दिमागी बुखार - अर्थ का अनर्थ करती राजनीति

Submitted by Hindi on Sun, 08/20/2017 - 16:22
Source
राष्ट्रीय सहारा, हस्तक्षेप, 19 अगस्त 2017


विश्व उत्तर प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव

 

 

फिलवक्त यहाँ मसले दो ही हैं। चूँकि सिलसिलेवार यह मानवी त्रासदी होती रही तो उत्तर प्रदेश शासन और भारत सरकार संवेदनशील क्यों नहीं हुई? ‘सब चलता है’ की कातिलाना भावना से ही सहायता कार्य संपादित होता रहा। दोषी को कैसे चिन्हित करें? जिलाधिकारी की रपट में अन्य डॉक्टरों के साथ दो लिपिक लेखाकार भी गुनहगार पाए गए हैं। सतही तौर पर तो डॉक्टरजन कोताही के दोषी हैं पर गहराई में परखें तो प्रशासन सीधे तौर पर हत्या का अपराधी है। लेखाकारों ने ऑक्सीजन की खरीद में रिश्वतखोरी की है।

विश्व के अस्पताली इतिहास में इतनी लोमहर्षक मानवी त्रासदी शायद ही कहीं घटी हो। बीआरडी अस्पताल (गोरखपुर) हर जगह सुर्खियाँ बटोर रहा है। दस हजार बच्चे गत तीन दशकों में कालकवलित हो गए। दंगों में भी पूरे राज्य में इतने नहीं मरे होंगे। घृणा तो इस बात पर हो रही है कि डॉक्टर से लेकर स्वास्थ्य सचिव तक सभी दामन बचाकर दायित्व से भागने की कोशिश में हैं। समाधान के प्रयास में नहीं। यदि प्रदेश के भाजपायी स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह चाहते तो रोगग्रसित अस्पताल को कोमा से जगा सकते थे। अपने त्यागपत्र की घोषणा कर, आतिशी निर्णय लेकर। प्रशासन की बेसुधी को झटका दे सकते थे। आखिर वे एक परंपरा के दौहित्र हैं। उनके नाना लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली से ढाई हजार किमी. दूर दक्षिण के अरियालूट में रेल दुर्घटना (26 नवम्बर, 1956) पर पद त्यागा था। इसमें 144 यात्री मरे थे। तब जवाहरलाल नेहरू ने लोक सभा को बताया था कि शास्त्री इस रेल दुर्घटना के दोषी नहीं हैं पर संवैधानिक दायित्व का यह तकाजा है। अब नाना के पुण्यफल से राज पद पाए सिद्धार्थनाथ को पितृपक्ष के पूर्व ही श्रद्धापुष्प अपने नाना को दे सकते थे।

अब मुख्यमंत्री महंत आदित्यनाथ योगी के बचाव में इतना तो कहा ही जा सकता है कि 18 वर्षों से लोक सभा में वे बीआरडी अस्पताल की त्रासदी का मसला उठाते रहे। विगत साढ़े चार महीनों में प्रेरक पहल कर सकते थे। पर निर्भर रहे अपने साथी मंत्री पर। उधर क्रूर हास्य रहा कि गत सप्ताह गोरखपुर की यात्रा पर आए थे मियां गुलाम नबी आजाद जो स्वास्थ्यमंत्री भी केंद्र में रह चुके हैं। अगर अपने गिरहबान में आजाद तनिक झांकते तो उन्हें आभास हो जाता कि इस विपदा के सृजन में उनका अंशदान काफी था। उनके कांग्रेसी साथी जो पड़ोसी पडरौना के राजा रहे कुंवर रतनजी नारायण प्रताप सिंह भी आजाद के सुर को तेज ही करते रहे। पर कोई पूछे कि वे सांसद रहे थे तो सत्तर किलोमीटर दूर गोरखपुर की सुध क्यों नहीं ली? दस वर्ष उन्हीं की सरकार रही। मनमोहन सिंह उसके सरदार थे।

इस दुखभरी दास्तां का इतिहास से रिश्ता रहा है। यह अस्पताल कांग्रेसी नेता बाबा राघव दास के नाम पर रखा गया। इन्हीं ने अयोध्या से 1948 में विधानसभा उपचुनाव में समाजवादी शिखर पुरुष गांधीवादी आचार्य नरेन्द्र देव को हराया था। एक प्रायोजित प्रश्न किसी से पुछवाया गया था कि आचार्य जी क्या राम पर आपकी आस्था है? नरेन्द्र देव जी का उत्तर सत्यतापूर्ण था कि समाजवादी होने के नाते वे भौतिकवादी हैं। अत: नास्तिक हैं। आचार्य नरेन्द्र देव चुनाव हार गए। बाबा राघवदास हिंदू आस्था के नाम पर जीत गए। यह अस्पताल का नाम उन्हीं पर रहा है जो त्रासदी के कारण अब प्रचारित हुआ है।

उत्तर प्रदेश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधारभूत सुविधाओं का अभाव

प्रसूती गृह

40.5

ऑपरेशन थियेटर

1.9

कम से कम चार बेड रहित

15.6

बिजली नहीं

26.1

अनियमित पानी आपूर्ति

12.5

सभी मौसमों में पहुँच वाली सड़क नहीं

14

कम्प्यूटरविहीन

77.8

फेरी लगाने वाले वाहन नहीं

80.2

 

