उपाय तो है बशर्ते सत्ता इस पर अमल करे

Submitted by editorial on Sat, 12/08/2018 - 17:03
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 08 दिसम्बर, 2018

कृषिकृषि किसानों के लिये बेसिक इनकम स्कीम तैयार करके क्रियान्वित की जाती है, तो सरकार के संसाधनों पर कोई दबाव नहीं पड़ने वाला। इससे तो किसानों में देशव्यापी असन्तोष कम ही होगा

राजग सरकार द्वारा तमाम दावों के बावजूद भारतीय कृषि की बीते चार वर्षों के दौरान जिस तरह से उपेक्षा की गई है, उससे भारतीय किसान का समय इतना बुरा गुजर रहा है कि बयाँ नहीं किया जा सकता। इन हालात में किसानों द्वारा आत्महत्या करने के मामले बढ़े हैं और देश के अनेक हिस्सों में खेती-किसानी पर अप्रत्याशित संकट के बादल घिर आए हैं। जरूरी हो गया है कि ग्रामीण क्षेत्र खासकर किसानों पर नये सिरे से तवज्जो दी जाए। 2011 के आँकड़ों के मुताबिक, भारत का 54.6 प्रतिशत श्रम बल कृषि क्षेत्र में नियोजित है। लेकिन इस क्षेत्र का जीडीपी में योगदान 17 प्रतिशत से भी कम है। इस असन्तुलन को दुरुस्त करने में एक के बाद एक सरकार नाकाम रही है।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज द्वारा तैयार जो रिपोर्ट मार्च, 2018 में जारी की गई उसके मुताबिक, 76 प्रतिशत किसान खेती छोड़कर कोई अन्य काम-धन्धा करने के इच्छुक हैं। यह रिपोर्ट 18 राज्यों में पाँच हजार से ज्यादा खेतिहर परिवारों को लेकर किये गए सर्वे पर आधारित है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी योजनाओं और सब्सिडी से एक से चार एकड़ कृषि भूमि वाले मात्र 10 प्रतिशत गरीब और छोटे किसान ही लाभान्वित हुए हैं। जिन लोगों की राय जानी गई उनमें से 70 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा खेती करने के तरीकों के बाबत कोई जानकारी या सलाह मुहैया नहीं कराई जाती। सर्वे से पता चलता है कि 62 प्रतिशत किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के बारे में नहीं जानते। सत्तर प्रतिशत किसानों ने प्रत्यक्ष नकद अन्तरण (डायरेक्ट कैश ट्रांसफर) योजना के बारे में सुना तक नहीं है।

किसान को तत्काल मिले सहायता

भारतीय किसान को तत्काल सहायता दिए जाने की जरूरत है। इस काम में विलम्ब हुआ तो निश्चित ही किसान की दिक्कतें और असन्तोष बढ़ जाएगा। मेरा सुझाव है : किसान को प्रशिक्षित अधिकारियों द्वारा प्रत्येक फसल के लिये उनके द्वार पर ही जरूरी जानकारियाँ मुहैया कराई जानी चाहिए। कौन-सी पैदावार लें, क्या तकनीक इस्तेमाल करें, बाजार में दाम कितने मिलेंगे, मृदा में पोषक तत्वों का परीक्षण, सिंचाई जैसे मुद्दों पर किसानों को चाक-चौबन्द किया जाना चाहिए। आज तो स्थिति यह है कि कृषि विस्तार सेवाएँ करीब-करीब न के बराबर हैं।

कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबन्ध को तत्काल हटाया जाना चाहिए क्योंकि ऐसी प्रतिबन्धात्मक नीतियों से घरेलू बाजार में दामों में गिरावट का रुझान बन जाता है जिससे किसान हित प्रभावित होते हैं। किसानों की वैश्विक बाजारों तक पहुँच होनी चाहिए क्योंकि इससे उन्हें अपनी आय बढ़ाने में मदद मिलेगी। व्यापार प्रतिबन्ध लगाए जाने जरूरी हो जाएँ तो ही लगाए जाने चाहिए। जहाँ तक घरेलू व्यापार की बात है, तो कृषि उपज को लाने-ले जाने पर अन्तर-जिला और अन्तर-राज्य रोक तुरन्त हटाई जानी चाहिए। प्रत्येक किसान परिवार के पास किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) होना जरूरी है। नाबार्ड के मुताबिक, 31 मार्च, 2015 को लॉन्च होने के बाद से 14.64 करोड़ केसीसी जारी किए जा चुके हैं, जिनमें इस्तेमालशुदा केसीसी की संख्या 7.41 करोड़ है। देश में 13.83 खेती में इस्तेमालशुदा रकबे (कृषि सर्वेक्षण 2010-11) के बरक्स कह सकते हैं कि बड़ी संख्या अभी भी ऐसे किसानों की है, जो केसीसी योजना की परिधि में नहीं लाए जा सके हैं।

