सोच…शौचालय की, सूखे शौचालय या फ्लश शौचालय

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 18:13
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Source
चरखा फीचर्स, मई 2018


सूखा शौचालयसूखा शौचालयलेह, लद्दाख/बदलते समय के साथ जीवन बहुत व्यस्त हो गया है, इस व्यस्तता के कारण हमें परिवारों के साथ बैठकर पौष्टिक और पर्याप्त भोजन करने तक का समय नहीं मिलता। हम इतने व्यस्त हैं कि हमारे पास साँस लेने तक की फुरसत नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हम सिर्फ एक मशीन की तरह काम करने के लिये खाना-पानी और साँस ले रहे हैं।

आज लोगों को शौच करने का भी पर्याप्त समय नहीं मिल पाता है। लेकिन मैं आपको बताना चाहूँगी कि लद्दाख के सूखे शौचालय (ड्राई टॉयलेट) में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। सूखे शौचालयों के अन्दर हमेशा मिट्टी के ढेर पर चमकता फावड़ा रखा रहता है। मानव अपशिष्ट को फर्श में बनी छेद से गुजरता है और फावड़े की मदद से कचरे पर थोड़ी सूखी रेत फेंक दी जाती है और इस तरह अपघटन का दिलचस्प चक्र शुरू होता है। खाद के कमरे अर्थात इन सूखे शौचालयों में बिताया गया समय और प्रयास निश्चित रूप से बर्बाद नहीं होता।

यहाँ की शौचालय प्रणाली मूल रूप से दो तलों वाली होती है। पहले तल पर शौचालय और दूसरे तल पर मानव अपशिष्ट से बनने वाले खाद का स्थान होता है। शौचालय का उपयोग करने के बाद, छेद के नीचे थोड़ा रेत फेंकने के लिये फावड़े का उपयोग करना होता है, जो न केवल मानव अपशिष्ट को ढँकने के काम आता है बल्कि अपशिष्ट की गंध को कम करने में भी सहायक है।

यह कम्पोस्टिंग प्रक्रिया में भी मदद करता है। मानव अपशिष्ट, कम्पोस्टिंग प्रक्रिया से गुजरने के बाद उत्तम किस्म के खाद में परिवर्तित हो जाता है जिसे खेतों के चारों ओर छिड़ककर किसान अच्छी फसल पैदा करते हैं। ये सूखे शौचालय विशेष रूप से सर्दियों के महीनों में उपयोगी होते हैं जब तापमान माइनस 30 डिग्री सेल्सियस से कम हो जाता है और पानी जम जाता है।

लद्दाख में लोगों द्वारा सूखे खाद शौचालय का उपयोग करने के पीछे मुख्य कारण है भारत के अन्य हिस्सों की तुलना में यहाँ पानी की कम उपलब्धता। स्थानीय लोगों के लिये पानी के मूल स्रोत ग्लेशियर हैं। इन्हीं के पिघलने से लोगों को पानी मिलता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पर्यटक, विदेशी अथवा भारतीय दोनों सूखे शौचालय को कम ही स्वीकार कर पाते हैं और उनकी सुविधा के लिये यहाँ फ्लश सिस्टम शौचालय भी लाया गया है। फ्लश शौचालयों के कारण भूजल निकालने के लिये बोर कुओं की शुरुआत लद्दाख की पारिस्थितिकीय प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है।

लेह के चांगस्पा में स्थित जिग-गियास गेस्ट हाउस की मालिक लगभग 30 वर्षीय श्रीमती यांगडोल का कहना है कि वह अपने गेस्ट हाउस में भारतीयों के बजाय विदेशियों को जगह देना ज्यादा पसन्द करती हैं। वह महसूस करती हैं कि विदेशी भारतीयों की तुलना में अधिक प्रकृति प्रेमी होते हैं और वे भारतीय पर्यटकों की तुलना में कम पानी का उपयोग करते हैं जो लद्दाख में बहुत कीमती हैं।

सूखे खाद शौचालय और फ्लश शौचालयों के बीच अन्तर के बारे में बात करते समय, वह दिल की गहराईयों से कहती है, "लद्दाखी पारम्परिक शौचालय सर्वश्रेष्ठ हैं लेकिन हमारे शौचालय को बढ़ावा देना आसान नहीं है।” वह विदेशियों के लिये अपने गेस्ट हाउस में सूखे शौचालय की सुविधा नहीं रखना चाहतीं क्योंकि वह अपनी आजीविका खोना नहीं चाहती।

एक सरकारी कर्मचारी श्री डॉर्जी से बात करने पर उन्होंने कहा, "मैं अपने घर पर सूखे शौचालय के साथ-साथ फ्लश टॉयलेट को भी पसन्द करता हूँ क्योंकि मुझे अपने स्थान पर स्थानीय और गैर-स्थानीय मेहमानों दोनों की सुविधा का ध्यान रखना होता है। इसलिये मेरे घर पर एक फ्लश सिस्टम शौचालय का निर्माण भी करना पड़ा। मेरा मानना है कि यह भी बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय ‘अतिथि देवो भवः’ (मेहमान भगवान की तरह हैं) के वाक्य में दृढ़ विश्वास रखते हैं। अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत करना और उसे यादगार बनाना हमारा मुख्य कर्तव्य है।

जांस्कर के यारलंग गाँव की 40 वर्षीय सोनम डोलकर मुस्कुराते हुए कहती हैं कि मुझे वास्तव में फ्लश सिस्टम शौचालय पसन्द नहीं हैं। जब मैं लेह के बाहर तीर्थयात्रा पर जाती हूँ तो सूखे शौचालय नहीं मिलते इसलिये मुझे फ्लश शौचालय का उपयोग करने के लिये मजबूर होना पड़ता है। लेकिन मुझे अभी भी फ्लश शौचालय प्रणाली पसन्द नहीं है।

अतः आपसे अनुरोध है कि अगर आप लद्दाख आने की योजना बना रहे हैं तो मेरी ओर से इस सुझाव को मानते हुए यहाँ के पारम्परिक शौचालय का उपयोग जरूर करें और शौचालय की इस नई प्रणाली के बारे में जानें।

 

 

 

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