आर्थिक विकास और पारिस्थितिकीय सुरक्षा का द्वन्द

Submitted by editorial on Thu, 01/17/2019 - 17:28
Source
ग्रीन सिग्नल्स, 2015

एक तरफ उद्योग और विकास परियोजनाओं के लिये अधिक वन क्षेत्र के विचलन का दबाव और दूसरी तरफ वन क्षेत्र को बढ़ाने का लक्ष्य। वन क्षेत्र में विकास के बजाय मैंने क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों सेहत सुधारने पर जोर देने को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। मेरे अनुसार नए वन क्षेत्रों के विकास के असम्भव और अव्यवहारिक लक्ष्य को हासिल करने में ऊर्जा बर्बाद करने की बजाय वनों की गुणवत्ता को सुधारने का प्रयास करना बेहतर था। यह ग्रीन इंडिया मिशन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।

पर्यावरण मंत्रालय का मतलब केवल विभिन्न प्रकार की अनुमतियाँ थी। ऐसा कुछ हद तक बड़ी परियोजनाओं से सम्बन्धित पर्यावरणीय उल्लंघनों के खिलाफ मेरे द्वारा की गयी कार्रवाई को व्यापक प्रचार मिलने की वजह से हुआ था। मंत्रालय को महज परियोजनाओं को अनुमति देने या नहीं देने में समेट देने से इसकी छवि लाइसेंस राज की पुनर्रावृत्ति करने वाले के रूप में बन गई। पर्यावरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा, आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले योजनाओं का मामला-दर-मामला या नीतिगत आधार पर मूल्यांकन करने से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।

अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के पहले 1970 के साथ ही 1980 के दशक में पर्यावरण और पारिस्थितिकीय सुरक्षा मोटे तौर पर वन्यजीव और वनों पर केन्द्रित थी। परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इसमें बदलाव आया है। अब पर्यावरण मंत्रालय अनुमतियों पर पूर्व की तुलना में और अधिक केंद्रित हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता की वजह से मंत्रालय ने वायु प्रदूषण जैसे मसलों पर ध्यान देना आरम्भ कर दिया है। मेरा प्रयास इन सभी विषयों के बीच संतुलन कायम करने का था। पारिस्थितिकीय सुरक्षा की चर्चा करना निरर्थक होगा अगर वनों, नदियों, झीलों, आर्द्रभूमि और दूसरे जल क्षेत्रों की अवस्था पर विचार नहीं करें जिसका 40 प्रतिशत हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया है। मेरी समझ से इसका कोई मतलब नहीं है कि हम केवल बाघों पर ध्यान दें और हाथियों या गैंड़ों को भूल जाएं जो शिकारियों की वजह से उतने ही जोखिमग्रस्त हैं। इस तथ्य को भी नजरअन्दाज कर दें कि घड़ियाल या गंगा में पाए जाने वाले डॉल्फिन जोखिमग्रस्त हैं।

यह जोखिम आबादी का दबाव बढ़ने के साथ अधिक गम्भीर हुआ है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मैं एक महत्त्वपूर्ण बदलाव लाना चाहता था जो देश के 33 प्रतिशत इलाके को वन क्षेत्र के अन्तर्गत लाने के लक्ष्य में नयापन लाने से सम्बन्धित था। वह ऐसा विचार था जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं था। एक तरफ उद्योग और विकास परियोजनाओं के लिये अधिक वन क्षेत्र के विचलन का दबाव और दूसरी तरफ वन क्षेत्र को बढ़ाने का लक्ष्य। वन क्षेत्र में विकास के बजाय मैंने क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों सेहत सुधारने पर जोर देने को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया। मेरे अनुसार नए वन क्षेत्रों के विकास के असम्भव और अव्यवहारिक लक्ष्य को हासिल करने में ऊर्जा बर्बाद करने की बजाय वनों की गुणवत्ता को सुधारने का प्रयास करना बेहतर था। यह ग्रीन इंडिया मिशन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा था। वनों की गुणवत्ता सुधारने का मतलब उनकी कार्बन अवशोषण क्षमता को और भी बेहतर बनाना था जो अर्थव्यवस्था में विकास के साथ बढ़ने वाले कार्बन उत्सर्जन से निपटने में भी सहायक होता। जैव-विविधता से सम्पन्न वनों का संरक्षण करने के अनेक फायदे हैं। यह हमारी विरासत को बचाने के अतिरिक्त हमारी प्राकृतिक सम्पदा में योगदान करते हैं। वहीं, पहुँच एवं लाभ के बँटवारे की व्यवस्था के अन्तर्गत उन इलाकों में निवास करने वाले समुदायों की आजीविका को बेहतर बनाने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

बाघ पर काफी ध्यान देने और फोकस होने के बावजूद यह संकटग्रस्त प्राणी बना हुआ है। हमलावर केवल शिकारी ही नहीं हैं। तेजी से विकास करने की हमारी चाहत ने बाघों सहित दूसरे जानवरों के निवास स्थलों को संकट में डाल दिया है। किसी देश का प्राकृतिक स्वास्थ्य मोटे तौर पर इसके वनों और वन्यजीवों के स्वास्थ्य से निर्धारित होता है। इसीलिये मैं चीता के पुनरोत्थान के लिये उत्सुक था जो वास्तव में इकलौता चौपाया है जो भारत में विलुप्त हो गया है। मेरे प्रयासों के बावजूद भी इस प्रकल्प को आरम्भ नहीं किया जा सका और मेरा कुछ ‘बाघ बहादूरों’ से सीधा टकराव हो गया। मेरे पर्यावरण मंत्रालय छोड़ने के बहुत बाद में सुप्रीम कोर्ट ने चीता के पुनरोत्थान के विचार को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि भारत को मौजूदा वन्यजीवों के संरक्षण पर अधिक ध्यान देना चाहिए। चीता के पुनरोत्थान के लिये मेरी तत्परता को इससे झटका लगा।

दूसरी प्रजातियों पर ध्यान देने के लिये मैंने महेश रंगराजन की अध्यक्षता में एलिफैंट टास्कफोर्स (Elephant Taskforce) का गठन किया ताकि उनके संरक्षण के लिये योजना बनाई जा सके। हाथियों की बड़ी संख्या में मौत के लिये रेलवे, खासकर उत्तर बंगाल जैसे कुछ इलाके जिम्मेवार हैं। मानवीय गतिविधियों के बढ़ने से जानवरों के साथ संघर्ष की घटनायें बढ़ी हैं। कई बार इसका परिणाम दर्दनाक हुआ है जैसे उत्तर बंगाल में तेज गति की ट्रेन से टकराकर सात हाथियों की मौत हो गई। उस घटना के बाद मैंने रेल मंत्रालय और पश्चिम बंगाल सरकार के साथ मिलकर मौत की ऐसी घटनाओं को कम करने के लिहाज से कुछ उपाय किये।

पर्यावरण किसी भी देश में एक जटिल मसला होता है लेकिन भारत में यह जटिलता कुछ अधिक ही है। बड़ा आकार, परस्पर विपरीत अपेक्षायें, विभिन्न प्रकार के अभावों और तेज आर्थिक विकास की आवश्यकता इसके कारण हैं। पर्यावरण मंत्री होने के नाते मुझे बाजीगरों से अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता थी क्योंकि एक ही समय में कई गेंद हवा में उछल रहे थे। समस्याओं के आकार और उनसे जुड़ी जटिलताओं को देखते हुए यह कठिन और बेवकूफी भरी उम्मीद होती कि सारी समस्याओं का समाधान कोई एक संस्था अर्थात वन एवं पर्यावरण मंत्रालय कर लेगा। यह आवश्यक था कि सभी हितधारकों को एक साथ लाया जाए और उन्हें पारिस्थितिकीय सुरक्षा की खोज में लगाया जाए। यह भी आवश्यक था कि संस्थानों और साझीदारों के मामले में नवाचारी हुआ जाए। मुझे पर्यावरण को प्रभावित करने और उसके सामने आने वाली समस्याओं को सुलझाने में अमेरिकी राजनीतिक अर्थशास्त्री स्व. एलिनर ओस्ट्रोम (अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार पाने वाली अकेली महिला) द्वारा प्रस्तुत ‘बहु-केन्द्रित’ पद्धति अपनाने से काफी मदद मिली।

इस सिद्धांत का बोध हो जाना कुछ हद तक राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (National Ganga River Basin Authority) के गठन का कारण बना। हमने गंगा को स्वच्छ बनाने के लिये 1980 के दशक से ही काफी रकम खर्च किया लेकिन इसका मामूली प्रभाव पड़ा। बेहतर परिणाम पाने के लिये बहु-हितधारक संस्था बनाई गई जिसमें गंगा घाटी के राज्य, नागरिक संगठन और विशेषज्ञों को रखा गया। गंगा में अपरिष्कृत मल-जल और दूषित औद्योगिक जल के प्रवाह को कम करने के लिये हर राज्य में कार्रवाई करना आवश्यक था। साथ ही गंगा को एक नदी-प्रणाली के रूप में देखने की आवश्यकता भी थी जो वास्तव में वह है। जलस्रोतों का स्वास्थ्य सुधारने के लिये अनेक दूसरे उपाय किये गए जिसमें झीलों के संरक्षण पर ध्यान देना, आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबन्धन नियमावली की अधिसूचना जारी करना शामिल हैं।

राज्य सरकारों, नागरिक संगठनों और अकादमिक लोगों को जोड़ना ही पर्याप्त नहीं था। उद्योग और बाजार को भी पारिस्थितिकीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयासों का हिस्सा बनाना जरूरी था। वायु प्रदूषण का सामना करने के लिये बाजार-आधारित व्यवस्था को इस्थर डुफलो (Esther Duflo) के नेतृत्व में हावर्ड यूनिवर्सिटी के मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Massachusetts Institute of Technology,MIT) की टीम ने इजाद किया, जो पर्यावरणीय मसलों का समाधान करने के लिये बाजार की ताकत का इस्तेमाल करने का एक सफल उदाहरण है।

मैं अच्छी तरह जानता था कि पारिस्थितिकीय सुरक्षा के मसले को सुलझाने का कोई प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक इसके केन्द्र में आम लोगों को नहीं रखा जाए। प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा के लिये आवश्यक साझेदारियाँ तभी कारगर होती हैं जब इससे लोगों के हित जुड़े हों, चाहे वह गैरकाष्ठ वनोपजों का संग्रह करना हो या छोटा कारोबार चलाना। पर्यावरणीय क्षति का मुकाबला करने से जुड़े प्रयासों के केन्द्र में लोगों को रखना आवश्यक है, चाहे वह वनों में अतिक्रमण का मसला हो या वन्यजीवों के वासस्थलों के घटने का मामला। इसके लिये अक्सर मैं पर्यावरण की संकीर्ण परिभाषा से परे गया, चाहे लघु वनोपजों के लिये न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने की आवश्यकता हो या फिर टाईगर रिजर्व क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के पुनर्स्थापन की मानवीय और न्यायसंगत व्यवस्था हो। ऐसे बुनियादी मसलों पर हम लोगों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं, इस पर ही वनों और वन्यजीवों के संरक्षण में लोगों की हिस्सेदारी बहुत हद तक निर्भर करती है। इसी सन्दर्भ में मैंने वन क्षेत्रों के भीतर और आसपास निवास करने वाले लोगों और वन अधिकारियों के बीच के परम्परागत सम्बन्धों को बेहतर बनाने का प्रयास किया। भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act) 1927 में प्रस्तावित संशोधन इस प्रयास का हिस्सा हैं और संयुक्त वन प्रबन्धन समितियों का पुनर्गठन भी एक ऐसा ही प्रयास है।

कभी-कभी पर्यावरणीय मसलों को आजीविका के विभिन्न साधनों को बेहतर बनाने के प्रयास के साथ सुलझाया जा सकता है। मैंने सीबकथोर्न (पहाडी ठंडे प्रदेश में मिलने वाली एक जड़ी) की खेती के लिये प्रतिरक्षा शोध एवं विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation,DRDO) के साथ साझीदारी करने की पहल की थी। यह ऐसी पहल थी जिसका यदि उचित तरीके से कार्यान्वयन होता तो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के ऊंचे इलाकों में रेगिस्तान के बढ़ने की समस्या का सामना करने के साथ ही स्थानीय आबादी की आमदनी बढ़ाने के अवसर भी उपलब्ध करा पाने में भी कारगर साबित हो पाता। साझेदारियाँ, उद्योगों को तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिये भी हो सकती हैं जैसे केंद्रीय प्रदूषण नियन्त्रण पर्षद (Central Pollution Control Board) द्वारा विकसित चमड़ा संरक्षण की नई तकनीक। यह कम पानी और कम क्रोमियम का उपयोग करने पर आधारित है। इस तकनीक के इस्तेमाल से कम औद्योगिक कचरा पैदा होगा। जलस्रोत भी कम प्रदूषित होंगे क्योंकि ऐसे कचरे अन्ततः नदी और दूसरे जल स्रोतों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं।

इस अध्याय में पर्यावरण मंत्रालय के उन कामों पर विचार किया गया है जो अनुमति प्रदान करने जैसे चर्चित कामों से परे होते हैं।

‘साझा वस्तुओं का प्रबन्धन: अकादमिक जगत से वास्तविक दुनिया तक’-इंटरनेशनल एसोसिएशन फॅार द स्टडी ऑफ द कॉमन्स (International Association for the study of the Commons), हैदराबाद, के तेरहवें द्विवार्षिक सम्मेलन में सम्बोधन ।

10 जनवरी 2011

प्रोफेसर ऑस्ट्रोम (Ostrom) का यह रोचक व्याख्यान सुनने के बाद मैंने अपने पुराने दोस्त और सहकर्मी डॉ. नितिन देसाई से कहा है कि इस दर्शक मंडली में ऐसे कई लोग होंगे जो मुझे सुनने की बजाय प्रोफेसर से सवाल करना अधिक पसन्द करेंगे, लेकिन ऐसा होना सम्भव नहीं लगता। डॉ. ऑस्ट्रोम का यह व्याख्यान ‘संस्थानिक मोनोकल्चर’(Institutional Monoculture) का एक उदाहरण है। सभी उद्घाटन सत्रों को किसी पूर्व निर्धारित व्यवस्था का अनुसरण करना होता है। उद्घाटन सत्र में किसी ‘जैव-विविधता’ की गुंजाइश नहीं होती। मुझे अफसोस है कि हम इस रोचक व्याख्यान पर आपसे प्रश्न नहीं कर पाए जिसने नीतिगत हस्तक्षेप की अनेक सम्भावनाओं के द्वार खोले हैं।

मुझे प्रसन्नता हुई है और मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ कि यहाँ दुनिया भर के अनेक अकादमिक विद्वानों के बीच आया हूँ। अपनी मंत्रीमंडलीय हैसियत में मेरा खासतौर से प्रयास रहा है कि अकादमिक जगत और वास्तविक दुनिया के बीच की दूरी पाटने का काम करूं। दुर्भाग्य से मैं हमेशा सफल नहीं हो पाता क्योंकि अकादमिक लोग समय को वर्ष और दशक में मापते हैं जबकि वास्तविक दुनिया के अधिकांश लोग समय को महीनों में मापते हैं। हममें से कुछ लोग जो संकटग्रस्त प्राणियों के लिये काम करते हैं सम्भव है कि वे दिनों में गणना भी करते हों। इसीलिये अकादमिक लोगों को रोजमर्रा के स्तर पर जोड़ना बहुत कठिन है। इस मंत्रालय में पिछले 19 महीनों के दौरान मैंने अपने कामों में अकादमिक लोगों को जोड़ने का सचेतन प्रयास किया है। हालांकि,निर्णय करने, नीति निर्माण या नीति की निगरानी की प्रक्रिया में उनको शामिल करने में हमेशा सफलता नहीं मिलती। अकादमिक लोगों की समस्या यह है कि अगर आप तीन अकादमिक व्यक्तियों के साथ काम करना आरम्भ करें तो सम्भव है कि आपके सामने पांच भिन्न प्रकार के विकल्प आ जाएं जिसका परिणाम अक्सर सकारात्मक नहीं होता। हालांकि, अर्थशास्त्रियों के साथ ऐसा नहीं है। बावजूद इसके मैं सोचता हूँ कि यह अवसर इस सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ बेहद मूल्यवान अकादमिक आलेखों को पढ़ने और सुनने का है। आगामी तीन दिनों में मेरे अनेक सहकर्मी, राज्य सरकारों, राज्य के विभागों और वन विभाग से यहाँ आने वाले हैं। और मुझे पूरा विश्वास है कि वे यहाँ हुए विचार विमर्श का उपयोग अपने कार्य क्षेत्र में कर सकेंगे।


मुझे प्रोफेसर ऑस्ट्रोम का विचारोत्तेजक व्याख्यान सुनने का अवसर मिला जिसमें उन्होंने एक साझावस्तु जैसे वनों के प्रबन्धन की चर्चा की है जो उनके महाराष्ट्र के टडोबा-अन्धारी क्षेत्र और पश्चिम बंगाल के महानंदा क्षेत्र में अध्ययन पर आधारित था।

साझा वस्तु का मसला: मैंने क्या सीखा?

अपने वर्तमान हैसियत में मेरे सामने एक बड़ी चुनौती, साझा वस्तुओं को क्रमानुगत ढंग से देखने की थी। वैश्विक साझा-जलवायु परिवर्तन पर बहस, क्षेत्रीय साझा-नदियों- नदी प्रबन्धन और जलभृतों (एक्वीफर) के मसले और स्थानीय साझा-वनों का प्रबन्धन मुझे इन तीनों का सामना करना था। मेरे पास प्रोफेसर ऑस्ट्रोम का लेखन था जिसे मैं मंत्री बनने के पहले से जानता था और मेरे लिये वह काफी उपयोगी साबित हुआ। जब इन साझा वस्तुओं के प्रभावों का मुकाबला करने और उपलब्धता एवं निष्पक्षता के मसले को सुलझाना होता था तो एक मुहावरा मेरे साथ लगातार जुड़ा रहा वह था ‘संस्थानिक मोनेकल्चर’ को खारिज कर ‘बहुकेन्द्रित पद्धति’ को अपनाना आवश्यक है। मैं नितिन देसाई का एक बहुत ही रोचक इंटरव्यू पढ़ रहा था, उनसे अर्थशास्त्री होने के नाते पूछा गया था कि साझा हित और सार्वजनिक हित में बुनियादी फर्क क्या है? उन्होंने जिस तरह जबाब दिया उसे हम लोग अर्थशास्त्र में पढ़ते हैं। उनका जवाब था ‘साझा के मामले में हमें उपलब्धता और निष्पक्षता दोनों को देखना होता है जो परम्परागत सार्वजनिक हित के मामले में नहीं होता’। मेरे सामने वास्तविक चुनौती उपलब्धता और निष्पक्षता के मामले से उत्पन्न समस्याओं का समाधान करने में ‘संस्थानिक मोनोकल्चर’ की अवधारणा को खारिज करने की थी। मैंने इन तीनों क्षेत्रों-वैश्विक साझा, क्षेत्रीय साझा और स्थानीय साझा में से प्रत्येक के बारे में जो सीखा, उसे आपको बताना चाहता हूँ।

वैश्विक साझा

मैं वैश्विक साझा के मसले से आरम्भ कर रहा हूँ। इससे सम्बन्धित बहस ताजा और समकालीन परिघटना, जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित है। जलवायु परिवर्तन पर बहस में वार्ताकारों और अकादमिक लोगों के बीच संवादहीनता को मैंने सबसे निराशाजनक पाया है। जलवायु परिवर्तन के बारे में बेहद दिलचस्प काम अकादमिक जगत में हो रहे हैं। वार्ताकार ‘हो सकता है एवं होगा’, एवं ‘होना चाहिए’ की अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। और वे हावर्ड के जेफरी फ्रैंकेल, स्टैंन्फोर्ड के माइकल स्पेंस, मेरीलैंड यूनिवर्सिटी के थॉमस स्चेलिंग या प्रोफेसर ऑस्ट्रोम के कामों से पूरी तरह अनजान बने हुए हैं। मैं मानता हूँ कि यह बहुत ही दुर्भाग्यजनक है। मेरा प्रयास है कि वार्ताकारों के समूह जलवायु परिवर्तन के बारे में इन अकादमिक कामों की ओर ध्यान दें। वार्ता की सफलता इस पर निर्भर करती है कि हम निष्पक्षता के मसले को कैसे सम्बोधित करते हैं। अलबत्ता, यह मसला स्वयं जलवायु परिवर्तन के ही केन्द्र में है। अगर आप कानकून समझौते (Cancun Agreement) को देखें तो उसमें जिस पदबन्ध को शामिल कराने में हम सफल रहे वह है ‘‘टिकाऊ विकास तक न्यायपूर्ण पहुँच’’ (Equitable Access to Sustainable Development)। मैं ‘‘कार्बन के क्षेत्र में समतापूर्ण पहुँच’’ (Equitable Access to Carbon Space) के परम्परागत मुहावरे से बहुत खुश नहीं हूँ क्योंकि यह प्रदूषित करने के अधिकार को प्रकट करता है। मैं अफ्रीका और छोटे द्वीपों के उन लोगों को जानता हूँ जो केवल विकसित दुनिया से ही सावधान नहीं होते, बल्कि दो बड़े विकासशील देश भारत और चीन से भी सावधानी बरतना चाहते हैं। मैं यह सन्देश देना चाहता था कि इसे प्रदूषित करने के निरंकुश अधिकार का संकेत नहीं समझना चाहिए। बल्कि हमें इसे बेहतर गुणवत्ता वाले जीवन और जीवन-स्तर के मौलिक अधिकार के रूप में देखना चाहिए जिसे सुनिश्चित करना सरकारों का काम है। हमने कानकून समझौते में ‘टिकाऊ विकास तक न्यायपूर्ण पहुँच’’ की अवधारणा को शामिल किया और अगले साल डरबन सम्मेलन के पहले हमें न्यायपूर्ण पहुँच को पारिभाषित करने का कोई नवाचारी ढंग खोजना होगा।
 

