डेंगू बुखार के लक्षण हो तो समझें एडीज मच्छर है आस-पास

Submitted by Hindi on Mon, 08/21/2017 - 16:49
Source
विज्ञान गंगा, 2015

‘विश्व मच्छर दिवस’ पर विशेष - Special on 'World Mosquito Day'


.कोने-कोने में पाये जाने वाले मच्छर न केवल जीवन में खलल डालते हैं बल्कि कई बार गम्भीर बीमारियों की चपेट में भी ले लेते हैं। इनमें से कुछ ऐसे मच्छर भी हैं जो डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, पीला बुखार जैसी खतरनाक बीमारियों का शिकार बना देते हैं। डेंगू एक बीमारी है जो एडीज इजिप्टी मच्छरों के काटने से होती है। इस रोग में तेज बुखार के साथ-साथ शरीर के उबरे चकत्तों से खून रिसता है। डेंगू बुखार धीरे-धीरे एक महामारी के रूप में फैल रहा है। यह ज्यादातर शहरी क्षेत्र में फैलता है। यदि डेंगू बुखार के लक्षण शुरुआत में पता चल जाये, तो इस बीमारी से बचा जा सकता है। डेंगू बुखार से कई बार गम्भीर स्थिति पैदा हो जाती है और इसका सही समय पर इलाज व विशेष बचाव के तरीके उपलब्ध न होने के कारण व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है। डेंगू बुखार में जीवाणुरोधी (एंटीबायोटिक्स) काम नहीं करती, केवल कुछ घरेलू उपचार अत्यधिक आराम और अधिक मात्रा में पोषित खाद्य पदार्थों और द्रव्य के सेवन से इसे रोकने की कोशिश की जाती है।

डेंगू जो मादा एडीज एजिप्टाई मच्छरों के काटने से फैलता है, एक प्रकार का विषाणुजनित वायरल बुखार है। डेंगू विषाणु सबसे ज्यादा विश्वव्यापी आर्थोपोड-जनित विषाणु है, जो कि फ्लेविरिडी परिवार से है, जिसमें 70 से ज्यादा परन्तु विभिन्न प्रकार के विषाणु हैं। डेंगू बुखार से पीड़ित व्यक्ति को मादा एडीज एजिप्टाई मच्छर के काटने पर वह मच्छर भी डेंगू विषाणु (वायरस) से संक्रमित हो जाता है और फिर उसके किसी अन्य स्वस्थ व्यक्ति को काटने पर वह व्यक्ति भी डेंगू बुखार का शिकार हो जाता है। इस प्रकार मच्छरों की आबादी बढ़ने से डेंगू की महामारी के बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है जो काफी घातक है।

डेंगू के मच्छर की पहचान


डेंगू के मच्छर को इसके शरीर एवं पैरों पर विशेष सफेद छोटे-छोटे धब्बों के द्वारा पहचाना जा सकता है। यह एक घरेलू प्रकार का मच्छर है जो रुके हुए पानी में प्रजनन करता है तथा 100-200 मीटर तक की पहुँच तक उड़ सकता है। यह ज्यादातर ठंडे छायादार जगहों पर घर के भीतर व बाहर पनपता है। मादा मच्छर ज्यादातर अपने अंडे घर के आस-पास रखे कनस्तरों, डिब्बों आदि में पैदा करती है जो दस दिन में ही वयस्क मच्छर में बदल जाते हैं।

डेंगू के लक्षण


डेंगू बुखार में ठंड लगती है और शरीर का ताप बढ़ जाता है। शरीर पर लाल चकत्ते भी बन जाते हैं। यह सबसे पहले पैरों पर, फिर छाती तथा कभी-कभी सारे शरीर पर फैल जाते हैं। डेंगू बुखार में रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है और नब्ज का दबाव भी कम (20 मिमी एचजी दबाव से कम) हो जाता है। डेंगू से संक्रमित व्यक्ति में लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, भूख न लगना, पेट खराब होना, खूनी दस्त होना और खून की उल्टी होना आदि लक्षण शामिल हैं। कुछ स्थिति में यह बीमारी खतरनाक तब हो जाती है जब इसका संक्रमण रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। रक्तस्राव शुरू हो जाता है तथा रक्त की कमी हो जाती है, जिससे थ्रोम्बोसाटोपेनिया हो जाता है, जिसके कारण रक्त और प्लाज्मा शरीर के अन्य अंगों में बहने (स्रावित) लगते हैं। डेंगू बुखार का 2 मरीज तीन चरणों के दौर से गुजरता है।

