छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक विवेचन

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छत्तीसगढ़ प्रदेश में औद्योगिक विकास और उसका पर्यावरण पर प्रभाव (पुस्तक), 2002

स्वतंत्रता पूर्व छत्तीसगढ़ क्षेत्र के उद्योगस्वतंत्रता पूर्व छत्तीसगढ़ क्षेत्र के उद्योग

1. स्वतंत्रता से पूर्व उद्योगों की स्थिति,
2. स्वतंत्रता के पश्चात उद्योगों की स्थिति एवं विकास,
3. पंचवर्षीय योजनाएँ एवं औद्योगिक विकास

ऐतिहासिक विवेचन

छत्तीसगढ़ प्रदेश की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आश्रित रही है। कृषि के क्षेत्र में सम्पन्न होने के समानान्तर यह क्षेत्र खनिज पदार्थों की उपलब्धता के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। ये खनिज पदार्थ प्रदेश के औद्योगिक विकास में कृषि के साथ सहभागी के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। खनिज पदार्थों की उपलब्धता के आधार पर देखा जाये तो स्पष्ट होता है, कि छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था कृषि से खनिजोन्मुख अथवा खनिज आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने लगी है तथा यह प्रदेश को औद्योगिक रूप से अग्रणी क्षेत्रों के समानान्तर लाने के लिये आवश्यक भी है।

प्रदेश के आर्थिक विकास सम्बन्धी परिदृश्य द्वारा स्पष्ट होता है कि प्रदेश के वे स्थान, जो महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक केन्द्र, वनोपज, खनिज उत्पादों तथा कृषि पर आधारित प्रमुख मण्डी रहे हैं तथा साथ ही साथ परिवहन मार्गों एवं संचार माध्यमों द्वारा देश के अन्य भागों में जुड़े रहे वे क्षेत्र औद्योगिक रूप से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभर कर सामने आये तथा इन्हीं क्षेत्रों से वनोपज, कृषि उत्पाद तथा खनिज आधारित प्रारम्भिक औद्योगीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। ऐसे क्षेत्रों के अन्तर्गत रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बिलासपुर, महासमुंद, धमतरी, तिल्दा-नेवरा, भाटापारा आदि विशेष उल्लेखनीय है।

स्वतंत्रता से पूर्व उद्योगों की स्थिति :-

स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व छत्तीसगढ़ प्रदेश, औद्योगिक रूप से देश का पिछड़ा हुआ क्षेत्र था तथा प्रदेश में औद्योगिक विकास हेतु सुनिश्चित नीति का अभाव था। अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर ही आश्रित थी, फलतः उद्योगों के रूप में चावल, दाल तथा तेल मिलें ही मुख्य थीं। अन्य प्रकार के उद्योगों का सर्वथा अभाव था। ग्रामीण जनता जो सामान्यतः अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में आत्मनिर्भर होती है, अपनी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कपड़ा-बुनाई, रंगाई, बर्तन, जूते, लकड़ी तथा लोहे के कृषि उपकरण आदि बनाने जैसे कुछ उद्योगों में लगी रहती थी।

धान उत्पादक के रूप में प्रमुख क्षेत्र होने के फलस्वरूप वर्ष 1935 में छत्तीसगढ़ प्रदेश में 46 चावल मिलें थीं। जिनमें से वर्ष 1935 में कारखाना अधिनियम 1935 (XXV 1934) के अन्तर्गत रायपुर में 37, बिलासपुर में 4 तथा दुर्ग में 5 चावल मिलें मौसमी कारखानों के रूप में पंजीयित थी। इन कारखानों में औसतन प्रतिदिन काम करने वाले कामगारों की संख्या जहाँ रायपुर में 497 थी, वहीं बिलासपुर में 27 तथा दुर्ग में 18 थी।

प्रदेश में तेल मिल के अन्तर्गत 6 इकाइयाँ पंजीयित थीं। कारखाना अधिनियम 1911 (1922 के एक्ट क्रमांक 3 द्वारा यथा संशोधित) के अधीन वर्ष 1924 में रायपुर जिले में कारखाने के रूप में तेल मिल का पंजीयन किया गया था। कारखाना अधिनियम 1934 लागू होने तक कारखाने के रूप में पंजीयित तेल मिलों की संख्या 4 हो गई थी। बिलासपुर जिले में पंजीयित कारखानें के रूप में तेल मिल का उल्लेख कारखाना अधिनियम के अधीन सन 1930 के पंजीयित कारखानों की सूची में विद्यमान है। इस वर्ष तेल मिल के अन्तर्गत 2 इकाइयाँ थी तथा इन दोनों में दैनिक रूप से 37 कामगार नियोजित थे। सन 1935 में तेल मिलों की संख्या वही थी जो 1930 में थी किन्तु कामगारों की संख्या 83 तक हो गई थी। इमारती लकड़ी की चिराई वन उपज पर आधारित है। छत्तीसगढ़ प्रदेश में आरा मिल एकमात्र बिलासपुर जिले में स्थापित थी। वर्ष 1947 में बिलासपुर जिले में एक आरा मिल कारखाने के रूप में पंजीयित थी।

स्पष्ट है कि स्वतंत्रता से पूर्व औद्योगिक गतिविधियाँ कृषि पर आधारित चावल तथा तेल मिलों तक ही सीमित थी। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ प्रदेश हाथ करघा बुनाई उद्योग का भी एक मुख्य केन्द्र था। छत्तीसगढ़ प्रदेश में टसर सिल्क तथा कोसा उत्पादन के महत्त्वपूर्ण केन्द्र रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ इत्यादि थे। रायपुर तहसील में आरंग, सारागाँव, खरोरा तथा कुनारा, महासमुंद तहसील में राजिम तथा पचेड़ा, धमतरी तहसील में धमतरी तथा कूरा, बलोदाबाजार तहसील में बलौदा, सिमगा तथा नवापारा में छोटे पैमाने पर टसर सिल्क की कताई तथा बुनाई का कार्य किया जाता था।

बिलासपुर जिले में अन्य जिलों की अपेक्षा टसर सिल्क उद्योग अधिक महत्त्वपूर्ण रहा है। बिलासपुर खास, खोकरा, चांपा, छुरी, अकलतरा तथा बालोद रेशम बुनाई के प्रमुख केन्द्र थे। टसर रेशम का कपड़ा भारत के सभी भागों तथा साथ ही चीन को भी निर्यात किया जाता था। बमनीडीह तथा करनोद सर्वोत्तम सूती कपड़े की बुनाई के लिये प्रसिद्ध थे। बिलासपुर, चन्द्रपुर, चांपा, बालोद, तखतपुर, नवागढ़ मुंगेली आदि बुनाई के अन्य केन्द्र थे। दुर्ग जिले में बेमेतरा तहसील के अन्तर्गत सिवनी टसर सिल्क के उत्पादन के लिये प्रसिद्ध था। रायगढ़ तथा सारंगढ़ भी टसर सिल्क तथा कोसा उत्पादन के महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे।