भारतीय वनों की कार्बन अवशोषण की क्षमता को 1990 के मध्य में मोटे तौर पर दस प्रतिशत आँका गया था। चूँकि, हमने विकास दर को 8-9 प्रतिशत बनाए रखा है, हम वन आच्छादन में हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करने में सक्षम नहीं हो सकेंगे। हमारा आकलन है कि 2020 तक भारतीय वनों के कार्बन अवशोषण की वार्षिक क्षमता हमारे कुल ग्रीनहाउस उत्सर्जन का छह से सात प्रतिशत के बीच रहेगी। इस स्तर को बनाए रखना भी हमारे कार्बन अवशोषण स्तर पर बड़ा असर डालेगा।

जलवायु परिवर्तन पर अन्तरराष्ट्रीय विचार-विमर्श की समस्याओं में एक किसी आर्थिक मानदंड का पूरी तरह अभाव है। चूँकि, हमारा देश प्रति व्यक्ति आय की सीढ़ी पर उपर चढ़ा है पर जलवायु परिवर्तन की वर्तमान बनावट में बृहत्तर जिम्मेवारी वाले देशों का विचार पूरी तरह गायब है। भविष्य में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिये कोई एक फार्मूला नहीं बल्कि फॉर्मूलों के समूह की आवश्यकता होगी जो टिकाऊ विकास के न्यायपूर्ण बँटवारे को सुनिश्चित करेंगें। वार्तालाप की संरचना में केन्द्रीय वस्तु को बदले बिना हम सफल नहीं हो सकते क्योंकि 193 देशों के बीच हम कोई एक अनुबन्ध नहीं कर सकते। परन्तु, जैसाकि प्रोफेसर ऑस्ट्रोम ने उल्लेख किया है, अगर हम विविधतापूर्ण ढंग अपनाते हैं और सन्दर्भों के अनुसार विविधतापूर्ण समाधान खोजते हैं तो सम्भव है कि हम सफल हो जाएं और आज से कुछ वर्षों बाद वर्तमान संरचना को संशोधित करना चाहें। मैं सोचता हूँ कि शोधकर्ताओं के सामने बड़ी चुनौती टिकाऊ विकास की समता-मूलक उपलब्धता को कार्यकारी अर्थ प्रदान करना है।

सबसे पहले हमें परिभाषित करना होगा कि टिकाऊ विकास क्या है? डॉ. नितिन देसाई ने इसे बाइस वर्ष पहले पारिभाषित किया था। उनके अनुसार यह ‘‘आगामी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को खतरे में डाले बगैर अपनी खपत से जुड़ी आवश्यकताओं को पूरा करने की योग्यता है’’। हमें इसे निश्चित तौर पर एक कार्यकारी अर्थ प्रदान करना होगा और ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिससे समता-मूलक उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। इसमें जनसंख्या, प्रति व्यक्ति आय और वितरण की आन्तरिक समस्याओं का ध्यान रखना होगा (क्योंकि भारत अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर समानता को लेकर भले सचमुच चिन्तित हो, आन्तरिक स्तर पर वितरण में असमानता की समस्या को छिपा नहीं सकता)। हम अन्तरराष्ट्रीय असमानता की चर्चाओं में विश्व के अगुवा होते हैं लेकिन घरेलू असमानता से निपटने में हिचकते हैं। टिकाऊ विकास की उपलब्धता में असमानता का मामला आज भारत में बहुत ही गम्भीर स्थिति में है जिसका समाधान, नीति निर्माताओं और अकादमिक लोगों को करना है। इसीलिये मैं यह कहते हुए समाप्त करना चाहूँगा कि कानकून ने बहुस्तरीय प्रक्रिया को पुनर्जीवित कर दिया है जो कोपेनहगेन में बन्द हो गया था। इसके साथ ही इसने कुछ हद तक सर्वानुमति की स्थिति तैयार करने का भी काम किया है।

फिर भी एक बड़ी अड़चन बनी हुई है कि वैश्विक लक्ष्य को कैसे निर्धारित करेंगे? इस लक्ष्य को हासिल करने में विकासशील देशों के विकास की सम्भावनाओं को खतरे में डाले बिना समता को कैसे पारिभाषित करेंगे?

क्षेत्रीय साझा:

नदी जल प्रबन्धन क्षेत्रीय साझा का बेहतरीन उदाहरण है जो न तो वैश्विक साझा है और न स्थानीय साझा ही। यह वैश्विक साझा पर भी लागू होता है लेकिन बहुविध लक्ष्यों के बीच मौजूद दुविधाएं क्षेत्रीय साझा के क्षेत्र में अधिक प्रखर होती हैं। उदाहरण के लिये किसी नदी घाटी को लें। बीस वर्ष पहले हमारे नीतिगत विमर्शों में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह की अवधारणा मौजूद नहीं थी इसीलिये हमने अनेक पनबिजली, सिंचाई और पेयजल परियोजनायें बनायी। लेकिन आज हम पाते हैं कि हमारी अनेक महत्त्वपूर्ण एवं पारिस्थतिकीय रूप से संवेदनशील नदी प्रणालियों में उतना पानी नहीं है जिसे पारिस्थितिकीविद ‘न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह’ (Minimum Environmental flow) कहते हैं। न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह को हम कैसे सुनिश्चित कर सकेगें जब नदी प्रणालियों पर विभिन्न प्रकार के दबाव हों? दबाव चाहे पनबिजली परियोजना के विकास का हो या बड़ी आबादी के लिये पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने का। यह ऐसा मसला है जो नीतिगत विचार विमर्शों में लगातार महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है। मुझे उत्तराखंड में गंगा के ऊपरी बहाव क्षेत्र में पनबिजली परियोजनाओं को रोक देने के फैसले को लेकर गहरे विरोध का सामना करना पड़ा जिनमें से कुछ पूरा होने के करीब पहुँच गए थे। एक खास पनबिजली परियोजना जिसका निर्माण 40 प्रतिशत पूरा हो गया था जिसमें हमने लगभग 500 करोड़ रुपए खर्च कर दिए थे उस परियोजना को भागीरथी नदी में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करने के लिये रद्द कर देना पड़ा। ये क्षेत्रीय साझा के मामले में विरोध और दुविधा के कुछ उदाहरण है जिनमें पानी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

स्थानीय साझा

आखिर में हम स्थानीय साझा के मसले पर आते हैं। प्रोफेसर ऑस्ट्रोम के अनुसार यह पूरा मामला वनों का प्रबन्धन करने का है। हम हमेशा पूछते है कि वनों का प्रबन्धन करने का सर्वोत्तम तरीका क्या है? यह गलत प्रश्न है और अक्सर हमें गलत जबाब मिलता है। प्रश्न यह होना चाहिए कि वनों का प्रबन्धन करने के कौन से तरीके सर्वोत्तम हैं? हमारे देश में लगभग सात करोड़ हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र हैं जो हमारे भौगोलिक क्षेत्रफल का करीब 21 प्रतिशत हैं। पिछले तीस या चालीस वर्षों से वनों के लिये योजना बनाने में यह विचार चलता रहा है कि भारत के एक तिहाई इलाके को वन क्षेत्र के अधीन लाया जाना चाहिए। मैं पिछले उन्नीस महीनों से बोल रहा हूँ कि इस विचार का आधार क्या है? इस बुनियादी सवाल का कोई संतोषजनक जबाब मुझे आज तक नहीं मिला। यही कारण है कि मैं सोचता हूँ कि इस सोच में बुनियादी बदलाव करने का समय आ गया है। हमें वनों की मात्रा के बजाय गुणवत्ता के बारे में सोचना चाहिए। सात करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र के 40 प्रतिशत हिस्से के क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद हमारे सामने मुख्य चुनौती है देश के वर्तमान वन क्षेत्रों की गुणवत्ता सुधारने की है न की एक तिहाई इलाके को वनों के अन्तर्गत लाने की। वनों की पारिस्थतिकीय भूमिका को अब तेजी से स्वीकार किया जाने लगा है। हम जितना ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं उसके लगभग दस प्रतिशत हिस्से का अवशोषण वनों द्वारा कर लिया जाता है। यह एक उल्लेखनीय योगदान है। भारतीय वनों की कार्बन अवशोषण की क्षमता को 1990 के मध्य में मोटे तौर पर दस प्रतिशत आँका गया था। चूँकि, हमने विकास दर को 8-9 प्रतिशत बनाए रखा है, हम वन आच्छादन में हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करने में सक्षम नहीं हो सकेंगे। हमारा आकलन है कि 2020 तक भारतीय वनों के कार्बन अवशोषण की वार्षिक क्षमता हमारे कुल ग्रीनहाउस उत्सर्जन का छह से सात प्रतिशत के बीच रहेगी। इस स्तर को बनाए रखना भी हमारे कार्बन अवशोषण स्तर पर बड़ा असर डालेगा।

हमारे वनों को न केवल पारिस्थितिकीय अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है बल्कि सामाजिक और आर्थिक अड़चनें भी झेलनी पड़ रही हैं। बीस से पच्चीस करोड़ भारतीय अपनी आजीविका के लिये वनों पर निर्भर हैं। इस तथ्य की अनदेखी अक्सर वन विभाग कर देता है जिसमें मैं खुद को भी शामिल करता हूँ। मैं सोचता हूँ कि भारतीय वनों का प्रबन्धन करने में हमारे सामने बड़ी चुनौती उनके पारिस्थितिकीय मूल्य को सार्वजनिक विचार-विमर्श के दायरे में लाने की है। दुर्भाग्य से पूर्व के वर्षों में हमारे कानून वनों की परम्परागत आर्थिक और सामाजिक भूमिकाओं को स्वीकार करने और स्थापित करने में सफल नहीं हुए हैं।

बेहतरीन कानून, खराब कार्यान्वयन क्यों?

अब इस प्रश्न पर आयें कि साझा संसाधनों के प्रबन्धन के लिये बने कानूनों का कार्यान्वयन करने में कौन सी अडचनें हैं? यह बेहद दिलचस्प है कि मुझे प्रचलित कानूनों का कार्यान्वयन करने के बारे में पिछले दिनों बहुत सफाई देनी पड़ी। यह विचित्र सी स्थिति थी जब मैं केवल कानून का कार्यान्वयन करने के लिये खबरों में आ गया। इसे अधिकांश आधुनिक देशों में एक मंत्री के दैनिक कर्तव्यों का हिस्सा माना जाता है लेकिन यहाँ प्रचलित कानूनों का कार्यान्वयन कर रहा एक मंत्री विलुप्त प्राणि जैसा बन गया जो रोजाना अखबारों के पहले पन्ने की खबर बनने लगा। इस मामले में मैं चार मुद्दों का उल्लेख करना चाहता हूँ।

इस समय भारत को यह मानने, मान्यता देने, स्वीकार करने और समझने की जरूरत है कि आर्थिक विकास की दर 9 प्रतिशत होने की एक पारिस्थितिकीय कीमत होगी। विभिन्न पारिस्थितिकीय और आर्थिक लक्ष्यों के बीच दुविधा है और हमारा दायित्व इन दुविधाओं और विकल्पों को स्पष्ट करना है। अधिकतर मामलों में हम दोनों में सफल हो सकते हैं। वास्तव में एक हजार वर्ष पूर्व अलबरूनी ने भारत और भारतीय संस्कृति को विलक्षण बताया था क्योंकि जब विकल्पों को चुनने का अवसर आता है तो हम दोनों को पाना चाहते हैं। यह हमारी डीएनए का हिस्सा है। हमारी संस्कृति का हिस्सा है कि हम आर्थिक विकास करने के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा भी करें।

एक दूसरी धारणा भी है जिसे मैं बताना चाहता हूँ और शायद यही कारण है कि मैं तेजी से अलोकप्रिय होता जा रहा हूँ। ऐसे अवसर आते हैं जब आपको चुनना होता है। हमारे समाज,व्यवस्था और संसद का यह कर्त्तव्य है कि वे चुनाव करें। ये कठिन चुनाव होते हैं। उदाहरण के लिये प्रोफेसर ऑस्ट्रोम ने दिखाया है कि टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व को खतरा, मवेशियों या स्थानीय अक्रिमणकारियों से नहीं बल्कि कोयला खदान की वजह से है जिसे बिजली बनाने के लिये खोदने की जरूरत है। चुनाव हमें करना है। क्या भारतीय राजनीतिक व्यवस्था टाडोबा-अन्धारी टाइगर रिजर्व की सुरक्षा करना चाहती है (जो महज एक टाइगर रिजर्व नहीं है बल्कि एक पारिस्थितिकी-तंत्र, विशाल वासस्थल, जैव-विविधतापूर्ण भू-परिदृश्य है)? या आर्थिक विकास के नाम पर इसे संरक्षण मुक्त करने वाली है? मुझे अपने विकासवादी सहयोगियों से जो हमें अब देशद्रोही मानते हैं, उत्तर मिलता कि ‘‘कुछ क्षतिपूरक वनीकरण कर देने से समाधान हो जाएगा।’’ इस उत्तर में खोट यह है कि प्राकृतिक वन जो शताब्दियों में विकसित हुए हैं उन्हें बर्बाद करने की क्षतिपूर्ति, वनीकरण से नहीं हो सकती। वनीकरण के पारिस्थितिकीय मूल्य की तुलना प्राकृतिक वनों के बहुविध पारिस्थितिकीय फायदों से कतई नहीं की जा सकती। यह उन चयनों का एक उदाहरण है जिसे हमें करना है।

हमें लगातार ऐसे चुनाव करने हैं। जैसे क्या हम अपनी नदियों में पानी चाहते हैं या उनमें सुरंगें बनाना चाहते हैं? आज भारत की अनेक नदियों में आप केवल सुरंगे ही देखेंगे, पानी नहीं। यह तकनीकी या वैज्ञानिक चयन नहीं है बल्कि राजनीतिक चयन है। मैंने पर्यावरण को अपने देश की राजनीतिक बहसों की मुख्यधारा में ले आने की कोशिश की। ये ऐसे मसले नहीं हैं जिनका समाधान वैज्ञानिक या पारिस्थितिकीविद या नागरिक संगठन अकेले कर सकें। ये ऐसे मसले हैं जिनके बारे में राजनीतिक व्यवस्था को निर्णय करना होगा। भारत को क्या अनुवांशिक रूप से उन्नत बैंगन (बीटी बैंगन) को अपनाना चाहिए चूँकि, यह अनुवांशिक विविधता के केंन्द्र में हैं? बैंगन की तीन हजार से अधिक प्रकार की प्रजातियाँ यहाँ मौजूद हैं इसीलिये यह वैज्ञानिक समस्या नहीं होकर एक राजनीतिक समस्या है। इसका फैसला राजनीतिक व्यवस्था को करना होगा।

चुनाव निश्चित तौर पर करना होगा और कुछ मामलों में हाँ तो कुछ मामलों में ‘नहीं’ भी कहना होगा। जब आप बॉक्साइट खनन को रोकने जा रहे हों और जिससे आदिवासी समुदाय की आजीविका प्रभावित हो रही हो तब आप ‘नहीं’ कह रहे होते हैं। यह एक चुनाव है जिसे समाज को करना है। क्या यह 9 प्रतिशत विकास दर के प्रक्षेप पथ को प्रभावित करेगा? मेरा विचार है कि नहीं प्रभावित करेगा जो आम विचार से भिन्न है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि प्रभावित करेगा।

विकास की गत्यात्मकता

अपने देश में कानूनों के कार्यान्वयन में पहली अड़चन विकास की गत्यात्मकता है। मैं नहीं सोचता कि कोई भी व्यक्ति सही दिमागी हालत में आर्थिक विकास की वास्तविक दर को 9-10 प्रतिशत बनाए रखने की आवश्यकता के खिलाफ बहस करेगा। परन्तु इसकी पारिस्थितिकीय कीमत क्या है उसे ठीक से समझने की जरूरत है।

बीस वर्ष पहले डॉ. नितिन देसाई जैसे लोगों ने संकेत दिया था कि 1980 के दशक का आर्थिक विकास वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है। मैं कहना चाहूँगा कि बीस वर्ष बाद फिर वही प्रश्न पूछने की आवश्यकता है कि क्या यह विकास पारिस्थितिकीय रूप से टिकाऊ है? हम इस दुविधा का सामना कैसे करेंगे जब विकास और संरक्षण के उद्देश्यों के बीच सीधा मुकाबला हो? हम अधिकतम सीमा तक समझौता कर सकते हैं सामना नहीं। लेकिन अब सवाल उठता है कि जब ऐसा करना सम्भव ही नहीं तो समाज और लोकतांत्रिक संस्थाएं इसका सामना कैसे करेंगी?

संस्थागत मोनोकल्चर

मेरा दूसरा मुद्दा संस्थागत मोनोकल्चर है जो कानूनों के कार्यान्वयन में अड़चन बनकर खडा है। एक तरफ हमारी मानसिकता कहती है कि साझा संसाधनों का टिकाऊ प्रबन्धन और प्रभावी देखभाल केवल राजसत्ता ही कर सकती है। हमारे पास सदाशय, सुयोग्य, बेहद अग्रगामी, मुखर नागरिक कार्यकर्ता भी हैं जिनमें अनेक आज इस सभा में उपस्थित हैं। उनका विश्वास है कि राजसत्ता टिकाऊ प्रबन्धन की शत्रु है और केवल समुदाय ही इन संसाधनों का प्रबन्धन कर सकता है। मैं सोचता हूँ कि अब समय आ गया है कि विविधतापूर्ण संस्थानिक मॉडल को अपनाया जाएं और इसके साथ ही साझा संसाधनों के प्रबन्धन के भिन्न तरीकों को अपनाने की इजाजत भी दी जाए।
 

भारतीय वनों की कार्बन अवशोषण की क्षमता को 1990 के मध्य में मोटे तौर पर दस प्रतिशत आँका गया था। चूँकि, हमने विकास दर को 8-9 प्रतिशत बनाए रखा है, हम वन आच्छादन में हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करने में सक्षम नहीं हो सकेंगे। हमारा आकलन है कि 2020 तक भारतीय वनों के कार्बन अवशोषण की वार्षिक क्षमता हमारे कुल ग्रीनहाउस उत्सर्जन का छह से सात प्रतिशत के बीच रहेगी। इस स्तर को बनाए रखना भी हमारे कार्बन अवशोषण स्तर पर बड़ा असर डालेगा।

केवल दो दिन पहले मैंने तटीय क्षेत्रों का प्रबन्धन करने के लिये नए कानूनों की पुस्तक का लोकार्पण किया है। अपने पास 7500 किलोमीटर तटवर्ती क्षेत्र है और उनका प्रबन्धन करने के लिये हमारे पास एक कानून है, जो एक संस्थानिक मॉडल है। हमने नए कानूनों को प्रस्तुत किया है जो मानते हैं कि गोवा, सुंदरवन, चिल्का, लक्ष्यदीप, अंडमान, इकलौता द्वीपीय महानगर मुंबई और केरल का उथला समुद्री इलाका, सभी अनोखे पारिस्थितिकी तंत्र हैं। तटीय क्षेत्र नियामक अधिसूचना (Coastal Zone Notification) 2011 में ऐसे कोने मौजूद हैं जो परिस्थितिगत विविधता की इजाजत देते हैं। कानूनों का कार्यान्वयन में हमारी विफलता का एक बड़ा कारण यह है कि हमारे कानून संस्थानिक मोनोकल्चर पर आधारित हैं। हम क्षेत्रीय विविधता की इजाजत नहीं देते। भारत व्यापक पारिस्थितिकीय विविधता का देश है और हम अभी तक राजसत्ता की प्रमुखता पर जोर दे रहे हैं। और कभी-कभी राजसत्ता के प्रभावी सुशासन के विकल्प के तौर पर स्थानीय स्वशासन या सशक्तिकरण की खूबियों का गायन करने लगते हैं।

मैं सोचता हूँ कि संस्थानिक मोनेकल्चर के बारे में प्रोफेसर ऑस्ट्रोम की परख बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसीलिये हमें अपनी कानूनी व्यवस्था और जिस आधार पर यह व्यवस्था अवलम्बित है उसके बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। वन एवं पर्यावरण मंत्री के नाते मुझे यह कहते हुए अफसोस है कि भारतीय वन अधिनियम (Indian Forest Act) 1927 इस पूर्वमान्यता पर अवलम्बित है कि वे लोग जो अपनी आजीविका के लिये वनों पर निर्भर हैं, अपराधी हैं। यह अलिखित है। हमने इस बौद्धिक छद्म को चुनौती नहीं दी है और ऐसा करने के लिये समूची व्यवस्था को बदलना होगा और इसे स्वीकार करना होगा कि स्थानीय समुदायों का आर्थिक हित विकसित करना बहुत ही जरूरी है। मैं जोर देना चाहता हूँ कि सम्पदा में ‘आर्थिक हित’ की हिफाजत क्षेत्रीय स्तर पर करनी होगी। हमारे अनेक कानूनों का बुनियादी दायरा, हमारे कानूनों का संस्थानिक दायरा और प्रक्रियागत दायरा को उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण रूप से पुनर्निधारित करने की आवश्यकता है।

