विकास बनाम पर्यावरणीय सुरक्षा

Submitted by editorial on Fri, 12/21/2018 - 17:58
Source
ग्रीन सिग्नल्स, 2015

पर्यावरणीय बहस के पुनर्विन्यास की वकालत की है, केवल विकास बनाम पर्यावरण के द्वन्द्व से बचने भर की नहीं, बल्कि पर्यावरणीय मसलों को आजीविका, सुरक्षा की आवश्यकताओं, जनस्वास्थ्य, कृषि की पद्धति, जल की उपलब्धता और ऐसे अन्य मसलों के परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इस बात को थोड़ा दूसरे ढंग से रखें कि अगर आप वार्तालाप की मेज पर बैठे हैं तो आपको ऐसे अधिक लोगों की आवश्यकता होगी जो आपकी तरह सोचते हों और उन मसलों पर समान दिलचस्पी रखते हों जिनकी वकालत आप कर रहे हैं तब आपकी बातें सूनी जाएगी।

मैं इस विचार का हो गया हूँ कि ‘आर्थिक विकास बनाम पारिस्थितिकीय सुरक्षा’ की बहस में शामिल होने का कोई फायदा नहीं है। यह स्पष्ट है कि आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय सुरक्षा दोनों अच्छे हैं। इसके बजाय फोकस इस पर होना चाहिए कि विकास की रणनीति बनाने में पर्यावरणीय सरोकारों को समुचित महत्त्व देना कैसे सुनिश्चित किया जाये और पर्यावरणीय सरोकारों को समुचित महत्त्व देते हुए विकास की रणनीति कैसे बनाई जाये।

मैं मानता हूँ कि पर्यावरणीय सरोकारों को आर्थिक विकास के बराबर ऊँचे स्थान पर लाने की कोशिश में व्यक्ति को दार्शनिक ‘इसैया बर्लिन’ की लोमड़ी की तरह होना चाहिए, शाही की तरह नहीं। (लोमड़ी कई चीजें जानती है और चालाकी करती है, पर शाही एक चीज के अलावा कुछ नहीं जानता, उसी पर अड़ा रहता है) यह आमतौर पर मान लिया गया है कि पर्यावरणीय सरोकार महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसे देश जो अपने लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में लगा है, घने जंगलों को बचाना और कोयला तथा दूसरे खनिज पदार्थों को पहुँच से बाहर रखना आश्चर्यजनक या विकास-विरोधी लग सकता है। इसीलिये मैंने पर्यावरणीय बहस के पुनर्विन्यास की वकालत की है, केवल विकास बनाम पर्यावरण के द्वन्द्व से बचने भर की नहीं, बल्कि पर्यावरणीय मसलों को आजीविका, सुरक्षा की आवश्यकताओं, जनस्वास्थ्य, कृषि की पद्धति, जल की उपलब्धता और ऐसे अन्य मसलों के परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। इस बात को थोड़ा दूसरे ढंग से रखें कि अगर आप वार्तालाप की मेज पर बैठे हैं तो आपको ऐसे अधिक लोगों की आवश्यकता होगी जो आपकी तरह सोचते हों और उन मसलों पर समान दिलचस्पी रखते हों जिनकी वकालत आप कर रहे हैं तब आपकी बातें सूनी जाएगी। उन स्वरों को समन्वित करना आवश्यक है जो पर्यावरण, आजीविका, स्वास्थ्य और विकास रणनीति पर विश्वास रखते हों। पर्यावरण की बहस के आधार को व्यापक बनाते हुए इसका पुनर्विन्यास करना विकास की रणनीति को अधिक टिकाऊ रास्ते पर चलाने का सही ढंग है।

इस बहस का पुनर्विन्यास करना वास्तव में पर्यावरणीय मसलों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता को बल प्रदान कर सकता है, इसके बेहतरीन उदाहरण जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में मिलते हैं। भारत के अधिकांश शहरी क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता खराब है। यह कुछ हद तक वाहनों की आवाजाही में अत्यधिक बढ़ोत्तरी की वजह से है। खराब वायु की वजह से साँस की जटिल बीमारियों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इनके बीच के सम्बन्ध को समुचित शोध और महामारी से सम्बन्धित आँकड़ों के आधार पर स्थापित करके सार्वजनिक परिवहन को सुधारने के मामले को आगे बढ़ाया जा सकता है ताकि ईंधन के मानक और वाहनों के किफायती इस्तेमाल के लिये मानदण्ड तैयार किये जा सकें। यह सब वायु गुणवत्ता को उन्नत बनाने में सहायक होगा और इसका स्वास्थ्यगत प्रभाव बेहतर होगा।

खराब स्वास्थ्य का असर व्यक्ति की उत्पादनशीलता पर पड़ता है जो विकास की सम्भावनाओं को प्रभावित करता है। स्वास्थ्य की जटिल समस्याओं और कैंसर जैसी बीमारियों की अधिक घटनाओं का मतलब उत्पादनशील कार्यबल का नुकसान होना है। इसका मतलब है संसाधनों का विचलन जिनका साधारणतया कोई उत्पादनात्मक मूल्य नहीं रह जाता है। पर्यावरणीय प्रतिरक्षण और जन स्वास्थ्य के बीच सम्बन्ध एकदम स्पष्ट है, यही कारण है कि मैंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बीच साझेदारी बनाने की भरपूर कोशिश की, हालांकि यह नहीं हो सका।

इसी प्रकार, पर्यावरणीय सरोकारों को निश्चित तौर पर आजीविका के मसलों से जुड़ा होना चाहिए। बाँस को गैरकाष्ठ वनोपज घोषित करना और बाँस की बिक्री को नियंत्रित करने का अधिकार ग्रामीणों को सौंपना एक उदाहरण है कि किस तरह पर्यावरण प्रतिरक्षण के मसलों का तौर-तरीका बदला जाना चाहिए। मेढ़ालेखा के प्रयोग का सारतत्व यही है। इस तरह वन संरक्षण को आजीविका से जोड़ने और स्थानीय आबादी एवं वन अधिकारियों के बीच बेहतर सम्बन्ध बनाने के साथ ही हमने एक कैडर तैयार किया है जो वन और पर्यावरण के विनाश के खिलाफ पहली रक्षा पंक्ति होगी।

भूमिक्षरण कृषि उत्पादकता घटने का बुनियादी कारण होता है। जिस देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा हो, उसमें नीतियों के निर्माण के दौरान कृषि के अधिक पर्यावरण-हितैषी तौर-तरीकों को अपनाने की आवश्यकता या नदियों में पारिस्थितिकीय प्रवाह सुनिश्चित करने का सम्बन्ध कृषि उत्पादनशीलता से जोड़ना, भूजल और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के पर्यावरणीय पहलूओं का समाधान करने का अच्छा ढंग हो सकता है। आखिरकार भूजल के संरक्षण और पुनर्भरण की आवश्यकता या जलवायु परिवर्तन के मानसून पर प्रभाव को किसान से अधिक कौन समझ सकता है? पर्यावरण प्रतिरक्षण के प्रयासों में इन मसलों को केन्द्र में रखने की आवश्यकता है।

तौर-तरीकों में आये इस परिवर्तन के साथ निश्चित ही यह भी स्वीकार करना होगा कि हमें कई बार दूसरी अधिक महत्त्वपूर्ण चीजों को वरीयता देनी होगी। एक विचारणीय मुद्दा माओवाद प्रभावित इलाके में सार्वजनिक कार्य के लिये वन-अनुमति में रियायत करने का है। पर्यावरणीय मसलों के प्रति अनुराग सुरक्षा, संरक्षा और सबसे वंचित समुदायों के पास राज्य द्वारा बुनियादी सुविधाएँ पहुँचाने की आवश्यकता के आड़े नहीं आना चाहिए। मध्य भारत के वन क्षेत्रों में एक लम्बी पट्टी में राज्य की तकरीबन सम्पूर्ण अनुपस्थिति या विरोधात्मक भूमिका में उपस्थिति ने माओवादियों को मजबूत पकड़ बनाने का मौका दिया है। इन इलाकों में वन अनुमति के मानदण्डों में रियायत करने के मेरे निर्णय का मतलब वनों का विचलन करने की पूरी आजादी देना नहीं है। मानदण्डों में रियायत केवल सार्वजनिक अधिसंरचनाओं जैसे विद्यालय, अस्पताल और सड़कें बनाने के लिये दी गई है। सियांग नदी घाटी में प्रस्तावित परियोजना को अनुमति देने की प्रक्रिया तेज करने का मेरा फैसला भारत-चीन सीमा क्षेत्र में इसके सामरिक महत्त्व को देखते हुए था। भारत-चीन सीमा पर सड़क निर्माण की अनुमति देने को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। कहने का मतलब यह नहीं है कि इन मामलों में हमने पर्यावरणीय मसलों से कन्नी काट ली, बल्कि कई बार केवल दो प्रतियोगी वस्तुओं के बीच सन्तुलन बिठाने भर का मामला नहीं रह जाता, कुछ अन्य कारण भी होते हैं और तब एक तरह की बाजीगरी करनी होती है।

यह अध्याय उस तरीके को रेखांकित करता है जिसमें पर्यावरणीय बहस निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रासंगिक बना रहे। यह उन अप्रत्यक्ष बिन्दुओं पर भी रोशनी डालता है जिससे पर्यावरण प्रशासकों पर दबाव पड़ता है और वे विकास तथा पर्यावरण के बीच एकात्मक सम्बन्ध स्थापित करते हैं। यह पर्यावरणीय बहस के पुनर्विन्यास की अनिवार्यता को उजागर करता है। मेरा विश्वास है कि पर्यावरणीय प्रश्नों को उसके प्रभावों के माध्यम से देखना अधिक कारगर और शायद इकलौता रास्ता है जिससे हमारी विकास रणनीति में पर्यावरण को उचित स्थान मिलना सुनिश्चित हो सकता है।

शाही (हेडगेहॉग) और लोमड़ी (फॉक्स) का पुनरावलोकन: भारत में विकास बनाम पर्यावरण बहस पर कुछ और बातें-द लॉरेंस डाना पिंन्खम स्मारक व्याख्यान, एशियन कॉलेज आफ जर्नलिज्म (एसीजे), चेन्नई का दीक्षान्त समारोह, और विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस

3 मई 2011

आज शाम यहाँ आकर मुझे प्रसन्नता हुई है। यहाँ आने का निमंत्रण जब मुझे अपने मित्र श्री शशि कुमार से मिला। तब मेरे पास केवल एक ही सवाल था कि क्या मुझे दीक्षान्त समारोहों से जुड़ा वह महिमामय गाउन और विचित्र टोप पहनने के लिये कहा जाएगा? सामान्य पहनावे के बारे में आश्वस्त किये जाने पर मैंने सहज ही आमंत्रण स्वीकार कर लिया।

आज के इस आयोजन के तीन सिरे हैं जिसकी रिपोर्ट विकिलिक्स में की जा सकती है। इसमें तीन आयोजन मिले हुए हैं- एसीजे का दीक्षान्त समारोह, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस और द्वितीय लॉरेंस डाना पिन्खम स्मारक व्याख्यान। द हिन्दू एक विशाल संस्थान है जिसने निरन्तर हमारे ध्यान को खींचा है। एसीजे ने बहुत तेजी से दुर्जेय प्रतिष्ठा अर्जित कर ली। यह बात मैं उस नौजवान के पिता की हैसियत से कह रहा हूँ जिसने दो साल पहले एसीजे में नामांकन कराया लेकिन जल्दी ही महसूस कर लिया कि उसकी चाहत डॉन बनने की थी, लिखने वाला बनने की नहीं।

इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र साधारण सभा द्वारा घोषित विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की बीसवीं वर्षगाँठ है और आज हम खुले, उदार, लोकतांत्रिक समाज के एक स्तम्भ के रूप में स्वतंत्र मीडिया में अपना विश्वास व्यक्त करते हैं और उस स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। हालांकि नियमन के लिये यदा-कदा उकसावे भरे और जोरदार तर्क जरूर सामने आते रहे हैं, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये।

मैं प्रोफेसर पिन्खम को केवल उनकी प्रतिष्ठा से जानता हूँ और स्पष्ट रूप से वे महान विद्वान, अपने जीवन मूल्यों में सम्पूर्णतः प्रगतिशील थे, साथ ही न केवल अमरीका बल्कि भारत और चीन में भी रहे और काम किया। ऐसी विशिष्टता का दावा करने वाले बहुत से लोग नहीं होंगे-मिस्टर राम भी नहीं। प्रोफेसर पिन्खम के बारे में जानकारी जुटाने के क्रम में मुझे पता लगा कि वे हैरी डेक्स्टर ह्वाइट के दामाद थे जो जॉन मेयनार्ड कीन्स के साथ ब्रेटन वूड्स इंस्टीट्यूशन्स खासकर अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund, IMF) के जन्मदाता माने जाते हैं और उनकी भूमिका को कीन्स की आधिकारिक जीवनी के लेखक राबर्ट स्कीडेल्स्की ने खूबसूरत ढंग से चित्रित किया है। प्रोफेसर पिन्खम करीब चार दशक पहले मिस्टर राम के परामर्शदाता होने से प्रशंसा के पात्र हैं या निन्दा के, यह इस पर निर्भर करता है कि इसे आप किस तरह देखते हैं।2

बीसवीं सदी का एक बहुत ही प्रसिद्ध आलेख इसैया बर्लिन का ‘द हेडगेहॉग एंड फॉक्स’ है। विद्वान दार्शनिक ने ग्रीक कवि आर्चिलोकस की कविता का एक अंश उठाया ताकि इतिहास के बारे में टाल्सटॉय की दृष्टि की गहन पड़ताल कर सकें कि लोमड़ी कई चीजें जानती है, पर शाही एक बड़ी चीज जानता है। टॉल्सटाय की भारत में निश्चित तौर पर बहुत ही प्रासंगिकता है क्योंकि महात्मा गाँधी पर उनका अत्यधिक प्रभाव था। आज मैं इस रूपक का उपयोग अनियंत्रित आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बारे में मौजूदा बहस को स्पष्ट करने में करना चाहता हूँ। मैं मान लेता हूँ कि जानवरों के रूपकों की चर्चा, दैनिक स्तर पर वन्यजीवों के मसलों का सामना करने वाले मंत्री से ही की जा सकती है। संयोगवश, सकारात्मक और नकारात्मक आजादी के बीच का भेद तभी प्रासंगिक हुआ जब व्यक्तिगत और प्रेस की आजादी के बारे में सबसे पहले स्वयं बर्लिन ने 1958 में ऑक्सफोर्ड में एक व्याख्यानमाला के दौरान स्थापित किया।

