प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

Submitted by editorial on Sat, 10/20/2018 - 18:06
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Source
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

 

अंग्रेजों ने व्यापारिक स्वार्थ के लिये, तराई के क्षेत्र में कारखाने लगाने के लिये मिश्रित वनों के स्थान पर एकल प्रजाति-सचिपर्णी के महासागर फैला दिये हिमालय में और एक समय में जो गढ़वाल-कुमाऊँ के लोग तिब्बत के साथ व्यापार करके अच्छा जीवन बिताते थे, ऊन काष्ठ-फल इत्यादि का निर्यात करते थे, वे दरिद्र हो गये। पहाड़ के वृक्ष और मिट्टी के साथ मानव-शक्ति का भी पलायन हो गया। उनकी ‘इकोनॉमी’ वनाधारित न रहकर ‘मनीअॉर्डर’ पर होने लगी। वस्तुतः स्वातंत्र्योत्तर काल में पुनः वनों का मिश्रित रूप प्रकट होना चाहिए था।

इसके ठीक विपरीत दिशा में औद्योगिक क्रान्ति के बाद मानव-विश्व कैसे विकसित होता गया यह हमने इस निवेदन में देखा है। अपना प्राण देकर नहीं, अपने स्वार्थ के लिये सृष्टि के जीव-जन्तु, पशु, वृक्ष इनके प्राण लेकर हम अपना विकास चाहते हैं। इस सन्दर्भ में एक व्यंग चित्र अंग्रेजी पीरियोडिकल में आया था। एक ठिगना आदमी अपने हाथ के नीचे, बगल में एक प्रचण्ड वृक्ष को छिपाकर दौड़ रहा था।

किसी ने उससे पूछा- कहाँ भाग रहे हो? ठिगने आदमी ने दौड़ते हुए ही जवाब दिया। किसी सुरक्षित स्थान में इस वृक्ष को छिपाने के लिये दौड़ रहा हूँ, क्योंकि सीमेंट कंक्रीट का रास्ता मेरा पीछा कर रहा है। अपने देश में सभी बड़े शहरों में रास्ते चौड़े बनाने की मुहिम में दोनों तरफ के प्रचण्ड, छायादार वृक्षों को जड़ो सहित उखाड़ने का कार्य हो रहा है। यही विकास की छवि हमारे मन में निश्चित हो चुकी है।

लेकिन इस विनाशक, क्रूर विकास का नतीजा मनुष्य के लिये क्या हुआ है? मनुष्य सृष्टि से, मानव समाज से और स्वयं अपने से भी टूटकर अलग हो गया है। सबसे टूट जाने को मजबूर करने वाली सभ्यता और संस्कृति निरोग नहीं होती है। इस सभ्यता को शान्ति का और एकान्त का वातावरण सुहाता नहीं। वैर का और स्पर्धा का मानसशास्त्र भीड़ के मानसशास्त्र का ही एक हिस्सा बन जाता है।

नित्य तनाव में जीते रहने से अनेक प्रकार के शारीरिक-मानसिक रोग आन्तर्बाह्य असन्तुलन को जन्म देते हैं। एकदम तारुण्य में ही हृदय रोग के शिकार बनने वाले लोग अति विकसित देशों में ही अधिक हैं और मानसिक रोगों का इलाज करने के लिये साइकेट्रिस्ट की मनोवैज्ञानिकों की खोज करनी पड़ती है।

प्रकृति के सान्निध्य में रहने से शरीर एवं मन स्वस्थ व सन्तुलित रहते हैं। बहती नदी के पास, पहाड़ों की चोटियों पर, नीले खुले आसमान के नीचे और वृक्षों के निकट आरोग्य की गुरु चाभी खोजनी चाहिए। ऐसा इस देश के आयुर्वेद के शास्त्र ने बताया है और जर्मनी में विकसित हुई होमियो तथा बायोकेमिक की उपचार पद्धतियों ने भी आन्तर्बाह्य सन्तुलित, संयमित जीवन जीने की दिशा में काफी मदद की है। इनके साथ ही प्राचीन काल से निसर्गोपचार (नेचुरोपैथी) भी अनेक देशों में चलता आया है।

प्रकृति के निकटता की महत्ता समझदार लोगों के लिये हमेशा ही ऊँची रही है। मनुष्य को अन्तर्मुख होकर अपने शरीर-मन-बुद्धि का और सृष्टि का शोषण करने के तरीके समाप्त करने चाहिए। इस दृष्टि से इन उपचार पद्धतियों ने कुछ हद तक काम करना प्रारम्भ किया है और किसी ड्रग का, दवा का उपयोग न करते हुए शरीर के कुछ बिन्दुओं को (प्वाइन्ट्स) दबाने से रोग हटाने के, दुख-दर्द मिटाने के एक्युप्रेशर, एक्युपंक्चर जैसे उपाय भी सन्तुलन साधने की दिशा में अग्रसर हो गये हैं। चीन और जापान से इन उपायों के प्रयोग प्रारम्भ हुए ऐसा कह सकते हैं।

