हिमालयी राज्यों में विकास का इको फ्रेंडली मॉडल हो

Submitted by HindiWater on Wed, 09/11/2019 - 12:16
Source
अमर उजाला, 9 सितम्बर 2019

हिमालयी राज्यों में विकास का इको फ्रेडली मॉडल हो। फोटो स्त्रोत-trekearth.comहिमालयी राज्यों में विकास का इको फ्रेडली मॉडल हो। फोटो स्त्रोत-trekearth.com

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत हिमालयी राज्यों में पर्यावरण संरक्षण को बेहद अहम मानते हैं, पर उनकी यह चिन्ता भी है कि तेजी से बदल रहीं स्थितियों के बीच पहाड़ पर विकास कैसे होगा ? दरअसल, उन्हें महसूस हो रहा है कि पहाड़ की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए इको फ्रेडली डेवलपमेंट का टिकाऊ मॉडल होना चाहिए। इस दिशा में वह अन्य हिमालयी राज्यों के साथ मिलकर प्रयास कर रहे हैं। वह इस बात के पैरोकार हैं कि पहाड़ पर हेवी इंडस्ट्री नहीं होनी चाहिए, लेकिन आईटी, वेलनेस, टूरिज्म, एजुकेशन, इलेक्ट्राॅनिक्स जैसे सेक्टर से सुरक्षित पर्यावरण के साथ विकास की नई परिभाषा दी जा सकती है। बढ़ते वन क्षेत्र से विकास योजनाओं पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव के एवज में वह ग्रीन बोनस की माँग को जायज मानते हैं। मुख्यमंत्री ने हिमालय दिवस पर ‘अमर उजाला’ के राज्य ब्यूरो प्रमुख अरुणेश पठानिया के सवालों का विस्तार से जवाब दिया। पेश हैं मुख्य अंश:-
 
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच कैसे तालमेल बैठाते हैं ?

हिमालयी राज्यों में पर्यावरण संरक्षण बेहद महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यहाँ विकास भी उतना ही आवश्यक है। हमें ऐसे इको फ्रेडली डेवलपमेंट मॉडल की जरूरत है, जिससे हिमालय की जैव विविधता को नुकसान पहुँचाए बिना हम प्रदेश की आर्थिकी को मजबूत कर सकें। यह इतना मुश्किल भी नहीं है। जैव विविधता को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त नियम कानून हैं, लेकिन सरकारों को अपने स्तर से पर्याप्त संख्या में पौधरोपण, जलाशयों का संरक्षण, जल संचय के साथ पारंपरिक जैविक खेती के साथ हॉर्टिकल्चर को विकसित करना होगा। साथ ही विकास योजनाएँ संचालित करनी पड़ेगी।

पहाड़ में इंडस्ट्री नहीं आएगी तो विकास कैसे होगा ?

यह धारणा पूरी तरह से गलत है कि विकास बड़े उद्योगों के लगने से होता है। मैं इसका बिल्कुल भी पक्षधर नहीं हूँ कि मेगा हैवी इंडस्ट्री पर्वतीय क्षेत्रों में लगे, लेकिन कई ऐसे इंड्रस्ट्रियल सेक्टर हैं, जिनसे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना आर्थिकी मजबूत की जा सकती है। एग्रो बेस्ड इंडस्ट्री व बागवानी में बहुत कुछ किया जा सकता है। कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना होगा। पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी, वेलनेस, एजुकेशन, इलेक्ट्राॅनिक्स आदि सेक्टर हैं, जिन्हें विकसित करने की जरूरत है। ये विकास को नई दिशा दे सकते हैं।

पर्यावरण संरक्षण के लिए कर रहे बड़ी पहल

मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत मानते हैं कि पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं होना चाहिए, लेकिन उनकी चिन्ता यह है कि इससे विकास योजनाओं पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव से कैसे निपटा जाए ? पर्यावरणविदों की पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित दलीलों को मुख्यमंत्री एक तरफा सोच मानते हैं। उनका कहना है कि सिक्के के दूसरे पहलू, विकास योजनाओं को भी देखना जरूरी है। बढ़ते वन क्षेत्र के एवज में उनकी ग्रीन बोनस की मजबूती से पैरोकारी है। पर्यावरण संरक्षण के लिए वे एक बड़ी पहल करने जा रहे हैं। हरेला पर्व के दिन एक साथ करोंड़ों पौधे रोपित करना अगला लक्ष्य है। हिमालय दिवस पर मुख्यमंत्री जनता से वादा चाहते हैं कि वे पॉलिथिन बैग का त्याग करें।
 
क्या वजह है कि सरकारी विकास मॉडल से पर्यावरणविद् सहमत नहीं होते ?