वृहद स्तरीय उद्योगों के अन्तर्गत प्रदेश में रायगढ़ में स्थित रायगढ़ जूट मिल थी जो सन 1935 में स्थापित की गई थी। सन 1968 में इस कारखानें में कार्यरत दैनिक श्रमिकों की संख्या 620 थी। इस मिल में उत्पादित बोरियाँ ना सिर्फ मध्य प्रदेश अपितु राजस्थान तथा उड़ीसा में भी भेजी जाती थीं।

प्रदेश में सर्वप्रथम स्थापित वृहदोत्पादी औद्योगिक इकाइयों में से एक राजनांदगांव में कपड़ा मिल थी। यह मिल राजनांगदांव के छत्तीसगढ़ सामतीय राज्य के राजा बलराम दास द्वारा स्थापित की गई थी सन 1891 में अपने अभिषेक के पश्चात शीघ्र ही उन्होंने राजनांदगांव में पानी-घर, शाला-भवन आदि के निर्माण जैसे जन उपयोगी कार्य हाथ में लिये तथा इनके साथ ही 1892 में छत्तीसगढ़ में प्रथम कताई-बुनाई मिल का निर्माण प्रारम्भ किया। मिल का नाम “केन्द्रीय प्रांत कपास मिल” (Central Provinces Cotton Mill) रखा गया तीन वर्ष पश्चात यह मिल बंगाल-नागपुर कपास मिल कम्पनी को बेच दी गई। शताब्दी के पहले दशक के दौरान मिल में 478 करघे और 28,224 तकुए थे। इस अवधि में विनियुक्त कर्मचारी 1833 थे। मिल के उत्पादों में चादर, धोतियाँ, मेजपोश तथा कम्बल इत्यादि थे। छत्तीसगढ़ सामंतीय राज्यों (Chhattisgarh Feudatory States) के प्रशासनिक प्रतिवेदन के अनुसार 1906 में प्लेग के कारण मिल चलाने में बाधाओं के बावजूद वर्ष के कार्य परिणाम अच्छे थे और यह निर्णय लिया गया था कि मिल के उत्पादों की बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिये उसमें अभिवर्धन किया जाए। 1922 में आंशिक हड़ताल के कारण रात्रि का कार्य बन्द हो गया। हड़ताल अक्टूबर में आरम्भ हुई और वर्ष के दिसम्बर तक चलती रही। 1925 में पुनः हड़ताल के कारण वर्ष के कुछ भाग में मिल बन्द कर दी गई थी।

मिल का नाम मध्य प्रदेश राज्य के कारखाना अधिनियम 1948 के अधीन पंजीकृत होने वाले कारखानों की सूची में 1949 में प्राप्त होता है। उस वर्ष मिल में प्रतिदिन काम करने वाले श्रमिकों की औसत संख्या 3656 थी। मिल 1954-55 तक बंगाल नागपुर कपास मिल कम्पनी के प्रबन्धन में रही। 1956 में प्रबन्धन में बदलाव आने से अधिकार में परिवर्तन आया। 1953 से 1962 तक साल दर साल हानि होने के फलस्वरूप मिल 21 दिसम्बर 1962 को बन्द कर दी गई। सरकार ने मिल के कार्य-चालन की जाँच की और 17 दिसम्बर 1963 के आदेश से उसे गृहीत कर लिया तथा सर्वश्री राजाराम गुप्ता एंड ब्रदर्स को उसका प्रबन्ध-अभिकर्ता नियुक्त किया, जिसने मिल का कार्यभार 19 दिसम्बर 1963 को लिया। मिल पुनः 4 जनवरी 1964 को नए प्रबन्ध-अभिकर्ता द्वारा प्रारम्भ हुई। मिल ने कपड़े के केवल मोटे और मध्यम प्रकारों को तैयार किया और मच्छरदानी के कपड़े में विशेषज्ञता रखी। 1950 में मिल में कुल श्रमिकों की संख्या 2994 थी। 1960 में यह 2550 थी। मिल की उत्पादन पूँजी 1950 में 76,89,826 रुपए थी, लेकिन 1960 में वह 62,03,474 रुपए हो गई। उल्लेखनीय है कि 1963 के दौरान मिल उसके कार्य चालन आदि की जाँच के लिये भारत-सरकार द्वारा गृहीत होने का कारण बन्द रही। 1962 में उसमें प्रतिदिन कार्यरत श्रमिकों की औसत संख्या 1445 थी तथा 1964 में 2,447 थी। 1965 में मिल में प्रतिदिन 2,319 श्रमिक कार्य कर रहे थे।



छत्तीसगढ़ के मौजूदा उद्योग क्षेत्रछत्तीसगढ़ के मौजूदा उद्योग क्षेत्र

ऐसा केवल भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना के बाद हुआ कि कुछ अन्य वृहदोत्पादी इकाइयाँ जिले में प्रारम्भ हुई जो मोटे तौर पर इस्पात संयंत्र के सहायक और गौण उद्योगों की सामान्य श्रेणियों में आती है।

स्वतंत्रता के पश्चात उद्योगों की स्थिति एवं विकास :-

स्वतंत्रता के पश्चात कुछ वर्षों तक प्रदेश की औद्योगिक स्थिति में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ था। लघुस्तरीय उद्योगों के अन्तर्गत चावल मिल, दाल-मिल तथा तेल मिल ही मुख्य थी। स्वतंत्रता के पश्चात इनकी संख्या में कुछ वृद्धि अवश्य हुई।

चावल मिल :-

स्वतंत्रता के पश्चात वर्ष 1949 से 1968 के मध्य छत्तीसगढ़ प्रदेश में चावल मिलों की संख्या 269 हो गई थी। रायपुर जिले में वर्ष 1949 में धान कुटाई कारखानों की संख्या 45 थी जो 1951 में बढ़कर 49 हो गई तथा एक दशक पश्चात 1960 में चावल मिलों की संख्या बढ़कर 99 हो गई तथा 1963 में इनकी संख्या 118 हो गई, जिनमें प्रतिदिन 3200 कामगारों को रोजगार मिलता था। वर्ष 1964 में इन मिलों की संख्या घटकर 107 हो गई थी। वर्ष 1968 में पंजीयित चावल मिलों की संख्या 119 थी जिसमें प्रतिदिन 2,932 व्यक्तियों को रोजगार मिलता था। सहकारिता के आधार पर कार्य करने वाली चावल मिल वर्ष 1949 में महासमुंद किसान कोऑपरेटिव राइस मिल एंड मार्केटिंग सोसाइटी लिमिटेड, महासमुंद में तथा धमतरी तहसील में कुरुद कोऑपरेटिव मार्केटिंग सोसाइट कुरुद की स्थापना की गई थी।

बिलासपुर जिले में वर्ष 1950 में पंजीकृत चावल मिलों की संख्या 51 थी, जो वर्ष 1965 में बढ़कर 78 हो गई। उसी वर्ष चावल की 12 मिलें बन्द रही। वर्ष 1965 में चालू कारखानों में नियोजित श्रमिकों की संख्या 2400 थी।

