पूर्वोत्तर में सुशासन की चुनौतियाँ

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 18:02
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योजना, अप्रैल 2018


1970 की शुरुआत में असम भारत के बेहतर राज्यों में से एक था लेकिन पिछले चार दशकों में असम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका और उसके सभी संकेतकों में गिरावट देखी गई। चूँकि असम में पूर्वोत्तर की 70 प्रतिशत आबादी बसती है और यहाँ विकास से जुड़े सभी संकेतकों की गति मन्द रही, इसलिये इसने पूरे क्षेत्र के प्रदर्शन को नीचे की ओर धकेल दिया। हालांकि केन्द्र सरकार को पूर्वोत्तर की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि राज्यों को स्वयं अपने प्रशासन को मजबूत करना चाहिए। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है जहाँ प्रति व्यक्ति आय कम है, निजी निवेश का अभाव है और पूँजी निर्माण का स्तर निम्न है। इस क्षेत्र मेें बुनियादी सुविधाएँ पर्याप्त नहीं हैं तथा भौगोलिक रूप से यह दूसरे क्षेत्रों से कटा हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों जैसे खनिज, हाइड्रोपावर क्षमता और वनों का दोहन भी पूरी तरह से नहीं किया गया है। इन क्षेत्रों के अपने कर एकत्रण और आन्तरिक संसाधन भी अत्यन्त कम हैं जिसके कारण वे केन्द्र सरकार के हस्तान्तरणों पर पूरी तरह से निर्भर हैं।

स्थानीय धनाढ्य मैदानी सम्पत्तियों में निवेश करना पसन्द करते हैं और ऐसे उद्योग लगाने से कतराते हैं जिन्हें जोखिमपूर्ण समझा जाता है। चूँकि इन राज्यों की अवस्थिति और बुनियादी सुविधाओं की कमी की वजह से उद्योगों के विकास की गति इतनी तेज नहीं हो सकती।

सिक्किम, त्रिपुरा और कुछ हद तक मिजोरम के अतिरिक्त बाकी राज्य अपने आर्थिक विकास में कुछ खास सुधार नहाँ कर पाये, जैसा कि तालिका 1 मेें प्रदर्शित किया गया है।

1970 की शुरुआत में असम भारत के बेहतर राज्यों में से एक था लेकिन पिछले चार दशकों में असम अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सका और उसके सभी संकेतकों में गिरावट देखी गई। चूँकि असम में पूर्वोत्तर की 70 प्रतिशत आबादी बसती है और यहाँ विकास से जुड़े सभी संकेतकों की गति मन्द रही, इसलिये इसने पूरे क्षेत्र के प्रदर्शन को नीचे की ओर धकेल दिया।

हालांकि केन्द्र सरकार को पूर्वोत्तर की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए, लेकिन यह भी सच है कि राज्यों को स्वयं अपने प्रशासन को मजबूत करना चाहिए। समावेशी विकास का लक्ष्य सिर्फ आर्थिक विकास नहीं, उसके साथ गरीबी उन्मूलन, सामाजिक संकेतकों में सुधार और असमानता को कम करना भी होना चाहिए। यह सुनिश्चित भी किया जाना चाहिए कि विकास के साधनों से पर्यावरण को नुकसान न हो।

पूर्वोत्तर में वृहद नीतियों को अमलीजामा पहनाने के लिये सुशासन और जवाबदेह प्रशासन की जरूरत होगी क्योंकि इसके बिना अच्छी-से-अच्छी नीतियाँ और कानून भी सिर्फ कागजी शोभा बढ़ाएँगे या सुपात्र जन तक नहीं पहुँच पाएँगे। विडम्बना यह है कि पूर्वोत्तर क्षेत्रों का राज्य और जिला स्तरीय प्रशासन कमजोर है जो अनुदानों का सदुपयोग नहीं करता और नीतियों के कार्यान्वयन पर नजर नहीं रखता। इसलिये नतीजे सुफल नहीं देते। यही वे कुछ कारण हैं जिनके चलते विकास और सामाजिक संकेतक प्रभावित होते हैं। इनके कुछ उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं।