मेरी बात एकदम सरल है- भारत को सकल घरेलू उत्पाद के उच्च विकास के हेडगेहॉग और किसी भी कीमत पर संरक्षण के हेडगेहॉग, दोनों से आजाद होने की जरूरत है। मैं अतिशयोक्ति नहीं कर रहा और मैं व्यंग्य भी नहीं कर रहा दोनों प्रकार के काँटेदार शाही (हेडगेहॉग) की आबादी बड़ी है। आप भले ही मुझसे असहमत हों फिर भी मैं कहूँगा कि ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है जो सार्वजनिक बहसों में बहुत प्रभावशाली है। भारत को शान्त लोमड़ी की जरूरत है, चतुर और चालाक ताकि उच्च विकास और टिकाऊ संरक्षण के बीच सन्तुलन हासिल किया जा सके। हेडगेहॉग वैचारिक धर्मयोद्धा होते हैं जिनका अपने लक्ष्य की सर्वोच्चता पर दृढ़ विश्वास होता है जबकि लोमड़ी सन्देह और अनिश्चितता को स्वीकार करेगी। हेडगेहॉग नहीं जानता कि दूसरे विचारों के प्रति रियायत कैसे की जाये, जबकि लोमड़ी भाषागत विशेषताओं का आजादी से इस्तेमाल करेगी-जैसे, हाँ लेकिन, हो सकता है, शायद इत्यादि। हेडगेहॉग का पैर एक्सीलेटर पर होता है जबकि लोमड़ी क्लच से काम लेती है, ट्रैफिक की स्थिति के अनुसार गियर बदलती रहती है।

मुझे गलत ढंग से मत समझें। हेडगेहॉग्स ने वास्तव ने बहुत योगदान किया है और लगातार कर रहे हैं। विज्ञान और साहित्य की दुनिया ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जिन्होंने एकाग्र भाव से अपने क्षेत्र में प्रसिद्धि के माउंट एवरेस्ट को प्राप्त किया है। इसके साथ ही मैं वास्तव में यह कहना चाहता हूँ कि आश्चर्यजनक विविधता वाले खुले समाज में नीति निर्माण के दौरान किसी एक बड़े विचार पर अड़ जाना अभिशाप है क्योंकि ऐसे विचार वास्तविक जीवन की जटिलताओं और अव्यवस्थाओं के प्रति उदासीन और असावधान होते हैं।3

जहाँ तक आर्थिक विकास का सवाल है, पर्यावरणवादी इसे कतई स्वीकार नहीं करेंगे। सही है कि विकास और कुशलक्षेम को मापने के पैमाने के तौर पर जीडीपी विकास दर की अपनी सीमाएँ हैं लेकिन हमारे पास उपलब्ध वही सर्वोत्तम पैमाना है। यह सम्पूर्ण नहीं है पर उपयोगी है और अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन को बताने का मोटा सूचक जरूर है। फिर हमें उच्च जीडीपी विकास दर को टिकाए रखने की परवाह क्यों करनी चाहिए? इस क्षेत्र में विकास दर वास्तविक अर्थों में कम-से-कम 8-9 प्रतिशत प्रतिवर्ष है-वह भी मूद्रास्फिति को समायोजित करने के बाद।

बात बेहद सरल है कि उच्च विकास दर सरकार को राजस्व पाने में सहायता करती है जिसका उपयोग अनिवार्य कार्यों में किया जा सकता है। इसीलिये 2004 और 2009 के बीच, वास्तविक औसत वार्षिक जीडीपी विकास दर 8.4 प्रतिशत होने से ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून की शुरुआत और कर्ज माफी सम्भव हो पाई। अधिक विकास का मतलब सरकार के लिये अधिक राजस्व होता है। उदाहरण के लिये 2005-6 और 2010-11 के बीच केवल पाँच वर्षों में केन्द्र सरकार की सकल कर-राजस्व दोगुनी हो गई। अधिक राजस्व आमदनी का मतलब कल्याण कार्यक्रमों पर अधिक खर्च होता है। मैं इस महत्त्वपूर्ण सवाल को कि राजस्व की राशि वास्तव में कितने कारगर ढंग से खर्च होती है, को अलग रखता हूँ।

उच्च जीडीपी विकास दर एक दूसरी आवश्यकता को भी पूरा करता है। यह रोजगार पैदा करता है बशर्ते विकास की संरचना श्रमोन्मुख हो। कुछ जानकारों का आकलन हैं कि भारत की श्रमशक्ति में इस दशक के दौरान 8 करोड़ से 11 करोड़ के बीच की बढ़ोत्तरी होगी जो चीन के डेढ़ करोड़ की तुलना में चौंका देने वाला है। भारत को चालीस प्रतिशत रोजगार कृषि क्षेत्र के बाहर, दूसरे क्षेत्रों में सृजित करना होगा अर्थात उद्योग और सेवा क्षेत्र में। इस जनसांख्यिकीय वास्तविकता को देखते हुए उच्च जीडीपी विकास दर खासकर कृषि और निर्माण के क्षेत्र के साथ ही पूरे देश के लिये विशेष महत्त्व रखता है।

उच्च जीडीपी विकास दर के लिये निवेश की जरूरत होती है, सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में। ये निवेश केवल तभी सम्भव हो सकेंगे जब नीतियों में स्पष्टता और अनुकूलता होगी। विकास के लिये उर्जा एक प्रमुख आवश्यकता है। लेकिन पर्यावरणवादी पनबिजली परियोजनाओं का विरोध पुनर्वास और पुनर्स्थापन के आधार पर करेंगे, कोयला परियोजनाओं का विरोध वन विनाश के आधार पर और परमाणु परियोजनाओं का विरोध जोखिम के आधार पर, तो भारत कैसे इतनी बिजली पैदा कर सकेगा जिससे उच्च जीडीपी विकास दर को बरकरार रखा जा सके। यह सोचना रूमानी गलतफहमी का चरम और खतरनाक भी है कि 120 करोड़ लोगों का यह देश बिजली की अपनी जरूरतों को सौर, पवन या बायोमास ऊर्जा के माध्यम से पूरा कर लेगा। लेकिन अधिकतर पर्यावरणवादी चाहते हैं कि हम इसी पर विश्वास करें।4

इसी तरह जहाँ तक पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्यता का सवाल है, विकास वाले इसे कतई स्वीकार नहीं करेंगे। विकास के अन्धविश्वासी अक्सर कहते हैं कि हम क्यों नहीं ‘अभी विकास और बाद में भुगतान’ की नीति अपना लें। मैं इसके चार कारण बताना चाहूँगा कि ऐसी नीति को क्यों नहीं अपनाया जा सकता। पहला, देश भर में फैले पर्यावरणीय अभियान और आन्दोलन लगातार आदिवासी और दूसरे वंचित समुदायों की आजीविका से जुड़े बुनियादी सरोकारों को अभिव्यक्त कर रहे हैं। दूसरा, वायु और जल प्रदूषण का जन स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रभाव एक राज्य के बाद दूसरे राज्य में दिखने लगा है। तीसरा, जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता है और यह भारत को किसी दूसरे देश से अधिक गम्भीर ढंग से प्रभावित करेगा क्योंकि भारत के अधिक जोखिमग्रस्त होने के कई आयाम हैं, जैसे-मानसून, तटीय क्षेत्र, वन और ग्लेशियर आदि। चौथा, हमें आगामी पीढ़ियों के लिये निश्चित तौर पर कुछ छोड़ जाना होगा क्योंकि दुनिया के अनेक हिस्सों के विपरीत भारत की आबादी बढ़ेगी और हम अपनी आबादी में इस शताब्दी के मध्य तक 40 से 50 करोड़ की बढ़ोत्तरी कर चुके होंगे।

अगर पर्यावरण-कार्यकर्ता सम्पदा निर्माण को विस्तार देने की अनिवार्यता को पूरी तरह नहीं समझते तो विकास के पक्षधर व्यापक पारिस्थितिकीय परिप्रेक्ष्य को नहीं देखते जिस पर विकास या कहें कि समूचे आर्थिक चक्र का अस्तित्व निर्भर करता है। वहीं मानवीय जीवन चक्र भी अनिवार्य रूप इसी पर निर्भर करता है। मोटे तौर पर उष्णकटिबन्धीय देश जहाँ वर्षा की मात्रा समान रूप से वितरीत नहीं हो और पानी का संग्रह करना और बचाना शहरों के साथ-साथ गाँवों के लिये भी महत्त्वपूर्ण है। भूमि संरक्षण को केन्द्रीय महत्त्व देने और उर्वर भूमि को उत्पादनशील बनाए रखने पर जोर देने की जरूरत है। पारिस्थितिकीय सेवाओं की पूरी शृंखला कम परिचित पर समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं जैसे मैंग्रोव्स या आर्द्रभूमि आदि। अगर विकास के चैम्पियन एक क्षण ठहरें तो बीसवीं शताब्दी के कई वायदे मतिभ्रम के तौर पर नजर आएँगे जब तकनीक और विकास के जोर ने प्रकृति को व्यर्थ ही नष्ट किया।5

 

मुझे जरूरत ऐसी पद्धति विकसित करने की थी जिसमें लागत और पर्यावरणीय प्रतिरक्षण के फायदों को जीडीपी की गणना में पूरी तरह एकीकृत किया जा सके। वास्तविक जीडीपी विकास दर 10 प्रतिशत वार्षिक होने का मतलब क्या है, अगर हम पर्यावरणीय क्षति की कीमत, प्राकृतिक संसाधनों में क्षरण और प्रदूषण का आकलन करें तो इस विकास का कुल निचोड़ क्या बचेगा? इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का वस्तुनिस्ठ ढंग से उत्तर देने का अकेला उपाय, विकास प्रक्रिया में पर्यावरणीय लागत की मात्रा स्पष्ट रूप से जान लेना है जो हरित राष्ट्रीय खाता का आकलन करने पर प्राप्त होगा।

 

 

इस प्रकार, यह स्वतः प्रमाणित और स्पष्ट होना चाहिए कि भारत को एक साथ दोनों दुनिया अर्थात उच्च जीडीपी विकास की दुनिया और पारिस्थितिकीय सुरक्षा की अर्थपूर्ण दुनिया की ओर पैर फैलाकर खड़ा होने की जरूरत है। लेकिन जो स्वतः प्रमाणित और स्पष्ट है उसे अक्सर भूला दिया जाता है। यही वह जगह है, जहाँ आप मीडिया वालों के विभिन्न प्रकार सामने आते हैं। हेडगेहॉग अपनी स्पष्टता और निश्चितता से अच्छी कॉपी तैयार करते हैं। लोमड़ी अपनी अस्पष्टता की वजह से ढंग से कॉपी तैयार नहीं कर पाते।

इस प्रकार मीडिया के कुछ हिस्सों में विकास-हेडगेहॉग्स नए भारत के चैम्पियन हैं जबकि पर्यावरण-हेडगेहॉग लुडिटस (19वीं शदी का वह अंग्रेज मजदूर जिसने श्रम में बचत करने वाली मशीन को यह सोचकर नष्ट कर दिया कि इससे बेरोजगारी फैलेगी) की तरह दुनिया में बड़ी शक्ति के तौर पर भारत के उभरने की सम्भावना को बर्बाद कर रहे हैं। कुछ दूसरे हिस्सों में पर्यावरण-हेडगेहॉग्स नायक हैं (और अक्सर नायिकाएँ भी) जो भारत को लूट और बर्बादी से बचा रहे हैं जबकि विकास-हेडगेहॉग्स विनाश और बर्बादी के अग्रदूत हैं। यह दिलचस्प है कि विकास-हेडगेहॉग्स की जयकार मोटे तौर पर अंग्रेजी मीडिया (खासकर जिन्हें पिंक पेपर कहा जाता है अर्थात आर्थिक अखबार) में होती है जबकि पर्यावरण-हेडगेहॉग्स को क्षेत्रीय और देशी मीडिया की शुभकामनाएँ मिलती हैं। यह विषय डॉक्टरेट की उपाधि लायक है, उससे कम नहीं।

वापस सन्तुलन के प्रश्न पर लौटें तो इसकी खूबी और इसकी आवश्यकता अपरिवर्तनीय है। हालांकि सन्तुलन कायम करने की बात करना आसान है पर ऐसा करना बहुत कठिन है। कई बार अनुकूल परिस्थितियों के मौजूद होने पर भी ऐसा करना कठिन हो जाता है क्योंकि समाधान विशेष परिस्थितियों और शर्तों के अन्तर्गत चाहिए होता है। लेकिन मैं महसूस करता हूँ कि अगर स्पष्टता और पारदर्शिता है तो अनुकूलता की कमी का आसानी से मुकाबला किया जा सकता है। मैंने सार-रूप में यही करने की कोशिश दो विशेष नवोन्मेषों के माध्यम से किया है।

पहला ‘मुखर आदेशों’ का व्यवहार करने के माध्यम से हुआ है। मेरे लिये यह कहना ठीक नहीं है कि मैं सफल हुआ या नहीं, पर इण्डियन एक्सप्रेस में प्रताप भानु मेहता ने 17 फरवरी 2011 को जो लिखा उससे मैं प्रोत्साहित जरूर हुआ। (यह अखबार विकास-हेडगेहॉग है, इसलिये अक्सर मेरे साथ मित्रवत नहीं रहता।)

‘‘मंत्रीमंडल को जयराम रमेश द्वारा प्रस्तुत अभ्यास को अपनाने की जरूरत है, जिसे ‘मुखर आदेश’ कहते हैं, उसके माध्यम से शासन चलाएँ। वे ऐसे आदेश हैं जो सार्वजनिक और स्पष्ट रूप से बताते हैं कि कोई खास निर्णय क्यों लिया गया। (इस पर बहस की जा सकती है कि कारण अपरिहार्य थे या नहीं)। लेकिन कम-से-कम सरकार इस जाल में नहीं फँसेगी कि किसने फैसला किया और क्यों किया?’’