परन्तु विकृत जीवन-पद्धति में से उद्भूत हुई रोगों की मालिका मर्यादित करने के लिये सबसे अधिक पहल तो अध्यात्म शास्त्र को करनी होगी और यह बात आज अनेक देशों में सामान्य लोगों के ध्यान में आ रही है। विज्ञान के विकास ने एक इष्ट परिवर्तन भी किया है। विश्वभर के लोग परस्पर निकट आये हैं, मानव-विश्व इसी से छोटा बन गया है। इसमें से एक भिन्न प्रकार की क्रान्ति जन्म ले चुकी है। देश की सीमा रेखा किसी भी जाति को, धर्म को पन्थ या आचार-विचारों की विशिष्ट पद्धति को मर्यादा-बद्ध कर नहीं सकती।

राज्य चलाने वाले लोकसत्ता की प्रणाली चलाते हैं, या मजदूर-खेतिहरों के नाम से मिलिटरी का राज्य स्थापन करते हैं अथवा जाति-धर्म इनके नाम लेकर कोई आतंकवाद को प्रोत्साहित करते रहते हैं या इससे भी भिन्न प्रकार से अधिक औद्योगीकरण के जाल में स्वयं फँसकर अन्य देशों को भी उसमें खींच लेते हैं। राज्यकर्ताओं के इन सभी प्रकारों का अनुभव करके अब सभी राष्टों की जागृत जनसंख्या इनकी मर्यादा पहचान गई है। इसलिये सर्वत्र जन-मानस में मनुष्य के लिये इनमें से छूट निकलने का मार्ग आध्यात्मिकता का ही शेष रहा है। मानव के आन्तरिक विश्व में बाह्म झंझटों का प्रवेश न हो, स्वयं की विशेषताओं का भी आन्तरिक चेतना में पता न रहे, ऐसा ध्यान का आयाम खोजने की तड़पन हरेक मानव-समूह में जागृत हो रही है ऐसा महसूस होता है।

वैश्विक एकता का, श्रमनिष्ठा का, सृष्टि के साथ सख्य-सम्बन्ध की, जीवन-साधना की नई दृष्टि खुलनी हो तो सातत्यपूर्वक, प्राण-पण से ध्यान-पथ पर चरण अग्रसर होने होंगे। एक नये शैक्षणिक युग का प्रभात मानव के लिये होना आवश्यक है। आन्तर्बाह्य पर्यावरण के सन्तुलन साध्य होने के लिये सार्वत्रिक मानव-जीवन में इस तरह की आध्यात्मिक जागृति की शहनाई बजे यह जरूरी हो गया है।

इस दिशा की ओर भारतीय महात्माओं ने उन्नीसवीं सदी में ही अँगुली निर्देश किया है। बंगाल के देहात में जन्म पाये गदाधर ने राम-कृष्ण परमहंस होने तक जो आध्यात्मिक साधना की थी वह युग-प्रवर्तक ही थी। सभी विश्व-धर्मों ने संचित किये विभिन्न साधना मार्गों की प्रत्यक्ष अनुष्ठानपूर्वक परीक्षा ली गदाधर ने, आर्यों के या हिन्दुओं के सनातन धर्म ने सुझाई पूर्व अनुष्ठित साधनाओं का पुनः परीक्षण किया, देवी की उपासना हुई, वेदान्त के ‘तत्त्वमसि’ का रहस्य चित्त की गुफा में खोलकर देख लिया और इस सबके पश्चात स्वानुभूति पर आधारित अपना निर्णय प्रकट किया।

चित्त में तड़पन होगी, तीव्र जिज्ञासा होगी तो साधना के क्षेत्र में सत्यनिष्ठा के बल पर उठाया कदम किसी भी देश में, किसी भी धर्म पर या पन्थ में, कहीं के भी गुरु मुख से श्रवण करके स्वीकारे। किसी भी मार्ग पर चल पड़ता हो तो सभी की परिणति एक ही होती है। ‘अहं’ की ग्रन्थि खुले और विश्व की व्याप्ति व्यक्ति के जीवन को प्राप्त हो, इसी लक्ष्य के लिये सारी साधनाएँ होती हैं। यह हेतु सिद्ध होने पर ज्ञानेश्वर महाराज के शब्दों में-