खंडित जिम्मेवारी

कानूनों के कार्यान्वयन में तीसरी समस्या खंडित जिम्मेवारी है। हमारे सभी कानून संघीय है और हर प्रकार का प्रबन्धन एवं कार्यान्वयन स्थानीय स्तर पर होता है। इसीलिये संसद में जब लोग मुझसे पूछते हैं कि ‘आप वायु प्रदूषण के मामले में क्या कर रहे हैं? तो मेरा जबाब होता है कि यह राज्य सरकार की जिम्मेवारी है। किसी ने मुझसे पूछा कि ‘‘आप वनों के मामले में क्या कर रहे हैं?’’ एकबार फिर मेरा जबाब था कि यह राज्य सरकार की जिम्मेवारी है। असली समस्या है कि वन संरक्षण अधिनियम, वनाधिकार कानून और पर्यावरण परिरक्षण अधिनियम सभी केन्द्रीय कानून हैं। यही स्थिति जल प्रदूषण अधिनियम और वायु प्रदूषण अधिनियम के मामले में भी है। लेकिन इन सभी कानूनों के कार्यान्वयन की जिम्मेवारी राज्य सरकारों और स्थानीय स्तरों की होती है। एक देश के रूप में हम प्रोत्साहन के ऐसे तरीके नहीं खोज पाये हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेवार पर्यावरणीय शासन को प्रोत्साहित करे। इन खंडित जिम्मेवारियों पर नियन्त्रण पाना आवश्यक है। संसाधानों के बँटवारे की हम अपनी संघात्मक व्यवस्था में परिवर्तन लाने में सफल हो सके हैं।

आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि इस वर्ष अप्रैल से केन्द्र सरकार से राज्य सरकारों को मिलने वाले संसाधनों में पर्यावरणीय मानदंडों के लिये 2.5 प्रतिशत अधिभार दिया जाएगा। इस प्रकार जो राज्य पर्यावरण का बेहतर प्रबन्धन करेंगे, उन्हें योजना आयोग से अधिक संसाधन प्राप्त होंगे। हमने संसाधनों के अन्तरण में वनों के टिकाऊ प्रबन्धन, वनाच्छादन और वन प्रबन्धन में प्रकट नवोन्मेषों के लिये पांच हजार करोड़ रुपए की एक बड़ी रकम के अनुदान की व्यवस्था की है। कुछ राज्य छोटी शुरुआत कर रहे हैं पर मैं मानता हूँ कि खंडित जिम्मेवारी एक बड़ी अड़चन है। हमने हाल में वनाधिकार कानून 2006 के कार्यकलापों की समीक्षा की जो सम्पत्ति के सामुदायिक अधिकार का प्रावधान करता है। समीक्षा के दौरान हमने पाया कि व्यक्तिगत अधिकारों को तो हम कारगर ढंग से निपटा रहे हैं पर समुदाय के वन अधिकारों को हमने स्वीकार नहीं किया है। इसका एक कारण राष्ट्रीय कानून बनाना और उसका कार्यान्वयन राज्यों पर छोड़ देना है।

मानसिकता

साझा संसाधनों के प्रबन्धन और कानूनों के कार्यान्वयन में आखिरी अड़चन प्रबन्धन में लगे लोगों की मानसिकता की वजह से है। हमें एकदम नया ढंग अपनाने की जरूरत है। मुझे एक उदाहरण देने की इजाजत दें- अमेरिका ने 1980 के मध्य में अम्लीय वर्षा की पर्यावरणीय समस्या का समाधान जिस तरीके से किया, वह बाजार आधारित व्यवस्था थी। अभी मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के इस्थर डूफलो और माइकल ग्रीनस्टोन ने भारत में वायु प्रदूषण की समस्या का प्रबन्धन करने की बाजार आधारित व्यवस्था के बारे में एक दस्तावेज तैयार किया है जो हमारी वेबसाइट पर उपलब्ध है। इस दस्तावेज के प्रकाशन पर देश के नागरिक संगठनों और अकादमिक जगत में काफी हलचल हुई। उन्होंने समझा कि मैं पर्यावरणीय प्रबन्धन के लिये बाजार आधारित सिद्धांत प्रस्तुत कर रहा हूँ। वे समझते हैं कि पर्यावरणीय प्रबन्धन केवल संस्थानों द्वारा किया जा सकता है। वहीं, नियमावलियों का प्रबन्धन केवल नियामकों द्वारा किया जा सकता है। नियमावलियों के कार्यान्वयन के लिये बाजार-हितैषी उपकरण अभी हममें से कईयों के लिये अछूत जैसा बना हुआ है। मैं सोचता हूँ कि हमारे लिये आवश्यक है कि इस पुरानी मानसिकता को छोड़ दें। साझा संसाधनों के प्रबन्धन के लिये नियमावलियों की आवश्यकता तो होगी पर सवाल है कि उन नियमावलियों को लागू करने के लिये नियामकों की भी आवश्यकता होगी क्या? हमें नियमावलियों की आवश्यकता और उन्हें लागू करने वाले नियामकों या इंस्पेक्टरों की फौज के आवश्यक होने की मान्यता के बीच फर्क करने की जरूरत है, जो कतई समाधान के हिस्सा नहीं होते।

निष्कर्ष

मैंने आपका बहुत समय लिया, इसके लिये माफी माँगता हूँ। मैंने यह बातचीत पहले से तैयार आलेख को प्रस्तुत करने की तरह की। आलेख तैयार करने से लगता कि मैं कोई विद्वान हूँ जो कि मैं नहीं हूँ। मैं कोई अकादमिक विद्वान नहीं हूँ, लेकिन जैसाकि मैंने आरम्भ में ही कहा कि मैं एक तरह का बौद्विक सफाईकर्मी हूँ। मैं ढेर सारी सामग्री और साहित्य पढ़ता हूँ और उनसे नीति तैयार करने में उपयोगी बातों को सीखता हूँ। मैं सोचता हूँ कि प्रोफेसर ऑस्ट्रम ने जिस ज्ञान को हमारे साथ बाँटा है वह साझा-संसाधनों का कारगर ढंग से प्रबन्धन करने में हमारी सहायता करेगा ताकि कुशलता और समता के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके। मैं यहाँ उपस्थित विद्वानों की बड़ी जमात के साथ निरंतर सम्बन्ध बनाए रखना चाहता हूँ। अपने मंत्रालय का संचालन करने में आपको शामिल करके मुझे बेहद प्रसन्नता होगी। केवल एक शर्त है कि परिणाम कुछ महीनों के अन्तराल में प्राप्त हो जाए, न कि अध्ययन का पहला प्रारूप देने में ही पांच-छह वर्ष गुजर जाएं।

प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगाने के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

3 जुलाई 2009

हिमालय क्षेत्र में प्लास्टिक और टेट्रापैक के उपयोग को नियन्त्रित करने और प्रतिबन्ध लगाने के बारे में आपने 8 जून 2009 को मुझे लिखा था। मैं आपके और गोपाल गाँधी के विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ और आपका पत्र मिलने के बाद इस मसले को प्राथमिकता के आधार पर लिया है। गोपाल गाँधी ने इस मसले पर अलग से मुझे लिखा है और मैंने उन्हें विस्तृत उत्तर भेज दिया है।

परिस्थिति संक्षेप में निम्नलिखित है:-

अध्ययनों से पता चलता है कि प्लास्टिक और प्लास्टिक के थैले वैसे नुकसानदेह नहीं हैं। समस्या बुनियादी तौर पर हमारे शहरों और महानगरों में कचरा उठाने की निष्प्रभावी व्यवस्था और प्रबन्धन की वजह से उत्पन्न होती है। बेकार प्लास्टिक कूड़े की ढेर में मिल जाते हैं और नालियों में जाकर पूरी जल निकासी प्रणाली को भी जाम कर देते हैं। कुछ प्लास्टिक थैलों को गाय और दूसरे जानवर निगल जाते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है।

प्लास्टिक के विकल्पों की अपनी सीमाएं हैं बायो-डिग्रेडेबल या नष्ट होने योग्य प्लास्टिक का विकास अभी आरम्भिक दौर में है। कागज के थैले के साथ पेड़ों का कटना जुड़ा होता है और उसका उपयोग विभिन्न कारणों से सीमित ही हो सकता है।

केन्द्र सरकार के कानून और नियमावलियाँ राज्यों को प्लास्टिक कचरा प्रबन्धन के लिये अपनी नियमावली विकसित करने की स्वायत्तता प्रदान करता है। इन नियमावलियों को लागू करने की जिम्मेवारी राज्यों की है। इस मामले में कार्रवाई मोटे-तौर पर राज्य स्तर पर होनी है और राज्य की एजेंसियों ने कमोबेश सफलता और फोकस के साथ कार्यवाईयाँ भी की हैं।

इसके बाद भी कचरा प्रबन्धन दीर्घकालीन व्यवस्थागत समस्या है जिसके समाधान में काफी समय और प्रयास की जरूरत है। कुछ पहाड़ी राज्यों ने पर्यटन स्थलों पर प्लास्टिक थैलों/बोतलों के उपयोग पर पूरा प्रतिबन्ध लगा दिया है ताकि उन स्थलों के प्राकृतिक सौंदर्य को बनाए रखा जा सके। इनमें जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं।


हिमाचल प्रदेश सरकार की कैबिनेट ने 31 अगस्त 2009 से समूचे राज्य में प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा देने का फैसला लिया। यह शायद उन राज्यों के लिये उदाहरण बन सकता है जिनका अधिकांश इलाका पहाड़ी है। हिमाचल प्रदेश का फैसला ध्यान देने योग्य है क्योंकि इसने प्लास्टिक थैलों और सभी गैर बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक वस्तुओं के इस्तेमाल पर भी पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया है। यहाँ प्लास्टिक की मोटाई के आधार पर फर्क नहीं किया गया है जिससे इस प्रतिबन्ध का कार्यान्वयन आसान है। प्रतिबन्ध बिना किसी अपवाद के पूरे राज्य पर लागू है। यह सरकारी अधिकारियों के हरेक तबके को प्रतिबन्ध को लागू करने में सक्षम बनाता है (केवल राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड को नहीं)। इसमें विभिन्न प्रकार के उल्लंघनों के लिये स्पष्ट दंड का प्रावधान किया गया है।

तदनुसार, मैंने उन सभी राज्यों को जिनमें उल्लेखनीय पहाड़ी क्षेत्र हैं, हिमाचल प्रदेश कैबिनेट के फैसले की तर्ज पर कानून बनाने या कार्यकारी आदेश जारी करने के लिये लिखा है। मैं इस प्रतिबन्ध के कार्यान्वयन की बेहतर निगरानी की आवश्यकता पर भी पर्याप्त जोर देना चाहूँगा जिसमें कई बार कमजोरी रह जाती है। इसके अतिरिक्त मैं इस मामले में राज्य सरकारों द्वारा की गई कार्रवाइयों की निगरानी करने की व्यवस्था भी करने जा रहा हूँ।

कचरा संग्रहण और प्रबन्धन जो एक बड़ी समस्या है इनके लिये कारगर समाधान ढूंढने की भी आवश्यकता है। इसके लिये राज्य सरकारों और शहरी निकायों के बीच परस्पर सहयोग और समन्वित प्रयास की जरूरत होगी। मेरा मंत्रालय कुछ नवाचारी उपायों पर काम कर रहा है जिसमें कचरा प्रबन्धन के लिये बनी संस्थाएं और निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी होगी। हम मानते हैं कि यह हमारे महानगरों के कचरा प्रबन्धन के प्रभाव को बेहतर बनाएगा। यह जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन का हिस्सा होगा। हम इसके बारे में विस्तृत सूचनाओं को जल्दी ही जारी किया जाएगा।

मेरा मंत्रालय पुनर्चकृत प्लास्टिक निर्माता और उपयोग नियमावली 1999 (Recycled Plastic Manufacture and Usage Rules 1999) (2003 में संशोधित) की विस्तृत समीक्षा और उसमें संशोधन करने का विचार कर रहा है। इसका मसौदा विचार विमर्श के लिये अगले छह सप्ताह प्रकाशित किया जाएगा, उसे मैं आपको भेजूंगा।

भारतीय वानिकी शोध एवं शिक्षण परिषद द्वारा तैयार तकनीकी रिपोर्ट ‘‘भारत के वन और वृक्ष आच्छादन, कार्बन अवशोषण में योगदान’’ के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

10 अगस्त 2009

कार्बन अवशोषण में हमारे वनों की भूमिका के बारे में रिपोर्ट देखने में आपकी दिलचस्पी होगी जिसे मैंने तैयार कराया है जिसे आज ही मोन्टेक सिंह अहलुवालिया ने देहरादून में जारी किया है। हम इस दस्तावेज का उपयोग जलवायु परिवर्तन पर अन्तरराष्ट्रीय वार्तालापों में व्यापक रूप से करेंगे। हम कार्बन अवशोषण की नियमित अन्तराल पर निगरानी भी करेंगे।

इस अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष है कि भारत के वन और वृक्ष आच्छादन ने वर्ष 1994 में हमारे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लगभग 11 प्रतिशत को अवशोषित किया। उस वर्ष के बाद ग्रीनहाउस गैसों के अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय आँकड़े आधिकारिक तौर पर उपलब्ध नहीं हैं। हमारे ग्रीनहाउस उत्सर्जन का नया समन्वित आकलन किया जा रहा है और यह नवंबर 2010 तक उपलब्ध हो जाएगा। यह ग्रीनहाउस उत्सर्जन का 2004 तक समयबद्ध आँकडा प्रदान करेगा। कहने की जरूरत नहीं कि इस 11 प्रतिशत के आँकड़े को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती है और वानिकी के क्षेत्र में यही हमारा रणनीतिक लक्ष्य रहेगा।

स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

13 नवंबर 2009

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों के आधार पर तैयार स्टेट आफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (State of Forest Report) प्रत्येक दो वर्षों पर जारी करता है। पिछले वर्ष 2005 की रिपोर्ट तैयार की गई थी जिसे 2007 में जारी किया गया। अब हम वर्ष 2007 के लिये स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट जारी करने जा रहे हैं। इस रिपोर्ट में कार्यपद्धति और निगरानी की दृष्टि से कई नई विशेषताएं शामिल की गई हैं। इसमें वनों के सन्दर्भ में जलवायु परिवर्तन की चिन्ताओं को भी सम्मिलित किया गया है।......मुझे यहाँ बताना चाहिए कि पिछली रिपोर्ट में प्रधानमंत्री द्वारा एक प्रस्तावना दी गई थी और उक्त प्रस्तावना में उनके द्वारा व्यक्त कुछ चिन्ताओं को इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है।

स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2009 के प्रकाशन और लोकार्पण के बाद प्रधानमंत्री को पत्र

1 दिसम्बर 2009

कल हमने स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2009 जारी किया। इस पहलकदमी को राजीव जी ने 1985 में आरम्भ किया था। उन्होंने प्रत्येक दो वर्षों पर हमारे वनाच्छादन का उपग्रह आधारित सर्वेक्षण करने के लिये भारतीय वन सर्वेक्षण की स्थापना की। ताजा सर्वेक्षण में कई नई विशेषताएं सम्मिलित की गई हैं-1. इसमें वनाच्छादन में परिवर्तन का यथासम्भव आकलन किया गया है। 2. यह वनाच्छादन की ऊंचाई और वनों प्रकार के आधार पर विवरण देता है। 3. यह राज्य द्वारा विकसित किए जा रहे वृक्षों की तादाद भी बताता है।


सर्वेक्षण की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:-

भारत का करीब 21 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वनों से आच्छादित है, इसमें 3 प्रतिशत अति सघन वनक्षेत्र, 10 प्रतिशत मध्यम सघनता का वनक्षेत्र और 8 प्रतिशत विनष्ट वन क्षेत्र है। इसका अर्थ है कि भारत के वनक्षेत्र का 40 प्रतिशत खुला और नष्ट वनक्षेत्र है जिसमें कोई उल्लेखनीय हरियाली नहीं है। हमारे वनीकरण कार्यक्रमों का फोकस निश्चित ही इस पर होना चाहिए।
 

वन एवं पर्यावरण मंत्री के नाते मुझे यह कहते हुए अफसोस है कि भारतीय वन अधिनियम 1927 इस पूर्वमान्यता पर अवलम्बित है कि वे लोग जो अपनी आजीविका के लिये वनों पर निर्भर हैं, अपराधी हैं। यह अलिखित है। हमने इस बौद्धिक छद्म को चुनौती नहीं दी है और ऐसा करने के लिये समूची व्यवस्था को बदलना होगा और इसे स्वीकार करना होगा कि स्थानीय समुदायों का आर्थिक हित विकसित करना बहुत ही जरूरी है।

1997 से 2007 के बीच भारत का वनाच्छादन लगभग 3 लाख हेक्टेयर प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा है। यह प्रशंसनीय है क्योंकि इस दौरान करीब 25 लाख हेक्टेयर प्रतिवर्ष की दर से वनों का नुकसान भी हुआ।

देश के 188 आदिवासी जिलों में वनाच्छादन का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा आता है। इस प्रकार आदिवासी कल्याण और वानिकी कार्यक्रमों में आन्तरिक सम्बन्ध है जिसका हम आज तक पूरा फायदा नहीं उठा सके हैं।

पूर्वोत्तर के राज्य कुल मिलाकर देश के भौगोलिक क्षेत्र के 5 प्रतिशत से भी कम हैं लेकिन वनाच्छादन का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा इन राज्यों में है।

गुजरात में मैंग्रोव का क्षेत्रफल प्रभावशाली ढंग पिछले दशक में करीब छह गुना बढ़ गया है। इस उपलब्धि के लिये गुजरात इकोलॉजी कमीशन (Gujarat Ecology Commission) की तारीफ की जानी चाहिए।

भारत के वनक्षेत्र हमारे वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के करीब 11 प्रतिशत का अवशोषण कर लेते हैं। इस प्रकार वन कार्बन अवशोषण की लिहाज से महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं और यह जलवायु परिवर्तन पर बहस के दौर के लिये खासतौर पर उल्लेखनीय है।

अगर लगभग 4 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई के इलाके को छोड़ दिया जाए, जहाँ कोई वृक्ष नहीं पनप सकता तो पांच राज्य-अरूणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, और सिक्किम के वनाच्छादन में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है।

हम अब पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर प्रदेश और हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के वनाच्छादन में परिवर्तन की निगरानी अधिक तत्परता से करने के लिये उपग्रह तकनीक का उपयोग करने जा रहे हैं।

चीतलों की मौत के बारे में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र

9 जून 2010

मुझे आश्चर्य होता है कि क्या आपने आज के अखबार में दक्षिण दिल्ली की अरावली पहाड़ी में स्थित एक वन्यजीव अभयारण्य में पिछले सप्ताह भर में आठ चीतलों की मौत के बारे में प्रकाशित समाचार को देखा है ? मुझे विश्वास है कि इसे लेकर आप भी उतनी ही चिन्तित होगी जितना मैं हूँ। मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि इस मामले को देखें और उचित कार्रवाई करें।

केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री मुरली देवड़ा को टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाके में सीएनजी की आपूर्ति के बारे में पत्र

3 अगस्त 2009

हमारा प्रयास देश के ब्याघ्र अभयारण्यों के कोर व क्रिटीकल क्षेत्रों के भीतर और आसपास के इलाके में इको-फ्रेंडली माहौल बनाने का रहा है। हालांकि, ऐसे इलाकों में पर्यटन की अधिसंरचनाओं के साथ ही पर्यटन के विकास के कारण वाहनों की आवाजाही से वायु/ध्वनि प्रदूषण का स्तर ऊंचा हो रहा है। हमने ऐसे इलाकों से पर्यटन की गतिविधियों को बन्द कर टाइगर रिजर्व के बफर जोन में ले जाने का निर्देश जारी किया है। इस सन्दर्भ में यह महसूस किया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में सीएनजी-चालित वाहनों को प्रोत्साहित करने से प्रदूषण का स्तर न्यूनतम किया जा सकता है।

मध्य प्रदेश में अनेक महत्त्वपूर्ण टाईगर रिजर्व (पन्ना, कान्हा, संजय दुबरी, बाँधवगढ़, सतपुरा और पेंच) हैं और जिन जिलों में ये टाइगर रिजर्व स्थित हैं, उनमें सीएनजी की आपूर्ति नहीं होती।

मुझे बहुत ही अच्छा लगेगा अगर आपका मंत्रालय मध्यप्रदेश के इन जिलों (पन्ना, मंडला, बालाघाट, उमरिया, होशंगाबाद और सिवनी) में सीएनजी आपूर्ति केन्द्र खोलने की सम्भावनाओं की तलाश करें।

केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री जयपाल रेड्डी को वनक्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों को एलपीजी प्रदान करने के बारे में पत्र ताकि जलावन के लिये जंगलों की कटाई रोका जा सके।

11 जून 2011

आप इससे सहमत होंगे कि वनों के विनाश को रोकने का एक बेहद महत्त्वपूर्ण कदम वन क्षेत्रों के भीतर और आसपास बसे गाँवों को वैकल्पिक जलावन उपलब्ध कराना हो सकता है। वनों के भीतर और आसपास लगभग 1.7 लाख गाँव हैं और अगर उनके पास एलपीजी पहुँचाने की कोई वितरण व्यवस्था हो तो मैं सोचता हूँ कि हम वनों की हिफाजत करने में एक बड़ी पहल कर सकेंगे।

स्थानीय स्तर पर कुछ पहलकदमी हुई है जैसे,बाँदीपुर अभयारण्य के पास कोई 30 हजार परिवारों को एक गैर सरकारी संगठन के प्रयासों से एलपीजी मिला है और इसका वनाच्छादन पर उल्लेखनीय प्रभाव दिखने लगा है। हमें इन 1.7 लाख गाँवों को रसोई का इंधन उपलब्ध कराने के लिये लगभग 50 से 60 लाख टन एलपीजी की जरूरत होगी।