पिछले दो वर्षों में मैंने सार्वजनिक विषयों पर ऐसे ‘मुखर आदेश’ दिये हैं जैसे-बीटी बैंगन, वेदान्ता, पोस्को, जैतापुर, नवी मुम्बई और आदर्श। मैंने इसे जनता के साथ संवाद करने के मध्यमार्ग के तौर पर देखा है हालांकि हर कोई इससे प्रसन्न नहीं है। लेकिन इस प्रक्रिया से गुजरे सभी मुद्दे सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं जिनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जा सकती है।

दूसरा नवाचार सार्वजनिक परामर्श की पद्धति है। इसकी शुरुआत बीटी बैंगन के मसले से हुई। आधे दिन के लिये आयोजित किये जाने वाले इन परामर्शों में हजारों लोग शरीक हुए। इन परामर्शों का आयोजन बंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता नागपुर, अहमदाबाद, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर में हुआ। फिर जब तटीय क्षेत्र नियमावली (Coastal Regulation Zone, CRZ) अधिसूचना 1991 का मसौदा दोबारा तैयार किया जा रहा था तब चेन्नई, पुरी, कोच्चि, गोवा और मुम्बई में सार्वजनिक बैठकें आयोजित हुईं। तीसरी बार मध्यमार्ग की खोज में मैं जब भारत दर्शन पर निकला उस समय ग्रीन इण्डिया मिशन को अन्तिम रूप दिया जा रहा था और गुवाहाटी, विशाखापट्टनम, देहरादून, मैसूर, पुणे, भोपाल और जयपुर में लोगों की राय ली गई थी। इन सभी सार्वजनिक परामर्शों का आयोजन अहमदाबाद स्थित सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (Centre for Environment Education) द्वारा किया गया था। साथ ही इन सभी कार्यवाहियों की विडियोग्राफी की गई थी जो मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध है। यह कमर तोड़ने वाली प्रक्रिया थी और कई बार सार्वजनिक परामर्श हाथ से निकल सकता था क्योंकि मैंने पाया कि हम भारतीय लोग बेहतरीन बोलने वाले होते हैं लेकिन बहुत खराब सूनने वाले। परन्तु बड़ी आबादी के साथ सम्पर्क स्थापित करने और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने का यह महत्त्वपूर्ण माध्यम था।

मुझे लगता है कि शायद स्वर्गीय प्रोफेसर नुरूल हसन ने एकबार कहा था कि भारतीय लोग अनूठे जनसमूह होते हैं, उन्हें जब पसन्द से चुनने का अवसर मिलता है तो दोनों को आजमाते हैं और दोनों रखना चाहते हैं। लेकिन ऐसे सुनहरे अवसर हमेशा उपलब्ध नहीं होंगे और मुझे भय है कि कई बार कठोर, अलोकप्रिय चुनाव करने होंगे। हमेशा परस्पर विरोधी उद्देश्यों के बीच सामंजस्य बिठाना सम्भव नहीं होगा। यही कारण है कि मेरा तरीका दुविधाओं को प्रकट कर देने और चुनाव सार्वजनिक नजरों के सामने करने का रहा है। यह तरीका कुछ समय के लिये काम करेगा। परन्तु मुझे जरूरत ऐसी पद्धति विकसित करने की थी जिसमें लागत और पर्यावरणीय प्रतिरक्षण के फायदों को जीडीपी की गणना में पूरी तरह एकीकृत किया जा सके। वास्तविक जीडीपी विकास दर 10 प्रतिशत वार्षिक (जो अब हमारी पहुँच में है) होने का मतलब क्या है, अगर हम पर्यावरणीय क्षति की कीमत, प्राकृतिक संसाधनों में क्षरण और प्रदूषण का आकलन करें तो इस विकास का कुल निचोड़ क्या बचेगा? इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का वस्तुनिस्ठ ढंग से उत्तर देने का अकेला उपाय, विकास प्रक्रिया में पर्यावरणीय लागत की मात्रा स्पष्ट रूप से जान लेना है जो हरित राष्ट्रीय खाता का आकलन करने पर प्राप्त होगा।

मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हम राष्ट्रीय हरित खाता तैयार करने हेतु एक कार्ययोजना विकसित करने के लिये विशेषज्ञ समूह का गठन कर रहे हैं ताकि भारत 2015 तक इस सन्दर्भ में जानकारी एकत्र करने में समर्थ हो सके। मैं कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सर पार्थ दासगुप्ता को इस समूह की अध्यक्षता करने के लिये राजी करने में सफल हुआ हूँ जो इस क्षेत्र में विश्व के दिग्गज विशेषज्ञ हैं। इनके अलावा समूह में दो अति प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री भी रहेंगे। इस ‘विशेषज्ञ समूह’ का काम तेज विकास और संरक्षण के बीच सन्तुलन कायम करने के लिहाज से बहुत ही महत्त्वपूर्ण होगा क्योंकि ‘जिसको हम माप नहीं सकते, उसकी निगरानी नहीं कर सकते और जिसकी हम निगरानी नहीं कर सकते, उसका प्रबन्धन नहीं कर सकते।6

सन्तुलन कायम करने की कोशिश (मैं स्वीकार करता हूँ कि मध्यमार्ग से भिन्न है) को भी नवाचारों की आवश्यकता होगी। पर्यावरणीय प्रतिरक्षण को निःसन्देह नियमावलियों की आवश्यकता होती है। उन नियमावलियों और कानूनों को समय के साथ तालमेल बिठाना पड़ेगा ताकि अद्वितीय जनसांख्यिकीय दबावों और विकासात्मक अनिवार्यताओं को प्रतिबिम्बित कर सकें। लेकिन क्या हम नियामवलियों को उन्हें लागू कराने वाले नियामकों के बगैर रख सकते हैं? अक्सर ये नियामक अनावश्यक परेशानी और भ्रष्टाचार के कारण बन जाते हैं। हमें निश्चित तौर पर रचनात्मक रूप से सोचना चाहिए। हालांकि विकास-हेडगेहॉग्स चाहेंगे कि नियमावलियाँ स्वयं समाप्त हो जाएँ या हल्की कर दी जाएँ या स्वप्रमाणन के लायक बना दी जाएँ। इनमें से किसी को स्वीकार नहीं किया जा सकता। पर्यावरण-हेडगेहॉग्स की पसन्द होगी कि नियमावलियों को लागू करने के लिये इंस्पेक्टरों की पूरी फौज हो।

नियमावलियों की बाजार-हितैषी पद्धति अपनाने की एक शुरुआत हुई है। मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट्स ऑफ टेक्नोलॉजी में कार्यरत विश्व के चार प्रमुख अर्थशास्त्रियों की सहायता से हमने तमिलनाडु, गुजरात, और महाराष्ट्र में वायु प्रदूषकों के लिये नियमावलियों को लागू करने की पायलट प्रोजेक्ट आरम्भ किया है। यह बाजार आधारित प्रणाली मोटे-तौर पर उसी तरह की है जिससे अमेरिका ने 1980 के आखिरी और 1990 के आरम्भिक वर्षों में अम्लीय वर्षा की समस्या का निपटारा करने के लिये बिक्री योग्य परमिट जारी किया था। यह अधिकार और नियंत्रण की परम्परागत इंस्पेक्टर राज प्रणाली से अलग है जिसकी जन्मगत सीमाओं से हम अवगत हैं। इन नवाचारी प्रणालियों में तकनीकों का प्रयोग किया जाता है और पर्यावरणीय कानूनों एवं नियमावलियों का बेहतर अनुपालन सुनिश्चित करने में बाजार का उपयोग किया जाता है। यह योजना, प्रदूषण नियंत्रण के हमारे तौर-तरीके को बुनियादी तौर पर बदल देगी। यह औद्योगिक इकाईयों के प्रदूषण भार की समयोचित ऑनलाइन निगरानी पर आधारित होगी जिसके आधार पर ‘उत्सर्जन-व्यापार’ की प्रणाली स्थापित की जाएगी। उत्सर्जन व्यापार नियामक, प्रदूषण की अधिकतम सीमा निर्धारित करने की सुविधा देगी और फिर प्रदूषण को उस सीमा से आगे बढ़ने नहीं देना सुनिश्चित करने के लिये स्व-नियंत्रित प्रणाली स्थापित करेगी।7

सन्तुलन कायम करने के प्रयास में बुनियादी संस्थागत परिवर्तनों की जरूरत भी होगी। द इंडियन एक्सप्रेस में 25 मार्च 2011 को जेरी राव को इसे कहना पड़ा। मैं उद्धृत करता हूँ:

‘‘ अनुमोदन करने के विवेकाधीन अधिकारों को जयराम रमेश अपने मंत्रालय से क्यों नहीं समाप्त कर देते और इसे स्वतंत्र पर्यावरण आयोग को सौंप देते जिसकी स्थापना वैधानिक रूप से की जाए और अनुमोदन प्रदान करने तथा उसकी निगरानी करने की जिम्मेवारी उस आयोग को सौंप दी जाये?.... यह देश के प्रति उनका अवदान होगा। नियंत्रण छोड़ने में श्री रमेश को राजनीतिक संस्थानों और नौकरशाही की ओर से प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। लेकिन अगर वे भारतीय इतिहास में शेरशाह, मुनरो या कर्जन की तरह दर्ज होना चाहते हैं तो यह सुनहरा अवसर है। उम्मीद करें कि वे इसे समझेंगे।

यह ठीक है पर मैं शेरशाह, मुनरो और कर्जन का जितना सम्मान करता हूँ मुझे कोई भ्रम नहीं है कि इन महान गुणवान लोगों का मामूली हिस्सा भी प्राप्त कर पाऊंगा। लेकिन एक मध्यकालीन सम्राट या दो शाही प्रशासकों में से कोई भी कैसे हमारे लोकतांत्रिक युग का रोल मॉडल हो सकता है? इसे लेकर भी मैं निश्चित नहीं हूँ। एक छोटी शुरुआत की जा रही है। हम अभी राष्ट्रीय पर्यावरण मूल्यांकन और निगरानी प्राधिकरण (National Environmental Appraisal and Monitoring Authority, NEAMA) की स्थापना करने की प्रक्रिया में हैं। यह पेशेवर विज्ञान आधारित स्वायत्त संस्था होगी जिसकी जिम्मेवारी पर्यावरणीय मूल्यांकन और अनुपालन की निगरानी करने की होगी। प्राधिकरण द्वारा मूल्यांकन के बाद उसकी सिफारिशों के साथ परियोजनाओं को अनुमोदन के लिये वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास भेजा जाएगा। अन्तिम अनुमोदन मंत्रालय द्वारा हो यह कार्यपालिका की जबाबदेही के सिद्धान्तों को बनाए रखने के लिये आवश्यक है। जेरी राव भले इसे पसन्द नहीं करें लेकिन जब संसद में अपने फैसलों को लेकर पर्यावरण मंत्री कठघरे में खड़े किए जाएँगे तो ‘एनईएएमए मेरे मातहत नहीं, पूरी तरह स्वतंत्र है’ जैसे तर्क देकर अपना बचाव नहीं कर सकेंगे। वैसे भी किसी राजनीतिक व्यक्ति के लिये चाहे वह उच्च सदन का सदस्य हो, सार्वजनिक उत्तरदायित्व का बोध रहता है जो विशुद्ध रूप से तकनीकी संस्था में नहीं रहता। मेरे ही मंत्रालय के अन्तर्गत जेनेटिक अभियंत्रण अनुमोदन समिति (Genetic Engineering Approval Committee GEAC) 2009 के पहले से ही कार्यरत है और उसके कामकाज का आकलन कर जेरी राव जैसे लोग मेरी बात स्वीकार करेंगे।

यह प्राधिकरण (एनईएएमए) कई मायनों में वर्तमान पद्धति (जिसमें मंत्रालय नई परियोजनाओं का मूल्यांकन और अनुमोदन करता है) में बड़ा सुधार करेगा। पहला, प्राधिकरण पूर्णकालीक पेशेवर संस्था होगी जिसमें पर्यावरणीय मूल्यांकन निरन्तर चलने वाली गतिविधि के तौर पर होगा, जबकि वर्तमान व्यवस्था में मूल्यांकन पर्यावरणीय मूल्यांकन समिति द्वारा की जाती है जो तदर्थ समिति है और महीने में एक बार बैठती है। इस मायने में प्राधिकरण धीमी ‘दलबद्ध’ प्रक्रिया को एक निरन्तर प्रक्रिया में बदल देगा, जिससे मूल्यांकन प्रक्रिया में अधिक कठोरता आएगी वहीं अनावश्यक विलम्ब से बचा जा सकेगा। दूसरा, प्राधिकरण के गठन से मूल्यांकन और अनुमोदन की प्रक्रिया के अलग-अलग होने से उत्पन्न ‘हितों के टकराव’ से बचा जा सकेगा। प्राधिकरण को नई परियोजनाओं के मूल्यांकन की जिम्मेवारी होगी जबकि मंत्रालय अन्तिम अनुमोदन के लिये जिम्मेवार होगा। तीसरा, प्राधिकरण देशव्यापी प्रदूषण-भार की अपनी समयोचित और समय आधारित आँकड़ा भण्डार तैयार रखेगा जिसका उपयोग प्रस्तावित परियोजना का मूल्यांकन करने के दौरान किया जाएगा जिससे परियोजना प्रस्तावक द्वारा दिए गए आँकड़ों पर निर्भरता समाप्त होगी। इससे मूल्यांकन प्रक्रिया में काफी वस्तुनिष्ठता आएगी। चौथा, प्राधिकरण के पास नई परियोजनाओं को पर्यावरणीय अनुमति देने के समय लगाई गई शर्तों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिये उपकरणों से सुसज्जित व्यवस्था होगी।8

मैंने पहले हेडगेहॉग्स की सराहना करने और लोमड़ियों को माफ कर देने में मीडिया की भूमिका के बारे में बोला है। वह इसीलिये कि आज की मीडिया सब कुछ साफ-साफ चाहती है। उसे सफेद और स्याह के बीच का भूरा क्षेत्र पसन्द नहीं। वह अस्पष्टता को लेकर लगातार अधीर और असहिष्णु होने लगी है। यह ढंग सार्वजनिक संवाद और बहस को बिगाड़ देता है और आसानी से समझौता करने एवं सहमति बनाने का अवसर नहीं देता। जैसाकि मैंने पहले उल्लेख किया है कि हेडगेहॉग्स अधिक तार्किक, मुखर और एक सरल एवं सहज शक्तिशाली सन्देश के वाहक होते हैं, इसलिये मीडिया द्वारा पसन्द किए जाते हैं। लेकिन लोमड़ी आत्मालोचक, सारग्राही चिंतक, अपने विश्वासों को अद्यतन करने या सुधार करने के लिये खुले होते हैं। वहीं, जब विपरीत साक्ष्य और विचारों का सामना होता है तो फिर से दुनिया को देखना-समझना चाहते हैं। हेडगेहॉग्स अपने एक ही अच्छे विचार को बढ़ाने में लगे रहते हैं और उनके पास केवल वही एक विचार होता है, लेकिन एक सीमा के बाद इस विस्तार का उलटा प्रभाव होने लगता है और टूटने की सीमा पर पहुँच जाता है।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि ‘सन्तुलन कायम करने का प्रयास’ आगे का इकलौता रास्ता है। इसका यह मतलब नहीं होना चाहिए कि हम इसे अस्वीकार करें कि ऐसे अवसर भी आ सकते हैं जब विकास और संरक्षण के लक्ष्यों के बीच समझौता की गुंजाइश ही नहीं रही। रोटी को खाते रहने और उसे बचाए रखने की कोशिश की सीमा होगी। किसी बेहद सघन वनक्षेत्र या टाइगर रिजर्व जैसे संरक्षित क्षेत्र के बीच में कोयला खदान का धमाका सीधे-सीधे अस्वीकार्य है और देश को इस अप्रिय वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। जब ऐसा होता है तो फैसला निश्चित तौर पर इस पक्ष या उस पक्ष को नाराज करता है। एक पक्ष की ओर से गुलदस्ते पेश किए जाते हैं तो दूसरे पक्ष की ओर से रोडे़-पत्थर फेंके जाते हैं। इसमें कोई अनुरूपता भी नहीं रहती। आज गुलदस्ता पेश करने वाला कल रोड़े-पत्थर फेंकने वाला बन सकता है और इसका उलटा भी हो सकता है।