पहले डेंगू बुखार (डीएफ) होता है, फिर व्यक्ति डेंगू हिमोरेजिक बुखार (डीएचएफ) का शिकार हो जाता है। इसके बाद भी अगर इलाज नहीं किया गया तो वह डेंगू साक सिंड्रोम (डीएसएस) का शिकार हो जाता है और अन्ततः उसकी मृत्यु हो जाती है। डेंगू का संक्रमण चार विभिन्न प्रकार के डेंगू वायरस के स्ट्रेन से फैलता है। डेंगू का संक्रमण चार विभिन्न प्रकार के डेंगू वायरस के स्ट्रेन से फैलता है, इसलिये कोई भी व्यक्ति एक से अधिक बार भी संक्रमित हो सकता है। कोई भी एक स्ट्रेन किसी भी दूसरे वायरस के प्रति प्रतिरोध क्षमता को नहीं दर्शाता है। डेंगू का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता, बल्कि यह मच्छर के काटने से ही फैलता है।

साइटोकाइन स्ट्रोम क्या है?


जब डेंगू का संक्रमण वायरस के किसी एक स्ट्रेन के द्वारा होता है तो उससे मिलती-जुलती एण्टीबॉडीज शरीर में पैदा हो जाती हैं और विचरण करती हैं। लेकिन जब दूसरी बार संक्रमण किसी दूसरे स्ट्रेन के द्वारा होता है तो इन एण्टीबॉडीज की संख्या बढ़ जाती है और दूसरे स्ट्रेन के लिये नई ताजा एण्टीबॉडीज का निर्माण होने लगता है। इसके परिणाम स्वरूप बहुत अधिक मात्रा में साइटोकाइन्स के जैसी इन्टरल्यूकिन 6 और ट्यूमर नैक्रोसिस कारक का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता है, जो रक्त कोशिकाओं में स्राव पैदा कर देते हैं। जैसे ही बुखार कम होता है बीमार व्यक्ति में रक्त स्रावित होने की स्थिति दिखाई देने लगती है।

डेंगू कैसे फैलता है?


डेंगू का विषाणु (वायरस) आक्रमण करता है और कोशिका के अन्दर चला जाता है जहाँ यह वृद्धि करता है। एक बार रक्त कोशिकाओं में आकर यह यकृत (लिवर कोशिकाओं) को अपना निशाना बनाता है। फिर प्रजनन के द्वारा यह विषाणु गुणन प्रारम्भ करता है और यकृत कोशिका के केन्द्रक को निशाना बनाता है। तुरन्त वृद्धि करने वाले गुथे हुए मीरोज्वाइट, रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुँचाते हैं और फाड़ देते हैं तथा एक रसायन को स्रावित करते हैं; जिससे ठंड बुखार व दर्द होता है। डेंगू होने पर दरअसल प्लेटलेट्स की संख्या घट जाती है। सामान्यतः स्वस्थ व्यक्ति में कम-से-कम 5-6 लीटर खून होता है। प्लेटलेट्स दरअसल रक्त का थक्का बनाने वाली वह कोशिकाएँ हैं जो लगातार नष्ट होकर निर्मित भी होती रहती हैं। ये रक्त में बहुत ही छोटी-छोटी कोशिकाएँ होती हैं। ये कोशिकाएँ रक्त में 1 लाख से 3 लाख तक पाई जाती हैं। इन प्लेटलेट्स का काम टूटी-फूटी रक्त वाहिकाओं को ठीक करना है। डेंगू मच्छर जब शरीर में काटते हैं तो शरीर में विषाणु (वायरस) फैल जाता है। ये वायरस प्लेटलेट के निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। सामान्यतया हमारे शरीर में एक बार प्लेटलेट का निर्माण होने के बाद 5-10 दिन तक बना रहता है। जब-जब इनकी संख्या घटने लगती है तब शरीर आवश्यकता के हिसाब से इनका दोबारा निर्माण कर देता है। लेकिन जब डेंगू के वायरस आक्रामक हो जाते हैं तो प्लेटलेट निर्माण की क्षमता को घटा देते हैं। इसलिये डेंगू बुखार से संक्रमित व्यक्ति की प्लेटलेट्स की समय-समय पर जाँच होनी चाहिए। चूँकि प्लेटलेट्स का काम खून पर थक्का जमाना (ब्लड क्लोटिंग) है अतः इनकी संख्या रक्त में 30 हजार से कम हो जाए तो शरीर के अन्दर ही खून बहने लगता है और शरीर में बहते-बहते यह खून नाक, कान, मूत्र द्वारा और मल द्वारा आदि से बाहर आने लगता है। कई बार यह रक्त स्राव (ब्लीडिंग) काफी जानलेवा भी हो सकती है। डेंगू बुखार में यदि प्लेटलेट्स के कम होने पर ब्लड प्लेटलेट्स न चढ़ाये जायें तो डेंगू संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