क्या हम इसकी शुरुआत कर सकते हैं? मैं इस बारे में आपसे विस्तृत बातचीत करना चाहता हूँ ताकि जमीनी स्तर पर कुछ किया जा सके।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोन्टेक सिंह अहलुवालिया को दिल्ली चिडि़याघर के बारे में पत्र

18 मार्च 2011

आपका 17 मार्च 2011 का पत्र अभी-अभी मुझे मिला है जिसमें आपने पितामह के नए अवतार में लिखा है। मुझे यह पत्र पाकर बहुत प्रसन्नता हुई है। इसने मेरे विश्वास को पुष्ट किया है कि पितामह की भूमिका ने उस व्यक्ति को भी हरीतिमा से भर दिया है जो उच्च जीडीपी विकास दर की हिमायत एकांत भाव से करता रहता है।

दिल्ली चिड़ियाघर में उन्नयन के आपके कई सुझाव ऐसे हैं जिन पर मैंने व्यक्तिगत रूप से पहल की है और उनमें से कुछ का कार्यान्वयन किया जा रहा है हालांकि, इसमें समस्याएं भी आ रही हैं। उदाहरण के लिये मैं पिछले कुछ महीनों से दिल्ली चिड़ियाघर को गेट रसीद की वैसी व्यवस्था अपनाने की अनुमति प्राप्त करने के लिये वित्त मंत्रालय से संघर्ष कर रहा हूँ जैसाकि टाइगर रिजर्वों में प्रचलन में है। मुझे इस सरल सी व्यवस्था के लिये अभी तक वित्त मंत्रालय का औपचारिक अनुमोदन प्राप्त नहीं हुआ है। फिर भी आप आश्वत रहें कि मैं आपके सुझावों पर कार्रवाई करूंगा और अगली बार जब आप चिड़ियाघर में जाएंगे तो आप उन्हें सरजमीनी स्तर पर कार्यान्वित देखेंगे।

बाघ गणना-2010 के लोकार्पण के अवसर पर बाघ और बाघ विशेषज्ञों के बारे में कुछ टिप्पणियाँ

26 मई 2011

बाघों की संख्या से कहीं ज्यादा संख्या बाघ-विशेषज्ञों की है। बाघ-विशेषज्ञों के लिये बाघ आजीविका के स्रोत हैं।

कभी भी दो बाघ-विशेषज्ञ एक-दूसरे से सहमत नहीं होते। बाघों की तरह बाघ-विशेषज्ञ भी पूरी तत्परता से अपने विचरण क्षेत्र की रक्षा करते हैं। इनके द्वारा अपने विरोधियों पर किया गया हमला भयभीत बाघों द्वारा दुश्मन पर किये गये हमले से कहीं अधिक तीव्र होता है। बाघों की मौत बाघ-विशेषज्ञों के लिये अच्छी खबर है जबकि बाघों का प्रजनन बुरी।

विभिन्न टाइगर रिजर्व में निवास करने वाली आबादी को दूसरी जगह बसाने के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

7 मई 2010National Board for Wildlife

आपकी अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय वन्यजीव पर्षद ((NBWL) द्वारा गठित टाइगर टास्क फोर्स की एक अत्यावश्यक सिफारिश बाघों के लिये अक्षत इलाका सुनिश्चित करना है। टाइगर रिजर्व्स के आन्तरिक (Core) इलाके में मनुष्य-बाघ संघर्ष की घटनाओं को देखते हुए इस प्रजाति के परिरक्षण और संरक्षण के लिये अब यह बेहद महत्त्वपूर्ण हो गया है। स्मरणीय है कि एनबीडब्लूएल की ताजा बैठक में भी इस मसले पर विस्तार से चर्चा हुई जिसकी अध्यक्षता आपने की थी।

बाघ अभयारण्य वाले सत्रह राज्यों में से पंद्रह (बिहार और उत्तर प्रदेश को छोड़कर) ने वन्यजीव (परिरक्षण) अधिनियम 1972 के प्रावधानों के अनुसार बाघों के निवास के लिहाज से 29,284.76 वर्ग किलोमीटर इलाके को कोर/क्रिटिकल इलाके के तौर पर चिन्हित/अधिसूचित किया है। वर्तमान में देश के इन कोर/क्रिटिकल बाघ वासस्थानों में 762 गाँव/बस्ती हैं जिनमें 48,549 परिवार निवास करते हैं।

कोर इलाकों में सहवास की गुंजाइश शायद ही रह गई है क्योंकि मानवीय उपस्थिति से बाघों की सामाजिकता में विघ्न पड़ता है, जिनके विचरण के लिये कम से कम 800 से 1000 वर्ग किलोमीटर अक्षत इलाके की जरूरत होती है। कोर इलाकों में निवास करने वाले लोगों को दूसरी जगह बसाने और इलाके को अक्षत बनाने की पारिस्थितिकीय अनिवार्यता को देखते हुए प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत पुनर्वास पैकेज को प्रति परिवार एक लाख रुपए से बढ़ाकर दस लाख रुपए कर दिया गया है।

टाइगर प्रोजेक्ट के 1970 के दशक में आरम्भ होने से लेकर अभी तक विभिन्न टाइगर रिजर्व्स से केवल 91 गाँवों (3602 परिवारों) को पुनर्स्थापित किया जा सका है। बाघ वाले राज्यों को अपर्याप्त केन्द्रीय सहायता मिलने की वजह से इस कार्य में प्रगति काफी धीमी है।

कोर/क्रिटिकल क्षेत्रों के निवासी परिवारों को दूसरी जगह बसाने के काम को निर्धारित समयसीमा के भीतर करना आवश्यक है अन्यथा मूल्यवृद्धि और परिवारों की संख्या बढ़ने की वजह से पुनर्स्थापन पैकेज अर्थहीन हो जाएगा। इस प्रकार इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिये वर्तमान और आगामी पंचवर्षीय योजना के दौरान इन 48,549 परिवारों (762 गाँव) के लिये न्यूनतम 5 हजार करोड़ रूपयों की आवश्यकता होगी।

मैंने इस बारे में योजना आयोग के उपाध्यक्ष से अनुरोध किया है और आपके हस्तक्षेप की अपेक्षा करता हूँ जिससे केन्द्र प्रायोजित प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत इस कार्य को पूरा करने के लिये वांछित रकम का आवंटन हो सके।

हाथी कार्यबल (Elephant Taskforce) की रिपोर्ट ‘‘गज: भारत में हाथियों के भविष्य का संरक्षण’’ को संलग्न करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र

(मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट 31 अगस्त 2010 को जारी की गई। इसे सार्वजनिक जानकारी के लिये मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल दिया गया।)

18 सितंबर 2010

भारत में जहाँ बाघ विलुप्त होने का संकट झेल रहा है, वहीं हाथी जीने के संघर्ष में लगा है। इसी पृष्ठभूमि में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कुछ समय पहले हाथी कार्यबल का गठन किया था। कार्यबल ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है जिसमें उसने कुछ दीर्घ प्रभावी सिफारिशें की हैं। मैंने उनमें से कुछ अति महत्त्वपूर्ण सिफारिशों को रेखांकित किया है।

देश में अभी लगभग 25 हजार हाथी हैं जिनमें जंगली और पालतू दोनों शामिल हैं। उनमें अधिकांश केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और असम में हैं। इनके अलावा ओड़िसा, झारखंड और उत्तराखंड भी हाथियों के निवास वाले तीन अन्य महत्त्वपूर्ण राज्य हैं। लगभग 4 हजार हाथी पालतू हैं जिनमें एक तिहाई मंदिरों के पास हैं जैसे गूरूवायोर। पालतू और खासकर मंदिरों के पास मौजूद हाथियों के साथ हो रहा बर्ताव भी एक महत्त्वपूर्ण मसला है। इसके अतिरिक्त बिहार में हर साल सोनपुर मेला लगता है जो हाथियों के व्यापार को प्रोत्साहित करता है। इस पर भी कठोर नियन्त्रण की जरूरत है।

कार्यबल की सिफारिशें स्वीकार कर ली गई हैं और उनके कार्यान्वयन की प्रक्रिया आरम्भ हो गई है। हाथियों का अपने देश में बड़ा सांस्कृतिक महत्त्व है और अभी समय है कि प्रोजेक्ट एलिफैंट को उसी तरह महत्त्व दिया जाए जैसाकि प्रोजेक्ट टाइगर को मिलता है।

प्रोजेक्ट एलिफैंट के लिये कोष-आवंटन के बारे में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोन्टेक सिंह अहलुवालिया को पत्र

22 अक्टूबर 2010

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित हाथी कार्यबल ने भारत में हाथियों की अवस्था के बारे में ‘‘गज’’ शीर्षक से अपनी रिपोर्ट हाल में सौंपी है। इस रिपोर्ट में हाथियों को देश का राष्ट्रीय धरोहर जानवर (National Heritage Animal) घोषित किये जाने के साथ ही उनके संरक्षण के प्रयासों को प्रोत्साहन देने पर बल दिया गया है। मुझे आपको सूचना देते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हमने इस बारे में आधिकारिक अधिसूचना 21 अक्टूबर 2010 को जारी कर दी है।

कार्यबल ने कई महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की हैं जिनका कार्यान्वयन करने की प्रक्रिया में मंत्रालय जुटा हुआ है। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय हाथी संरक्षण प्राधिकरण (National Elephant Conservation Authority,NECA) के गठन का प्रस्ताव है। यह प्राधिकरण राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority) की तर्ज पर काम करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि हाथियों के संरक्षण के लिये बनने वाले सभी कार्यक्रमों की योजना बनाने और उनके कार्यान्वयन का काम एक पूर्णकालिक पेशेवर संस्था करे।

केंद्रीय सिफारिश ने हाथी परियोजना के परिव्यय के लिये वित्तीय आवंटन में बढ़ोतरी की है। रिपोर्ट बताती है कि ‘एलिफैंट रिजर्व्स’ के भीतर विभिन्न संरक्षण कार्यक्रमों और मानव-हाथी संघर्ष के न्यूनीकरण के उपायों के कार्यान्वयन में सबसे बड़ी अड़चन कोष की कमी है।’ इस लिहाज से कार्यबल ने कुल परिव्यय आवंटन को ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत 81.99 करोड़ से बढ़ाकर बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत 600 करोड़ रुपए करने की सिफारिश की है।

 

विशेषज्ञ समिति ने उपयुक्त निरीक्षण के बाद इस रेलमार्ग में तीन अति जोखिमग्रस्त और तीन संवेदनशील इलाकों को चिन्हित किया। समिति ने दो अति जोखिमग्रस्त हिस्से में ट्रेनों की गति 25 किलोमीटर प्रति घंटा रखने और खास स्थलों पर रक्षात्मक बाँध, बैंक कटिंग और ढलानों को भरने एवं 5 मीटर चौड़ाई के अंडरपास इत्यादि के निर्माण जैसे कुछ सुझाव दिए थे। इनके अतिरिक्त कुछ साधारण सुझाव भी दिया जैसे रेलमार्ग के आसपास हाथियों की उपस्थिति के बारे में सूचना वन विभाग रेल अधिकारियों को दे।

 

 

मैं आपसे सहयोग करने का अनुरोध कर रहा हूँ ताकि हाथी परियोजना के लिये आवंटन को बढ़ाकर कार्यबल की सिफारिश के अनुसार बारहवीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत कम से कम 600 करोड़ रुपए किया जा सके। अगर हम एशियाई हाथियों (जिनमें 50 प्रतिशत से अधिक भारत में हैं) की सुरक्षा करना चाहते हैं तो ऐसा करना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

मैं रिपोर्ट की एक प्रति संलग्न कर रहा हूँ जिसमें वित्तीय आवंटन के बारे में सिफारिशों का विस्तृत विवरण भी संलग्न हैं।

ट्रेन दुर्घटनाओं में हाथियों की मौत के बारे में केन्द्रीय रेलवे मंत्री ममता बनर्जी को पत्र

9 सितंबर 2009

कुछ राज्यों में ट्रेन दुर्घटनाओं में हाथियों की हुई असामयिक मौतों की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। मुझे बताया गया है कि पिछले चार वर्षों में ऐसी दुर्घटनाओं में 38 हाथियों की मौत हो चुकी है। इन दुर्घटनाओं को रोकने का अनुरोध करते हुए मुझे कई ज्ञापन प्राप्त हुए हैं जिनमें पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी और अलीपुरद्वार के बीच होने वाली दुर्घटनाओं का खासतौर पर उल्लेख किया गया है। मैंने इस मामले में प्रभावित राज्यों के मुख्य वाइल्ड लाइफ वार्डेन और रेलवे बोर्ड के अधिकारियों के साथ 4 सितंबर को समीक्षा बैठक की। प्रभावित राज्यों के नाम पश्चिम बंगाल, आसाम, उत्तराखंड, झारखंड, तमिलनाडु, केरल और ओड़िशा हैं।

अधिकारियों के साथ विस्तृत विचार विमर्श के दौरान स्पष्ट हुआ कि उत्तराखंड और झारखंड में रेलवे और राज्य के वन अधिकारियों की स्वतःसक्रिय कार्रवाइयों से ही स्थिति नियन्त्रण में लायी जा सकती है। आसाम और केरल में भी स्थिति नियन्त्रण में दिखती है, जहाँ दोनों विभागों के अधिकारियों के बीच संवाद है और साझा कार्रवाई की गई है। हालांकि, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में कार्रवाई की अधिक आवश्यकता है।

मैं आपको यह बताना भी चाहता हूँ कि मेरे मंत्रालय ने वर्ष 2007 में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था जिसे पश्चिम बंगाल में रेलमार्ग के संवेदनशील हिस्से का निरीक्षण करने और दुर्घटनाओं के न्यूनीकरण के उपायों के बारे में सुझाव देना था। विशेषज्ञ समिति ने उपयुक्त निरीक्षण के बाद इस रेलमार्ग में तीन अति जोखिमग्रस्त और तीन संवेदनशील इलाकों को चिन्हित किया। समिति ने दो अति जोखिमग्रस्त हिस्से में ट्रेनों की गति 25 किलोमीटर प्रति घंटा रखने और खास स्थलों पर रक्षात्मक बाँध, बैंक कटिंग और ढलानों को भरने एवं 5 मीटर चौड़ाई के अंडरपास इत्यादि के निर्माण जैसे कुछ सुझाव दिए थे। इनके अतिरिक्त कुछ साधारण सुझाव भी दिया जैसे रेलमार्ग के आसपास हाथियों की उपस्थिति के बारे में सूचना वन विभाग रेल अधिकारियों को दे।

रेलमार्गों के दोनों तरफ 30 मीटर के दायरे में हरियाली को साफ कर दिया जाए और ट्रेन चालकों व गार्डों को इस मामले में संवेदनशील बनाने के लिये कार्यक्रम चलाए जाएं इत्यादि।

तमिलनाडु में ट्रेन हादसों के शिकार बने हाथियों के ग्राफिक्स और तस्वीरों में जो मुझे दिखा वह हृदय विदारक था। वहाँ कटिंग्स की चौड़ाई बढ़ाने और ढाल को पाटना बहुत जरुरी है। खासकर एक पुराने खदान के निकट जहाँ हाथी रेलमार्ग और खदान के बगल की दीवार के बीच फंस जाते हैं।

बैठक में रेलवे बोर्ड की ओर से अतिरिक्त सदस्य (यातायात) गिरीश चंद्रा शामिल हुए और उन्हें विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट की एक प्रति फिर से दी गई और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया।

मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में रेलवे अधिकारियों को निर्देश दें कि समस्या के न्यूनीकरण के लिये राज्य वन विभाग अधिकारियों के साथ मिलकर समयबद्ध ढंग से संयुक्त कार्यक्रम पर कार्रवाई करें। मैं आपसे यह सुनिश्चित करने के लिये अपील करता हूँ कि वर्ष 2010 में पूरे देश में कहीं भी रेलवे के कारण हाथियों की मौत नहीं हो।

मैं आपसे यह अनुरोध भी करूंगा कि पश्चिम बंगाल के सम्बन्धित अधिकारियों को निर्देश दें कि विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों का परीक्षण करें और उनके अनुसार संरचनाओं का निर्माण कराने पर आने वाले खर्च का आकलन तैयार करें।

दुर्घटनाओं में हाथियों की मौत के बारे में केन्द्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी को पत्र

4 अगस्त 2010

कृपया मेरे विभाग के 9 सितंबर 2009 के आदेश को देखें जो पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी और अलीपुर द्वार के बीच दुर्घटनाओं में हाथियों की असामयिक मौत के बारे में है। रेलवे बोर्ड और राज्य वन विभाग के अधिकारियों के साथ 4 सितंबर 2009 को हुई मेरी बैठक में तीन फैसले लिये गये थे। 1. सभी रेलवे जोन को एक सामान्य परामर्श भेजा जाए। 2. रेलमार्गों के आर-पार हाथियों को आवाजाही की सुविधा देने के लिये संरचनाओं के निर्माण की डिज़ाइन और निर्माण कार्यों की लागत का आकलन संयुक्त तौर पर तैयार कराये जाएं। 3. संवेदनशील क्षेत्रों में रेलगाडियों की गति नियन्त्रित की जाए।

मैं इसे आपके ध्यान में लाना चाहता हूँ कि मेरे मंत्रालय, राज्य वन विभाग और रेलवे के संयुक्त प्रयासों का उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क में काफी सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वह इलाका 2001 से ही दुर्घटना मुक्त है। हालांकि,आपको मेरे द्वारा लिखे गए पिछले पत्र के बाद भी पश्चिम बंगाल में ट्रेन दुर्घटनाओं में दो हाथियों की मौत हो गई। रेलवे बोर्ड ने यद्यपि 30 मार्च 2010 को सभी रेलवे जोन को सामान्य परामर्श भेजा है लेकिन अन्य दो फैसलों के कार्यान्वयन की दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

मेरे मंत्रालय ने महानंदा वन्यजीव अभयारण्य और चापरामारी वन्यजीव अभयारण्य में पड़ने वाले अति संवेदनशील रेलमार्गों पर ट्रेनों की गति नियन्त्रित करने की सलाह दी थी। संयोग से ताजा दुर्घटना महानंदा वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में हुई है।

मुझे यह जानकारी भी मिली है कि रेलवे बोर्ड द्वारा विभिन्न संरचनाओं की डिज़ाइन तैयार की गई है जिसपर 7.27 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। मैं तहेदिल से अनुरोध करता हूँ कि सम्बन्धित अधिकारियों को उपरोक्त संवेदनशील हिस्से में गति-सीमा को नियन्त्रित करने का निर्देश दें। आप अगर रेलवे की बजट से उपरोक्त संरचनाओं के निर्माण कराने की व्यवस्था कर सके तो मैं बेहद उपकृत महसूस करूंगा। वैसे भी इन संरचनाओं का निर्माण रेलवे को ही कराना है।

उत्तर बंगाल में रेलमार्ग पर 22 सितंबर की रात में सात हाथियों की मौत होने के बारे में नोट

(यह नोट न्यूयार्क में भारत के स्थाई मिशन द्वारा जारी किया गया जो मेरा कैंप कार्यालय था क्योंकि मैं जैव विविधता के बारे में जेनरल एसेंम्बली के 65 वें सत्र की उच्चस्तरीय बैठक में हिस्सा लेने वहाँ गया था।)

23 सितंबर 2010

मैंने अभी-अभी पश्चिम बंगाल में 22 सितंबर की रात रेलमार्ग पर सात हाथियों की दुखदायी मौत के बारे में समाचार देखा है। ऐसी दुर्घटना पहली बार नहीं हुई है लेकिन इन दिनों इनकी तादाद अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है खासकर उत्तर पूर्व सीमाँत रेलवे के अन्तर्गत। मैंने रेल मंत्री को अनेक पत्र लिखे हैं और रेलवे बोर्ड के अधिकारियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें की हैं। हमने ऐसी दुर्घटनाओं को टालने के लिये उपयुक्त रणनीति अपनाने के बारे में विचार विमर्श किया है। मुझे इन उपायों को अपनाने का आश्वासन एक से अधिक बार दिया गया है।

यह दुर्घटना अधिक हृदय विदारक है क्योंकि यह वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा हाथी को राष्ट्रीय धरोहर पशु घोषित करने, नेशनल एलिफैंट कंजरवेशन ऑथिरिटी (National Elephant Conservation Authority) का गठन करने और हाथियों की आवाजाही वाले प्रमुख कारीडोरों की सुरक्षा के बारे में हाथी कार्यबल की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के बाद घटित हुआ है। मैं 26 सितंबर को भारत लौटने के बाद एकबार फिर रेलवे बोर्ड के अधिकारियों से मुलाकात करूंगा। इस घटना पर मैं अपनी गहरी चिन्ता को अभिव्यक्त करना चाहता हूँ।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बानेरहाट में हाथियों की मौत के बारे में पत्र

30 सितंबर 2010

मैं जानता हूँ कि सिलीगुड़ी और अलीपुर द्वार के बीच 22 सितंबर की रात करीब 11 बजे तीव्रगामी मालगाड़ी की चपेट में आकर सात हाथियों की भयंकर मौत से आप मेरी तरह ही व्यथित होंगी। उम्मीद है कि इस दर्दनाक हादसे की रेलवे के अधिकारी अपनी ओर से जाँच कर रहे होंगे।

तेज गति वाली ट्रेनों की चपेट में आकर हाथियों की मौत को हम उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क के 18 किलोमीटर हिस्से में न्यूनतम करने में सफल रहे हैं। दुर्भाग्य से हमें उत्तरपूर्व सीमाँत रेलवे के क्षेत्र में उस तरह की सफलता नहीं मिल रही और हम उत्तर बंगाल तथा आसाम में रेलमार्ग पर हाथियों की मौत के गवाह बन रहे हैं। इस समस्या के बारे में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, रेलवे, एनजीओ और राज्य सरकारों द्वारा विस्तृत अध्ययन भी कराये गए हैं। मैंने स्वयं 4 सितंबर 2009 को ऐसी एक बैठक की थी। हाल में महानिदेशक, वन (डीजीएफ) ने 28 सितंबर 2010 को एक बैठक की है। उत्तर बंगाल में रेलमार्ग के 160 किलोमीटर हिस्से में समस्या के समाधान के लिये जो सुझाव आये हैं, उनमें से प्रमुख को संक्षेप में नीचे दे रहा हूँ-

