गाँवों में गहराता जा रहा है पेयजल संकट

Submitted by editorial on Sun, 12/16/2018 - 16:11
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विलुप्त होते पहाड़ों से परम्परागत स्रोतविलुप्त होते पहाड़ों से परम्परागत स्रोत (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)उत्तराखण्ड को एशिया के सबसे बड़े जल भण्डार के रूप में जाना जाता है। इस राज्य के भूभाग में स्थित हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों से गंगा, यमुना, अलकनन्दा, पिण्डर, मन्दाकिनी, काली, धौली, सरयू, कोसी, रामगंगा आदि जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम हुआ है। इसीलिये यह आम धारणा है कि राज्य में जल की कमी नहीं हो सकती। परन्तु राज्य की भौगोलिक परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि गाँव काफी ऊँचाई पर बसे हैं और पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं।

गाँवों में पीने के पानी की आपूर्ति धारे, नौले, तालाब, झरनों, चाल-खाल व छोटे-छोटे गदेरों से होती है। इस पर्वतीय प्रदेश में बसे विभिन्न गाँवों की स्थिति देखने से यह स्पष्ट होता है कि वे वहीं फले-फूले हैं जहाँ ये छोटे-छोटे जल स्रोत उपलब्ध थे। परन्तु विभिन्न प्राकृतिक सम्पदाओं के अति दोहन के कारण उत्पन्न पर्यावरणीय संकट का प्रभाव इन छोटे-छोटे प्राकृतिक जल स्रोतों पर भी पड़ा है और अब ये विलुप्त होने के कगार तक पहुँच गए हैं।

इन प्राकृतिक जल स्रोतों के विनाश का एक अन्य कारण यहाँ प्रचलित जल संरक्षण की समृद्ध परम्पराओं का विलुप्त होना भी है। पुराने समय में जल संरक्षण, राज्य की पारम्परिक सामाजिक व्यवस्था में शामिल था। इसका उदाहरण आज भी दूर-दराज के गाँवों में विवाह संस्कार के दौरान देखने को मिलता है। विवाह संस्कार में दूल्हा-दुल्हन अपने गाँव के समीप स्थित प्राकृतिक जलस्रोत तक जाते हैं और सतजल की उपलब्धता के लिये पूजा करने के साथ ही उसके संरक्षण की भी शपथ लेते हैं। इसका मतलब है कि यहाँ के गाँवों में बसे लोगों के जीवन में जल संरक्षण का बहुत ही महत्त्व था लेकिन यह परम्परा भी अब विलुप्त होने के कगार तक आ पहुँची है। जब तक इन सामजिक दायित्वों की पूर्ति लोग करते थे तब तक गाँवों को पेयजल की समस्या जूझना नहीं पड़ता था।

उत्तराखण्ड के स्थापना के 18 वर्ष पूरे हो गए हैं पर जल संसाधन के विकास और प्रबन्धन की दिशा में अब तक जो प्रयास किये गए हैं वे काफी नहीं हैं। बताया जा रहा है कि जल संस्कृति के विकास की दिशा में सहभागी पंचायती राज संस्थाएं योगदान दे रही हैं लेकिन उनका यह प्रयास भी अब तक स्थिति में परिवर्तन नहीं ला सका है। पंचायती राज संस्थाओं की असफलता के विषय में लोगों का मत है कि इनके माध्यम से जो भी कार्य अब तक हुए हैं वे राज्य में प्रचलित जल संस्कृति को ध्यान में रखकर नहीं हुए हैं। इन स्रोतों के संरक्षण के नाम पर इनके उद्गम स्थल पर सीमेंट का अत्यधिक उपयोग किया गया है जिससे इनकी सेहत पर बुरा असर पड़ा है।

सामाजिक कार्यकर्ता रमेश चौहान कहते हैं कि पानी प्राकृतिक संसाधन है, वर्षा ही इसका मुख्य स्रोत है और हमारे प्रदेश में वर्षाजल के रूप में पानी की प्राप्ति पूरे वर्ष में लगभग छह महीने तक होती है। पानी की इस उपलब्धता को सन्तुलित करने के लिये प्रकृति ने स्वयं व्यवस्था बनाई है। वे बताते हैं कि राज्य के वनों में यह क्षमता है कि वे वर्षाजल को अवशोषित कर नदियों, नालों, झरनों आदि को सदानीरा रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँ। वहीं, ऊँची पहाड़ी चोटियों पर वर्षाजल बर्फ के विशाल भण्डार के रूप में संग्रहित रहता है जो वर्ष भर नदियों में जल प्रवाह को बनाए रखता है।

उनका मानना है कि जब तक प्रकृति जनित यह जलचक्र सन्तुलित था तब तक पीने के पानी जैसी समस्याएँ बिल्कुल नहीं थी। वनों का दोहन, अविवेकपूर्ण विकास, खनन, बढ़ती जनसंख्या, जल संरक्षण की विलुप्त होती परम्पराएँ इसके कारण हैं। इन्हीं के कारण जल सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है। वे कहते हैं कि जल संरक्षण व संवर्द्धन के पुराने तरीकों को बहाल करके ही इस समस्या से निपटा जा सकता है।

वर्षाजल का संग्रहण भी जल संकट से निपटने के लिये एक कारगर कदम है। केन्द्र के साथ ही राज्य सरकार भी इस दिशा में पहल कर रही है। दोनों ही स्तरों पर संचालित की जाने वाली योजनाओं के तहत वर्षाजल के संग्रहण के लिये गाँवों के साथ शहरों में भी टैंकों का निर्माण कराया जा रहा है। इसी तरह चाल-खाल सहित जल संरक्षण के अन्य पारम्परिक स्रोतों को भी मनरेगा, वन विभाग और पंचायती राज संस्थाओं द्वारा ग्रामीणों के सहयोग से पुनर्जीवित किये जाने के प्रयास किया जा रहा है। इन उपायों का मूल उद्देश्य भूजल के स्तर को बढ़ाना है। इतना ही नहीं पेड़ों के जल अवशोषण क्षमता में विकास करने के लिये चौड़ी पत्ती वाले पौधों का रोपण भी किया जा रहा है।

राज्य के सभी जिलों में पेयजल एवं स्वच्छता के स्तर में सुधार के लिये प्रयास किये जा रहे हैं जिसमें पंचायत का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

कफनौल के ग्राम प्रधान विरेन्द्र सिंह कफोला, नौगाँव के क्षेत्र पंचायत प्रमुख प्रकाश असवाल, टिहरी के जिला पंचायत सदस्य अमेन्द्र बिष्ट, चमोली जनपद के उर्गम गाँव के ग्राम प्रधान लक्ष्मण सिंह नेगी का कहना है कि स्वच्छ एवं निर्मल उत्तराखण्ड का निर्माण तभी सम्भव है जब इसे समाज के सभी वर्गों का सहयोग मिलेगा। उन्होंने कहा कि निर्मल ग्राम पुरस्कार प्रकृति-पर्यावरण के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने के लिये सरकार द्वारा की गई एक अच्छी पहल है।

 

 

 

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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