विकास की आँधी, पेड़ों की आहुति

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 17:51
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डाउन टू अर्थ, मई, 2018

 

यदि आप किसी स्थान पर पाँच सौ पेड़ भी लगा दें तो भी आप उस नये स्थान की पारिस्थितिकी उन सौ पेड़ वाले स्थान की तरह नहीं बना सकते। सर्वप्रथम नये स्थान पर लगाये पेड़ों को बड़े होने में समय लगेगा, उनके साथ सूक्ष्म जीवाणु एवं जंगली जानवरों का तालमेल बनने में समय लगेगा। नये पेड़ उस स्थान की मिट्टी व जल को संरक्षित करने में भी समय लेंगे।

उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह प्रश्न हमेशा उठता है कि विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में सामंजस्य कैसे बनाया जा सकता है। यदि ध्यान दिया जाए तो विकास एवं पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ किया जा सकता है किन्तु उत्तराखण्ड जैसे हिमालयन राज्य में चल रहे निर्माण कार्यों जैसे बड़े बाँधों का निर्माण, सड़क चौड़ीकरण, ऑल वेदर रोड, भव्य भवन निर्माण और अब रेल लाइन निर्माण आदि कार्यों में विकास के नाम पर विनाश के दरवाजे खोले जा रहे हैं। ये विशालकाय निर्माण धरा को प्राकृतिक प्रकोपों के प्रति और संवेदनशील बना रहे हैं।

भूमि के साथ उथल-पुथल भरा विकास आने वाले समय में भारी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकता है। हाल के कुछ महीनों में इसकी आहट भी महसूस की गई है। पिछले साल 28 दिसम्बर को गढ़वाल क्षेत्र में 4.8 तीव्रता का भूकम्प महसूस किया गया जिसका केन्द्र रूद्रप्रयाग जिले के ऊखीमठ से करीब 10 किलोमीटर दूर हिमालय की तरफ बताया गया। दिसम्बर माह में ही पर्वतीय क्षेत्र उत्तराखण्ड में यह दूसरा भूकम्प था।

मैं पर्वतीय क्षेत्र जनपद टिहरी गढ़वाल, उत्तराखण्ड का रहने वाला हूँ और बचपन से भूकम्प का अनुभव करता रहा हूँ। पर्वतीय क्षेत्र के लोगों में भूकम्प की दहशत फैली रहती है। आँकड़ों पर नजर डालने पर पता चलता है कि 2017 में ही उत्तराखण्ड में 14 भूकम्प के झटके 3 से अधिक के रिक्टर स्केल पर आ चुके हैं। 3 फरवरी, 2017 को 3.5, 6 फरवरी को 5.8, पुनः 6 फरवरी को 3.6, 16 अप्रैल को 3.5, 12 जून को 3.0, 10 जुलाई को 3.8, 22 अगस्त को 4.2, 6 दिसम्बर को 5.5 एवं 28 दिसम्बर को 4.8 रिक्टर स्केल का भूकम्प उत्तराखण्ड में आया।

हाल ही में मैंने ऋषिकेश से चम्बा (टिहरी गढ़वाल) नेशनल हाइवे (एनएच- 94) पर हो रहे सड़क चौड़ीकरण को देखा। ऑल वेदर रोड के अन्तर्गत रोड अत्यधिक चौड़ी (लगभग 12 मीटर) की जा रही है जिससे हजारों की संख्या में पर्यावरण रक्षी वृक्षों की कटाई की जा रही है। रोड के चौड़ीकरण हेतु वनों की इस प्रकार कटाई देख कदापि प्रतीत नहीं होता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल रहे हैं।