दुर्ग जिले में वर्ष 1949 में 20 चावल मिलें कारखाने के रूप में पंजीयित की गई थी जिनमें 310 कामगार प्रतिदिन कार्य करते थे। वर्ष 1960 में इनकी संख्या बढ़कर 36 हो गई जिनमें 414 श्रमिक प्रतिदिन कार्य करते थे। वर्ष 1960 में राजनांदगांव में मुर्रा फैक्ट्री स्थापित की गई तथा वर्ष 1965 में पंजीयित चावल मिलों की संख्या 52 हो गई।

रायगढ़ जिले में वर्ष 1956 में कारखाना अधिनियम 1948 के अन्तर्गत 22 चावल मिले पंजीयित थी। वर्ष 1964 में इनकी संख्या बढ़कर 29 हो गई तथा वर्ष 1967 में इनकी संख्या घटकर 20 हो गई। इस वर्ष चावल मिलों में कार्य करने वाले कामगारों की संख्या 744 थी। सरगुजा जिले में वर्ष 1956 में मात्र 1 चावल मिल थी। चावल मिल होने के साथ ही साथ यह तेल मिल भी थी, जो अम्बिकापुर में स्थापित थी।

चावल मिल के अन्तर्गत वर्तमान में प्रदेश में 679 इकाइयाँ स्थापित हैं, जिनमें से रायपुर जिले में 196 इकाइयाँ (रायपुर में 53 इकाइयाँ, राजिम में 47 इकाइयाँ, भाटापार में 37 इकाइयाँ, तिल्दा में 18 इकाइयाँ, कुरुद में 10 इकाइयाँ, अभनपुर में 9 इकाइयाँ, आरंग में 9 इकाइयाँ, खरोरा में 7 इकाइयाँ तथा बलोदाबाजार में 6 इकाइयाँ), बिलास पुर जिले में 75 इकाइयाँ (बिलासपुर में 32 इकाइयाँ, बिल्हा में 15 इकाइयाँ, तखतपुर में 12 इकाइयाँ, लोरमी में 8 इकाइयाँ, बाराद्वार तथा मुंगेली में 4-4 इकाइयाँ) धमतरी जिले में 72 इकाइयाँ, महासमुन्द जिले में 58 इकाइयाँ (महासमुन्द में 19 इकाइयाँ, बागबहरा में 16 इकाइयाँ, सराइपाली में 11 इकाइयाँ, बसना में 7 तथा पिथौरा में 5 इकाइयाँ), रायगढ़ जिले में 55 इकाइयाँ (खरसिया में 26 इकाइयाँ, रायगढ़ में 20 इकाइयाँ, बरमकेला तथा सारंगढ़ में 4-4 इकाइयाँ तथा लैलुंगा में 1 इकाई) जांजगीर चांपा जिले में 45 इकाइयाँ (अकलतरा मे 16 इकाइयाँ, नैला में 15 इकाइयाँ, चांपा में 10 तथा सक्ती में 4 इकाइयाँ), राजनांदगांव जिले में 23 इकाइयाँ, बस्तर जिले में 22 इकाइयाँ (जगदलपुर में 17 इकाइयाँ, कोंडागाँव में 5 इकाइयाँ) कांकेर जिले में 10 इकाइयाँ तथा कवर्धा में 3 इकाइयाँ कार्यरत हैं।

आटामिल :-

छत्तीसगढ़ में आटा मिल केवल रायपुर जिले में ही स्थापित थी। वर्ष 1949 में तीन आटा मिलें पंजीयित थी। वर्ष 1964 में जिले में 6 कारखानें थे, जिनमें से एक वर्ष भर बन्द रहा। उस वर्ष चालू कारखानों में प्रतिदिन औसतन 204 कामगारों को रोजगार मिलता था। 1956-57 में कैलाश बेसन तथा चावल मिल्स की स्थापना रायपुर में की गई थी। जिसमें 1,26,387 रुपये का पूँजी विनियोजन किया गया था। यह कारखाना प्रतिदिन 9 कामगारों को रोजगार प्रदान करता था।

दाल मिल :-

प्रदेश में दाल मिलों की संख्या 16 थी जो मुख्यतः रायपुर एवं दुर्ग जिले में केन्द्रित थी। विभिन्न वर्षों में इनकी संख्या में वृद्धि एवं कमी होती रही। रायपुर जिले में 1949 में केवल 1 दाल मिल थी जो 1958 में बढ़कर 20 हो गई तथा वर्ष 1964 में इनकी संख्या घटकर 14 रह गई और उस वर्ष वास्तविक रूप से चालू कारखाने 12 रह गये। इन कारखानों में प्रतिदिन औसतन 110 कामगारों को रोजगार मिलता था। वर्ष 1968 में दाल मिलों की संख्या 13 हो गई जिनमें प्रतिदिन 164 कामगार कार्य करते थे।

दुर्ग जिले में 1951 में एक दाल मिल थी, जो 1961 में 6 हो गई। इन मिलों में 85 कामगारों को रोजगार मिलता था। वर्ष 1965 में दाल मिलों की संख्या 3 हो गई।

प्रदेश में वर्तमान में दाल मिलों की संख्या 212 है। जिनमें रायपुर जिले में 98 इकाइयाँ (भाटापारा में 50 इकाइयाँ, रायपुर में 40 इकाइयाँ, नेवरा में 5 तथा राजिम में 3 इकाइयाँ), धमतरी जिले में 4 इकाइयाँ, बिलासपुर जिले में 40 इकाइयाँ (बिलासपुर में 30 इकाइयाँ, बिल्हा में 4 इकाइयाँ, तखतपुर में 3 तथा मुंगेली में 3 इकाइयाँ), राजनांदगांव जिले में 30 इकाइयाँ, दुर्ग जिले में 36 इकाइयाँ (दुर्ग में 30, बेमेतरा में 6 इकाइयाँ) तथा कवर्धा जिले में 4 दाल मिल कार्यरत हैं।

तेल मिल :-

छत्तीसगढ़ प्रदेश में तेल मिलें मुख्यतः रायपुर, बिलासपुर तथा दुर्ग जिले में स्थित थी, जिनकी संख्या 12 थी। वर्ष 1949 में रायपुर जिले में कारखाना अधिनियम 1948 के अधीन पंजीयित कारखाने के रूप में केवल एक तेल मिल थी जो 1951 में बढ़कर 3 हो गई तथा एक दशक के पश्चात 1960 में तेल मिलों की संख्या 7 हो गई जिनमें से 2 वर्ष के दौरान बन्द रही। वर्ष 1964 में भी तेल मिलों की संख्या 7 ही थी। जिनमें प्रतिदिन औसतन 210 कामगारों को रोजगार मिलता था। वर्ष 1968 में इनकी संख्या बढ़कर 9 हो गई, जिनमें 274 कामगारों को काम मिलता था। इन कारखानों में 15 लाख रुपए की पूँजी लगी हुई थी। वर्ष 1951 में एक बृहत तेल मिल श्री गणेश ऑइल मिल रायपुर में 78000 रुपये के पूँजी विनियोजन से प्रारम्भ की गई। दूसरा कारखाना सेठ ऑयल मिल्स 49.50 लाख रुपये के पूँजी विनियोजन से वर्ष 1967 में स्थापित की गई। महासमुन्द में वर्ष 1968 में के.एन. ऑयल मिल 20.20 लाख रुपयों की पूँजी विनियोजन से प्रारम्भ की गई।