भारत में डेंगू का प्रकोप


.डेंगू भारत में तेजी से बढ़ती हुई एक घातक बीमारी है। यूरोप को छोड़कर विश्व के अनेकों देशों में लगभग दो करोड़ लोग हर वर्ष इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। वास्तव में हर वर्ष मानसून के आस-पास इसका प्रकोप फैलता है। वैसे तो डेंगू अब बारहमासा बीमारी हो गई है लेकिन साल के तीन महीने डेंगू का सबसे अधिक प्रभाव रहता है। कई आँकड़े दिखाते हैं कि सितम्बर, अक्टूबर तथा नवम्बर के महीने डेंगू के लिये सबसे अनुकूल (पसन्दीदा) महीने हैं। इन्हीं तीन महीनों में डेंगू के सबसे अधिक मरीजों की पुष्टि होती है। दिसम्बर में डेंगू का प्रकोप कम हो जाता है।

 

फेवरेट महीनों में डेंगू के मरीजों की संख्या

वर्ष

अगस्त

सितम्बर

अक्टूबर

नवम्बर

दिसम्बर

2004

04

104

230

237

25

2005

45

159

415

347

44

2006

59

412

2163

681

45

2007

15

68

320

129

10

 

फेवरेट महीनों में डेंगू के मरीजों की संख्या (2004-2007) तक


भारत में डेंगू की महामारी सबसे पहले 1963 में कोलकाता में रिपोर्ट की गई थी जिसमें लाखों लोग प्रभावित हुए थे। सन 1996 में दिल्ली में डेंगू की महामारी फैली थी जिसमें दस हजार से अधिक लोग डेंगू के मरीज हो गए थे तथा जिसमें 423 लोगों की मृत्यु हो गई थी। देश में सन 1996 के बाद डेंगू के प्रकोप में कुछ कमी देखी गई। प्रारम्भ में इसके प्रकोप से राजस्थान राज्य में (1452 में से 35 मृत्यु), तमिलनाडु में (816 में से 8 मृत्यु), हरियाणा में (260 में से 5 मृत्यु) तथा कर्नाटका में 220 व्यक्तियों में डेंगू के लक्षण देखे गये। वर्ष 2001 में डेंगू से ग्रसित बीमार लोगों की संख्या कुछ अधिक पाई गई और वर्ष 2002 में फिर बीमार लोगों की संख्या में 46 प्रतिशत की कमी देखी गई तथा मृत्युदर में भी 2001 की तुलना में 41 प्रतिशत की कमी देखी गई। चूँकि प्रारम्भिक रिपोर्टों में इसको ज्यादा गम्भीर नहीं पाया गया अतः इसके रोकथाम एवं बचाव के प्रति भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। इस साल भी डेंगू एवं डेंगू हिमोरेजिक बुखार को दिल्ली, केरला, कर्नाटका तथा राजस्थान राज्यों में संक्रमित पाया गया। वर्ष 1996 से डेंगू से ग्रसित मरीजों की संख्या का आँकड़ा कुछ इस प्रकार है।

राजधानी दिल्ली में डेंगू का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। अगस्त और सितम्बर माह में दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में डेंगू का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है, क्योंकि उमस और तापमान में ज्यादा कमी न हो पाने के कारण मच्छरों के प्रजनन के लिये यह समय ज्यादा अनुकूल हो जाता है। सन 2013 में दिल्ली क्षेत्र में प्रतिदिन औसत 30 मामले डेंगू से ग्रसित पाये गये और 1 अक्टूबर 2013 को तो केवल 72 घंटे में ही 395 मरीज विभिन्न अस्पतालों में दाखिल किये गये। दिल्ली में इस वर्ष भी कुछ बड़े संस्थानों/निकायों को दंडित करने के लिये लगभग 145 चालान काटे गये, जिसमें दिल्ली जलबोर्ड, विश्वविद्यालय तथा रेलवे स्टेशन आदि हैं, जहाँ मच्छरों को पनपने से रोकने के व्यापक इन्तजाम नहीं किये गये। सन 2011, 2012 और 2013 में दिल्ली में 20,000-70,000 परिवारों में किये गये एक सर्वे के अनुसार डेंगू का लार्वा क्रमशः 3.2 प्रतिशत, 2.6 प्रतिशत और 3.08 प्रतिशत की दर से विभिन्न घरों में पनपता पाया गया। वर्ष 2002 से अब तक दिल्ली राज्य में डेंगू से ग्रसित बीमारों की संख्या तथा उसके संक्रमण से हुई मृत्यु का आँकड़ा कुछ इस प्रकार दर्शाया जा सकता है।