मैं कुछ दिन पूर्व ऋषिकेश से चम्बा जा रहा था जो जनपद टिहरी के ऋषिकेश-धरासू (एनएच-94) मार्ग पर है। मैंने देखा कि ऑल वेदर रोड के अन्तर्गत रोड का चौड़ीकरण किया जा रहा है। नागनी में वर्षों पूर्व सड़क के किनारे लगाये गये अति मनमोहक सिल्वर ओक के पेड़ों को एक साथ काट दिया गया है। यह सब चारधाम हेतु ऑल वेदर रोड चौड़ीकरण के अन्तर्गत हो रहा है। इस परियोजना के तहत 889 किमी रोड का चौड़ीकरण होना है जो उत्तराखण्ड के 8 जिलों में होगी तथा जिसकी लागत 12 हजार करोड़ रुपए है।

परियोजना के अन्तर्गत रोड चौड़ीकरण में मुख्य 9 पड़ाव हैं जो विभिन्न पर्वतीय राष्ट्रीय मार्गों में आते हैं, जैसे ऋषिकेश-धरासू (एनएच-94), ऋषिकेश-रूद्रप्रयाग (एनएच-58), रूद्रप्रयाग-माना-बद्रीनाथ (एनएच-58), धरासू-गंगोत्री (एनएच-108), धरासू-यमनोत्री (एनएच-94), रूद्रप्रयाग-गौरीकुंड (एनएच-109) एवं टनकपुर-पिथौरागढ़ (एनएच-125)। ये ऋषिकेश से लेकर धरासू, रूद्रप्रयाग, गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गौरीकुंड एवं टनकपुर से पिथौरागढ़ के पड़ावों में आते हैं। इस रोड चौड़ीकरण परियोजना के अन्तर्गत 2 टनल, 15 फ्लाईओवर, 13 भूक्षरण वाले स्थानों पर एलाइनमेंट, 25 बड़े पुल, यात्रियों हेतु 18 सुविधा स्थान एवं 13 बाईपास शामिल हैं। इस परियोजना के अन्तर्गत 30,000 से अधिक वृक्षों का कटाव किया जा रहा है। मात्र ऋषिकेश- धरासू मार्ग पर ही हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं जिसका काफी भाग नरेन्द्रनगर वन प्रभाग के अन्तर्गत आता है।

इस विषय पर जाने-माने समाजसेवी व बीज बचाव आन्दोलन के जनक विजय जड़धारी ने बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में पृथ्वी के साथ इस तरह का छेड़छाड़ कदापि उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि रोड चौड़ीकरण के समय कुछ वृक्षों को बचाया भी जा सकता था किन्तु ऐसा नहीं किया जा रहा। जड़धारी ने कहा कि पहाड़ की महत्ता वहाँ की संकरी रोड व प्राकृतिक सुन्दरता के कारण है। यह जरूरी नहीं है कि पहाड़ में भी मैदानी भागों की तरह अत्यन्त चौड़ी सड़कें हों। जड़धारी ने कहा कि हम सब जानते हैं कि हिमालय भूकम्प, भूक्षरण, बाढ़, बादल फटना, सूखा, जंगली आग आदि के लिये अत्यन्त संवेदनशील है।

अत्यधिक पेड़ काटने से पानी के स्रोत पूर्ण रूप सूख जाएँगे। पहाड़ों का अस्तित्व जंगलों से है और जंगलों का मतलब पेड़ होता है। यदि ऋषिकेश से चम्बा कस्बे के मध्य देखा जाए तो विभिन्न प्रकार के वृक्ष जैसे चीड़, बांज,, बेडू, पईयां, भीमल, खड़ीक, गुरियाल आदि बहुपयोगी वृक्ष भी इस रोड चौड़ीकरण में अपनी आहूति दे रहे हैं।