बीस वर्ष पहले भारत ने ऐतिहासिक आर्थिक सुधार कार्यक्रम आरम्भ किया। इस कार्यक्रम के तीन स्तंभों में से एक वित्तीय टिकाऊपन था बाकी दो औद्योगिक लाइसेंसिंग को समाप्त करना और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्त करना था। आज जब हम आगामी दो दशकों की ओर देखेंगे तो हमें निश्चित रूप से न केवल वित्तीय समझदारी को देखना होगा बल्कि अपने विकास के प्रक्षेप-पथ में पारिस्थितिकीय टिकाऊपन पर भी समान ध्यान देना होगा। क्या 1 अप्रैल 2012 से आरम्भ हो रही बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत निर्धारित 9 प्रतिशत से अधिक जीडीपी का वास्तविक विकास दर का लक्ष्य पर्यावरणीय लिहाज से स्वीकार्य होगा? उदाहरण के लिये वह विकास हमारे वनों और हमारे जल संसाधन से अनिवार्य रूप से क्या लेगा? इन दिनों निम्न कार्बन रास्ता कहलाने वाले ढंग का बनना सुनिश्चित करने के लिये वह विकास क्या लेना चाहेगा? अगर 9 प्रतिशत से अधिक जीडीपी विकास दर को सुनिश्चित करने के लिये एक लाख मेगावाट बिजली निर्माण क्षमता में बढ़ोत्तरी करनी होगी तो उसका इंधन कैसा हो ताकि हम उन्हीं गलतियों को दुहराने से बच सकें जिसे अमेरिका और चीन कर चुके हैं? भारत की तरह सदा देर से आरम्भ करने वाले को यह सुविधा रहती है कि वह दूसरों की गलतियों से सीख सकता है।9

दीक्षान्त भाषण के अन्त मैं सोचता हूँ कि मुझे निश्चित रूप से आप सभी नौजवानों को ज्ञान के महानतम मंदिर (आय -जीवन के विश्वविद्यालय) के बारे में कुछ परामर्श देना चाहिए। मैंने आज जो कुछ कहा उसकी रोशनी में मैं जो सर्वोत्तम सलाह दे सकता हूँ, वह है कि बर्लिन को पढ़े। ‘हेडगेहॉग’ बनो, पर लोमड़ी की विशेषताएं विकसित करो। एक लोमड़ी को इसकी जरूरत नहीं होती कि कोई उसकी ओर देखें, जैसाकि हम अक्सर अपेक्षा करते हैं।

संयुक्त वन प्रबन्धन समितियों के कार्य और ग्रामसभाओं के बीच सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र।

29 अक्टूबर 2010

आप अच्छी तरह जानते हैं कि संयुक्त वन प्रबन्धन समितियों (Joint Forest Management Committees, JFMC) ने देश के विभिन्न राज्यों में वन संरक्षण, पुनर्सृजन और प्रबन्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

संयुक्त वन प्रबन्धन समितियों के कामकाज के बारे में विभिन्न हलकों में जताई गई चिंताओं को देखते हुए मैंने विकेन्द्रित प्रशासन के सन्दर्भ में विभिन्न हितधारकों के साथ विचार विमर्श किया है जो 1993 में हुए संविधान के 73 वें संशोधन द्वारा परिकल्पित और सम्मिलित पंचायत और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 (पेसा कानून 1996 ) से सम्बन्धित है।


इन विचार विमर्शों से कतिपय ठोस निष्कर्ष सामने आए :-

वर्तमान संयुक्त वन समितियों को अपना कामकाज ग्रामसभा की देखरेख में करना चाहिए और जहाँ जरूरत हो ग्रामसभा द्वारा नई संयुक्त समितियों का गठन किया जाना चाहिए।

संयुक्त वन समितियों को राज्य के पंचायती राज संस्थानों से सम्बन्धित कानूनों के अन्तर्गत ग्रामसभा का अंग माना जाएगा।

संयुक्त वन समितियों को संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में उल्लेखित आईटम 6 (सामाजिक वानिकी और कृषि वानिकी Social Forestry and Farm Forestry) और आईटम 7 (लघु वनोपज या Minor Forest Produce,MFP) के मामले में ग्राम पंचायत की स्थाई समिति के तौर पर कार्य करना चाहिए।

संयुक्त समितियों द्वारा विकास-कोष का उपयोग किस तरीके से होगा, इसका अनुमोदन ग्रामसभाओं को करना चाहिए।

मैं आपको यह पत्र पंचायती राज संस्थानों और संयुक्त वन प्रबन्धन समितियों से सम्बन्धित राज्य कानूनों, नियमावलियों और कार्यकारी आदेशों में राज्य सरकार द्वारा समुचित संशोधन करके उपयुक्त निष्कर्षों को समाहित करने में आपके सहयोग की अपेक्षा करते हुए लिख रहा हूँ।

बाँस को लघु वनोपज घोषित करने के सम्बन्ध में सभी मुख्यमंत्रियों, केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख, केन्द्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहुलावलिया को पत्र।

21 मार्च 2011

आपको याद होगा कि 29 अक्टूबर 2010 को मैंने संयुक्त वन प्रबन्धन समितियों (Joint Forest Management Committees, JFMC) के पुनर्गठन की आवश्यकता बताते हुए पत्र लिखा था ताकि इन्हें अधिक सहभागितापूर्ण और लोकतांत्रिक बनाने की कुछ हलकों में बनी सोच का समाधान किया जा सके। मैंने विशेष रूप से चार कार्यवाईयों को चिन्हित किया है...

मैं अब आपको बाँस को लघु वनोपज घोषित करने से जुड़े मामले के बारे में लिख रहा हूँ। आप भली-भांति जानते हैं कि बाँस परम्परागत रूप से भारत के अनेक वनवासी समुदायों की आजीविका का आधार रहा है और इसका बड़ा ही सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्त्व है। बाँस कारीगरों और दस्तकारों के लिये जरूरी कच्चा माल भी है और अनेक देशज दस्तकारी एवं कुटीर उद्योगों की बुनियाद है। बाँस के जंगल करीब 90 लाख हेक्टेयर में फैले हुए हैं और गरीबों को आजीविका प्रदान करने के अलावा यह अनेक पारिस्थितिकी-तंत्रों को स्थिरता प्रदान करने वाला महत्त्वूपर्ण कड़ी है। बाँस के जंगल वन्यजीवों के महत्त्वपूर्ण वासस्थल भी होते हैं। इसीलिये हमारे लिये बाँस के जंगलों के संरक्षण की व्यवस्था करना अनिवार्य है और इस महत्त्वपूर्ण संसाधन के टिकाऊ उपयोग एवं प्रबन्धन के लिये लोगों को सशक्त बनाने की जरूरत है।


लघु वनोपज के रूप में बाँस की कानूनी स्थिति:

अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (जिसे वनाधिकार कानून 2006 के नाम से भी जाना जाता है) ने ‘गाँव की सीमा के भीतर और बाहर परम्परागत रूप से संग्रह किए जाते रहे लघु वनोपजों का स्वामित्व, संग्रह करने, उपयोग करने और निस्तारण करने का अधिकार’ अनुसूचित जनजातियों और परम्परागत वन निवासियों को प्रदान किया है।

 

 

मैं समझता हूँ कि आप भी मेरे इस विचार से सहमत होंगे कि तत्काल हमें निश्चित तौर से अत्यधिक दोहन से बचना होगा। कटाई के प्रभाव की समीक्षा हर तीन साल पर की जानी चाहिए और बाँस की अतिशय कटाई को नियंत्रित करने के लिये कार्ययोजना एवं प्रबन्धन योजना में समुचित परिवर्तन किया जाना चाहिए। ऐसे अध्ययनों की एक प्रति वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा जाना चाहिए।

वनाधिकार कानून 2006 ने लघु वनोपजों की परिभाषा ‘सभी गैर-काष्ठ वनोपजों के तौर पर किया है’ जिसमें बाँस और उस तरह के दूसरे पौधे शामिल हैं। इन कानूनी प्रावधानों और अनेक समुदायों के जीवन एवं आजीविका में बाँस के महत्त्व को देखते हुए आपसे अपने-अपने राज्य के वन विभाग को यह निर्देश देने का अनुरोध है कि बाँस को लघु वनोपज माना जाये और वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत समुदायों को प्राप्त अधिकारों का सम्मान करें।

राज्य सरकारों के लिये अगला कदम:

राज्य सरकार और वन प्रशासन के लिये बाँस को लघु वनोपज स्वीकार करने के कई परिणाम होंगे। उन्हें नीचे दिया गया है:-

जिन इलाकों में वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत सामुदायिक वन संसाधन ( Community Forest Resource, CFR) के अधिकार मान्य और निहित कर दिए गए हैं।:

क. ग्रामसभा पारगमन अनुमति प्रदान करेगी: सामुदायिक वन संसाधन (वनाधिकार कानून 2006 के अन्तर्गत घोषित) और ग्रामीण वन (भारतीय वन अधिनियम 1927 के अन्तर्गत घोषित) के तौर पर अधिसूचित इलाके से लघु वनोपज के रूप में बाँस के लिये पारगमन अनुमति देने का अधिकार वन विभाग निश्चित तौर पर ग्राम सभाओं को सौंप देगा।

ख. बाँस की कटाई: स्थानीय समुदाय की वास्तविक जरूरत और आजीविका के लिये बाँस की कटाई की मात्रा का निर्धारण ग्राम सभा द्वारा किया जाएगा। ग्राम सभा, वन विभाग के परामर्श से बाँस की व्यावसायिक कटाई के बारे में प्रबन्धन योजना विकसित करेगी।

इलाके जिनमें सामुदायिक वनाधिकारों का दावा या निपटारा नहीं हुआ:

क. स्थानीय समुदायों के साथ साझीदारी: ऐसे इलाकों में वन विभाग स्थानीय समुदायों के साथ साझेदारी में बाँस की कटाई और टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करने के लिये प्रबन्धन योजना और कार्य योजना को तैयार और कार्यान्वयन करना जारी रखेगा।

ख. राजस्व में हिस्सेदारी: बाँस की फसल/प्रबन्धन से अर्जित सभी राजस्व को इलाके में निवास करने और अपनी आजीविका की वास्तविक जरूरतों के लिये उस जमीन पर निर्भर स्थानीय समुदाय के साथ बाँटा जाएगा।

ग. टिकाऊपन सुनिश्चित करना: हालांकि इन इलाकों में पारिस्थितिकी-तंत्र की पारिस्थितिकीय अखंडता को निश्चित तौर पर सुनिश्चित किया जाएगा और अन्य प्रासंगिक कानूनों का अनुपालन किया जाएगा।

अन्य:

क. गैर-वनभूमि/निजी भूमि:- ग्राम सभा ऐसी भूमि पर उपजे बाँस के लिये पारगमन अनुमति प्रदान करेगी।

ख. जिन राज्यों में बाँस कम या एकदम नहीं है:- उन राज्यों में बाँस की फसल उपजाने और परिवहन करने में उदारता बरतते हुए प्रबन्धन योजना तैयार करने और पारगमन अनुमति जारी करने के लिये ग्रामसभा को विकास प्राधिकार के तौर पर विकसित किया जाएगा।

मैं समझता हूँ कि आप भी मेरे इस विचार से सहमत होंगे कि तत्काल हमें निश्चित तौर से अत्यधिक दोहन से बचना होगा। कटाई के प्रभाव की समीक्षा हर तीन साल पर की जानी चाहिए और बाँस की अतिशय कटाई को नियंत्रित करने के लिये कार्ययोजना एवं प्रबन्धन योजना में समुचित परिवर्तन किया जाना चाहिए। ऐसे अध्ययनों की एक प्रति वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा जाना चाहिए।

सभी प्रबन्धन योजनाओं को पारदर्शी और सहभागीतापूर्ण ढंग से तैयार किया जाना चाहिए जो स्थानीय समुदाय के समझ के परे न हो। योजनाओं को स्थानीय सभा या समुदाय का अनुमोदन प्राप्त होना अनिवार्य है। प्रबन्धन योजना में कटाई-चक्र और वार्षिक कटाई क्षमता का संख्या के रूप में स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो सम्बन्धित ग्रामसभा की आवश्यकता के अनुसार विविध उपयोग की योजना तैयार की जानी चाहिए।

इसके अलावा, हमारी जानकारी में यह बात आयी है कि वन विभाग बाँस के आजीविका सम्बन्धी वास्तविक उपयोग का प्रमाण देने के लिये स्थानीय समुदाय को कहता है। मैं जानता हूँ आप भी सहमत होंगे कि यह आवश्यक नहीं है।

मुझे विश्वास है कि आप संयुक्त वन प्रबन्धन समिति के पुनर्गठन और बाँस को लघु वनोपज घोषित करने, दोनों मामलों में अपनी ओर से कार्रवाई आरम्भ करेंगे। आपकी ओर से आपके वन प्रशासन को स्पष्ट संकेत पहला कदम होगा और फिर राज्य के कानूनों एवं नियमावलियों में जरूरी संशोधन किए जा सकते हैं।

माओवादी प्रभाव का मुकाबला करने में मंत्रालय की पहलकदमियों के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

21 मई 2010

काफी समय से मैं सोच रहा हूँ कि माओवादी हिंसा का मुकाबला करने में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय कैसे सहायता कर सकता है। मैं आपका ध्यान तीन विशेष पहलकदमियों की ओर दिलाना चाहता हूँ जिन्हें पिछले कुछ महीनों में आरम्भ किया गया है।

पहला, गृहमंत्री को एक पत्र भेजा गया। केन्द्र सरकार ने वन विकास कार्यक्रमों के लिये सभी राज्यों को पांच वर्षों में पांच हजार करोड रूपए का विशेष अनुदान देने का फैसला किया है। हमने उग्रवाद प्रभावित राज्यों की एक बैठक बुलाई और उन राज्यों के उग्रवाद प्रभावित जिलों के लिये विशेष वन विकास योजना तैयार की। गृहमंत्री से मेरा अनुरोध है कि माओवाद विरोधी अभियानों की समीक्षा करने के दौरान इन योजनाओं को केन्द्रीकृत ढंग से कार्यान्वित करने के लिये राज्यों को प्रेरित करें। मैंने इस मामले में राज्यों से बात की है लेकिन गृहमंत्री भी यह करें तो इसका महत्त्व बढ़ेगा।

दूसरा, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय की संयुक्त समिति का गठन श्री एनसी सक्सेना की अध्यक्षता में किया गया है ताकि यह देख सकें कि वनाधिकार कानून 2006 के कार्यान्वयन में वन प्रशासन कैसे बेहतर सहायता कर सकता है। टिकाऊ वन संरक्षण और पुनर्सृजन में लोगों खासकर आदिवासियों को साझीदार बनाने का विचार है जिन्हें स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया गया है।

तीसरा, पंचायती राज मंत्री कांतिलाल भूरिया के साथ एक विस्तृत बैठक की गई जिसमें पंचायती राज संस्थाओं के निर्वाचित प्रतिनिधियों को खासकर पेसा क्षेत्रों में, वानिकी कार्यक्रमों का प्रत्यक्ष नियंत्रण सौंपने के तौर-तरीकों के बारे में विचार किया गया जैसाकि राजीव जी ने संविधान के 73 वें संशोधन और पेसा कानून में प्रस्थापित किया था। हमने कुछ प्रारम्भिक कार्रवाइयों के बारे में फैसला किया है।

आपने माओवादी हिंसा का मुकाबला करने के लिये दोहरा ढंग अपनाने की चर्चा की है। मुझे लगता है कि आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक चिंताओं का समाधान करने के बारे में आपने जो कुछ कहा है, उसके व्यावहारिक रूप को उपरोक्त तीन पहलकदमियाँ प्रस्तुत करती हैं।