बीआरडी अस्पताल की त्रासदी है कि प्रशासकों के निम्नस्तरीय निजी खुन्नस तथा खुर्जी का नतीजा यह घटना है। मीडिया भी संतुलन खो बैठा। मसलन, एक डॉक्टर को पहले नायक बनाया गया। बारह घंटों में उसे खलनायक बनाया। मीडिया का एक तबका उसको मुसलमान होने पर ढिंढोरा पीट रहा था। सच्चाई पता चली कि यह फर्जी है तो दूसरा फिरका टूट पड़ा। फोकस सांप्रदायिक हो गया। मानवीय नहीं। इस धार्मिक विकृति पर किसी भी संपादक ने किसी भी संवाददाता को डांटा नहीं, सजा नहीं दी। यह पूरा प्रकरण एक रक्तरंजित अतिरंजित हादसा था। कुछ अमरनाथ के गुजराती तीर्थयात्रियों की बस के मुस्लिम ड्राइवर की भांति।

फिलवक्त यहाँ मसले दो ही हैं। चूँकि सिलसिलेवार यह मानवी त्रासदी होती रही तो उत्तर प्रदेश शासन और भारत सरकार संवेदनशील क्यों नहीं हुई? ‘सब चलता है’ की कातिलाना भावना से ही सहायता कार्य संपादित होता रहा। दोषी को कैसे चिन्हित करें? जिलाधिकारी की रपट में अन्य डॉक्टरों के साथ दो लिपिक लेखाकार भी गुनहगार पाए गए हैं। सतही तौर पर तो डॉक्टरजन कोताही के दोषी हैं। पर गहराई में परखें तो प्रशासन सीधे तौर पर हत्या का अपराधी है। लेखाकारों ने ऑक्सीजन की खरीद में रिश्वतखोरी की है। पूरा एक झुण्ड श्रृंखलावद्ध रीति से कारगर रहा। इन पर केवल घूस लेने का नहीं वरन हत्या में शामिल होने का मुकदमा चलना चाहिए। मतलब मरीज का जीवन कुल मिलाकर सिक्कों में तय किया जाएगा ? बेटी बचाओ, गैरकानूनी बूचड़खाने बंद, किसान ऋण माफी, उर्दू के मुकाबले देवभाषा संस्कृत की उपेक्षा का खात्मा, समाजवादी सरकार के भ्रष्टाचार की जाँच आदि कार्ययोजनाओं को आकार देने वाली योगी सरकार बस एक अस्पताल की मौतों के कारण आत्मरक्षा हेतु हतोत्साहित हो गई। उठे, फिर उबरे पर वक्त चाहिए।
 

योगी के शासन और प्रशासन पर उठीं उंगलियाँ


गोरखपुर की त्रासदी से मंत्रिमंडलीय साथियों और प्रशासन की क्षमता पर भी उंगलियाँ उठ रही हैं। जब तक काबीना के सदस्य और उनके विभाग दिल्ली के अशोक मार्ग (भाजपा मुख्यालय) से तय होगा, न कि मुख्यमंत्री द्वारा तो फिर उनकी निष्ठा भी दोहरी होगी। वहीं सोनिया-कांग्रेस की तरह कि जो भी बने, दस जनपथ की बदलती भृकुटि पर टिका रहेगा। भाजपा इस नीति और व्यवहार में परिवर्तन कर सकती थी। यों भी दलीय सामंतवाद से भिड़ना सरल नहीं है। बाबू निलंबित अथवा स्थानांतरित हो सकता है, तो निर्वाचित राजनेता क्यों नहीं? यह दायित्व के एहसास पर निर्भर हो गया है। कभी इंग्लैंड के बारे में कहा जाता था कि राजनेता रिटायर नहीं होता, त्यागपत्र तो कोई भी कभी नहीं देता। लेकिन अब लोकतांत्रिक मर्यादाएं सुधर रही हैं। मसलन कुछ वर्ष बीते एक वित्त मंत्री से एक रिपोर्टर ने पूछा, नये कर किस पर लगेंगे?

अपने को चतुर समझने वाले वित्त मंत्री ने संक्षिप्त जवाब दिया, आप सिगरेट आराम से पी सकते हैं। अगले दिन उसी मंत्री की छुट्टी हो गई क्योंकि उस रिपोर्टर के दैनिक ने छापा था तंबाकू करमुक्त रहेगा। बजट को लीक करने का आरोप लगा था वित्त मंत्री पर। गोरखपुर अस्पताल की इस त्रासदी में पुरानी समाजवादी सरकार की भी किरदारी रही। इस पूरे प्रहसन की नायिका एक महिला डॉक्टर रही। इन्हें अखिलेश यादव की सरकार ने अपने राज के आखिरी दिनों में नियुक्त किया था। ये महोदया कर्मियों की सारी तैनातियां, ऑक्सीजन सिलिंडरों की आवाजाही, अस्पताल का लेखा-जोखा आदि अपनी निगरानी में रखती थीं। मुख्यमंत्री योगी ने इनकी खास जाँच मांगी है। मगर प्रश्न उठता है कि इस जांच और दंड की यह समस्त प्रक्रिया केवल एक मौसमी कवायद होकर न रह जाए। आवश्यकता आमूलचूल सुधार की है वर्ना जिस देश का बचपन इतना निर्लक्षित हो, उसकी जवानी क्या होगी?

के. विक्रम राव, वरिष्ठ पत्रकार
 

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