Effort Feed http://hindi.indiawaterportal.org/effort.xml en गाँव ने रोका अपना पानी http://hindi.indiawaterportal.org/suface-water-management-and-villagers <span>गाँव ने रोका अपना पानी</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Mon, 12/03/2018 - 20:37</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><span class="inline inline-left"><img alt="बेहरी में कच्चे बाँध से लबालब नदी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm5.staticflickr.com/4830/46118649352_17c02cf556_b.jpg" title="बेहरी में कच्चे बाँध से लबालब नदी" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>बेहरी में कच्चे बाँध से लबालब नदी</i></span></span>'खेत का पानी खेत में' और 'गाँव का पानी गाँव में' रोकने के नारे तो बीते पच्चीस सालों से सुनाई देते रहे हैं, लेकिन इस बार बारिश के बाद एक गाँव ने अपना पानी गाँव में ही रोककर जलस्तर बढ़ा लिया है। इससे गाँव के लोगों को निस्तारी कामों के लिये पानी की आपूर्ति भी हो रही है और ट्यूबवेल, हैण्डपम्प और कुएँ-कुण्डियों में भी कम बारिश के बावजूद अब तक पानी भरा है। यह काम किसी सरकारी योजना के अन्तर्गत नहीं हुआ है और न ही किसी संस्था ने किया है। यह काम खुद गाँव में रहने वाले लोगों ने अपने गाँव में जलस्तर बढ़ाने के प्रयासों के चलते किया है।<br /><br /> मध्य प्रदेश में देवास जिले के बागली विकासखण्ड का छोटा-सा गाँव बेहरी इन दिनों पानी के मामले में आत्मनिर्भर बना हुआ है, जबकि उसके आसपास के अन्य गाँव अभी से बाल्टी-बाल्टी पानी को मोहताज हैं। इस 'पानीदार' गाँव ने अपने पानी का खजाना नदी में छुपा लिया है।<br /><br /> ग्रामीणों के मुताबिक रोका हुआ पानी मार्च महीने तक भरा रहकर गाँव का जलस्तर बनाए रखेगा। दरअसल गाँव के पास से बहकर जाने वाली एक छोटी नदी में ग्रामीणों ने अपने दम पर कच्चा बाँध बनाकर बरसाती पानी रोका है। उनके इस काम को इलाके के दूसरे गाँव के लोग भी अब देखने-परखने आ रहे हैं।<br /><br /> मालवा का यह इलाका और खासतौर पर देवास जिला पानी के संकट के लिये देश भर में पहचाना जाता है। बागली और उसके आसपास के करीब सौ गाँवों में बीते पाँच सालों से लगातार कम और अनियमित बारिश की वजह से पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई है। यहाँ का जलस्तर धरती में काफी नीचे तक चला गया है।<br /><br /> हालात इतने बुरे हैं कि कई किसान पानी के संकट से परेशान होकर अपनी खेती की जमीन को बेचने तक का विचार बना चुके हैं। हर साल जमीनी पानी का स्तर नीचे जाते रहने से धड़ाधड़ ट्यूबवेल अनुपयोगी होते जा रहे हैं। पानी के लिहाज से बागली इलाका इन दिनों सबसे डार्क जोन में माना जाता है। इसी बागली कस्बे से चंद किलोमीटर की दूरी पर यह गाँव इलाके की जल संकट की भयावहता से बेखबर है।<br /><br /> बेहरी के स्थानीय लोगों ने श्रमदान से एक छोटी नदी में पानी रोककर मार्च तक के लिये पानी के संकट से निजात पाने के साथ जलस्तर भी बढ़ा लिया है। ग्रामीणों की मेहनत रंग लाई और अब मार्च तक नदी का पानी और उसके बाद यहाँ के कुएँ-कुण्डी अप्रैल के आखिरी हफ्ते तक पानी दे सकेंगे।<br /><br /> अपने पसीने के दम पर इकट्ठा किये पानी के खजाने की ग्रामीण अब खुद निगरानी करते हैं और नदी को लबालब भरी हुई देखकर उत्साहित हैं। उनका मानना है कि यह पानी मार्च तक चल सकता है। उन्होंने इसके पानी को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पंचायत को सौंपी है। पंचायत में बैठकर ही ग्रामीणों नें निर्णय लिया कि इस पानी को खेती में इस्तेमाल करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये।<br /><br /> कोई भी किसान नदी में जमा इस पानी का उपयोग अपने खेतों में सिंचाई के लिये नहीं कर सकेगा। इस पानी का उपयोग सिर्फ जलस्तर बढ़ाने तथा मवेशियों को पानी पिलाने जैसे कामों के लिये ही हो सकेगा। यदि कोई किसान इसके पानी को मोटर से खींच कर सिंचाई करेगा तो उसे अर्थदंड से दंडित किया जाएगा।<br /><br /> बेहरी गाँव के पास से ही गुनेरा-गुनेरी नाम की छोटी-सी पहाड़ी नदी बहती है। पहले कभी इसमें पानी पूरे साल भरा रहता था, लेकिन अब बारिश के बाद से ही पानी घटते हुए दिसम्बर-जनवरी तक तो यह गंदले नाले में बदल जाया करता था।<br /><br /> इस नदी के असमय सूख जाने से ग्रामीणों को साल-दर-साल जनवरी महीने से पानी के संकट से दो चार होना पड़ता था। खेती के लिये तो दूर पीने के पानी की भी किल्लत होने लगती थी। धरती के पानी का जलस्तर गहरे चले जाने से ट्यूबवेल सहित कुएँ-कुण्डियाँ सूख जाते और इस तरह पानी के लिये गर्मियों के चार-पाँच महीने में लोगों को भयावह जल संकट से रूबरू होना पड़ता था।<br /><br /> मालवा का यह इलाका कभी पग-पग रोटी, डग-डग नीर के लिये पहचाना जाता रहा है, लेकिन अब यहाँ के हालात पानी के मामले में काफी बदतर हो चुके हैं। जमीनी पानी का जलस्तर 200-300 फीट से गहरा होते हुए 600-800 फीट तथा कहीं-कहीं एक हजार फीट तक जा पहुँचा है।<br /><br /> बेहरी के आसपास करीब 75 वर्ग किमी इलाके में करीब तीन हजार से ज्यादा ट्यूबवेल खनन बीते तीन सालों में हुए हैं, इनमें अधिकांश सूख भी चुके हैं। बीते पाँच सालों में यहाँ कभी पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। इस बार औसत 40 इंच बारिश से आधी करीब 22 इंच ही हो सकी है। इसलिये पानी के संकट की दस्तक अभी से सुनाई देने लगी है। कई तालाब और बाँध भी पूरे नहीं भर सके हैं। बारिश की कमी के साथ बड़ा कारण बोरिंग की होड़ में भूजल भण्डार में कमी होने का है।<br /><br /> बीते साल तक बेहरी में खेती तो दूर मवेशियों को पिलाने और अन्य कामों के लिये पानी की व्यवस्था करना बड़ा कठिन हो जाता था। पानी के अभाव में बारिश के बाद किसान भी खेती नहीं कर पाते थे। औरतें अपने घरों में पानी की जरूरत के लिये आसपास खेतों में बने कुओं आदि पर निर्भर थी। कई बार तो डेढ़ से दो किमी तक सिर पर पानी से भरे मटके रखकर पैदल लाना पड़ता था।<br /><br /> गर्मियों के इन महीनों में छोटे बच्चों से लेकर महिलाएँ तक सुबह से शाम तक पानी की जुगाड़ में लगी रहती। एक मटका पानी लाने में दो से तीन घंटे का वक्त लग जाता था। कई बार तो बच्चों को इस वजह से स्कूल की भी छुट्टी कर देनी पड़ती थी। खेतों के कुओं पर भी पानी भरना आसान नहीं होता। कोई भरने नहीं देता तो कहीं बिजली नहीं होती।<br /><br /> ऐसी स्थिति में ग्रामीणों ने चौपाल पर बैठकर सोचा कि इसका निदान क्या हो सकता है। लोगों ने अपने-अपने तरह से विचार रखे लेकिन कोई कारगर तरीका नहीं निकल पा रहा था। कुछ युवाओं ने सुझाया कि किसी तरह यदि हम नदी के बरसाती नदी के पानी को रोक सकें तो यह पानी हमारे गाँव के जलस्तर सहित मवेशियों के पानी पिलाने तथा अन्य निस्तारी कामों के लिये भी उपयोगी होगा। यह आइडिया सबको बड़ा पसन्द आया।<br /><br /> हर साल पहाड़ियों और जंगलों से इस नदी में बारिश का खूब सारा पानी आता है और तेजी से बहते हुए गाँव से बाहर निकल जाया करता है। कभी गाँव के लोगों ने इसे रोकने की कवायद तो दूर इस बारे में सोचा तक नहीं था। लोगों ने सोचा कि बाँध बनाकर रोक लेने से यहाँ पानी भरा रहेगा। पानी धीरे-धीरे जमीन में रंजने लगेगा। जमीन की नीली नसों में पानी भरेगा तो भूजल भण्डार में भी इजाफा होगा। यह आसपास के ट्यूबवेल और कुएँ-कुण्डियों को भी रिचार्ज करता रहेगा।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="ग्रामीणों की मेहनत से गाँव में आया पानी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm5.staticflickr.com/4856/46118650312_c061d7ea44_b.jpg" title="ग्रामीणों की मेहनत से गाँव में आया पानी" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>ग्रामीणों की मेहनत से गाँव में आया पानी</i></span></span>चौपाल में हुई बात पर गाँव की पंचायत ने नदी पर स्टापडैम बनाने का विधिवत प्रस्ताव बनाया और जिले के तत्कालीन बड़े अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी। स्थानीय पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक कई बार आने-जाने से ग्रामीण यह अच्छी तरह समझ चुके थे कि इस तरह बात नहीं बनने वाली। कुछ अधिकारियों ने उनकी बात गम्भीरता से सुनी भी थी लेकिन बजट की अनुपलब्धता इसका बड़ा कारण था। दो-तीन साल तक यही सब चलता रहा पर कोई बात नहीं बनी।<br /><br /> इसी दौरान मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिये आदर्श आचार संहिता लग जाने से किसी भी नए सरकारी काम के लिये बजट मिलना सम्भव ही नहीं था और यदि ग्रामीण इसका इन्तजार करते तो दो महीने हाथ-पर-हाथ धरे गुज़र जाते।<br /><br /> आखिरकार ग्रामीणों ने खुद अपना रास्ता खोजा और बिना देर किये वे इसमें जुट गए। उन्होंने खुद श्रमदान करते हुए नदी पर कच्चा बाँध बनाने का निर्णय लिया और जुट गए। एक-दो दिन की मेहनत में ही कच्चा बाँध बनकर तैयार हो गया और पानी रुकना शुरू हो गया। देखते-ही-देखते नदी में छह फीट से ज्यादा पानी भर गया। अमूमन पतली धार की तरह बहने वाली नदी इन दिनों पानी से लबालब है।<br /><br /> हर साल इलाके के किसान नदी में सीधे मोटर लगाकर इससे पानी खींच लेते थे, इस कारण नवम्बर-दिसम्बर से ही नदी सूखने लगती थी। गाँव लगभग 'बेपानी' हो जाया करता था। लेकिन इस बार नदी में इतना पानी देखना ग्रामीणों के लिये भी सुखद है। डेढ़ महीने में ही इसका फायदा भी दिखना शुरू हो गया है। ट्यूबवेल जो लगभग बन्द हो चले थे या कम पानी दे रहे थे, उनमें पानी पहले के मुकाबले बढ़ गया है। हैण्डपम्प भी लगातार पानी दे रहे हैं।<br /><br /> सरपंच हीरालाल गोस्वामी बताते हैं- <b>'पंचायत ने नदी पर स्टापडैम के लिये प्रस्ताव बनाकर भेजा था। लेकिन सफल नहीं हो सके तो ग्रामीणों के साथ श्रमदान से हमने कच्चा बाँध बनाकर आपने गाँव के लिये पानी रोक लिया है। अब ग्रामीणों को भी नदी और तालाबों का महत्त्व समझ आने लगा है। अगले साल गाँव में पानी के लिये कुछ और काम करने की इच्छा है। गाँव और खेतों के पास पानी रोकने की संरचनाएँ बनाएँगे। पेड़ लगाएँगे। एक तालाब भी जन भागीदारी से बनाने पर विचार चल रहा है। पानी और पर्यावरण बचाकर ही हम अपने गाँवों को बचा सकते हैं। इधर इलाके में पानी का संकट सबसे बड़ा है। हमने खेती के लिये जमीन का सारा पानी उलीच डाला। अब कहाँ से लाएँ...? इसीलिये अब बारिश के पानी को रोककर उसके सही इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है।'</b><br /><br /> पंचायत सचिव मनोज कुमार का कहना है कि <b>बीते सालों में हमारे पूर्वज इस बात का ध्यान रखते थे कि बारिश का पानी धरती में रंजता रहे ताकि धरती में पानी का भण्डार बढ़ता रहे लेकिन आजकल किसी का इस बात पर ध्यान नहीं जाता। धरती में यथोचित पानी जा ही नहीं रहा तो रंजते हुए जमीन की कोख तक कैसे जाएगा। हजारों सालों में हमारे पूर्वजों ने जो पानी बचाया था, उसे हम उन्नत खेती के नाम पर गँवा चुके। बरसाती पानी को गाँव और खेतों में रोकने के लिये हमारे पास कोई संसाधन नहीं हैं। बारिश में जंगलों और पहाड़ियों से पानी नदी नालों से व्यर्थ बह जाता है, उसे रोकने की महती जरूरत है। खेती से मुनाफा कमाने की होड़ में लोगों ने क्षेत्र में पानी के संकट को आमंत्रित कर लिया है। हालांकि अब बेहरी के लोगों ने तो अपनी गलती सुधार ली है।'</b><br /><br /> बागली विकासखण्ड में बेहरी सहित छतरपुरा, नयापुरा, नानूखेड़ा, चारिया, चापड़ा, हाटपीपल्या, आमला ताज, टप्पा, झिकड़ाखेड़ा, भमोरी, आगुरली, मोखा पीपल्या, देवगढ़, करोंदिया, नेवरी, अरलावदा, गुनेरा, लखवाड़ा, पांजरिया, बावड़ीखेड़ा और अवल्दा-अवल्दी आदि 50 गाँवों में सबसे ज्यादा बोरिंग करवाए गए हैं। कई गाँवों में तो ढाई सौ से चार सौ तक ट्यूबवेल हैं।<br /><br /> बीते सालों में इस क्षेत्र में प्याज, लहसुन तथा आलू की बम्पर पैदावार होने से किसानों ने पानी उलीचने के लिये जी जान लगा दी। इन फसलों में पानी की खपत बहुत ज्यादा होती है। कई किसान इस वजह से कर्ज के दलदल में बुरी तरह फँस चुके हैं।<br /><br /> बेहरी की महिला बसंती बाई कहती हैं- <b>'अभी बीस पच्चीस साल में पानी की किल्लत बढ़ी है। इससे पहले हमने इलाके में कभी पानी की दिक्कत न देखी न महसूसी। मालवा की तो जमीन ही गहन गम्भीर है लेकिन ट्यूबवेल की होड़ में जमीन का पानी पाताल में चला गया। पानी के संकट का सबसे ज्यादा खामियाजा औरतों को ही उठाना पड़ता है। गाँवों में तो घर-परिवार की जरूरत के लिये औरतें ही पानी भरने की जिम्मेदारी निभाती हैं। ऐसे में उन्हें दूर-दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। नदी का व्यर्थ पानी बह जाता था, अब रोक लिया है तो तीन-चार महीने पानी की किल्लत से निजात मिलेगी।'</b><br /><br /> बेहरी गाँव की पंचायत और ग्रामीणों की तरह ही कई और गाँवों को पानी और पर्यावरण की समझ बढ़ानी होगी और स्थानीय स्तर पर वहाँ की जरूरतों के हिसाब से ऐसे काम करने होंगे कि उनका भी गाँव 'पानीदार' बन सके, इस तरह ग्रामीण भूजल भण्डार के मनमाने दोहन का प्रायश्चित भी कर सकेंगे।<br /><br /> कोई भी सरकार कभी भी हर गाँव के लिये पानी मुहैया नहीं करा सकती। स्थानीय ग्रामीण ही अपने पसीने से अपने हिस्से का बरसाती पानी रोककर इसका सही-सही इस्तेमाल कर सकते हैं। यह सिर्फ पर्यावरण के लिये ही ज़रुरी नहीं है बल्कि हमारे जीवन के लिये भी बहुत जरूरी है। पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">surface water management, villagers of devas district, madhya pradesh, improved groundwater table, bagali block, dark zone in terms of groundwater table, drying tubewells, stopdams.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333502&amp;2=comment&amp;3=comment" token="8bFmNlKO-u5mU9wlyXi7MPpTive80Ho23d7A1wxUwvs"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/suface-water-management-and-villagers" data-a2a-title="गाँव ने रोका अपना पानी"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fsuface-water-management-and-villagers&amp;title=%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80"></a></span> Mon, 03 Dec 2018 15:07:22 +0000 editorial 1319333502 at http://hindi.indiawaterportal.org अनूठा पर्यावरण प्रेमी http://hindi.indiawaterportal.org/nature-lover-with-difference <span>अनूठा पर्यावरण प्रेमी</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Mon, 10/29/2018 - 20:11</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><span class="inline inline-left"><img alt="जंगल का रूप लेते हाथीपावा के पौधे" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1961/44891485414_f5809125e3_c.jpg" title="जंगल का रूप लेते हाथीपावा के पौधे" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>जंगल का रूप लेते हाथीपावा के पौधे</i></span></span>दावा है कि कभी आपने ऐसा पुलिस अफसर नहीं देखा होगा, आज तक आपने जितने भी पुलिस अफसर देखे होंगे, अपराधों पर सख्ती से अंकुश लगाने या नरम-गरम छवि की वजह से पहचाने जाते रहे हैं। आमतौर पर खाकी वर्दी और रौब झाड़ना ही पुलिस की पहचान होती है लेकिन एक आईपीएस अफसर ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल दिया।<br /><br /> मध्य प्रदेश में झाबुआ के पुलिस कप्तान इन दिनों पर्यावरण के सिपाही बन गए हैं। सच कहें तो पर्यावरण के असली पहरेदार...अपराधों पर नियंत्रण के साथ ही इस डायनामिक पुलिस कप्तान ने अपनी इच्छाशक्ति से पूरी ताकत झोंक एक ऐसे स्थान को हरा-भरा बनाया है, जो कभी उजाड़ में अपनी वीरानियों के लिये पहचाना जाता रहा है।<br /><br /> सिर्फ हरा-भरा ही नहीं बल्कि इतना मनोहारी कर दिया है कि अब वह आसपास से लेकर दूर-दराज तक के लोगों को लुभाने लगा है। उनका काम सिर्फ एक पहाड़ी पर हजारों पौधे लगाकर जंगल खड़ा कर देने तक ही सीमित नहीं है, झाबुआ जिले के कई कस्बों और गाँवों में भी उन्होंने सैकड़ों फलदार पौधे लगाए हैं। तालाबों की गन्दगी हटाने में श्रमदान किया है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="गड्ढों की तैयारी करते एसपी जैन" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1944/44891474504_63cb2c1fe5_c.jpg" title="गड्ढों की तैयारी करते एसपी जैन" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>गड्ढों की तैयारी करते एसपी जैन</i></span></span>पर्यावरण के सरोकारों से गहरे तक जुड़े पुलिस पदक से सम्मानित इस आईपीएस अफसर ने करीब डेढ़ साल के छोटे से वक्फे (समय) में ही आदिवासी बाहुल्य झाबुआ अंचल की पूरे प्रदेश में एक अलग ही छवि बना दी है।<br /><br /> झाबुआ कस्बे से सटी हाथीपावा की पहाड़ी पर दो साल पहले तक झाबुआ के 99 फीसदी लोग भी कभी नहीं गए थे लेकिन आज झाबुआ ही नहीं दूर-दराज के लोग भी यहाँ आने लगे हैं। इस वीरान और उजाड़ रहने वाली बंजर पहाड़ी पर पंछी भी अपना रुख नहीं करते थे लेकिन अब यह जगह प्रवासी पक्षियों के लिये भी शेल्टर बन गई है।<br /><br /> दूर-दूर तक हरियाली का नजारा दिखता है। हरे पौधे बड़े होकर पेड़ बनने को आतुर हैं। आदिवासियों ने बीते सालों में यहाँ हलमा कर हजारों खन्तियाँ बनाई हैं, अब इनमें बारिश का पानी ठहरने से पहाड़ी घास से ढँकी-ढँकी नजर आती है। बारिश के दिनों में तो यह जगह किसी रमणीक पिकनिक स्पॉट की तरह लगती है। सुबह के सूर्योदय का मनोरम दृश्य देखने के लिये कई लोग यहाँ पहुँचते हैं। वे स्वीकारते हैं कि यह काम लोगों की कल्पना से भी परे था और मैंने खुद भी इतनी जल्दी इतने बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की थी।<br /><br /> आज से दो सालों पहले दिसम्बर 2016 में झाबुआ में पुलिस अधीक्षक के रूप में महेशचंद जैन ने पदभार ग्रहण किया तो उन्हें झाबुआ देखकर हैरानी हुई। यहाँ आने से पहले झाबुआ को लेकर उनके मन में कुछ अलग ही कल्पना थी।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="शहीद पुलिस जवानों की स्मृति में पौधरोपण" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1978/44891433004_923a7e1a6b_c.jpg" title="शहीद पुलिस जवानों की स्मृति में पौधरोपण" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>शहीद पुलिस जवानों की स्मृति में पौधरोपण</i></span></span>उन्हें लगा था कि आदिवासी बाहुल्य और प्राकृतिक रूप से इलाका समृद्ध होगा। इसमें घना जंगल होगा, जंगली जानवर और पंछी होंगे मनोरम दृश्य होंगे। बारिश के दिनों में इसका अपना देखने लायक प्राकृतिक सौन्दर्य होगा। लेकिन जब यहाँ पहुँचे तो देखा कि झाबुआ के आसपास तो कई बंजर पहाड़ियाँ थीं। यह इलाका किसी लैंडस्केप की तरह खूबसूरत तो था लेकिन जंगल का कई मीलों तक अता-पता नहीं था। पुलिस कप्तान जैन ने उसी दिन ठान लिया कि वह अपनी कल्पना को साकार करेंगे।<br /><br /> पुलिसिंग के साथ उन्होंने कम्यूनिटी पुलिसिंग भी शुरू कर दी और बतौर पर्यावरण के असली पहरेदार के रूप में शुरू कर दिया काम। यह काम आसान नहीं था और पुलिस अफसर के रूप में यह काम करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था लेकिन जिद और जुनून के आगे कोई काम असम्भव नहीं रह जाता। इसी बात को आखिरकार उन्होंने महज डेढ़ साल में ही चरितार्थ कर दिखाया।<br /><br /> हर दिन कप्तान साहब यहाँ सुबह-शाम एक घंटा बीताते हैं और खुद पेड़-पौधों के लिये नवजात बच्चों की तरह देखभाल भी करते हैं।<br /><br /> हाथीपावा की पहाड़ी पर आज 12 हजार पौधे हैं, पंछियों का बड़ा बसेरा है, प्रवासी पक्षियों का कलरव है, किसी नामी हिल स्टेशन की तरह का अहसास है, सूर्यास्त और सूर्योदय का खूबसूरत नजारा है, योग और ध्यान का बेहतरीन स्थान है, फलदार वृक्षों की सरसराहट है, बच्चों के लिये झूले और फिसलपट्टियाँ है, वाकिंग ट्रेक है, हिल टॉप से समंदर की तरह दूर तक दिखने वाला दृश्य है, किसी लैंडस्केप की तरह आदिवासियों के खेत और झोपड़ों का दिलकश नजारा है, सच कहें तो ये दिलखुश करने वाली संजीवनी बूटी का खजाना है अब हाथीपावा की पहाड़ियों में।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="श्रमदान करते महेशचन्द्र जैन" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1945/44891429954_30f1480485_c.jpg" title="श्रमदान करते महेशचन्द्र जैन" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>श्रमदान करते महेशचन्द्र जैन</i></span></span>बहुत ही कम वक्त में हुए इस बदलाव के पीछे कड़ी मेहनत, दूर दृष्टि और पक्के इरादों की एक बड़ी कहानी है जो अपनी सफलता खुद तय करती है। पुलिस अधीक्षक जैन ने देखा कि हर साल हजारों आदिवासी अपने गाँवों से एक दिन के लिये यहाँ आते हैं और पहाड़ी का शृंगार (श्रमदान) कर लौट जाते हैं।<br /><br /> हर साल यहाँ एक नियत दिन आदिवासी अपने फावड़े-कुदाली लेकर आते हैं तथा हलमा करते हुए पहाड़ी पर खंतियाँ बनाते हैं ताकि बारिश का पानी इनमें रुक सके। बीते पाँच सालों में उन्होंने पचास हजार से ज्यादा ऐसी जल संरचनाएँ बना दी हैं। दूर गाँवों में रहने वाले आदिवासी तो अपना काम बड़ी मेहनत और जज्बे से पूरा करते हैं लेकिन झाबुआ शहर में रहने वाले अधिकांश लोग इसमें कोई मदद नहीं करते हैं।<br /><br /> इसी एक विचार से उनके सपने को पूरा करने का सूत्र उन्हें पकड़ में आ गया। उन्होंने तय किया कि आने वाले बारिश के मौसम में हाथीपावा की पहाड़ी पर क्यों न पौधरोपण का बड़ा आयोजन किया जाये और शहर के लोगों को भी इससे जोड़ा जाये। पौधरोपण करना तो आसान था लेकिन उनकी जिद यह भी थी कि जब तक लगाए गए पौधों में से 80 से 90 फीसदी बड़े पेड़ नहीं बन जाते तो इसका कोई अर्थ नहीं है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="हाथीपावा का दिलकश नजारा" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1966/44891426974_16b8fa6b26_c.jpg" title="हाथीपावा का दिलकश नजारा" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>हाथीपावा का दिलकश नजारा</i></span></span>उन्होंने आसपास के पर्यावरणविदों से भी बात की और जुट गए इस असम्भव से दिखते काम को पूरा करने में। उन्होंने जिला प्रशासन, वन विभाग और शहर के लोगों को जोड़कर इसे मूर्त रूप देने के लिये कमर कस ली। अपराधों पर नियंत्रण के साथ अब हर दिन वे दो से तीन घंटे का वक्त इसके लिये भी निकालने लगे। कई बार उन्होंने पहाड़ी के अलग-अलग हिस्सों पर जाकर देखा। लोगों से बात की। पौधों को गर्मियों में जिन्दा रख पाने के लिये पानी की उपलब्धता पर गौर किया।<br /><br /><b>एक संकल्प और सैकड़ों लोगों का मिला साथ</b><br /><br /> अन्ततः 26 मार्च 2017 को उन्होंने पहली बार श्रमदान के लिये लोगों को इकट्ठा किया। लोग तो कम ही पहुँचे लेकिन इससे एसपी जैन का हौसला नहीं डिगा। उन्होंने चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी में भी पसीना बहाते हुए पौधरोपण के लिये जमीन में गड्ढे बनाने और पानी रोकने की तकनीकों पर काम करना जारी रखा। धीरे-धीरे कई लोग उनके काम में जुटते चले गए।