लघु वनोपजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा के बारे में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया को पत्र

11अप्रैल 2011

पेसा कानून पर विचार करने के लिये हुई एक बैठक में जिसमें आप भी उपस्थिति थे, प्रधानमंत्री को दिए वचन का पालन करते हुए मैंने बाँस को लघु वनोपज घोषित करने के बारे में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है जिसकी एक प्रति पहले भी आपको भेज चुका हूँ।

अब मैं दूसरे मामले को निपटाना चाहता हूँ जो पेसा के बारे में प्रधानमंत्री की बैठक में बार-बार सामने आया, वह लघु वनोपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने के बारे में है। मैंने इस मसले पर योजना आयोग के सदस्य सचिव के साथ विचार विमर्श किया है और डॉ. टी हक से भी बात की है जो पंचायती राज मंत्रालय द्वारा अगस्त 2010 में गठित एक समिति के अध्यक्ष है और जल्दी ही अपनी रिपोर्ट सौंपने वाले हैं।


जो सहमति बनी वह निम्नलिखित हैं :-

प्रमुख लघु वनोपजों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price, MSP) निश्चित रूप से अधिसूचित होनी चाहिए जो आदिवासियों की आजीविका के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसे बारह लघु वनोपजों को चिन्हित किया गया-तेंदु, बाँस, महुआ फूल और बीज, सखुआ पत्ता और बीज, लाख, चिरौंजी, जंगली शहद, हर्रे, इमली, गोंद और करंज।

एक केन्द्रीय समिति को न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना चाहिए जो सभी राज्यों के लिये अनुकरणीय आधार होगा। राज्य इस आधार से अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर सकते हैं, पर उससे नीचे नहीं।

तेंदु और बाँस समेत सभी लघु वनोपजों की खरीद पर किसी भी प्रकार का एकाधिकार (राज्य की किसी एजेंसी समेत) को समाप्त किया जाना चाहिए।

लघु वनोपजों का व्यापार करने वाली राज्य की एजेंसियों को संग्रहकर्ताओं से सभी लघु वनोपज खरीदने के लिये प्रतिबद्ध होना चाहिए न कि केवल लाभकारी वनोपजों को खरीदना चाहिए। राज्य की एजेंसियों को उनके विपणन नेटवर्क को उल्लेखनीय ढंग से उन्नत भी बनाना चाहिए।

लघु वनोपजों के अवागमन में रूकावट पैदा करने वाली सभी अड़चनों को निश्चित रूप से दूर करना चाहिए।

लघु वनोपजों के प्रबन्धन और पुनर्सृजन में स्वतः सक्रिय भूमिका निभाने के लिये ग्रामसभाओं का निश्चित रूप से सशक्तिकरण करना चाहिए। ग्रामसभाओं की पूरी भागीदारी में वन पुनःसृजन की कार्ययोजना को निश्चित तौर पर बनाया जाना चाहिए।

लघु वनोपजों के संग्रह के बाद उनका मूल्य-संवर्द्धन अनिवार्य है। बुनियादी मूल्य संवर्द्धन ईकाइयों को गाँव के स्तर पर स्थापित किया जाना चाहिए।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय लघु वनोपजों के बारे में इस पहलकदमी को आगे बढ़ाने में पंचायती राज मंत्रालय, जनजातीय कल्याण मंत्रालय और योजना आयोग के साथ मिलकर काम करने के लिये बेहद उत्सुक है। इस पहलकदमी के आवश्यक होने पर वन प्रशासन में आन्तरिक सुधार को उच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाके में वन-अनुमति के मानकों में रियायत देने के बारे में पर्यावरण सचिव और वन महानिदेशक को नोट

28 अप्रैल 2011

योजना आयोग और गृह मंत्रालय द्वारा चिन्हित वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्रावधानों को ‘उदार’ बनाने के मामले पर काफी समय से चर्चा हो रही है। इन जिलों में सार्वजनिक अधिसंरचना परियोजनाओं के लिये वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अन्तर्गत आवेदन करने के बजाय राज्य सरकार द्वारा स्वयं अनुमति देने की सीमा को हमने पहले ही एक हेक्टेयर से बढ़ाकर दो हेक्टेयर कर दिया है।

इस विषय में कई मुख्यमंत्रियों ने मुझसे मुलाकात की है। गृहमंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और सदस्य सचिव ने भी मुझसे बात की है। कल मुझे गढ़चिरोली में राज्य सरकार द्वारा एक ज्ञापन दिया गया जहाँ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान और उनके वरीय सहकर्मी उपस्थित थे। अब मुझसे अनुरोध किया जा रहा है कि हम योजना आयोग और गृह मंत्रालय द्वारा चिन्हित 60 वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में सार्वजनिक अधिसंरचनात्मक परियोजनाओं (स्कूल, स्वास्थ्यकेन्द्र, पुलिस थाना और सुरक्षा परिसर, राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिये आवासीय परिसर, सड़क, पुल, छोटी सिंचाई परियोजनाओं) के लिये पांच हेक्टेयर वन भूमि को (वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अन्तर्गत आवेदन दिए बगैर) राज्य सरकारों द्वारा स्वयं अनुमति देने का अधिकार प्रदान कर दें।

इस नई छूट को प्रभावी बनाने के लिये आवश्यक प्रक्रियागत औपचारिकताओं को तेजी से पूरा किया जाए। जब औपचारिकताएं पूरी हो जाए तो मुझे सूचित किया जाए।


वामपंथी-उग्रवाद प्रभावित इलाकों में वन-अनुमति मानकों में छूट के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

11 मई 2011

मैं आपको यह सूचना देने के लिये लिख रहा हूँ कि हमने अभी-अभी गृह मंत्रालय और योजना आयोग द्वारा चिन्हित 60 वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अनुप्रयोग में बेहद उल्लेखनीय छूट प्रदान कर दी है।


अब हमने राज्य सरकारों को बिना केन्द्र सरकार या वन संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत अनुमति के लिये आवदेन दिए सभी प्रकार की भौतिक और सामाजिक अधिसंरचना परियोजनाओं के लिये पांच हेक्टेयर तक वन भूमि के विचलन करने का अधिकार दे दिया है। पहले यह सीमा 1 से 2 हेक्टेयर थी लेकिन अब स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, सड़क, पुल, कृषि विपणन केन्द्र, पुलिस और सूरक्षा परिसरों इत्यादि के लिये समान रूप से पांच हेक्टेयर तक सीमा बढ़ा दी गई है।


झारखंड के सारंडा वनक्षेत्र में जिंदल स्टील एवं पावर और जेएसडब्लू स्टील को खनन करने की अनुमति देने के बारे में वन सलाहकार समिति की सिफारिशों को लेकर प्रधानमंत्री को पत्र

(माओवाद प्रभावित जिले में समृद्ध सघन वनक्षेत्र में खनन की अनुमति देना स्थानीय लोगों के निकट पहुँचने और विकास पर केन्द्रित होकर माओवादी प्रभाव का मुकाबला करने के सरकारी प्रयासों के लिये नुकसानदेह साबित होगा। खासकर स्थानीय आबादी में खनन के खिलाफ जबरदस्त विरोध होने की वजह से क्योंकि इससे स्थानीय लोगों को कोई फायदा नहीं मिलने वाला। दोनों परियोजनाओं को निवेश के मामले में कैबिनेट कमिटी द्वारा मई 2013 में मंजूरी दी गई।)

6 फरवरी 2013

मैं सारंडा विकास योजना के कार्यान्वयन के बारे में आपको नियमित तौर पर सूचित करता रहा हूँ। इस विषय में पिछला पत्र 28 जनवरी 2013 को दीघा ग्राम पंचायत में 26 जनवरी को राष्ट्रीय ध्वज फहराने के बाद लिखा था। वहाँ इसका आयोजन करीब एक दशक बाद हो सका था। सांरडा में चुपचाप लेकिन बहुत ही प्रत्यक्ष परिवर्तन हो रहा है जिसकी दूसरे राज्यों के वैसे इलाकों के लिये भी प्रासंगिकता है।

अपने पहले के पत्रों में से एक दिनांक 3 जुलाई 2012 (जिसकी प्रति संलग्न है) के पत्र में मैंने आपका ध्यान उस प्रचार की ओर दिलाया था कि सारंडा विकास योजना केवल निजी खनन के हितों की पूर्ति के लिये है। मुझे इस प्रचार का खंडन करने और इस धारणा को दूर करने में काफी परेशानी हुई थी। अनेक लोग सहमत नहीं होते लेकिन मैं लगातार इस विषय पर बोलता रहा और कहता रहा कि इस समृद्ध वनक्षेत्र में खनन के लिये किसी नई संस्था को प्रवेश देने के खिलाफ जबरदस्त स्थानीय भावनाओं के प्रति हमारी सरकार संवेदनशील है।

इस सन्दर्भ में आज मुझे यह जानकर घोर निराशा हुई कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने लौह अयस्क के खनन के लिये सारंडा वन क्षेत्र में 512.43 हेक्टेयर वनभूमि के विचलन की अनुमति जिंदल स्टील एंड पावर को दी है और जेएसडब्लू स्टील को लौह अयस्क एवं मैगनीज अयस्क के खनन के लिये दूसरे 998.70 हेक्टेयर वनभूमि के विचलन की अनुमति दे दी है।

महोदय, मैं सोचता हूँ कि अगर इन अनुमतियों पर काम आगे बढ़ा तो मैं सारंडा विकास योजना में आगे किसी सफलता और उसके पूर्ण एवं उत्साहपूर्ण कार्यान्वयन में स्थानीय लोगों के सहयोग की गारंटी करने की स्थिति में नहीं होउंगा। आखिरकार यह भारत सरकार और झारखंड सरकार का निर्णय है लेकिन यह मेरी जिम्मेवारी बनती है कि इस निर्णय के गम्भीर हानिकारक प्रभावों को लेकर आपको सतर्क करूं जो केवल सारंडा में ही नहीं इस तरह की दूसरी जगहों पर भी होगा।


भारत-चीन सीमा पर सड़क निर्माण की अनुमति देने में पर्यावरण मंत्रालय के प्रयासों के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

10 जून 2010

मैं अरूणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर बहुत दिनों से लम्बित 63 सड़कों के निर्माण की अनुमति को लेकर रक्षा मंत्री के साथ निकट सम्पर्क में रहा।

वर्तमान तथ्यात्मक स्थिति निम्नलिखित है:- पिछले दो महीनों में 36 सड़कों के लिये अन्तिम अनुमति प्रदान कर दी गई है। 13 सड़कों को ‘सैद्धांतिक’ अनुमति दे दी गई है पर राज्य सरकार /या सीमा सड़क संगठन की ओर से अनुपालन रिपोर्ट की प्रतीक्षा है। आठ सड़कों के प्रस्ताव अभी तक राज्य सरकार/सीमा सड़क संगठन के पास लम्बित है। चार सड़कों का प्रस्ताव सीमा सड़क संगठन के पास लम्बित है।


सियांग नदी घाटी के सामरिक महत्त्व को देखते हुए इसके विकास के लिये पर्यावरणीय अनुमति को तीव्र गति प्रदान करने के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

14 अप्रैल 2010

कल मैं केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे की अध्यक्षता में हुई ‘पनबिजली परियोजनाओं पर कार्यबल’ की दूसरी बैठक में शामिल हुआ। योजना आयोग के उपाध्यक्ष, जल संसाधन मंत्री, ग्रामीण विकास मंत्री और मैं उपस्थित थे। उसमें विभिन्न राज्यों के बिजली मंत्री भी आए थे।

पूर्वोत्तर राज्यों की पनबिजली परियोजनाओं के बारे में विचार विमर्श के दौरान सचिव (जल संसाधन) ने एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण बात रखी जिसे मैंने पहली बार किसी को कहते सुना था। उन्होंने कहा कि चीन के साथ वार्तालापों में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिये हमें सियांग नदी पर पनबिजली परियोजनाओं को अत्यधिक प्राथमिकता देनी चाहिए। दूसरी नदियों जैसे सुबनसिरी और दिबाँग पर पनबिजली परियोजनाएं हैं पर एक अन्तराष्ट्रीय दृष्टिकोण से सियाँग घाटी की परियोजनाएं सामरिक महत्त्व की हैं। मैंने उनसे पूछा कि सियाँग की पनबिजली उत्पादन क्षमता कितनी है तो उन्होंने बताया कि इसे लगभग 20 हजार मेगावाट अनुमान किया जाता है। मेरे अधिक जोर देने पर उन्होंने बताया कि तीन खास परियोजनाएं चिन्हित की गई हैं जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 11 हजार मेगावाट है। हालांकि ये परियोजनाएं एकदम प्रारम्भिक अवस्था में हैं और उनपर काम आरम्भ करने के पहले हमें बहुत कुछ करना है।

स्पष्ट है कि हमें सियांग नदी घाटी की परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर अविलम्ब आरम्भ करना चाहिए। अगर इसके लिये अधिक आकर्षक पुनर्वास और पुनर्स्थापन पैकेज देना पड़े और अगर इसके लिये अरूणाचल प्रदेश सरकार को अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि देनी हो तब भी हमें तैयार होना चाहिए। हमें सियाँग घाटी की परियोजनाओं को निश्चित तौर पर एक राष्ट्रीय परियोजना के रूप में आरम्भ करना चाहिए। मैं उनके सामरिक महत्त्व को देखते हुए पर्यावरणीय और वन अनुमति की प्रक्रिया को विशेष महत्त्व देने के लिये तैयार हूँ।

इस पहलकदमी को जल्द आरम्भ करने के लिये प्रधानमंत्री के निजी हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी।


सियांग नदी घाटी का विकास करने में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा किए गए कार्यों के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

14 अक्टूबर 2010

अरूणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर पनबिजली परियोजनाओं के बारे में मैंने 14 अप्रैल 2010 को आपको एक नोट भेजा था। आगे हुई कार्रवाइयों के बारे में इस नोट के माध्यम से आपको बताना चाहता हूँ।

अनेक आपत्तियों को दूर करते हुए 2 अगस्त 2010 को मैंने 2,700 मेगावाट के लोअर सियाँग परियोजना के लिये पर्यावरणीय प्रभाव आँकलन (ईआईए) की कार्ययोजना (टीओआर) तैयार करने का अनुमोदन कर दिया जिसका कार्यान्वयन एक निजी कम्पनी करने वाली है।


आपत्तियों पर विचार करते हुए मैंने निम्नलिखित बातों को दर्ज किया है:

‘यह सामरिक दृष्टि से अतिशय महत्त्वपूर्ण परियोजना है जो ब्रहमपुत्र के पानी के मसले पर चीन के साथ वार्तालाप/सौदेबाजी में हमारी स्थिति को मजबूत करने के लिहाज से बहुत ही आवश्यक है। सियाँग पर ऐसी अन्य परियोजनाएं भी बनेगी। इस सम्भावना को ध्यान में रखते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को तेज कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिये स्वतः सक्रिय भूमिका निभाना चाहिए। कार्ययोजना के प्रारूप को जरूरी संशोधनों के बाद शीघ्र जारी किया जाएगा।’