छत्तीसगढ़ के बड़े एवं मध्यम उद्योग क्षेत्रछत्तीसगढ़ के बड़े एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र

बिलासपुर जिले में 1950 में केवल 1 तेल मिल गुरु रामदास ऑयल तथा जनरल मिल्स थी। वर्ष 1950 से 1965 के दौरान पंजीयित कारखानों की सूची में अकेले इसी कारखाने का नाम बना रहा किन्तु 1965 की सूची में इस इकाई को भी बन्द दर्शाया गया। दुर्ग में 1965 में 2 मिलें पंजीकृत थी तथा इनमें 37 कामगार प्रतिदिन कार्य करते थे।

वर्तमान में प्रदेश में तेल मिलों की संख्या (बृहत एवं मध्यम) 18 हैं, जिनमें से रायपुर जिले में 8, महासमुन्द जिले में 3, धमतरी जिले में 2, राजनांदगांव जिले में 2, रायगढ़, दुर्ग तथा बस्तर में 1,1 इकाई स्थापित है।

आरामिल :-

वर्ष 1949 से 1969 के मध्य छत्तीसगढ़ प्रदेश में आरामिल की संख्या 38 थी। ये आरा मिलें मुख्यतः रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग राजनांदगांव, भिलाई, रायगढ़ तथा सरगुजा में स्थापित थी। कारखाना अधिनियम 1948 के अन्तर्गत वर्ष 1949 में रायपुर जिले में 5 आरा मिलें थीं। वर्ष 1951 तक इनकी संख्या बढ़कर 9 हो गई। इन 9 इकाइयों में से डुग्ली स्थित एक शासकीय आरामिल थी जो वन विभाग के अन्तर्गत कार्य करती थी। वर्ष 1960 में आरामिलों की संख्या 18 हो गई। वर्ष 1970 में रायपुर जिले में 28 पंजीयित आरा मिलें थी जिनमें प्रतिदिन 425 कामगार कार्य करते थे। धमतरी तहसील के सांकरा में शासकीय आरा मिल की स्थापना वर्ष 1960 में की गई थी।

बिलासपुर जिले में 1950 तक 2 आरा मिलें थीं तथा 1950 से 1965 तक पंजीयित कारखानों की संख्या में केवल एक आरा मिल की और वृद्धि हुई। इन तीनों आरा मिलों में काम करने वाले कामगारों की औसत संख्या 20 से 40 थी।

राजनांदगांव में वर्ष 1949 में 1 आरा मिल थी जिनकी संख्या वर्ष 1951 में बढ़कर 3 हो गई। वर्ष 1958 में भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना के फलस्वरूप दुर्ग में 14 आरामिलें पंजीयित की गई, जिनमें से एक बन्द हो गई। वर्ष 1958 में राजनांदगांव में आरा मिलों की संख्या 8 थी जो 1963 में बढ़कर 14 हो गई, जिनमें से 11 राजनांदगांव में, 2 भिलाई तथा 1 दुर्ग में थी। वर्ष 1964 में यहाँ 11 पंजीयित इकाइयाँ थीं जिसमें से 9 राजनांदगांव में, 1 भिलाई में तथा 1 दुर्ग में थी। वर्ष 1965 में इनकी संख्या बढ़कर 16 हो गई जिसमें से 12 राजनांदगांव में, 2 भिलाई में तथा 1-1 मिल दुर्ग एवं डोगरगढ़ में थी। इन सभी मिलों में दैनिक रूप से 400 श्रमिक कार्य करते थे।

वर्ष 1956 में दुर्ग में हिंद सॉ मिल 30,000 रुपये के पूँजी विनियोजन से प्रारम्भ की गई थी, जिसमें प्रतिदिन 14 श्रमिक कार्य करते थे। इस मिल की स्थापना का मुख्य कारण भिलाई इस्पात संयंत्र का निर्माण कार्य था। निर्माण कार्य समाप्त होते ही यह मिल भी बन्द हो गई।

वर्ष 1962 में राजनांदगांव में भारत टिम्बर कम्पनी की स्थापना 1 लाख रुपये के पूँजी निवेश के साथ की गई थी। इस मिल में प्रतिदिन 23 श्रमिक कार्य करते थे। इस मिल के उत्पाद प्रमुख रूप से कलकत्ता तथा साथ ही मद्रास, गुजरात तथा मैसूर भी भेजे जाते थे।

वर्ष 1965 में भिलाई में हिंद कंस्ट्रक्शन के. सॉ मिल की स्थापना इस्पात संयंत्र के निर्माण कार्य के लिये की गई थी जिसमें 48 कामगार कार्य करते थे। रायगढ़ में वर्ष 1967 में 1 तथा सरगुजा में 1969 में 3 आरा मिलें थीं।

वर्तमान में प्रदेश में 414 आरा मिलें स्थापित है। जिनमें से रायपुर जिले में 256 इकाइयाँ (रायपुर 232 इकाइयाँ, अभनपुर में 10 इकाइयाँ, आरंग में 6 इकाइयाँ, भाटापारा में 4 इकाइयाँ, बलोदा बाजार में 3 तथा नवापारा राजिम में 1 इकाई), दुर्ग जिले में 40 इकाइयाँ (बालोद में 12 इकाइयाँ, दुर्ग में 10 इकाइयाँ, कुम्हारी में 9 इकाइयाँ, भिलाई में 5 तथा दल्लीराजहरा में 4 इकाइयाँ) जगदलपुर जिले में 40 इकाइयाँ (जगदलपुर में 31 तथा कोंडागांव में 9 इकाइयाँ), राजनांदगांव जिले में 36 इकाइयाँ, बिलासपुर जिले में 14 इकाइयाँ, कोरबा जिले में 12 इकाइयाँ, महासमुन्द जिले में 5 इकाइयाँ (महासमुन्द में 2 इकाइयाँ तथा पिथौरा, बागबहरा एवं सरायपाली में 1, 1 इकाई) धमतरी जिले में 5 इकाइयाँ तथा चांपा तथा कवर्धा जिले में 2, 2 इकाइयाँ स्थापित हैं।