<br /><br /> तीन महीनों तक गड्ढे बनाने तथा बारिश के पानी को पौधों के आसपास रोकने का जतन होता रहा। उन्होंने अपने स्टाफ के करीब डेढ़ सौ पुलिसकर्मियों को भी इसके लिये प्रेरित किया। वन विभाग का भी उन्हें सहयोग मिला और कई बड़े फलदार पौधे तैयार किये गए। पौधों का चयन करते समय जिन बातों पर विशेष गौर किया, उनमें खासतौर पर छाया, हवा, फल, पक्षियों के लिये बसेरा आदि का विशेष ध्यान रखा गया।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="बारिश से पहले मनुहार" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1932/44891434114_b8a71639e7_c.jpg" title="बारिश से पहले मनुहार" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>बारिश से पहले मनुहार</i></span></span>बारिश से पहले ही पाँच हजार पौधे लगाने के लिये सारी तैयारियाँ चाक-चौबन्द कर ली गई थी। बारिश की मनुहार की गई और बारिश शुरू होते ही 8-9 जुलाई को कई चरणों में यहाँ पौधे रोपने का काम शुरू हो गया। तब तक उनके साथ कई लोग जुड़ चुके थे और एक व्यक्ति का विचार कारवाँ में बदल चुका था। प्रशासन के साथ शहर की संस्थाएँ भी आगे आईं। इसी साल यहाँ साढ़े आठ हजार पौधे लगाए गए।<br /><br /> हर रविवार की सुबह दो घंटे तक करीब दो से तीन सौ लोगों ने श्रमदान किया। झाबुआ के बुजुर्ग बताते हैं कि यहाँ इससे पहले कभी इस तरह का कोई श्रमदान नहीं हुआ। कई सालों से ये पहाड़ियाँ वीरान पड़ी थीं लेकिन किसी का ध्यान कभी इन्हें हरा-भरा बनाने की ओर नहीं गया। इतने अफसर आये और चले गए लेकिन उनमें से कभी किसी ने इस पर गौर नहीं किया। इस काम का शहर के पर्यावरण पर भी बड़ा असर पड़ेगा।<br /><br /> पहली बारिश में लगाए गए पौधों की लगातार निगरानी और श्रमदान करने के साथ ही एसपी जैन ने पर्यावरण के लिये जिले के अन्य स्थानों पर भी पौधे लगाने और इन्हें पेड़ के रूप में बदलने के लिये स्थानीय लोगों को जागरूक करने का काम भी शुरू कर दिया।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पौधों को पानी देते एसपी जैन" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1934/44891438144_276c1532b1_c.jpg" title="पौधों को पानी देते एसपी जैन" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पौधों को पानी देते एसपी जैन</i></span></span>जोबट के पास बरखेड़ा में करीब एक हजार, होमगार्ड लाइन झाबुआ में आम, अमरुद, चीकू, सुरजना, नीबू, तथा कटहल के 40 पौधे, खवासा में स्थानीय लोगों के साथ मिलकर 100 से ज्यादा पौधे, राणापुर में विद्यार्थियों के साथ बड़, पीपल, आम, नीम, खिरनी, अमरुद तथा जामुन के सवा सौ पौधे लगाए गए। पुलिस अधीक्षक कार्यालय, रक्षित केन्द्र और विभिन्न थाना परिसरों में भी मोरसली, आम, बड़, पीपल जामुन और अमरुद के पाँच से सात फीट कद की ऊँचाई वाले एक हजार से ज्यादा पौधे लगाए गए।<br /><br /> नवम्बर-दिसम्बर तक तो पौधे जीवित रहे लेकिन उसके बाद धूप और गर्मी से वे मुरझाने लगे। महेशचन्द जैन के मन में यह बात पहले से थी और वे इसके लिये पूर्व तैयारी भी कर चुके थे। उन्होंने पहाड़ी पर इसके लिये सीमेंट की कुछ टंकियाँ बनवा ली थीं और टैंकरों के जरिए इन्हें भरा जाता था। कहीं आसपास के ट्यूबवेल से भी पानी आ जाता था।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पुलिस लाइन में आरओ के पानी की सुविधा" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1980/31743677838_72d6d8cc1d_c.jpg" title="पुलिस लाइन में आरओ के पानी की सुविधा" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पुलिस लाइन में आरओ के पानी की सुविधा</i></span></span>इस तरह फिर लोगों को जोड़ा गया तथा हर हफ्ते कुछ घंटों के श्रमदान में सैकड़ों लोग बाल्टियों में पानी लेकर पौधों को पानी देते रहे। इससे गर्मियों के दिनों में भी पौधे जीवित रहे और इस बार बारिश आने के बाद तो यहाँ की तस्वीर ही बदल गई है।<br /><br /> ऐसा लगता है मानों पहाड़ी पर हरियाली का चुनर ओढ़े कोई नया जंगल खड़ा हो गया है। पहाड़ी पर पौधरोपण से आगे उन्हें बड़ा करने के लिये लगातार पानी देने और उनकी देखभाल करने के लिये श्रमदान किया जाता है। खुद एसपी जैन सुबह पौधों को पानी देते हैं। दो चौकीदार भी रखे हैं, जिनका वेतन खुद एसपी अपने जेब से करते हैं।<br /><br /> केवल हाथीपावा पहाड़ी ही नहीं, जहाँ-जहाँ बीते साल पौधरोपण हुआ है, वहाँ की तस्वीर बदल गई है। पुलिस विभाग के भवनों के परिसर में पेड़ लहलहा रहे हैं। फूलों से डालियाँ झुकी जा रही हैं तो कहीं घास के मैदान नजर आते हैं। पुलिस लाइन के बगीचे में सुबह शाम चहल-पहल बढ़ गई है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पुलिस लाइन में पौधरोपण के साथ-साथ सफाई का ध्यान रखा गया" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1916/44891453394_29e97ede57_c.jpg" title="पुलिस लाइन में पौधरोपण के साथ-साथ सफाई का ध्यान रखा गया" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पुलिस लाइन में पौधरोपण के साथ-साथ सफाई का ध्यान रखा गया</i></span></span>बाल आश्रम का परिसर भी हरा-भरा हो गया है। उन्होंने पुलिस लाइन में रहने वाले परिवारों के लिये आरओ के शुद्ध पानी तथा विभिन्न थानों और पुलिस भवनों में आने वाले शिकायतकर्ताओं तथा अन्य लोगों के लिये गर्मी में ठंडे पानी की व्यवस्था भी करवाई है। वे गाँव-गाँव में खाटला (खटिया) चौपाल लगाकर बेटियों को पढ़ाने तथा पेड़ों को सहेजने के साथ पानी और पर्यावरण की बात भी करते हैं।<br /><br /><b>छोटे तालाब को सँवारा</b><br /><br /> झाबुआ शहर के बीचोंबीच छोटे तालाब के आसपास बीते कुछ सालों से गन्दगी का ढेर लगने लगा था। किनारों की बस्तियों में रहने वाले लोग अपने घरों का कचरा तथा अन्य गन्दगी तालाब के किनारे डाल दिया करते थे। इससे तालाब का पानी भी गन्दला जाता और आसपास बदबू उठती रहती लेकिन कभी किसी ने इसकी सफाई पर गौर नहीं किया। तालाब में काफी गाद भी जम चुकी थी और कुछ वक्त ध्यान नहीं दिया जाता तो तालाब ही खत्म हो जाता।<br /><br /> पुलिस अधीक्षक महेशचन्द जैन की नजर एक दिन इस पर पड़ी तो उन्होंने शहर के कुछ लोगों को इकट्ठा किया और शनिवार की सुबह दो घंटे के श्रमदान का आह्वान किया। कई लोग जुटे और दो घंटे में ही तालाब के आसपास का काफी हिस्सा सँवर गया। करीब सौ लोगों के साथ उन्होंने भी तालाब की गीली मिट्टी और कीचड़ से भरी तगारियाँ बिना किसी हिचक के उठाकर बाहर की।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पौधरोपण की तैयारी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1971/44891448034_bf14d7ab09_c.jpg" title="पौधरोपण की तैयारी" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पौधरोपण की तैयारी</i></span></span>इस दौरान उनके कपड़ों पर कीचड़ भी लग गया लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। तालाब की सफाई के बाद वे लोगों के साथ ही तालाब के आसपास रहने वाले लोगों के घरों पर पहुँचे और उन्हें हाथ जोड़कर समझाया कि तालाब में गन्दगी न करें। उन्होंने कहा कि तालाब में साफ पानी रहेगा तो सभी के उपयोग में आ सकेगा। गन्दगी करोगे तो बदबू आएगी और बीमारियाँ होंगी। लोगों पर उनकी बात का बड़ा असर हुआ और फिलहाल तो उन्होंने गन्दगी न करने की शपथ ली है।<br /><br /><b>स्मृतियों के पौधे भी बनेंगे घने पेड़</b><br /><br /> कुछ महीनों पहले इस अभियान को लोगों से जोड़ने के लिये जन्मदिन, पुण्यतिथि तथा शादी की मैरिज एनिवर्सरी पर भी यहाँ पौधे लगाने की मुहिम शुरू की गई है। खुद एसपी जैन ने पाँच मई को अपने 52वें जन्मदिन पर दस फीट ऊँचे 52 पौधों को रोपित किया। उनकी शादी की 23वीं एनिवर्सरी पर भी 23 पौधे पीपल, नीम और मोलसरी के पौधे रोपे गए।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पहाड़ी पर टंकियों में पानी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1913/44702324065_df5b0755f1_c.jpg" title="पहाड़ी पर टंकियों में पानी" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पहाड़ी पर टंकियों में पानी</i></span></span>उनके पुत्र निहित जैन के 21वें जन्मदिन पर छह जनवरी को 7 नीम, 7 पीपल तथा 7 मोलसरी के पौधे लगाए गए। इसके अलावा कई लोगों ने यहाँ आपने पूर्वजों की स्मृति में भी पौधरोपण किया है तथा खुद उसकी देखभाल करते हैं।<br /><br /> जैन बताते हैं कि <b>1999 में जब उनका बेटा निहित पाँच साल का था और उसे स्कूल में भर्ती किया गया तो नीमच के कार्मल कान्वेंट स्कूल के सामने दोपहर के वक्त उसे लाने के लिये खड़ा होना पड़ता था। उन दिनों वहाँ कोई पेड़ नहीं थे और बच्चों को लेने आने वाले पालकों को कड़ी धूप में खड़ा रहना पड़ता था। उन्होंने अपने बेटे के पाँचवे जन्मदिन पर स्कूल के बाहर नीम के पाँच पौधे लगवाए। कुछ ही दिनों में ये पौधे पेड़ बन गए और अब लोगों को घनी छाया देते हैं।</b><br /><br /> इस बार मकर संक्रान्ति पर हाथीपावा की पहाड़ी पर बड़ी संख्या में शहर के लोगों को बुलाकर पतंग उत्सव मनाया गया। परिवार सहित पहुँचे लोगों ने पतंगबाजी के साथ गिटार और अन्य वाद्ययंत्रों को बजाकर या गीत गाते हुए त्योहार मनाया। पहली बार हुए इस आयोजन को लोगों ने खूब सराहा। विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को भी यहाँ श्रमदान कर पौधों को पानी दिया गया।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पुलिस थानों और भवनों में गर्मी में ठंडे पानी की व्यवस्था" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1969/43798426350_ec0de39236_c.jpg" title="पुलिस थानों और भवनों में गर्मी में ठंडे पानी की व्यवस्था" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पुलिस थानों और भवनों में गर्मी में ठंडे पानी की व्यवस्था</i></span></span>झाबुआ जिले के ही अमर शहीद स्वतंत्रता सेनानी चन्द्रशेखर आजाद की 112वीं जयन्ती पर हाथीपावा पहाड़ी पर 112 पौधे बड़, पीपल और नीम रोपित किये गए। इसकी तारीफ प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी की। उन्होंने अपने सन्देश में कहा कि पौधरोपण से ही सृष्टि की रक्षा की जा सकती है, झाबुआ पुलिस ने यह बेहतरीन मिसाल पेश की है। इसी तरह पुलिस शहीद दिवस पर शहीद जवानों की स्मृति में एक हजार नीम, सौ जामुन, सौ चेरी, सौ बादाम, सौ अमरुद तथा सौ मोलसरी कुल डेढ़ हजार पौधे लगाए गए हैं।<br /><br /> उन्होंने देश-विदेश के लोगों को भी इस अभियान में शामिल करते हुए आग्रह किया है कि कोई भी अपने परिजनों के जन्मदिन या पुण्यतिथि को यादगार रूप देने हाथीपावा पहाड़ी पर पौधरोपण हेतु झाबुआ पुलिस के मोबाइल 70491 40506 पर सम्पर्क कर सकता है। विभाग उन्हें निशुल्क पौधे उपलब्ध कराएगा।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="हाथीपावा पर सूर्यास्त दर्शन पॉइंट" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1909/43798520660_b1f217834b_c.jpg" title="हाथीपावा पर सूर्यास्त दर्शन पॉइंट" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>हाथीपावा पर सूर्यास्त दर्शन पॉइंट</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="तालाब की सफाई करते एसपी जैन" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1970/44702328245_515e9a3cd8_c.jpg" title="तालाब की सफाई करते एसपी जैन" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>तालाब की सफाई करते एसपी जैन</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="गन्दगी से पटा झाबुआ का तालाब" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1961/44891470584_d37a08e273_c.jpg" title="गन्दगी से पटा झाबुआ का तालाब" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>गन्दगी से पटा झाबुआ का तालाब</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="चन्द्रशेखर आजाद की स्मृति में पौधरोपण" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1947/45565437372_d808477f67_c.jpg" title="चन्द्रशेखर आजाद की स्मृति में पौधरोपण" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>चन्द्रशेखर आजाद की स्मृति में पौधरोपण</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="खाटला चौपाल" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1937/45565440822_8655934c46_c.jpg" title="खाटला चौपाल" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>खाटला चौपाल</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="हाथीपावा पर गर्मियों में पानी देने का श्रमदान" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1959/45565445092_f8e0496321_c.jpg" title="हाथीपावा पर गर्मियों में पानी देने का श्रमदान" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>हाथीपावा पर गर्मियों में पानी देने का श्रमदान</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="हाथीपावा पहाड़ी पर पौधरोपण" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1957/31743708268_41db257480_c.jpg" title="हाथीपावा पहाड़ी पर पौधरोपण" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>हाथीपावा पहाड़ी पर पौधरोपण</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="हाथीपावा में पौधरोपण का विहंगम दृश्य" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1931/31743713908_baa06a272d_c.jpg" title="हाथीपावा में पौधरोपण का विहंगम दृश्य" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>हाथीपावा में पौधरोपण का विहंगम दृश्य</i></span></span><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="नीमच के स्कूल में छाया देते पेड़" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1972/44891489104_5b883b690c_c.jpg" title="नीमच के स्कूल में छाया देते पेड़" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>नीमच के स्कूल में छाया देते पेड़</i></span></span></p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">ips officer, ssp of jhabua mahesh chandra jain, madhya pradesh, protectionist of environment, afforestation, plantation of fruit bearing trees, tourists plant trees in memory of special days, rejuvenation of ponds, hathipava hill, favourite picnic spot, sunset, sunrise, community policing.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333438&amp;2=comment&amp;3=comment" token="ONSQHBXEe3JCiWrG1C2ASimwOxifXbxDQ1pLzYMP1XI"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/nature-lover-with-difference" data-a2a-title="अनूठा पर्यावरण प्रेमी"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fnature-lover-with-difference&amp;title=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%A0%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%A3%20%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A5%80"></a></span> Mon, 29 Oct 2018 14:41:48 +0000 editorial 1319333438 at http://hindi.indiawaterportal.org पुनर्जीवित हुआ ढाई सौ साल पुराना तालाब http://hindi.indiawaterportal.org/water-crisis-forced-to-rebulid-years-old-pond <span>पुनर्जीवित हुआ ढाई सौ साल पुराना तालाब</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Fri, 10/12/2018 - 14:31</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><span class="inline inline-left"><img alt="मीठा तालाब" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1972/45264143071_8f2dd05ed5_c.jpg" title="मीठा तालाब" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>मीठा तालाब</i></span></span>"जिस दौर में ये तालाब बने थे, उस दौर में आबादी और भी कम थी। यानी तब जोर इस बात पर था कि अपने हिस्से में बरसने वाली हरेक बूँद इकट्ठी कर ली जाये और संकट के समय में आसपास के क्षेत्रों में भी उसे बाँट लिया जाये। वरुण देवता का प्रसाद गाँव अपनी अंजुली में भर लेता था।<br /><br /> और जहाँ प्रसाद कम मिलता है? वहाँ तो उसका एक कण, एक बूँद भी भला कैसे बगरने (व्यर्थ बहना) दी जा सकती थी...इसी बात को समाज ने गुनते हुए कई तालाब बनाए। तालाब नहीं तो गाँव कहाँ? जहाँ आबादी में गुणा हुआ और शहर बना, वहाँ भी पानी न तो उधार लिया गया, न आज के शहरों की तरह कहीं और से चुराकर लाया गया। शहरों ने भी गाँव की तरह ही अपना इन्तजाम खुद किया।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="स्वेच्छा से श्रमदान करने पहुँचे लोग" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1921/30325125787_41cb156ce8_c.jpg" title="स्वेच्छा से श्रमदान करने पहुँचे लोग" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>स्वेच्छा से श्रमदान करने पहुँचे लोग</i></span></span>देश के जाने-माने पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने अपनी किताब <b>'<a href="https://hindi.indiawaterportal.org/Aaj-Bhi-Khare-Hain-Talab-Hindi" target="_blank">आज भी खरे हैं तालाब</a>'</b> में आज से बीस साल पहले पानी की चिन्ता करते हुए यह बात कही थी। लेकिन हमने शहरों में सैकड़ों साल पुराने तालाबों पर गौर नहीं किया बल्कि नई तकनीक से पाइपलाइन से पानी पहुँचाने के नाम पर सदानीरा नदियों को ही सूखने की कगार पर ला खड़ा कर दिया। ऐसा ही वाकया मध्य प्रदेश के देवास का है, जहाँ के समाज ने ढाई सौ साल पुराने तालाबों से नाता तोड़कर नर्मदा, क्षिप्रा, लखुन्दर और गम्भीर नदियों से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश की लेकिन अन्ततः तालाब की शरण में ही लौटना पड़ा।<br /><br /> बीते सालों में समाज ने अपनी गलती स्वीकार की। इस बीच कुछ तालाब खत्म हो चुके थे। फिर भी जो बचे थे, समाज ने उनकी चिन्ता शुरू कर दी। गर्मियों के दिनों में पसीना बहाने वाला समाज बरसात में यहाँ नीले पानी की लहरों को देखकर मुग्ध हो जाता है।<br /><br /> इस बार भी गर्मियों में पूर्व रियासतदारों के परिवार से लेकर अफसरों, नेताओं और आम जनता तक ने शहर के ढाई सौ साल पुराने रियासतकालीन तालाब को पानीदार बनाने के लिये श्रमदान किया और कम बारिश के बावजूद अब इसमें नीला पानी ठाठे मार रहा है। यह कहानी हमें सन्देश देती है कि तालाबों की सुध लेने वाला समाज कभी भी पानी के लिये घाटे में नहीं रहेगा।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="तालाब से मिट्टी निकालते श्रमदानी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1931/30325128807_8ac5a89532_c.jpg" title="तालाब से मिट्टी निकालते श्रमदानी" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>तालाब से मिट्टी निकालते श्रमदानी</i></span></span>पानी की किल्लत और देवास का बहुत पुराना नाता रहा है। साठ-सत्तर के दशक तक यहाँ की जलवायु सुखद और सेहतमन्द हुआ करती थी तब यहाँ शुद्ध आबोहवा तथा पर्याप्त पानी हुआ करता था। बीते पाँच सालों से यहाँ पर्याप्त बारिश नहीं हुई है।<br /><br /> करीब 40 साल से यहाँ के लोग पानी की परेशानी का सामना करते रहे हैं। देवास शहर की प्यास बुझाने के लिये कभी ट्रेन से पानी लाना पड़ा तो कभी कई किलोमीटर दूर नदियों से पानी लाना पड़ा। बावजूद इसके अब तक कभी शहर को यथोचित पानी नहीं मिला।<br /><br /> प्रदेश के मालवा इलाके में पचास साल पहले तक कभी पानी का संकट नहीं हुआ करता था, लेकिन आज हालात दूसरे हैं। गाँव से लेकर शहरों तक में पानी की हाहाकार मची है। देवास जैसा शहर जिसकी अपनी जलस्रोतों की रियासतकालीन समृद्ध परम्परा रही हो, वहाँ पानी की जबरदस्त किल्लत साफ बताती है कि इधर के सालों में हमने अक्षम्य गलतियाँ की हैं।<br /><br /> 17वीं शताब्दी में मराठा काल में शिवाजी महाराज के अग्रिम सेनापति साबूसिंह पवार ने इसे बसाया था।<br /><br /> माता टेकरी के आसपास बसा यह शहर बाद में दो रियासतों में बँट गया। एक सड़क दोनों रियासतों को जोड़ती थी। बड़े भाई की रियासत सीनियर और छोटे की जूनियर। दोनों रियासतों में टेकरी से आने वाले बारिश के पानी को रोकने के लिये तालाब तथा अन्य जल संरचनाएँ बनी हुई थीं। छोटे से शहर में पाँच बड़े तालाब, बावड़ियाँ और कुएँ-कुण्डियाँ भरे रहते थे। मीठा तालाब आज भी मौजूद है।<br /><br /> देवास नगर बसाने वाले साबूसिंह पवार ने माता टेकरी से बारिश में बहकर आने वाले पानी को सहेजने के लिये सन 1750 के आसपास इस तालाब का निर्माण कराया था। इसका उल्लेख यहाँ के रियासती दस्तावेजों में मिलता है। कुछ दिनों पहले एक और तालाब के बचे हुए छोटे से हिस्से मेंढकी तालाब का जीर्णोंद्धार भी बीस साल पहले कर इसे सहेज लिया गया है। बाकी हिस्से पर बड़ी-बड़ी इमारतें बन चुकी हैं।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="दो साल पहले इस तरह होती थी जलकुम्भी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1936/30325129857_3da6352131_c.jpg" title="दो साल पहले इस तरह होती थी जलकुम्भी" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>दो साल पहले इस तरह होती थी जलकुम्भी</i></span></span>बुजुर्ग बताते हैं कि सन 1942 में जूनियर रियासत के तत्कालीन राजा सदाशिव राव पवार ने जन-सहयोग से प्राकृतिक रूप से बने इस तालाब का जीर्णोंद्धार करवाकर इसे एक नया आकार दिया था, खुद राजा ने भी श्रमदान किया था। जीर्णोंद्धार के बाद 'मुक्ता सरोवर' के नाम से इसे पहचाना जाने लगा।<br /><br /> देवास रियासत की नई बसाहट में उस समय तालाब, कुएँ, बावड़ियों के निर्माण कराए गए। रियासतों के बँटवारे के बाद दो प्रमुख कुओं से दोनों रियासतों में जल आपूर्ति की व्यवस्था की गई। 18वीं सदी के अन्त तक देवास सीनियर बड़ी पाँती में 30 तालाब, 636 कुएँ और बावड़ी और 60 ओढ़ियाँ थीं। जिनमें 3300 एकड़ जमीन सिंचित की जाती थी, देवास जूनियर में 49 तालाब, 236 कुएँ और 22 बावड़ी एवं 156 ओढ़ी द्वारा 850 एकड़ जमीन को सिंचित किया जाता था।<br /><br /> पचास साल पहले सत्तर के दशक में औद्योगिक शहर हो जाने से इसकी आबादी तेजी से बढ़ी और जलस्रोतों का अपमान होने लगा। पाइपलाइन से घर-घर नलों में पानी आने लगा तो किसी ने जलस्रोतों की परवाह नहीं की। तीन बड़े तालाब पाटकर उन पर बाजार बना दिया गया। बचा रह गया सीनियर रियासत का मीठा तालाब।<br /><br /> संयोग से शहर के इस कोने पर तथाकथित विकास कम हुआ और यह बचा रहा। हालांकि लगातार गाद जम जाने, बरसाती पाने लाने वाली नलियों के रुक जाने, सफाई नहीं होने, प्रतिमाओं और पूजन सामग्री के विसर्जन और जल कुम्भी आदि के कारण यह तालाब भी जल्दी ही सूखने लगा।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="तालाब का गहरीकरण" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1902/43449709800_0bc93d5ab7_c.jpg" title="तालाब का गहरीकरण" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>तालाब का गहरीकरण</i></span></span>देवास के लोगों को जब अपनी गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने बचे हुए जलस्रोतों को सहेजने का मन बनाया। खासकर मीठा तालाब को। खुशी की बात थी कि यह तालाब आज भी उसी रूप में मौजूद है। प्रशासन और आम लोगों ने मिलकर श्रमदान किया। कई संस्थाएँ इस काम में आगे आईं और स्वेच्छा से तालाब को सँवारने में जुट गईं।