कार्ययोजना को अनुमोदन देने का पत्र 3 अगस्त को कम्पनी को जारी कर दिया गया। मेरी समझ से यह तथ्य आपके ध्यान में लाना आवश्यक है कि कुछ लोगों द्वारा यह प्रचार आरम्भ किया गया है कि अरूणाचल प्रदेश में पनबिजली परियोजनाओं पर मेरा रूख राष्ट्र-हित को कमजोर कर रहा है। वास्तव में, मैं यह कहने की छूट लेना चाहता हूँ कि जो रूख मैंने अपनाया जिसका विवरण संलग्न नोट में होने के साथ साथ संचिका में भी दर्ज है, वह मैंने स्वयं अपनाया, उसके लिये मंत्रालय का कोई दबाव नहीं था।

ऊर्जा सुरक्षा के मामलों में विदेशी अन्तर-फलक का समन्वय करने के लिये वित्तमंत्री की अध्यक्षता में बने मंत्रीमंडलीय समूह की 8 जुलाई 2010 को हुई पहली बैठक में सियाँग नदी का मसला उठाने वाला मैं अकेला मंत्री था और इस पर बनने वाली परियोजनाओं को मैंने गति प्रदान की।

महेश्वर पनबिजली परियोजना के बारे में मुखर आदेश

6 मई 2011


वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 17 फरवरी 2010 को प्राप्त विभिन्न ज्ञापनों के जवाब में पर्यावरण (प्रतिरक्षण) अधिनियम (Environment Protection Act) 1986 की धारा 5 के अन्तर्गत श्री महेश्वर हाईड्रोइलेक्ट्रिक पावर कारपोरेशन लिमिटेड ( Shri Maheshwar Hydroelectric Power Corporation Limited, SMHPCL) को कारण बताओ नोटिस 1 जारी किया क्योंकि उसने मध्यप्रदेश में महेश्वर हाईड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट लगाने के लिये 1 मई 2001 को दी गई मूल पर्यावरण-अनुमति की विभिन्न शर्तों का अनुपालन नहीं किया था।

एसएमएचपीसीएल ने कारण बताओ नोटिस का जबाब 9 मार्च 2010 को दिया। एसएमएचपीसीएल के जबाब का विस्तृत छानबीन करने के बाद 23 अप्रैल 2010 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा कम्पनी को काम बन्द करने की नोटिस दी गई।

महेश्वर पनबिजली परियोजना में 27 गेट हैं जिनमें से 22 गेट बन गए है और 17 फरवरी 2010 के पहले ही कार्यरत हो चुके हैं। इनमें पंद्रह गेट दाहिने तट और सात बायें तट से सटे हैं। बाकी पांच गेट जिनका निर्माण काम बन्दी नोटिस की वजह से रूक गया है असल में बाँध और नदी के बीचों-बीच में हैं। बाँध के निर्माण के लिये अस्थाई इंतजाम के तौर पर एक कॉफर डैम का निर्माण पत्थरों और स्थानीय मिट्टी जैसी सामग्री से हुआ है।

 

 

मैंने एकबार फिर अपने पुराने फैसले को 4 जनवरी 2011 को दुहराया कि राहत एवं पुनर्वास कार्यों के योजना के अनुसार पूरा हो जाने की विश्वसनीय गारंटी के अभाव में काम बन्दी आदेश को हटाया नहीं जा सकता। मैंने यह उल्लेख भी किया कि फिर से काम आरम्भ होने का सम्बन्ध राहत एवं पुनर्वास कार्य में प्रगति से जोड़ा जाए क्योंकि राहत व पुनर्वास कार्यों में पहले ही बुरी तरह पिछड़ गई है।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 28 अप्रैल 2010 को काम बन्दी के आदेश का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। इस पत्र के प्रत्युत्तर में प्रधानमंत्री कार्यालय ने 7 मई 2010 को एक बैठक बुलाई जिसमें वन एवं पर्यावरण मंत्रालय 23 अप्रैल 2010 की काम बन्दी आदेश में सुधार करने पर राजी हो गया ताकि पहले से बन गए सात गेटों पर सुरक्षात्मक निर्माण कार्य हो सके। हालांकि कामबन्दी आदेश आखिरी पांच गेटों के निर्माण के सन्दर्भ में प्रभावी बना रहा जिन पर कोई निर्माण कार्य आरम्भ नहीं हुआ।

राज्य सरकार और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के बीच मई 2010 से दिसम्बर 2010 के दौरान अनेक पत्रों का आदान-प्रदान हुआ और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा समय-समय पर समीक्षा की गई क्योंकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और एक पूर्व मुख्यमंत्री दोनों परियोजना का काम आरम्भ होने में इस आधार पर बेहद दिलचस्पी ले रहे थे कि इससे न केवल बिजली का उत्पादन होगा बल्कि इंदौर एवं देवास शहरों में पेयजल की आपूर्ति भी हो सकेगी। मैं भी 19 मई 2010 को परियोजना प्रस्तावक से मिला।

22 दिसम्बर 2010 को मैंने काम बन्दी आदेश को वापस नहीं लेने का फैसला किया क्योंकि मैंने महसूस किया कि राहत और पुनर्वास कार्यों (आर एंड आर) में इस दौरान मामूली प्रगति हुई थी। पर्यावरणीय अनुमति में स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि राहत और पुनर्वास कार्य बाँध निर्माण के साथ-साथ चलेंगे। लेकिन इसके स्पष्ट प्रमाण थे कि इस शर्त का उल्लंघन किया गया। मैंने यह फैसला भी किया कि मध्यप्रदेश सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय को वचन दिया है कि राहत एवं पुनर्वास कार्य 31 मार्च 2011 तक पूरा कर लिया जाएगा, हमें कामबन्दी का आदेश हटाने के पहले उसका इंतजार करना चाहिए।

मुझे इस मामले की समीक्षा करने का दूसरा अवसर जल्दी ही मिला जब मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया और पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय से अग्रसारित होकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में आया। मैंने एकबार फिर अपने पुराने फैसले को 4 जनवरी 2011 को दुहराया कि राहत एवं पुनर्वास कार्यों के योजना के अनुसार पूरा हो जाने की विश्वसनीय गारंटी के अभाव में काम बन्दी आदेश को हटाया नहीं जा सकता। मैंने यह उल्लेख भी किया कि फिर से काम आरम्भ होने का सम्बन्ध राहत एवं पुनर्वास कार्य में प्रगति से जोड़ा जाए क्योंकि राहत व पुनर्वास कार्यों में पहले ही बुरी तरह पिछड़ गई है।

इसी बीच, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने 11 जनवरी 2011 को प्रधानमंत्री को दूसरा पत्र लिखा जिसे 31 जनवरी 2011 को मामले को जाँचने के अनुरोध के साथ वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को अग्रसारित कर दिया गया।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री 12 फरवरी 2011 को भोपाल में उपवास पर बैठ गए और उनके उपवास पर जाने के कारणों में एक महेश्वर पनबिजली परियोजना पर कामबन्दी आदेश को हटाने में कथित विलम्ब भी बताया गया।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उपवास वापस लेने के लिये मनाने में प्रधानमंत्री के आश्वासन के अनुसार योजना आयोग के सदस्य डॉ. मिहिर साह ने 18 फरवरी 2011 को उन मुद्दों पर बैठक की जिन्हें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उपवास के दौरान उठाए थे। इस बैठक के बाद आगे की कार्यवाही करते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के विशेष सचिव ने 21 फरवरी 2011 को मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा।

भारत सरकार के बिजली सचिव ने 17 फरवरी 2011 को वन एवं पर्यावरण सचिव को यह बताते हुए पत्र लिखा कि केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण की राय है कि बचे हुए पांच गेटों के निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए। अगले दिन बिजली मंत्री ने मुझसे कामबन्दी हटाने का अनुरोध करते हुए बात की क्योंकि बिजली की कमी वाले राज्य को 400 मेगावाट अपेक्षाकृत सस्ती बिजली मिल सकेगी।

मध्य प्रदेश सरकार ने 17 फरवरी 2011 को राहत एवं पुनर्वास के बारे में एक स्थिति रिपोर्ट भेजी और दावा किया कि 70 प्रतिशत राहत एवं पुनर्वास कार्य पूरा हो चुका है। मैं यह समझने में असमर्थ था कि राहत एवं पुनर्वास के 70 प्रतिशत होने का आँकड़ा कैसे बना जबकि राज्य सरकार ने इस पत्र में स्वयं स्वीकार किया था कि पूरी तरह डूबने वाले नौ गाँवों में से केवल एक को ही दूसरी विकसित जगह पर पुनर्स्थापित किया जा सका है। राज्य सरकार से उसकी गणना के बारे में स्पष्टीकरण माँगा गया। 13 अप्रैल 2011 को मैंने एकबार फिर दर्ज किया कि डूब क्षेत्र में आने वाले गाँवों की स्थिति के बारे में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना अधूरी है और राहत एवं पुनर्वास कार्य के 70 प्रतिशत पूरा होने की गणना विश्वास योग्य नहीं है, इसे देखते हुए पांच गेटों के निर्माण पर लगी रोक जारी रहेगी।

राहत एवं पुनर्वास की स्थिति के बारे में मुख्यमंत्री के स्तर से हुई समीक्षा के आधार पर तैयार दूसरी स्थिति रिपोर्ट 19 अप्रैल 2011 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को मिली।

परियोजना की सबसे ताजा समीक्षा प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा 2 मई 2011 को की गई। इस बैठक के बाद 4 मई 2011 को केन्द्रीय जल आयोग ने मंत्रालय को एक तकनीकी रिपोर्ट भेजी। इस रिपोर्ट में सीडब्लूसी ने बरसाती पानी के दबाव में कॉफर डैम के टूटने की स्थिति में वर्तमान में निर्मित गेटों को सम्भावित नुकसान से बचने के लिये बाकी पांच गेटों के निर्माण की सिफारिश की।

इस पृष्ठभूमि में मैं एकबार फिर महेश्वर पनबिजली परियोजना के बचे पांच गेटों के निर्माण पर काम-बन्दी आदेश की समीक्षा करने के लिये तैयार हुआ। बाइस गेटों का निर्माण हो चुका है। दूसरी ओर सीडब्लूसी की तकनीकी रिपोर्टें हैं। सीडब्लूसी की रिपोर्ट के साथ सीईए की रिपोर्ट इस निष्कर्ष को लेकर विशेष रूप से स्पष्ट है कि बाकी पांच गेटों का निर्माण बरसात के आगमन के पहले पूरा करना इंजीनियरिंग के लिहाज से आवश्यक है। दूसरी ओर राहत और पुनर्वास कार्यों में खराब प्रगति से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

जो लोग काम बन्दी आदेश को हटाने की वकालत कर रहे हैं उनका कहना है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को राहत एवं पुनर्वास कार्यों के बारे में कहने-सुनने का अधिकार नहीं है। मैं इससे एकदम सहमत नहीं हूँ। राहत एवं पुनर्वास कार्यों को बाँध निर्माण के साथ-साथ करने की शर्त मई 2010 की पर्यावरणीय अनुमति की प्रमुख शर्त थी और इस मसले की चिंता करना वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधिकार में है। इसे 1 मई 2010 की पर्यावरणीय अनुमति के पत्र में देखा जा सकता है।

मैं यहाँ एक वार्तालाप का उल्लेख करना चाहता हूँ जो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुझसे 16 अप्रैल 2011 को फोन पर की थी तब मैं पन्ना टाइगर रिजर्व के दौरे पर था। उन्होंने मुझे राहत एवं पुनर्वास कार्यों की धीमी प्रगति का कारण बताया कि परियोजना प्रभावित लोग सोचने लगे हैं कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के कठोर रवैये की वजह से बाँध परियोजना कभी पूरी नहीं होगी, इसलिये यहाँ से क्यों हटा जाए, मुख्यमंत्री के अनुसार लोगों का यही रूख है। पहले 19 मई 2010 को जब परियोजना प्रस्तावक ने मुझसे मुलाकात की थी, तब उन्होंने कहा था कि राहत एवं पुनर्वास कार्यों की धीमी प्रगति का मुख्य कारण स्थानीय नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा व्यवधानकारी रवैया अपनाना था।

इस प्रकार, इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए और केन्द्रीय जल आयोग के 4 मई 2011 की तकनीकी रिपोर्ट, राज्य सरकार द्वारा राहत एवं पुनर्वास कार्यों की मुख्यमंत्री द्वारा समीक्षा के बाद 19 अप्रैल 2011 को भेजी गई। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ 16 अप्रैल को मेरी बातचीत, केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण की 17 फरवरी 2010 की रिपोर्ट, उसके तुरन्त बाद केन्द्रीय बिजली मंत्री सुशील कुमार शिंदे के साथ मेरी बातचीत और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री एवं पूर्व मुख्यमंत्री समेत विभिन्न प्रमुख लोगों की ओर से प्रधानमंत्री को मिले ज्ञापनों के आलोक में बुलाई गई विभिन्न बैठकों में हुए फैसलों के मद्देनजर मेरे पास पांच बचे हुए गेटों के निर्माण पर लगे कामबन्दी आदेश को हटाने का फैसला करने के सिवा कोई उपाय नहीं था। हालांकि यह साफ़ तौर कहा गया था कि राहत एवं पुनर्वास कार्यों के सन्तोषजनक ढंग से पूरा होने तक इन गेटों को नीचे नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही जलाशय को 154 मीटर तक भरने का निर्णय राहत एवं पुनर्वास कार्यों के पूरा होने के बाद लिया जाएगा।

गिरनार वन्यजीव अभयारण्य में अम्बाजी मंदिर के पास रोपवे के निर्माण के बारे में मुखर आदेश

2 फरवरी 2011


जूनागढ़ में गिरनार वन्यजीव अभयारण्य के अन्दर भवनाथ तालेती से अम्बाजी मंदिर तक रोपवे के निर्माण का मामला बीते सालभर से वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास विचारार्थ लम्बित है। मेरी सलाह पर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Borad of Wildlife,NBWL) की स्थाई समिति की एक तकनीकी समूह ने 21-22 दिसम्बर 2010 को इस स्थल का भ्रमण किया। इस दो सदस्यीय समूह ने रोपवे के निर्माण के खिलाफ सिफारिश की क्योंकि यह स्थानीय ‘गिरनारी गिद्ध’ के विलुप्त होने का कारण बन सकता है जो वन्यजीव प्रतिरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 1 में दर्ज बेहद संकटग्रस्त प्राणी है। मैंने 27 जनवरी 2011 को व्यक्तिगत रूप से स्थल का भ्रमण किया। मैंने इस परियोजना के बारे में बंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (Bombay Natural History Society,BNHS) के साथ विस्तार से चर्चा की और राज्य सरकार के अधिकारियों के अलावा डॉ. दिव्यभानुसिंह चावड़ा और डॉ नीता शाह के साथ बातचीत की जिन्होंने स्थल-भ्रमण की व्यवस्था की थी और मैं जूनागढ़ में स्थानीय संगठनों एवं नागरिकों से भी मिला।