डेंगू के मरीजों की कुल संख्याडेंगू के मरीजों की कुल संख्या ग्राफ

डेंगू के प्रति सचेत करते हुए समाचार पत्र की झलकियाँ डेंगू से बचाव एवं रोकथाम के उपाय


डेंगू संक्रमित मादा एडीज एजिप्टाई मच्छर के काटने से फैलता है। डेंगू को केवल रक्त की जाँच के बाद ही पहचाना जा सकता है। इसके लिये कोई विशेष इलाज नहीं है जबकि मरीज को केवल पूर्ण आराम और ज्यादा द्रव्य व नींबू पानी आदि पीने की सलाह दी जाती है। इसके साथ कोई भी दर्द निवारक दवा नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि यह रक्त में प्लेटलेट की मात्रा को कम कर देता है।

एडीज मच्छर ज्यादातर दिन में दोपहर के बाद सक्रिय होते हैं, अतः शरीर को पूरी तरह ढककर रखना चाहिए। बचाव के अन्य तरीके हैं हमें मादा मच्छरों को बढ़ने से रोकना चाहिए, जो डेंगू का संक्रमण करते हैं। घर में मच्छरों के पनपने की सभी जगहों को हटा देना चाहिए व उन सभी जगहों को साफ कर देना चाहिए जहाँ बारिश का जमा हुआ पानी इकट्ठा हो, विशेषतौर पर पुराने टायर व तेल इत्यादि के डब्बे। ऐडीज साफ किए हुए पानी में बढ़ते हैं, इसलिये पक्षियों आदि के लिये रखे गये कन्टेनर रोज साफ करने चाहिए। यदि कूलर का काम ना हो तो उसे सुखाकर रखें वरना उसका पानी रोज बदलते रहें। पानी को कूलर और पौधों आदि में जमा न रहने दें। अपने आस-पास सफाई रखें। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें और मच्छरदानी लगाकर सोएँ। डेंगू बुखार में आराम करना और पानी की कमी को पूरा करना बहुत जरूरी है। बदलते मौसम में अगर आप किसी नयी जगह पर जा रहे हैं तो मच्छरों से बचने के उत्पादों का प्रयोग करें।

मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिये सार्वजनिक तौर पर कई और कदम उठाये जाने चाहिए। जिसमें कुछ मुख्य इस प्रकार से हैं-

1. घर के आस-पास तथा अन्य स्थानों जैसे प्लास्टिक बैग, कैन, गमले, सड़कों में पानी जमा न होने दें। जहाँ कहीं भी पानी जमा हो उसमें केरोसिन तेल डाल दें और रोज घर में कीटनाशक का छिड़काव करें।
2. जागरूकता लाने के लिये वर्कशॉप, लेक्चर आदि कई प्रकार के कार्यक्रम चलाये जाने चाहिए।
3. घर-घर जाकर मच्छर के प्रजनन की जाँच की जाये तथा जहाँ प्रजनन पाये गये उसके मालिक को तुरन्त नोटिस दिया जाये।
4. कूलरों को सप्ताह में एक बार खाली करके सफाई करने तथा पानी की टंकियों को ढककर रखने की सलाह दी जानी चाहिए। 100 लीटर पानी में लगभग दो चम्मच केरोसिन तेल/पेट्रोल डालकर रखना चाहिए।
5. टेमीफास की गोलियों का वितरण किया जाना चाहिए जिससे मच्छर न पनपने पायें।
6. सभी बर्तनों, हौदियों जहाँ पानी भरने की सम्भावना है उसे सुखा लेने की सलाह दी जानी चाहिए जिससे मच्छर न पनपने पाएँ।
7. वाटर टैंक तथा कूलर आदि को फिर से पेंट किया जाना चाहिए।