<br /><br /> श्रमदान में करीब तीन सौ से ज्यादा हाइवा (बड़ा डम्पर) गाद निकाली गई, तीन सौ ट्रॉली कचरा हटाया गया और एक हजार से ज्यादा लोगों ने चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी में पानी के लिये अपना पसीना बहाया। बीते सालों से यहाँ प्रतिमाओं के विसर्जन पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया है। प्रशासन सख्ती से इसका पालन करवाता है। इससे पहले तक यहाँ हर साल गणेश और दुर्गा की दस हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी प्रतिमाएँ विसर्जित की जाती रही हैं।<br /><br /> यह तालाब काफी बड़ा है और शहर के नजदीक होने से अब इसे पर्यटन केन्द्र के रूप में भी विकसित किया है। इस तालाब का पानी मीठा होने की वजह से इसका नाम मीठा तालाब पड़ गया और आज भी इसे इसी नाम से पहचाना जाता है। इसका पानी गर्मियों की शुरुआत तक भरा रहता है। इसके पानी में माता टेकरी का अक्स देखना बहुत अच्छा लगता है।<br /><br /> यह शहर की करीब 25 से ज्यादा मुहल्लों के जलस्तर को बढ़ाने में सहायक होने के साथ लोगों के लिये शाम की प्राकृतिक सैर का बहाना भी है। तालाब के बीचों-बीच दो टापूनुमा आईलैंड भी बनाये गए हैं। यहाँ से लोग शाम के समय अप्रतिम सौन्दर्य को निहारते हैं। एक किनारे पर वाटिका भी विकसित की गई है। सुन्दर पक्के घाट भी बने हैं। तालाब अब पक्षियों का नया बसेरा बन गया है।<br /><br /> सुबह और शाम के समय पक्षियों का कलरव सुनाई देता है। अब तो यहाँ प्रवासी पक्षी भी आने लगे हैं। माता टेकरी से भी इसका नजारा अलग ही दिखता है। टेकरी से देखने पर ऐसा लगता है कि किसी बड़ी परात में दूध भर कर रखा हो। रात के समय टेकरी से चाँदनी रातों में इसकी छटा देखते ही बनती है।<br /><br /> मीठा तालाब के साथ एक और बड़ा नाम जुड़ा है अंग्रेजी साहित्य के नामचीन लेखक ईएम फास्टर का। उन्होंने इसके किनारे सागर महल में रहते हुए महत्त्वपूर्ण उपन्यास लिखे, जिनमें तब के भारतीय जन-जीवन की छाप मिलती है। बाद के दिनों में ये उपन्यास विश्व साहित्य में खासे चर्चित भी हुए।<br /><br /> ए पैसेज टू इण्डिया (a passage to india) तो नोबल पुरस्कार के लिये भी नामांकित हुआ। द हिल ऑफ देवी (the hill of devi) में उन्होंने देवास का विस्तार से जिक्र किया है। उन्हीं के लिखे हुए से देवास की प्राकृतिक सुन्दरता को सुदूर विदेशों तक पहचान मिली। जब तक फास्टर देवास में रहे, वे हमेशा इसी तालाब के किनारे सागर महल में रहे।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पक्षियों का बसेरा" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1952/30325127137_b83a31f4e1_c.jpg" title="पक्षियों का बसेरा" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पक्षियों का बसेरा</i></span></span>इसी महल की बुर्ज से उन दिनों प्रकृति का ऐसा नजारा दिखता था कि फास्टर इसके मुरीद बन गए। सामने अपार जलराशि समेटे मीठा तालाब और उस पर नेपथ्य में हरी-भरी माता टेकरी का अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य। एडवन मार्गन फास्टर की रचनाएँ तब के भारत की प्रवेश द्वार मानी जाती है यानी दुनिया के लोगों ने भारत के प्राकृतिक वैभव उसकी विविधता, सुन्दरता, जनजीवन और उनकी जिजीविषा को इन्हीं की किताबों के जरिए जाना-समझा।<br /><br /> उन दिनों देवास आज की तरह फैला हुआ शहर नहीं हुआ करता था, बल्कि टेकरी और उसके आसपास बसा छोटा-सा कस्बा हुआ करता था। यह इलाका सीनियर रियासत में आता था। तब यह बहुत सुन्दर हुआ करता था। सघन पेड़ पौधों से आच्छादित साफ-सुथरा तालाब और माता टेकरी की वजह से यह कस्बा हिल स्टेशन की तरह लगता था।<br /><br /> ख्यात शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व को टीबी की बीमारी हो जाने से उनका एक फेफड़ा खराब हो गया था तब उन्हें ताजी प्राकृतिक हवा के लिये सुदूर कर्नाटक से देवास भेजा गया था। यानी तब देवास का नाम देश में प्राकृतिक सेनेटोरियम के रूप में जाना जाता था। स्वस्थ होने के बाद कुमारजी को देवास इतना पसन्द आया कि वे यहीं के होकर रह गए।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="सागर महल" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1974/30325118787_aebfa7c2b2_c.jpg" title="सागर महल" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>सागर महल</i></span></span>फास्टर को 23 दिसम्बर 1912 के दिन इन्दौर क्लब में मेजर लुआर्ड ने देवास के तत्कालीन राजा तुकोजीराव पवार तृतीय से मिलवाया था। क्रिसमस यानी 25 दिसम्बर की दोपहर वे इन्दौर महाराजा की मोटर से 23 मील का सफर तय करके पहली बार देवास पहुँचे थे। राजकीय अतिथि के रूप में तब उन्हें गेस्ट हाउस यानी सागर महल में ठहराया गया।<br /><br /> फास्टर इसके प्राकृतिक वैभव के इस तरह दीवाने हुए कि उनका लेखक मन यहीं रमने लगा। पहली बार वे केवल 10 दिन यहाँ रुके पर बाद में 1921 में वे यहाँ 6 माह से ज्यादा समय तक रहे। इन्हीं दिनों उन्होंने 'द हिल ऑफ देवी' लिखा, जिसमें तब के देवास की झलकियाँ नजर आती है। यहीं रहकर उन्होंने ए पैसेज टू इण्डिया लिखा, जो भारत की आजादी के बाद 1953 में प्रकाशित हुआ और खासा चर्चित भी हुआ। उन दिनों साहित्य के नोबल के लिये भी इसका नाम चला था हालांकि बाद में इसे नोबल नहीं मिल सका।<br /><br /> यहाँ रहते हुए ही उन्होंने मारिस उपन्यास भी लिखा, जिस पर कई आरोपों के चलते उनके जीवन पर्यन्त प्रतिबन्ध लगा रहा। बताते हैं कि चाँदनी रातों में फास्टर सागर महल की बुर्ज से तालाब की लहरों को देर तक निहारते रहते या वे मार्निंग वाक के बाद अक्सर पाल पर खड़े होकर तालाब से बतियाते रहते।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="मीठा तालाब का वर्तमान स्वरूप" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1954/44352335035_b18eb971f4_c.jpg" title="मीठा तालाब का वर्तमान स्वरूप" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>मीठा तालाब का वर्तमान स्वरूप</i></span></span>देवास का समाज अब जागरूक हो गया है। उन्हें लगा कि बरसाती पानी को थामने में ही समझदारी है। यह प्रायश्चित था अपनी उन गलतियों के लिये, जिनमें उन्होंने धरती की छाती से पानी उलीचकर उसे सूखा देने की कगार तक पहुँचा दिया था या परम्परागत जलस्रोतों को भूला दिया था। वे अच्छी तरह समझ चुके थे कि तालाबों और जल संरचनाओं को सहेज कर ही हम पानी के संकट को दूर कर सकते हैं।<br /><br /> देवास को बसाने के साथ ही तब के चेतनाशील समाज ने बरसाती पानी को यहीं रोक लेने के लिये पाँच बड़े तालाबों की एक भरी-पूरी शृंखला तैयार की थी। टेकरी से बरसाती पानी की निकासी के लिये जगह-जगह जल संरचनाएँ तथा पानी को रोकने के लिए प्राकृतिक तंत्र विकसित किया गया था।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="मीठा तालाब का विहंगम दृश्य" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1975/30325119797_8d08ffa97f_c.jpg" title="मीठा तालाब का विहंगम दृश्य" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>मीठा तालाब का विहंगम दृश्य</i></span></span>देवास के लोगों का कहना है कि यही काम हमारे पूर्वज सैकड़ों सालों से करते आये हैं, इसीलिये तो वह समाज पानीदार बना रहा लेकिन हमने इसे भूला दिया था और यह मान लिया था कि पानी की सम्पदा पर हमारा एकाधिकार है। हमने इसका मनमाना दोहन प्रारम्भ कर दिया। हम अपना कर्तव्य ही भूल गए थे। यह तालाब पानी के प्रबन्धन के लिहाज से देवास के लिये बहुत जरूरी है। मीठा तालाब देवास शहर की एक बड़ी धरोहर है। यहाँ के समाज को इसकी निरन्तर चिन्ता करते रहना होगा।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">water crisis, water conservation, noted environmentalist anupam mishra, madhya pradesh, devas district, narmada river, shipra river, lakhundar river, gambheer river, shivaji maharaj, saabusingh pawar, mukta sarovar, e m forster, a passage to india, nominated for nobel, the hill of devi, solution for water scarcity in rajasthan, causes of water crisis in rajasthan, essay on water scarcity in rajasthan, water scarcity problem in rajasthan, water related problems in rajasthan, drinking water problem in rajasthan, water scarcity in rajasthan wikipedia, who is responsible for water scarcity in rajasthan, naturals tambaram sanitorium, naturals tambaram sanatorium contact number, naturals tambaram west, naturals tambaram east, naturals chennai, tamil nadu, 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data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/water-crisis-forced-to-rebulid-years-old-pond" data-a2a-title="पुनर्जीवित हुआ ढाई सौ साल पुराना तालाब"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fwater-crisis-forced-to-rebulid-years-old-pond&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%86%20%E0%A4%A2%E0%A4%BE%E0%A4%88%20%E0%A4%B8%E0%A5%8C%20%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2%20%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AC"></a></span> Fri, 12 Oct 2018 09:01:13 +0000 editorial 1319333383 at http://hindi.indiawaterportal.org पानी की महत्ता का स्मारक बाला तालाब http://hindi.indiawaterportal.org/water-conservation-and-bala-talab-of-dewas <span>पानी की महत्ता का स्मारक बाला तालाब</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Sat, 09/22/2018 - 18:38</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><span class="inline inline-left"><img alt="बाला तालाब" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1934/44841856231_eda07aee69_b.jpg" title="बाला तालाब" width="710" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>बाला तालाब</i></span></span>एक समाज ने अपना तालाब सहेजकर पानी के संकट की आशंका को हमेशा-हमेशा के लिये खत्म कर दिया। इस एक तालाब से आसपास के करीब 25 गाँवों में भूजलस्तर काफी अच्छा है। आज जबकि यह पूरा इलाका पानी के संकट से रूबरू हो रहा है तो ऐसे में यह तालाब और यहाँ का समाज एक मिसाल है, पानी को रोककर जमीनी पानी के स्तर को ऊँचा उठाने में। आसपास पहाड़ियों से घिरे होने की वजह से थोड़ी-सी भी बारिश में यह लबालब भर जाता है और अमूमन यहाँ बरसात से गर्मियों तक पानी भरा रहता है।<br /><br /> मध्य प्रदेश के मालवा में स्थित देवास जिला बीते पाँच वर्षों से बारिश की लगातार अनियमितता की वजह से पानी के संकट वाले जिले में तब्दील होता जा रहा है। यहाँ लगातार औसत से कम बारिश होने से जिले के कई इलाकों में पानी का भयावह संकट है।<br /><br /> कई गाँवों में तो सर्दियों के मौसम से ही परिवहन के जरिए पानी पहुँचाना पड़ता है। जिले के एक बड़े हिस्से से नर्मदा और कालीसिंध नदी बहती है लेकिन कई जगह तो इन नदियों के किनारे बीस-पच्चीस किमी के दायरे में आने वाले गाँव ही पीने के पानी तक को तरसते हैं। जिले में डेढ़ दर्जन से ज्यादा छोटी बड़ी नदियाँ बहती रही हैं। लेकिन इनमें ज्यादातर अब सिर्फ बारिश में ही बहती हैं।<br /><br /> जिले में जलस्तर 400 से 600 फीट नीचे तक पहुँचने लगा है। लेकिन जिले के छोर पर बसे बालोन और इसके आसपास के करीब 25 गाँवों में पानी का ऐसा कोई संकट नहीं है। यहाँ का जलस्तर अब भी 250 से 300 फीट के आसपास सामान्य बना हुआ है।<br /><br /> ग्रामीणों के मुताबिक इसका सबसे बड़ा कारण बालोन का वह तालाब है, जिसे यहाँ के ग्रामीणों ने बड़े जतन से सहेजा है। इस तालाब के पानी का काम सिर्फ-और-सिर्फ जमीन के पानी के भण्डार को बढ़ाना भर ही है। इसके पानी का खेती या अन्य किसी काम में कभी कोई ग्रामीण इस्तेमाल नहीं करता है। इस तालाब से आसपास के करीब ढाई-तीन सौ ट्यूबवेल, सौ से ज्यादा कुएँ और अन्य जलस्रोत रिचार्ज होते रहते हैं। पहली बारिश से ही इसमें पानी भरने लगता है और कुछ ही दिनों में यह लबालब हो जाता है। लबालब होने पर इस तालाब की छटा बहुत ही सुन्दर नजर आती है।<br /><br /> यह तालाब बताता है कि हमारी संस्कृति में जलस्रोत के रूप में तालाबों का कितना अधिक महत्त्व रहा है। कई सौ साल पहले के समाज ने इसे अपने खून-पसीने से तैयार करवाया और आज का समाज भी इसे उसी तरह सहेजते हुए इसे अपनी अगली पीढ़ी के लिये विरासत में सौंपने के लिये संकल्पित है। यह तालाब अपनी कसौटी पर आज भी खरा है।<br /><br /> गाँव और आसपास के लोग इस तालाब को खूब मान देते हैं तथा इसके पानी को दैवीय पानी मानते हैं। यही वजह है कि वे इस पानी का अपने खेतों में सिंचाई के लिये कभी उपयोग नहीं करते। समाज के लोग ही इसकी निगरानी करते हैं और तालाब के पानी को गन्दा या प्रदूषित होने से भी बचाते हैं। गाद इकट्ठी होने पर कुछ सालों के अन्तराल से श्रमदान कर इसे गहरा किया जाता है।<br /><br /> तालाब की वजह से ही इसके आसपास दूर-दूर तक हरियाली देखने को मिलती है। खेतों में फसलें लहलहाती नजर आती हैं और किसान बनिस्बत रूप से खुश हैं। यहाँ के ट्यूबवेल गर्मियों का एकाध महीना छोड़कर बाकी दिनों में लगातार चलते रहते हैं।<br /><br /> कुओं में भी पानी बना रहता है। सैकड़ों साल पहले के अभियांत्रिकी ज्ञान को देखकर आज भी चमत्कृत हुआ जा सकता है कि उस संसाधनविहीन समाज का जज्बा और जुनून क्या रहा होगा कि उसने अपने खून-पसीने से इतने बड़े तालाब का निर्माण किया, जो आज सैकड़ों साल बाद भी यहाँ के समाज को 'पानीदार' बनाए हुए है। इसका इतिहास भी बड़ा रोचक है और इसकी गाथाएँ घर-घर अब भी सुनी-गाई जाती हैं।<br /><br /> बढ़ रहे जल संकट के दौर में आज समाज को एकजुट होकर अपने परम्परागत जलस्रोतों को बचाने की सबसे बड़ी जरूरत है। लेकिन यह तालाब सैकड़ों सालों से पानी के महत्त्व का स्मारक बना हुआ है और स्थानीय समाज को पानी की महत्ता का पाठ पढ़ाता रहा है। यह तालाब समाज की एकजुटता से जलस्रोतों को पानीदार बनाने की आदिम कोशिशों की कहानी सुनाता है। यहाँ हर दिन कई लोग आते हैं और यहाँ से पानी बचाने का संकल्प लेकर जाते हैं।<br /><br /> पानी की कीमत हर दौर में पहचानी जाती रही है। भयंकर अकाल के वक्त पानी की बूँद-बूँद के लिये लोगों को तड़पने की कई कहानियाँ सुनी जाती रही हैं। लेकिन आज हम सैकड़ों साल पहले की एक ऐसी अनूठी गाथा की खोज में निकले हैं। जहाँ एक तालाब को पानी से लबालब करने की जुगत में एक नवब्याहता ने अपनी जिन्दगी तक को दाँव पर लगाकर भी पानी को सहेजा। यह पानी की महत्ता पहचाने जाने की अनूठी लोक गाथा है और मालवा के लोक अंचल में घर-घर गाई जाती है।<br /><br /> बड़ी बात यह है कि सैकड़ों साल बाद अब भी यहाँ के लोग इसके पानी को कभी सिंचाई या अन्य निजी कामों में उपयोग नहीं करते हैं। ऐसी धारणा है कि यदि कोई इसके पानी से अपने खेत में सिंचाई करता है तो फसल नष्ट हो जाती है। यहाँ तक कि इस इलाके में मिले मवेशियों के गोबर को भी खेत में प्रयुक्त करने पर फसलें खराब हो जाने की बात कही जाती है। इसका उपयोग सिर्फ कंडे बनाने में ही होता है। आज भी बारिश के दिनों में यह लबालब भरता है। आसपास पहाड़ियों से घिरे होने से इसकी भौगोलिक स्थिति बड़ी ही सुरम्य लगती है।<br /><br /> यह लगभग 80 बीघा के रकबे में हुआ करता था, जो अब सिमटकर 40 बीघा में ही रह गया है। पूरे पहाड़ी क्षेत्र का बारिश का पानी इसी तालाब में आता है। कभी यहाँ तराशे हुए पत्थरों की 101 सुन्दर सीढ़ियाँ हुआ करती थीं। इसकी टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब भी तालाब के आसपास बिखरी पड़ी हैं।<br /><br /> मध्य प्रदेश में देवास से 80 किमी दूर उत्तरी-पूर्वी छोर पर तथा विन्ध्याचल के उत्तर में मालवा के पठार पर बालोन गाँव की पहाड़ी पर यह तालाब है। पाल पर ही तालाब के लिये अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देने वाली बालामाता का सुन्दर मन्दिर बना हुआ है तथा लोग यहाँ पानी, दूध और पूत के लिये मनोकामना माँगते हैं। इसे बाला माता के नाम पर ही बाला सरोवर कहते हैं। लोक अंचल में वे देवी की तरह पूजी जाती हैं।<br /><br /> कई बरसों तक पत्थर की एक पिंडी को बालामाता मानकर पूजा गया लेकिन बीते कुछ साल पहले यहाँ यह खंडित हो जाने से अब नवनिर्मित मन्दिर में गंगा, यमुना और सरस्वती नदी की प्रतीक प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं तथा बाला माता की खंडित प्रतिमा को तालाब में विसर्जित कर दिया गया है। यहाँ से पश्चिमी रेलवे मार्ग के भोपाल-उज्जैन ट्रैक पर बेरछा मंडी 9 किमी दूर है।<br /><br /> यह देवास और शाजापुर जिले के अन्तिम सीमा पर स्थित है। इस गाँव का नाम बंजारों के डेरों (बालत) के नाम पर पड़ा तो कुछ लोग बालामाता के स्थान होने से इसके नामकरण बालोन होने की बात कहते हैं। एक अन्य धारणा में यहाँ के जागीरदार बलवंतराव बालोन के नाम पर इसका नाम पड़ा।<br /><br /> लोक वार्ताओं के मुताबिक अकाल के वक्त बंजारों के सरदार लाखा की पुत्रवधू बाला बाई को मायके भेज दिया गया। वहाँ उन्हें पता लगा कि उनके ससुराल की हालत बहुत गम्भीर है और मनुष्य, पशु-पक्षी सभी बूँद-बूँद पानी तक को तरस रहे हैं। मौत ने तांडव मचा रखा है तो उन्होंने ससुराल लौटने की जिद की।<br /><br /> यहाँ आकर उन्होंने पहाड़ियों के बीच पानी सहेजने के लिये एक बड़ा तालाब बनाने का प्रस्ताव रखा। कहा कि एक बार तालाब बन गया तो अगले ढाई सौ सालों तक यहाँ किसी तरह के अकाल का कोई प्रभाव नहीं होगा। लेकिन किसी ने नहीं माना। लोग परेशान थे, बीमार और कमजोर भी। वे कैसे इतनी मेहनत कर पाते। इस पर बाला बाई ने हिम्मत नहीं हारी और कहा कि कल सूरज उगने से पहले वे खुद कुदाली-फावड़ा लेकर काम शुरू करेगी। उन्हें न तो खाने की चिन्ता रही और न ही पानी की। बस एक तालाब बनाने का जुनून। सिर पर सूरज चमकता। देह पसीने से भींग जाती लेकिन बाला बाई का उत्साह कम नहीं होता था।<br /><br /> बाला के पति हरकुंवर भी उसके साथ तगारियाँ ढोते। काम बढ़ा तो धीरे-धीरे गाँव के और भी आदमी-औरत उनके काम में मदद करने लगे। कुछ ही दिनों में जैसे-जैसे तालाब का काम पूरा होने लगा, वैसे-वैसे बाला बाई की सेहत कमजोर होती चली गई। लगातार काम करते रहने से हाथों में फफोले पड़ गए लेकिन उन्होंने काम नहीं रुकने दिया।<br /><br /> तीन तरफ के पहाड़ों से आने वाले पानी के सैलाब को बारिश से पहले अपने गाँव में ही थामने का जज्बा बढ़ता ही जा रहा था। मिट्टी खोदती और पानी के बहने वाले प्राकृतिक रास्ते पर डालती जाती। देखते-ही-देखते मिट्टी की काफी ऊँची पाल बन गई लेकिन बारिश अभी दूर थी। बाला बाई काम करते हुए एक दिन वहीं गश खाकर गिर पड़ी।<br /><br /> कुछ ही देर में हरकुंवर भी इसी तरह तालाब में काम करते हुए चल बसे। तालाब के बीच में जहाँ वे दोनों शहीद हुए, उनकी समाधि पर सुन्दर मन्दिर बनाया गया। इस मन्दिर का शिखर आज भी दिखता है। बताते हैं कि दोनों के बलिदान के बाद तो जैसे गाँव के दिन ही बदल गए। जोरदार बारिश हुई और यह विशाल तालाब पानी से भर गया। तब से ही लोग बाला को देवी रूप में पूजते आये हैं।<br /><br /> एक अन्य लोक वार्ता के अनुसार पं सुरेशचन्द्र नागर बताते हैं- <b>"एक समय यहाँ भयंकर अकाल पड़ा था। उस दौरान यहाँ कई लोग और मवेशी रहते थे, जिनके लिये पीने के पानी तक का भयावह संकट हो गया और लोग मरने लगे। सारे लोग परेशान होकर राजा (बंजारों के सरदार लाखा) के सामने पहुँचे। वे पहले से ही परेशान थे। कई पंडितों और तांत्रिकों ने पाठ-पूजा और टोने-टोटके किये। लेकिन कुछ नहीं हुआ। तब सबने मिलकर बारिश के पानी को सहेजने के लिये पहाड़ियों के बीच तालाब खोदने का निर्णय लिया। सभी इस काम में जुट गए। लोगों ने भूखे-प्यासे रहकर कई दिनों तक तालाब खोदा लेकिन पानी तो दूर गीली मिट्टी तक नहीं आई। कुछ शिल्पियों ने तालाब में जाने के लिये तराशे हुए पत्थरों की सीढ़ियाँ भी बना दी। तालाब बनकर तैयार था लेकिन उसमें पानी की एक बूँद तक भी नहीं थी। इसे सब लोगों ने ईश्वरीय प्रकोप माना और वे हताश हो गए।”</b><br /><br /> एक दिन सरदार लाखा को स्वप्न आया कि अपनी नवब्याहता बहू के बलिदान से ही तालाब में पानी भर सकेगा। वह सोच और संशय में पड़ गया। अपनी इकलौते बेटे की बहु को वह कैसे बलि चढ़ा दे। लेकिन कुछ ही देर में उसका संशय दूर हो गया जब खुद नवब्याहता बहु बाला बाई ने हजारों लोगों की भलाई के लिये अपने प्राणों की आहुति देने का मन बना लिया।<br /><br /> बात तो सिर्फ बाला बाई की ही थी, बाद में उसके पति सरदार के बेटे हरकुंवर ने भी उसके साथ शहीद होने का निर्णय लिया। दोनों पति-पत्नी का विवाह की तरह का शृंगार किया गया। उनके जय-जयकार के बीच लाखों लोगों ने भींगी आँखों से उन्हें आखिरी बार नजर भर कर देखा और प्रणाम किया। जैसे-जैसे वे तालाब में जाते गए, वैसे-वैसे तालाब पानी से भरता चला गया। तालाब के बीचोंबीच बालामाता का मन्दिर बनाया गया था। इसका शिखर स्तम्भ आज भी तालाब के बीचोंबीच दिखाई देता है।<br /><br /> पत्थरों से निर्मित प्रवेश द्वार से वे तालाब के बीच बने मन्दिर में आये और बड़े-बुजुर्गों को प्रणाम किया। बेटे और बहु ने यहाँ जल समाधि लेकर अपने नाम को अमर किया। लोग इसे बालामाता के बलिदान का प्रभाव मानते हैं कि तब से अब तक यह तालाब पानी से लबालब रहता है और फिर कभी इस इलाके को अकाल का सामना नहीं करना पड़ा।"<br /><br /> बंजारों के कबीले तब से ही इस तालाब का पानी नहीं पीते हैं। उनके मुताबिक पुरखों ने प्रण लिया था कि यह जनता के खून-पसीने से बना है, इसलिये इसके पानी पर हमारा अधिकार नहीं। एक दूसरी मान्यता के मुताबिक बंजारों की बहु के जल समाधि ले लेने से शोकमग्न बंजारे इसका पानी नहीं पीते हैं।<br /><br /> तालाब के बीचोंबीच स्तम्भ के बारे में मान्यता है कि यह तालाब में दबे हुए मन्दिर का शिखर है। यह स्तम्भ चिकने पत्थर का है। इसकी बनावट चौकोर है तथा नीचे का भाग 4.5 फीट लम्बा तथा 4 फीट चौड़ा है। इसमें चार पट्टे पड़े हैं। दोनों किनारों पर कंगूरे बने हैं। इसके ऊपर 3.5 फीट का बड़ा चोरस पत्थर रखा है तथा एक फीट आड़ा पत्थर है। वर्तमान में तालाब के तल से यह स्तम्भ 16 फीट ऊँचा है। इसकी जुड़ाई न तो सीमेंट से की गई थी और न ही चूने से। केवल पत्थर-पर-पत्थर करीने से जमाए गए हैं।<br /><br /> इतिहास की जानकारी रखने वाले मदनलाल वर्मा बताते हैं- <b>"यहाँ का इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ से हड़प्पाकालीन पुरावशेष भी मिलते रहते हैं। यह क्षेत्र कभी बंजारों के आधिपत्य में रहा होगा, इसीलिये यहाँ अब भी बंजारों में प्रचलित वस्तुएँ खुदाई के दौरान धरती से मिलती रहती है। लोक श्रुति के मुताबिक कभी यहाँ इनके 20 गाँव हुआ करते थे, जिनके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। तब यहाँ आसपास घना जंगल हुआ करता था। मांडू में किसी घमासान युद्ध में मारकाट होने पर एक क्षत्रिय अपनी जान बचाकर निकला। वह भागते हुए जिवाजीगढ़ (बालोन से करीब 20 किमी पहले) पहुँचा। यहाँ उन दिनों बंजारों की बालत (डेरे) पड़े हुए थे। उसने बंजारों को जब अपना हाल बताया तो उन्होंने उसे शरण दी और उसे छुपाने की नियत से अपने कबीले में उनकी वेशभूषा में शामिल कर लिया। बंजारों ने अपनी बालत आगे बढ़ाई और जंगलों को साफ कर इस पहाड़ी पर अपना गाँव बाला खेड़ा बसाया। इसी के आसपास अलग-अलग परिवारों ने अपने पसन्द की जगह पर रहने लगे। इसी से 20 गाँवों की बात सामने आती है। कुछ दिनों बाद जब इसकी खबर पहुँची तो यहाँ भी विरोधियों की सेना आ गई और युद्ध हुआ लेकिन बंजारों की वीरता, साहस और शौर्य ने उन्हें परास्त कर दिया।"