बीड़ी निर्माण इकाइयाँ :-

वनोपज पर आधारित उद्योगों में बीड़ी निर्माण एक मुख्य उद्योग है जो मुख्यतः तेन्दूपत्ता पर आधारित है। छत्तीसगढ़ में कारखाना अधिनियम, 1948 के रूप में व्यापक कारखाना विधान बनने के पूर्व बीड़ी निर्माण इकाइयाँ मध्य प्रान्त तथा बरार अनियमित कारखाना अधिनियम 1937 के अधीन पंजीयित थी। यह अधिनियम कारखाना अधिनियम 1948 की धारा 2 के अन्तर्गत अधिष्ठित किया गया। इस प्रकार प्रदेश में 1950 से 1968 के मध्य 60 बीड़ी निर्माण इकाइयाँ कार्यरत रहीं जिनमें रायपुर जिले में वर्ष 1950 में 12 बीड़ी निर्माण इकाइयाँ थी जो वर्ष 1962 में बढ़कर 53 हो गई जिनमें से 12 कारखाने उस वर्ष बन्द रहे। वर्ष 1964 तक केवल 32 पंजीयित कारखाने रह गए इनमें से भी 11 कारखाने कार्य नहीं कर रहे थे। वर्ष 1968 में जिले में 17 पंजीयित बीड़ी कारखाने थे, जिनमें प्रतिदिन औसतन 788 कामगार कार्य करते थे।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में बड़े एवं मध्यम उद्योगों का विकासछत्तीसगढ़ क्षेत्र में बड़े एवं मध्यम उद्योगों का विकास

बिलासपुर जिले में वर्ष 1950 में पंजीयित बीड़ी कारखाने की संख्या 15 थी जो 1965 में घटकर 8 हो गई इनमें से एक कारखाना वर्ष भर बन्द रहा। इन 7 कारखानों में से तीन कारखाने बिलासपुर खास में तथा शेष चार में से प्रत्येक चांपा, बारादुआर, रतनपुर तथा सक्ती में स्थित थे।

दुर्ग में वर्ष 1951 में कारखाना अधिनियम 1948 के अधीन 20 बीड़ी निर्माण इकाइयाँ थी। आरा मिलों के समान ही ये इकाइयाँ भी राजनांदगांव में ही केन्द्रित थी। जिनमें से 4 इकाइयाँ दुर्ग में थी। वर्ष 1958 में राजनांदगांव में इनकी संख्या बढ़कर 32 हो गई तथा 1960 में इनकी संख्या घटकर 29 हो गई जिनमें से 7 इकाइयाँ इस वर्ष बन्द रही वर्ष 1965 में इनकी संख्या घटकर सिर्फ 13 रह गई जिनमें से 3 इकाइयाँ उस वर्ष बन्द रही। इन इकाइयों की संख्या में कमी का मुख्य कारण भिलाई इस्पात संयंत्र का प्रारम्भ होना था जहाँ मजदूरी की दर इन बीड़ी निर्माण इकाइयों की अपेक्षा अधिक थी। इन बीड़ी निर्माण इकाइयों में 700 कामगार प्रतिदिन कार्य करते थे। रायगढ़ जिले में वर्ष 1956 में 22 बीड़ी निर्माण इकाइयाँ पंजीयित थी। वर्ष 1967 तक इनकी संख्या में ना कोई कमी हुई और ना ही वृद्धि। इन इकाइयों में 889 कामगार कार्य करते थे। हरमन दास जयदयाल बीड़ी फैक्ट्री रायगढ़ की एक वृहत बीड़ी निर्माण इकाई थी जिसमें 100 कामगार प्रतिदिन कार्य करते थे। सरगुजा जिले में बीड़ी निर्माण इकाई अम्बिकापुर में स्थापित थी।

वर्तमान में प्रदेश में बीड़ी निर्माण इकाइयों की संख्या 74 है, जिनमें से रायपुर जिले में 16 इकाइयाँ (रायपुर में 3, भाटापारा में 10, गरियाबंद में 1 तथा राजिम में 2 इकाइयाँ) चांपा जिले में 12, धमतरी जिले में 12, राजनांदगांव 10, कांकेर जिले में 10, महासमुन्द जिले के अन्तर्गत मुख्यतः सरायपाली में 2, दुर्ग में 6 तथा रायगढ़ में 6 इकाइयाँ स्थापित हैं।

वृहद एवं मध्यम उद्योगों का विकास :-

प्रदेश में वृहद एवं मध्यम उद्योगों का विकास मुख्यतः भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना के पश्चात हुआ। इस संयंत्र की स्थापना से पूर्व प्रदेश में वृहद एवं मध्यम उद्योग नगण्य थे। प्रदेश में स्थापित 16 5 वृहद एवं मध्यम उद्योगों में से रायपुर में 84, दुर्ग में 29, राजनांदगांव में 12, बिलासपुर में 11, रायगढ़ में 9, कोरबा में 6, जांजगीर चांपा में 4, बस्तर में 4, महासमुन्द में 4 तथा धमतरी में 2 वृहद एवं मध्यम इकाइयाँ स्थापित है।

प्रदेश में वर्षवार स्थापित वृहद एवं मध्यम उद्योगों की संख्या निम्नांकित है :-

 

तालिका 4.1

छत्तीसगढ़ प्रदेश : वृहद एवं मध्यम उद्योगों का विकास

वर्ष

स्थापित इकाइयों की संख्या

1960 से पूर्व

4

1960-70

20

1970-80

44

1980-90

96

1990-00

165

 

वर्ष 1960 से पूर्व उद्योगों की संख्या :- स्पष्ट है कि वर्ष 1960 से पूर्व प्रदेश में वृहद एवं मध्यम उद्योगों की संख्या 4 थी। इन इकाइयों में भिलाई में स्थापित स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया तथा सिम्पलेक्स इंजीनियरिंग एंड फाउन्ड्री वर्क्स तथा रायगढ़ में स्थापित मोहन जूट मिल एवं राजनांदगांव में बंगाल नागपुर काटन मिल्स प्रमुख इकाइयाँ थी।

वर्ष 1960-70 के मध्य उद्योगों की संख्या :- वर्ष 1960-70 के मध्य प्रदेश में 16 नई इकाइयों की स्थापना के साथ ही वृहद एवं मध्यम इकाइयों की संख्या बढ़कर 20 हो गई इस वर्ष के दौरान कोरबा में 1, महासमुंद में 1, रायपुर में 6, दुर्ग में 8 इकाइयाँ स्थापित हुई।

वर्ष 1970-80 के मध्य उद्योगों की संख्या :- वर्ष 1970-80 के मध्य 24 नई इकाइयाँ स्थापित हुई, इनमें से कोरबा में 3, बस्तर में 1, महासमुन्द में 1, बिलासपुर में 2, रायपुर में 10, दुर्ग में 6 तथा जांजगीर चांपा में 1 इकाई स्थापित हुई। इस प्रकार वर्ष 1970-80 में प्रदेश में स्थापित कुल वृहद एवं मध्यम उद्योगों की संख्या 40 हो गई।

वर्ष 1980-90 के मध्य उद्योगों की संख्या :- वर्ष 1980-90 के मध्य, प्रदेश में 52 नई इकाइयाँ स्थापित हुई, इनमें रायगढ़ में 1, राजनांदगांव में 7, कोरबा में 1, बस्तर में 3, धमतरी में 2, बिलासपुर में 5, रायपुर में 25, दुर्ग में 6 तथा जांजगीर चांपा में 2 इकाइयों की स्थापना हुई। अतः वर्ष 1980-90 के मध्य कुल स्थापित वृहद एवं मध्यम उद्योगों की संख्या 96 हो गई।