यद्यपि केवल भारत में ही इस घातक बीमारी ने अपने पैर पसारे हैं, बल्कि विश्व में एशिया तथा कैरेबियन के प्रदेशों में डेंगू एक सामान्य बीमारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार इस बीमारी से अनुमानतः 100 करोड़ लोग प्रतिवर्ष प्रभावित होते हैं जिनमें 5 प्रतिशत लोगों की मृत्यु हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 100 से ज्यादा देश इसके प्रकोप से प्रभावित हैं, जिनमें 4 लाख लोगों की संख्या डेंगू हिमोरेजिक बुखार (डीएचएफ) से ग्रसित लोगों की पाई गई हैं। वर्ष 2002 के आँकड़ों के अनुसार दक्षिण एशिया के 8 देश जिनमें जिनमें भारत, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार और नेपाल शामिल हैं, में डेंगू से 9000 लोगों की मृत्यु को रिपोर्ट किया गया है। जबकि वैश्विकतौर पर 57 करोड़ लोगों में से 19000 लोगों को डेंगू द्वारा काल ग्रसित पाया गया। यह संख्या अब और अधिक हो सकती है।

डेंगू विषाणु का संक्रमण अब विश्व में स्वास्थ्य सम्बन्धित एक आम गम्भीर समस्या है। जबकि इसकी पैथोजेनिक क्रियाएँ (बीमारी पैदा करने के कारण) और उसके द्वारा शरीर में होने वाले प्रभावी परिवर्तनों व कारकों के बारे में अभी कम ज्ञान है। वैज्ञानिकों का ध्यान इस ओर आकर्षित है और आरम्भिक अनुसन्धानों में इसके संक्रमण के तरीकों और प्रवर्धन (रिप्लीकेशन) आदि को गहन रूप से अध्ययन किया गया, जिससे विषाणु के द्वारा मनुष्य शरीर और प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) में होने वाले प्रभावों को समझा जा सके। अनुसन्धानकर्ताओं के द्वारा डेंगू विषाणु के विभिन्न कारकों (फैक्टर्स) जो कि संक्रमण के लिये जिम्मेदार थे, कि क्रियाविधि को समझा गया, डेंगू विषाणु के अनुवांशिकी तथा विकास के अध्ययन को होने वाले प्रभावों से यह जाना गया कि वायरस के कुछ सीक्वेंस के काफी गम्भीर बीमारियों से जुड़े होने के संकेत हैं।

एव्ल्यूशन ऑफ डायग्नोस्टिक टेस्ट्स : नेचर रिव्यू माइक्रोबायोलॉजीगम्भीर व्यक्तियों का इलाज तुरन्त सम्भव हो सकता है, अगर परीक्षण समय से किया जा सके। प्रयोगशाला परीक्षण वायरस के प्रतिजन (एन्टीजन) को जानने तथा संक्रमित व्यक्ति के नमूने में रोग प्रतिकारक (एन्टीबॉडी) को जानकर किया जाता है, जैसा कि नीचे चित्र दर्शाया गया है। डेंगू के प्राथमिक संक्रमण में 1gm का लेवल ज्यादा पाया गया, जबकि द्वितीय संक्रमण में इसको कम देखा गया। उपचार के लिये मच्छरों की आबादी को नियंत्रण में रखना सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय बताया गया। हाल में ही अनुसन्धानकर्ताओं ने डेंगू के पाँचवे सब टाइप को खोजा है, जिससे वैक्सीन निर्माण में सहायता प्राप्त होगी। जैवप्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) अनुसन्धान के द्वारा प्रोटियोमिक संश्लेषण की विधि के माध्यम से प्राथमिक मेजबान प्रतिक्रियाओं (जो कि प्रोटीन के बदलाव को दर्शाता है) को मनुष्य की निशानदेही कोशिकाओं में डेंगू वायरस के संक्रमण के समय का भी अध्ययन किया गया। हिपेटाइटिस जी 2 कोशिकाओं (हिप जी 2) में डेंगू वायरस सीरोटाइप 2 (डीइएन 2) संक्रमण को वृद्धि करते देखा गया जैसा कि नीचे चित्र में दिखाया गया है।