रात के समय ट्रेनों का परिचालन घटाने के बारे में रेलवे गम्भीरता से विचार करे, खासकर मालगाड़ियों के परिचालन का, जो अक्सर असमय चला करती हैं। राज्य सरकार ने सिफारिश की है कि गुलमा और राजाभटखावा के बीच शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे के बीच ट्रेनों का परिचालन बन्द कर दिया जाए। और इस इलाके में दिन के समय भी ट्रेनों की अधिकतम गति सीमा 20 किलोमीटर प्रति घंटा हो।

अगर राज्य सरकार की सिफारिश को मानने में रेलवे को कोई एतराज हो तो हाथियों की आवाजाही के लिये चिन्हित गलियारे और अन्य संवेदनशील इलाकों तथा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा चिन्हित संवेदनशील बिन्दुओं पर गतिसीमा को 20 किलोमीटर प्रतिघंटा के भीतर रखने की पाबन्दी निश्चित रूप से लगायी जाए।

हाथियों की आवाजाही वाले गलियारों के निकट रेलमार्गों का दोहरीकरण अब और नहीं किया जाए।

हाथी (खासकर बच्चा) को रेल लाइन तेजी से पार करने की सुविधा दी जानी चाहिए। इसके लिये कुछ क्षेत्रों में रेल लाइनों के नीचे से अंडरपास बनाये जा सकते हैं जो 40 मीटर चौड़ा और 10 मीटर उंचा हो। इसके लिये रेल लाइनों को उंचा उठाना होगा। विकल्प के रूप में बेहतर ढाल वाले रैंप बनाए जा सकते हैं, खासकर उन इलाकों में जहाँ रेल लाइनों के किनारे ढाल नहीं है।

रेलमार्गो के दोनों तरफ पर्याप्त जगह खाली छोड़ना चाहिए ताकि हाथी, ट्रेनों के आने की आवाज सूनकर या देखकर अलग हट सकें।

इन क्षेत्रों में ट्रेनों को केवल संवेदनशील चालकों द्वारा चलाया जाए जिन्हें इस मार्ग और निकट रहने वाले हाथियों के बारे में जानकारी हों। हाथियों का पूरा झुण्ड बाहर निकल सकें, इसके लिये पर्याप्त बड़े और समतल स्तर के क्रॉसिंग की जरूरत होगी। इन्हें सभी नियमित क्रॉसिग स्थलों पर बनाने की जरूरत है।

अलीपुर द्वार में रेलवे नियन्त्रण कक्ष को चौबीसों घंटा संचालित करना चाहिए जिसका खर्च वन एवं पर्यावरण मंत्रालय उठाएगा।

सभी मालगाड़ियों को हत्यारी ब्रॉडगेज से हटाकर वनों के बाहर दक्षिण की ओर मौजूद लाइनों से होकर चलाया जाए।

वन क्षेत्र के बाहर से गुजर रही रेल लाइन को मजबूत और दोहरा किया जाना चाहिए।

हाथी अभयारण्य अधिसूचित करने और गैर-अधिसूचित करने के बारे में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह को पत्र

25 जनवरी 2011

मुझे 16 जनवरी 2011 के टाइम्स ऑफ इंडिया में यह देखकर धक्का लगा कि छत्तीसगढ़ सरकार ने हाथी अभयारण्यों की अधिसूचना-सूची से लेमरू को निकाल देने का फैसला किया है और बादलकोल तामोरपिंग्ला एलिफैंट रिजर्व की अधिसूचना अभी तक जारी नहीं की है।

विडंबना है कि इन दोनों हाथी अभयारण्यों की अधिसूचना जारी करने की अनुमति वन एवं पर्यावरण मत्रालय ने 2007 में आपके अनुरोध के आधार पर दिया था जिसका जिक्र आपने अपने 28 मार्च 2005 के पत्र में किया था। आपने छत्तीसगढ़ को प्रोजेक्ट एलिफैंट में शामिल करने का अनुरोध भी किया था जिसे मान लिया गया है। मैं समझता हूँ कि राज्य सरकार वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को लगातार आश्वासन देती रही है कि अधिसूचना की प्रक्रिया चल रही है, पर ऐसा हुआ नहीं।

मैं यह जोड़ना चाहता हूँ कि लेमरू और बदालकोल तामोरपिंग्ला एलिफैंट संरक्षित क्षेत्र के रूप में पहले से अधिसूचित हैं। इसलिये इन वनक्षेत्रों का गैर-वानिकी उपयोग करने के लिये वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अन्तर्गत केन्द्र सरकार और वन्यजीव प्रतिरक्षण अधिनियम 1972 के अन्तर्गत एनबीडब्लूएल से वैधानिक अनुमति लेने की जरूरत होगी।

चूँकि, हाथी अभयारण्य की अधिसूचना राज्य सरकार के प्रशासनिक आदेश से जारी की जाती है इसलिये किसी हाथी अभयारण्य की घोषणा करने से गैर-वानिकी उपयोग पर कोई अतिरिक्त कानूनी या वैधानिक प्रतिबन्ध लागू नहीं होगा। हाथी अभयारण्य की घोषणा करने का मतलब खास इलाके में हाथियों पर अधिक ध्यान देना और उनका वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्धन करना है जिसका लाभ हाथियों और स्थानीय आबादी को मिले।

मैं आपसे एकबार फिर अनुरोध करूंगा कि अपने फैसले पर पुनर्विचार करें और इन दो इलाकों को हाथी अभयारण्य घोषित करें जैसाकि आप पहले चाहते थे। आप जानते हैं कि हाथी अब हमारा राष्ट्रीय धरोहर पशु है।

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सोहन चिड़िया (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के बारे में पत्र

9 जून 2010

आप जानते हैं कि सोहन चिड़िया अतिशय जोखिमग्रस्त प्रजाति है और गुजरात के कच्छ क्षेत्र में घास के मैदान उन क्षेत्रों में एक हैं जिनमें इस प्रजाति के पुनरूद्धार की सम्भावना है। पक्षी विज्ञानी मानते हैं कि भारतीय सोहन चिड़िया का संरक्षण उतना ही आवश्यक है जितना शेर और बाघ का संरक्षण। वास्तव में माननीय सलीम अली ने 1960 के दशक में यह प्रस्ताव दिया था कि सोहन चिड़िया को भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया जाए।

कच्छ क्षेत्र में कार्यरत संरक्षणकर्मी और शोधकर्ताओं ने मेरे ध्यान में लाया है कि नलिया (कच्छ) में अबदासा घास के मैदान को खेती के लिये मुक्त कर दिया गया है जो सोहन चिड़िया का मुख्य प्रजनन क्षेत्र है। एक शोधकर्ता ने ऐसी तस्वीरें भी भेजी हैं जिनमें कृषि की नई जमीन के सीमाँकन स्पष्ट नजर आते हैं।

 

 

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 38वीं के अन्तर्गत एक वैधानिक आवश्यकता है जो ऐसे इलाकों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिये अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त स्थानीय लोगों को स्थल-विशेष के बारे में खास सूचना देकर जागरूक बनाना भी बेहद जरूरी है। यह काम प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत केन्द्रीय सहायता से होना है। जैसाकि आप जानते हैं कि पिछले पांच महीनों में कॉर्बेट के भीतर और आसपास के इलाके में छह बाघों की मौत हो चुकी है।

 

 

मैं आपसे अविलम्ब हस्तक्षेप करने और राजस्व गोचर जमीन के विचलन को रोकने का अनुरोध करते हुए यह पत्र लिख रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप नालिया संरक्षण पहलकदमी को जिला प्रशासन का सहयोग मिलना सुनिश्चित करें। अगर हमने हस्तक्षेप नहीं किया तो गुजरात में सोहन चिड़िया के विलुप्त हो जाने की आशंका सही साबित हो जाएगी।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र के बारे में पत्र

11 जुलाई 2009

मैंने हाल में कॉर्बेट का दौरा किया और उस सुदंर परिवेश में बाघ एवं दूसरे वन्यजीवों को देखकर आँनदित हुआ। बाघों की इस वासस्थली का तत्परता के साथ प्रबन्धन करने के लिये राज्य के अधिकारी प्रशंसा के पात्र हैं। सत्तर के दशक में प्रोजेक्ट टाइगर को यहीं आरम्भ किया गया था।

कॉर्बेट भू-परिदृश्य की पारिस्थितिकीय अखंडता को सुनश्चित करने के लिये पारिस्थितिकीय चिन्ताएं भी हैं जिनके सम्बन्ध में कार्रवाई आवश्यक है। वे निम्नलिखित हैं:-

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के कोर/क्रिटिकल इलाके के चारो तरफ बफर/बाहरी इलाके का निरूपण करने की आवश्यकता है। इसके अन्तर्गत लैंसडाउन, वेस्ट तराई और रामनगर वन क्षेत्र के हिस्से शामिल होंगे। यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 38वीं के अन्तर्गत एक वैधानिक आवश्यकता है जो ऐसे इलाकों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिये अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त स्थानीय लोगों को स्थल-विशेष के बारे में खास सूचना देकर जागरूक बनाना भी बेहद जरूरी है। यह काम प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत केन्द्रीय सहायता से होना है। जैसाकि आप जानते हैं कि पिछले पांच महीनों में कॉर्बेट के भीतर और आसपास के इलाके में छह बाघों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा बाघ-मनुष्य संघर्ष की घटनाएं लगातार जारी हैं। क्षेत्रीय निदेशक (फिल्ड डायरेक्टर) के एकीकृत नियन्त्रण में बफर जोन के रहने पर अपेक्षित संस्थानिक व्यवस्था और कोषगत सहायता उपलब्ध हो सकेगी जिससे ऐसे मामलों का मुकाबला आसानी से किया जा सकेगा। बफर जोन के बारे में स्पष्टीकरण पहले ही जारी किये जा चुके हैं जिनकी हैसियत किसी भी हालत में राष्ट्रीय उद्यान/वन्यजीव अभयारण्य जैसी नहीं होगी बल्कि वह विविध उपयोग वाला इलाका होगा।

कॉर्बेट और आसपास के इलाके की सुरक्षा व्यवस्था को गुप्त सूचनाओं के सहारे मजबूत बनाने की जरूरत है। इसके बारे में स्थानीय अधिकारियों के साथ विचार विमर्श किया गया है। प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत केन्द्रीय सहायता से स्थानीय निवासियों को शामिल करके सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना है। इन योजनाओं के बेहतर कार्यान्वयन एवं सूचनाओं के तेजी से आदान-प्रदान के लिये विभिन्न उपकरणों, नाइट विजन वाहन/माइक्रोलाइट की खरीद की जानी है।

बफर जोन में अनियन्त्रित ढंग से अनेक निजी रिसॉर्ट पनपने के अलावा बाघ वासस्थल के कोर/क्रिटिकल क्षेत्र में भी पर्यटन की अनेक अधिसंरचनाएं मौजूद हैं। ये इस गलियारे की महत्ता को घटा रहे हैं। बफर जोन में पड़ने वाली गैर-वनीय क्षेत्रों को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत सुरक्षा दी जानी चाहिए ताकि पारिस्थितिकीय रूप से गैर टिकाऊ भूमि उपयोग को रोका जा सके। इसके अलावा कोर क्षेत्र से पर्यटन की गतिविधियों को क्रमबद्ध ढंग से हटाकर बफर जोन में भेज देना चाहिए जैसाकि प्रोजेक्ट टाइगर की मार्गदर्शिका में संकेत किया गया है।

मैं उपरोक्त मामले में आपसे हस्तक्षेप की अपेक्षा करता हूँ और बाघ के संरक्षण में अपना पूरा सहयोग देने का आश्वासन देता हूँ।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सरिस्का में साम्भर के पुनर्वास के बारे में पत्र

2 दिसम्बर 2010

मैं सरिस्का से जुड़े दो गम्भीर मसलों की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ। यह पता चला है कि हाल में सरिस्का के कोर इलाके से बड़ी संख्या में साम्भरों को पकड़कर उनका कुम्बलगढ़ में पुनर्वास किया गया है। ऐसे कार्यों का वासस्थलों में परभक्षी-खाद्य संतुलन पर उल्लेखनीय प्रभाव हो सकता है जिससे पारिस्थितिकीय जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इस बारे में एनटीसीए जो टाइगर रिजर्व्स के मामले में वैधानिक संस्था है से सलाह भी नहीं ली गई। जैसाकि आप जानते हैं कि हम सरिस्का का फिर से निर्माण करने की प्रक्रिया में हैं और बाघों के पुनर्वास पर उल्लेखनीय प्रयास एवं संसाधन खर्च किये गए हैं। इसीलिये टाइगर रिजर्व के कोर इलाके से प्रमुख खाद्य प्रजाति को बिना किसी तकनीकी सलाह के हटाने जैसी कार्रवाई बहुत ही गम्भीर मसला है। मैं आपसे निजी हस्तक्षेप द्वारा सरिस्का से आगे साम्भरों को हटाने पर अविलम्ब रोक लगाने का अनुरोध करता हूँ।

दूसरा गम्भीर मसला जिसे आपके ध्यान में लाना है, वह सरिस्का के कोर इलाके में स्थित कंक्वारी किला का पुनरूद्धार कार्य बिना उचित अनुमति कराया जाना है। पता चला है कि उक्त किले को सम्भवतः पर्यटकों के भ्रमण/ठहराव बढ़ने की उम्मीद में पर्यटन विभाग की सहायता से पुर्नबहाल किया गया है। यह गम्भीर चिन्ता का विषय है क्योंकि इस क्षेत्र को अक्षत रखने के मानक का यह उल्लंघन करता है। भारत सरकार कोर इलाके को अक्षत रखने के लिये उसमें स्थित गाँवों को दूसरी जगह बसाने में उल्लेखनीय केन्द्रीय सहायता (प्रोजेक्ट टाइगर के अन्तर्गत 100 प्रतिशत) दे रही है। चालू वर्ष के दौरान 37.20 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है जिसमें 18.60 करोड रुपए को इस मद में जारी किया गया है। कोर इलाके को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार अक्षत रखा जाना है। इसीलिये पर्यटन की गतिविधियों को कड़ाई के साथ नियन्त्रित करने की जरूरत है। ऐसी गतिविधियों को क्रमबद्ध ढंग से बफर इलाके में आरम्भ किया जा सकता है। इस मामले में मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने के साथ-साथ कंक्वारी किला को पर्यटन के उपयोग में लाने से रोकने का अनुरोध कर रहा हूँ। पांडुपोल मंदिर में श्रद्धालुओं के भी समूह में जाने की व्यवस्था कर आवाजाही को नियन्त्रित करने की जरूरत है।

मैंने सरिस्का के परिस्थितियों की समीक्षा की है और भारतीय वन्यजीव संस्थान एवं एनटीसीए के अधिकारियों को रेडियो संचार मॉनिटरिंग प्रणाली मजबूत करने का निर्देश दिया है। वे बाहरी इलाके में आजीविका के अवसरों को लेकर योजना बनाने में राज्य सरकार को सहायता प्रदान करेंगे।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चीता के पुनर्स्थापन के बारे में पत्र

15 सितंबर 2010

आपके 17 अगस्त 2010 के पत्र के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद। इस पत्र में आपने कुनो-पालपुर और नौरादेही में चीता पुनर्वास के प्रस्ताव पर अपनी सैद्धांतिक सहमति दी है। साथ ही इस प्रस्ताव को कुछ विस्तार से बताने के लिये भारतीय वन्यजीव संस्थान के डॉ. एम.के.रंजीत सिंह एवं डॉ.वाई. झाला को अवसर देने की सूचना दी है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि यह परियोजना राज्य सरकार, केन्द्र सरकार एवं अन्य सहभागी संस्थाओं जैसे-भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय वन्यजीव न्यास सहित कुछ अन्य संस्थाओं की साझीदारी में संचालित होगी। चीता परियोजना नई परियोजना होगी जो प्रोजेक्ट टाइगर व दूसरे प्रकल्पों से अलग होगी और इसका अलग कोष होगा जो वन एवं पर्यावरण मंत्रालय प्रदान करेगा।

मेरी ऐसी समझ बनी है कि आप और राज्य के अधिकारियों का रूख बेहद सकारात्मक है। आपने आश्वासन दिया है कि इस परियोजना में वचनबद्ध और प्रमाणित योग्यता वाले समर्पित कर्मचारियों को तैनात किया जाएगा जिससे उनके प्रशिक्षण का पूरा लाभ उठाया जा सके।

मैं आपको और मध्यप्रदेश राज्य को धन्यवाद देना चाहता हूँ। जैसाकि आप चाहते हैं हम कुनो-पालपुर में पुनर्वास कार्यक्रम को पहली प्राथमिकता देंगे और नौरादेही को उसके बाद लिया जाएगा। अब हम इस परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। अगले चरण में इसे कार्यबल द्वारा विकसित किया जाएगा जिसकी नियुक्ति मैंने की है और जिसमें आपके मुख्य वन्यजीव संरक्षक एक सदस्य हैं। पहला काम दोनों स्थलों का विस्तृत सर्वेक्षण करना होगा ताकि इको-रिस्टोरेशन योजना (eco-restoration plan) तैयार किया जा सके और दूसरी आवश्यकताएं पूरी की जा सकें। इसके साथ ही अगले तीन वर्षों के लिये विस्तृत बजट तैयार करना होगा जिसमें राज्य के अधिकारियों का सहयोग बेहद जरूरी है।

परियोजना में सभी पक्षों की सक्रिय हिस्सेदारी और सहयोग के बल पर मैं बिल्कुल आश्वस्त हूँ कि हम इस परियोजना का कार्यान्वयन शीघ्र करने में सफल होंगे।

मनुष्य-जानवर संघर्ष के बारे में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र

8 अक्टूबर 2010

अनेक राज्यों से अक्सर मनुष्य-जानवर संघर्ष की सूचनाएं मिलती है क्योंकि जंगली जानवर जैसे बाघ और तेंदुआ आदि मानव बस्तियों के आसपास चले आते हैं। स्थानीय लोग अक्सर उस इलाके को घेर लेते हैं जिससे हिंसक भीड़ एकत्र होने जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। ठीक ऐसी ही परिस्थिति के कारण स्थानीय लोगों की भीड़ से घिरे बाघ को नशीली दवा देकर शांत करने की कोशिश में राजस्थान के एक रेंज अधिकारी बहुत ही गम्भीर रूप से घायल हो गए थे।

चूँकि ऐसी स्थिति में जानवरों को रसायनों के माध्यम से अचेत करना या जाल बिछाकर पकड़ना सम्भव नहीं होता इसीलिये जिलाधिकारी के साथ ही अन्य स्थानीय अधिकारियों को सचेत रहना आवश्यक है ताकि भीड़ को इकट्ठा होने से रोकने के एहतियाती इंतजाम किये जा सकें। भटके हुए बाघ या तेंदुआ के मामले को सांप्रदायिक हिंसा की तरह लेना चाहिए और स्थानीय पुलिस एवं राज्य सशत्र पुलिस को पर्याप्त संख्या में तैनात किया जाना चाहिए। इसके साथ ही स्थानीय लोगों को भी जागरूक बनाना चाहिए। इसके अलावा जानलेवा मुठभेड़ों को टालने के लिये उन इलाकों में आईपीसी की धारा 144 के अन्तर्गत निषेधाज्ञा भी जारी कर दी जानी चाहिए।

मैं इस मामले में जिलाधिकारी/दंडाधिकारी को आवश्यक निर्देश देने के लिये आपसे व्यक्तिगत हस्तक्षेप का अनुरोध करता हूँ।

आर्द्रभूमि को चिन्हित करने के बारे में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र

23 दिसम्बर 2010

जैसाकि आप जानते हैं कि आर्द्रभूमि अनूठे और विशिष्ट पारिस्थितिकी-तंत्र हैं जिनके संरक्षण के लिये समन्वित और संगठित प्रयास की जरूरत है। आर्द्रभूमियों को विभिन्न मानवजनित दबावों और शहरीकरण की प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है जिसका परिणाम आर्द्र इलाके का सिकुड़ना, जैव विविधता का नाश, आर्द्रभूमि का इस्तेमाल अन्य कार्यों के लिये किया जाना इत्यादि होता है। इन सभी कारकों को ध्यान रखते हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने आर्द्रभूमि के संरक्षण के लिये 1987 में एक योजना आरम्भ किया था। इस योजना में संरक्षण एवं प्रबन्धन गतिविधियों के साथ शोध और विकास की गतिविधियाँ भी शामिल हैं। इस परियोजना के अन्तर्गत सभी राज्यों/केन्द्रशासित प्रदेशों में फैले 115 आर्द्रभूमियों को चिन्हित किया गया है जिनके संरक्षण की व्यवस्था, प्रबन्धन कार्ययोजना के माध्यम से की जाएगी।

आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबन्धन के प्रयासों को अतिरिक्त प्रोत्साहन देने के लिये केन्द्र सरकार ने आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबन्धन) नियमावली 2010 को अधिसूचित किया है। यह नियमावली न केवल एक नियामक व्यवस्था प्रदान करती है बल्कि उन गतिविधियों का विवरण भी देती है जिन पर आर्द्रभूमियों में प्रतिबन्ध लगाने की जरूरत है। मैं इस नियमावली की गजट अधिसूचना की एक प्रति संलग्न कर रहा हूँ।