वर्ष 1990-2000 के मध्य उद्योगों की संख्या :- वर्ष 1990-2000 के दौरान प्रदेश में 69 नई इकाइयाँ स्थापित हुई, इनमें रायगढ़ में 7, राजनांदगांव में 4, कोरबा में 1, महासमुन्द में 2, बिलासपुर में 4, रायपुर में 43, दुर्ग में 7 तथा जांजगीर चांपा में 1 इकाई स्थापित हुई। इस प्रकार वर्तमान में प्रदेश में स्थापित वृहद एवं मध्यम उद्योगों की संख्या 165 है।

पंचवर्षीय योजनाएँ एवं औद्योगिक विकास :-

भारत वर्ष में सुव्यवस्थित उद्योगों का इतिहास 1854 से शुरू हुआ था जबकि मुख्यतः भारतीय पूँजी तथा उद्यम से बम्बई में सूती मिल उद्योग का वास्तविक आरम्भ हुआ। इसी समय के आस-पास कोयला खनन उद्योग ने प्रगति करनी प्रारम्भ की। प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व केवल ये ही बड़े उद्योग थे जिनका देश में पर्याप्त विकास हुआ था। प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तथा उसके बाद उद्योगों को संरक्षण देने की नीति अपनाई गई जिससे औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिला अनेक उद्योगों का तेजी से विस्तार हुआ तथा अनेक नये उद्योगों की स्थापना हुई जैसे इस्पात, चीनी, सीमेंट, काँच, औद्योगिक रासायनिक पदार्थ तथा इंजीनियरी वस्तुएँ इत्यादि। परन्तु उनका उत्पादन ना तो इतना पर्याप्त ही था कि उससे घरेलू माँग जो कि उस समय कम ही थी पूरी हो पाती और ना ही उसमें विविधता ही थी।5 (भारत वार्षिक सन्दर्भग्रंथ 1977-78, 389)

छत्तीसगढ़ प्रदेश में औद्योगिक विकास का प्रारम्भ पंचवर्षीय योजनाओं के साथ ही हुआ जब सन 1957 में तत्कालीन सोवियत रूस के सहयोग से भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना हुई। यह कहा जा सकता है कि भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना प्रदेश में औद्योगीकरण का प्रथम चरण थी। इसके साथ ही क्षेत्रीय औद्योगीकरण के इतिहास के नवीन युग का सूत्रपात हुआ। इसके पूर्व प्रदेश में खनिज आधारित उद्योगों की मात्रा नगण्य थी।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में बड़े एवं मध्यम उद्योगों का जिलावार विकास

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में बड़े एवं मध्यम उद्योगों का जिलावार विकास

 

 

औद्योगिक विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि बुनियादी एवं पूँजीगत वस्तुओं के उद्योगों की स्थापना के लिये सार्वजनिक क्षेत्र को महत्त्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है। सार्वजनिक क्षेत्र ने इस्पात, अलौह धातुओं, पेट्रोलियम, कोयला, ऊर्जा, उर्वरक तथा इंजीनियरी जैसे विभिन्न उद्योगों के विकास में पहल की है। सार्वजनिक क्षेत्र में भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना से प्रदेश की आर्थिक एवं औद्योगिक गतिविधियों को बल मिला, जिसके फलस्वरूप अनेक नवीन उद्योगों की स्थापना हुई जिनमें से अधिकांश इस्पात संयंत्र के सहायक उद्योग थे।

प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) :-

प्रथम योजना के दो प्रमुख उद्देश्य थे - द्वितीय विश्व युद्ध तथा देश के विभाजन से अर्थव्यवस्था में आए असन्तुलन को दूर करना तथा इसके साथ-साथ अर्थव्यवस्था के चहुँमुखी विकास की प्रक्रिया शुरू करना। यह लक्ष्य इस उद्देश्य से रखा गया ताकि राष्ट्रीय आय में वृद्धि हो सके तथा देशवासियों के जीवन स्तर में उत्तरोत्तर सुधार सुनिश्चित किया जा सके। वर्ष 1951 में बड़ी मात्रा में खाद्यान्न के आयात तथा अर्थ व्यवस्था पर मुद्रास्फीति के दबाव को ध्यान में रखते हुए योजना में कृषि सिंचाई तथा बिजली परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) :-

द्वितीय योजना में विकास के एक ऐसे ढाँचे को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया जिससे देश में समाजवादी स्वरूप के समाज का निर्माण हो सके। योजना में इस बात पर जोर दिया गया कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के उपेक्षित वर्ग को अधिक मिले तथा आय, सम्पत्ति एवं आर्थिक शक्ति के केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति में क्रमशः कमी हो। इस योजना के मुख्य उद्देश्य थे -

1. राष्ट्रीय आय में 25 प्रतिशत की वृद्धि 2. बुनियादी तथा भारी उद्योगों के विकास में विशेष जोर देते हुए तीव्र औद्योगीकरण 3. आय तथा सम्पत्ति में असमानताओं को कम करना तथा आर्थिक शक्ति का समान वितरण 4. रोजगार सुविधाओं का विस्तार 5. पूँजी निवेश की दर में वृद्धि। इस योजना में औद्योगीकरण पर विशेष जोर दिया गया जिसके अन्तर्गत लोहा इस्पात, भारी रसायन, नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का उत्पादन बढ़ाने तथा भारी इंजीनियरी और मशीन निर्माण उद्योग के विकास को प्रोत्साहन मिला। इन योजना काल में ही छत्तीसगढ़ प्रदेश में भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना हुई।

तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66) :-

तृतीय योजना का उद्देश्य आत्म निर्भर विकास की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति करना तथा राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को स्वयं स्फूर्ति अवस्था तक पहुँचाना था। इस योजना में कृषि को प्राथमिकता देते हुए आधारभूत उद्योगों के विकास के कार्यक्रम निर्धारित किये गये। स्वयं स्फूर्ति अवस्था तभी प्राप्त हो सकती है जब उद्योग एवं कृषि का सन्तुलित विकास किया जाये। आय एवं रोजगार की वृद्धि हेतु औद्योगीकरण के कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाये। (शर्मा एवं वार्ष्णेय 1990, 885) इस योजना के तात्कालिक उद्देश्य थे - 1. राष्ट्रीय आय में पाँच प्रतिशत की वृद्धि करना और उद्योग एवं निर्यात की आवश्यकता पूरी करने के लिये कृषि उत्पादन बढ़ाना, 3. इस्पात, रसायन, ईंधन तथा बिजली जैसे आधारभूत उद्योगों का विस्तार तथा लगभग दस वर्ष की अवधि में देश के अपने संसाधनों से औद्योगीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये मशीन निर्माण क्षमता विकसित करना, 4. मानव संसाधनों का पूरा-पूरा उपयोग करना तथा रोजगार के अवसरों में पर्याप्त वृद्धि सुनिश्चित करना 5. आय की समानता का क्रमशः विकास, आय और सम्पत्ति की असमानता को कम करना तथा आर्थिक शक्ति का समान वितरण।