गुणात्मक विश्लेषणों में डीइएन -2 संक्रमण को 12.24 और 48 घंटे के अन्तराल में कोशिकाओं के नष्ट होने को संक्रमण के बाद की दशाओं में अध्ययन किया गया है। गुणात्मक आधारित विश्लेषणों के द्वारा 17 विभिन्न प्रकार के प्रोटीनों को दर्शाया गया जिनको कि पेप्टाइड मॉस फिंगरप्रिंटिंग के द्वारा सफलतापूर्वक पहचान लिया गया। इस तरह ज्यादातर बदली हुई प्रोटीनों में कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण कारक (की फैक्टर) देखे गये जो ट्रांसक्रिप्शन और ट्रांसलेशन प्रक्रियाओं में शामिल थे।

डेंगू

डेंगू का टीका (वैक्सीन)


डेंगू से बचाव के लिये कोई भी कारगर टीका उपलब्ध नहीं है। जैवप्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) शोध एवं अनुसन्धान के द्वारा विभिन्न प्रकार के टीकों के निर्माण को बढ़ावा व तकनीकी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई है। जबकि गुणात्मक लेकिन विभिन्न प्रकार के डेंगू वायरस सीरोटाइप के होने के कारण यह डेंगू टीके के निर्माण कार्य में रुकावटें पैदा कर रहे हैं। किसी एक या दो डेंगू विषाणु के प्रति बचाव की सम्भावना वास्तव में डेंगू हिमोरेजिक बुखार और डेंगू सॉक सिंड्रोम के खतरे को और ज्यादा बढ़ा देती है। अतः एक सुरक्षित और प्रभावी डेंगू का टीका (वैक्सीन) को चतुर्थाकार होना चाहिए जो चारों प्रकार के सीरोटाइप के लिये एक मजबूत और दूरगामी प्रतिरक्षा प्रभाव के लिये कारगर सिद्ध हो। भारत में जेनेटिक इंजीनियरी एवं बायोटेक्नोलॉजी के अन्तरराष्ट्रीय केन्द्र (आईसीजीईबी) में डेंगू के टीका (वैक्सीन) निर्माण पर कार्य में कुछ सफलता हासिल हुई है।

डेंगू वैक्सीन के लिये कई चरणों में विकास कार्य जारी है, जिसमें येलो फीवर के 17ड वैक्सीन स्ट्रेन के कीमेराइजेशन के साथ, एन.आई.एच. में म्यूटेसन्स के कम्बीनेशन के द्वारा तथा डेंगू 2PDK53 को सेल कल्चर विधि के द्वारा डेंगू के लिये एक आधुनिक टीका विश्व स्वास्थ्य संगठन के दक्षिण पूर्वी एशिया क्षेत्रीय कार्यालय के सहयोग से माहिडोल विश्वविद्यालय, थाईलैण्ड द्वारा विकसित किया गया है। कठिन प्रयोगशाला परीक्षणों के बाद जिसमें पशु मॉडलों पर आधारित परीक्षण एवं अध्ययन भी शामिल हैं, को मोनो, डाई, ट्राई और टेट्रा प्रारूपों में औषधीय परीक्षणात्मक अध्ययनों से भी गुजारा गया है। यह टीका अवन्तिस पाश्चुर के द्वारा एक अनुबन्ध के तहत व्यापारिक निर्माण के लिये तैयार किया जा रहा है। विभिन्न अनुसन्धानकर्ताओं के संघटन ने संक्रमित क्लोन तकनीकी के द्वारा डेंगू टीके के विकास को सफलतापूर्वक खोज लिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उच्च प्राथमिकता के आधार पर इसके टीके के विकास के लिये एक समिति का गठन किया है, जिसमें नई जैवप्रौद्योगिकीय सम्भावनाओं को शामिल किया जाएगा। यह समिति डेंगू और जापानी इंसेफलाइटिस के टीका विकास के कार्य के लिये अनुसन्धान कार्यक्रमों एवं प्रोजेक्टों को भी सहयोग प्रदान करेंगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सितम्बर 2012 की रिपोर्ट के अनुसार अभी किसी भी वैक्सीन को परमिट (लाइसेंस) नहीं दिया गया है।

एक छोटा मच्छर एक खतरनाक महामारी पैदा कर सकता है। डेंगू का स्थान मलेरिया के बाद दूसरे नम्बर पर आता है। आँकड़ों की तुलना में अभी इसमें उतार-चढ़ाव देखे जा रहे हैं, लेकिन सभी ओर इसका खतरा धीरे-धीरे मँडराने लगा है। सभी आँकड़े यह दर्शाते हैं कि हमें हर पल सदैव इन खतरों से सजग रहना होगा।

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