून का महीना आने की तैयारी कर रहा है। महाराष्ट्र के किसान खौफजदा आंखों इसे आता देख रहे हैं। उनकी आंखों में पानी नहीं है। पानी कहीं नहीं है।

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