वार्षिक योजनाएँ :-

वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध, लगातार दो वर्षों तक भीषण सूखे, मुद्रा का अवमूल्यन, मूल्यों में असमान वृद्धि तथा संसाधनों के हृास जैसे कारणों से चौथी योजना को अन्तिम रूप देने में विलम्ब हुआ। अतः इनके साथ पर 1966 से 1969 की अवधि में चौथी योजना के प्रारूप के अन्तर्गत तीन वार्षिक योजनाएँ बनाई गई।

चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-1974) :-

इस योजना का लक्ष्य विकास की गति को तेज करना, कृषि उत्पादन में उतार-चढ़ाव को कम करना तथा विदेशी सहायता की अनिश्चितता के प्रभाव को समाप्त करना था। इसमें समानता तथा सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के कार्यक्रमों के माध्यम से जीवन स्तर को ऊँचा उठाने की कोशिश की गई। दुर्बल एवं साधनहीन वर्ग के लोगों की दशा सुधारने, विशेष रूप से उनकी शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था करने पर विशेष जोर दिया गया था।

पाँचवी पंचवर्षीय योजना (1974-1979) :-

इस योजना का प्रमुख उद्देश्य आत्मनिर्भरता प्राप्त करना तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले के उपभोग स्तर में सुधार के उपाय करना था। इस योजना में मुद्रास्फीति पर नियन्त्रण और आर्थिक स्थिति में स्थायित्व लाने को प्राथमिकता दी गई। पाँचवी योजनावधि की चार वार्षिक योजनाओं को इस दौरान पूरा किया गया। बाद में यह निर्णय लिया गया कि पाँचवी योजनाओं को 1978-79 की वार्षिक योजना के साथ समाप्त कर दिया जाये तथा नई प्राथमिकताओं और नये कार्यक्रमों को लेकर नई योजनाओं का कार्य शुरू किया जाये।

छठी पंचवर्षीय योजना (1980-1985) :-

गरीबी हटाना छठी योजना का प्रमुख लक्ष्य था। छठी योजना की कार्यनीति बुनियादी तौर पर यह थी कि कृषि और उद्योग दोनों के आधारभूत ढाँचे को एक साथ मजबूत किया जाये ताकि पूँजी निवेश, उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में विकास तेज करने की स्थितियाँ निर्मित हो सके।

सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-1990) :-

सातवीं योजना में आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और सामाजिक न्याय जैसे आयोजना के मूलभूत सिद्धान्तों का पालन करते हुए खाद्यान्न उत्पादन, रोजगार तथा उत्पादकता बढ़ाने की नीतियों और कार्यक्रमों पर अधिक जोर दिया गया। बेरोजगारी तथा गरीबी को कम करने के लिये अन्य चालू कार्यक्रमों के अलावा “जवाहर रोजगार योजना” जैसे विशेष कार्यक्रम प्रारम्भ किये गये। इस दिशा में लघु उद्योगों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के महत्त्व को भी स्वीकार किया गया। उत्पादकता बढ़ाने और भारतीय अर्थव्यवस्था की अन्तरराष्ट्रीय स्थिति को सुदृढ़ करने के लिये अनेक योजनाएँ चलाई गई। नई सुविधाएँ जुटाने की बजाय विद्यमान सुविधाओं को सुधारने तथा उनके भरपूर उपयोग पर बल दिया गया।

आठवीं पंचवर्षीय योजना का दृष्टिकोण (1992-1997) :-

“आठवीं योजना का लक्ष्य और वृहत आयाम” शीर्षक से आठवीं पंचवर्षीय योजना का नया दृष्टिकोण पत्र प्रस्तुत किया गया। बढ़ते हुए वित्तीय घाटे और गैर योजना खर्चों में वृद्धि, घाटे में चलने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और चालू खातों के घाटे से पीड़ित सरकार ने इन समस्याओं से निपटने के लिये अनेक नीतिगत कदम उठाये गये। यह निर्णय लिया गया कि अब योजना की प्रकृति निर्देशात्मक होगी और उद्योग तथा व्यापार को सरकारी/नौकरशाही नियन्त्रण से मुक्त रखा जायेगा। इसमें विकास की प्रक्रिया में आम लोगों की पहल और उसकी भागीदारी को मुख्य तत्व माना गया है। इस पत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को भी समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया गया, जो वर्तमान में सार्वजनिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। इस योजना में जिन लक्ष्यों को प्रमुखता दी गई उनमें रोजगार के पर्याप्त अवसर प्रदान करना, जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण, निरक्षरता उन्मूलन, स्वच्छ पेयजल और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था, खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता, निर्यात और व्यवस्था की मजबूती के लिये कृषि उत्पादों का अतिरिक्त उत्पादन शामिल है।

सरकार ने छठी योजना के अन्त तथा सातवीं योजना के शुरू के वर्षों में औद्योगिक विकास के क्षेत्र में बाधाओं को दूर करने तथा उद्योगों के विकास के लिये अधिक उदार तथा उपयुक्त वातावरण बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाये। उद्योगों की क्षमता बढ़ाने, टेक्नोलॉजी के आयात आदि से सम्बन्धित औद्योगिक प्रक्रियाओं को गतिशील बनाने के लिये कई उपाय किये गये जिसका उद्देश्य भारतीय उद्योगों में प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ाना था। इन उपायों में एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार कानून तथा विदेशी मुद्र विनियमन अधिनियम के अन्तर्गत आने वाले उद्योगों को लाइसेंस मुक्त करने के अलावा ऊर्जा के उत्पादन और उपयोग तथा आम उपभोग की वस्तुएँ बनाने वाले उच्च तकनीकी के उद्योगों के उत्पादन में विविधता लाना था। मौजूदा इकाइयों के विस्तार की प्रक्रिया को भी उदार बना दिया गया और अब उद्योगों के आधुनिकीकरण/नवीनीकरण/परिवर्तन और उनके द्वारा निर्यात के लिये किये जाने वाले उत्पादन को औद्योगिक लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया है।6 (भारत वार्षिक सन्दर्भ ग्रन्थ, 1992, 349-362)।

नवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) :-

नवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि 1997 से 2002 तक निर्धारित की गई है। यह योजना अप्रैल 1997 से ही प्रारम्भ हो चुकी थी लेकिन राजनीतिक अस्थिरता की वजह से इसके मसौदे को मंजूरी दी। आर्थिक मन्दी के कारण आर्थिक विकास दर के लक्ष्य को 0.5 प्रतिशत कम करके 6.5 प्रतिशत निर्धारित किया गया है। पहले यह 7 प्रतिशत था। देश में व्याप्त मन्दी के मद्देनजर कृषि व सम्बद्ध क्षेत्रों, खनन, बिजली, निर्माण, उत्पादन एवं व्यापार क्षेत्र के विकास के लक्ष्य की दरों को भी घटा दिया गया है। इस योजना में प्रधानमंत्री की विशेष कार्य योजना के मद में 22300 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान है। इस राशि को सामाजिक व बुनियादी ढाँचे और सूचना तकनीक के विकास पर खर्च किया जायेगा। नवीं योजना में पाँच क्षेत्रों, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, तथा पेयजल एवं सफाई पर विशेष जोर देते हुए, बिजली जैसे ढाँचागत क्षेत्रों में भी विशेष बल देने की बात है।