आनंदाच्या डोही। आनंद तरंग।
आनंदचि अंग। आनंदाचे।।


(आनन्द के पोखर में। आनन्द के ही तरंग। आनन्द ही अंग। आनन्द के।।) ऐसी स्थिति हो आती है। ऐसी अवस्था में भोगवाद व युद्धवाद के फन्दे में फँसा देने वाले, सृष्टि के साथ शत्रुत्व करने वाले तथाकथित विकास का आडम्बर और उसके साथ आने वाले आन्तर्बाह्य गुलामी का जोखड़ कैसे टिक पाएगा ? मानव जाति के उदात्त भवितव्य के लिये मार्गदर्शक सिद्ध हुए इस परमहंस को अक्षर-ज्ञान नहीं था, एकदम अपढ़ देहाती था वह, लेकिन उसका प्रज्ञान अक्षर था, इतना कह देने में सब कुछ सूचित हो जाता है।

इस क्रान्तिकारी अध्यात्म की मशाल लेकर विदेशों में पहुँचने वाले प्रथम सन्यासी थे स्वामी विवेकानन्द। उन्होंने रामकृष्ण देव की अनुभूति का सशास्त्र विवेचन करके यूरोप-अमेरिका को हिला दिया। अति-भोग के गुलामी की निद्रा तब प्रगाढ नहीं हुई थी और यह देश राजनैतिक गुलामी में से गुजर रहा था। उस समय का इस तरुण सन्यासी का कार्य पूरी मानव-दुनिया को जगाने वाला हो गया था। उसके पश्चात आध्यात्मिक जागृति लाने वाले सन्त-महात्माओं की, साधक-सन्तों की एक मालिका ही शुरु हो गई।

देश के स्वातन्त्र्य की आकांक्षा संजोकर चाहे तो जान देने को तैयार ऐसे कितने ही महान देशभक्त देशभर में उठ खड़े हुए थे उस समय। कितने ही क्रान्तिकारक गीता की सर्वत्र ईश्वरानुभूति की, ज्ञान-कर्म-भक्ति के एकरूपता की सिखावन पचाते रहे और इन्होंने फाँसी का फन्दा भी गीता के आधार से ही स्वीकार लिया। योगी श्री अरविन्द पूर्ण-योग के उपासक होकर पुदुच्चेरी में विश्वभर के साधकों के लिये मार्गदर्शक बने और पंजाब में जन्में रामतीर्थ व्यावहारिक वेदान्त के मूर्त प्रतीक बनकर आधुनिक भारत में, जापान और अन्य कुछ देशों में नित्य दैनन्दिन जीवन में एकात्मता किस तरह आती है इसके पाठ पढ़ाते रहे। उनका वेदान्त-जीवन की एकता की अनुभूति-व्यवहार के कर्म में उतरा था।

श्रीरमण महर्षि ने अन्तरात्मा की विश्व के साथ एकरूपता होने पर क्या घटित होता है यह दिखा दिया। श्री मेकिन्स नाम के एक वैज्ञानिक दो हफ्तों के लिये भारत आये थे। वे जब दक्षिण भारत में मद्रास के पास तिरुवल्लमलाई पहुँचे तब उन्होंने देखा कि श्रीरमण महर्षि जब शाम के समय घूमने के लिये निकलते तब थोड़े ही समय में पशु-शाला के पशु, वन में निवास करने वाले पशु, सर्प इत्यादि प्राणी रमण के साथ चलने लगते। चिड़ियाँ, शिकारी पक्षी, अन्य प्रकारों के पक्षी भी उनके ऊपर आसमान में उड़ने लगते, उनकी अच्छी खासी भीड़ लग जाती आकाश में। यह देखने पर इस वैज्ञानिक के ध्यान में आया कि इस महापुरुष से प्रसारित हुए रेडिएशन (विकिरणों) की ऊर्जा यदि दुनिया भर की वनस्पतियों को पहुँचा सकेंगे तो उन सात्विक वनस्पतियों का आहार पाकर सिंह भी सुखपूर्वक जी सकेंगे और वे बकरियों के साथ प्रेमपूर्वक रह लेंगे।

तापसों के, ऋषि-मुनियों के सेंट फ्रान्सिस और राबिया के निकट यह वैर-त्याग का प्रत्यक्ष अनुभव रहता था यह हमने देखा ही है। विश्वव्याप्त प्रेम की यह परिणति है यह तो स्पष्ट ही है; परन्तु यह प्रेम जिसमें से प्रवाहित हुआ वह चैतन्य सार्वत्रिक आत्मिक एकता का प्रकट आविष्कार है यह भी इससे स्पष्ट हो गया।

