एक बार फिर भूकम्प, मगर मनुष्य बहुत ही स्वार्थी हो चला

Submitted by RuralWater on Thu, 02/09/2017 - 12:57
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उत्तराखण्ड समेत तमाम हिमालयी राज्य ऐसी अल्पाइन पट्टी में आते हैं, जिसमें विश्व के 10 फीसद भूकम्प आते हैं। यह धरती की सतह पर मौजूद तीन भूकम्पीय पट्टी में से एक है। उत्तर भारत से जुड़ा देश नेपाल भी इसी अल्पाइन पट्टी में आता है। वैसे यह पट्टी न्यूजीलैंड से होते हुए ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, अण्डमान एंड निकोबार, जम्मू कश्मीर, अफगानिस्तान, भूमध्य सागर व यूरोप तक फैली है। वैज्ञानिकों के मुताबिक करीब चार करोड़ साल पहले आज जहाँ हिमालय है, वहाँ से भारत करीब पाँच हजार किलोमीटर दक्षिण में था। इस दौरान का भूकम्प उत्तराखण्ड में वहीं पर आया जहां सिंगोली-भटवाड़ी नाम से 99 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना निर्माणाधीन है। दरअसल इस स्थान का मूल नाम ही रयाड़ी-कुण्ड है, मगर जलविद्युत के लिये इस स्थान का नाम बदलकर सिंगोली-भटवाड़ी रखा गया है जो हकीकत में नदी के पली पार है।

खैर यदि यह भूकम्प का केन्द्र 43 किमी जमीन के नीचे नहीं होता तो भारी जान-माल की क्षति हो सकती थी। वैज्ञानिक कइयों बार अगाह कर चुके हैं कि इस मध्य हिमालय में बड़े निर्माण पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए। वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक केएस बल्दिया का कहना है कि उत्तराखण्ड भूकम्प की दृष्टी से जोन चार व पाँच में आता है जो अतिसंवेदनशील कहा जाता है। यहाँ पर विकास के पैमाने के लिये फिर से सोचने की जरूरत है।

बीते छः फरवरी की रात्रि को उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जनपद अर्न्तगत कुण्ड नामक स्थान में आये 5.8 रिक्टर स्केल के भूकम्प के बाद इस विषय पर गम्भीर चर्चा की जरूरत महसूस होने लगी है। विज्ञानी वैसे भी कई बार संकेत कर चुके हैं कि उत्तर भारत में कभी भी बड़े भूकम्प आने की सम्भावना है। क्योंकि मध्य हिमालय दुनिया के अन्य पहाड़ों की अपेक्षा अभी बन ही रहा है यानि कच्चा है जिसकी साल-दर-साल ऊँचाई इसलिये बढ़ रही है कि भूगर्भीय प्लेटें हिमालय की ओर खिसक रही हैं।

जिस कारण मध्य हिमालय में प्राकृतिक हलचल बनी रहती है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की मानें तो और भी शक्तिशाली भूकम्प उत्तर भारत खासकर उत्तराखण्ड समेत हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब के क्षेत्र में आने की आशंका कभी भी बन सकती है।

उत्तराखण्ड सहकारिता आपदा पुनर्वास प्रबन्धन के पदाधिकारी एसए अंसारी का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में जिस तरह ऊर्जा लॉक है, उससे बड़े भूकम्प की आशंका बनी हुई है। विज्ञानी अन्दाज नहीं लगा पा रहे हैं कि यह ऊर्जा कहाँ से निकलेगी। उसी लिहाज से नए जोन चिन्हित होंगे। विज्ञानियों का मत है कि यह भूकम्प आने वाले दिनों से लेकर 50 साल बाद भी आ सकता है। इसकी प्रमुख वजह है इन हिमालयी क्षेत्र की भूगर्भीय प्लेटों का लगातार तनाव की स्थिति में रहना।

वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुशील कुमार के मुताबिक इण्डियन प्लेट सालाना 45 मिलीमीटर की रफ्तार से यूरेशियन प्लेट के नीचे घुस रही है। इससे भूगर्भ में लगातार ऊर्जा संचित हो रही है। इस तरह तनाव बढ़ने से निकलने वाली अत्यधिक ऊर्जा से भूगर्भीय चट्टानें फट सकती हैं। उन्होंने बताया कि 2000 किलोमीटर लम्बी हिमालय शृंखला के हर 100 किमी क्षेत्र में उच्च क्षमता का भूकम्प आ सकता है। क्योंकि हिमालयी क्षेत्र में ऐसे 20 स्थान हो सकते हैं।