ग्रामीण विकास की स्थायी समिति के मुताबिक, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के वॉटरशेड डेवलपमेंट हिस्से के तहत केवल 10 प्रतिशत परियोजनाएँ ही अभी तक कार्यान्वित कराई जा सकी हैं। वर्षा जल को सिंचाई परियोजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि अभी भी इस मामले में सम्भावनाओं का पूरा दोहन नहीं किया जा सका है। मैं इसका भी हामी हूँ कि बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के बजाय ट्यूबवेल और चेक डैम (कटाव-रोधी बाँध) जैसी लघु, छोटी और मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ कार्यान्वित की जानी चाहिए। ऐसी परियोजनाओं का समूचा वित्त-पोषण केन्द्र सरकार को करना चाहिए।

प्रत्येक योजना के लिये ‘पानी पंचायत’ गठित की जानी चाहिए जो सिंचाई परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिये विशेष पंजीकृत संस्था के रूप में कार्य करें। पंचायत को जल-चैनलों के रख-रखाव तथा लाभग्राहियों से उपयोग शुल्क संग्रहित करने की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। इससे स्व-पोषित जल प्रबन्धन सम्बन्धी तौर-तरीकों का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह पंचायत-इतर माध्यम का भी काम कर सकेगी। उदाहरण के लिये ऐसे मामलों में जहाँ किसी सिंचाई परियोजना के तहत एक से ज्यादा लाभग्राही पंचायतें हों। प्रत्येक छोटे और सीमान्त किसान और प्रत्येक कृषि मजदूर, जब वह साठ साल की आयु पूरी कर लें, को मासिक पाँच हजार रुपए की पेंशन दी जानी चाहिए।

उर्वरकों पर सब्सिडी

किसानों को डायरेक्ट ट्रांसफर स्कीम के तहत उर्वरकों पर सब्सिडी दी जानी चाहिए। राज्य सरकारों द्वारा सभी किसानों को पृथक बिजली लाइनों के जरिए बिजली मुहैया कराई जानी चाहिए ताकि उनकी आदान लागतें कम की जा सकें। साथ ही, खेतों को नियमित बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। मुद्रा योजना के तहत उद्यमियों की पृथक श्रेणी बनाई जानी चाहिए जो कृषि इकाइयों के लिये प्रसंस्करण एवं भंडारण संयंत्र स्थापित करें।

भंडारण और प्रसंस्करण के लिये लघु एवं मध्यम उद्यमियों को 3.5 से 6 प्रतिशत तक की ब्याज दरों पर ऋण मुहैया कराने से कृषि क्षेत्र में ढाँचागत विकास में खासी मदद मिल सकती है। मेरी सबसे महत्त्वपूर्ण सिफारिश है कि भारतीय किसान को बेसिक इनकम स्कीम के तहत लाया जाना चाहिए। इस योजना की प्रमुख विशेषताएँ होंगी : प्रत्येक फसली वर्ष में सभी छोटे और सीमान्त किसानों तथा बटाईदार किसानों को प्रति एकड़ 6000 रुपए की आमदनी होनी ही चाहिए। प्रत्येक खेतिहर परिवार के लिये यह सालाना 12,000 रुपए होगी। जिन किसानों के पास पाँच एकड़ से ज्यादा का सिंचित रकबा है और जिनके पास अतिरिक्त उपज बचती है और जो न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था से लाभान्वित होते हैं, उन्हें मासिक छह हजार की निश्चित आय की योजना के तहत भले ही नहीं लाया जाए। असिंचित कृषि रकबे के लिये यह सीमा दस एकड़ तक हो सकती है।

इस योजना का कुल वित्तीय भार 1.84 लाख करोड़ रुपए हो सकता है, जिसे केन्द्र और राज्यों के बीच 70:30 के अनुपात में वितरित किया जा सकता है। इस प्रकार केन्द्र पर वित्तीय भार 1.29 लाख करोड़ रुपए रहेगा जो देश की जीडीपी का एक प्रतिशत से भी कम है। 2018-19 में भारत सरकार का कुल बजट परिव्यय 24.42 लाख करोड़ है। इसलिये सरकार के लिये उपलब्ध संसाधनों से ही इस मद के लिये धन की व्यवस्था मुश्किल नहीं होगी बशर्ते वह बेहतर तरीके से परिव्यय का प्रबन्धन करे। लेकिन इसके बावजूद यदि इस मद पर व्यय से वित्तीय घाटा बढ़ता है, तो भी यह कदम उठाए जाने योग्य ही कहा जाएगा क्योंकि इससे किसानों के हालात खुशनुमा होंगे और उनकी उत्पादकता में वृद्धि करने वाले साबित होंगे। मैं यह सिफारिश भी करता हूँ कि समूचे भारत के किसानों के एक साथ दो लाख रुपए तक के कर्ज माफ किये जाने चाहिए। (इंडियन एक्सप्रेस से साभार)

(लेखक पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री हैं।)


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