</b><br /><br /> वे बताते हैं- <b>"लाखा उर्फ लखन बंजारा कबीले का सरदार हुआ करता था। वह नमक और मिश्री आदि वस्तुओं का व्यापार किया करता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार चलता था। यहाँ बंजारों के पास लाखों की कीमत के मवेशी हुआ करते थे। इनके साथ चरवाहा, कुम्हार, लुहार आदि भी थे, जो कई तरह की शिल्पकला में निपुण थे। आज भी यहाँ पत्थर और मिट्टी की दीवारें, मिट्टी के बर्तन, आभूषण, सिक्के, तराशे गए पत्थर आदि मिलते रहते हैं। यहाँ बहुत समय तक बंजारे आबाद रहे, कुछ सालों पहले तक भी यहाँ बड़ी तादाद में बंजारे आते रहे तथा लोगों को खेती के लिये बैल खन्दुलों पर देते थे और इसके बदले अनाज लेते थे। बारिश के बाद ये लोग व्यापार के लिये दूसरी जगह चले जाया करते थे। बाद में परमार राजाओं का शासन रहा तो कभी यह अवन्तिका क्षेत्र में राजा विक्रमादित्य के अधीन भी रहा। आजादी से पहले तक यह स्थान ग्वालियर राजघराने में आता था।"</b><br /><br /> बलदेवसिंह मालवीय बताते हैं- <b>"बाला माता या बालेश्वरी तालाब के पानी को लेकर जन सामान्य में कई विश्वास और मान्यताएँ हैं। लोक श्रुति के अनुसार बालामाता ने जल समाधि से पहले कहा था कि इस तालाब में स्नान करने से कोढ़ियों को काया, निःसन्तान को सन्तान, बाँझ पेड़ों में फल तथा ऐसी धात्री महिलाओं को, जिन्हें अपने बच्चों को पीलाने हेतु स्तनों में दूध नहीं आता तो यहाँ का जल प्रयोग करने से स्तनों से दूध आने लगता है। इसके अलावा कई चर्म रोगों सहित अन्य बीमारियों में भी यह पानी औषधि की तरह काम करता है। इन्हें खासतौर पर पानी, दूध और पूत की देवी माना जाता है। लोक मान्यता है कि यहाँ से कभी कोई निराश नहीं लौटता। यहाँ दूर-दूर से लोग आते हैं और दर्शनों के साथ यहाँ से पानी भरकर नंगे पाँव ले जाते हैं। इसके पानी की चर्चा और उससे लाभान्वित होने वाली माताओं के कई नाम क्षेत्र में बताए जाते हैं। इसके जल में गंगाजल की तरह कभी कीड़े नहीं पड़ते।”</b><br /><br /> पास के गाँव नाग पचलाना में रहने वाले मदनलाल वर्मा किस्सा सुनाते हैं- <b>"उनके खेत पर एक आम का पेड़ था, जिसमें कभी फल नहीं लगते थे। कई वर्षों तक फल नहीं आने पर उनके पिता एक दिन नंगे पाँव बाला माता के मन्दिर गए और स्नान कर माँ से पेड़ को फलदार बनाने की प्रार्थना करते हुए गाँव लौटे। उन्होंने पेड़ में उस पानी को डाला और थोड़े ही दिनों में यह पेड़ फल देने लगा।”</b> वे बताते हैं कि <b>आज चालीस साल बाद भी पेड़ उसी तरह फल दे रहा है।</b> इसी तरह यहीं की वलू बाई ने अपने बेटे को जन्म दिया लेकिन उसकी छाती से एक बूँद दूध नहीं आता। चिन्तातुर हो उसका भाई माँ से प्रार्थना करते हुए तालाब से जल भरकर लाया तो प्रसूता को पानी पीने के एक-दो दिनों में ही दूध आने लगा। वलू बाई का यह पुत्र अब भी स्वस्थ है।<br /><br /> लीला बाई बताती हैं- <b>"बाला माता के क्षेत्र में कई लोकगीत गाए जाते हैं। महिलाएँ और पुरुष इन गीतों को सामूहिक रूप से गाते हैं। अब मालवी लोकगीतों की परम्परा नए चलन के साथ खत्म हो रही है तथापि अब भी कई गीत प्रचलन में है...</b><br /><br /><b><i>आगे-आगे हरकुंवर, पाछे बाला बऊ, राजाजी के पीछे नगरी बालोन<br /> पेली पेड़ी ओ हरकुंवर बाला बऊ पग धरिया अँगूठा पर आयो वह नीर<br /> तीसरी पेडी हरकुंवर बालाबऊ पग धरिया, राजा गोडा पर आयो वह नीर<br /> पांचवी पेडी हरकुंवर बालबऊ पग धरिया, राजा खांदा पर आयो वह नीर<br /> छठमी पेडी हरकुंवर बालाबऊ पग धरिया, राजा चोटी पर आयो वह नीर<br /> पाछी फिरी के ससरा जी देखो, ससरा जी सरवर तमारो हिलोरा यो खाय</i></b><br /><br /> (बेटा हरकुंवर तथा बहु बाला जैसे-जैसे तालाब की सीढ़ियाँ उतरते जाते हैं, वैसे-वैसे तालाब में पानी बढ़ता चला जाता है। पहली सीढ़ी उतरते हैं तो पानी पैर के अँगूठे तक, तीसरी सीढी उतरते तक घुटनों तक, पाँचवी सीढ़ी उतरने तक छाती पर, छठवीं सीढ़ी उतरने पर कंधे तक और सातवीं सीढ़ी उतरने पर सिर की चोटी डूबने लगी है। तब बाला बहु पीछे मुड़कर ससुर जी को विनम्र भाव से कहती हैं कि देखो आपके तालाब में लबालब पानी हिलोरें ले रहा है।) यह बड़ी करुण कथा है तथा मालवा की ठंडी रातों में जब लोग इस गाथा को पूरी तन्मयता से गाते हैं तो उनकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगते हैं। यही हाल गाथा सुनने वालों का भी हो जाया करता है। अब भी यह गाथा गाई-सुनाई जाती है।<br /><br /> बाला माता का एक और भजन है, जिसे गरबा धुन पर गया जाता है–<br /><br /><b><i>या तो ऊँची रे पाल, तालाब की रे, लोभी बंजारा रेટટ<br /> जिका नीचे पिहरिया री बाट, लोभी बंजारा रेટટ<br /> यो तो बालक होय तो राखी लेवा रे लोभी बणजारा<br /> यो तो जोबन राख्यो नी जाय, लोभी बंजारा रेટટ<br /> यो तो कागज़ होय तो बांची लेवा रे लोभी बणजारा<br /> यो तो करम नी बाँच्यो जाय, लोभी बंजारा रेટટ<br /> यो तो कुंवलो होय तो थागी लेवा रे, लोभी बणजारा<br /> यो तो समन्दर थाग्यो नी जाय, लोभी बंजारा रेટટ</i></b><br /><br /> (इस गीत में बाला माता के त्याग और बलिदान को याद करते हुए उनके ससुर को पानी का लोभी कहकर उलाहना दिया जाता है। तालाब की इस ऊँची पाल के नीचे बाला बहु के मायके का रास्ता है। बच्चे को कोई भी रख सकता है लेकिन यौवन को कौन रख सका है। (बाला बहु को तो किशोर उम्र में ही प्राण दे देने पड़े) कागज को कोई भी पढ़ सकता है लेकिन कर्म की गति कौन जान सकता है। इतने बड़े सरदार के इकलौते बेटे से ब्याहने की खुशी अभी ठीक से मनाई भी नहीं थी कि यह विपदा आ पड़ी। कुएँ में तो कोई भी तल तक जाकर उसका पार पा सकता है लेकिन समुद्र की तरह के इस तालाब में कोई कैसे तल तक जा सकता है।)<br /><br /><b><i>हाँ गढ़ से उतर गुजर ग्वालिनी रे ...<br /> जिका माथा पर यही केरो मठ, अलबेला बाला पूछा बणजारी पूरबदेस की रे...<br /> हाँ गंगा-जमना तो म्हारा माहय बीवे।<br /> अरे न्वाहण मीसे आव जो नी, अलबेला बाला...<br /> हाँ राम रसोई म्हारा याँ हद बणिया<br /> अरे जीमण का मीसे आव जो नी, अलबेला बाला...<br /> हाँ रंग-महल म्हारा याँ हद बणिया<br /> अरे पोढन का मीसे आव जो नी, अलबेला बाला...<br /> हाँ बागा रा झूला म्हारा याँ हद बणिया<br /> अरे झूलन का मीसे आव जो नी, अलबेला बाला</i></b><br /><br /> (अपने गढ़ से उतरकर जाने वाली गुर्जर ग्वालिन से बाला माता कहती हैं कि गंगा-जमना जैसी पवित्र नदियाँ यहाँ मेरे भीतर ही बहती है, स्नान करने के लिये आओ न... यहाँ हर दिन राम रसोई होती है, भोजन करने आओ न ... यहाँ खूब बड़े महल-चौबारे हैं, देखने और उनका आनन्द लेने आओ न... यहाँ बागों में सुंदर झूले पड़े हैं, सखी झूलने आओ न...)"<br /><br /> पुजारी कुंदनबाई कहती हैं- <b>"बाला माता में कोई प्राचीन मन्दिर नहीं था। यहाँ किनारे पर खुले में ही इमली के पेड़ के नीचे सिन्दूर लेपित बाला माता की पाषाण प्रतिमा रखी हुई थी। पाँच साल पहले प्रतिमा का एक हिस्सा खंडित हो गया था तो गाँव और लोगों ने इसके स्थान पर नया मन्दिर बनाकर इसमें गंगा, यमुना और सरस्वती नदी की प्रतीक स्वरूप संगमरमर की प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। बाला माता की खंडित प्रतिमा को तालाब में विसर्जित कर दिया गया है। बहुत खोजने पर आखिरकार पुरानी प्रतिमा का एक चित्र अवश्य मिला है। इसमें सिन्दूर लेपित वह प्रतिमा दिखाई दे रही है। बाला माता की विशेष आरती यहाँ हर दिन होती है–</b><br /><br /><b><i>आरती बाला माता की, जुग-जुग पालनहारी की।<br /> भयानक जंगल एक भारी, बसाई वहाँ नगर थारी।<br /> पशु-पक्षियों का था ठाँव, बसाया बंजारों ने गाँव।<br /> चारों ओर पहाड़ी थी न्यारी, गाँव का नाम रखा बंजारी।<br /> डाला ठा पड़ाव, पत्थरों का जमाव, बंजारों की बालत लहराई... आरती बाला...<br /> जन्म बंजारों के घर पाया, रूप देखा पिता ने सुख पाया<br /> मात मन ही मन हर्षाई, चिंता अपने मन माही सताई<br /> अभी तो झूले है पलना, प्यारी से मेरी ये ललना<br /> मगन हुई मात, सोच रही बात, लीला है लीलाधारी की... आरती बाला...<br /> बहु बन हंसराज घर आई, रूप देख मन सबके भाई<br /> खुशी हुई सबके मन अपार, भाग जागे हैं अब हमार<br /> पड़ा एक बार यहाँ अकाल, भयंकर था कालों का काल<br /> करें पूजन, कोई भजन, करी सब देखन की मनुहारी... आरती बाला...<br /> खोदा यहाँ सब मिलकर सरोवर, हजारों फीट खोदी धरोहर<br /> कहीं पर न पानी का निशान, सब हो गई थे परेशान<br /> गगन से आवाज़ आई, मदन कहे गंगा माँ आई<br /> पुत्रवधू जाई, गंगा तहाँ आई, सरोवर बीच आसन लगाई ... आरती बाला माता की...</i></b><br /><br /> बाला माता को वे सभी अलंकरण तथा सुहाग सामग्री चढ़ाई जाती है, जो सुहागन स्त्रियाँ अपने सौन्दर्य वृद्धि के लिये उपयोग करती हैं। खासतौर पर उन्हें लम्बी नथ चढ़ाई जाती है। बंजारा समाज की महिलाएँ विशेष तरह की लम्बी नथ पहनती हैं। उन्हें बंजारा परिधान के मुताबिक ही कांचली लुगड़ी और घाघरा भी चढ़ाया जाता है।<br /><br /> यहाँ हर अमावस्या को बड़ी तादाद में लोग आते हैं तथा बाल सरोवर में स्नान कर बाला माता के दर्शन और पूजा करते हैं। यहाँ मनौती पूरी करने वाले लोगों का भी वर्ष भर तांता लगा रहता है। ज्यादातर श्रद्धालु माघ तथा वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष में यहाँ आते हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु अपने साथ बाल सरोवर का पानी भी भरकर ले जाते हैं।<br /><br /> तालाब के पानी में सूरज डूब रहा था। हमारे लौटते हुए पश्चिम का आसमान सिंदूरी हो उठा था। तालाब की लहरों के साथ मन में भी इस अनूठी गाथा की नायिका बाला बाई के अदम्य साहस और प्राणोत्सर्ग कर समाज को सैकड़ों सालों तक पानी का खजाना देने की इस कहानी का प्रभाव गूँज रहा था। ऐसे कई पूर्वजों की वजह से ही आज हम पानीदार बने हुए हैं। लेकिन पानी का यह खजाना आगे भी बना रहे, इसके लिये हमारी पीढ़ी में से क्या कोई बाला और हरकुंवर बनने को तैयार है। बलिदान नहीं तो कम-से-कम समाज की चिन्ता करने वाले लोग तो होना ही चाहिए, ताकि अगली पीढ़ी भी पानीदार बनी रह सके।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">acute water crisis in dewas, drought prone area, bala talab, water conservation, reducing groundwater level in district, narmada river, kalisindh river, balon, huge number of wells, water recharge system, water available for irrigation.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333314&amp;2=comment&amp;3=comment" token="YKKL6Jzw_bcTj4kS71F7ZkCZppTlKc-ubyiCTLX3tmA"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/water-conservation-and-bala-talab-of-dewas" data-a2a-title="पानी की महत्ता का स्मारक बाला तालाब"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fwater-conservation-and-bala-talab-of-dewas&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%95%20%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%20%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AC"></a></span> Sat, 22 Sep 2018 13:08:25 +0000 editorial 1319333314 at http://hindi.indiawaterportal.org आदिवासियों ने सहेजे माता नु वन http://hindi.indiawaterportal.org/tribals-true-forest-conservators-of-madhya-pradesh <span>आदिवासियों ने सहेजे माता नु वन</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Mon, 09/03/2018 - 14:32</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><span class="inline inline-left"><img alt="आदिवासियों के प्रयास से हरा-भरा हुआ जंगल" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1899/43725966984_c11bafe7c2_z.jpg" title="आदिवासियों के प्रयास से हरा-भरा हुआ जंगल" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>आदिवासियों के प्रयास से हरा-भरा हुआ जंगल</i></span></span>मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में अपढ़ समझे जाने वाले आदिवासी समाज ने अपने जंगल को सहेजकर पढ़े-लिखे समाज को एक बड़ा सन्देश दिया है। जिले के 110 गाँवों में खुद आदिवासियों ने अपने बूते आसपास के जंगलों को न सिर्फ सहेजा, बल्कि वहाँ 41 हजार नए पौधों को रोपकर घना जंगल खड़ा करने के लिये भी जतन शुरू कर दिया है।<br /><br /> कई गाँवों में तो नए लगाए गए पौधे 8 से 10 फीट के होकर पेड़ों में तब्दील हो चुके हैं। इन जंगलों को "माता नु वन" नाम दिया गया है। कुछ गाँवों से प्रारम्भ होकर यह मुहिम जिले के गाँव-गाँव पहुँच चुकी है।<br /><br /> सैकड़ों बरस से घने जंगलों और उसमें रहने वाले जंगली जानवरों के साथ रहते हुए उन्होंने लम्बे वक्त में अपनी जंगल आधारित जीवनशैली विकसित की है। पूरा जीवन इन्हीं जंगलों पर आश्रित रहकर अपनी जीवनयापन के लिये संसाधन जुटाते रहे हैं। लेकिन 50-60 सालों में जंगल उनसे दूर हुए हैं।<br /><br /> आदिवासी जंगलों की जगह आसपास के गाँवों में आने लगे और धीरे-धीरे जंगल भी कम होते हुए खत्म होने की कगार पर पहुँच गए। इसका उनके जीवनस्तर पर बड़ा बुरा असर पड़ा और वे करीब-करीब दोनों तरफ से छले गए। इधर उनके जंगल छीन गए तो उधर ग्राम संस्कृति में वे आपने आपको न तो ढाल सके और न ही उनके पास इसके लिये जरूरी संसाधन और रोजमर्रा की जिन्दगी जीने के लिये रोजगार के साधन थे।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="जंगल की देखभाल करते स्थानीय आदिवासी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1863/30574519618_ab614040e6_z.jpg" title="जंगल की देखभाल करते स्थानीय आदिवासी" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>जंगल की देखभाल करते स्थानीय आदिवासी</i></span></span>इन स्थितियों से निजात दिलाने के लिये आदिवासियों ने अब अपने इलाके का जंगल सहेजने की मुहिम शुरू की है। कुछ दशक पहले तक आदिवासी इलाकों में परम्परा रही है कि हर गाँव के आसपास का करीब पाँच से सात एकड़ का जंगल संरक्षित होता था।<br /><br /> इसे देवी का जंगल यानी माता का वन कहा जाता और कोई भी इस जंगल से पेड़ों की लकड़ी काटना तो दूर गिरी हुई लकड़ियाँ उठाना भी उचित नहीं मानते थे। उनका मानना है कि इस जंगल की लकड़ी ले जाने या पेड़ों को नुकसान पहुँचाने पर देवता कुपित हो जाते हैं और श्राप दे देते हैं। इसी कारण यह हमेशा ही सघन जंगल बना रहता था। झाबुआ में इसे माता नु वन, राजस्थान में ओरण तथा महाराष्ट्र में देवराई कहा जाता है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="आदिवासियों की मेहनत से खिलता माता नु वन" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1892/30574522408_a83b914e00_c.jpg" title="आदिवासियों की मेहनत से खिलता माता नु वन" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>आदिवासियों की मेहनत से खिलता माता नु वन</i></span></span>आदिवासी हमेशा से प्रकृति पूजक रहे हैं और वे पेड़ों तथा जंगलों की भी पूजा कर उन्हें देवता मानते रहे हैं। इसीलिये माता के वन (आदिवासी बोली में माता नु वन) संरक्षित रखने की परम्परा रही है। इस वन को हमेशा ही पवित्र माना जाता रहा और त्यौहार, पर्व या कोई समारोह के दौरान ही आदिवासी यहाँ पहुँचते और पूजा-अर्चना के बाद लौट जाया करते थे।<br /><br /> उन दिनों जंगलों में आदिवासियों के अलावा बाकी लोगों का आना-जाना कम ही हुआ करता था। इसलिये ये हमेशा ही संरक्षित बने रहे लेकिन बीते 50 सालों में जंगलों में गैर आदिवासियों का आना जाना बढ़ा और दुर्भाग्य से इसी दौर में जंगल को सबसे अधिक नुकसान पहुँचा। जंगल के पेड़ों की लकड़ी सहित वन उत्पादों के बेतहाशा शोषण और जंगली जानवरों के अवैध शिकार ने जंगलों को खत्म कर दिया। उनकी सघनता में कमी आई।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="माता नु वन में पौधे पेड़ का रूप ले रहे हैं" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1845/29505729797_25ebc66d58_c.jpg" title="माता नु वन में पौधे पेड़ का रूप ले रहे हैं" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>माता नु वन में पौधे पेड़ का रूप ले रहे हैं</i></span></span>आदिवासियों को वहाँ से बलपूर्वक खदेड़ा गया। तस्करी के इस नए रूप ने आदिवासी जीवन के हजारों सालों की परम्पराओं तथा विश्वासों को बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया गया। इससे माता नु वन भी प्रभावित हुए। गैर आदिवासी लोग इनकी आस्था और विश्वास से जुड़े नहीं थे, इसलिये उनके स्वार्थ सिर्फ़ लकड़ी काटने और मोटा मुनाफा कमाने तक ही सीमित रहा और इलाके से बीते सालों में माता नु वन खत्म होते चले गए। इससे पानी के संकट के साथ ग्लोबल वार्मिंग का खतरा भी बढ़ गया है।<br /><br /> अकेले राणापुर इलाके में बीते दो सालों में चार हजार से ज्यादा पौधे माता नु वन में रोप गए हैं और आज इनमें से अधिकांश लहलहा रहे हैं। इनकी पूरी देखरेख तथा सुरक्षा का काम स्थानीय ग्रामीण ही देख रहे हैं। मोहनपुरा और छागोला गाँव में पहुँचकर देखें तो आँखों में हरियाली समा जाती है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पौधे रोपने के लिये स्कूली बच्चों ने भी किया श्रमदान" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1848/30556108708_a9c832ccb8_c.jpg" title="पौधे रोपने के लिये स्कूली बच्चों ने भी किया श्रमदान" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पौधे रोपने के लिये स्कूली बच्चों ने भी किया श्रमदान</i></span></span>मोहनपुरा में करीब 7 बीघा जमीन में माता नु वन को ग्रामीण आदिवासियों ने फिर से अपने हाथ में ले लिया है। बीते सालों में यहाँ दो हजार से भी ज्यादा पेड़ लगाए गए हैं। इसी तरह छागोला में भी 10 बीघा जमीन में परम्परागत माता नु वन को अब सघन किया जा रहा है। 2200 नए पौधे रोप गए हैं। ग्रामीणों को यहाँ काम करते देखा जा सकता है।<br /><br /> हर परिवार को दस पौधों को बड़ा करने का लक्ष्य दिया गया है। कल्याणपुरा में 30 हेक्टेयर क्षेत्र तथा खेड़ा में 75 एकड़ में माता वन बनाया जा रहा है। खेडा में हलमा से बनाए गए 24 करोड़ लीटर पानी की क्षमता वाले तालाब से पौधों को पानी दिया जा रहा है।<br /><br /> इसी तरह अब छायन पश्चिम, घाटिया, गुलाबपुरा, भूरी घाटी, बिजौरी, संत बोराली, बोरपारा, परवलिया, खेड़ा, कल्याणपुरा, मियाती, भाजी डूंगरा, कलिया बड़ा और कलिया छोटा आदि गाँवों में भी सघन माता नु वन नजर आने लगे हैं। माता नु वन से कोई भी आदिवासी परिवार कभी लकड़ी नहीं काटता बल्कि यदि कोई भी इसे नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है तो आदिवासी समाज इसका विरोध करता है। जंगल बचने का सीधे तौर पर फायदा इलाके के पर्यावरण पर पड़ेगा और बारिश अच्छी हो सकेगी। पेड़ों की जड़ों के जरिए भूजल भण्डार में भी बढ़ोत्तरी हो सकेगी।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पौधों के लिये गड्ढे तैयार करते आदिवासी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1863/29486875577_e345dcd066_c.jpg" title="पौधों के लिये गड्ढे तैयार करते आदिवासी" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पौधों के लिये गड्ढे तैयार करते आदिवासी</i></span></span>मोहनपुरा के ग्रामीण प्रेमसिंह मखोडिया बताते हैं- <b>"हम आदिवासी अपनी मान्यता के मुताबिक प्रकृति में पेड़-पौधों, नदी, पहाड़ और पत्थरों को पूजते रहे हैं। जहाँ पूजा की जाती है, उसके आसपास के जंगल को माता नु वन कहते हैं। मतलब माता का वन। हर आदिवासी गाँव में ऐसा स्थान हुआ करता था।"</b><br /><br /> छागोला के मांगीलाल सिंघाड बताते हैं- <b>"यहाँ गाँव के लोग सुख-समृद्धि की कामना के साथ पर्व, त्यौहार तथा शादी-ब्याह की खुशियाँ मनाते थे। हमारा समाज माता नु वन के पेड़ों और उसकी लकड़ियों को पूजता रहा। कभी कोई यहाँ की एक लकड़ी भी नहीं ले जाता था। बाद के सालों में ये खत्म होते चले गए। अब हमने इन्हें फिर से पुनर्जीवित करने की कोशिश शुरू की है। बीते सालों में हमारे काम से अब ये जंगल लहलहाने लगे हैं। इनकी देखरेख का जिम्मा हम सब गाँव वालों का है। हमारा दुर्भाग्य जंगलों के खत्म होने से ही आया है। जंगल सुधरेंगे तो हमारा जीवन भी फिर से हरा-भरा हो जाएगा।"</b><br /><br /> आदिवासियों की धार्मिक आस्था को पर्यावरण से जोड़ दिये जाने के बेहतर परिणाम सामने आये हैं। इलाके में लम्बे समय से पानी और पर्यावरण के लिये काम कर रहे महेश शर्मा बताते हैं- <b>"माता नु वन से जोड़कर आदिवासी इलाके में पर्यावरण को बड़ा फायदा हो रहा है। इससे पर्यावरण में सुधार के साथ आदिवासी अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। आदिवासी गाँवों में यह वन हुआ करते थे लेकिन धीरे-धीरे खत्म हो चुके थे। हमने इन्हें फिर से जिन्दा करने का बीड़ा उठाया है। आदिवासी समाज के हमेशा से पेड़ों और जंगलों से आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं। उनकी कई परम्पराएँ इस बात का प्रमाण है। माता नु वन से शुरू हुई यह पहल बड़े अर्थों में उन्हें जंगल से जोड़ेगी।"</b><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="पौधों के लिये तैयारी करते आदिवासी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1881/29486878867_493527a963_c.jpg" title="पौधों के लिये तैयारी करते आदिवासी" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पौधों के लिये तैयारी करते आदिवासी</i></span></span>शिवगंगा अभियान के राजाराम कटारा बताते हैं कि शुरुआत में प्रशासन की कोई मदद नहीं थी। लेकिन अब इसमें वन विभाग तथा प्रशासन का भी सहयोग मिलने लगा है। वन विभाग ने गाँवों में माता नु वन को संरक्षित करने में सीमांकन करने, कुछ जगह फेंस लगाने, पौधे देने तथा सिंचाई के लिये कुछ संसाधन मुहैया कराने जैसी मदद की है तो प्रशासन ने भी पानी का टैंक आदि मुहैया कराए हैं। पुलिस विभाग ने भी साढ़े 8 हजार पौधे लगवाए हैं। पौधों में भी हमारी कोशिश रहती है कि यहाँ के परम्परागत, पर्यावरण उपयोगी तथा ऐसे पेड़ों को लगाया जाये जिनसे समाज को पोषण प्रदान कर सकें या बीमारियों में औषधि के रूप में सहायक हों।<br /><br /> जिले के पुलिस अधीक्षक महेशचन्द्र जैन कहते हैं-<b>"यह अपनी तरह की अनूठी मुहिम है, जिसमें ग्रामीण आगे बढ़कर जंगल बचाने की पहल कर रहे हैं। कहा जाता है कि आदिवासी अपढ़ होते हैं लेकिन उनका जंगल बचाने का प्रयास उल्लेखनीय है। पानी होने से जिले में रोजगार की सम्भावनाएँ बढ़ेंगी और अपराधों का ग्राफ भी नीचे आएगा। इसलिये हम भी इस मुहिम में पूरी मदद कर रहे हैं।"</b><br /><br /> पश्चिम भारत में करीब 20 लाख की आबादी और 1320 गाँवों वाले झाबुआ जिला गुजरात की सीमाओं से सटा हुआ है। ज्यादातर लोग मजदूर या छोटी जोत के काश्तकार हैं। भील, भिलाला और पटेलिया जनजाति की परम्पराएँ यहाँ की ग्रामीण संस्कृति की पहचान है। 