 

तालिका 1-2004-05 के स्थिर मूल्यों पर पूर्वोत्तर राज्यों की प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (एनएसडीपी)

राज्य

2005-06

2015-16

वार्षिक विकास दर(2005-16)

अरुणाचल प्रदेश

26870

39107

3.82

असम

17050

26413

4.47

मणिपुर

19479

26301

3.05

मेघालय

25642

38601

4.18

मिजोरम

25826

44773

5.66

नागालैण्ड

33072

50327

4.29

सिक्किम

29008

92328

12.27

त्रिपुरा

25688

55322

7.97

भारत

28639

52833

6.32

 

 

तालिका 2ः गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चों का %

राज्य

सरकारी आँकड़ों के अनुसार

यूनिसेफ के अनुसार

अरुणाचल प्रदेश

0.00

13.30

असम

0.86

7.00

मणिपुर

0.02

3.50

मेघालय

0.14

16.00

मिजोरम

0.31

6.20

नागालैण्ड

0.20

7.90

सिक्किम

0.07

6.50

त्रिपुरा

0.25

16.80

भारत

1.61

9.40

स्रोत - htttp://icds&wcd.nic.in@Qpro314forwebsite23092014@qpr0314nutritionalstausofchildren.pdf

 

निधियों का उपयोग

जैसा कि ज्ञात है, सभी गैर मुक्त केन्द्रीय मंत्रालयों को अपने वार्षिक सकल बजटीय आवंटन (जीबीए) की 10 प्रतिशत राशि को पूर्वोत्तर क्षेत्र को अनिवार्य रूप से देना होता है। जितनी राशि खर्च नहीं होती, वह नॉन लैप्सेबल सेंट्रल पूल अॉफ रिसोर्सेज (एनएलसीपीआर) में चली जाती है। कुछ परियोजनाएँ तो समय पर पूरी हो जाती हैं, लेकिन कुछ लम्बित हो जाती हैं। इनकी वजह यह है कि कई परियोजनाों के लिये धन समय पर नहीं मिलता, इसके अलावा राज्यों की उपभोग क्षमता कम है और कार्य करने का मौसम भी अल्प अवधि का है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक 2000 से 2010 तक एनएलसीपीआर में संचयी संग्रहण 17,213 करोड़ रुपए था, लेकिन 2011 तक केवल 8796 करोड़ रुपए जारी किये गए जो केवल 50 प्रतिशत राशि है। ऐसा इसलिये हो सकता है क्योंकि राज्यों ने मंत्रालय को अच्छे प्रस्ताव नहीं भेजे। 2016-17 के दौरान नरेगा के अन्तर्गत असम और मणिपुर (पूर्वोत्तर के दो सबसे गरीब राज्य) में एक औसत ग्रामीण गरीब पर केवल 1630 और 4953 रुपए क्रमशः खर्च किये जा रहे थे, जबकि केरल में यह राशि 15,657 रुपए और आन्ध्र प्रदेश में 11,942 (तेलंगाना सहित) थी।

पूर्वोत्तर राज्यों में एडीबी और विश्व बैंक की कई परियोजनाएँ अधर में सिर्फ इसलिये लटकी हुई हैं क्योंकि उनकी औपचारिकताएँ पूरी नहीं हुई हैं। इसीलिये इन परियोजनाओं का व्यय में भी गति नहीं आई है। कुछ ऐसा ही हाल रेलवे की परियोजनाओं का भी है। इन परियोजनाओं के लिये राज्यों ने या तो जमीन मंजूर नहीं की है या वन मंजूरी नहीं दी गई है।