 

 

इन नियमावलियों के प्रावधानों के अनुसार राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों की सरकारों को अपने अधिकार क्षेत्र में नियम 3 के अन्तर्गत निर्धारित मानदंडों के अनुसार आर्द्रभूमियों को न केवल चिन्हित करना है। इसके बाद चिन्हित आर्द्रभूमियों की बुनियादी सूचनाओं के बारे में संक्षिप्त दस्तावेज भी सौंपना है। नियामक गतिविधियों को लागू करने के अलावा आर्द्रभूमियों के बेहतर उपयोग और प्रबन्धन सुनिश्चित करने में राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों की सरकारों की बड़ी भूमिका है।

 

 

आप गौर करेंगे कि सभी रामसर स्थल अधिसूचित किये गए हैं। अन्य आर्द्रभूमि जो इन नियमावलियों में निर्धारित मानदंडों के दायरे में आते हैं उनको सम्बन्धित राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों की सरकारें चिन्हित करेंगी और प्रत्येक आर्द्रभूमि के बारे में केन्द्रीय आर्द्रभूमि नियामक प्राधिकरण (Central Wetlands Regulatory Authority, CWRA) को संक्षिप्त प्रस्ताव सौंपेगी। प्राधिकरण का गठन इस नियमावली के अन्तर्गत अधिकतम एक वर्ष के अन्दर किया जाएगा। सीडब्लूआरए की सिफारिश पर केन्द्र सरकार चिन्हित आर्द्रभूमियों की अधिसूचना जारी करेगी। इसके साथ ही सीडब्लूआरए को अधिसूचित आर्द्रभूमियों में विभिन्न गतिविधियों को नियन्त्रित करने का अधिकार भी दिया गया है।

इन नियमावलियों के प्रावधानों के अनुसार राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों की सरकारों को अपने अधिकार क्षेत्र में नियम 3 के अन्तर्गत निर्धारित मानदंडों के अनुसार आर्द्रभूमियों को न केवल चिन्हित करना है। इसके बाद चिन्हित आर्द्रभूमियों की बुनियादी सूचनाओं के बारे में संक्षिप्त दस्तावेज भी सौंपना है। नियामक गतिविधियों को लागू करने के अलावा आर्द्रभूमियों के बेहतर उपयोग और प्रबन्धन सुनिश्चित करने में राज्य/केन्द्रशासित प्रदेशों की सरकारों की बड़ी भूमिका है। वो संरक्षित क्षेत्रों में स्थित आर्द्रभूमियों का वन विभाग और संरक्षित क्षेत्र से बाहर स्थित आर्द्रभूमियों का दूसरी नोडल एजेंसियों के सहयोग से प्रबन्धन करेंगी।

राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश की सरकारों द्वारा नियमावली में दिए गए मानदंडों के आधार पर चिन्हित नई आर्द्रभूमियों के बारे में अधिसूचना जारी करने सम्बन्धी प्रस्तावों को फौरन हमारे पास भेजा जाना चाहिए। फलतः इनके बेहतर उपयोग के लिहाज से उन गतिविधियों को नियन्त्रित किया जा सके जो आर्द्रभूमियों के लिये रामसर अधिघोषणा 1971 का मिशन है जिसका अपना देश भी एक हस्ताक्षरी है।

इस मामले में तेजी से कार्रवाई करने के लिये अपने राज्य/केन्द्रशासित प्रदेश के सम्बन्धित अधिकारियों को निर्देश देकर आप आर्द्रभूमि के संरक्षण के संयुक्त प्रयासों में सहयोग करेंगे जिसके लिये मैं आपका आभारी रहूँगा।

गांगेय सोंस के परिरक्षण के लिये उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पत्र

14 जनवरी 2010

यह पत्र नरौरा के निकट गंगा नदी और गाँगेय सोंस के संरक्षण के बारे में 2 नवंबर 2009 के आपके पत्र के सन्दर्भ में है।

मुझे आपको सूचना देते हुए प्रसन्नता हो रही है कि गंगा नदी के संरक्षण और प्रदूषण को कारगर ढंग से नियन्त्रित करने के लिये सरकार ने राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण (National Ganga River Basin Authority, NGRBA) का गठन किया है जो नदी घाटी आधारित पद्धति अपनाएगा। एनजीआरबीए की पहली बैठक 5 अक्टूबर 2009 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई जिसमें तय हुआ कि ‘मिशन क्लीन गंगा’ (Mission Clean Ganga) के अन्तर्गत गंगा नदी में अपरिष्कृत शहरी मलजल या औद्योगिक कचरे का प्रवाह वर्ष 2020 तक पूरी तरह रोक दिया जाएगा। उत्तर प्रदेश समेत विभिन्न राज्य सरकारों से गंगा नदी के प्रदूषण को रोकने के लिये समन्वित प्रस्ताव सौंपने के लिये अनुरोध किया गया है।

मंत्रालय ने पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर.के. सिन्हा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया है जिसका कार्य गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों में ऐसे इलाकों को चिन्हित करना और प्राथमिकता निर्धारित करनी है जिनमें गाँगेय सोंस पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इस समिति को सोंसों के संरक्षण के लिये कार्ययोजना तैयार करने का भी जिम्मा सौंपा गया है।

समुद्र तटीय प्रदूषण के बारे में केन्द्रीय रक्षा राज्यमंत्री एम.एम. पल्लम राजू को पत्र

13 नवंबर 2010

मैं तटीय प्रदूषण से सम्बन्धित एक बड़ी समस्या की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जो अभी उभर रही है और इस मामले में आपकी सहायता चाहता हूँ। प्रदूषण की मुख्य वजह समुद्री इलाकों में तारबॉल्स का निकलना है जो जहाजों द्वारा छोड़े गए कचरा तेल के समुद्री जल से प्रतिक्रिया करने का परिणाम हैं। यह देश के पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र की नियमित परिघटना हो गई है और इसका तटीय पारिस्थितिकी-तंत्र पर उल्लेखनीय रूप से नुकसानदेह प्रभाव हो रहा है। अगस्त 2010 के दौरान गोवा के समुद्र तट पर बड़ी संख्या में तारबॉल्स उभर आए। इस मामले में गोवा सरकार के विज्ञान, तकनीक और पर्यावरण विभाग का नोट ‘‘गोवा के तटों पर तार बाल्स उभरने की परिघटना’’ के साथ ही राष्ट्रीय समुद्रविज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography, NIO) का एक आलेख आपकी जानकारी के लिये संलग्न किया जा रहा है। यह नोट रेखांकित करता है कि तारबॉल्स निकलने की यह परिघटना लगातार हो रही है जो निश्चित रूप से जहाजों द्वारा कचरा तेल गैर कानूनी ढंग से समुद्री जल में छोड़ने/ डंम्प करके भाग जाने का परिणाम है।

इस समस्या को रोकने में मैं आपसे सहायता का अनुरोध करता हूँ जो देश के अनेक समुद्री तटों को प्रभावित कर रहा है। इंडियन कोस्ट गार्ड (Indian Coast Guard) द्वारा निगरानी और कार्यकारी गतिविधियों को खासतौर से सशक्त बनाने की जरूरत है ताकि ऐसी घटनाओं को कारगर ढंग से रोका जा सके और गड़बड़ी करने वाले जहाजों पर कठोर कार्रवाई की जा सके। मैं आपसे अनुरोध करना चाहता हूँ कि इस मामले में इंडियन कोस्ट गार्ड के महानिदेशक से बात करें और उपयुक्त कार्ययोजना तैयार करवाएं जिससे इसपर निगरानी रखने के साथ ही समुचित भी कार्रवाई की जा सके। कार्ययोजना को हमारे साथ साझा किया जाना मुझे अच्छा लगेगा। कार्ययोजना तैयार करने में अपनी ओर से कोई भी सहायता प्रदान करके हमें प्रसन्नता होगी।

न्हावा द्वीप के संरक्षण के बारे में केन्द्रीय रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी को पत्र

7 दिसम्बर 2009

मैं एक पर्यावरणीय मसले के बारे में आपको लिख रहा हूँ जिस पर आपको तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मुंबई के न्हावा द्वीप के संरक्षण के बारे में है। मुंबई हार्बर क्षेत्र में स्थित यह द्वीप पर्यावरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील क्षेत्र है और उस द्वीप से महज 1.5 किलोमीटर दूर है जिसपर विश्व धरोहर एलिफैंटा की गुफाएँ स्थित हैं।

न्हावा का महत्त्व इसलिये भी है कि भारत का सबसे पुराना समुद्रविज्ञानी प्रशिक्षण संस्थान (Nautical Training institute)-ट्रेनिंग शिप रहमान (Training Ship Rahman) और भारत का पहला मरीन म्यूजियम (Marine Museum) इस पर स्थित है। न्हावा का महत्त्व कई कारणों से कई गुना बढ़ जाता है। यह नवी बंबई में समुद्र तट पर स्थित इकलौता हरित क्षेत्र है। समुद्र तट के दूसरे इलाके नष्ट हो गये या दूसरी एजेंसियों द्वारा अधिग्रहित कर लिये गये। पूरा शेवा इलाका जवाहरलाल नेहरू बन्दरगाह द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया जिसमें क्षेत्रीय पार्क के तौर पर चिन्हित इलाका भी शामिल है। उरन पर नौसेना का शस्त्र भंडार, शराब कारखाना और ओएनजीसी टर्मिनल स्थित है। इनमें कुछ गतिविधियों के लिये पानी के सामने रहने की जरूरत नहीं है।

चूँकि, अब नया शहर ‘नवी मुंबई’ के रूप में विकसित हो रहा है और इसके निवासी समुद्र तट तक पहुँचने की सुविधा चाहेंगे जिसके लिये ऐसी इकलौती जगह न्हावा ही बची है। इसके अतिरिक्त बृहत्तर बंबई के निवासियों के लिये न्हावा बंबई हार्बर के भीतर और आसपास अकेला हरित क्षेत्र है जहाँ समुद्र से पहुँचा जा सकता है। ट्रैफिक समस्या से पीड़ित महानगर के लिये यह ऐसी चीज है जो बहुत महत्त्वपूर्ण है और बंबई के निवासियों के लिये बेहद अर्थवान है।

इन कारणों के अलावा एनजीसी और मझगाँव डॉक्स लिमिटेड द्वारा लिये गए इलाके को छोडकर पूरे न्हावा द्वीप में सघन काष्ठ वन हैं और केवल इसी आधार पर इसका संरक्षण किया जाना चाहिए।

एलिफैंटा का मामला समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। एलिफैंटा जाने वाले बहुसंख्यक दर्शकों में से अधिकांश वहाँ गुफाओं को देखने नहीं जाते बल्कि सैर करने जाते हैं जिसमें समुद्र तटीय भ्रमण का आकर्षण भी होता है। इससे गुफाओं पर अवांक्षित दबाव पड़ रहा है और वहाँ मौजूद पुरातात्विक कलाकृतियों पर संकट उत्पन्न होता है। यह संकट खुदाई से निकले और जमीन के भीतर मौजूद दोनों तरह की कलाकृतियों पर है। पुरातात्विक विशेषज्ञों ने बार-बार इस समस्या की ओर ध्यान दिलाया है। इसीलिये यह महत्त्वपूर्ण है कि हार्बर क्षेत्र में दूसरे हरित क्षेत्र विकसित किए जाएं ताकि सैलानियों की भीड़ को एलिफैंटा की बजाय दूसरी ओर मोड़ा जा सके और न्हावा इसके लिये एकदम उपयुक्त है।

 

 

पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र अधिसूचना का मसौदा पहले ही जारी कर दिया है जिसमें दांडी और आसपास के तीन अन्य गाँव ओन्जाल, मटवड और सामापोर को ईएसए घोषित करने का प्रस्ताव किया है। इस अधिसूचना का गुजराती में अनुवाद कराया गया है और गुजरात इकोलॉजी कमीशन द्वारा बड़े पैमाने पर प्रचारित किया गया है। ईएसए अधिसूचना के मसौदे पर इन चार गाँवों के घर-घर से प्रतिक्रिया लेने के लिये एक समर्पित एनजीओ को जिम्मा दिया गया है।

 

 

उपरोक्त बातों को स्वीकार करते हुए दिवंगत प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने न्हावा के संरक्षण के लिये लगातार कई निर्देश जुलाई 1980, अगस्त 1980 और अगस्त 1982 में जारी किया था। मैं उन निर्देशों की प्रति संलग्न कर रहा हूँ। आप गौर करेंगे कि उन्होंने निर्देश दिया था कि ओएनजीसी और मझगाँव डॉक्स समुद्र तटीय व्यवस्था स्थापित कर सकते हैं पर केवल अपेक्षित योजना के अनुसार ही। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया था कि इन संगठनों की गतिविधियों को न्हावा द्वीप पर विस्तार देने की अनुमति किसी भी हालत में नहीं दी जाएगी। इन निर्देशों को उन्होंने 1982 में दुहराया था।

बहुत पहले 1995 में तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री न्हावा द्वीप को पर्यावरण परिरक्षण अधिनियम 1986 (Environment Protection Act, 1986) के अन्तर्गत वैधानिक संरक्षण देने पर सहमत हो गए थे। तब वह प्रयास कानून मंत्रालय के एतराज की वजह से नाकाम हो गया था जिसे अब सुलझ गया है। हम इस सुरक्षा प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं।

अब ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि मझगाँव डॉक्स न्हावा में अतिरिक्त सुविधाएं स्थापित करना चाहता है। यह स्पष्ट रूप से इंदिराजी के निर्देश का उल्लंघन होगा। अगर ऐसी योजना सचमुच है तो मैं सलाह दूंगा कि वैकल्पिक स्थल का चयन किया जाए। इस मामले में आप हस्तक्षेप करें तो बड़ी कृपा होगी।

प्रधानमंत्री को दांडी ईको-पहल के बारे में पत्र

19 जुलाई 2010

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने दांडी में 25 करोड़ की लागत से पारिस्थितिकीय-पहल आरम्भ किया है। इसका उद्घाटन श्री गोपाल कृष्ण गाँधी ने 7 जुलाई 2010 को किया। इस परियोजना को पूरा होने में दो वर्ष लगेंगे और यह छोटा मगर महत्त्वपूर्ण प्रयास है जो दांडी को पारिस्थितिकीय रूप से टिकाऊ बनाने के लिये हमारी ओर से किया जा रहा है।

दांडी स्मारक उच्चस्तरीय समिति के अध्यक्ष गोपालकृष्ण गाँधी को पत्र

10 नवंबर 2010

मुझे प्रसन्नता है कि आपने सौर्य उर्जा से प्रकाशित जिस संरचना-‘दिवा दांडी’ का चुनाव किया है वह दांडी में स्थापित करने के लिये किसी विशाल संरचना की अपेक्षा बेहतर स्मारक है।

जैसाकि आप जानते होंगे कि मंत्रालय ने पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (Ecological Sensitive Area,ESA) अधिसूचना का मसौदा पहले ही जारी कर दिया है जिसमें दांडी और आसपास के तीन अन्य गाँव ओन्जाल, मटवड और सामापोर को ईएसए घोषित करने का प्रस्ताव किया है। इस अधिसूचना का गुजराती में अनुवाद कराया गया है और गुजरात इकोलॉजी कमीशन (Gujarat Ecology Commission, GEC) द्वारा बड़े पैमाने पर प्रचारित किया गया है। ईएसए अधिसूचना के मसौदे पर इन चार गाँवों के घर-घर से प्रतिक्रिया लेने के लिये एक समर्पित एनजीओ को जिम्मा दिया गया है। मसौदे पर प्रतिक्रियायें साठ दिनों तक प्राप्त करने के बाद अधिसूचना पर अन्तिम फैसला लिया जाएगा। अधिसूचना के मसौदे में उन गतिविधियों की सूची दी गई है जिनके आधार पर इस इलाके में प्रतिबन्ध लगाया जाएगा। इन गतिविधियों में औद्योगिक गतिविधियाँ, बड़े पैमाने पर पर्यटन, खनन, वृक्षों की कटाई इत्यादि शामिल हैं। पारिस्थितिकी के अनुकूल (Eco-Friendly) गतिविधियाँ जैसे-हरित क्षेत्र का विकास, बागवानी, पारिस्थितिकी के अनुकूल पर्यटन इत्यादि को प्रोत्साहित किया जाएगा। आपकी जानकारी के लिये अधिसूचना की प्रति संलग्न की जा रही है।

इसके अलावा उपरोक्त चारों गाँव समुद्र तट पर स्थित हैं इसीलिये उनपर तटीय क्षेत्र नियामक (Coastal Regulation Zone,CRZ) अधिसूचना 1991 के प्रावधान भी लागू होते हैं। यह अधिसूचना सीआरजेड क्षेत्र में वर्गीकरण के आधार पर कई गतिविधियों को प्रतिबन्धित करती है वहीं, कुछ को नियन्त्रण के साथ अनुमति देती है। इसीलिये यह अनिवार्य है कि इलाके का सीआरजेड मानचित्र तैयार किया जाए। इसके अलावा सीआरजेड अधिसूचना 1991 के प्रावधानों के अनुसार गुजरात तटीय क्षेत्र प्रबन्धन प्राधिकरण (Gujarat Coastal Zone Management Authority, GCZMA) एवं दूसरे सम्बन्धित एजेंसियों से आवश्यक अनुमति प्राप्त की जाए।

मेरे मंत्रालय द्वारा सोसाइटी ऑफ इंटिग्रेटेड कोस्टल मैनेजमेंट (Society of Integrated Coastal Management, SICM) के माध्यम से आरम्भ की गई स्मारक परियोजना, ग्रीन एक्शन फॅार नेशनल दांडी हेरिटेज इनिशिएटिव (Green Action for National Dandi Heritage Initiative,GANDHI) की रूपरेखा ऐसी बनाई गई है कि ये दोनों ही अधिसूचनाओं के अनुकूल हो। मैं उम्मीद करता हूँ कि केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग (Central Public Works Department,CPWD) व गुजरात सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा प्रस्तावित संरचनाएं/गतिविधियाँ सीआरजेड अधिसूचना 1991 और प्रस्तावित ईएसए अधिसूचना के अनुरूप होंगी।

पंजाब विधानसभा में राज्य के जलस्रोतों को प्रदूषण मुक्त बनाने के प्रस्ताव के सन्दर्भ में मेरे लेक्चर के बारे में प्रधानमंत्री को पत्र

(पंजाब विधानसभा द्वारा 30 सितंबर 2010 को) (सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘यह सदन राज्य को प्रदूषण मुक्त बनाने की योजना में पूरे आन्तरिक मन से सहायता करने के लिये केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को धन्यवाद देता है।)

7 अक्टूबर 2010

पंजाब विधानसभा द्वारा राज्य के जलस्रोतों को प्रदूषण मुक्त करने में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के प्रयासों और सहयोग को स्वीकार करते हुए 30 सितंबर 2010 को एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया जिसकी प्रति संलग्न कर रहा हूँ। मैं पंजाब की नदियों को साफ करने की परियोजनाओं, जिन्हें मई 2009 के बाद अनुमति दी गयी, के बारे में एक वक्तव्य को भी संलग्न कर रहा हूँ जिनसे इस प्रस्ताव को पारित करने की प्रेरणा मिली होगी।

केरल के मुख्यमंत्री वी.एस.अच्युतानंदन को सबरीमाला में भगदड़ और उठाए जाने वाले कदमों के बारे में पत्र

1 फरवरी 2011

सबरीमाला के पास हाल में भगदड़ में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौत भयानक और गहरी चिन्ता का कारण है। जैसाकि आप जानते हैं कि सबरीमाला मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बीते वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। खासकर उत्सवों के मौसम में इनकी संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हो जाती है।

लोक लेखा समिति ने सबरीमाला का दौरा किया है और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के बारे में अनेक टिप्पणियाँ / सिफारिशें की हैं। (अट्ठारहवीं रिपोर्ट/पीएसी/2005-06/चौदहवीं लोकसभा/1 दिसम्बर 2005) वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने त्रावणकोर देवस्थानम बोर्ड (Travancore Devsthanam Board, TDB) और राज्य सरकार के परामर्श से इस क्षेत्र के पेशेवर जानकारों द्वारा एक समग्र योजना तैयार कराने का फैसला किया है और इसके लिये उच्चस्तरीय समन्वय समिति का गठन किया है। इस मास्टर प्लान को तैयार करने के लिये राज्य सरकार को 57 लाख रुपए (100 प्रतिशत केन्द्रीय अनुदान) दिया गया है। इसके अलावा मास्टर प्लान के कार्यान्वयन के लिये पेरियार टाइगर रिजर्व के अन्दर 12.675 हेक्टेयर वन भूमि और नीलाक्कल में 110.524 हेक्टेयर वनभूमि के विचलन की अनुमति मंत्रालय ने दी है। यह श्रद्धालुओं के लिये विभिन्न सुविधाओं के लिये समय-समय पर पेरियार टाइगर रिजर्व में पहले उपलब्ध कराई गयी126.681 हेक्टेयर वनभूमि के अतिरिक्त है। उक्त मास्टर प्लान को राज्य सरकार ने कार्यान्वयन के लिये स्वीकार कर लिया है।

