सोना उगलने वाली मिट्टी खड़े कर रही सपनों के महल

Submitted by editorial on Tue, 01/29/2019 - 13:14
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दैनिक जागरण, 28 जनवरी, 2019
ईंट (फोटो साभार: विकिपीडिया)ईंट (फोटो साभार: विकिपीडिया) खाद्यान्न की पैदावार में सोना उगलने वाली पंजाब की मिट्टी पर जब संकट के बादल घिरने लगे, खेती घाटे का सौदा बनने लगी तब चण्डीगढ़ से लगे डेराबस्सी के मूल निवासी कुलभूषण अग्रवाल ने उसी मिट्टी से सपनों के महल खड़े करने शुरू कर दिए। उन्होंने मशीन मेड वायर कट एक्टरूडर ब्रिक्स के रूप में ऐसी ईंट बनाई जो आज देश में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में पहली पसन्द बनती जा रही है। बड़ी बात ये है कि ये ईंट ईको फ्रेंडली यानी पर्यावरण हितैषी साबित हो रही है। इसे बनाने में सामान्य ईंटों की तुलना में चार गुना कम पानी का प्रयोग होता है, पकाने में ऊर्जा की खपत भी कम होती है। क्षमता तीन गुना ज्यादा होती है। ईंट हीट प्रूफ भी है लिहाजा गर्मी के प्रकोप से भी बचाती है।

महज 26 साल की उम्र में कुलभूषण ने अपने पुस्तैनी ईंट भट्ठे के कारोबार में एक अलग सपना बुना था। उस सपने के चटख रंग आज देहरादून की यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम, दून इंटरनेशनल स्कूल, डीपीएस नोएडा जैसे संस्थानों की इमारतों में दिख रहे हैं। ऐसी अनेक इमारतें इन्हीं ईंटों से बनाई गई हैं। महज 19 साल के सफलता के सफर में आज द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट दुनिया के 22 देशों में कुलभूषण के इनोवेशन का गुणगान कर रही हैं। यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम में कुलभूषण के प्रोडक्ट का जिक्र किया गया है। कुलभूषण की भारत ब्रिक्स कम्पनी द्वारा तैयार की जा रही ईंटों का प्रदर्शन राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में किया जाता रहा है।

यह है तकनीक

कुलभूषण ने बताया कि मशीन से मिट्टी को कम्प्रेस किया जाता है। इससे गारे में से हवा पूरी तरह बाहर निकल जाती है, पानी भी महज 6 प्रतिशत रह जाता है। इस कारण उसे पकाने में भी कम तापमान का प्रयोग होता है। बाद में इन ईंटों को अलग-अलग तापमान में पकाना शुरू किया तो ईंट तापमान के अनुसार अपने प्राकृतिक रंग में सामने आने लगी। मिट्टी को कम्प्रेस्ड किए जाने से पकी ईंट की क्षमता सामान्य ईंटों की तुलना में तीन गुना ज्यादा होती है। हालांकि इस समय मशीन से ईंट और भी कई कम्पनियाँ बना रही हैं, लेकिन वे इस प्रकार की ईंटों को बनाने में मिट्टी के बजाय दूसरी चीजों का प्रयोग कर रही हैं। कुलभूषण ने पूरी तरह इन ईंटों को मिट्टी से ही बनाना जारी रखा। द एनर्जी एंड रिसोर्स इस्टीट्यूट के प्रोग्राम में कुलभूषण की ईंट का जिक्र देखकर इग्लैण्ड के इंजीनियर्स अब इस ईंट की काफी माँग कर रहे हैं।

पेंट करने की जरूरत नहीं

कुलभूषण का कहना है कि ईंट को तापमान के अनुसार प्राकृतिक रंग मिल जाता है, जिस कारण इन ईंटों का प्रयोग करने पर अलग से पेंट की जरूरत नहीं होती है। कम्प्रेस्ड होने के कारण मिट्टी बिल्डिंग निर्माण के दौरान या उसके बाद पानी भी नहीं सोखती है। यही वजह है कि भारत के वाटर एंड सेनीटेशन डिपार्टमेंट ने कुलभूषण द्वारा तैयार ईंट को सीवर लाइन के लिये सबसे उपयुक्त पाते हुए इसे मान्यता दी है। डिपार्टमेंट के स्टैंडर्ड के अनुसार सीवर लाइन में 10 प्रतिशत पानी सोखने वाली ईंटें ही प्रयोग की जा सकती हैं, जबकि कुलभूषण द्वारा तैयार ईंट सिर्फ 6 प्रतिशत पानी सोखती है।


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