5947 वर्ग किमी में सूखे और उजाड़ पठारों पर बसा आदिवासी बाहुल्य यह इलाका हमेशा से अकाल और पलायन का पर्याय रहा है। सघन वनों की कमी के साथ यह संकट और विकराल होता चला गया।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="हाथापावा में पौधारोपण करते लोग" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1895/29486888517_ab436dac03_c.jpg" title="हाथापावा में पौधारोपण करते लोग" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>हाथापावा में पौधारोपण करते लोग</i></span></span>प्रकृति से वन क्या छीने, पानी की कमी ने इस इलाके के लोगों के चेहरे का पानी भी उड़ा दिया। निस्तेज चेहरों पर अकाल की छाया इनकी नियति बन चुकी थी। वे अन्न और पानी को तरस रहे थे और उनका यहाँ रहना तक मुश्किल हो रहा था।<br /><br /> हर साल तीन से चार लाख लोग अपना घर-परिवार छोड़कर बेहतर मजदूरी की उम्मीद में शहरों की ओर पलायन करते। समस्या की विकटता और भौगोलिक विशालता को देखते हुए कोई सम्भावना भी नजर नहीं आती। कई प्रयास हुए लेकिन कुछ नहीं बदला। आपस में बातें होने लगी कि आखिर इसका समाधान कहाँ है? लोगों ने समझा कि इसका समाधान प्रकृति की ओर लौटने में ही निहित है।<br /><br /> कुछ सालों पहले जब झाबुआ जिले के गाँवों में पीने के पानी की जबरदस्त किल्लत होने लगी तो लोगों का ध्यान पानी और पर्यावरण से जुड़े कामों पर गया। इसी दौरान जिले में शिवगंगा अभियान ने आदिवासी परम्परा हलमा को सामाजिक हित में पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया। साल-दर-साल हलमा में हजारों आदिवासियों ने जुटकर इलाके में हजारों जल संरचनाएँ खड़ी कर दीं।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="माता नु वन में महेश शर्मा के साथ ग्रामीण" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1875/29486903867_7bc232e36a_c.jpg" title="माता नु वन में महेश शर्मा के साथ ग्रामीण" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>माता नु वन में महेश शर्मा के साथ ग्रामीण</i></span></span>बिना किसी लागत के मानवीय श्रम की सहभागिता की सदियों पुरानी भीली संस्कृति में हलमा यानी मिल-जुलकर समाज के लिये काम करने की परम्परा को फिर से जिन्दा करते हुए झाबुआ की हाथीपावा की पहाड़ियों पर 50 हजार से ज्यादा खंतियाँ (कन्टूर ट्रेंच) खोदी गईं। इसमें अब हर साल बारिश का लाखों गैलन पानी पहाड़ी से फिसलकर बह जाने के बजाय इनमें रिसता हुआ भूजल को बढ़ाता है और इससे कभी सूखी बंजर पड़ी यह पहाड़ी अब हरी-भरी रहने लगी है। इसके लिये शिवगंगा के कार्यकर्ताओं ने आदिवासी समाज को प्रेरित किया और वे बिना एक पैसा लिये एक दिन श्रमदान करने के लिये तैयार हुए। अब हर साल करीब 25 हजार आदिवासी एक दिन के लिये पानी और पर्यावरण का काम करते हैं। बीते साल इसी पहाड़ी पर प्रशासन की मदद से करीब 8 हजार 500 पौधे भी रोप गए हैं जो तेजी से बढ़ रहे हैं।<br /><br /> इतना ही नहीं जिले के गाँवों में हलमा से अब तक करीब 50 से ज्यादा छोटे-बड़े तालाब, कई बोरी बाँध तथा अन्य जल संरचनाएँ भी विकसित हो चुकी हैं। इससे इलाके की भौगोलिक पहचान भी अब बदलने लगी है। पहले दूर-दूर तक कहीं कोई हरियाली या पेड़-पौधे नजर नहीं आते थे, अब बारिश के दिनों में यहाँ की हरियाली देखते ही बनती है। कई गाँवों में पानी की उपलब्धता बढ़ने पर आदिवासियों ने खेती करना शुरू कर दिया है और हर साल इलाके से होने वाले रोजगार के लिये पलायन में भी कमी आई है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="माता नु वन के लिये बिजोरी में सफाई करते आदिवासी" class="image image-_original" height="450" src="https://farm2.staticflickr.com/1897/30556131868_2daa44b5b0_c.jpg" title="माता नु वन के लिये बिजोरी में सफाई करते आदिवासी" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>माता नु वन के लिये बिजोरी में सफाई करते आदिवासी</i></span></span>माता नु वन को संरक्षित करने की मुहिम में अब कई लोग आगे बढ़कर सहयोग करने लगे हैं। इंदौर की रहने वाली सुशीला तोलानी ने खेड़ा में पौधे लगाने के लिये एक लाख रुपए का दान किया है। उनके पति किशोर तोलानी बैंक में क्षेत्रीय अधिकारी हैं और बेटा अमेरिका की एक बड़ी फर्म में इंजीनियर है। वे हर साल अपने पति की एक महीने की वेतन किसी ऐसे ही समाज हित के कामों के लिये देती हैं।<br /><br /> हम साक्षर लोग ज्यादातर इसी मानसिकता के होते हैं कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी समाज में न तो जीने का ढंग है और न ही शिक्षा लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि उन्होंने सैकड़ों सालों से जंगल में रहते हुए सह अस्तित्व की ऐसी नायाब परम्पराएँ विकसित की हैं कि हम उन्हें जानकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं।<br /><br /> हलमा तथा माता नु वन ऐसी ही सहज लेकिन पर्यावरण के लिये बड़ी महत्त्वपूर्ण परम्पराएँ हैं। हालांकि जंगलों के लगातार खत्म होते जाने तथा आदिवासियों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा होने से वे अब ये परम्पराएँ भूलते जा रहे हैं। कई जगह अब इन परम्पराओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास किये जा रहे हैं और सार्थक भी हो रहे हैं। झाबुआ इसकी एक बड़ी सफल प्रयोगशाला साबित हुआ है।<br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="किशोर एवं सुशीला तोलानी अपने बेटे के साथ" class="image image-_original" height="675" src="https://farm2.staticflickr.com/1869/30574516898_a539aacdd4_o.jpg" title="किशोर एवं सुशीला तोलानी अपने बेटे के साथ" width="700" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>किशोर एवं सुशीला तोलानी अपने बेटे के साथ</i></span></span>आदिवासियों ने थोड़े से ही प्रयासों से हमें यह बताने की कोशिश की है कि सामुदायिक सहभागिता से ही पानी और पर्यावरण के जमीनी कामों को आगे बढ़ाया जा सकता है। सभ्य कहे जाने वाले नागरी समाज को भी इन आदिवासियों से बहुत कुछ सीखने समझने की बहुत जरूरत है। हम जहाँ अधिकांश कामों के लिये सरकारों की तरफ ताकते रहते हैं। उन्होंने अपनी मेहनत और पसीने के बूते काफी बड़े-बड़े कामों को अंजाम दिया है।<br /><br /> धरती का पानी और जंगल बचाने के लिये सबको जुटना होगा। आदिवासी समाज में हलमा अब एक शब्द नहीं बल्कि ताकत बनकर उभरा है। बीते दस सालों में हुए काम का अब इलाके में जमीन पर बदलाव साफ नजर भी आने लगा है। चारों तरफ हरियाली तथा तालाबों में लहर-लहर भरा हुआ पानी देखते ही बनता है।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">madhya pradesh, jhabua district, forest conservation by tribals, they call it ‘maata nu van’in madhya pradesh, oran in rajasthan, devrai in maharashtra, shivganga abhiyan, bheel, bhilala, patelia, contour trenching, tribals and forests pdf, forest and tribal life, forests and tribals, forest and tribal life project, forest and tribal livelihood, livelihood of forest tribes of our state, role of tribals in forest protection, how are tribals dependent on forests, role of tribals in conservation of forests, role of tribals in conserving forest in india, role of tribals in conservation of biodiversity, role of tribals in conserving the environment, tribals and forests pdf, how tribal practices help to conserve the environment, forest and tribal livelihood, role of tribals in protecting environment, what is devrai, list of sacred groves in maharashtra, devrai forest information, list of sacred groves in india, devrai forest information in marathi, 5 examples of sacred groves in india, where are such sacred groves in maharashtra, sacred groves pdf, forest source of their livelihood, relationship between forest and livelihood, forest and livelihood in india, forest and tribal livelihood, tribal societies showing their dependence on forest, livelihood of forest tribes of our state, tribes and their livelihood, forest dependent communities in india, livelihood of tribes, shivganga ngo, shivganga jhabua, halma jhabua, shivganga ngo jhabua, contour trenching pdf, types of contour trenches, staggered contour trenching, contour trench design, contour trenches photos, advantages of continuous contour trenches, staggered trenches meaning, contour trench images.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333239&amp;2=comment&amp;3=comment" token="Dpx_8inEe2LyTZ-BTgDREXjy4P5zZ6fJDD0kANukA5Y"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/tribals-true-forest-conservators-of-madhya-pradesh" data-a2a-title="आदिवासियों ने सहेजे माता नु वन"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Ftribals-true-forest-conservators-of-madhya-pradesh&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BE%20%E0%A4%A8%E0%A5%81%20%E0%A4%B5%E0%A4%A8"></a></span> Mon, 03 Sep 2018 09:02:09 +0000 editorial 1319333239 at http://hindi.indiawaterportal.org जल संरक्षण कर पानीदार हुआ मोरी http://hindi.indiawaterportal.org/water-conservation-in-mori-uttarkashi <span>जल संरक्षण कर पानीदार हुआ मोरी</span> <span><span>editorial</span></span> <span>Mon, 08/20/2018 - 16:00</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">नमिता</div> </div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><span class="inline inline-left"><img alt="चिंवा गाँव" class="image image-_original" height="250" src="https://farm2.staticflickr.com/1875/42345100310_c557f4840b_c.jpg" title="चिंवा गाँव" width="400" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>चिंवा गाँव (फोटो साभार - अमर उजाला)</i></span></span>भूजल वैज्ञानिक डॉ. डीडी ओझा की किताब ‘जल संरक्षण’ में बताया गया है कि धरती का 70.87 प्रतिशत भाग पानी से घिरा हुआ है। बावजूद इसके पीने के पानी का जबरदस्त संकट है। आँकड़ों के अनुसार विश्व की जनसंख्या वर्ष 2050 में 903.6 करोड़ हो जाने की सम्भावना है। लेकिन 2050 में भी धरती पर पानी की उपलब्धता उतनी ही रहेगी, जितनी की आज है। इसलिये पानी को बचाने के लिये उपयुक्त जतन तो करने ही चाहिए। वे अपनी किताब के मार्फत आगे बताते हैं कि भूजल और वर्षाजल को भविष्य के लिये संरक्षित करना जरूरी हो गया है। <br /><br /> यहाँ इस किताब का जिक्र इसलिये किया जा रहा है कि जो आँकड़े किताब में प्रस्तुत हैं उनसे जल संरक्षण के प्रति हो रहे प्रयास कितना मुकाबला कर पाते हैं कि नहीं। पर आने वाले समय में प्रेरणास्पद हो सकते हैं। इधर वाटर टैंक कहे जाने वाले उत्तराखण्ड में पानी को बचाने की मुहीम रंग ला रही है। लोग अपने-अपने स्तर पर जल संरक्षण के कार्य कर रहे हैं और उनके प्रतिकूल परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं।<br /><br /><b>जल सरंक्षण का पुरस्कार</b><br /><br /> उत्तराखण्ड के अन्तर्गत सीमान्त जनपद उत्तरकाशी की सरांश व चिंवा ग्राम पंचायतों में ग्रामीणों द्वारा छेड़ी गई जल संरक्षण की मुहिम ने देश भर को सन्देश दिया है। भारत-चीन सीमा से लगे मोरी ब्लॉक की इन दोनों पंचायतों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। <br /><br /> मुख्यालय उत्तरकाशी से 225 किमी दूर मोरी ब्लॉक की चिंवा ग्राम पंचायत के प्राकृतिक जलस्रोतों में लगातार जलस्तर घट रहा था। इसके समाधान बावत वर्ष 2017 में पंचायत ने कार्ययोजना बनाई और क्षेत्र में पौधरोपण शुरू कर दिया। इसके साथ-साथ पानी की छोटी-छोटी धाराओं को एकत्र कर तालाब तक पहुँचाया गया। चिंवा गाँव के 63 वर्षीय मोहन सिंह ने बताया कि पहले उनके गाँव के तीनों प्राकृतिक जलस्रोत सूखने के कगार पर आ चुके थे। अब ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास से गाँव के जलस्रोतों को रीचार्ज किया गया। गाँव की पेयजल की आपूर्ति के साथ-साथ यह पानी अब बाग-बगीचों की सिंचाई और पशुओं के पीने के काम में आ रहा है।<br /><br /><b>कैसे हुआ जल संरक्षण</b><br /><br /> ग्राम पंचायत चिंवा के प्रधान सतीश चौहान बताते हैं कि जल संरक्षण के लिये ग्रामीणों ने बिना किसी सरकारी सहायता के अगस्त 2017 में 500 पौधों का गाँव के आसपास रोपण किया। इन पौधों की देखभाल भी ग्रामीण ही कर रहे हैं। बताया कि गाँव में जल संरक्षण के साथ स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। आज सभी परिवारों के पास शौचालय है। साथ ही कूड़ा निस्तारण के लिये भी ग्रामीणों को जागरूक किया गया है। <br /><br /> चिंवा की तरह ही मोरी ब्लॉक की सरांश ग्राम पंचायत ने भी जल संरक्षण के क्षेत्र में मिसाल पेश की है। यह ग्राम पंचायत भी पिछले दस सालों से जल संकट से जूझ रही थी। इससे निपटने के लिये ग्रामीणों ने पहले जल संस्थान और जल निगम के चक्कर लगाए, लेकिन जब कोई बात नहीं बनी तो ग्रामीण पारम्परिक जलस्रोत को रीचार्ज करने में जुट गए। पहले-पहल ग्रामीणों ने मनरेगा के तहत छह लाख की धनराशि खर्च कर 1500 पौधों का रोपण किया। साथ ही छोटे-छोटे तालाब भी तैयार किये। <br /><br /> गाँव के 68 वर्षीय सूरत सिंह बताते हैं कि गाँव के पास सेरी स्रोत से अब पानी की सप्लाई हो रही है। प्रधान कमलेश चौहान बताते हैं कि यहाँ-वहाँ बिखरे हुए पानी को एकत्र कर तालाब में डाला गया। यह पानी पशुओं के पीने के साथ बागवानी के भी काम आ रहा है। यानि सरांश और चिंवा ग्राम पंचायत ने वर्षाजल एकत्रिकरण के लिये चाल-खाल को पुनर्जीवित किया, साथ-साथ वृक्षारोपण भी किया। इसके अलावा गाँव के आस-पास के जलागम को सुरक्षित भी किया। परिणामस्वरूप इसके गाँव में पानी की सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान होने लगा।<br /><br /><b>डुगरा गाँव की वन पंचायत की अनूठी पहल</b><br /><br /> पौड़ी जनपद के अर्न्तगत कल्जीखाल विकासखण्ड की वन पंचायत डुंगरा में वन और जल संरक्षण के लिये ग्रामीणों ने कमर कस ली है।<br /><br /> चाल-खाल और वनीकरण के जरिए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कार्य ग्रामीणों की तरफ से किये जा रहे हैं। सिविल और सोयम वन प्रभाग के माइक्रो प्लान में ग्रामीण बराबर की सहभागिता निभा रहे हैं। दिलचस्प यह है कि उत्तराखण्ड वन संसाधन प्रबन्धन परियोजना के तहत ग्रामीणों ने जल संरक्षण के कार्यों को सहभागिता के आधार पर क्रियान्वित किया है। इसके तहत क्षेत्र में चाल-खालों का निर्माण किया जा रहा है। साथ ही ग्रामीण पौधरोपण कार्यक्रम को भी सफलतापूर्वक निभा रहे हैं।<br /><br /> सिविल एवं सोयम वन प्रभाग के प्रभागीय अधिकारी लक्ष्मण सिंह रावत ने बताया कि आने वाले दिनों में यह क्षेत्र जल संरक्षण के लिये नजीर के तौर पर पेश होगा। बता दें कि डुगरा के ग्रामीण पुरानी चाल-खाल को पुनर्जीवित करने के लिये सामूहिक प्रयास कर रहे हैं तो वहीं पर्यावरण सन्तुलन के लिये वृक्षारोपण व जलागम संरक्षण का कार्य संगठनात्मक रूप से क्रियान्वित कर रहे हैं। यही वजह है कि जो गाँव पहले पानी की बूँद-बूँद के लिये मोहताज था वह गाँव आज जलापूर्ति के लिये उदाहरण बनकर प्रस्तुत हुआ है। <br /><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #750000; padding: 10px">सरांश ग्राम पंचायत ने पिछले दस सालों से जल संकट से जूझ रही थी। इससे निपटने के लिये ग्रामीणों ने पहले जल संस्थान और जल निगम के चक्कर लगाए, लेकिन जब कोई बात नहीं बनी तो ग्रामीण पारम्परिक जलस्रोत को रीचार्ज करने में जुट गए। पहले-पहल ग्रामीणों ने मनरेगा के तहत छह लाख की धनराशि खर्च कर 1500 पौधों का रोपण किया। साथ ही छोटे-छोटे तालाब भी तैयार किये।</p>इसी तरह चौंदकोट क्षेत्र के संघर्षशील युवा भला कैसे खामोश रह सकते थे। सूखते जलस्रोतों के कारण गायब हो रही हरियाली और भविष्य के पेयजल संकट से चिन्तित इन उत्साही युवाओं ने चौंदकोट क्षेत्र में पुरखों के बनाए चाल-खालों को पुनर्जीवन करने का संकल्प लिया। यह वही चौंदकोट क्षेत्र है जहाँ वर्ष 1951 में इस क्षेत्र के हजारों पुरुषार्थियों ने श्रमदान के बूते चन्द दिनों में ही 30-30 किमी के मोटर मार्गों का निर्माण कर डाला।<br /><br /> कुछ दशकों से चौंदकोट क्षेत्र में पानी की समस्या लगातार गहराती गई। नतीजा, क्षेत्र में हरियाली का गायब होना, गाँवों से बेतहाशा पलायन का बढ़ना आदि आदि। हालात से व्यथित क्षेत्र के युवाओं ने अपने पुरखों का अनुसरण करते हुए क्षेत्र में चाल-खालों को पुनर्जीवन देने का संकल्प लिया। बस एक वर्ष बाद जल संरक्षण के इस लोक विज्ञान के कारण जलधारों का पानी वापस लौटता दिखाई दिया। अब तो आस-पास के लोग डुगरा गाँव का अनुसरण करने लग गए हैं। डबरा चमनाऊं निवासी सुधीर सुंद्रियाल दिल्ली स्थित मल्टीनेशनल कम्पनी में लाखों का पैकेज छोड़ गाँव में जल संरक्षण के काम में लग गए। <br /><br /> चार वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद सुधीर ने गाँव के जलस्रोतों का पानी वापस लौटा पाया। वह मानता है कि जल संरक्षण की जो पुरातन पद्धति पूर्वजों ने इजाद की हुई है उसे कम-से-कम सरकार अनिवार्य कर दे तो पहाड़ के गाँव पानी की समस्या का सामना नहीं करेंगे। उन्होंने तो अपने गाँव में वर्षाजल एकत्रिकरण के लिये चाल-खाल की परम्परा को अपनाया है। यही वजह है कि गाँव में पेयजल से लेकर सिंचाई के साधन उपलब्ध हो पा रहे हैं।<br /><br /><b>अब वन विभाग की समझ बनी</b><br /><br /> बताया जाता है कि पूर्वजों द्वारा जंगलों में बनाई गई चाल-खाल इसलिये नष्ट हुईं कि वन विभाग ग्रामीणों को वनों में कुछ करने से पहले कानून के डरावने डंडे का खौप दिखाते थे। जिस कारण जल संरक्षण की यह लोक परम्परा नेस्तनाबूद हुई और पहाड़ों के गाँव में पानी का संकट बड़े पैमाने पर सामने आया। खैर! देर आये दुरस्त आये वाली कहावत यहाँ वन विभाग पर चरितार्थ होती है। <br /><br /> ज्ञात हो कि लम्बे इन्तजार के बाद ही सही आखिरकार वन महकमे को बारिश की बूँदों का मोल समझ आ ही गया। राज्य में हर साल बड़े पैमाने पर आग से तबाह हो रही वन सम्पदा को बचाने के लिये उसने वर्षाजल संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। बताया जाता है कि वन विभाग मानसून सीजन में ही वनों में जलाशय और जलकुंडों के जरिए लगभग 17 करोड़ लीटर पानी को एकत्रित करने का काम करने जा रहा है। जिस हेतु वे खाल-चाल, ट्रैंच व चेकडैम जैसे कार्यों को क्रियान्वित करने जा रहे हैं। वन विभाग का तर्क है कि जल संरक्षण के इस लोक ज्ञान के कारण एक तो पानी के रिचार्ज के काम होंगे दूसरी तरफ वनों में लगने वाली आग पर काबू पाया जा सकता है।<br /><br /><b>बरसात के पानी का इस्तेमाल हो</b><br /><br /> बता दें कि उत्तराखण्ड में साल भर में सामान्य तौर पर 1581 मिमी वर्षा होती है, जिसमें मानसून सीजन का योगदान 1229 मिमी का है। बारिश का यह पानी यूँ ही जाया न हो, इसे सहेजने के लिये वन महकमे ने जंगलों में तीन हजार जलाशय व जलकुंड तैयार करने आरम्भ कर दिये हैं। जिनकी क्षमता 16.75 करोड़ लीटर है। इसके साथ ही 12 हजार ट्रैंच, चेकडैम भी तैयार किये गए हैं। यही नहीं, वनों में वर्षाजल संरक्षण के लिये पारम्परिक तौर तरीकों खाल-चाल पर भी फोकस किया जा रहा है। प्रमुख मुख्य वन संरक्षक उत्तराखण्ड जयराज के मुताबिक इस बार 20 लाख से अधिक खाल-चाल (तालाबनुमा छोटे-बड़े गड्ढे) बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। जलाशय, जलकुंड, टैंच, खाल-चाल, चेकडैम के जरिए बड़े पैमाने पर वर्षाजल को वनों में रोकने की तैयारी है।<br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333201&amp;2=comment&amp;3=comment" token="nbYsEfmz3XWWxxG60HNakD9ld8AASsWfIn9C1GB1HcQ"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/water-conservation-in-mori-uttarkashi" data-a2a-title="जल संरक्षण कर पानीदार हुआ मोरी"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fwater-conservation-in-mori-uttarkashi&amp;title=%E0%A4%9C%E0%A4%B2%20%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3%20%E0%A4%95%E0%A4%B0%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%86%20%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%80"></a></span> Mon, 20 Aug 2018 10:30:01 +0000 editorial 1319333201 at http://hindi.indiawaterportal.org इजराइली तरीके से बारिश का पानी तिजोरी में http://hindi.indiawaterportal.org/israel-water-technology-in-Malwa <span>इजराइली तरीके से बारिश का पानी तिजोरी में</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Tue, 08/07/2018 - 16:14</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><span class="inline inline-left"><img alt="पानी से लबालब भरा प्रहलाद का तालाब" class="image image-_original" height="300" src="https://farm2.staticflickr.com/1814/43184041294_f49369e280.jpg" title="पानी से लबालब भरा प्रहलाद का तालाब" width="400" /><span class="caption" style="width: 100%"><i>पानी से लबालब भरा प्रहलाद का तालाब</i></span></span>आपने शायद ही कभी सुना होगा कि बारिश के पानी को तिजोरी में रखा जाता हो, लेकिन मालवा के किसान अपने खेतों पर इसे साकार कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिये बाकायदा जमीन पर लाखों की लागत से पॉलिथीन बिछाकर बारिश से पहले ही इस पानी को इजराइली तरीके से अपनी तिजोरी में स्टोर करने की पूरी तैयारी कर रखी थी। इस बारिश का करोड़ों लीटर पानी अब इसमें संग्रहित हो चुका है, जो गर्मियों में भी फसल लहलहाएगा। मालवा के कई खेतों पर बीते दो सालों में ऐसी तिजोरियाँ (पॉलिथीन के कृत्रिम तालाब) बनाई गई हैं।<br /><br /> पानी को बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ बरसाती पानी को बचाया जा सकता है। इसलिये अब लगातार पानी के लिये परेशान होते किसानों को यही रास्ता दिखाई दे रहा है। मालवा निमाड़ में खेती के लिये अब ऐसी कई तकनीकें इस्तेमाल की जा रही हैं, जिनसे बारिश के पानी को सहेजा जा सके। इजराइल में पानी की कमी से ऐसी कई तकनीकें पहले से इस्तेमाल की जा रही हैं। इजराइल सिर्फ हथियार और युद्ध का प्रशिक्षण ही नहीं देता, बल्कि पानी बचाने की नायाब तकनीकें भी सीखा रहा है। अपनी युद्धकला के लिये मशहूर इजराइल से डिग्रीधारी किसानों ने पानी बचाने की सीख ली है।<br /><br /> मध्य प्रदेश में इन्दौर के पास तिल्लौरखुर्द के किसान चिन्तक पाटीदार ने सीए की पढ़ाई छोड़कर खेती को अपनाया है। उन्होंने अपने खेत पर पॉली पोंड तैयार किया है। इस तरह के तालाब इसी गाँव में पाँच बन चुके हैं। पूरे इन्दौर इलाके में 40 तालाब इसी साल बनाए गए हैं। चिन्तक के पास 20 बीघा जमीन है। सवा बीघा में तालाब तैयार किया है। इसकी लागत 6 लाख रुपए आई है। महज 15 दिन में पोकलैंड मशीन से खुदाई की गई है। इसकी लम्बाई 165 फीट और चौड़ाई 185 फीट है जबकि गहराई 20 फीट है। इसमें डेढ़ करोड़ लीटर पानी की क्षमता है।