द्वितीय पंचवर्षीय योजना काल (1956-61) के मध्य, प्रदेश में मात्र 2 बृहद एवं मध्यम स्तरीय इकाइयाँ मुख्यतः दुर्ग जिले में स्थापित थी। तीसरी पंचवर्षीय योजना काल (1961-66) के मध्य, प्रदेश में 8 बृहद एवं मध्यम स्तरीय इकाइयाँ स्थापित हुई, जिनमें से दुर्ग में 5 तथा रायपुर, कोरबा एवं बस्तर में 1, 1 इकाई स्थापित हुई। वार्षिक योजना काल (1966-69) के मध्य 4 इकाइयाँ जिनमें से 3 रायपुर में तथा 1 दुर्ग में स्थापित हुई। चौथी पंचवर्षीय योजना काल (1969-74) के दौरान प्रदेश में 8 इकाई स्थापित हुई जिनमें से दुर्ग में 5 तथा रायपुर में 3 इकाई स्थापित हुई।

पाँचवी योजना काल (1974-79) में प्रदेश में स्थापित होने वाली वृहद एवं मध्यम स्तरीय इकाइयों की संख्या 12वीं, जिनमें से 7 रायपुर में, कोरबा में 2 तथा दुर्ग बिलासपुर एवं जांजगीर चांपा में 1-1 इकाई स्थापित हुई। वर्ष 1980-85 अर्थात छठी योजना काल के दौरान प्रदेश में कुल 15 इकाई स्थापित हुई, जिनमें से दुर्ग में 5, कोरबा, बिलासपुर, बस्तर तथा जांजगीर चांपा में 2-2 इकाइयाँ तथा रायपुर में 1 तथा राजनांदगांव में 1 इकाई स्थापित हुई। सातवीं योजना काल में (1985-90) प्रदेश में 44 इकाइयाँ स्थापित हुई, जिनमें से रायपुर में 25, राजनांदगांव में 6, बिलासपुर में 5, दुर्ग में 3 तथा धमतरी में 2 एवं बस्तर में 2 इकाई स्थापित हुई। अन्य योजना काल की अपेक्षा सर्वाधिक नई इकाइयों (57) की स्थापना आठवीं योजना काल (92-97) के दौरान हुई, जिनमें रायपुर में 38, दुर्ग में 7, रायगढ़ में 6, राजनांदगांव में 3, बिलासपुर, जांजगीर चांपा तथा कोरबा में 1-1 इकाइयों की स्थापना हुई। नवीं पंचवर्षीय योजना का (1997-2000) में मात्र 4 इकाइयाँ, जिनमें से रायपुर में 3 तथा बिलासपुर में 1 इकाई स्थापित हुई।

छत्तीसगढ़ प्रदेश में पहला सीमेंट कारखाना दुर्ग जिले में जामुल नामक स्थान पर जनवरी 1965 में तृतीय पंचवर्षीय योजनाकाल में स्थापित किया गया, जिसमें कुल पूँजी निवेश की मात्रा 550.93 लाख रुपये थी। चौथी पंचवर्षीय योजना काल में रायपुर जिले में 19 सितम्बर 1970 को मांढर में सीमेंट कारपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र में सीमेंट कारखाने की स्थापना की गई। चूँकि रायपुर चूना पत्थर प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है। अतः इस क्षेत्र में पाँचवीं योजना काल से आठवीं योजना काल अर्थात 1975 से 1995 के मध्य अनेक सीमेंट तथा लघु इस्पात संयंत्र निजी क्षेत्र में स्थापित हुए जिसमें सेंचुरी सीमेंट, मोदी सीमेंट, टाटा आयरन एंड स्टील कम्पनी, लार्सन एंड ट्यूब्रो सीमेंट लिमिटेड, ग्रासीम सीमेन्ट्स के नाम विशेष उल्लेखनीय है। बिलासपुर में अकलतरा में सीमेंट कारपोरेशन ऑफ इण्डिया तथा रेमण्ड सीमेंट की स्थापना क्रमशः 1-4-81 तथा 26-2-92 अर्थात छठी पंचवर्षीय योजना काल में स्थापित हुए। इसके अतिरिक्त प्रदेश के बस्तर जिले में भी सीमेंट कारखानों की स्थापना जगदलपुर में हुई जिनमें हीरा सीमेंट, रूद्र सीमेंट के नाम उल्लेखनीय है। सीमेंट कारखानों के अतिरिक्त प्रदेश में अनेक इस्पात संयंत्र एवं इंजीनियरी उद्योगों की स्थापना हुई जिनमें रायपुर जिले में मोनेट इस्पात लिमिटेड, भिलाई इंजीनियरिंग कारपोरेशन, रायपुर एलायज एंड स्टील, दुर्ग जिले में सिम्पलेक्स इंजीनियरिंग एंड फाउन्ड्री वर्क्स, फैरो स्क्रैपनिगम, बिलासपुर जिले में प्रकाश इण्डस्ट्रीज तथा नोवा आयरन एंड स्टील लिमिटेड एवं रायगढ़ जिले में जिन्दल स्ट्रीप्स लिमिटेड के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

तृतीय योजना काल में ही प्रदेश में रासायनिक खाद का पहला कारखाना धरमसी मोरार जी केमिकल कम्पनी लिमिटेड सन 1961 में कुम्हारी में स्थापित किया गया। इस कारखाने की पूँजी निवेश की मात्रा 53,68000 रुपये थी जो 1965 में बढ़कर 1,28,91000 रुपये हो गई।

प्रदेश के औद्योगीकरण की दिशा में दूसरा बड़ा कदम कोरबा में एल्यूमिनियम संयंत्र की स्थापना था। चौथी पंचवर्षीय योजनाकाल में सन 1973 में क्षेत्र के बाक्साइट भण्डारों का लाभ उठाकर कोरबा में देश के विशालतम एल्यूमिना संयंत्र की स्थापना की गई तथा कोरबा में ही विस्फोटक पदार्थों का कारखाना 1978 में प्रारम्भ किया गया। इसके अतिरिक्त प्रदेश में बिलासपुर में साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड तथा बस्तर में बैलाडीला की लौह अयस्क की परियोजनाएँ भी कार्यरत है जो प्रदेश के उद्योगों के लिये महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।

स्पष्ट है कि प्रदेश में लोहे तथा सीमेंट के कारखानों की एक वृहद शृंखला है। इसके अतिरिक्त कृषि तथा वनोपज पर आधारित अनेक इकाइयाँ स्थापित हुई है जिनमें दुर्ग में बी.ई.सी. फूड्स, राजनांदगांव में राजाराम मेज प्रोडक्ट, विद्यासागर साल्वेंट, बिलासपुर में कनोई पेपर इण्डस्ट्रीज लिमेटेड, मध्य भारत पेपर मिल, रायपुर में हनुमान एग्रोम इण्डस्ट्रीज इत्यादि उल्लेखनीय है।

 

 

 

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