इस प्रकार के व्यक्तियों के अस्तित्व में से प्रेम का विकिरण होता रहता है और इससे अनेक निकट आये लोगों के शारीरिक तथा मानसिक रोग दुरुस्त हो गये और अनुभव भी करते हैं। ध्यान-मार्ग के आधुनिक-काल के प्रवर्तक श्री जें. कृष्णमूर्ति के विषय में ऐसा ही कहा जाता था। उनके हस्तस्पर्श से अनेकों के रोग ठीक होते थे। जाति-धर्म-पन्थ इनके अतीत, देश-राष्ट्र इत्यादि की सीमा रेखाएँ लाँघकर मानव-मात्र से या भूत-मात्रों से सख्य अनुभूत करने वाला विश्व-मैत्री का वाहक बना हुआ व्यक्तित्व था कृष्ण मूर्ति जी का।

आर्थिक असमानता हर युग के मानव-समाज की बीमारी रहती आई है। बाह्य उपायों से, संस्थात्मक या हिंसात्मक क्रान्तियों से या कानून से यह समानता स्थापित करने वाली क्रान्ति हो नहीं सकती यह अनुभव हर युग में आया है। एक अलग संस्कार की, आन्तरिक एकता की साधना में से, शिक्षा में से विकसित हुई उदारता की, करुणा की इसके लिये आवश्यकता होती है। कृष्णमूर्ति ने कहा था- “सच्ची बात करें तो एक प्राध्यापक की कमाई बगीचे में काम करने वाले माली की कमाई से अधिक होने की क्या जरूरत है?” ध्यान में से अहं विलोपन, चित्त की विश्वव्याप्ति सध जाती है, तब किसी भी प्रकार की विषमता कैसे टिक सकेगी? इस आन्तरिक सम्यक परिवर्तन को कृष्णमूर्ति ‘दि ओनली रेवोल्यूशन’ एकमात्र असली क्रान्ति-मानते थे।

ऐसा एक सर्व-स्पर्शी जीवन-दर्शन इस देश में मूर्तिमन्त साक्षात हो, ऐसी तड़पन थी गाँधी जी के चित्त में। गुलामी का फन्दा दिखने के लिये केवल राजनैतिक था। उसमें से आर्थिक गुलामी आई यह भी समझना आसान था। परन्तु सर्वांगीण जागृति में से व्यवहार में उतरी हुई मुक्तता हर कर्म में व्यक्त हुए बिना लोगों के लिये सच्ची आजादी आ नहीं सकती यह गाँधीजी को स्पष्ट दिखाई देता था। जाति-पाति, धर्म-अधर्म, इनमें असमानता का, उँच-नीच का, परस्पर वैर-द्वेष का भाव रहना यानी गुलामी की साँकल दृढ़ करा देना ही है यह उन्होंने पहचाना था।

अन्याय के प्रतिकार के लिये सत्याग्रह की, अहिंसा की, प्रेम की पद्धति उनको मान्य हुई। युद्ध, रक्तपात, द्वेष को, वैर भावना को भड़काते हैं। मनुष्य-मनुष्य का शत्रु बन जाता है और इससे अन्याय तो कभी मिटता ही नहीं ! इसलिये सत्याग्रह और दूसरी ओर से रचनात्मक कार्यक्रमों में भंगी-मुक्ति, स्त्रियों का समूचा उत्थान जीवन-शिक्षण, वस्त्र-स्वावलम्बन इत्यादि सामाजिक-आर्थिक समानता का कार्यक्रम उन्होंने सहयोगी देश-सेवकों की मदद से चलाया। संयम को शरीर श्रमनिष्ठा के, विकार-शमन के, आहार-सन्तुलन के और इस तरह के अन्य अनेक प्रयोग उन्होने अपने जीवन में चलाए और मित्रों के, अनुयायियों को जीवन में चलाने की प्रेरणा दी।

मित्र-भावना की एक ऐसी आभा गाँधी जी के व्यक्तित्व में थी कि तीव्र मतभेद और शत्रुत्व करने वाले विरोधियों को अपनी विरोधी भूमिका पर टिके रहना असम्भव हो जाता था। गाँधीजी विरोध करने वालों को सहजता से अपने साथ कमेटी में शामिल करा लेते थे। प्रत्यक्ष साथ में कार्य करते समय ऐसे सहकारी सीखते थे और सहजता से सहयोग एवं मित्रता विकसित हो जाती थी।

ब्रिटिशों के कारागृह में कठोरता से पेश आने वाले जेल अधिकारी जनरल स्मट्स के लिये उन्होंने स्वयं बहुत प्रेम से चमड़े के जूते बनाकर भेंट किये थे और जनरल साहब ने वे जूते उतने ही प्रेम से इंग्लैण्ड में अपने बँगले में दर्शनी आलमारी में संभालकर रखे थे। अंग्रेजों की सत्ता और भारत की गुलामी गाँधी जी को नहीं सुहाती थी। अंग्रेजों की जीवन-पद्धति का उन्हें बिल्कुल आकर्षण नहीं था। किन्तु अंग्रेज मनुष्य की मित्रता उन्हें हमेशा प्रिय थी। एक नवीन, सर्व-मित्रता के दर्शन राष्ट्रीय जीवन में हो ऐसा उनका प्रयास रहता था।