वैज्ञानिकों का यह भी मत है कि वैसे इस बेल्ट में इतनी शक्तिशाली भूकम्प आने में करीब 200 साल का वक्त लग सकता है। अप्रैल 2015 में काठमांडू क्षेत्र में आये भूकम्प को भी इस बात से समझा जा सकता है। काठमांडू से 80 किलोमीटर पश्चिमोत्तर में इसी केन्द्र पर 7.5 रिक्टर स्केल की तीव्रता का भूकम्प 1833 में भी आया था। इस लिहाज से देखें तो उत्तराखण्ड समेत समूचे उत्तर भारत में कभी भी विनाशकारी भूकम्प आ सकता है और यह रुद्रप्रयाग में आये भूकम्प से कहीं अधिक ऊच्च क्षमता का हो सकता है।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड समेत तमाम हिमालयी राज्य ऐसी अल्पाइन पट्टी में आते हैं, जिसमें विश्व के 10 फीसद भूकम्प आते हैं। यह धरती की सतह पर मौजूद तीन भूकम्पीय पट्टी में से एक है। उत्तर भारत से जुड़ा देश नेपाल भी इसी अल्पाइन पट्टी में आता है। वैसे यह पट्टी न्यूजीलैंड से होते हुए ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, अण्डमान एंड निकोबार, जम्मू कश्मीर, अफगानिस्तान, भूमध्य सागर व यूरोप तक फैली है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक करीब चार करोड़ साल पहले आज जहाँ हिमालय है, वहाँ से भारत करीब पाँच हजार किलोमीटर दक्षिण में था। प्लेटों के तनाव के कारण धीरे-धीरे एशिया और भारत निकट आये और हिमालय का निर्माण हुआ। प्लेटों की इसी गति के कारण एक समय ऐसा भी आएगा कि दिल्ली में पहाड़ अस्तित्व में आ जाएँगे।

छठीं बार एक बड़ा झटका, डोली धरती


उत्तराखण्ड में सवा दो माह के अन्तराल में छठवीं बार धरती डोली है। बीते छः फरवरी को रात्रि के समय भूकम्प का पहला झटका 10ः33 बजे महसूस हुआ। कुछ देर बार दूसरा झटका भी महसूस किया गया। इस दरम्यान मोबाइल सेवाएँ भी कुछ देर के लिये गड़बड़ा गई थीं। भूकम्प के झटके न सिर्फ उत्तराखण्ड बल्कि पड़ोसी उत्तर प्रदेश समेत अन्य स्थानों पर भी महसूस हुए।

भूकम्प से हरियाणा के पानीपत, अम्बाला, करनाल राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में अचानक धरती हिलने से अफरा-तफरी मच गई। घरों में सामान हिलने लगे और लोग घरों से बाहर निकल गए। उधर पंजाब के लुधियाना, पटियाला सहित चंडीगढ़ तक भूकम्प के झटके लगे। लोग घरों से बाहर सड़कों पर निकल आये। तीन झटके लगने के बाद लोगों में अफरा-तफरी मची रही। इधर दिसम्बर और जनवरी के महीने में भी पूर्वोत्तर भारत में तीन बार भूकम्प आया था। हालांकि उनमें जानमाल का ज्यादा नुकसान नहीं हुआ।

कैसे आता है भूकम्प


विज्ञानियों के अनुसार भूकम्प अक्सर भूगर्भीय दोषों और धरती या समुद्र के अन्दर होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियाओं के कारण आते हैं। हमारी धरती चार परतों यानी इनर कोर, आउटर कोर, मैनटल और क्रस्ट से बनी हुई है। 50 किलोमीटर की यह मोटी परत विभिन्न वर्गों में बँटी हुई है, जिन्हें टैक्टोनिक प्लेट्स कहा जाता है।

ये टैक्टोनिक प्लेट्स अपनी जगह से हिलती रहती हैं, लेकिन जब ये बहुत ज्यादा हिलती हैं और इस क्रम में एक प्लेट दूसरी के नीचे आ जाती है, तो भूकम्प आता है। बताया जाता है कि 50 से 100 किलोमीटर तक की मोटाई की ये परतें लगातार घूमती रहती हैं। इसके नीचे तरल पदार्थ लावा होता है और ये परतें इसी लावे पर तैरती रहती हैं और इनके टकराने से ऊर्जा निकलती है, जिसे भूकम्प कहते हैं।

उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग में आये भूकंप से हिमालयन फ्रंटल थ्रस्ट (एचएफटी) ने आने वाले समय के संकेत देने शुरू कर दिये हैं। इण्डियन प्लेट यूरेशियन प्लेट के जितने नीचे धँसती जाएगी हिमालयी क्षेत्र में भूकम्प के झटके तेज होते जाएँगे। यहाँ भूगर्भ में भर रही ऊर्जा नए भूकम्प जोन भी सक्रिय कर सकती है और इसकी संवेदनशीलता भी बढ़ सकती है। स्थिति को भाँपकर वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान ने हिमालयी क्षेत्र में भूकम्प की तरंगे मापने वाले 10 ब्रॉड बैंड सिस्मोग्राफ संयंत्र लगा दिये हैं।