22 जुलाई, 2015 को लोकसभा के अतारांकित प्रश्न संख्या 287 में पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय ने स्वीकार किया था कि परियोजनाओं के लम्बित होने के कई कारण हैं, जैसे धनराशि जारी करने और परियोजनाओं को मंजूरी के बीच लम्बा समय, राज्य सरकारों द्वारा समय पर यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट जमा न करना, भूमि अधिग्रहण और वन मंजूरियों से सम्बन्धित समस्याएँ, कानून एवं व्यवस्था की स्थिति ठीक न होना और भारी बारिश के कारण कार्य का मौसम सीमित होना है।

मणिपुर में स्वच्छता कार्यक्रम पर कैग रिपोर्ट (2015 का 1) का कहना था कि योजना तैयार करते समय ग्रामीण लाभार्थियों की आवश्यकताओं का सही तरह से मूल्यांकन नहीं किया गया। विश्वसनीय आधारभूत डेटा भी उपलब्ध नहीं था। पीआईपी (परियोजना कार्यान्वयन योजना) की तैयारी में कोई भी सामुदायिक भागीदारी नहीं थी।

वित्तीय प्रबन्धन अक्षम था, जिसके परिणामस्वरूप धन जारी करने मेें देरी हुई, राज्य का योगदान अल्प रहा और शेष बड़ी राशि में बची रही। गलत तरीके से भुगतान किये गए और ऐसे व्यय किये गए जिनसे बचा जा सकता था। इससे सुपात्र लोगों को लाभ नहीं मिला। ऐसे मानदंड भी नहीं बनाए गए जिससे लाभार्थियो का मूल्यांकन या उनकी पहचान की जा सकें, साथ ही कार्यक्रम के दौरान निर्मित शौचालयों की स्थिति का आने वाले वर्षों में जायजा लिया जा सके।

एमएंडई तंत्र में सुधार

वर्तमान में सभी स्तरों के अधिकारी सूचनाएँ एकत्र करने और उन्हें जमा करने में काफी समय लगाते हैं, लेकिन इनका उपयोग सुधारात्मक और उपचारात्मक कार्रवाई या विश्लेषण के लिये नहीं किया जाता। इन सूचनाओं को केवल उच्च स्तरीय अधिकारियों को भेज दिया जाता है या फिर विधानसभा में सवालों के जवाब देने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। इन आँकड़ों को जमा करने के बाद नियमित रूप से जाँचा भी नहीं जाता। विभाग इनके सत्यापन में पूरी तरह से असफल है और किसी भी स्तर पर कोई जवाबदेही नहीं है।

उदाहरण के लिये राज्य सरकारों का दावा है कि पूर्वोत्तर राज्यों में गम्भीर रूप से कुपोषित बच्चे 1 प्रतिशत से भी कम हैं, जबकि 2014 में यूनिसेफ की स्वतंत्र रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग स्थितियाँ हैं। मणिपुर में कुपोषित बच्चे लगभग 3.5 प्रतिशत हैं और मेगालय एवं त्रिपुरा में करीब 16 प्रतिशत।

सरकारी आँकड़े (मार्च 2014) बनाम यूनिसेफ के निष्कर्ष इन आँकड़ों से जुड़े विरोधाभासों को हल करने की जरूरत है। इसके लिये प्रक्रियागत सुधारों की जरूरत होगी ताकि फील्ड डेटा सही, विश्वसनीय और मूल्यांकन किये गए डेटा से मेल खाता हो। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकारें जिला प्रशासन को इस बात के लिये प्रोत्साहित करती हैं कि वे बढ़ा-चढ़ाकर आँकड़े दर्ज करें। इसकी वजह से निरीक्षण अप्रभावी और जवाबदेही अर्थहीन हो जाती है।

ई-गवर्नेंस को बढ़ावा

ई-गवर्नेंस का अर्थ है, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) का उपयोग करके सरकार को अधिक सुलभ, प्रभावी और जवाबदेह बनाना। ई-गवर्नेंस में तकनीक का प्रयोग करते हुये पारदर्शिता को पोषित किया जाता है ताकि दूरियों को कम किया जा सके और लोगों को सशक्त बनाया जाय। इसी के जरिए वे उन राजनैतिक प्रक्रियाओं में हिस्सा ले सकते हैं जो उनके जीवन को प्रभावित करती हैं। ई-गवर्नेंस में सभी नागरिकों को लाभ पहुँचाने की क्षमता है लेकिन उसकी जानकारी केवल शिक्षित और पेशेवर लोगों तक सीमित है। अधिकतर नागरिक अब भी इसके सम्भावित लाभों से अनभिज्ञ हैं।