<br /><br /> चिन्तक बताते हैं- <b>"बारिश के पानी के बाद तीन बोरिंग और एक कुएँ से अब तक सोयाबीन के बाद आलू की फसल ले लेते थे। लेकिन उसके बाद तीसरी फसल प्याज बोने तक पानी सूख जाता। तीसरी फसल प्याज के लिये इस स्टोर पानी का इस्तेमाल करेंगे। अनुमान है कि एक ही सीजन में प्याज की फसल से तालाब की लागत वसूल हो जाएगी। पानी की कमी तथा अन्य कारणों से खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसी हालत में यह सबसे जरूरी है कि हर किसान पानी के मामले में आत्मनिर्भर हो।"</b><br /><br /> वे आश्वस्त हैं कि इससे इस साल पूरी जमीन में सिंचाई हो सकेगी। इसमें मछलीपालन भी किया जा सकता है। इसके अलावा तालाब के लबालब भरे होने से इससे सायफन आधारित सिंचाई हो सकेगी तो बिजली या डीजल का खर्च भी बच सकेगा। इलाके में इस तरह के तालाब तेजी से बनाए जा रहे हैं। हालांकि यह बहुत महंगी प्रक्रिया है और आम किसान इसका इस्तेमाल शायद ही कर सके पर यह दिखाता है कि हमने पानी बचाने और सहेजने के जिन परम्परागत सहज और सस्ते तरीकों को भुला दिया उनकी एवज में आज हमें कितने महंगे और श्रमसाध्य तरीकों पर निर्भर रहना पड़ता है।<br /><br /> गौरतलब है कि मध्य प्रदेश और खासकर मालवा-निमाड़ के जिलों में खेती के लिये पानी सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। हर साल गर्मी का मौसम आते ही भूजल स्तर तेजी से गिरने लगता है और पानी के लिये हाहाकार शुरू हो जाता है। सत्तर के दशक में खेती के लिये नलकूपों के बढ़ते चलन से बड़े पैमाने पर किसानों ने बैंक से कर्ज लेकर बोरिंग और विद्युत मोटरों के जरिए धरती के पानी को गहरे तक जाकर उलीचा है। इसे सिंचाई के एकमात्र विकल्प के रूप में माना जाने लगा।<br /><br /> वर्ष 1975 से 1990 तक के 15 सालों में ही अकेले मालवा-निमाड़ इलाके में 18 फीसदी हर साल की दर से नलकूप खनन में बढ़ोत्तरी हुई। जबकि 1991 से 2018 में यह दर करीब 30 फीसदी तक पहुँच गई। नतीजतन अब गाँव-गाँव नलकूपों की संख्या 300 से 1000 तक है। परम्परागत संसाधनों को भुला कर करोड़ों साल से धरती में जमा बैंक बैलेंस की तरह पानी का उपयोग इस हद तक हुआ कि हमारे यहाँ नलकूपों से ही करीब 60 फीसदी सिंचाई होने लगी यानी अब हम ज्यादा-से-ज्यादा भूजल पर ही आश्रित होते जा रहे हैं।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/43184036694/in/dateposted-public/" title="प्रहलाद के खेत में आलू की फसल"><img alt="प्रहलाद के खेत में आलू की फसल" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/856/43184036694_2aafa2ae45.jpg" width="400" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>इन्दौर से 60 किमी दूर देवास जिले के चापड़ा के किसान प्रहलाद पाटीदार ने भी अपने खेत पर पॉली पोंड बनाया है। डेढ़ साल में वे इससे लागत का करीब दोगुना कमा चुके हैं। इसके लिये जमीन में 8 फीट गहराई तक खुदवाया तथा उसकी मिट्टी से जमीन सतह से ऊपर करीब 12 फीट की तालाब के आसपास पाल बनवाई है। इस तरह कुल 20 फीट के इस तालाब में जमा पानी को वे तिजोरी का पानी कहते हैं। इसमें सवा दो करोड़ लीटर पानी इकट्ठा रहता है। वे इस तालाब को दो तरह से इस्तेमाल करते हैं।<br /><br /> बारिश के वक्त इसमें बरसाती पानी इकट्ठा हो जाता है, जिसका उपयोग वे बारिश के बाद रबी की फसल में करते हैं। सर्दियों के बाद जब उनके खेत के कुएँ सूखने लगते हैं तो इन कुओं का पानी जल मोटर से उलीच कर इस पॉली पोंड में भर देते हैं। पालिथीन होने से इस पानी का वाष्पीकरण बहुत कम होता है। गर्मियों में भी काफी दिनों तक इसमें पानी भरा रह सकता है।<br /><br /> प्रहलाद पाटीदार बताते हैं- <b>"इस तालाब में गर्मियों के दिनों में भी पानी संग्रहित रहने से अपने 30 बीघा जमीन में आसानी से साल की तीन फसल होती है। कुछ सालों पहले तक तो जमीन बेचने का ही सोच रहा था। यहाँ पानी नहीं होने से दो फसल भी नहीं ले पाते थे। जमीनी पानी 900 से हजार फीट तक नीचे चला गया था। इसी खेत में 700 से 800 फीट गहराई तक दो-तीन सालों में एक के बाद एक 13 बोर करवाए लेकिन धूल उड़ती ही मिली। सिर पर 20 लाख का कर्जा अलग हो गया। इसी बीच किसी ने बताया कि महाराष्ट्र में कुछ किसानों ने पोलिथीन के कृत्रिम तालाब बनाए हैं तो सोचा कि देख लेना चाहिए। आइडिया अच्छा लगा और यहाँ आकर 60 हजार वर्गफीट में तालाब बनवाया।"</b><br /><br /> प्रहलाद बताते हैं, <b>"यह तालाब बन जाने के बाद 30 बीघा जमीन पर तीन फसल लेते हैं। करीब 7 बीघा में पहले प्याज लगाया, फिर आलू और फिर से प्याज। इसके अलावा बाकी जमीन में से 15 बीघा में गेहूँ, 2 बीघा में तरबूज और 7 बीघा में कद्दू की फसल ली है। खेत में ज्यादातर ड्रिप सिस्टम लगाया है ताकि पानी का किफायत से इस्तेमाल हो सके। फसल के साथ नगदी फसल के लिये डेढ़ बीघा में एप्पल बेर लगाए हैं। अब तक एक लाख से ज्यादा का बेच चुके हैं। बीते साल प्याज में ही इतनी बचत हुई कि तालाब की लागत से दोगुना बच गया। तालाब में कुल खर्च करीब साढे नौ लाख रुपए हुआ।"</b><br /><br /> वे अपने 30 बीघा जमीन को सिंचित करते हैं लेकिन उनके खेत के आसपास की बात करें तो पूरे बागली इलाके में सिंचाई तो दूर की बात आम लोगों और मवेशियों के लिये पीने के पानी की भी मारामारी रहती है। इस इलाके में सिंचाई के लिये इतने अधिक बोरवेल हो चुके हैं कि जलस्तर लगातार नीचे जाते हुए अब बहुत नीचे चला गया है। अधिकांश बोरवेल सूखे पड़े हैं।<br /><br /> अब प्रहलाद पाटीदार के खेत पर पानी की तिजोरी देखकर आसपास के गाँव में भी किसानों ने इसका अनुसरण करना शुरू कर दिया है। इस साल इलाके में करीब 20 से ज्यादा तालाब बारिश से पहले बनाए गए हैं और अब वे बरसाती पानी से लबालब हो चुके हैं। यहाँ से करीब 20 किमी दूर करनावद गाँव के किसानों ने ही 10 तालाब बनवाए हैं। इसके अलावा तीन छतरपुरा में, दो डेरिया साहू तथा दो तिस्सी गाँव में बनाए गए हैं।<br /><br /> किसान मोर्चा के मोतीलाल पटेल कहते हैं, <b>"ऐसे इलाकों में जहाँ जलस्तर बहुत नीचे चला गया है, यह तकनीक बड़ी कारगर है। देवास के बागली इलाके में बीते पचास सालों में पानी की किल्लत कभी नहीं आई। लेकिन उपज और मुनाफा बढ़ने की होड़ में इस तरफ हजारों बोरवेल किये गए हैं। इसी वजह से जलस्तर बहुत नीचे चला गया। किसान कर्ज में दब गए। अब यहाँ बोरवेल सक्सेस ही नहीं है तो किसान अब पाने के लिये अन्य तकनीकों को अपना रहे हैं। प्रदेश सरकार पॉली पोंड पर कुछ सब्सिडी भी देती है, लेकिन यह बहुत कम है। इसे बढ़ाने के लिये शासन स्तर पर प्रस्ताव भी भेजा गया है।”</b><br /><br /> इलाके के कृषि विस्तार अधिकारी सुरेन्द्र सिंह उदावत कहते हैं कि <b>यह एक अच्छी पहल है। अन्य किसानों को भी इसे अपनाना चाहिए। इससे पानी को सुरक्षित सहेजा जा सकता है तथा वक्त पर जरूरत में उपयोग कर सकते हैं। इसमें मछली भी पाली जा सकती है।</b><br /><br /> स्थानीय पत्रकार नाथूसिंह सैंधव बताते हैं कि बीते बीस सालों में पूरे मालवा क्षेत्र में ही पानी की जबरदस्त किल्लत महसूसी जाने लगी है। कुँए-तालाब पहले ही साथ छोड़ गए। इलाके की जीवनरेखा मानी जाने वाली कालीसिंध नदी भी बारिश के थोड़े दिनों बाद ही सूखने लगी। बोरवेल किसानों के लिये सिर दर्द बन गए। लाखों की लागत से करवाए गए बोरवेल भी गहरे होते जा रहे जलस्तर के साथ किसी काम के नहीं रहे। कई किसान तो बोरवेल की वजह से लाखों के कर्ज के तले दब गए। उनके घर की महिलाओं के जेवर-गहने बिक गए। पानी की कमी के चलते खेत बेचने की कगार पर आ गए। यहाँ की मिटटी खेत तालाब के लिये भी अनुकूल नहीं है। खेत तालाब का पानी मिट्टी सोख लेता है और वे भी सर्दियों के साथ ही सूख जाते हैं।<br /><br /> वे कहते हैं- <b>"ऐसी स्थिति में कड़ी मेहनत करने वाले किसानों के सामने भी अपनी आँखों के सामने सूखी जमीन देखते रहना और फसलों को सूखते हुए देखना नियति बन चुकी है। ऐसे में यह तकनीक अब किसानों में लोकप्रिय हो रही है। बड़े किसान इसे आसानी से अपना रहे हैं। हालांकि यह बहुत महंगी तकनीक है लेकिन जिस किसान के पास पानी ही नहीं हो, उसके लिये बोरवेल करवाने से ज्यादा कारगर तो है ही। किसान के लिये खेती में सबसे ज्यादा जरूरी पानी ही होता है।"</b><br /><br /> लाखों की लागत से कृत्रिम पॉलिथीन तालाब बनाने की नौबत आखिर क्यों आई तो इसकी वजहें भी साफ-साफ नजर आती हैं। सदियों से मध्य प्रदेश के मालवा इलाके को 'डग-डग रोटी, पग-पग नीर' के नाम से पहचाना जाता रहा है। मतलब यह कि यहाँ जलस्तर अच्छा होने तथा परम्परागत जलस्रोतों की सहज मौजूदगी से यह इलाक हरा-भरा बना रहता था। आज यही इलाका बूँद-बूँद पानी के लिये मोहताज होता जा रहा है। इधर कुछ सालों में मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया कि उसने प्रकृति से सिर्फ लेना-ही-लेना सीखा, इसका कुछ हिस्सा वह वापस लौटाना भूल ही गया।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/43184051124/in/dateposted-public/" title="अपने तालाब के साथ चिन्तक पाटीदार"><img alt="अपने तालाब के साथ चिन्तक पाटीदार" height="300" src="https://farm2.staticflickr.com/1794/43184051124_a901ce92a2.jpg" width="400" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>बारिश के पानी को न तो धरती में रंजाने की हमने चिन्ता की और न ही कभी हमारे परम्परागत जलस्रोतों को सहेजने की कभी कोई ईमानदार कोशिश की। बोरवेल आ जाने से हमने उन्हें लगभग बिसरा ही दिया। इधर लगातार धरती का पानी उलीचा जाता रहा। धरती का पानी नीचे गहराई में उतरने लगा तो भी किसी ने ध्यान नहीं दिया, बल्कि बोरवेल और गहरा करवा दिया। जिन नालियों, नदी-नालों और तालाबों के जरिए पानी धरती में धीरे-धीरे रंजता रहता था, वे कम से कमतर होते गए। कुएँ-कुण्डियाँ कचरा पेटी बन गए। परम्परागत खेती के तौर-तरीकों को छोड़कर ज्यादा मुनाफे की होड़ में हमने दूसरे देशों की भौगोलिक स्थिति समझे बिना वहाँ के बीज, फसलें, खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल तेज कर दिया।<br /><br /> इन्हीं सब कारणों से इन तीस सालों में पानी के मामले में हम कहाँ-से-कहाँ आ पहुँचे। जहाँ इन बीते सालों में हमने लाखों गैलन बरसाती पानी को व्यर्थ बह जाने दिया, अब हमें पानी के लिये लाखों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। यदि हमने पानी के लिये शुरू से ही ध्यान दिया होता तो शायद यहाँ तक नौबत ही नहीं आती। हालांकि आज भी समय है। जब जागे, तभी सबेरा की तर्ज पर अब भी बहुत कुछ किया जा सकता है। जरूरत है संकल्प शक्ति के साथ जमीन पर ठोस काम करने की। देश के कई इलाकों में इस तरह के काम शुरू भी हो चुके हैं, देखना है देश के बाकी लोग कब इसे अपनाते हैं। हमें अब पानी का मोल पहचानना ही होगा। अब भी नहीं पहचाना तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">israel water technology, israel water treatment technology, israel water management agriculture, israel water technology companies, israel water shortage solution, israel water desalination, israel water technology in india, israel water purifier, Water storage from Israeli technology, israel water treatment technology, gal water technologies, gal mobile water purifier, israel water purifier, gal mobile price, gal mobile water purification system, gal mobile water purification vehicle, israel farming technology in india, poly pond in malwa, horticulture fish farming, sericulture fish system, types of integrated fish farming, farm pond construction cost in india, integrated fish farming system, integrated fish farming in india, integrated fish farming ppt, integrated cattle fish farming, poly pond in india.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333163&amp;2=comment&amp;3=comment" token="qgBttNgc4QxGomnTDmFBa1Uj2kRrN3J5j3lkVnZQ0_Y"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/israel-water-technology-in-Malwa" data-a2a-title="इजराइली तरीके से बारिश का पानी तिजोरी में"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fisrael-water-technology-in-Malwa&amp;title=%E0%A4%87%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A5%80%20%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B6%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82"></a></span> Tue, 07 Aug 2018 10:44:08 +0000 editorial 1319333163 at http://hindi.indiawaterportal.org आदिवासियों ने विकसित किया वाटर सप्लाई सिस्टम http://hindi.indiawaterportal.org/mamadoh-developed-water-supply-system <span>आदिवासियों ने विकसित किया वाटर सप्लाई सिस्टम</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>editorial</span></span> <span>Sun, 07/29/2018 - 15:18</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/42991532814/in/dateposted-public/" title="ग्रामीणों की मेहनत से पानीदार हुआ मामाडोह"><img alt="ग्रामीणों की मेहनत से पानीदार हुआ मामाडोह" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/857/42991532814_d4063b2c3f.jpg" width="400" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>एक गाँव ने अपना खुद का वाटर सप्लाई सिस्टम विकसित कर सबको चौंका दिया है। यह गाँव बीते 15 सालों से भीषण जलसंकट का सामना कर रहा था लेकिन कुछ ही दिनों की मेहनत में गाँव के लोगों ने पानी का खजाना ढूँढकर उसे सहेज लिया। जहाँ पहले पानी की तलाश में औरतें तीन से पाँच किमी तक की दूरी तय करती थीं अब उन्हें अपने घर के दरवाजे पर लगे नल से ही पानी मिल जाता है। अब न किसी को पलायन करना पड़ रहा है और न ही अपने मवेशी बेचने पड़ रहे हैं।<br /><br /> मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के आदिवासी बाहुल्य इलाके खालवा विकासखण्ड में 32 किमी दूर जंगल के बीच एक छोटा-सा गाँव है, मामाडोह। धावड़ी पंचायत के इस गाँव की आबादी करीब डेढ़ हजार है जिसमें ज्यादातर कोरकू जनजाति के आदिवासी परिवार ही हैं।<br /><br /> पच्चीस साल पहले तक पानी की कोई दिक्कत ही नहीं थी। एक कुआँ एवं आसपास कुछ और कुएँ या झिरियाँ थीं। दो-चार हाथ की रस्सी पर पानी आसानी से मिल जाया करता था। गाँव से कुछ दूरी पर जनवरी तक नाला बहता था। आसपास घना जंगल हुआ करता था और इनके पूर्वज उसी जंगल के प्राकृतिक परिवेश में घुल-मिलकर रहते आये थे। जंगल के कई राज इन्हें पता हैं और यहाँ के चप्पे-चप्पे से इनकी गहरी पहचान है। वनोपज पर आश्रित रहते हुए भी इन्होंने हमेशा जंगलों को संरक्षित किया है।<br /><br /> लेकिन बीते सालों में पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई के बाद अब इलाके में भी पहले जैसे जंगल नहीं बचे हैं। अब इनके परिवार का पालन-पोषण छोटी जोत वाली खेती और मेहनत-मजदूरी के कामों के बल पर होता है। इनके सामने रोटी के साथ ही पानी का भी संकट था। परम्परागत जलस्रोतों की उपेक्षा तथा पानी के लापरवाहीपूर्ण उपयोग ने इस आदिवासी क्षेत्र में पानी अब बड़ी समस्या बनता जा रहा है। साफ पानी नहीं मिलने से इलाके के लोगों को झीरी या खेतों के कुओं, हैण्डपम्पों आदि के अलावा जहाँ से भी जैसा पानी मिले, उसे ही पीना पड़ता है। कई बार दूषित पानी पीने से इलाके में लोगों को कई तरह की बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है।<br /><br /> स्पंदन समाज सेवा समिति की सीमा प्रकाश बताती हैं कि <b>बीते कुछ सालों में इधर का पर्यावरण भी खराब हुआ है तथा जमीनी पानी का स्तर लगातार नीचे गया है। अकेले मामाडोह गाँव की ही बात नहीं, इस पूरे ब्लॉक में ही कमोबेश यही स्थिति है। लेकिन खुशी की बात यह है कि अब यहाँ के आदिवासियों ने पानी की कीमत पहचान ली है और वे गाँव-गाँव पानी बचाने की जुगत में लगे हैं।</b> इस क्षेत्र के महिलाओं के हौसले की भी दाद देनी होगी। 11 गाँवों की 500 से ज्यादा औरतों ने खुद अपनी मेहनत से 10 जलस्रोतों को पुनर्जीवित किया है और जल संकट से मुक्ति पाई है। इससे करीब 10 हजार आदिवासियों को फायदा हुआ है और ये गाँव अब पानी के लिये आत्मनिर्भर हो चुके हैं।<br /><br /> हमारे साथ चल रहे प्रकाश भाई बात को आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि इसकी बानगी खंडवा से सौ किमी दूर चबूतरा गाँव के तालाब में देखी जा सकती है। कभी दिसम्बर-जनवरी में सूख जाने वाला तालाब इस गर्मी में भी सूखा नहीं है। महीने भर पहले तक यहाँ गाँव की औरतें मछलीपालन करती रहीं। इस तालाब को खुद औरतों ने गैंती-तगारी उठाकर जिन्दा किया है। बीते साल इस गाँव में पीने के पानी तक की किल्लत रही। औरतें दूर-दूर के खेतों से पानी लाती थी। लेकिन इस बार तालाब में पानी होने से ऐसी कोई परेशानी नहीं हुई। लोग बुधियाबाई की तारीफ करते नहीं अघाते, जिसने सबसे पहले स्पन्दन की प्रेरणा से गाँव में तालाब सँवारने का बीड़ा उठाया। फिर तो औरतें जुटती गई।<br /><br /> इलाके के जमाधड और जमोदा में भी लोगों ने तालाब सहेजा तो पानी की कमी नहीं रही, जलस्तर बढ़ गया और पुराने ट्यूबवेल भी पानी देने लगे। इसी तरह मीरपुर, मोहन्या ढाना, फोकटपुरा, जमोदा और मातापुरा में गाँव के लोगों ने पीढ़ियों पुराने उपेक्षित पड़े कुओं को सँवारा और अब गर्मियों में बिना किसी परेशानी के उन्हें पानी मिल रहा है। इतना ही नहीं इलाके के कई गाँवों से होकर एक छोटी-सी नदी बहती है, इसका नाम है बंगला नदी। कुछ सालों पहले तक इस नदी में मार्च के महीने तक अच्छा पानी रहता था, लेकिन अब तो यह बारिश के बाद ही सूखने लगी है।<br /><br /> कुछ गाँव की औरतों ने अपने नजदीक से बहने वाली इस नदी में भी अपनी गैंती चलाई और देखते-ही-देखते बरसों से जमा गाद को हटाया तो इस साल से इसमें भी पर्याप्त पानी रहने लगा है। यहाँ की महिलाओं ने बीते साल खूब काम किया है। उसी से प्रेरणा लेकर अब आसपास के गाँव के लोग भी इस साल अपने गाँवों में यही कहानी दोहरा रहे हैं। इस बार छोटी नदियों और नालों पर लोग कई जगह बोरी बंधान बन रहे हैं ताकि बरसात के व्यर्थ बह जाने वाले पानी को गाँव के नजदीक ही रोका जा सके। इसका पानी तो काम आएगा ही, इलाके का जलस्तर भी बढ़ा देगा।<br /><br /> अब बात मामाडोह की, यहाँ दस-पन्द्रह साल पहले गर्मियों के दौरान कुएँ में पानी की कमी आने लगी तो सरकारी अफसरों ने कुछ हैण्डपम्प लगा दिये। हैण्डपम्प से पानी भरना आसान हो गया तो लोगों ने कुएँ की ओर ध्यान देना कम कर दिया। धीरे-धीरे पूरा गाँव ही यहाँ के चार हैण्डपम्प पर निर्भर हो गया। उधर साल-दर-साल कुआँ गाद और कचरे से भरता रहा।<br /><br /> थोड़े ही दिनों में चार में से दो हैण्डपम्प बन्द हो गए तो पानी की किल्लत महसूस हुई। देखा तो हैण्डपम्प में पानी ही नहीं था। जलस्तर नीचे चला गया। खैर, दो हैण्डपम्प अभी भी पानी दे रहे थे। लेकिन कुछ साल पहले इनमें भी पानी की उपलब्धता कम हो गई। गर्मियों में तो ये आधे गाँव को भी पानी नहीं पिला पाते थे। ऐसे में शुरू हुई गाँव के लिये पानी की तलाश। कोई किसी खेत के कुएँ से पानी भर लाता तो कोई किसी ट्यूबवेल से। तीन से पाँच किमी तक घूम-घूम कर औरतों को अपने सिर पर घड़े रखकर लाना पड़ता था। बच्चों को भी स्कूल के बदले पानी लेने जाना पड़ता था जिससे परिवार में एक घडा पानी ज्यादा आता था।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/42991523074/in/dateposted-public/" title="कुएँ की सफाई करते ग्रामीण"><img alt="कुएँ की सफाई करते ग्रामीण" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/940/42991523074_e609fb222b.jpg" width="400" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>पीने के पानी का इन्तजाम तो फिर भी जैसे-तैसे हो जाया करता लेकिन मवेशियों को क्या पिलाएँ। हालात इतने गम्भीर हो गए कि यहाँ के कई मवेशी पालकों को अपने बाड़े के अधिकांश दुधारू गाय-भैंसों को औने-पौने दामों में बेच देना पड़ा। इतना ही नहीं कई परिवार तो हर साल गर्मियों में यहाँ से पानी और रोटी की तलाश में बाहर पलायन करने लगे। साल-दर-साल घर के कमाने लायक महिला-पुरुष बाहर चले जाते और गर्मियों के दिनों में बुजुर्ग ही बच जाया करते। पूरा गाँव वीरान हो जाया करता था। बीते दस सालों से इस गाँव में ऐसा ही चल रहा था। पानी नहीं होने से लोगों की परेशानियाँ बढ़ रही थीं। ग्रामीण आदिवासियों ने तहसील से लगाकर जिला मुख्यालय तक पानी के लिये गुहार लगाई लेकिन पानी था कहाँ? जब गाँव की जमीन में ही पानी नहीं बचा तो सरकारी अफसर भी पानी कहाँ से लाते।<br /><br /> इसी बीच कोरकू आदिवासियों के बीच काम करने वाली संस्था स्पंदन समाज सेवा समिति के कार्यकर्ता गाँव पहुँचे तो औरतों ने उन्हें साफ तौर पर बताया कि पानी के बिना यहाँ किसी तरह का कोई विकास सम्भव नहीं है। स्पंदन के कार्यकर्ताओं ने भी यह बात मानी कि गाँव में पानी ही नहीं तो विकास की बात बेमानी है।<br /><br /> सीमा प्रकाश ने गाँव के सब लोगों की एक बैठक बुलाकर कहा कि पानी के लिये काम करना है तो हम सबको एकजुट होकर मेहनत करना पड़ेगा। पानी कहीं बाहर से नहीं आएगा। वह तो यहीं की जमीन से निकलेगा पर हम सबको अपनी गलती का प्रायश्चित करते हुए अब पानी के मोल को पहचानना पड़ेगा।<br /><br /> आदिवासी आदमी-औरतों ने इस बात पर सहमति तो जताई लेकिन उनके सामने बड़ा सवाल यह था कि वे पन्द्रह-बीस दिनों तक गाँव में पानी के लिये काम करेंगे तो मजदूरी पर नहीं जा पाएँगे और इस बीच अपने परिवार की रोटी का इन्तजाम कैसे होगा?<br /><br /> इस पर स्पंदन ने भरोसा दिलाया कि वे गूँज के सहयोग से जितने दिन भी गाँव के लोग श्रमदान करेंगे, उनके लिये अनाज उपलब्ध कराएँगे। बात बन गई और तब शुरू हुई गाँव में पानी की खोजबीन। बुजुर्गों ने बताया कि गाँव में करणसिंह का कुआँ मिट्टी के ढेर में बदलता जा रहा है। यदि उसे किसी तरह साफ कर बारिश के पानी से भर लिया जाये तो अगले साल से पानी की किल्लत नहीं होगी। यह कुआँ हमारी पिछली पीढ़ियों की प्यास बुझाता रहा है।<br /><br /> ग्रामीणों ने उसी बैठक में तय किया कि सबसे पहले पानी के काम की शुरुआत यहीं से की जाएगी। यह बात ज्यादा पुरानी नहीं है। इसी साल के फरवरी महीने की है। इस कुएँ को साफ करना और फिर से जमीन में मिट्टी से पट चुकी इसकी आव (जलधारा) को ढूँढना मुश्किल काम था लेकिन जब पूरा गाँव गैंती-तगारी लेकर जुट गया तो फिर क्या मुश्किल। सामूहिक प्रयासों ने अपना रंग दिखाया और पन्द्रह दिनों में ही इसकी काया पलट हो गई। इस काम में 144 मानव दिवस लगे और यही काम यदि सरकारी प्रयासों से किया जाता तो करीब दो से तीन लाख रुपए खर्च होते।<br /><br /> ग्रामीणों के उत्साह का ठिकाना न रहा जब कुएँ की गाद हटाते हुए अनायास बरसों पुरानी आव (जलधारा) फिर से फूट पड़ी। फरवरी के महीने में कुएँ में पानी देखकर गाँव के लोग चकित थे। पानी धीरे-धीरे बढ़ता गया और देखते-ही-देखते कुआँ भरने लगा। अब आगे खुदाई करना मुश्किल था, लिहाजा काम रोक दिया गया।