मैंने सरजमीनी मूल्यांकन के लिये एनटीसीए के सदस्य-सचिव को हाल में वहाँ भेजा था। मास्टर प्लान का कार्यान्वयन समयबद्ध ढंग से नहीं कराया जा रहा है। मास्टर प्लान को पेशेवर एजेंसी द्वारा गहन परिश्रम से बनाया गया है और इसमें ढेर सारे मापदंडों का ध्यान रखा गया है जिसमें यातायात और परिवहन, ठोस कचरे का निपटारा, जलापूर्ति, स्वच्छता, सुविधाएं और सेवाएं शामिल हैं। इसकी सराहना की जानी चाहिए। इसमें व्यावसायिक, स्वास्थ्यगत, अग्निशामक, उर्जा और संचार की सुविधाओं का भी ध्यान रखा गया है। इसके अलावा इसमें भू-परिदृष्य मापदंड, निर्मित क्षेत्र के मापदंड, आपदा प्रबन्धन नियमावली और 2050 तक का दृष्टिपत्र भी शामिल है। मास्टर प्लान का विश्वसनीय और समय पर कार्यान्वयन इलाके में किसी तरह की आपदा का निराकरण कर सकता है। उक्त मास्टर प्लान के कार्यान्वयन का प्रभावशाली ढंग से निगरानी करने की आवश्यकता है। टीडीबी ने इलाके में स्वच्छता को सुनिश्चित नहीं किया है और पास में बहने वाली पंम्बा नदी, मानव मल और कचरे से बुरी-तरह प्रदूषित हो गई है। पंम्बा नदी के शुद्धिकरण का कार्यक्रम इस तथ्य के बावजूद गति नहीं पकड़ पाया है कि इसके लिये मई 2003 में 18.45 करोड रुपए आवंटित किये गए जिसमें से केन्द्र सरकार ने 3.78 करोड़ जारी भी कर दिया है।

हाल की भगदड़ में इतने लोगों की मौत की घटना की वजह उप्पुपारा के पास रास्ता अस्थाई तौर पर बन्द कर दिया जाना बताया जा रहा है। उपरोक्त स्थल पर हजारों लोग ‘मकराविलाक्कू’ को देखने के लिये पास के वालाकादाऊ-वांडी पेरियार हाइवे के चौथे माइल से निकले वनपथ से होकर एकत्र हुए थे।

इस सन्दर्भ में निम्नलिखित कार्रवाई की सिफारिश की जाती है:-

मास्टर प्लान का परियोजना के रूप में समयबद्ध ढंग से कार्यान्वयन हो, मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति करने के साथ सहयोगी कार्यकारी अधिकारियों की नियुक्ति की जाए क्योंकि टीडीबी इस कार्य को करने में सक्षम नहीं है।

मास्टर प्लान कार्यान्वयन परियोजना (पंम्बा नदी शुद्धिकरण समेत) के लिये वित्तीय सहायता देने में अगर राज्य सरकार/टीडीबी सक्षम नहीं हो तो यह किसी दाता एजेंसी के माध्यम से जुटाई जा सकती है।

एक स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे मास्टर प्लान के कार्यान्वयन की त्रैमासिक समीक्षा की जा सके।

भविष्य में उप्पुपारा में भगदड़ की घटनाओं से बचने के लिये चौथे माइल से उप्पुपारा के बीच वाहनों की आवाजाही को बन्द कर देनी चाहिए और सत्राम प्रवेश पथ से आवाजाही की व्यवस्था की जानी चाहिए जैसाकि मास्टर प्लान में सुझाव दिया गया है।

मैं यह जोड़ना चाहता हूँ कि मास्टर प्लान का अनुपालन नहीं होने पर मंत्रालय द्वारा वनभूमि के विचलन की अनुमति रद्द हो जाएगी। टीडीबी द्वारा अभी वनभूमि के विचलन की कोई माँग अर्थहीन है क्योंकि उपलब्ध कराई गयी वनभूमि का उपयोग मास्टर प्लान में निर्देशित ढंग से नहीं किया जा रहा है।

इस मामले में आपके व्यक्तिगत हस्तक्षेप की मैं सराहना करूंगा। जिन कार्रवाइयों की सिफारिश ऊपर की गयी है वह साबरीमाला जाने वाले लाखों श्रद्धांलुओं के हित में होने के साथ ही इलाके की जैव विविधता की सुरक्षा के लिये भी हैं, इसीलिये इन्हें प्राथमिकता के साथ लिया जाना चाहिए।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोन्टेक सिंह अहलुवालिया को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के लिये नए भवन के बारे में पत्र

29 सितंबर 2009

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के कार्यालय में जगह की घोर कमी है। इस भवन में कई बार आगजनी हो चुकी हो है जिसमें भवन के कई हिस्से जल गये हैं जिससे यह बेहद असुरक्षित हो गया है। मेरे द्वारा मंत्रालय का जिम्मा सम्भाले जाने के बाद से लेकर अब-तक आगजनी की चार घटनाएं हो चुकी हैं जिसमें एक मेरे कार्यालय में भी हुई है। वास्तव में पर्यावरण भवन आज जिस हालत में है वह अपमानजनक है और मुझे यह कहने में शर्म आती है कि यह उस मंत्रालय का कार्यालय है जो इको-फ्रेंडली तकनीकों को प्रोत्साहन देता है।

इसके अतिरिक्त आप जानते हैं कि मंत्रालय की गतिविधियों में पिछले कुछ दशकों में काफी तेजी से विस्तार हुआ है। कई नए मसले मंत्रालय की गतिविधियों में शामिल किये गए हैं जैसेकि जलवायु परिवर्तन। इस विस्तृत और अधिक महत्त्वपूर्ण कार्यादेशों को देखते हुए मंत्रालय को अधिक सम्मानजनक चेहरा प्रदान करना आवश्यक है जिसे वर्तमान कार्यालय कतई नहीं कर सकता।

मंत्रालय के कामकाज और व्यवस्थाओं में तेजी से विस्तार को देखते हुए किसी सम्मानजनक स्थल पर नया कार्यालय अत्यन्त आवश्यक हो गया है। मंत्रालय ने इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय और शहरी विकास मंत्रालय से सम्पर्क किया है ताकि उसे नया, सुरक्षित और समर्पित भवन मिल सके। शहरी विकास मंत्रालय ने अलीगंज (जोरबाग इलाका) में एक उपयुक्त भूखंड के आँवटन का सैद्धांतिक तौर पर अनुमोदन कर दिया है।

 

 

मैं साइलैंट वैली के प्रकरण को जानता था और मुझे मालूम था कि कैसे उन्होंने अपने दम पर इस खूबसूरत वर्षावन को नष्ट होने से बचाया था। परन्तु साइलैंट वैली उनकी लगन का केवल एक उदाहरण है। उन्हीं का श्रेय हैं कि 1970 के दशक में जल और वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिये अनेक कानून बने। हम उनके आभारी है कि हमारे पास वन्यजीव (प्रतिरक्षण) अधिनियम 1972 है और अप्रैल 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर आरम्भ हुआ जो केवल भारत के सर्वाधिक शोभायमान राष्ट्रीय जानवर बाघ की सुरक्षा के लिये नहीं है बल्कि समूचे वासस्थल और पारिस्थितिकी-तंत्र की सुरक्षा के लिये है।

 

 

इस आवंटित भूखंड पर मंत्रालय के लिये समर्पित हरित भवन का निर्माण कराना प्रस्तावित है जिसमें हरित तकनीकों, अक्षत उर्जा स्रोतों और इको-फ्रेंडली सामग्री का उपयोग किया जाएगा। यह विश्वस्तरीय भवन होगा जिसपर भारत गौरव कर सकेगा। इस परियोजना पर आगामी दो वर्षों में करीब 80 करोड रुपए की लागत आएगी। इमारत का नाम ‘‘इंदिरा पर्यावरण भवन’ रखा जाएगा।

चूँकि,यह नई परियोजना है इसीलिये इसे वार्षिक योजना में शामिल करने और कार्यान्वयन करने में योजना आयोग का अनुमोदन आवश्यक है। आयोग द्वारा प्रस्ताव के शीघ्र अनुमोदन से मैं आभारी होऊंगा और निर्माण कार्य यथाशीघ्र आरम्भ किया जा सकेगा।

‘पर्यावरणवादी इंदिरा गाँधी का स्मरण’- विश्व पर्यावरण दिवस पर हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित विचारपरक आलेख

5 जून 2010

मानवीय पर्यावरण पर पहला संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन 5 जून 1972 को आरम्भ हुआ और इस ऐतिहासिक सम्मेलन की याद में 1973 से इस दिन को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। तब ओलाफ पाल्मे (Olaf Palme) स्वीटजरलैंड के प्रधानमंत्री थे और इस सम्मेलन में उपस्थित हुए थे। उनके अलावा इस सम्मेलन में शामिल इंदिरा गाँधी इकलौती राष्ट्रध्यक्ष थी जिससे पर्यावरणीय मसलों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रकट होती है।

पाकिस्तानी अर्थशास्त्री तारिक बानुरी जो अब संयुक्त राष्ट्र में हैं, ने स्टाकहोम में इंदिरा गाँधी की भागीदारी को व्यापक फलक पर प्रस्तुत किया। एक बातचीत में उन्होंने कहा कि चार घटनाओं ने आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श को आकार दिया है। पहला 1962 में राचेल कार्सन की ‘साइलेंट स्प्रींग’ का प्रकाशन था। दूसरा 1968 में पॉल इहरिच की ‘पापुलेशन बम’ का प्रकाशन था। तीसरा 1972 के आरम्भ में क्लब ऑफ रोम की ओर से ‘लिमिट्स ऑफ ग्रोथ’ का प्रकाशन था और चौथा स्टॉकहोम में इंदिरा गाँधी का भाषण था जिसमें पर्यावरणीय मसले पहली बार विकास के व्यापक फलक पर प्रस्तुत किये गए। कहते हैं कि उनके योगदान के सम्मान में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme,UNEP) का मुख्यालय नई दिल्ली में खोला जाना था पर जोमो केन्याटा के अनुरोध पर वह इसका मुख्यालय नौरोबी में खोले जाने पर सहमत हो गई थी।

इस क्षेत्र में इंदिरा गाँधी के चिरस्थाई योगदान के बारे में मेरा अपना आकलन पिछले वर्ष गहरा हुआ। हालांकि, मैं साइलैंट वैली के प्रकरण को जानता था और मुझे मालूम था कि कैसे उन्होंने अपने दम पर इस खूबसूरत वर्षावन को नष्ट होने से बचाया था। परन्तु साइलैंट वैली उनकी लगन का केवल एक उदाहरण है। उन्हीं का श्रेय हैं कि 1970 के दशक में जल और वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिये अनेक कानून बने। हम उनके आभारी है कि हमारे पास वन्यजीव (प्रतिरक्षण) अधिनियम (Wildlife Protection Act) 1972 है और अप्रैल 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर आरम्भ हुआ जो केवल भारत के सर्वाधिक शोभायमान राष्ट्रीय जानवर बाघ की सुरक्षा के लिये नहीं है बल्कि समूचे वासस्थल और पारिस्थितिकी-तंत्र की सुरक्षा के लिये है। यह उनका और केवल उनका योगदान है कि हमारे पास वन (संरक्षण) अधिनियम (Forest Conservation Act)1980 है जो भारतीय कानून का ऐसा उल्लेखनीय हिस्सा है जिसने हमारे वनों को विकास के नाम पर बर्बाद हो जाने से बचाया है। हमारे समुद्र तटीय क्षेत्र के प्रति उनका लगाव अन्ततः सीआरजेड 1991 के रूप में सामने आया। उनका दिमाग निरंतर भारत की मूल्यवान प्राकृतिक सम्पदा की सुरक्षा करने के बारे में सोचता रहता था जो बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पांडे को शिमला से जुलाई 1972 में लिखे पत्र से उजागर हुआ। जुल्फिकार अली भुट्टो के साथ शिमला समझौता के बारे में वार्तालाप करने के दौरान भी उन्होंने राज्य में वनों की कटाई पर अपनी गहरी नाराजगी प्रकट की थी।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय जैसा हम आज इसे जानते हैं, तीन महीने में अपनी रजत जयन्ती मनाने वाला है। पर्यावरण मंत्रालय का गठन स्वयं इंदिरा गाँधी ने 1980 में किया था। वन और वन्यजीव को कृषि मंत्रालय से स्थानांतरित करके पर्यावरण विभाग से जोड़ा गया था। अब हम वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अन्तर्गत वन और वन्यजीव के लिये अलग विभाग बनाने वाले हैं जिसका फैसला प्रधानमंत्री ने 18 मार्च 2010 को एनबीडब्लूएल की पांचवी बैठक में किया। दिलचस्प है कि यह काम इंदिरा गाँधी स्वयं करना चाहती थीं जैसाकि उस बैठक में जाने माने प्रकृति प्रेमी प्रशासक डॉ. एम.के. रंजीतसिंह ने 1970 के आरम्भ के उनके कुछ निर्देशों को उद्धृत करते हुए बताया।

इंदिरा गाँधी के लिये पर्यावरणीय संरक्षण महज प्रदूषण नियन्त्रण या संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण से कहीं अधिक था। उनकी अवधारणा बहुत व्यापक थी और यही कारण था कि उन्होंने दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन (Delhi Urban Art Commission) की स्थापना की। उनकी सहायक रही ऊषा भगत ने अपने संस्मरण ‘इंदिराजी’ में बताया है कि अहमदाबाद से मृणालिनी साराभाई का एक फोन आने पर उन्होंने फौरन गुजरात के मुख्यमंत्री को कहकर सड़क को चौड़ा करने के लिये पोल (नगर का पुराना दरवाजा) को गिराना रूकवा दिया। इस संस्मरण में इंदिरा गाँधी के पक्षीविज्ञानी होने के शौक का उल्लेख भी है जो ब्रिटिश उच्चायुक्त मैलकम मैकडोनाल्ड के साहचर्य में दिखा था।

पर्यावरणीय संरक्षण की उनकी पद्धति का एक हिस्सा धरोहरों का संरक्षण था। जाने माने पर्यावरणविद श्याम चैनानी अपने ‘‘हेरिटेज एंड इंवायरमेंट’’ में 1982 के उनके एक निर्देश को पुनर्प्रकाशित किया है जिसमें मुंबई के निकट खूबसूरत एलिफैंटा गुफाओं को न केवल व्यावसायिक विकास से बचाने का उल्लेख है बल्कि वह यह भी बताता है कि इसकी सुरक्षा का सर्वोत्तम उपाय पूरे इलाके को हरित क्षेत्र में बदल देना होगा। उनके निर्देश का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा यहाँ उद्धृत करने लायक है -‘‘महाराष्ट्र सरकार को कहना चाहिए कि न्हावा और एलिफैंटा द्वीपों पर कोई व्यावसायिक या किसी प्रकार के निर्माण कार्य की अनुमति नहीं दी जाए। उन्हें हरित बनाने के लिये सकारात्मक कदम उठाए जाएं और अगर आवश्यक हो तो उन्हें उद्यान में बदल दिया जाए जिसमें वन्यजीव व पक्षी इत्यादि रह सकें।’ आज धरोहरों को बचाने, संरक्षण और पुनर्सृजन के लिये इस प्रकार का समग्रतामूलक तरीका अपनाने की जरूरत पहले से कहीं अधिक है।

पर्यावरण के क्षेत्र में इंदिरा गाँधी के असाधारण योगदान को समग्रता में स्पष्ट करने के लिये उनकी सम्पूर्ण जीवनी लिखने का बौद्धिक प्रयास करना होगा। शायद उस जीवनी में हमारा ध्यान उनके माता-पिता के प्रभाव की ओर जाए, खासकर माँ की ओर जो स्वयं उनके शब्दों में ‘अक्सर कहा करती थी कि सभी जीव-जंतुओं का आपस में सम्बन्ध है।’ शायद पढ़ने की उनकी आदत (स्वयं उनके कथनानुसार बचपन में फेबर बुक्स ऑफ इंसेक्टस और मधुमखियों व चींटियों के बारे में मीटरलिंक्स बुक्स) का इससे कुछ सम्बन्ध था। फिर टैगोर की कविताओं के प्रति उनका आकर्षण और शांति निकेतन में बीते दिनों ने भी उनकी सोच को आकार दिया। शायद कश्मीर का खूबसूरती भरा इकोसिस्टम और वहाँ स्थित पहाड़ियों, नदियों और झीलों के प्रति उनके दीर्घस्थाई प्रेम ने भी प्रकृति से उनके जुड़ाव को एक आयाम दिया जहाँ वो अपने पिता के साथ घूमने जाती थी। सबने उनमें प्रकृति के प्रति प्रेम को स्थाई बनाया।

डॉ. सलीम अली जैसे लोगों के साथ दोस्ती ने भी शायद उनके कार्यों को प्रभावित किया। चाहे कारण जो भी रहे हों भारत उनकी कृतज्ञता स्वीकार करता है। आज हम इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकते कि एक ताबीज की तरह उनके विचारों का इस्तेमाल कर उच्च आर्थिक विकास दर को प्राप्त करने में पर्यावरण एवं वनों की रक्षा के साथ ही उनके पुनर्सृजन में लगें। और उनकी कीमत पर विकास नहीं करें जैसाकि कई मामलों में दिखता है।

टिकाऊ समृद्धि को करें साकार - फिनलैंड की संसद, हेलसिंकी में सम्बोधन

11 अप्रैल 2012

मैं आज यहाँ आकर सचमुच सम्मानित हुआ हूँ और इस आमंत्रण के लिये आपको धन्यवाद। मैं पिछली बार चौदह महीने पहले हेलसिंकी आया था और दोबारा इस सुंदर शहर में आकर आनंदित हूँ। मैं आपके बीच बोलने के इस आमंत्रण को तेज आर्थिक विकास की अनिवार्यता और पर्यावरणीय परिरक्षण एवं संरक्षण के बीच तालमेल बिठाने की भारत की लम्बी परम्परा के अनुमोदन के रूप में देखता हूँ जो किसी दूसरी जगह के मुकाबले बेजोड़ स्तर का है।

मैं इसे याद किए बिना नहीं रह सकता कि आज से ठीक चालीस साल पहले स्टॉकहोम में पहले पहल आयोजित मानवीय पर्यावरण पर यूएन सम्मेलन में केवल दो राष्ट्र प्रमुख शामिल हुए थे-ओलाफ पाल्मे जिन्हें मेजबान के रूप में वहाँ होना ही था और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी। वहाँ उनके भाषण को बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय एजेंडा और विमर्श को व्यापकता देने वाला माना गया जिसमें गरीबी उन्मूलन, आर्थिक विकास और मानवीय विकास के मसलों को बेहद बुनियादी तौर पर समेटा गया था।

दोनों देशों के बीच हमेशा से बेहतर सम्बन्ध रहे हैं। फिनलैंड ने भारत में अपना दूतावास 1949 में ही स्थापित किया। हमारी आजादी के महज दो वर्ष बाद और जनवरी 1950 में गणराज्य घोषित होने के पहले।

फिनलैंड की कोई 80 अग्रणी कम्पनियों ने भारत में कारोबार स्थापित किया है जिनमें- नोकिया, आउटोकुंपु, वार्टसिला, कोने, सैंडविक और केमिरा हमारे देश में सुपरिचित हैं। हाल के वर्षों में लगभग बीस भारतीय कम्पनियों ने फिनलैंड में निवेश किया है। हम परमाणु विद्युत प्रकल्पों की नियमावलियों के मामले में भी आपके अनुभवों से उल्लेखनीय रूप से सीख रहे हैं। परस्पर हित के कई गैर आर्थिक मामले भी हैं।

जिस व्यक्ति ने सिंधु घाटी सभ्यता की अत्यल्प ज्ञात लिपि को स्पष्ट करने में सबसे अधिक योगदान देने वाले डी अस्को परपोला, यूनिवर्सिटी ऑफ हेलसिंकी के हैं। यह सभ्यता लगभग दो सहस्राब्दी पहले से हमारे देश में फल-फूल रही थी।


मुझे वैश्विक टिकाऊपन पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की उच्चस्तरीय समिति का सदस्य बनने का सौभाग्य मिला जिसके सह-अध्यक्ष दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुम्मा और आपके पूर्व राष्ट्रपति हाल्जा तालोनेन थे। यह अक्टूबर 1987 में गो हार्लेम ब्रंटलैड की अध्यक्षता में इसी तरह के एक आयोग की रिपोर्ट आने के लगभग चौथाई शताब्दी के बाद की घटना है।

राष्ट्रपति तालोनेन काम के प्रति बेहद कठोर थे और हमारी सभी बैठकों को उन्होंने बहुत ही पेशेवर ढंग से संचालित किया। समिति ने तीन महीने पहले अपनी रिपोर्ट सौंपी है और आज मैं जो कुछ बोलने जा रहा हूँ, वह रिपोर्ट में समाहित कुछ प्रमुख विषयों के बारे में होगा। जैसाकि मैंने समिति की बैठकों में अक्सर कहा कि विकासशील देशों के स्थानीय समुदायों को टिकाऊ विकास के बारे में सीखाने की जरूरत नहीं है। वे जानते हैं। वे इसका ध्यान भी रखते हैं। वे इससे सक्रिय ढंग से जुड़े हुए भी हैं। अधिकतम वकालत और हिमायत अमेरिका में करने की जरूरत है जो भले विश्व अर्थव्यवस्था की चालक शक्ति है लेकिन ऐसी जीवन पद्धति का उदाहरण बना हुआ है जो टिकाऊपन की बुनियादी वसूलों के खिलाफ जाता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जॉन केनेथ गैलब्रेथ (John Kenneth Galbraith) ने बहुत पहले 1958 में ही अपनी क्लासिक पुस्तक ‘द एफ्लुएंट सोसाइटी’ (The Affluent Society) में इस ढंग की ओर ध्यान दिलाया था जिस पुस्तक को अब करीब-करीब भूला दिया गया है। उसमें धनवान समाज बनने और सतत विकासवान समाज होने के बीच फर्क करने की जरूरत बताई गयी है।

हमें स्वीकार करना होगा कि आजीविका की सुरक्षा और जीवन पद्धति के टिकाऊपन में आन्तरिक सम्बन्ध हैं। देशों के भीतर और देशों के आर-पार दोनों। यह पूर्ण स्वीकृत है कि अमीरों की अपव्ययी उपभोग पद्धति को दुनिया सहन नहीं कर सकती, खासकर अमेरिका की। कई वर्षों पहले महात्मा गाँधी ने बिन्दुवार ढंग से कहा था ‘ब्रिटेन की जीवन पद्धति का अनुसरण करने के लिये भारत को कितनी दुनिया की जरूरत होगी?’