अपने अन्तिम फैसले का संकेत देने के पहले मुझे निश्चित तौर पर निम्नलिखित तथ्यों का उल्लेख करना चाहिए। रोपवे परियोजना सितंबर 1995 से अधर में लटकी हुई है। केन्द्र सरकार के अनुमोदन की आवश्यकता गिरनार आरक्षित वनक्षेत्र के मई 2008 में गिरनार वन्यजीव अभयारण्य घोषित किए जाने के बाद हुई। 1995 से 2008 के बीच के समय में राज्य सरकार परियोजना आरम्भ करना चाहती तो केन्द्र सरकार के अनुमोदन की कोई आवश्यकता नहीं थी।

गिरनार आरक्षित वनक्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करना स्वागतयोग्य कदम है। इससे गिर के शेरों को नया वासस्थल मिला है और गिरनार वन्यजीव अभयारण्य में अब बीस से पच्चीस शेर निवास कर रहे हैं, यह अभयारण्य लगभग 180 वर्ग किलोमीटर में फैला है।

गिरनारी गिद्धों की आबादी जिसपर रोपवे परियोजना का असर पड़ने वाला है, गुजरात में लम्बी-चोंच वाले गिद्धों की कुल आबादी की 20 से 25 प्रतिशत के बीच है, लेकिन राज्य में गिद्धों की कुल आबादी की 10 प्रतिशत से अधिक नहीं है।

हालांकि रोपवे के खिलाफ पर्यावरणीय आधार (बुनियादी तौर पर गिद्धों के वासस्थल पर प्रभाव को लेकर) पर मुझे अनेक ज्ञापन मिले हैं, लेकिन स्वयं मुझे रोपवे के निर्माण के पक्ष में मजबूत कारण दिखते हैं। यह गिरनार वन्यजीव अभयारण्य में मानव-जानवर संघर्ष (एक नई चिंता) की घटनाओं को न्यूनतम करेगा और यह रोजाना हजारों श्रद्धालुओं को गिरनार-शिखर पर स्थित मंदिर जाने का सुविधाजनक मार्ग प्रदान करेगा। इससे आने-जाने के लिये वर्तमान में प्रयुक्त होने वाले सामाजिक रूप से अस्वीकार्य माध्यम डोली के उपयोग पर भी रोक लग सकेगी।

इसे स्वीकार करते हुए कि रोपवे के पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क दिए जा सकते हैं और विभिन्न हितधारकों जिनमें डॉ दिव्यभानु सिंह चावड़ा और डॉ. नीता शाह और बीएचएनएस के डॉ असद रहमानी शामिल हैं, के साथ अपने विचार विमर्श के आधार पर मैंने निम्नलिखित कार्रवाई करने का फैसला किया।

सैद्धान्तिक तौर पर रोपवे परियोजना के निर्माण को अनुमोदन प्रदान की जा रही है बशर्ते निम्नलिखित छह खास शर्तों को पूरा किया जाए:-

गुजरात सरकार रोपवे परियोजना के वैकल्पिक मार्ग का अध्ययन कराएगी, खासकर दातर/भेषण की तरफ से होकर ताकि लम्बी-चोंच वाले गिद्धों और दूसरे वन्यजीवों के वासस्थल के बीचोंबीच से नहीं गुजरे और उनके घोंसला बनाने, बसेरा करने और विचरण करने में न्यूनतम अड़चन पैदा करे। इस अध्ययन की रिपोर्ट दो महीने के भीतर सौंपी जाएगी।

रोपवे के नौंवें और दसवें खंभे की उंचाई अधिक की जाए ताकि इस इलाके में गिद्धों के घोंसला बनाने की जगहों में कोई अड़चन उत्पन्न नहीं हो।

नौवें खंभे पर अत्याधुनिक कैमरा लगाया जाए जो गिद्धों की गतिविधियों पर नजर रखेगा और अगर जरूरत हो तो रोपवे के केबिनों की आवाजाही को इसतरह नियंत्रित किया जाएगा कि गिद्धों से टकराने के खतरे को टाला जा सके।

गिद्धों के लिये एक आहार-स्थल का निर्माण विशेषज्ञों की सलाह पर ऐसे उपयुक्त स्थान पर किया जाए जहाँ गिद्धों को पूरक आहार दिया जा सके और इसके माध्यम से गिद्धों की आवाजाही के रास्ते को रोपवे से दूर हटाने का प्रयास भी किया जाएगा।

रोपवे की टिकटों से होने वाली कुल आमदनी का दो प्रतिशत या पांच रूपए प्रति टिकट का सेस जो भी अधिक हो, लगाया जाएगा। सेस से हुई आमदनी को गिर शेर संरक्षण समिति को दिया जाएगा जिसे गिरनार वन्यजीव अभयारण्य के भीतर और आसपास लम्बी चोंच वाले गिद्धों का ध्यान रखते हुए संरक्षण से जुड़ी गतिविधियों पर खर्च किया जाएगा।

रोपवे परियोजना को मिली अनुमति की शर्तों के कार्यान्वयन की निगरानी करने और सुरक्षा इंतजामों के बारे में सलाह देने के लिये गुजरात सरकार के वन विभाग के अधिकारियों, स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों, बीएचएनएस, वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड फॅार नेचर के प्रतिनिधियों और विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया जाएगा।

जैसाकि वैधानिक प्रक्रिया है एनबीडब्लूएल की स्थाई समिति गुजरात सरकार द्वारा समर्पित रिपोर्ट के आधार पर अन्तिम निर्णय करेगी।

गरीबों का पर्यावरण विषय पर एशियन डेवलपमेंट बैंक द्वारा नई दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में वक्तव्य -‘‘गरीबों का पर्यावरण: टिकाऊ विकास को समावेशी बनाना’’

24 नवंबर 2010

मुझे प्रसन्नता है कि एशियन डेवलपमेंट बैंक (Asian Development Bank,ADB) ने इस सेमिनार का आयोजन ऐसे समय पर किया है जब इस देश में स्वयं पर्यावरणवाद पर गम्भीर राजनीतिक बहस चल रही है। एक तरफ वैसे लोग हैं जो विश्वास करते हैं कि पर्यावरणीय मसले वास्तव में मध्यवर्गीय आभिजात्य मनबहलाव है और इसका विकास की चुनौतियों से कोई सम्बन्ध नहीं है जिसका देश अभी सामना कर रहा है। दूसरी ओर अनेक ऐसे लोग हैं जो तर्क देंगे कि पर्यावरणीय आँदोलन का विकास या पर्यावरणीय जागरूकता जिसे हम आज देख रहे हैं, वह वास्तव में गरीबों का पर्यावरणवाद है और आज पर्यावरणीय मसले आजीविका पर संकट की वजह से प्रमुखता हासिल कर रहे हैं।

इसीलिये मैं सोचता हूँ कि इस तरह के बौद्धिक आयोजन में विश्व के विभिन्न हिस्सों में गरीबी, विकास की मुख्यधारा से जुड़े मामलों एवं पर्यावरणीय मसलों के बीच सम्बन्धों को लेकर हो रहे विश्लेषणात्मक कार्यों और विचारों को एक साथ लाना सामयिक और बेहद प्रासंगिक है। मैंने इस सम्मेलन में प्रस्तुत होने वाले कुछ आलेखों को देखा है और मुझे पूरा विश्वास है कि वे आलेख वर्तमान बहस का अधिक संवर्धन करेंगे।

पर्यावरणीय मसलों को गरीबी घटाने के कार्यक्रमों के अंग के रूप में मुख्यधारा में लाने की प्रक्रिया के तीन बहुत महत्त्वपूर्ण पहलू हैं जिनका ध्यान रखना जरूरी है। जलवायु परिवर्तन का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। जनस्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों का पहलू जिसकी अक्सर अनदेखी कर दी जाती है और जिसे अक्सर उतना महत्त्व नहीं मिल पता जितना मिलना चाहिए। मैं आज जो भी बोलने जा रहा हूँ, वह सब भारतीय अनुभवों के आधार पर है।

गरीबी-पर्यावरण-जलवायु का सम्बन्ध

सबसे पहले जलवायु परिवर्तन के पहलू की चर्चा करें और जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में पर्यावरण एवं गरीबी न्यूनीकरण के बीच के सम्बन्धों का विश्लेषण करें। भारत में अनेक हलकों में यह माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हम नहीं हैं, तो हमें इसके मद्देनजर स्वतः सक्रिय कार्रवाई क्यों करनी चाहिए? हमारी घरेलू कार्रवाईयाँ, अन्तर्राष्ट्रीय वार्तालापों में हमारी स्थिति से निर्धारित हुई हैं। हमने वास्तव में किसी आक्रामक घरेलू एजेंडा पर विचार नहीं किया है। हमें घरेलू एजेंडा की आवश्यकता ही क्यों है? यह बेहद महत्त्वपूर्ण प्रश्न है जिसे हमें पूछना होगा। कारण सरल है जो किसी के लिये स्पष्ट होना चाहिए कि दुनिया में दूसरा कोई देश नहीं है जो जलवायु परिवर्तन से भारत की तरह गम्भीरता से प्रभावित होने वाला है। अनेक देश जलवायु परिवर्तन से जोखिमग्रस्त जरूर हैं, लेकिन मैं नहीं सोचता कि दुनिया का कोई दूसरा देश भारत से अधिक जोखिमग्रस्त है। हम जोखिमग्रस्त होने के स्तर के बारे में कुछ बिन्दुओं पर विचार करें।

निःसन्देह मानसून पर हमारी निर्भरता है। यद्यपि अब हमारी जीडीपी का 18 प्रतिशत से भी कम हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है लेकिन इस तथ्य को स्वीकार करने से बचा नहीं जा सकता कि जीडीपी में उतार-चढ़ाव मानसून के मिजाज पर निर्भर करता है। बावजूद इसके कि अर्थव्यवस्था के विविधिकरण के मामले में हमने प्रभावशाली उपलब्धि प्राप्त की है। यह तथ्य है कि प्रत्येक तीन भारतीय में से दो आज भी आजीविका के लिये कृषि या कृषि से जुड़े व्यवसायों पर निर्भर हैं। इस प्रकार मानसून पर न केवल कृषि क्षेत्र में बल्कि अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में भी इसके अप्रत्यक्ष और गुणक प्रभावों के कारण असाधारण निर्भरता है। पिछले पचास वर्षों के आँकड़ों का एक विश्लेषण दिखाता है कि हमारी जीडीपी में 40-45 प्रतिशत उतार-चढ़ाव केवल मानसून में घट-बढ़ की वजह से हुए हैं इसीलिये मानसून महत्त्वपूर्ण है। मेरी समझ से मानसून की स्थिति शायद भारत में खुशहाली का अकेला सबसे बड़ा निर्णायक है।

जोखिमग्रस्त होने का दूसरा पहलू इस तथ्य से उत्पन्न होता है कि हमारी बहुत बड़ी आबादी तटीय क्षेत्रों में रहती है। हमारे पास बड़ा प्रायद्वीप है जिसके तटों पर लाखों की आबादी निवास करती है जिन्हें समुद्र का जलस्तर बढ़ने के मद्देनजर बेहद जोखिमग्रस्त कहा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन पर अन्तर-सरकारी समिति की रिपोर्ट के जिस पहलू को उल्लेखनीय रूप से चुनौती नहीं दी जा सकी है और जिसके साथ काफी मजबूत तर्क जुड़े हैं, वह यह है कि जलवायु परिवर्तन समुद्र के जलस्तर को प्रभावित कर रहा है। यह करीब-करीब अपरिवर्तनीय निष्कर्ष है। इसीलिये हम मालदीव, बांग्लादेश और इस तरह के दूसरे देश जो समुद्र स्तर से जोखिमग्रस्त है, को लेकर उतने ही चिंतित हैं। फिर भी यह तथ्य है कि कोई दूसरा देश उतना जोखिमग्रस्त नहीं है जितना भारत, खासकर प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या के लिहाज से। हमारी करीब 25 से 30 करोड आबादी बंगाल की खाड़ी में सुंदरवन से लेकर गुजरात के बीच समुद्र तट पर निवास करती है। मैं तकरीबन तेरह राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों और भारत की आबादी के बड़े हिस्से की चर्चा कर रहा हूँ।

 

 

 

 

जलवायु परिवर्तन से भारत का गहराई तक प्रभावित होने के तथ्य को स्वीकार करके ही आरम्भ करने की आवश्यकता है। इस प्रभाव के प्रति हमारी प्रतिक्रिया निश्चित रूप से अनुकूलन और न्यूनीकरण का मिलाजुला रूप होगी। यह न्यूनीकरण शब्द हाल तक भारत में निषिद्ध रहा है लेकिन यह यहाँ के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण है। हम प्रति व्यक्ति के रूप में बहुत कम उत्सर्जन करते हैं लेकिन विशुद्ध रूप में हम विश्व के चौथे सबसे बड़े उत्सर्जक हैं।

जोखिमग्रस्त होने का तीसरा पहलू जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालयी ग्लेशियरों पर होने वाले प्रभावों के बारे में पूर्वानुमानों से उत्पन्न होता है। इसके बारे में उपलब्ध साक्ष्य वास्तव में मिले-जुले हैं। मैं अपनी ओर से हिमालयी ग्लेशियरों के बारे में अनेक लोगों द्वारा फैलाई जाने वाली एकदम निराशाजनक बातों को पूरी-तरह स्वीकार नहीं करता। यह तो तथ्य है कि हिमालयी ग्लेशियरों की अवस्था गहरी चिंता का कारण है। अगर हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में से अधिकांश का पीछे हटना इसी तरह जारी रहा तो उत्तर भारत की नदियों में जल की उपलब्धता पर गम्भीर असर पड़ेगा जो भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश में निवास करने वाले लगभग सौ करोड लोगों की जीवनरेखा हैं।

आखिर में जोखिमग्रस्त होने का चौथा महत्त्वपूर्ण पहलू प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर हमारी निर्भरता है। यह तथ्य है कि भारत पिछले पांच वर्षों से 8-9 प्रतिशत जीडीपी विकास के दौर में है। हम उम्मीद करते हैं कि यह कम से कम अगले पंद्रह से बीस वर्षों तक जारी रहेगा जो हमारी खनिज सम्पदा के अधिक दोहन की अपेक्षा करता है। हम जैसे-जैसे अनुसन्धान कर रहे हैं हमारे वन क्षेत्रों में कोयला (जो बिजली उत्पादन के लिये अनिवार्य हैं) और दूसरे खनिज पदार्थों के भण्डार मिल रहे हैं। अतः हम जितना ज्यादा कोयला का उत्पादन करेंगे उतने ज्यादा वनों को नष्ट करेंगे और जितने अधिक जंगल नष्ट होंगें उतना ही अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होगा और पारिस्थितिकीय नुकसान भी होंगे।

मैं नहीं सोचता कि दुनिया में कोई दूसरा देश नहीं है जो जलवायु परिवर्तन से इतने प्रत्यक्ष और स्पष्ट रूप से विभिन्न आयामों पर प्रभावित होः-मानसून, समुद्री जलस्तर का बढ़ना, हिमालयी ग्लेशियरों का पीछे हटना और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की वजह से सम्भावित वन विनाश।