आक्रमणकारी साम्राज्यवाद के कारण हम गुलाम हो गये। यह गुलामी नष्ट होने के लिये स्वातन्त्र्य-आन्दोलनों की संरचना इस तरह हमें करनी होगी कि दुनिया में कोई भी किसी का भी गुलाम न हो। यह भूमिका थी गाँधीजी की। अब्राहम लिंकन का गुलामी नकारने वाला प्रसिद्ध वचन गाँधीजी की वृत्ति का, कार्यक्रमों का मूलभूत हेतु था “ऐज आई शैल नाॅट बी अ स्लेव,सो आई शैल नाॅट बी अ मास्टर - (As I shall not be a slave, so I shall not be a master)” (मैं गुलाम नहीं रहना चाहता, परन्तु मैं किसी का मालिक भी नहीं बनना चाहता) इस प्रकार सबके लिये आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक समान अवसर उपलब्ध कराने वाली व्यवस्था स्वातन्त्र्य के लिये किये आरोहण में से निर्माण हो यही भूमिका थी गाँधी जी के नेतृत्व की।

इसी कारण उन्होंने कहा था- यदि यूरोप-अमेरिका का जीवन-स्तर स्वतन्त्र-भारत के लिये चाहेंगे तो इन राष्टों से पाँच गुना अधिक शोषण अन्य देशों का हमें करना पड़ेगा। इसका अर्थ यही होगा कि हिंसा, अपमान, डण्डाशाही के मार्ग से अन्यों के लिये गुलामी लादने वाला साम्राज्य खड़ा करना। यानी रक्तरंजित इतिहास की पुनरावृत्ति करने के सिवा गत्यन्तर नहीं रहता। एक समाज का साम्राज्य फैलाने के लिये गृध्रवृत्ति बढ़ानी पड़ती है। इसके विपरीत, समानता विकसित करना कितना आसान है।

गाँधी जी का एक उद्गार प्रसिद्ध है- “दि अर्थ हैज गाॅट इनफ फॉर एवरी बडीज नीड, बट शी हैज नाॅट गाॅट, इनफ टू सैटिस्फाइ अ सिंगल मैन्स ग्रीड- (The Earth has got enough for every bodies need but she has not got enough to satisfy a single man’s greed)” हरेक की आवश्यकता पूरी करने के लिये पर्याप्त सामग्री धरती के पास अवश्य है, परन्तु किसी एक की भी लोभ-वृत्ति को सन्तुष्ट करने जितनी साधन सम्पदा उसके पास नहीं है और आखिर यह लोभ ही मनुष्य के लिये भस्मासुर बन जाता है यह इतिहास हर युग में पुनरावर्तित होता रहता है।

ईशावास्य उपनिषद का आदेश ‘मा गृधः कस्यस्विद्धनम्’। यह गाँधी जी का ब्रीद वाक्य था। वह पूरे राष्ट्र के लिये उन्होंने लागू किया। इसी के कारण नव-निर्मित पाकिस्तान का पचपन कोटि रु. देनदारी देने के दियानत भारत के नेताओं की नहीं है, यह देखकर उनके उपवास का प्रसंग उद्भूत हुआ था। आखिर ये पैसे दिये गये, और उपवास टल गया। परन्तु गाँधी हत्या का बीज इसी प्रकरण में से अंकुरित हो गया था! अपनी आहुति देने की तैयारी रखकर ही सत्यव्रती मनुष्य जीवन जीता है। हरिश्चन्द्र की कहानी गाँधी जी को बचपन से प्रेरणा देता रही थी। उनके लिये खाने के और दिखाने के दाँत अलग-अलग नहीं थे! उनकी सामूहिक प्रार्थना- ‘ईश्वर अल्ला तेरे नाम’ यह मात्र गाने के लिये नहीं थी। उनकी दृढ़ अन्तः श्रद्धा थी वह। इस देश में जातियों का ऊँच-नीच का भाव समाप्त हो, हिन्दू-मुस्लिम तथा अन्य धर्मानुयायियों का परस्पर के साथ प्रेम का सहयोग का नाता जुड़ जाये इसी के खातिर श्रद्धापूर्वक चलाया प्रार्थना का उपक्रम था उनकी प्रार्थना।