पर्यावरणविद् एक तरफा सोचते हैं। सरकारें भी जानती हैं कि पर्यावरण संरक्षण भविष्य की जरूरत है, लेकिन उनके साथ विकास भी जरूरी है। पर्यावरण की कीमत पर विकास का कोई पक्षधर नहीं है, लेकिन तालमेल बैठाकर एक पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों को सुविधाएँ और साधन दे सकते हैं। मैं पर्यावरणविदों से पूछता हूँ कि टिहरी बाँध नहीं होता तो वर्ष 2013 में आई आपदा से क्या होता ? हमें सकारात्मक पक्ष भी सोचना चाहिए। बाँध ने नुकसान को काफी हद तक कम कर दिया। एक तरफा सोचने की जरूरत नहीं है, हमें सर्वांगीण सोचना चाहिए। पर्यावरण एक बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष है, लेकिन पर्यावरण का संरक्षण करते हुए हमें मौजूदा परिस्थितियों के बीच ही विकास का रास्ता निकालना है।
 
पर्यटन प्रदेश की आर्थिकी की रीढ़ है, लेकिन पर्यावरणविद् उसे नुकसान का कारण भी मानते हैं ?

हिमालय राज्यों में पर्यटन की अपार सम्भावनाएँ हैं। सुनियोजित तरीके से काम करने पर पर्यटन में कई सेक्टर्स विकसित हो सकते हैं। उत्तराखण्ड सरकार इस दिशा में आगे बढ़ रही है। एडवेंचर टूरिज्म में काफी सम्भावनाएँ हैं। इको पार्क हम लोग विकसित कर रहे हैं। इसमें बस एक चीज बेहद महत्त्वपूर्ण है कि पर्यटन क्षेत्रों में कई तरह का कचरा भी पैदा होता है, जिसके लिए स्वच्छता का ठोस प्लान होना चाहिए। पर्वतारोहण के क्षेत्र में भी कई सम्भावनाएँ हैं, जिन पर काम हो रहा है। स्पोट्र्स टूरिज्म भी हिमालय राज्यों में विकसित हो सकता है। मिडिल हिमालय में क्रिकेट जैसे खेल के लिए प्रशिक्षण कैंप बन सकते हैं। पौड़ी में हम हाई एल्टीट्यूड स्पोट्र्स अकादमी बना रहे हैं। क्रिकेट और अन्य खेलों के स्टेडियम और ट्रेनिंग सेंटर बन सकते हैं। विदेशों से ट्रेनिंग के लिए यहाँ खिलाड़ी प्रेक्टिस करने आ सकते हैं। उन्हें कम खर्च में अधिक सुविधाएँ दी जा सकती हैं।
 
पर्यावरण संरक्षण को लेकर आपने कौन-सी पहल की है ?

हर जिले में हर वर्ष एक-एक नदी पर काम करने के निर्देश जिलाधिकारियों को दिए हैं। पौधरोपण और चैक डैम बनना चाहिए। इसकी रिपोर्ट हर जिले को देनी होगी कि पर्यावरण संरक्षण पर कितना काम हुआ। इससे अधिकारियों में प्रतिस्पर्धा आएगी। दूसरा, पौधरोपण हमारे फोकस में है। भविष्य में हरेला पर्व को व्यापक तरीके से मनाने की योजना बना रहे हैं। एक दिन पूरे राज्य का हर नागरिक पौधरोपण में जुटेगा। यह संकल्प लाने पर मैं अधिकारियों के साथ बैठक करुंगा। समाज के हर वर्ग को हरेला से जोड़ा जाएगा।
 
पर्यावरण संरक्षण के एवज में ग्रीन बोनस की माँग कितनी जायज है ?

पर्यावरणविदों ने हमारी ग्रीन बोनस की माँग को जायज माना है। उन्होंने केन्द्र से की गई अपनी सिफारिशों में इसे शामिल किया है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रदेश में हरियाली क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। जंगली जानवरों की संख्या भी बढ़ रही है। इससे हमारी विकास योजनाओं पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। विकास परियोजनाओं को बेहद मुश्किल से पर्यावरणीय अनुमति मिल पाती है, अनावश्यक विलम्ब हो रहा है। ग्रीन बोनस की हमारी माँग को केन्द्र के स्तर से भी सही माना जा रहा है। जो भी राज्य ग्रीन कवर बढ़ाए, उसे ग्रीन बोनस मिलना चाहिए।
 
हिमालय दिवस पर जनता को आप क्या संदेश देना चाहेंगे ?

मैं केवल यह चाहता हूँ कि हिमालय दिवस पर हम एक चीज का त्याग करें। प्लास्टिक बैंग का इस्तेमाल पूरी तरह से बंदकर दें। इससे ही पर्यावरण को बहुत लाभ होगा।

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