<br /><br /> कुएँ में पर्याप्त पानी आ गया तो ग्रामीणों ने स्थानीय पंचायत से आग्रह किया कि वे कुएँ में मोटर लगा दें तो गाँव में पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति की जा सकती है। इसके लिये जरूरी बिजली खर्च आदि के लिये वे हर महीने बिल दे सकते हैं। पंचायत ने अफसरों से बात की और एक महीने में पानी घर-घर तक पहुँचने लगा। श्रमदान करने वाली राधाबाई ने बताया <b>“पहले हमें पानी के लिये दूर-दूर खेतों तक जाना पड़ता था। लेकिन इस साल इस भीषण गर्मी के बावजूद भी गाँव की औरतों को पानी की तलाश में भटकना नहीं पड़ा”।</b> उसने कहा कि <b>हमें तो लगता था कि बारिश के बाद हमें इस कुएँ से पानी मिल सकेगा लेकिन हमें तो पन्द्रह दिनों में ही मिल गया। बरसों तक हम सरकारों और अफसरों से गुहार लगाते रहे। काश यह काम हम पहले ही कर लेते तो सालों तक यूँ तकलीफ नहीं भुगतनी पड़ती।</b><br /><br /> बड़ी बात यह है कि अब ग्रामीण पानी का मोल समझ गए हैं और उन्हें लगता है कि यह सब उन्हीं के प्रयासों से हुआ है तो वे खुद इस वाटर सप्लाई सिस्टम की मानिटरिंग करते हैं। कहीं पानी बह रहा हो तो सब मिलकर उसे रोकते हैं। अब तक गाँव के 80 में से पचास परिवारों के घर के दरवाजे पर नल लगे हैं। बाकी 30 परिवार इन्हीं नलों से पानी भर लेते हैं। हर दिन सुबह एक घंटे और शाम को एक घंटे नल खोले जाते हैं।<br /><br /> दूरस्थ अंचल में बसे मामाडोह जैसे छोटे से गाँव के कोरकू आदिवासी समाज के लोग, जिन्हें हम आमतौर पर अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा मानते हैं, पानी की समझ के मामले में कई पढ़े-लिखे और समृद्ध गाँवों के लिये मिसाल बन गए हैं। ग्रामीणों के इस कारनामे के आगे नत-मस्तक हुआ जा सकता है। खुद का पसीना बहाकर ही हम पानीदार बन सकते हैं। पसीने के सिवा इसका कोई विकल्प नहीं। सच भी है जो समाज पानी के लिये एकजुट होकर प्रयास नहीं करेगा तो उसे पानी मिल ही नहीं सकता।<br /><br /> देश के लाखों गाँव नासमझी के चलते आज भयावह जल संकट का सामना कर रहे हैं। ऐसे तमाम गाँवों को मामाडोह और इसके आसपास के गाँवों से पानी को सहेजना और उसके मोल की पहचान करने का तरीका सीखने की जरूरत है। किसी भी सूरत में पानी को बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ बचाया जा सकता है। इतनी छोटी-सी बात भी हमारे पढ़े-लिखे समझदार तबके को आखिर कब समझ आएगी। यह जिम्मेदारी समाज को ही खुद अपने हाथों में लेनी होगी, इसे कोई भी सरकार ठीक ढंग से नहीं कर सकती।</p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><b><b><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></b></b></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><b><b><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">mamdoh village, khalava block, khandwa, madhya pradesh, water management, water crisis, water harvesting, ground water recharge.</span></span></b></b></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333140&amp;2=comment&amp;3=comment" token="aSgMChQD3q7CbJb_XDOXXRjU1U6FQb2f3p-ucIZnkyE"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/mamadoh-developed-water-supply-system" data-a2a-title="आदिवासियों ने विकसित किया वाटर सप्लाई सिस्टम"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fmamadoh-developed-water-supply-system&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%A4%20%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%20%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%B0%20%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88%20%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%AE"></a></span> Sun, 29 Jul 2018 09:48:08 +0000 editorial 1319333140 at http://hindi.indiawaterportal.org मधेश्वर नेचरपार्क द्वारा ग्राम पंचायत भंडरी का विकास http://hindi.indiawaterportal.org/madheshwar-nature-park-and-economic-growth <span>मधेश्वर नेचरपार्क द्वारा ग्राम पंचायत भंडरी का विकास</span> <span><span>editorial</span></span> <span>Thu, 07/26/2018 - 14:30</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">आशीष कुमार तिवारी</div> </div> </div> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">कुरुक्षेत्र, अप्रैल, 2018</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><br /><span class="inline inline-right"><img alt="मधेश्वर नेचरपार्क" class="image image-_original" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/839/42744794745_3e7106dc77.jpg" title="मधेश्वर नेचरपार्क" width="400" /><span class="caption" style="width: 300px"><i>मधेश्वर नेचरपार्क</i></span></span>मयाली गाँव में मधेश्वर में स्थित वनों का संरक्षण ग्रामीणों द्वारा किया जाता है तथा नए वृक्षों का रोपण वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है जिससे वहाँ के वन अब व्यवस्थित नजर आते हैं। सभी ग्रामीण पर्यावरण के महत्त्व को समझते हुए अपने घर में कम-से-कम 5 वृक्ष अवश्य लगाते हैं जिसमें मुनगा, पपीता, नीबू, आँवला तथा आम हैं जिससे भंडरी ग्राम पंचायत में आज चारों ओर हरियाली-ही-हरियाली है।<br /><br /> छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जशपुर जिला मुख्याल से 35 किलोमीटर की दूरी पर राजकीय राजपथ क्रमांक 78 परचरई डांड के समीप मयाली ग्राम स्थित है मधेश्वर। वहाँ स्थित एक पहाड़ है जिसकी आकृति शिवलिंग जैसी है। ग्रामीण इसकी पूजा करते हैं और इसे विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग होने का गौरव प्राप्त है। वर्तमान में यहाँ वन विभाग द्वारा नेचरपार्क का निर्माण किया गया है जिससे सम्पूर्ण भंडरी ग्राम पंचायत को फायदा हो रहा है तथा भंडरी ग्राम पंचायत की वित्तीय स्थिति में गुणोत्तर विकास हुआ है।<br /><br /> मनुष्य के प्रगतिशील बने रहने के लिये आवश्यक है कि उसे अवकाश मिले। जिस प्रकार किसी औजार से निरन्तर काम करते रहने पर उसकी धार मंद हो जाती है और उसकी धार को तेज बनाने हेतु उसे कुछ समय विश्राम देना पड़ता है ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी यदि निरन्तर काम करता रहे तो उसकी क्षमता प्रभावित होती है। अतः कार्यक्षमता को प्रभावी बनाए रखने के लिये आवश्यक है कि मनुष्य भी अवकाश ले और ऐसे स्थान पर समय बिताए जहाँ प्रकृति अपनी अनूठी छवि के साथ विराजित हो। ऐसा स्थान प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों हो सकते हैं।<br /><br /> मयाली ग्राम में पहले अत्यधिक वन सम्पदा बाँस के रूप में थी परन्तु ग्रामीणों द्वारा उसका निरन्तर दोहन किया गया जिससे वहाँ के बाँस वनों की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई और बाँस के वन वहाँ नाममात्र के बचे। ऐसी स्थिति में वन विभाग हरकत में आया और पर्यावरण चेतना केन्द्र के रूप में मयाली गाँव को चिन्हांकित करते हुए वहाँ की बंजर जमीन में कृत्रिम झील का निर्माण किया और नेचर पार्क हेतु कुल 3 चरणों में 36.22 लाख रुपए खर्च किये जिसमें शामिल हैं- आधुनिक टेंट निवास हेतु भोजन हेतु कैंटीन, बच्चों हेतु चिल्ड्रस पार्क, झील में भ्रमण हेतु आधुनिक बोट इत्यादि।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/43601291982/in/dateposted-public/" title="मयाली गाँव के झील में सैर करने की भी व्यवस्था है"><img alt="मयाली गाँव के झील में सैर करने की भी व्यवस्था है" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/847/43601291982_a2008f8ddf.jpg" width="424" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>इन सभी की व्यवस्था हेतु ग्रामीणों के एक स्वयंसहायता समूह का निर्माण किया गया और इसकी देखरेख की जिम्मेदारी समूह को प्रदान की गई। समूह में कुल 20 सदस्य हैं। मधेश्वर नेचरपार्क की बदौलत आज मयाली गाँव को किसी पहचान की आवश्यकता नहीं है। छुट्टी के दिन यहाँ आने वाले सैलानियों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है। आज मयाली गाँव की रूपरेखा ही बदल गई है। पूरे नेचरपार्क का प्रबन्धन देवबोरा पर्यावरण जागरुकता समूह द्वारा किया जाता है।<br /><br /><b>मधेश्वर नेचरपार्क द्वारा भंडरी ग्राम पंचायत का विकास-</b> भंडरी ग्राम पंचायत में सैलानी घूमने आते हैं जिससे वहाँ के निवासियों को अतिरिक्त आय के साधन मिले हैं। जैसे रोजमर्रा की जरूरतों हेतु दुकानें, मोटर मैकेनिक, खिलौना, फुग्गा इत्यादि से सम्बन्धित दुकानें खुली हैं।<br /><br /> नेचरपार्क में भ्रमण हेतु विभिन्न सरकारी विभाग के अधिकारी भी आते रहते हैं जिससे वहाँ संचालित होने वाली विभिन्न सरकारी योजनाओं का निरीक्षण एवं क्रियान्वयन भी तेजी से होता है। तत्कालीन कलेक्टर श्री हिमशिखर गुप्ता स्वयं भी भ्रमण हेतु मयाली जा चुके हैं। वहाँ स्थित वनों का संरक्षण ग्रामीणों द्वारा किया जाता है तथा नए वृक्षों का रोपण वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है जिससे वहाँ के वन अब व्यवस्थित नजर आते हैं।<br /><br /> सभी ग्रामीण पर्यावरण के महत्त्व को समझते हुए अपने घर में कम-से-कम 5 वृक्ष अवश्य लगाते हैं जिसमें मुनगा, पपीता, नीबू, आँवला तथा आम हैं जिससे भंडरी ग्राम पंचायत में आज चारों ओर हरियाली-ही-हरियाली है। कृत्रिम झील में मछली बीज डाला जाता है तथा उस झील की नीलामी की जाती है जिससे ग्राम पंचायत की आमदनी बढ़ी है और इस आय से ग्राम पंचायत के विकास कार्यों मे तेजी आई है। पहले कृषि कार्य हेतु पानी की अनुपलब्धता थी परन्तु अब भंडरी ग्राम पंचायत में भूजल स्तर सुधरा है वहाँ के सभी हैण्डपम्प जो पहले सूखे थे उन सभी में पानी आ गया है।<br /><br /><b>पर्यावरण की जानकारी</b><br /><br /> वहाँ सैलानी दूर-दूर से आते हैं और प्रकृति से अपने आप को जोड़ते हैं। कई स्कूली बच्चों का कैम्प यहाँ लगाया गया है। स्कूली बच्चे वहाँ रहकर पर्यावरण को निकटता से महसूस करते हैं। उनके द्वारा मधेश्वर पहाड़ पर पर्वतारोहण किया जाता है; विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप किये जाते हैं जिससे उनका सर्वांगीण विकास सम्भव दिखता है।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/41840307800/in/dateposted-public/" title="मधेश्वर नेचरपार्क में खेलते बच्चे"><img alt="मधेश्वर नेचरपार्क में खेलते बच्चे" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/935/41840307800_37bbbaf39c.jpg" width="424" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><b>पार्किंग सुविधा</b><br /><br /> पंचायत द्वारा वहाँ पार्किंग की सुविधा प्रदान की गई है, जिस पर नियंत्रण पंचायत के बेरोजगार नवयुवकों को दिया गया है जिससे उनकी बेरोजगारी दूर हुई है।<br /><br /> नेचरपार्क में गाँव के ही कुछ व्यक्तियों की खानसामा, सहायक खानसामा, चौकीदार तथा गार्ड्स के रूप में नियुक्ति की गई है। पूरे मधेश्वर नेचरपार्क परिसर को इस प्रकार से बनाया गया है कि वहाँ साँप ना आ सकें तथा रात्रि में प्रकाश हेतु सोलर लाइट की व्यवस्था भी की गई है। मधेश्वर नेचरपार्क से वहाँ के ग्रामीणों के साथ-साथ आसपास के लोगों को भी लाभ हुआ है।<br /><br /> मधेश्वर पार्क के माध्यम से आसपास के लोग प्रकृति के बीच रहने आते हैं और अपने आप को रिचार्ज करते हैं। आसपास की जनता वहाँ जाकर आनन्द महसूस करती है। वर्तमान में वहाँ निवास हेतु कुल 4 टेंट हैं और विकास कार्य प्रारम्भ हैं। मधेश्वर नेचर पार्क से प्रेरणा लेकर अन्य स्थानों पर भी नेचरपार्क का निर्माण किया जा सकता है जिससे ग्रामीण भी लाभान्वित हों और प्रकृति भी।<br /><br /> (लेखक जशपुर (छत्तीसगढ़) के जिला पंचायत संसाधन केन्द्र में संकाय सदस्य हैं।)<br /><br /> ई-मेलःashishtiwarijashpur@gmail.com</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">economic growth, bhandari panchyat, selfhelp groups, economic benefits of national parks, why are national parks so important, social benefits of national parks, benefits of national parks in the us, advantages of national parks and wildlife sanctuaries, disadvantages of national parks, economic impacts of national parks, economic impact of national parks, central india national parks, kanha national park accommodation, national park near ujjain, kanha national park safari timings, night safari kanha national park, kanha resort kanha national park, bandhavgarh national park official site, kanha national park jeep safari, madheshwar nature park.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333125&amp;2=comment&amp;3=comment" token="N8Q8oyM7t2psFfw50jLM07snyCqJT4CIzBbVd81REtk"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/madheshwar-nature-park-and-economic-growth" data-a2a-title="मधेश्वर नेचरपार्क द्वारा ग्राम पंचायत भंडरी का विकास"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fmadheshwar-nature-park-and-economic-growth&amp;title=%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95%20%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%20%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A4%20%E0%A4%AD%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8"></a></span> Thu, 26 Jul 2018 09:00:14 +0000 editorial 1319333125 at http://hindi.indiawaterportal.org मिसाल बेमिसाल http://hindi.indiawaterportal.org/revival-of-ponds-Dwarka-Delhi <span>मिसाल बेमिसाल</span> <span><span>editorial</span></span> <span>Wed, 07/25/2018 - 14:44</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">राकेश रंजन</div> </div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><br /><span class="inline inline-right"><img alt="डिस्ट्रिक्ट पार्क तालाब सेक्टर 23 द्वारका दिल्ली" class="image image-_original" height="270" src="https://farm1.staticflickr.com/922/41820428370_a41462cd48.jpg" title="डिस्ट्रिक्ट पार्क तालाब सेक्टर 23 द्वारका दिल्ली" width="400" /><span class="caption" style="width: 300px"><i>डिस्ट्रिक्ट पार्क तालाब सेक्टर 23 द्वारका दिल्ली</i></span></span> द्वारका वाटर बॉडीज रिवाइवल कमेटी (Dwarka Water Bodies Revival Committee) का प्रयास आखिरकार रंग लाया। कमेटी के सदस्यों ने बिना सरकारी मदद के इलाके के दो तालाबों को जीवन्त रूप देने में सफलता हासिल की है। लेकिन सफलता की यह लड़ाई काफी लम्बी है जिसमें सरकारी महकमें की उदासीनता और कानूनी दाँव-पेंच से भी कमेटी के सदस्यों को रूबरू होना पड़ा है।<br /><br /> बकौल, दीवान सिंह, जो द्वारका वाटर बॉडीज रिवाइवल कमेटी के मेम्बर हैं ने कहा <b>“सरकार की तरफ से तालाबों के पुनर्जीवन के लिये हमें आज तक कोई आर्थिक सहायता मुहैया नहीं कराई गई है। जबकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकार को तालाबों को संरक्षित करने का आदेश दिया है।”</b><br /><br /> दीवान सिंह और उनके सहयोगियों का ही प्रयास है कि सालों से उपेक्षा की मार झेल रहे द्वारका सेक्टर-20 का भारत वंदना उधरन तालाब और द्वारका सेक्टर-23 का डिस्ट्रिक्ट पार्क तालाब आज जीवन्त हो चुके हैं।<br /><br /> द्वारका वाटर बॉडीज रिवाइवल कमेटी का गठन 2011 में दिल्ली के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर बनवारी लाल जोशी के आदेश से किया गया था। इस कमेटी को इलाके के 10 तालाबों को पुनर्जीवित करने से सम्बन्धित प्रस्ताव तैयार करने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। कमेटी ने प्रस्ताव तैयार किया और उसे सरकार को सौंप भी दिया लेकिन डीडीए (Delhi Development Authority) गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण इस कार्य में कोई प्रगति नहीं हो सकी। कमेटी के सदस्यों के लाख प्रयास के बावजूद भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ तो उन्होंने अन्ततः नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में इस सम्बन्ध में मुकद्मा दायर किया।<br /><br /> मुकद्में का फैसला 2016 में द्वारका वाटर बॉडीज रिवाइवल कमेटी के पक्ष में आया। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकार को इन तालाबों को संरक्षित करने का आदेश दिया। लेकिन अफसोस की बात है कि दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी ने तालाबों को पुनर्जीवित करने के लिये नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा दिये गये आदेश को भी दरकिनार कर दिया। अब एक बार फिर से द्वारका वाटर बॉडीज रिवाइवल कमेटी के सदस्य कोर्ट की शरण में गये हैं। <b>“हमने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश को नहीं माने जाने के विरूद्ध सरकार के खिलाफ कोर्ट में कंटेम्प्ट दायर किया जिसकी सुनवाई अभी अपेक्षित है,”</b> दीवान सिंह ने कहा।<br /><br /> दीवान सिंह, नेचुरल हेरिटेज फर्स्ट नामक स्वयंसेवी संस्था से भी ताल्लुक रखते हैं। इस संस्था ने लोगों को पर्यावरण से जुड़े मसलों से जोड़ने के उद्देश्य से 2008 में लोकल वाटर बॉडीज को पुनर्जीवित करने का कार्य शुरू किया। सबसे पहले इन्होंने पश्चिमी दिल्ली के बक्करवाला गाँव स्थित तालाब और उसकी 21 एकड़ जमीन को बचाने के लिये सत्याग्रह किया। इस जगह को दिल्ली परिवहन विभाग द्वारा बस डिपो के रूप में विकसित किये जाने की योजना थी। इस योजना का विरोध बक्करवाला ग्राम युवा समिति के बैनर तले किया जा रहा था। नेशनल ग्रीन हेरिटेज फर्स्ट के आन्दोलन से जुड़ने के बाद सरकार ने उस जगह पर बस डिपो बनाने का प्रस्ताव वापस ले लिया।<br /><br /><br /><span class="inline inline-left"><img alt="भारत वंदना उधरन तालाब सेक्टर 20 द्वारका दिल्ली" class="image image-_original" height="270" src="https://farm1.staticflickr.com/852/41820428560_685431525f.jpg" title="भारत वंदना उधरन तालाब सेक्टर 20 द्वारका दिल्ली" width="400" /><span class="caption" style="width: 300px"><i>भारत वंदना उधरन तालाब सेक्टर 20 द्वारका दिल्ली</i></span></span> यह सिलसिला यहीं नहीं थमा वर्ष 2011 संस्था ने दक्षिणी दिल्ली में तालाबों को संरक्षित करने का एक अभियान छेड़ा। इस अभियान के तहत 50 गाँवों का सर्वे किया गया। सर्वे के दौरान इलाके में कुल 183 तालाब पाए गये जिनमें से 29 का सरकारी रिकॉर्ड में कोई विवरण नहीं था। इसके अलावा 93 तालाब सूखे पड़े थे वहीं 63 अन्य तालाबों में पानी तो था लेकिन मुहल्लों से निकलने वाले नालों का। शेष बचे केवल 27 तालाबों में पानी था लेकिन उन्हें ट्यूबवेल की सहायता से भरा गया था। इन तालाबों के पानी का इस्तेमाल जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिये किया करते थे। साफ है कि दक्षिणी दिल्ली में तालाबों की स्थिति दयनीय थी।<br /><br /> दिल्ली में पानी की किल्लत किसी से छुपी नहीं है। दिल्ली में लोगों को पानी उपलब्ध करने के दो ही मुख्य स्रोत हैं। पहला दिल्ली को आस-पास के इलाकों की नदियों से मिलने वाला पानी और दूसरा भूजल। यदि नदियों की बात करें तो दिल्ली को मुख्यतः यमुना, गंगा और व्यास से पानी उपलब्ध कराया जाता है। आँकड़े बताते हैं कि इन नदियों से दिल्ली की पानी की जरुरत का केवल 40 प्रतिशत हिस्सा ही प्राप्त होता है। इस तरह पानी की जरुरत को पूरा करने के लिये भूजल का भी व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसी का प्रतिफल है कि दिल्ली का भूजल स्तर काफी नीचे गिर गया है और प्रदूषित भी हो गया है।<br /><br /> भारत में पौराणिक काल से पानी की जरूरतों को पूरा करने में तालाबों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है लेकिन सरकार और लोगों के गैर जिम्मेदाराना रवैये के कारण इनका अस्तित्व आज खतरे में है। पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो आज भी भूजल रिचार्ज करने का तालाब बड़ा साधन हो सकते हैं बशर्ते सही तरीके से उनकी परवरिश की जाए। इतना ही नहीं तालाबों के संरक्षण से इलाके के तापमान, प्रदूषण के स्तर सहित उनके प्रभाव क्षेत्र में पारिस्थितिकीय संतुलन को भी कायम रखने में मदद मिलती है। इस तरह यहाँ यह कहना अनुचित नहीं होगा कि दिल्ली में भी तालाबों का संरक्षण वहाँ के गिरते भूजल स्तर को बनाये रखने में मददगार साबित हो सकता है।<br /><br /> द्वारका में दीवान सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा तालाब को संरक्षित किये जाने का कार्य सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकार का एक बेहतरीन उदाहरण है। वे और उनके सहयोगियों ने व्यक्तिगत रूप से अपनी सेवाएँ देकर द्वारका के सेक्टर-20 के भारत वंदना उधरन तालाब और द्वारका सेक्टर-23 के डिस्ट्रिक्ट पार्क तालाब का उत्थान किया है। इन तालाबों को पुनर्जीवित करने के लिये धन की वयवस्था भी इन्होंने खुद और अपने साथियों के सहयोग से की है। दीवान सिंह कहते हैं कि सरकार यदि चाहे तो दिल्ली के सभी तालाबों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। <b>“इस कार्य को व्यक्तिगत स्तर पर या कुछ लोगों के सहयोग से किया जाना सम्भव नहीं है क्योंकि हर किसी की अपनी व्यक्तिगत सीमाएँ होती हैं। हाँ यदि तालाबों के संरक्षण के लिये सरकार कुछ कदम उठाये तो इन्हें जिन्दा करना कोई बड़ी बात नहीं है,” दीवान सिंह ने कहा।</b><br /><br /> इन्होंने यह भी बताया कि गाँवों की तुलना में शहर में तालाबों को जिन्दा करना आसान होता है। इसकी सबसे बड़ी वजह शहरों में रनऑफ वाटर को तालाबों तक गाँवों की तुलना में आसानी से ले जाया जा सकता है। दिल्ली में तालाबों की बर्बादी का एक बड़ा कारण मुहल्लों से निकलने वाले गन्दे पानी को उनमें गिराया जाना है। सरकार द्वारा इसको प्रतिबन्धित किये जाने के लिये पर्याप्त कदम लिये जाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त लोगों को पर्यावरण के संवर्धन और उसके विकास के मुद्दों के प्रति और अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">Dwarka Water Bodies Revival Committee in Hindi, Diwan Singh, Delhi Development Authority in Hindi, National Green Tribunal in Hindi </span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333122&amp;2=comment&amp;3=comment" token="VwtsyuRfM-BCV0Xmk1SSUYFQijNgEJhmPpew6stEBS0"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/revival-of-ponds-Dwarka-Delhi" data-a2a-title="मिसाल बेमिसाल"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Frevival-of-ponds-Dwarka-Delhi&amp;title=%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2%20%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2"></a></span> Wed, 25 Jul 2018 09:14:29 +0000 editorial 1319333122 at http://hindi.indiawaterportal.org तो बहुरेंगे पांवधोई के दिन http://hindi.indiawaterportal.org/paon-dhoi-to-be-rejuvenated <span>तो बहुरेंगे पांवधोई के दिन</span> <span><span>editorial</span></span> <span>Tue, 07/10/2018 - 14:49</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">राकेश रंजन</div> </div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><br /><span class="inline inline-right"><img alt="पाँव धोई नदी की सफाई करते लोग" class="image image-_original" height="200" src="https://farm2.staticflickr.com/1782/43267505962_148ba0513c.jpg" title="पाँव धोई नदी की सफाई करते लोग" width="300" /><span class="caption" style="width: 300px"><i>पाँव धोई नदी की सफाई करते लोग</i></span></span> सहारनपुर शहर के बीच से प्रवाहित नाले के समान दिखने वाली पाँव धोई नदी को पुनर्जीवित करने की पहल ने एक बार फिर तेजी पकड़ ली है। यह प्रयास नदी को नया जीवन देने के लिये जिले के आला सरकारी अफसरों और नागरिक संगठनों से जुड़े प्रबुद्ध लोगों की पहल पर गठित की गई <b>‘पाँव धोई बचाव समिति’</b> के माध्यम से किया जा रहा है।