स्वातन्त्र्य के लिये किये प्रयास देश में प्राचीन काल से चलती आई समन्वय की संस्कृति पुष्ट करने के लिये उपयुक्त हो यह हेतु नित्य जागृत रखा था गाँधी जी ने। ‘सर्व धर्म समानत्व’ यह ‘एकादश व्रतों’ में से एक व्रत था। आश्रम वासियों के लिये। रामकृष्ण परमहंस ने जिसका अनुष्ठान किया उस अनुभूत सत्य को आश्रम के व्रतों में आग्रहपूर्वक स्थान देने की यह भूमिका थी। जीवन की एकात्मता जीने के लिये होती है, मात्र बोलने के लिये नहीं रहती। एक खण्डप्राय देश को एकत्रित रखने के लिये, उसके सम्यक विकास के लिये दुनिया को मित्रता से जीतकर एक वैश्विक मानव-समाज के निर्माण के लिये अपने देश को उदाहरण रूप बनना चाहिए इस हेतु से इस महावीर ने अथक प्रयत्नों की पराकाष्ठा की। ‘आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति’ यह गीता के योगी की साधना उन्होंने सार्वजनिक जीवन में चलाने का व्रत धारण किया था।

परन्तु काल की परिपक्वता किसी भी प्रयास के यश के लिये आवश्यक होती है ऐसा इतिहास कहता आया है। धारित्री का संकट अत्यन्त विकराल रूप धारण कर रहा है यह अनुभव होने पर पर्यावरण शास्त्र अध्यात्म के साथ खड़ा हो गया है। प्राचीन काल से अध्यात्म के अहाते में ही पर्यावरण का विषय आ जाता रहा। उसे अलग ढंग से महत्त्व देने की तब आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी।

अब स्वतन्त्र वैज्ञानिक परिभाषा में जीवन की एकता और परस्परावलम्बिता उद्घोषित हो रही है। जीवन जीने की पद्धति बदलने की तीव्र आवश्यकता सभी को जँच रही है। गाँधी जी से 1920 के दशक में ही काका साहेब कालेलकर जी ने पूछा था, “भविष्य काल की खेती का क्या होगा स्वरूप?” वह समय था नये सोवियत संघ की प्रचारित सामूहिक खेती का। गाँधी जी को इस प्रचार-प्रसार से कुछ लेना-देना नहीं था। स्वतन्त्र विचार की उनकी भूमिका अनुभव पर, निरीक्षण पर आधारित थी। उन्होंने तत्काल जवाब दियाः ‘वृक्ष-खेती’। वृक्ष खेती के अनेक लाभ हैं-

1. कम श्रम करने होंगे।
2. पानी की कम आवश्यकता रहेगी।
3. वृक्ष स्वयं पानी से भरपूर बादलों को निमन्त्रित करते हैं।
4. वृक्षों के पत्तों-फलों पर पशु-पक्षी-मानव और अन्य जीव-जन्तु जीते हैं। मानव वृक्षों से अपना आहार लेता रहे तो हिंसक वृत्ति बढेगी नहीं। भूमि पर खेती करने में धरती पर कुछ-न-कुछ अत्याचार होते रहते हैं। उस मातृ देवता पर अन्याय होता रहता है।
5.अन्न पकाने के लिये अधिक ऊर्जा खर्च होती है। इसके लिये लकड़ी, कोयले की ऊर्जा के विकल्प खोजना जरूरी है।

गाँधी जी का यह चिन्तन पूर्णतः वैज्ञानिक है यह बाद में सिद्ध हो गया है। जापान के विख्यात समाज-सेवक कागावा ने जापान की भू-क्षरण से दरिद्र बनी पहाड़ियों के क्षेत्र में वृक्ष-खेती प्रारम्भ की और जापान के ही ‘वन स्ट्रॉ रेवोल्यूशन (One Straw Revolution’ वाले फुकुओकाजी ने अपने प्राकृतिक खेती प्रयोगों में वृक्ष-खेती को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। मिट्टी को संरक्षण देने के कार्य वृक्ष अनेक प्रकारों से करता रहता है यह बात तो प्रसिद्ध ही है।

स्वातन्त्र्य-आन्दोलन में गाँधी जी के साथ कार्य करने वालों में से अनेक लोग राजनीति के प्रचलित प्रांगण में उतरे। उनमें से कुल थोड़े सहयोगी काका साहेब काललेकर, विनोबा, जयप्रकाश जी और अन्य कुछ लोग समाज में समानता आये, सम्पत्ति का उचित विभाजन हो, देहातों में स्वतंत्रता पहुँचकर सामान्य मनुष्य को लाभान्वित करें इत्यादि कार्य करने के लिये सीधे लोगों के बीच सारी शक्ति लगाते रहे। विशेषतः विनोबा के भूदान-यज्ञ में पद यात्राओं से लोक सम्पर्क का नया माध्यम स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिये उपलब्ध हुआ।