गाँधी का दूर-दृष्टिपरक विवेक आज हमारे सामने आता है जब दुनिया आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से लड़ती नजर आती है। वर्तमान विकास पद्धति टिकाऊ या न्यायोचित नहीं है यह पूरी तरह स्वीकृत हो चुका है। यह भी लगातार स्पष्ट हो रहा है कि उर्जा और सामग्रियों के उपयोग में कार्यकुशलता को बेहतर बनाना, भविष्य की समस्याओं के समाधान का केवल एक पक्ष है। हालांकि, प्रसिद्ध भारतीय पर्यावरणविद सुनीता नारायण कहेंगी कि अगर पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो तो यह किफायत की क्रांति अर्थहीन होगी।

 

 

तेजी से पलायन होना एक वास्तविकता है जिससे शहरीकरण में अपरिहार्य बढ़ोतरी होने के साथ-साथ आधुनिक परिवहन के साधन अपनाना मजबूरी बनती जा रही है। इस गठजोड़ के सामने हमारा चुनाव, सामूहिक भविष्य के टिकाऊपन को बरकरार रखने के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण है। सवाल है कि क्या हम अमेरिकी ढंग की संसाधन बहुल शहरीकरण और परिवहन के चक्कर में फंसे रहेंगे जिसमें उपनगरीय रहन-सहन और इंधन निगलने वाले निजी वाहन अपरिहार्य हैं?

 

 

 

टिकाऊ उपभोग का प्रश्न वैश्विक एजेंडा है फिर भी इसके समाधान के लिये अधिक सटीक कार्रवाई हमारे पास मौजूद नहीं है। जो सिद्धांत रूप में अपेक्षित लगता है वह व्यवहारिक रूप में वैसा नहीं होता। आज सभी देश, मेरे अपने देश समेत एक जैसी पद्धति - वही उपभोग आधारित, जीडीपी से अनुमापित आर्थिक विकास के पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं, यह जानते हुए भी कि यह विकास हमारी धरती को नुकसान पहुँचा रहा है।

निःसन्देह, तेज आर्थिक विकास लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने और नया भविष्य प्रदान करने के लिये अनिवार्य है। चुनौती अर्थव्यवस्था के ऐसे चालकों को खोज निकालने की है जो जीवन के उच्चतम स्तर की बढ़ती आकांक्षाओं को पूरा कर सके और ऐसी जीवन पद्धति को फिर से खोज निकाले जो स्थायी और टिकाऊ हो।

पलायन, शहरीकरण और परिवहन गठजोड़ की वजह से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिये इस क्षेत्र में हमें दुबारा काम करने की आवश्यकता है। तेजी से पलायन होना एक वास्तविकता है जिससे शहरीकरण में अपरिहार्य बढ़ोतरी होने के साथ-साथ आधुनिक परिवहन के साधन अपनाना मजबूरी बनती जा रही है। इस गठजोड़ के सामने हमारा चुनाव, सामूहिक भविष्य के टिकाऊपन को बरकरार रखने के लिये बेहद महत्त्वपूर्ण है। सवाल है कि क्या हम अमेरिकी ढंग की संसाधन बहुल शहरीकरण और परिवहन के चक्कर में फंसे रहेंगे जिसमें उपनगरीय रहन-सहन और इंधन निगलने वाले निजी वाहन अपरिहार्य हैं? या हम रहन-सहन का अधिक स्मार्ट और नया मॉडल विकसित करें जो बेहतर जीवन का अनुभव करने की इच्छा में लाखों लोगों के कारवां को शहरों की ओर जाने की इजाजत भले ही देगा परन्तु टिकाऊपन की अनिवार्यता के प्रति भी संवेदनशील होगा जिसकी ओर आज हम टकटकी लगाए हुए हैं। हमारे पास इस अधिकार को प्राप्त करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। आज अच्छी और बुरी आदतों में हिस्सेदारी करने की जिम्मेवारी दुनिया के विकसित देशों की है तो विकासशील देशों की जिम्मेवारी है कि उसे ठीक कर लें।

वैश्विक स्तर पर वार्तालापों को निश्चित तौर पर पर्यावरणीय संसाधनों या पारिस्थितिकीय परिवेश के न्यायोचित आधार पर हिस्सेदारी की अवधारणा का समाधान खोजना चाहिए जिसे अमेरिका के अलावा पूरा विश्व किसी न किसी रूप में स्वीकार करेगा। राष्ट्रीय स्तर पर सरकारों को अर्थव्यवस्था को टिकाऊ उपभोग के रास्ते पर चलाने के लिये निश्चित तौर पर आर्थिक और दूसरे प्रोत्साहन देने चाहिए जो बदले में टिकाऊ समृद्धि प्रदान करेगी। टिकाऊ समृद्धि, जो इस व्याख्यान का शीर्षक है, हमें याद दिलाता रहेगा कि यही हमारा लक्ष्य है।

अपनी बात को स्पष्ट करने के लिये मैं जलवायु परिवर्तन से एक उदाहरण लेता हूँ। जी-8 प्लस-5 की जर्मनी के हीलिजेन्डम में जुलाई 2007 में हुई बैठक में बोलते हुए भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा ‘‘हमारा दृढ़विश्वास है कि विकास और आर्थिक उन्नति की नीतियों को आगे बढ़ाने के बाद भी भारत का प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन विकसित देशों से अधिक होने नहीं जा रहा।’’ उसी वर्ष बाद में चांसलर अंजेला मार्केल ने ‘प्रति व्यक्ति उत्सर्जन पर आधारित पद्धति को अपनाए जाने का आह्वान किया जिसका झुकाव जलवायु संरक्षण के साझा लक्ष्य के साथ अनुकूल स्थापित करने पर था। उन्होंने दलील दी कि ‘ऐसा दीर्घकालीन झुकाव सभी देशों को विकसित होने का अवसर देता है।’ यह किसी पर अत्यधिक बोझ नहीं डालता बल्कि सुनिश्चित करता है कि जलवायु के मसले पर आवश्यक कार्रवाई की जाए। इस उपाय से देशों की अलग-अलग जिम्मेवारियों के बावजूद सहमति के सिद्धांतों को आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकता में बदला जा सकेगा। इस सूत्रीकरण को मैं ‘सिंह-मार्केल फार्मूला’ या इसी तरह कुछ कहूँगा। इसमें जलवायु वार्तालापों में आए गतिरोध को तोड़ने की उल्लेखनीय क्षमता है लेकिन एक शर्त है। शर्त यह है कि देशों द्वारा किए जा रहे प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को प्रति व्यक्ति आय के विभिन्न स्तरों के अनुकूल बनाना होगा जो रहन-सहन के स्तर में फर्क लाएगा। इस बारे में कुछ और चिन्तन करने की जरूरत है।

टिकाऊ विकास का नया परिप्रेक्ष्य अपेक्षा करता है कि हम प्रगति के तीन एम-(मेजर, मॉडल और मॉनिटर प्रोग्रेस) अर्थात अनुमापन, प्रतिरूपण और निगरानी में कितना अच्छा परिवर्तन करते हैं। हमें पुनर्विचार करने की जरूरत है कि हम आर्थिक प्रगति का मतलब क्या समझते हैं।

सकल राष्ट्रीय उत्पाद (Gross National Product, GNP) के विकास की संकीर्ण अवधारणा को उद्देश्यपूर्ण ढंग से बदला जाना चाहिए ताकि गुणवत्ता के व्यापक मानदंड प्रतिबिम्बित हो सके जैसे-समृद्धि और कुशलक्षेम। ‘सामाजिक प्रगति और आर्थिक प्रदर्शन के अनुमापन के लिये गठित किये गए आयोग’ जिसके अध्यक्ष जोसेफ स्टिग्लिट्ज़, अमर्त्य सेन और जीन पॉल फिटौसी हैं, ने 2009 की रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि विशुद्ध आर्थिक सूचक यह कतई नहीं बताते कि पर्यावरणीय प्रभावों की कीमत या महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक प्रणालियों का अतिक्रमण करने के बावजूद वास्तविक कुशलक्षेम प्राप्त किया गया।

इसी के फलस्वरूप जीएनपी अवधारणा में सम्पूर्ण बदलाव किया जा रहा है। आज यह बहुत आवश्यक हो गया है कि अतिरिक्त और अधिक समावेशी सूचक तैयार किये जाएं जो सार्वभौमिक स्वास्थ्य और मानव विकास को एक साथ समाहित करे। राष्ट्रीय लेखा-जोखा में इन्हें प्रतिम्बित किया जाना जरूरी है।

इस सन्दर्भ में मुझे आपको बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि हमने भारत में इस दिशा में एक शुरुआत की है। प्रोफेसर सर पार्थ दासगुप्ता की अध्यक्षता में जो शायद आज विश्व के सबसे प्रमुख पारिस्थितिकीय अर्थशास्त्री हैं, हमने भारत के लिये ‘‘हरित राष्ट्रीय लेखा”(Green National Account) की रूपरेखा का विकास करने के लिये विशेषज्ञ समूह का गठन किया है। हम उम्मीद करते हैं कि वर्ष 2015 तक यह समूह ‘हरित राष्ट्रीय लेखा’ की रिपोर्ट तैयार करने में सक्षम हो जाएगा। वैश्विक स्तर पर समन्वित कार्रवाइयों के माध्यम से ऐसे प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

एक अन्य अत्यधिक मूल्यवान प्रयास विभिन्न प्रकार की पारिस्थितिकीय तंत्र से मिले आर्थिक लाभ और उनके नुकसान से जुड़ी लागत का वैश्विक अध्ययन है जिसे पारिस्थितिकीतंत्र और जैव विविधता का अर्थशास्त्र (The Economics of Ecosystem and Biodiversity, TEEB) कहा जाता है। इसे यूएनईपी, जर्मन सरकार, यूरोपीय संघ और दूसरे संस्थान सहायता दे रहे हैं। भारत के लिये भी टीईईबी अध्ययन कराया गया, जिसमें अन्य बातों के अलावा यह उजागर हुआ कि भारत के 45 प्रतिशत घरों की आमदनी या ग्रामीण और वनवासी समुदायों की आमदनी प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं से प्राप्त होती है। यह गरीब आदमी की जीडीपी है जिसे परम्परागत राष्ट्रीय लेखा में अक्सर नजरअन्दाज कर दिया जाता है।

प्रतिमान और आकलन समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं ताकि हम वक्र से आगे बने रहे और इससे पहले की बहुत देर हो जाए समुचित नीतिगत तैयारी कर सकें। उदाहरण के लिये भारत ने जलवायु परिवर्तन आकलन के लिये भारतीय नेटवर्क का गठन किया है जो समूचे देश के 120 संस्थानों और 220 वैज्ञानिकों का नेटवर्क है। इसे पूरे देश के विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न विषयों में जलवायु परिवर्तन से जुड़े सभी पहलुओं के बारे में वैज्ञानिक आकलन करना है। ऐसे कार्यों को मजबूत बनाने और इन्हें राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर खड़ा करने की जरूरत है।

इस मामले में अन्तर-सरकारी साझेदारियों की बड़ी भूमिका है। आईपीसीसी अपनी कमियों के बावजूद भी एक तार्किक कार्य मॉडल है और अब इसी तरह के सिद्धांत टिकाऊ विकास के व्यापक आकलन के लिये विकसित किए जा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव की समिति ने सुझाव दिया है कि टिकाऊ विकास लक्ष्यों ( Sustainable Development Goal, SDG) का विचार सभी देशों पर लागू होगा। यह सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (Millenium Development Goal, MDG) की तरह नहीं है जो केवल विकासशील देशों पर लागू है। एसडीजी को क्या होना चाहिए और वैश्विक स्तर पर टिकाऊ विकास के किस सूचकांक का उपयोग किया जाना चाहिए इस बारे में सहमति विकसित करना एक विशाल प्रयास होगा। लेकिन इसकी शुरुआत हमें निश्चित तौर पर रियो-20 सम्मेलन में कर देनी चाहिए जो बहुत जल्द ही होने वाला है। एक वर्ल्ड सस्टेनेबलिटी आउटलूक रिपोर्ट (World Sustainability Outlook Report) हर साल या दो साल पर तैयार करने और प्रकाशित करने के बारे में भी इस सम्मेलन में विचार किया जाना चाहिए।

तीन एम (अनुमापन, प्रतिरूपण और निगरानी) के एक खास पहलू पर मैं जोर देना चाहूँगा। वैज्ञानिक जिसे ‘भूमंडलीय परिसीमा, (Planetary Boundaries) पर्यावरणीय दहलीज’(Environmental Threshold) और ‘चरम बिन्दू ’ (Tipping Point) कहते हैं, उस शब्दसंग्रह में मैं एक अन्य शब्द शामिल कर रहा हूँ वह है सार्वभौमिक अतिसंवेदनशीलता (Planetary vulnerability)। आज हम एक अजीब सी परिस्थिति में हैं। हम जानते हैं कि संकटग्रस्त प्राकृतिक प्रणाली अत्याधिक दबाव में है परन्तु प्रकृति और उसके अनेक दबावों के बारे में अपनी वैज्ञानिक समझदारी बढ़ाने के मामले में हमने केवल उपरी सतह को खुरचा भर है। आज उस चरम बिन्दु को पार करने की सक्षमता के बारे जागरूकता बढ़ रही है जिसके आगे पर्यावरणीय परिवर्तन बढ़ जाता है। इसमें स्वतः स्थिर हो जाने की क्षमता होती है और पीछे जाना कठिन या लगभग असम्भव होता है। सार्वभौमिक सीमाओं के बारे में स्टॉकहोम रिसाइलेन्स सेंटर ऑन प्लैनेटरी बाउंडरीज (Stockholm Resilience Centre on Planetary Boundaries) के कार्य जिससे आप में से कई परिचित होंगे, इस तरह के कार्यों का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

लेकिन हमें ऐसे कार्यों को बार-बार करने की जरूरत है। और हमें इसे उस स्तर पर एवं गति से करने की आवश्यकता है जो इस समस्या की जरुरत है। मेरी नजर में वैज्ञानिक अनुसन्धान अनेक मोर्चों पर हो रहे हैं लेकिन हम अभी भी इसकी समग्र तस्वीर नहीं देख पा रहे कि धरती किस ओर जा रही है। कुछ क्षेत्रों में खासकर जैसे जलवायु परिवर्तन और ओजोन क्षरण के सम्बन्ध में हमारे पास नीतियों और अत्याधुनिक शोध के साथ समन्वित बेहतरीन कार्यकारी मॉडल उपलब्ध हैं। लेकिन दूसरे क्षेत्रों में विज्ञान ठीक से विकसित नहीं हुआ है। अधिक महत्त्वपूर्ण है कि विभिन्न पर्यावरणीय,आर्थिक और सामाजिक दबावों के संयुक्त प्रभाव का आकलन करने का तौर-तरीका अभी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है।

स्पष्ट है कि अब वह समय आ गया है कि विज्ञान और नीतियों के बीच के आन्तरिक सम्बन्धों को मजबूत बनाने के लिये एक बड़ी समन्वित वैश्विक वैज्ञानिक पहलकदमी आरम्भ की जाए। इसमें टिकाऊ विकास के सन्दर्भ में भूमंडलीय संवेदनशीलता जैसी अवधारणाओं के विज्ञान का नियमित आकलन करने की तैयारी करना भी शामिल होना चाहिए। ऐसी पहलकदमी को आरम्भ करने और सचमुच अर्थपूर्ण बनाने के लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि विकासशील देशों की चिन्ताओं को स्पष्ट तौर पर सम्बोधित किया जाए। अर्थात, इसे उनके आर्थिक विकास पर सीमाबन्दी थोपने के औजार के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाए। मुझे विश्वास है कि हम वैश्विक समुदाय के रूप में इन चिन्ताओं का मुकाबला कर सकते हैं और इस तरह की वैज्ञानिक पहलकदमी को जल्द आरम्भ कर सकेंगे।

टिकाऊ विकास के नए परिप्रेक्ष्य को इसकी आवश्यकता भी होगी कि सभी देश अपने निजी हित में जिम्मेवारी का उचित हिस्सा उठायें, खासकर उनका वैश्विक साझा की समस्याओं से जितना सम्बन्ध हो। इसे कहना बेकार है कि इस मामले में तेज आर्थिक विकास की सम्भावनाओं को खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि सभी देशों को उतनी वचनबद्धता स्वीकार करने की आवश्यकता है जिसके लिये वे स्वयं को जिम्मेवार समझें।

बोझ की हिस्सेदारी को निश्चित तौर पर इस सरल सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए कि जैसे ही देश सम्पन्न हो (प्रति व्यक्ति आमदनी के रूप में मापने पर), उसकी जिम्मेवारी बढ़ जाए। नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री माइकल स्पेंस ने इस दिशा में एक ठोस प्रस्ताव दिया है और मैं जोरदार ढंग से सिफारिश करूंगा कि उनके प्रस्ताव का परीक्षण किया जाए और उसे आगे बढ़ाया जाए।

मैं यहाँ यह भी जोडूंगा कि देशों की वचन-बद्धताओं के अन्तरराष्ट्रीयकरण के विभिन्न ढंग हैं जिन्हें वे अपने घरेलू कानूनों में समाहित करने या कार्यवाई करने के लिये तैयार हों। इस मामले में एक प्रकार का अन्तरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है जो पारदर्शी और असन्दिग्ध रूप से विश्वसनीय हो। लेकिन यह तर्क देना कि इसे करने का एक ही तरीका है, मेरे विचार से अवास्तविक है और विभिन्न घरेलू राजनीतिक वास्तविकताओं को नजरअन्दाज करने वाला है जिनसे प्रत्येक देश को निपटना पड़ता है।

टिकाऊ विकास के केन्द्र में कृषि है। यही कारण है कि जुमा-टालोनेन समिति ने कृषि क्षेत्र में सदाबहार क्रांति का आहवान किया था जिसमें कम लागत, पानी का संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन के जरिए उत्पादन और उत्पादनशीलता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। जब हम इसकी ओर लक्ष्य करते हैं तो यह याद करना जरूरी हो जाता है कि पहली हरित क्रांति को किसने सफल बनाया। पहली हरित क्रांति के केन्द्र में सार्वजनिक कोष पर आधारित सहयोगपूर्ण शोध था जिसे अन्तरराष्ट्रीय कृषि शोध पर परामर्शदात्री समूह (Consultative Group on International Agricultural Research, CGIAR) के अंगर्तत संचालित किया गया।

सीजीआईएआर पद्धति ने धान और गेहूँ की नई किस्में विकसित की। गेहूँ मैक्सिको में और धान मनीला में। इसने विभिन्न देशों को अभूतपूर्व ढंग से बदल दिया। उदाहरण के लिये भारत जो 1960 में विश्व में सबसे अधिक खाद्यान्न का आयात करने वाला देश था, चार दशक से भी कम समय में धान और गेहूँ का निर्यातक बन गया। ऐसे सार्वजनिक कोष से संचालित शोध की प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त हो गई है और इस समय हम कुछ बेहतर करने के लिये निजी एग्री-कम्पनियों पर विश्वास करते प्रतीत होते हैं। यह विश्वास गलत है और इसके सामाजिक परिणाम विनाशकारी हुए हैं।

यह मेरी उत्कट अभिलाषा है कि विचारशील परामर्शदाता बिना देर किए जल्द यह बात दृढ़तापूर्वक कहेंगे और हम 1950 व 1960 की सीजीआईएआर के मिजाज को फिर से अपना सकेंगे जिसका समूचे विश्व के लाखों लोगों के जीवन पर नाटकीय प्रभाव पड़ा था। सीजीआईएआर जैसी शोध और विकास नेटवर्क को अपारम्परिक ऊर्जा जैसे दूसरे क्षेत्रों में भी प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है।

अन्त करने के पहले मैं आपको बताना चाहता हूँ कि दस दिन पहले भारत की बारहवीं पंचवर्षीय योजना के तीन बुनियादी स्तंभ -तेज, अधिक समावेशी और टिकाऊ विकास की शुरुआत की गई हैं। यह इसका जोरदार अनुमोदन है कि विकास की परम्परागत समझदारी से अब काम नहीं चलने वाला। इसका कारण वैश्विक समझौते नहीं बल्कि घरेलू अनिवार्यताएं हैं। उर्वरता के तेजी से घटने के बावजूद भारत के लोग अगले तीन दशकों में तीस-चालीस करोड़ टन अनाज उपजायेंगे और यह टिकाऊ विकास को किसी दूसरी चीज से अधिक प्रासंगिक और अपरिहार्य बनाता है। सबके बाद ब्रटलैंड कमीशन ने करीब एक चौथाई सदी पहले हमारे लिये कहा था कि टिकाऊ विकास ऐसा विकास है जो वर्तमान की जरूरतों को इस तरह पूरा करता है जिससे भविष्य की पीढ़ियों को अपनी जरूरतें पूरा करने की क्षमता पर असर न पड़े।

मैं एकबार फिर कहना चाहता हूँ कि आज आप सबसे बात करके मुझे सचमुच गौरव का बोध हो रहा है। अगर हम अपने देश में टिकाऊ समृद्धि लाना चाहते हैं तो हमें सच्चे संवाद, समझदारी और सहयोग कायम करने की आवश्यकता है। वाद-विवाद और दिखावटीपन की नहीं।

 

 

 

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