असम से सम्बन्धित विश्व बैंक की एक रिपोर्ट (संख्याः एसीएस 2740) ने 2014 में यह गौर किया कि व्यापक आईसीटी योजना का अभाव है और मजबूत एवं सहयोगी आईसीटी अवसंरचना सहित सेवा सुपुर्दगी के लिये कोई सामान्य ढाँचा नहीं है।

एक सामान्य आईसीटी योजना को विकसित किया जा सकता है, अगर कानूनी मसलों को सुलझा लिया जाय, बुनियादी बाधाओं को पार कर लिया जाय, हॉरिजोंटल कनेक्टिविटी, व्यापक क्षेत्र के नेटवर्क्स और डेटा केन्द्रों की उपलब्धता हो, आईसीटी को मजबूत किया जाय, मानदंडों एवं इंटरअॉपरेबिलिटी को बढ़ाया जाय और तकनीक तथा उपयोग के लिहाज से भविष्य का विकास और स्केलेबिलिटी मॉडल तैयार किया जाय।

प्रत्येक विभाग को ऐसी आईसीटी योजना बनानी चाहिए जिसमें सेवाओं, बैंकएंड की जरुरतों और हॉरिजोंटल नेटवर्क्स एवं क्षमताओं को शामिल किया जाय। विभागों को इस बात के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है कि वे केन्द्रीकृत व्यवस्था को अपनाएँ। इससे प्रभावपरकता में सुधार होगा और जवाबदेही बढ़ेगी।

इसी प्रकार नागालैण्ड पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की प्रगति से सम्बन्धित 10वें सामान्य समीक्षा मिशन (2017) का कहना था कि राज्य में स्वास्थ्य पर केन्द्रीत आईटी ढाँचा बहुत कमजोर था। वहाँ टेलीमेडिसिन या एम-हेल्थ कार्यक्रम शुरू भी नहीं किये गए थे। आरसीएच (प्रजनन और बाल स्वास्थ्य) रजिस्टरों पर आधारित वर्कप्लान जनरेट नहीं किये गए थे। इनवेंटरी मैनेजमेंट को कम्प्यूटरीकृत नहीं किया गया था और एएनएम द्वारा लाभार्थियों की ट्रैकिंग की स्थिति खराब थी।

राज्य में कई क्षेत्र दुर्गम हैं जहाँ कनेक्टिविटी का अभाव है और फोन इंटरनेट का नेटवर्क अच्छा नहीं है। इसलिये उपलब्ध आईटी ढाँचे का प्रयोग नहीं किया जा सकता। चूँकि एकाउंट्स को पूरी तरह से कम्प्यूरीकृत नहीं किया जा सका, इसलिये त्रिपुरा के धलाई जिले में आशा कार्यकर्ताओं को कमीशन का भुगतान किये एक वर्ष से ज्यादा हो गया था।

देश के कई राज्यों को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के अन्तर्गत खाद्यान्न वितरण का एंड टू एंड कम्प्यूटरीकरण किया जा चुका है। मंत्रालय द्वारा छह राज्यों, जैसे असम, बिहार, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में टीपीडीएस के तुलानात्मक अध्ययन (चुन हुए राज्यों में लक्षित सार्वजविक वितरण प्रणाली का मूल्यांकन अध्ययन, एनसीएईआर सितम्बर, 2015) में निम्नलिखित तथ्य सामने आयेः

1. छत्तीसगढ़ में लाभों के लिये सुपात्र सभी परिवारों में 2 प्रतिशत की सबसे कम अपवर्जन त्रुटि थी, जबकि असम में सबसे अधिक 71 प्रतिशत अपवर्जन त्रुटि थी।