पाँच बार पृथ्वी प्रदक्षिणा हो जाय इतना पैदल चले विनोबा-देहात-देहात में यह सन्देश पहुँचा कि खूनी क्रान्तियों या कानून से जो हो नहीं सकता वह प्रेम से हो सकता है। गरीबों की जमीन की भूख अन्य किसी तरीके से मिटाना सम्भव नहीं, मित्रता की, हृदय के भगवान को जगाने की आवश्यकता है इसके लिये दुनिया के सामने यह उदाहरण रखने का अवसर दिया भूदान ने। आन्ध्र प्रदेश में पोचमपल्ली गाँव में एक सभा में विनोबा जी को एक जमींदार ने दान में जब स्वयं होकर जमीन देने की तैयारी दिखाई तब भूदान-यज्ञ का सूत्रपात हुआ। उस क्षेत्र में जमीन के प्रश्न को लेकर हिंसक क्रान्ति की हवा फैल रही थी। भगवान की प्रेरणा से विनोबा को यह नया सत्याग्रह का रूप सूझा। अनेक प्रान्तों में कार्यकर्ता जुट गये। ‘दान’ शब्द का सही अर्थ लोगों के सामने आया। आद्य शंकराचार्य ने ‘दानं संविभागः’ यह कहकर समानता के लिये उचित संविभाजन करने का तरीका स्पष्ट किया।

फिर केवल जमीन नहीं सम्पत्ति, श्रम, बुद्धि की शक्ति सभी का विनियोग समाज के सभी तबकों के लिये हो यह बात भी चल पड़ी। इसके लिये ग्रामदान प्रारम्भ हुआ। उसके लिये कानून भी कुछ प्रान्तों में बने। काका साहेब ने कह दिया- यह दान और यज्ञ की परम्परा विनोबा ने पुनरुज्जीवित की, क्रान्ति का नया सत्याग्रही स्वरूप प्रकट किया। वे हम सबमें इस वजह से ‘सीनियर मोस्ट’ हो गये हैं। स्वातंत्र्य के पश्चात गाँधी जी के देश में रक्तरंजित क्रान्ति को स्थान मिल जाता तो मानव-समाज की सभी आशाओं पर पानी फिर जाता। भूदान-यज्ञ के कारण पूरे देश में कुछ वर्षों के भीतर चालीस लाख एकड़ जमीन मात्र माँगने से मिल सकी यह इतिहास में घटित हुआ बड़ा आश्चर्य है। क्रान्ति का काम सम्भावना व्यक्त करने का होता है । वह सम्भावना 1960 के दशक में व्यक्त हो गई थी।

चीन के आक्रमण के कारण सभी का ध्यान 1960 के बाद हिमालय के क्षेत्र पर केन्द्रित हुआ। विनोबा ने हिमालय के कार्यकताओं से कहा- ‘उत्तर दिशा के आप प्रहरी बनिए।’ इससे हिमालय के वनों में, देहात-देहात में भूदान का, प्रेम से गरीबों के लिये परिस्थिति का परिवर्तन करके सभी को न्याय दे सकते हैं यह सन्देश पहुँचा। लोक-जागृति का एक परिणाम ऐसा होता है कि अपने-अपने क्षेत्र की प्रमुख समस्या पर उपाय खोजने की दृष्टि खुल जाती है। विकास के औद्योगिक शहर वाले चेहरे के कारण हिमालय के क्षेत्र में शतकानु शतक शुद्ध हवा को, निर्मल आरोग्यदायी जल का, भूमि संरक्षण को निश्चित करने वाले और सभी प्राणियों के लिये आहार, छाया व विश्राम को मातृगृह बने हुए वनों पर कुल्हाड़ी बरस पड़ी थी।

अंग्रेजों ने व्यापारिक स्वार्थ के लिये, तराई के क्षेत्र में कारखाने लगाने के लिये मिश्रित वनों के स्थान पर एकल प्रजाति-सचिपर्णी के महासागर फैला दिये हिमालय में और एक समय में जो गढ़वाल-कुमाऊँ के लोग तिब्बत के साथ व्यापार करके अच्छा जीवन बिताते थे, ऊन काष्ठ-फल इत्यादि का निर्यात करते थे, वे दरिद्र हो गये। पहाड़ के वृक्ष और मिट्टी के साथ मानव-शक्ति का भी पलायन हो गया। उनकी ‘इकोनॉमी’ वनाधारित न रहकर ‘मनीअॉर्डर’ पर होने लगी। वस्तुतः स्वातंत्र्योत्तर काल में पुनः वनों का मिश्रित रूप प्रकट होना चाहिए था।

हुआ यह कि घर बार और थोड़ी खेती को लेकर मात्र स्त्री ही पहाड़ की प्रमुख निवासी के रूप में रह गई। वन-विनाश के कारण इस निवासी पर संकटों का पहाड़ ही टूट पड़ा। पीने का पानी लाने के लिये, घास, चारा, लकड़ी के लिये मीलों-मील चलना नित्य का हो गया। दिन का सारा समय इसी में बीते तो जीना क्या हुआ? ‘हमारा जीवन तो खच्चरों से भी गया बीता है। यह इसी वेदना का उद्गार है।