जब मैंने ऋषिकेश-धरासू मार्ग में नागिनी के निकट के कस्बे कुकरबागी के भरतू से सम्पर्क किया तो उन्होंने कहा कि रोड चौड़ीकरण में हमारी जमीन भी जा रही है। भरतू ने कहा कि मेरा मकान रोड से नजदीक होने के कारण इसकी जद में है। वह मुआवजा मिलने से इतने खुश नहीं है जितना घर उजड़ने से चिन्तित हैं। अधिकतर रोड चौड़ीकरण के निकटवर्ती गाँव वाले चिन्तित हैं क्योंकि काम से मिट्टी गिरने से खेत खराब हो रहे हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार की ज्यादा सम्भावना न होने के कारण यहाँ के युवा मैदानी क्षेत्रों में रोजगार हेतु पलायन करते हैं। वैसे भी जहाँ तक पर्वतीय कृषि का सवाल है तो वह पूर्णतः वर्षा पर आधारित है एवं कृषि उत्पादकता भी बहुत कम है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों में अच्छा खासा भू-भाग होने के बावजूद लोग रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ देते हैं। इसलिये कहा भी जाता है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती।

यदि हम वैश्विक स्तर पर बात करें तो अतिसंवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में वृहद स्तर का भूमि कटाव कम किया जा रहा है। साथ ही पर्यावरणरक्षी तकनीकी का भी पूर्ण प्रयोग किया जा रहा है, किन्तु इस ऑल वेदर रोड परियोजना के अन्तर्गत इस तरह की पर्यावरण रक्षक तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है, यह ज्ञात नहीं है। यह भी ज्ञात है कि पेड़ काटने के बाद भविष्य में जितने पेड़ काटे जाएँगे उससे कई गुना अधिक पेड़ अन्य क्षेत्रों में रोपित भी किये जाएँगे।

यह एक ज्ञात तथ्य है किन्तु किसी स्थान की पारिस्थितिकी एवं उसमें विभिन्न प्रकार के जंगली जानवरों, कीट पतंगों एवं सूक्ष्म जीवाणुओं का एसोसिएशन जो इकोलॉजी बनाता है, उसे बनने में हजारों वर्ष लगते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि आप किसी स्थान पर पाँच सौ पेड़ भी लगा दें तो भी आप उस नये स्थान की पारिस्थितिकी उन सौ पेड़ वाले स्थान की तरह नहीं बना सकते।

सर्वप्रथम नये स्थान पर लगाये पेड़ों को बड़े होने में समय लगेगा, उनके साथ सूक्ष्म जीवाणु एवं जंगली जानवरों का तालमेल बनने में समय लगेगा। नये पेड़ उस स्थान की मिट्टी व जल को संरक्षित करने में भी समय लेंगे लेकिन क्या ये पेड़ उस दूसरे स्थान पर उस तरह की प्राकृतिक पारिस्थितिकी बना पाएँगे? यह लाख टके का सवाल है। सौ पेड़ों को काटने में सौ मिनट भी नहीं लग रहे हैं किन्तु उन सौ पेड़ों ने जो पारिस्थितिकी बनाई है, उसको बनाने में हजारों वर्ष लगे होंगे। अतः एक सुनियोजित एवं सामंजस्य पूर्ण विकास एवं सोच की नितान्त आवश्यकता है।

उत्तराखण्ड में लगभग 889 किमी लम्बी सड़कों को इतना चौड़ा किया जा रहा है कि पहाड़ भी अपने लिये जगह नहीं बना पा रहे हैं अर्थात इतनी चौड़ी सड़कें संवेदनशील पहाड़ों पर उचित नहीं लगतीं।

कई पर्वतीय देशों में विकास हुए हैं। सड़क प्रभावित होती है। क्या यह आवश्यक है कि मैदानी क्षेत्रों की तरह पहाड़ों पर भी वाहन 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलें? मैं पहाड़ों पर रेल पहुँचाने का पक्षधर भी नहीं हूँ क्योंकि पहाड़ में रेल झटके का द्योतक हो सकती है, यातायात का नहीं। मैंने शिमला की कालका-शिमला रेल देखी है, वह यातायात के लिये कम व टूरिज्म के लिये अधिक जानी जाती है। पहाड़ों पर रेलमार्ग बनाने के लिये कई सुरंगों को बनाना होता है जो पहाड़ के निवासियों एवं पहाड़ की सेहत के लिये कदापि हितकर नहीं होगा।