2. लीकेज (सुपात्र को लाभ न मिलना) छत्तीसगढ़ में सबसे कम पाया जाता है, उसे बाद बिहार का स्थान है। असम, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल मेें यह अपेक्षाकृत अधिक है।

3.असम में सतर्कता और निगरानी काफी कम है। असम मे बीपीएल कार्ड पाने के लिये लोगों को 3,000 रुपए तक चुकाने पड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में इसके लिये कोई पैसा नहीं लगता।

4. कछार और बोंगाई गाँव कार्ड धारकों में कभी भी अपना पूरा अनाज नहीं मिलता क्योंकि एफपीएस डीलर प्रति कार्ड 3-4 किलोग्राम अनाज कम कर देते हैं। डीलरों ने स्वीकार किया कि यह सच था। उन्होंने इस कटौती को उचित ठहराया क्योंकि परिवहन की लागत की भरपाई सरकार द्वारा नहीं की गई थी।

निरर्थक नौकरशाही

हालांकि अनेक राज्यों में ऊपरलिखित कमियाँ हैं, दो विशेष समस्याएँ पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्रों में हैं। इन राज्यों में गैर योजनागत व्यय बहुत अधिक है क्योंकि यहाँ ग्रुप सी और ग्रुप डी के कर्मचारी बहुत अधिक संख्या में हैं, जैसे क्लर्क, चपरासी वगैरह जिनकी अब जरूरत नहीं है। इसके कारण पूर्वोत्तर राज्यों में योजनागत व्यय के लिये पर्याप्त धनराशि नहीं बचती, इसके बावजूद केन्द्रीय हस्तान्तरण उदारता से किया जाता है।

उदाहरण के लिये 2014-15 में असम का प्रति व्यक्ति योजनागत परिव्यय 5,775 रुपए था, जबकि इसी के समान निर्धन गरीब जनसंख्या वाले छत्तीसगढ़ का योजनागत परिव्यय 12,807 रुपए था। इसका कारण यह था कि असम में वेतन का भारी बोझ था। यहाँ हम दोनों राज्यों की तुलना कर रहे हैं।

इस प्रकार पूर्वोत्तर राज्यों के सरकारी प्रशासन में बहुत से कर्मचारियों की जरूरत नहीं है। वास्तव में ऐसे कर्मचारी प्रशासन को अक्षम बनाते हैं। इन कर्मचारियों में बहुत से कर्मचारी सहायक के तौर पर काम कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि कर्मचारियों की नियुक्त के लिये कोई मानदंड तय नहीं है और उनकी तनख्वाह का भारी दबाव रहता है। संख्या के अतिरिक्त दक्षता का भी सवाल है।

प्रशासन अनुत्पादक और अप्रासंगिक कर्मचारियों से भरा पड़ा है, जहाँ क्लर्कों, चपरासियों और वाहन चालकों की बड़ी संख्या है। दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में अग्रणी पंक्ति के कर्मचारियों का अभाव है जैसे नर्स, डॉक्टर, शिक्षक, न्यायाधीश और यहाँ तक कि पुलिसकर्मी। इन राज्यों में गैर योजनाबद्ध तरीके से संगठनात्मक संरचनाएँ तैयार की गई हैं जहाँ विभिन्न विभाग एक जैसे कार्य करते हैं। इनकी कार्य प्रणालियाँ और प्रक्रियाएँ अच्छी तरह से नहीं बनाई गई हैं, मानव संसाधन प्रबन्धन खराब है और प्रोत्साहनों की कमी है। इन कारणों से सरकार की प्रशासनिक क्षमता कम हो गई है।

पूर्वोत्तर क्षेत्र की एक अन्य बड़ी समस्या असम, मणिपुर और नागालैण्ड में व्यापक रूप से प्रचलित ‘बन्द’ (राज्य बन्द) की संस्कृति है जो व्यक्तिगत अधिकारों की धारणा के खिलाफ है। यह स्थानीय प्रशासनिक संरचनाओं की प्रभावशीलता पर एक कलंक है और पूरी तरह से असंवैधानिक है।