बूढाकेदार के पास वाले गाँव में रहने वाली अपनी सहेलियों से बाहर से आई दो लड़कियाँ कहने लगी- ‘आप कितनी भाग्यवान बहनें हैं यहाँ। नजदीक ही नदियों का संगम है। कष्ट सहना कठिन हो जाये तब हाथ में हाथ पकड़कर आप मिलकर छलाँग लगा सकती हैं।’ जीने के विषय में इतनी विरक्ति तारुण्य में ही निर्माण करने वाली विकास की पद्धति वनों के साथ-साथ स्त्री-जाति का मायका भी नष्ट कर देती आई है।

और हिमालय के वन मात्र स्त्री जाति के लिये नहीं, देश की संस्कृति के लिये भी कभी मायका रहे हैं। वन-सम्पदा ही अन्य सारे वैभव के मूल में रहती है। पृथ्वी पर जीव-जन्तुओं से लेकर मानव तक जो जीवन का विकास हुआ है वह नदियाँ-सागर-झरने, स्रोत, तालाब इनके निकट अवश्य हुआ लेकिन उसे सांस्कृतिक उन्नत अवस्था प्राप्त हुई वृक्ष-वनों के कारण ही। इसके सहज दर्शन हिमालय में जितना होता था उतना अन्यत्र होना मुश्किल था।

ये वन मानव के सर्वांगीण विकास के लिये पीठ की रीढ़ के समान आधार स्तम्भ बनकर रहे। ये ही तो मनुष्य के असली पूर्वज हैं। स्वाभाविक नैसर्गिक रूप में धरती पर पहले फूलों से फलों से और पर्ण-सम्भार से झुके हुए वृक्षों के संसार ही खिले और इनके पश्चात इनका आस्वाद लेने वाले पशु-पक्षी अन्य प्राणी और मानव आये। घास के नाजुक हरे कोंपलों से लेकर मानव तक की एक शृंखला ही काल के ताल पर वर्त्तुलाकार में घूमती हुई आगे-पीछे, पीछे-आगे उत्तुंग पर्वत-चोटियों से पाताल तक नृत्य-गायन का, मौन ध्यान का वाद्य-वृन्दात्मक और शान्ति का महापर्व मनाता आया।

जिन समाजों को समग्र संसार की चन्द्र-सूर्य-तारक-ग्रह-नक्षत्रों से मिट्टी के कण तक आ ब्रह्म स्तम्भ पर्यन्त की जीवन की एकता समझने की और जीने की कला सध गई और फिर जीवन-नाट्य की संगीतिका में, मौन-एकान्त साधना में अपने स्वर, एवं चित्त की शान्ति मिला देने की खूबी मालूम हो गई, उसे अधिक मधुर, अधिक गहन-गम्भीर और रूप-सम्पन्न बनाना आया वे समाज संस्कृति के शिखर पर पहुँच सके। मात्र “लिव एंड लेट लिव (Live and let live) - जीयो और जीने दो” नहीं, एक दूसरे के पड़ोसी बनकर नहीं, तो एक-दूसरे के प्राणों में प्राण मिलाकर, परस्पर से एकरूप होकर रहना आया। वे ब्रह्माण्ड का रहस्य समझकर ब्रह्माण्ड को व्याप्त करके रह लिये। ऐसे जीवन गहन-गम्भीर आनन्द उपनिषदों ने शब्दों में उड़ेलने का प्रयास किया। हमनें उसका थोड़ा सा ही क्यों न हो स्वाद चख लिया है, यहाँ के निवेदन में।
 

 

सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम संख्या

अध्याय

1.

वायु, जल और भूमि प्रदूषण

2.

विकास की विकृत अवधारणा

3.

तृष्णा-त्याग, उन्नत जीवन की चाभी

4.

अमरत्व की आकांक्षा

5.

एकत्व ही अनेकत्व में अभिव्यक्त

6.

निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

7.

एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

8.

सर्व-समावेश की निरहंकारी वृत्ति

9.

प्रकृति प्रेम से आत्मौपम्य का जीवन-दर्शन

10.

नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

11.

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

12.

अपना बलिदान देकर वृक्षों को बचाने वाले बिश्नोई

13.

प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

14.

मानव व प्रकृति का सामंजस्य यानी चिपको

15.

टिहरी - बड़े बाँध से विनाश (Title Change)

16.

विकास की दिशा डेथ-टेक्नोलॉजी से लाइफ टेक्नोलॉजी की तरफ हो

 

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