मैं सोचता हूँ कि जलवायु परिवर्तन से भारत का गहराई तक प्रभावित होने के तथ्य को स्वीकार करके ही आरम्भ करने की आवश्यकता है। इस प्रभाव के प्रति हमारी प्रतिक्रिया निश्चित रूप से अनुकूलन और न्यूनीकरण का मिलाजुला रूप होगी। यह न्यूनीकरण शब्द हाल तक भारत में निषिद्ध रहा है लेकिन यह यहाँ के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण है। हम प्रति व्यक्ति के रूप में बहुत कम उत्सर्जन करते हैं लेकिन विशुद्ध रूप में हम विश्व के चौथे सबसे बड़े उत्सर्जक हैं। चीन विश्व के कुल ग्रीनहाउस उत्सर्जन में 23 प्रतिशत की हिस्सेदारी करने की वजह से पहले स्थान पर है, अमेरिका उसे खदेड़ते हुए 22 प्रतिशत पर है तो यूरोपीय संघ करीब 13 प्रतिशत पर और भारत एवं रूस मोटे-तौर पर लगभग पांच प्रतिशत की हिस्सेदारी करते हैं। नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च (National Council of Applied Economic Research, NCAER) द्वारा संचालित एक मॉडलिंग अध्ययन ने कई गम्भीर तथ्यों को उजागर किया। उसने दिखाया कि विभाजक के सौ करोड़ से अधिक होने उसमें हर साल एक करोड़ की बढ़ोत्तरी होने से हमारा प्रति व्यक्ति के आधार पर उत्सर्जन हमेशा कम रहेगा। लेकिन अगर हमने इसी दर से उत्सर्जन करना जारी रखा तो 2030 तक हम विश्व के 8.5 से 9 प्रतिशत के बीच उत्सर्जन कर रहे होंगे। एक जिम्मेवार नागरिक होने की हैसियत से हमें चिंतित होना चाहिए और हमें कार्रवाई करना चाहिए। हमारी बढ़ती अन्तर्राष्ट्रीय भूमिका अपने साथ जिम्मेवारियों को भी ले आई है। इसका मतलब वार्तालापों में अपनी मजबूती को छोड़ देना नहीं है। इसका मतलब है कि आप दोनों पैरों पर चलें। आप अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरी मजबूती के साथ बातचीत करें पर घरेलू मोर्चे पर स्वतःसक्रिय ढंग से उल्लेखनीय नीतिगत कार्रवाई करें।

इसीलिये मैं सोचता हूँ कि जलवायु परिवर्तन पर्यावरणवाद और गरीबी न्यूनीकरण के बीच सम्बन्धों का एक पहलू है। यह एकदम स्पष्ट है कि हम जोखिमग्रस्त हैं और गरीब क्षेत्र एवं समुदाय इस जोखिम का बोझ सबसे अधिक वहन करेंगे। इसके लिये अनुकूलन की जरूरत होगी और कृषि में व्यापक निवेश होगा वहीं इनके प्रभावों के न्यूनीकरण के लिये भी उल्लेखनीय सत्तर पर निवेश की जरुरत होगी।

गरीबी-पर्यावरण-जनस्वास्थ्य का सम्बन्ध

अब मुझे पर्यावरण और गरीबी न्यूनीकरण के बीच इस सम्बन्ध के दूसरे पहलू की चर्चा करने की इजाजत दें जो जनस्वास्थ्य से जुड़ा है। मैं मानता हूँ कि पर्यावरणीय मसलों का जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की, इस देश में गम्भीर उपेक्षा की गई है। यही कारण है कि जब आप पर्यावरण की बात करते हैं तो आपको उस तरह की प्रतिध्वनि नहीं मिलती जिसकी आवश्यकता है। मैं जब अपने ‘विकास के हिमायती’ दोस्तों को कहता हूँ कि ‘क्या आप जानते हैं कि पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण मसला है,’ वे तुरन्त कह पड़ते हैं कि ‘क्या आप जानते हैं कि यह 9-10 प्रतिशत विकास दर अधिक महत्त्वपूर्ण है।’ जब मैं उनसे कहूँगा कि ‘पर्यावरण का ठीक से देखरेख नहीं करना भारतीय आबादी को दुर्बल बनाना है और यह विकास के दीर्घकालीन टिकाऊपन को कमजोर करना है।’ तब शायद मुझे बेहतर प्रतिक्रिया मिलेगी। मैं सोचता हूँ कि इस देश में पर्यावरण पर बहस के दौरान बदले हुए शब्दों का इस्तेमाल करने की जरूरत है। हमें इसे समुचित और स्पष्ट रूप से जनस्वास्थ्य के मसले के तौर पर प्रस्तुत करने की जरूरत है। यह कोई मार्केटिंग का जुमला नहीं है।

हमारे देश की कमजोरियों में एक प्रमुख है महामारियों का कोई मजबूत रिकार्ड नहीं रखना। विभिन्न संस्थानों और विशेषज्ञों से किस्सों के माध्यम से जितनी जानकारी हमें मिल पाती है, उसके आधार पर मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि परम्परागत पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के मामलों में बहुत ही निकट सम्बन्ध है। उदाहरण के लिये करीब पच्चीस वर्ष पहले भारत में सूचना तकनीक की राजधानी बंगलोर में सांस सम्बन्धी बीमारियों से ग्रस्त बच्चों का अनुपात 10 प्रतिशत से कम था। लेकिन आज आँकड़े बताते हैं कि बंगलोर की करीब 30 प्रतिशत आबादी दमा या दूसरी सांस सम्बन्धी बीमारियों का शिकार है। पंजाब का समृद्ध कृषि क्षेत्र भटिण्डा आज कैंसर के एक प्रमुख केन्द्र के रूप में उभरा है। इसका कारण प्रत्यक्ष रूप से भूमि क्षरण है और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण जल में मिलावट एवं जल प्रदूषण है। इसीलिये आप वास्तव में जब अनेक आर्थिक गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों की ओर देखेंगे चाहे वह कृषि हो या उद्योग से जुड़े हों आप पाएंगे कि जनस्वास्थ्य पर इनका काफी गम्भीर प्रभाव है। मेरी नजर में ऊँचे विकास दर को लम्बे समय तक जारी रखने की हमारी क्षमता के सामने यह गम्भीर अवरोध साबित होगा। भारतीय गरीबी के बारे में ड्यूक यूनिवर्सिटी के अनिरुद्ध कृष्णा ने बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है जो हाल ही में प्रकाशित हुआ है। अनिरूद्ध भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं और लम्बे समय से ड्यूक युनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। उन्होंने भारतीय गरीबी का एक सर्वाधिक समन्वित विश्लेषण किया है। अपने विश्लेषण (जो एक दशक से अधिक समय तक फैला है) में उन्होंने एक जबरदस्त निष्कर्ष की पुष्टि की है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च परिवार के गरीब होने का एक प्राथमिक कारक है। स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करना, स्वास्थ्य पर खर्च करने में असमर्थ होना या इसके लिये कर्ज लेना गरीबी में धकेलता है। आज बहुत ही ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं जो बताते हैं कि भारत में ग्रामीण कर्जखोरी का मुख्य कारण स्वास्थ्य पर खर्च है। मैं अतिश्योक्ति कर सकता हूँ लेकिन कम से कम मेरी समझ से स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च की बहुत बड़ी मात्रा पर्यावरण से सम्बन्धित है। इसीलिये मेरा दृढ़ मत है कि अगर हम पर्यावरण को जनस्वास्थ्य से जुड़े मसले के तौर पर देखने के लिये लोगों को राजी करा पाये तो हम विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण को एकीकृत करने और मुख्यधारा में लाने में काफी हद तक सफल हो सकेंगे।

गरीबी-पर्यावरण-प्राकृतिक संसाधन का सम्बन्ध

अब मुझे तीसरे मसले पर आने दें जो प्राकृतिक संसाधनों का मसला है। मैंने पर्यावरण की चर्चा जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में की, जनस्वास्थ्य के सन्दर्भ में की, अब मुझे प्राकृतिक संसाधनों के सन्दर्भ में पर्यावरण की चर्चा करने दें। यह पूरी तरह स्पष्ट है कि आगामी दो दशकों या उससे भी ज्यादा समय तक विकास दर को 8-9 प्रतिशत पर टिकाए रखने का हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर उल्लेखनीय प्रभाव होगा। इसका हमारे कोयला पर, वानिकी पर, जल पर और जमीन पर उल्लेखनीय प्रभाव होगा जैसाकि मैंने पहले उल्लेख किया है। इन प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ ढंग से उपयोग करने की हमारी योग्यता विकास का प्राथमिक निर्धारक होने जा रही है।

भारत की आर्थिक प्रगति को उर्जा प्रदान करने के लिये आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों में अधिकांश हमारे वनक्षेत्रों में स्थित हैं। इन वनक्षेत्रों में अधिकांश हमारे देश के गरीब क्षेत्रों में स्थित हैं। हमारे देश के छह सौ जिलों में से 188 जिलों में आदिवासी आबादी बहुत ही उल्लेखनीय संख्या में है, उन्हीं में हमारे वनक्षेत्रों के लगभग 60 प्रतिशत हैं । इस प्रकार गरीबी, वन, आदिवासी आबादी, प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और इसके साथ ही सामाजिक हिंसा के बीच निकट सम्बन्ध है। यह एक मजबूत अन्तर-सम्बन्ध है। इसीलिये हमें इस पहलू की ओर देखना और इसका निपटारा करना होगा।

गरीबी: एक पारिस्थितिकीय परिघटना

एडीबी के उपाध्यक्ष ने गरीबी में पर्यावरणीय कारकों की भूमिका के बारे में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बयान दिया है। वास्तव में यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण मसला है जिसने कई वर्षों से हमारा ध्यान खींचा है। हमने शैक्षणिक गरीबी को देखा है और स्वास्थ्यगत गरीबी को देखा है, हम गरीबी का आँकलन मुख्यतौर पर उपभोग की गरीबी के रूप में करते हैं और एनसीएईआर आय की गरीबी का अध्ययन करती है। लेकिन पारिस्थितिकीय गरीबी या यह धारणा कि गरीबी पारिस्थितिकीय कारकों से उत्पन्न हो सकती है, बेहद महत्त्वपूर्ण विचार है जिसे हमें ठीक से देखने की आवश्यकता है। अपने अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि भारत के अनेक हिस्सों में गरीबी का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारण भूमि-क्षरण है। भूमि-क्षरण कई तरह के पर्यावरणीय कारणों से हो सकता है- कुछ प्राकृतिक, कुछ मानव निर्मित। यदि भूमि-क्षरण को रोक दिया जाए, तो हमें गरीबी के स्तर पर नाटकीय प्रभाव दिखेगा।

इसका एक बहुत ही सुंदर उदाहरण उत्तर प्रदेश में क्षारीय मिट्टी को सुधारने की विश्वबैंक की एक बेहद सफल परियोजना है। उत्तर प्रदेश के मध्यवर्ती इलाके में छोटे किसान मुख्यतः निम्नजातियों के किसान है जो समाज के कमजोर और उपेक्षित वर्गों से आते हैं। यह इलाका वास्तव में भारत की गरीबी का कटोरा है और किसान जिस जमीन पर खेती करते हैं, उससे कम उपज मिलने के कारण अत्यंत कठिनाई में होते हैं। यह जमीन मोटेतौर पर बंजर और क्षारीय है। क्षारीय भूमि को सुधारने के लिये विश्वबैंक की यह परियोजना 1990 के दशक में बनी। मैं कह सकता हूँ कि उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा इस इकलौते अति महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप से सुधर गया जिससे भूमि से उपज बढ़ गई, खासकर उन छोटे खेतों की जिसमें समाज के कमजोर वर्गों के छोटे किसान खेती करते हैं।

पारिस्थितिकीय गरीबी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है और इसपर समुचित ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें बहुत ही व्यवस्थित तरीके से उन हस्तक्षेपों का निर्धारण करना चाहिए जो सुनिश्चित कर सकें कि पारिस्थितिकीय कारक गरीबी के स्तर को अधिक तीखा नहीं बना सकें। वास्तव में भारत में अनेक नागरिक संगठनों ने जलछाजन विकास परियोजनाओं, जल-संरक्षण, वर्षाजल संचयन और कृषिगत कार्यों में जल के बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग के बारे में बहुत ही सफलतापूर्वक काम किया है, इन सभी का गरीबी के स्तर पर बेहद उल्लेखनीय प्रभाव हुआ है।

मैं इस पर जोर देना चाहता हूँ कि मेरे लिये पर्यावरणवाद केवल गरीबों के पर्यावरणवाद के रूप में ही अर्थपूर्ण है। हालांकि जीवन शैलीगत पर्यावरणीय मसले भी हैं पर हम जिसे लेकर चिंतित हैं वह अधिकांशतः आजीविका सम्बन्धी पर्यावरणीय मसला है। और मैं सोचता हूँ कि अगर हम पर्यावरण को जलवायु परिवर्तन, जनस्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के सन्दर्भ में देखें तो हम पर्यावरणवाद और गरीबी के बीच के सम्बन्ध को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। अपने देश में पर्यावरणीय बहसों को फिर से पारिभाषित करने की आवश्यकता सचमुच है क्योंकि आज अनेक लोगों द्वारा पर्यावरण संरक्षण को विकास में अड़चन के रूप में देखा जाता है।

समूची बहस ‘‘संरक्षण बनाम विकास’, पर्यावरण बनाम विकास’ है। मैं सोचता हूँ कि यह निरर्थक बहस है और अगर इसे इसी शैली में किया जाए तो इस बहस में पर्यावरण कतई जीत नहीं सकता क्योंकि कौन 9 प्रतिशत आर्थिक विकास के खिलाफ हो सकता है? इसलिये हमें पर्यावरण पर बहस की शब्दावली को फिर से पारिभाषित करने की जरूरत है और इसे गरीबी न्यूनीकरण की भाषा में देखने की आवश्यकता है। यह निश्चित तौर पर आगे की ओर बढ़ा बड़ा कदम साबित होगा। मैं इस सम्बन्ध को अधिक कार्यकारी विषयवस्तु प्रदान करने में एडीबी और एनसीएईआर के साथ काम करने और इसे मुख्यधारा के राजनीतिक विचार विमर्श का हिस्सा बनाने के लिये उत्सुक हूँ।


टिप्पणियाँ:-

कारण बताओ नोटिस की एक प्रति, कारण बताओ नोटिस का जबाब, काम बन्दी आदेश, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक पत्र और संशोधित काम बन्दी आदेश को मुखर आदेश के साथ ही सार्वजनिक कर दिया गया।

 

 

 

 

 

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जयराम रमेशजयराम रमेशजयराम रमेश, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय का प्रभार सम्भालने के पूर्व भी पर्यावरण से जुड़े मुद्दों में रुचि रखते थे। मंत्री बनने के बाद उनमें पर्यावरण से सम्बन्धित मुद्दों के प्रति सजगता में उत्तरोत्तर इजाफा होता रहा, यही वजह है कि वे पर्यावरणीय मसलों से सम्बन्धित विश्व की कई नामी-गिरामी संस्थाओं से जुड़े रहे।

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