असम मेें ‘बन्द’ का असर पूरे पूर्वोत्तर पर पड़ता है, चूँकि चावल, दालों, दवाइयाँ, सब्जियों, पोल्ट्री जैसी बुनियादी वस्तुएँ अन्य राज्यों में असम के रास्ते-सड़क या रेल से पहुँचती हैं। इसलिये समय आ चुका है, जब असम, मणिपुर और नागालैण्ड के नागरिक अपनी भावी पीढ़ियों को प्रगतिशील और शान्तिपूर्ण जीवन देने के लिये बन्द की नकारात्मक संस्कृति के खिलाफ खड़े हों। ये बन्द ऐसे सशस्त्र समूहों द्वारा कराए जाते हैं जो किसी नागरिक समूह का नहीं, बल्कि केवल खुद का प्रतिनिधित्व करते हैं और राज्य सरकारों को खराब प्रशासन के लिये जिम्मेदार ठहराते हैं।

 

तालिका 3ः असम बनाम छत्तीसगढ़

 

असम

छत्तीसगढ़

क्षेत्र (1000 वर्ग किलो मीटर)

135

78.4

जनसंख्या (करोड़ में)

3.12

2.55

% गरीबी रेखा से नीचे (2011-12)

32%

40%

2015-16 में वित्त आयोग द्वारा हस्तान्तरण, करोड़ रुपए में

17,401

13,490

योजना परिव्यय 2014-15, करोड़ रुपए में

18,000

32,710

2014-15 के लिये प्रति व्यक्ति योजना परिव्यय

5,775

12,807

सरकारी कर्मचारियों की संख्या हजार में

316

122

 

निष्कर्ष

हमें देश में विकास की भिन्न-भिन्न दरों के बीच अन्तराल को आने वाले दशक में समाप्त करना होगा। पूर्वोत्तर में ऐसा करने के लिये प्रशासन और उनके कामकाज में व्यापक सुधार करने की जरूरत है। इसके लिये सिर्फ वित्तीय संसाधनों के प्रवाह को बढ़ाने से काम चलने वाला नहीं हैं।

चूँकि वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न नहीं है, बल्कि पूर्वोत्तर के संस्थानों और व्यक्तियों की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि वे उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी प्रयोग कर सकें- यही विकास के मार्ग की एक बड़ी बाधा है। इसे काबू में करने के लिये देश के प्रत्येक भाग, पूर्वोत्तर में सरकार के सभी स्तरों पर तकनीकी सहयोग प्रदान किया जाना चाहिए। संस्थागत निर्माण राज्य सरकार के विभागों एवं एजेंसियों को मजबूत करने और नागरिक एवं राज्य सरकारों के बीच फलदायी सहभागिता का आह्वान करता है। स्थानीय स्वशासन से जुड़े संस्थानों को मजबूत करना खासतौर से महत्त्वपूर्ण है। इन क्षेत्रों में केन्द्र सरकार ध्यान केन्द्रित कर सकती है।

निर्धारित लक्ष्यों, स्पष्ट परिणामों रणनीतियों और क्षेत्र के लिये समन्वित योजना के साथ पूर्वोत्तर को तेजी से आत्मनिर्भर बनाना होगा ताकि वह देश के खजाने और अर्थव्यवस्था में सकारात्मक रूप से योगदान करे। इस प्रक्रिया को शुरू करना एक अनिवार्यता है। सुशासन विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग करता है। यह नैतिकता और प्रशासनिक प्रणाली, दोनों का मामला है। ऐसा हस्तान्तरण, जिसकी सामाजिक स्तर पर समीक्षा की जाय, जमीनी स्तर पर निरीक्षण और सतर्कता को मजबूती देगा। इससे प्रशासन के उच्च स्तर पर प्रभाव पड़ता है। इसी तरह क्षमता निर्माण और संस्था-निर्माण, दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर बताने की आवश्यकता नहीं है।

 

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