आज इस क्षेत्र के लोग अपनी पहचान खो चुके हैं। यहाँ तक कि डूब क्षेत्र के निवासियों को पूर्णतः विस्थापित भी नहीं किया जा सका। खैर, विकास के लिये कुछ कुर्बानियाँ देनी होती हैं किन्तु यह जानते हुए भी कि टिहरी भूकम्प की दृष्टि से अति संवेदनशील क्षेत्र है और यह हाई रिस्क जोन 4 एवं 5 में आता है, इतने बड़े बाँध बनाने की ज्यादा जरूरत नहीं थी।

टिहरी डैम भागीरथी नदी पर बना है जो कि गंगोत्री से निकलती है एवं टिहरी में मिलंगना नदी में मिलती है। इस बाँध के बनने से टिहरी जनपद के सीमान्त जिले उत्तरकाशी के चिनियालीसौंन से लेकर टिहरी के धनसाली, थौलधार एवं समस्त प्रताप नगर ब्लॉक प्रभावित हुए हैं। इस क्षेत्र में बाँध से 42 वर्ग किलोमीटर की झील बनी हुई है। इस झील के बनने से यहाँ मौसम अकारण बदल जाता है। प्रताप नगर ब्लॉक के ग्राम भौन्याणा के 73 वर्षीय भवानी दत्त का कहना है कि यहाँ हम लोग पहले ही परेशान थे, टिहरी बाँध की झील बनने से हम अत्यन्त परेशान हो गये हैं। क्षेत्र जनपद टिहरी मुख्यालय से झील की वजह से पूर्णतः कट गया है। टिहरी बाँध में कितने वृक्षों ने अपनी आहूति दी है, इसका पूर्णतः आकलन मुश्किल है।

भू वैज्ञानिकों द्वारा उत्तराखण्ड को भूकम्प की दृष्टि से अति संवेदनशील बताया गया है। भू वैज्ञानिकों एवं भूकम्प विशेषज्ञों के अनुसार, इन हिमालयी क्षेत्रों में बड़े भूकम्प आने की आशंका है जो रिक्टर स्केल पर 8 तक का हो सकते हैं। ये भूकम्प 700 किमी तक के क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इतना ही नहीं उत्तराखण्ड की धरती पर बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण कर ऊर्जा प्रदेश बनाने की कल्पना पर्यावरण की दृष्टि से कितनी कारगर होगी, यह तो पता नहीं किन्तु भू-कटाव, भूक्षरण एवं पहाड़ वनस्पति विहीन एवं नंगे जरूर हो जाएँगे जो भविष्य में भयावह त्रासदी को न्यौता दे सकते हैं।

वर्तमान में उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़, चम्पावत एवं अल्मोड़ा जिलों के महाकाली नदी में पंचेश्वर बाँध प्रस्तावित है जिसकी जद में लगभग 134 गाँव आएँगे एवं प्रारम्भिक अवस्था में 1,583 हेक्टेयर वन भूमि वनस्पति सहित अपनी भेंट देगी। इस बाँध में भारत का 120 वर्ग किमी और नेपाल का 12 वर्ग किमी क्षेत्र आ रहा है। पंचेश्वर बाँध टिहरी बाँध से लगभग दोगुनी विद्युत क्षमता अर्थात 4,800 मेगावाट बिजली के लक्ष्य के साथ प्रस्तावित है। बाँध की ऊँचाई 311 मीटर होगी। अभी टिहरी बाँध का दंश कम नहीं हुआ कि पंचेश्वर बाँध का प्रस्ताव उत्तराखण्ड के संवेदनशील पर्यावरण को लीलने के लिये तैयार है।

(लेखक भोपाल स्थित भारतीय वन प्रबन्ध संस्थान में सहायक प्राध्यापक हैं)
 

 

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