भूकम्प के मायने


इण्डियन और यूरेशियन प्लेट में चल रही टकराहट से हिमालयी पट्टी (एचएफटी) में बड़े पैमाने पर ऊर्जा भर रही है। यह दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। नीचे ऊर्जा का दबाव बढ़ने पर हजारों सालों से हिमालयी क्षेत्र में सुसुप्तावस्था में पड़ी भूकम्प पट्टियाँ सक्रिय हो गई हैं। ये कभी ऊर्जा के बाहर निकलने का रास्ता बन सकती हैं जिसकी वजह से भूकम्प आने की सम्भावना प्रबल बनती है। इसके साथ ही बड़े भूकम्प की शक्ल में ऊर्जा बाहर निकल सकती है।

16 दिसम्बर को सेंस फ्रांसिस्को अमेरिका में हुई जियो फिजिकल यूनियन की कांफ्रेंस में कहा गया कि हिमालयी क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर 9 की तीव्रता वाला भूकम्प आ सकता है। वर्ष 1950 में असम के बाद रिक्टर स्केल पर 8 से अधिक तीव्रता वाला कोई बड़ा भूकम्प नहीं आया है। विज्ञानियों का मानना है कि चूँकि हिमालयी भूगर्भ में ऊर्जा भरने का सिलसिला लगातार जारी है। इससे भूकम्प के खतरे अप्रत्याशित रूप से और बढ़ सकते हैं। अर्थात इससे नए संवेदनशील जोन बनेंगे।

अमूमन भूकम्प आने के बाद भूकम्प की संवेदनशीलता तय की जाती है। अभी उत्तराखण्ड चार और पाँच भूकम्पीय जोन में आता है, लेकिन हालात इसमें बदलाव कर सकते हैं। पूरे हिमालयी क्षेत्र में लगभग चार हजार भूकम्प पट्टियाँ चिन्हित की गई हैं। हर झटका इन्हें और सक्रिय करता जाएगा। वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान के विज्ञानी रुद्रप्रयाग के भूकम्प के केन्द्र का पता करके अन्य संवेदनशील स्थानों की भी जाँच कर रहे हैं। संस्थान की भूकम्पीय अध्ययन में हिमालय पट्टी (एचएफटी) का पूरा क्षेत्र भूगर्भीय ऊर्जा से लॉक है।

अब तक के भूकम्प


उत्तरकाशी में 1803 में बड़ा भूकम्प आया जिससे बड़े पैमाने पर नुकसान मापा नहीं गया, 1905 में कांगड़ा में 7.8 तीव्रता का भूकम्प, 1950 में असम में रिक्टर स्केल पर 8 की तीव्रता वाला भूकम्प आया, 1975 में किन्नौर में 6.8 तीव्रता का भूकम्प, 1991 में फिर उत्तरकाशी में औसत तीव्रता का भूकम्प आया, 1950 से अब तक हिमालयी क्षेत्र में 430 भूकम्प के झटके लगे। भूकम्प की दृष्टि से बेहद नाजुक है आधे देहरादून की ऊपरी सतह। उत्तराखण्ड में 22 माह में 31 बार डोली धरती। इस दौरान रुद्रप्रयाग के कुण्ड में था भूकम्प का केन्द्र। उत्तराखण्ड में लगातार भूकम्प आने पर वाडिया की चेतावनी। 15 दिन में पाँचवी बार डोली धरती। अल्पाइन पट्टी में आती है हिमालय की यह शृंखला।

सुरक्षित नहीं सिंगोली-भटवाड़ी परियोजना


उल्लेखनीय हो कि रूद्रप्रयाग जनपद अर्न्तगत निर्माणाधीन सिंगोली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना के मूल जगह का नाम ही रयाड़ी-कुण्ड है। दरअसल सिंगाली-भटवाड़ी नाम से मात्र परियोजना निर्माण हो रही हैं। इस दौरान जहाँ भूकम्प का केन्द्र था वहीं का नाम कुण्ड है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या सिंगाली-भटवाड़ी जलविद्युत परियोजना भविष्य के लिये सुरक्षित हैं? वह तो शुक्र रहा कि कुण्ड नामक स्थान पर 43 किमी मी. नीचे जमीन की सतह पर भूकम्प का केन्द्र था।

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प्रेम पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और जुझारु व्यक्ति हैं, विभिन्न संस्थानों और संगठनों के साथ काम करते हुए बहुत से जमीनी अनुभवों से रूबरू हुए। उन्होंने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की।

 

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