<br /><br /> गौरतलब है कि सहारनपुर स्मार्ट सिटी योजना के तहत नामित देश के 100 शहरों में से एक है। केन्द्र सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के अन्तर्गत ही ‘पाँव धोई नदी’ के उत्थान की कवायद शुरू हो गई है। इस कार्य के लिये तैयार की गई योजना के अनुसार नदी को पूर्णतः प्रदूषण मुक्त किया जाना है। इस विषय पर बात करते हुए ‘पाँव धोई बचाव समिति’ के उपसचिव डॉ. पीके शर्मा ने कहा <b>“नदी में गिरने वाले सभी नालों के अवजल का उपचार किये जाने की योजना है ताकि इसे प्रदूषण मुक्त किया जा सके। इसके लिए प्रयास शुरू कर दिये गये हैं। जिसका असर भी अब दिखने लगा है।”</b> उन्होंने बताया कि नदी के ऊपरी बहाव क्षेत्र से मलबे को साफ करने, किनारों को चौड़ा करने के साथ ही तल को गहरा करने का कार्य शुरू हो चुका है।<br /><br /> मिली जानकारी के अनुसार आठ किलोमीटर लम्बी इस नदी को कचरामुक्त करने और सदानीरा बनाने के लिये गोमती नदी के विकास का मॉडल अपनाये जाने की योजना है। इसके तहत नदी के ऊपरी बहाव क्षेत्र में दो चेक डैम बनाने का निर्णय लिया गया है जो इसे सदानीरा बनाये रखने में मददगार साबित होंगे।<br /><br /><b>“इस नदी का उद्गम स्थल एक स्प्रिंग है। इसका जल स्तर कम है। इसीलिए चेक डैम का निर्माण आवश्यक है ताकि पानी के स्तर को बरकरार रखा जा सके,”</b> डॉ. पीके शर्मा ने कहा। इन दोनों चेक डैम के बीच की दूरी एक किलोमीटर से ज्यादा नहीं होगी। इसके अलावा कचरा शोधन के लिए यहाँ 40 एमएलडी की क्षमता वाले दो सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाये जाने की भी योजना है।<br /><br /> मालूम हो कि कुछ दिनों पहले पाँव धोई नदी के ऊपरी बहाव क्षेत्र में व्यापक सफाई अभियान चलाया गया। इस अभियान की बागडोर कमिश्नर चंद्र प्रकाश त्रिपाठी के हाथों में थी। उनकी अगुआई में हजारों की संख्या में उपस्थित होकर लोगों ने इस सफाई अभियान में हिस्सा लिया। इस दौरान सहारनपुर शहर के समीप शकलापुरी में स्थित नदी के उद्गम स्थल की विशेष तौर पर सफाई की गई। इस अवसर पर कमिश्नर ने कहा कि कभी शहर की शान माने जाने वाली इस नदी को फिर उसी रूप में लाना है और यह तभी सम्भव है जब इस पुनीत कार्य में लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। नदी की सफाई के लिये <b>“पाँव धोई हमारी शान, सब मिलकर भर दें इसमें जान”</b> नारा भी दिया गया है।<br /><br /> लेकिन ये विवरण नदी को पुनर्जीवित करने के इस अभियान के केवल सकारात्मक पहलू हैं। इसके कई नकारात्मक पहलू भी हैं। इस अभियान से जुड़े लोगों की मानें तो नदी को निर्मल बनाने की यह कवायद 2010 से ही शुरू हो गई थी लेकिन स्थिति लगभग वहीं की वहीं है। हालाँकि, पूर्व में चलाये गये सभी अभियान नागरिक संगठनों द्वारा चलाये गये थे। वहीं, वर्तमान में शुरू किया गया अभियान पूर्णतः सरकारी है। ‘पाँव धोई बचाव समिति’ के सदस्य सुशांत सिंघल के अनुसार वर्तमान में चलाये जा रहे अभियान से कुछ उम्मीद तो जगी है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। वो कहते हैं कि <b>“नदी को साफ और स्वच्छ बनाने के लिये सबसे पहले इसमें गिरने वाले नालों के पानी को ट्रीट करना होगा। इसके लिये सरकारी स्तर पर प्रयास करना जरूरी है”।</b><br /><br /> आपको बता दें कि पाँव धोई नदी में बहने वाले सैकड़ों नालों में से 98 सहारनपुर नगर निगम के हैं। लेकिन इनसे नदी में आने वाले गन्दे पानी को ट्रीट करने की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं की गई है। हाँ नदी में गिरने वाले इस अवजल को साफ करने की योजना जरूर बनाई गई है जो अभी पेपरों तक ही सिमटी है। इसके अलावा चीनी मिलों से निकलने वाला कचरा भी पाँव धोई के अतिरिक्त अन्य नदियों के प्रदूषण की एक मुख्य वजह है। पाँव धोई, धमोला नदी की सहायक नदी है।<br /><br /> पाँव धोई के अतिरिक्त धमोला में भी चीनी मिल से निकलने वाला कचरा गिरता है जिससे ये प्रदूषित हो रही है। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘पाँव धोई बचाव समिति’ को नदी को स्वच्छ बनाने के लिये लम्बी जद्दोजहद करनी होगी। सहारनपुर के जिलाधिकारी इस समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं। समिति में जिलाधिकारी के अलावा कुल 22 लोग शामिल हैं जिसमें 10 सरकारी अफसर और अन्य विभिन्न क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले शहर के प्रतिष्ठित लोग हैं।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">paon dhoi river in Hindi, saharanpur in Hindi, rejuvenation plan in Hindi, smart city in Hindi </span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=1319333102&amp;2=comment&amp;3=comment" token="U6mb3_8OGWrlgzW3XOvIiJOYzQ6TCOuHqluizGHoSm0"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/paon-dhoi-to-be-rejuvenated" data-a2a-title="तो बहुरेंगे पांवधोई के दिन"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fpaon-dhoi-to-be-rejuvenated&amp;title=%E0%A4%A4%E0%A5%8B%20%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%87%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%A7%E0%A5%8B%E0%A4%88%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8"></a></span> Tue, 10 Jul 2018 09:19:59 +0000 editorial 1319333102 at http://hindi.indiawaterportal.org पानी ने लौटाई खुशहाली http://hindi.indiawaterportal.org/water-management-in-baloda-lakha <span>पानी ने लौटाई खुशहाली</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Thu, 05/03/2018 - 18:57</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p> </p> <p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #750000; padding: 10px">बालौदा लक्खा गाँव को अब जलतीर्थ कहा जाता है। इस साल इलाके में बहुत कम बारिश हुई है। 45 डिग्री पारे के साथ चिलचिलाती धूप में भी गाँव के करीब 90 फीसदी खेतों में हरियाली देखकर मन को सुकून मिलता है। पर्याप्त पानी होने से किसान साल में दूसरी और तीसरी फसल भी आसानी से ले रहे हैं। लगभग एक हजार से ज्यादा किसान सोयाबीन, प्याज, मटर, गेहूँ और चने की तीन फसलें लेते हैं। गाँव की खेती लायक कुल 965 हेक्टेयर जमीन के 90 फीसदी खेतों में पर्याप्त सिंचाई हो रही है।</p> <p>वो कहते हैं न कि आदमी के हौसले अगर फौलादी हो तो क्या नहीं कर सकता। और जब ऐसे लोगों का कारवाँ बन जाये तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है। हम बात कर रहे हैं उज्जैन जिले के एक छोटे से गाँव बालौदा लक्खा और उसके बाशिन्दों की। लोगों की एकजुटता और उनके प्रयास ने इस बेपानी गाँव को पानीदार बना डाला।<br /><br /> बीस साल पहले तक यह गाँव बूँद-बूँद पानी को मोहताज था। पानी की कमी के कारण खेती दगा दे गई थी। युवा रोजगार की तलाश में उज्जैन और इन्दौर पलायन करने को मजबूर थे। महिलाएँ पानी की व्यवस्था करने में ही परेशान रहती थीं। बच्चे स्कूल जाने के बजाय हाथों में खाली बर्तन उठाए कुआँ-दर-कुआँ घूमते रहते।<!--break--> पर समय ने करवट ली और लोगों ने मेहनत के दम पर वहाँ की तस्वीर ही बदल डाली। अब यह गाँव प्रदेश के लोगों के लिये कौतूहल का विषय है और वे पानी का काम देखने के लिये दूर-दूर से यहाँ आते हैं।<br /><br /> मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले का बालौदा लक्खा गाँव को अब जलतीर्थ कहा जाता है। इस साल इलाके में बहुत कम बारिश हुई है। 45 डिग्री पारे के साथ चिलचिलाती धूप में भी गाँव के करीब 90 फीसदी खेतों में हरियाली देखकर मन को सुकून मिलता है। पर्याप्त पानी होने से किसान साल में दूसरी और तीसरी फसल भी आसानी से ले रहे हैं। लगभग एक हजार से ज्यादा किसान सोयाबीन, प्याज, मटर, गेहूँ और चने की तीन फसलें लेते हैं। गाँव की खेती लायक कुल 965 हेक्टेयर जमीन के 90 फीसदी खेतों में पर्याप्त सिंचाई हो रही है। एक हजार बोरिंग तथा 25 हैण्डपम्प में से कहीं पानी की किल्लत नहीं है। गाँव में रोज एक घंटे तक नल चलते हैं। भीषण गर्मी में भी घरों में पानी की कमी नहीं है।<br /><br /> बडनगर-रूनिजा मार्ग पर महज नौ किमी चलने पर ही करीब पाँच हजार की आबादी वाला छोटा-सा गाँव बालौदा लक्खा मिलता है। यहाँ के ज्यादातर लोग किसान हैं, जिनके पास अपनी जमीन नहीं है, वे खेतों में मजदूरी करते हैं। इस अकेले गाँव में सवा सौ से ज्यादा जल संरचनाएँ बनी हैं, जिनसे गाँव का बरसाती पानी बाहर नहीं जाता। पास की पहाड़ी से भी नालियों के रूप में बारिश का पानी गाँव और खेतों में जाकर धरती में समा जाता है।<br /><br /> आप चौंक जाएँगे लेकिन यहाँ 11 तालाब, 15 सोख्ता तालाब, 6 सूक्ष्म तालाब (आरएमएस), 25 परकोलेशन टैंक, दर्जनों रिचार्ज पिट तथा पचास से ज्यादा बोल्डर चेकडैम और मिट्टी के बाँध बनाए गए हैं। पूरे गाँव और आसपास के इलाके में रनिंग वाटर सिस्टम के जरिए बारिश का अधिकांश पानी गाँव और उसके खेतों से बाहर नहीं जा पाता है। इस साल बारिश सामान्य से लगभग आधी होने के बावजूद गाँव में जलस्तर बना हुआ है।<br /><br /> यहाँ गंगा सागर तालाब, मुक्ति सागर तालाब, भवानी सागर तालाब, माता सागर तालाब, रेडवाला तालाब, कृषि सागर आदि तालाबों में आमतौर पर मार्च के आखिरी हफ्ते तक पानी भरा रहता है। हालांकि बारिश कम होने से इस बार ये जनवरी-फरवरी में ही सूख चुके हैं। इलाके का भूजल स्तर जो कभी तीन सौ फीट से ज्यादा हो गया था आज भी महज 60 से सौ फीट है।<br /><br /> मोटे तौर पर यहाँ ग्रामीणों के आपसी सहयोग से निर्मित 60 जल संरचनाएँ तथा सरकारी खर्च से बनी 40 से 60 जल संरचनाएँ हैं। बालौदा के आसपास बहने वाले तीन टेढ़े-मेढ़े नालों की कुल लम्बाई 18 किमी तथा इसकी सहायक करीब 120 छोटी नालियों और छपरों का बहाव तालाबों और अन्य जल संरचनाओं से इस तरह जोड़ दिया गया है कि बारिश के पानी का एक भी बूँद व्यर्थ नहीं बहता।<br /><br /> गाँव में परम्परागत जल संरचनाओं का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है। रिचार्ज कर कई पुरानी संरचनाओं को पुनर्जीवित किया गया है। गाँव वालों ने रिकार्ड तोड़ करीब 14 लाख रुपए का जन सहयोग इन कामों के लिये किया है। यही काम यदि सरकारी स्तर पर होता तो इसकी लागत 40 से 50 लाख रुपए तक की होती।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/41822642782/in/dateposted-public/" title="बूँदों का जलतीर्थ बना बालौदा लक्खा गाँव"><img alt="बूँदों का जलतीर्थ बना बालौदा लक्खा गाँव" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/974/41822642782_c859409885.jpg" width="424" /></a>इस गाँव को जल संरचनाओं के कारण मध्य प्रदेश सरकार का प्रमाण पत्र भी मिल चुका है। तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को तो यहाँ पानी का काम इतना पसन्द आया था कि उन्होंने कई बार यहाँ तक कहा कि <b>मेरा सपना तभी पूरा होगा जब प्रदेश का हर गाँव बलौदा लक्खा की तरह पानी रोकने का काम करेगा।</b><br /><br /><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>ग्रामीण बताते हैं कि पच्चीस साल पहले तक गाँव में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन नब्बे के दशक के आसपास अचानक यहाँ पानी की कमी होने लगी। खेती और खेत आधारित मजदूरी से ही जिस गाँव की रोजी-रोटी चलती हो, उस गाँव में पानी के मोल को समझा जा सकता है। पानी नहीं तो रोटी पर संकट आने लगा।<br /><br /> जमीन का पानी गहरा और गहरा होता जा रहा था। लोग पानी की तलाश में गहरे से गहरे ट्यूबवेल करवा रहे थे। एक किसान सवाई सिंह झाला ने तो अपने खेतों में एक के बाद एक ढाई सौ बोरिंग करवा दिये लेकिन पानी नहीं निकला। इतनी बड़ी तादाद में बोरिंग करवाने में उन्हें लाखों का नुकसान हुआ,वह अलग। लोगों के पास जमीनें तो थीं पर पानी के बिना क्या करते? हाथ-पर-हाथ धरे पानी के बारे में सोचते हुए कई बरस बीत गए।<br /><br /> अर्जुन सिंह राठौर बताते हैं कि <b>हमने सबसे पहले यह संकल्प लिया कि 'गाँव का पानी गाँव में और खेत का पानी खेत में' के नारे को जमीनी हकीकत बनाएँगे। हमने कृषि अधिकारी अमर सिंह परमार, किसान किशोर सिंह चौहान, भीम सिंह कारा, ओमप्रकाश दुबे, नाहर सिंह चौधरी तथा सबल सिंह आदि ने ग्रामीणों के साथ आपसी बातचीत कर समस्या का हल ढूँढने के तरीकों पर चर्चा की। सबसे पहले बरसाती पानी को गाँव के पास से बहाकर ले जाने वाले बाँकिया (टेढ़े-मेढ़े) नाले पर कंक्रीट के रोक बाँध बनाए और बाकी बचे पानी को पुरानी बनी एक तलाई में रोकने का जतन किया।</b><br /><br /> यह बात सन 2000 के बारिश से पहले की है। बदकिस्मती कि इस साल बारिश बहुत कम (औसत से भी आधी) ही हुई। किसानों को इसका कुछ खास फायदा नहीं मिला, लेकिन बड़ा चमत्कार यह हुआ कि 2001 के मार्च-अप्रैल तक भेरुलाल माली का ट्यूबवेल बिना थके पानी दे रहा था। भेरुलाल का खेत बाँकिया नाले के आखिरी बिन्दु पर था। आमतौर पर यह ट्यूबवेल नवम्बर-दिसम्बर में ही सूख जाया करता था। ग्रामीणों का रास्ता मिल गया था। इस सफलता से उत्साहित होकर गाँव के कुछ लोग अन्ना हजारे के गाँव (रालेगाँव) में पानी का काम देखने जा पहुँचे।<br /><br /> ग्रामीणों ने पहाड़ी पठार से आने वाले बरसाती पानी को गाँव में ही रोकने के मकसद से जनसहयोग कर एक बड़ा तालाब बनाने का विचार किया। देखते-ही-देखते कार्य योजना बन गई और किसी ने रुपए दिये, किसी ने श्रमदान तो किसी ने अपने ट्रैक्टर देने की बात कही। यानी जिससे जो बन पड़ा उसने वैसा ही सहयोग दिया।<br /><br /> अब समस्या यह थी कि तालाब बनेगा कहाँ और इसके लिये अपनी जमीन कौन देगा। लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर इसका भी रास्ता निकल आया। हुआ कुछ यूँ कि करीब 15 साल पहले सरकारी सूखा राहत मद से सिंचाई विभाग ने एक तालाब बनाने के लिये गाँव से लगी सरकारी जमीन पर खुदाई शुरू की थी लेकिन आगे का बजट नहीं आने से वह तब से यूँ ही पड़ा था। ग्रामीणों ने अपना पसीना बहाकर तालाब तैयार किया।<br /><br /> इसी तरह मालगावड़ी से आने वाले बारिश की बूँदों को सहेजने के लिये एक और तालाब बनाया गया। यह तालाब ऐसी जगह पर बना है, जिसे बरसों तक झगड़ात की कहा जाता रहा मतलब कई सालों से इस पर दो पक्षों के बीच विवाद चल रहा था। गाँव वालों के समझाने पर दोनों पक्षों ने दावेदारी छोड़ दी और दोनों ने ही आधा-आधा बीघा जमीन तालाब के लिये सहर्ष दे दी। इस तालाब के ओवरफ्लो होने पर पानी को रोकने के लिये एक तलैया बनवाया गया। इस पानी से किसानों के कुएँ रिचार्ज होते हैं। इसके आगे एक बोल्डर पाला बनाकर पानी को रोका गया। कुंडवाला नाले पर भी रोक बाँध बनाया गया।<br /><br /> गाँव के ही भीम सिंह कारा ने आगे बढ़कर खेडवड़ाके नाले को रोककर एक और तालाब बनाने के लिये 25 हजार रुपए देने की घोषणा की तथा बाकी लोगों ने पाँच से बीस हजार रुपए तक देने की बात कही। इससे तीन लाख रुपए लागत से तीसरा बड़ा तालाब भी बनकर तैयार हो गया। चौथा तालाब मालगावड़ी की ओर जाने वाले रास्ते पर कुछ किसानों ने अपने खर्च पर बना लिया। इन चारों तालाब से भी यदि कुछ बरसाती पानी ओवर फ्लो होता है तो उसे सहेजने के लिये ढाई लाख रुपए की लागत से डेढ़ हेक्टेयर का बड़ा तालाब बनाया गया।<br /><br /> गाँव के मुक्तिधाम में पानी का संकट होने पर मृतक देह को अन्तिम आचमन के लिये भी पानी नहीं मिल पाता था, ऐसे में ग्रामीणों ने विचार कर यहाँ भी एक तालाब बनाने का फैसला किया। तालाब बनाने के लिये लोग घर-घर पहुँचे और सहयोग माँगा। लोगों पर इसका बड़ा भावनात्मक असर हुआ और अच्छा जन सहयोग मिला। आज इस तालाब में पानी भरा हुआ है। इसी प्रकार किसान रमेश चन्द्र ने अपनी निजी जमीन में तीन बीघा का बड़ा सा तालाब बनवाया।<br /><br /> इससे भी बड़ी बात यह है कि बालौदा लक्खा में 'कर्मचारी तालाब' भी है और इसके बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। जिन दिनों गाँव में तालाब बनाने की अलख जगाई जा रही थी तो कृषि अधिकारी अमर सिंह परमार और उनके कर्मचारी साथियों ने सोचा कि हम भी कब तक ग्रामीणों को सिर्फ पानी बचाने का भाषण ही पिलाते रहेंगे। हमें भी कोई संरचना बनाकर गाँव को तोहफा देना चाहिए।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/41822634772/in/dateposted-public/" title="तालाबों के कारण पानीदार हुआ बालौदा लक्खा गाँव"><img alt="तालाबों के कारण पानीदार हुआ बालौदा लक्खा गाँव" height="300" src="https://farm1.staticflickr.com/960/41822634772_2b7f3ddb6a.jpg" width="424" /></a>गाँव में तैनात कर्मचारियों ने अपने वेतन से पैसे जोड़े और तालाब बनाया तो उसका नाम ही पड़ गया कर्मचारी तालाब। इस तरह एक के बाद एक कई जल संरचनाएँ बनीं। कहीं रोक बाँध बनाए गए तो कहीं रिचार्ज पिट बनाए गए। इस तरह अब बारिश का एक बूँद पानी भी यहाँ से व्यर्थ बहकर बाहर नहीं जाता। पहाड़ियों से पानी को तालाबों तक लाने के लिये हर साल नालियों को साफ किया जाता है ताकि पानी को ढंग से सहेजा जा सके। इसके लिये नई तकनीकें ही नहीं, बालौदा गाँव के बुजुर्गों को विरासत में मिले पानी से सम्बन्धित परम्परागत ज्ञान का भी उपयोग किया गया है।<br /><br /> जल तीर्थ बने बालौदा लक्खा के लोगों ने अपने गाँव में पानी का जमीनी काम करते हुए एक मिसाल पेश की और आज इसका पूरा फायदा यहाँ के किसानों को मिल रहा है। 'पानीदार' होने से बेहतर उपज ने उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बड़ा बदलाव किया है।<br /><br /><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>बीते पन्द्रह सालों में गाँव के किसानों के अधिकांश घर पक्के बन गए हैं। घर-घर बाइक हैं तो कहीं दालान में कारें खड़ी हैं। लगभग सभी बड़े किसानों के यहाँ चमचमाते ट्रैक्टर हैं। उनकी क्रय शक्ति बढ़ी है। उनके बच्चे बडनगर और उज्जैन के अच्छे स्कूलों तथा कॉलेजों में पढ़कर अपना भविष्य बना रहे हैं। पलायन कर उज्जैन और इन्दौर गए लोग भी धीरे-धीरे गाँव लौट रहे हैं। जिनके पास खेती नहीं है और मजदूरी पर ही जीविकोपार्जन करते हैं, उन्हें भी अब पर्याप्त कृषि मजदूरी मिल रही है। अब गाँव के किसान जैविक खेती पर जोर दे रहे हैं। कुछ किसानों ने इसकी पहल शुरू भी कर दी है।<br /><br /> बालौदा गाँव से प्रेरणा लेकर कई गाँवों ने अपने यहाँ भी जल संरचनाएँ बनाने का काम शुरू किया है। कई जगह अच्छे परिणाम भी आ रहे हैं, लेकिन हजारों गाँवों में लोग अब भी अपने 'पानी' के लिये सरकार का मुँह ताक रहे हैं।</p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">rainwater harvesting, water conservation, boost to agriculture, watershed management projects in maharashtra, paani foundation ppt, pani foundation logo, www panifoundation in 1may, jalmitra paanifoundation in, paani foundation app, paani foundation news, water resources and irrigation, development in chhattisgarh, water resources in chhattisgarh pdf, chhattisgarh water resources department, water resources department chhattisgarh recruitment 2017, cg irrigation department recruitment 2017, groundwater level in chhattisgarh, cg wrd gradation list, irrigation department chhattisgarh recruitment 2015.</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=69009&amp;2=comment&amp;3=comment" token="H-R7mWpnifGI_lR9qKbu_Ahpjo9leTzdYkeQo_Y-Gjg"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/water-management-in-baloda-lakha" data-a2a-title="पानी ने लौटाई खुशहाली"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fwater-management-in-baloda-lakha&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%B2%E0%A5%8C%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%88%20%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80"></a></span> Thu, 03 May 2018 13:27:22 +0000 RuralWater 69009 at http://hindi.indiawaterportal.org आदिवासियों ने खुद खोजा अपना पानी http://hindi.indiawaterportal.org/Tribal-themselves-find-their-water <span>आदिवासियों ने खुद खोजा अपना पानी</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Fri, 03/30/2018 - 15:39</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">जल दिवस की सार्थकता इसी में निहित है कि हम अपने पारम्परिक जल संसाधनों को सहेज सकें तथा प्रकृति की अनमोल नेमत बारिश के पानी को धरती की कोख तक पहुँचाने के लिये प्रयास कर सकें। अपढ़ और कम समझ की माने जाने वाले आमली फलिया के आदिवासियों ने इस बार जल दिवस पर पूरे समाज को यह सन्देश दिया है कि बातों को जब जमीनी हकीकत में अमल किया जाता है तो हालात बदले जा सकते हैं। आमला फलिया ने तो अपना खोया हुआ कुआँ और पानी दोनों ही फिर से ढूँढ लिया है लेकिन देश के हजारों गाँवों में रहने वाले लोगों को अभी अपना पानी ढूँढना होगा।</p> मध्य प्रदेश के एक आदिवासी गाँव में बीते दस सालों से लोग करीब तीन किमी दूर नदी की रेत में झिरी खोदकर दो से तीन घंटे की मशक्कत के बाद दो घड़े पीने का पानी ला पाते थे। आज वह गाँव पानी के मामले में आत्मनिर्भर बन चुका है। अब उनके ही गाँव के एक कुएँ में साढ़े पाँच फीट से ज्यादा पानी भरा हुआ है। इससे यहाँ के लोगों को प्रदूषित पानी पीने से होने वाली बीमारियों तथा सेहत के नुकसान से भी निजात मिल गई है।<br /><br />आखिर ऐसा कैसे हुआ कि गाँव में दस सालों से चला आ रहा जल संकट आठ से दस दिनों में दूर हो गया। कौन-सा चमत्कार हुआ कि हालात इतनी तेजी से बदल गए। यह सब सिलसिलेवार तरीके से जानने के लिये चलते हैं आमली फलिया गाँव। कुछ मेहनतकश आदिवासियों ने पसीना बहाकर अपने हिस्से का पानी धरती की कोख से उलीच लिया।<!--break--><br /><br />मध्य प्रदेश का आदिवासी बहुल जिला बड़वानी अपनी ऊँची-नीची पहाड़ियों और दूर तक फैले ऊसर की भौगोलिक पृष्ठभूमि से पहचाना जाता रहा है। इस जिले के आदिवासी क्षेत्र पाटी में खेती का रकबा बहुत कम है और ज्यादातर आदिवासी समाज के लोग बूढ़े और बच्चों को यहीं छोड़कर हर साल अपने लिये रोटी की जुगत में इन्दौर या गुजरात के दाहोद पलायन करते हैं। <br /><br />बारिश में तो ये ऊँची-नीची थोड़ी-सी जमीनों में कुछ उगाकर जैसे-तैसे अपने परिवार के लिये रोटी का इन्तजाम कर लेते हैं लेकिन बारिश खत्म होते ही कमाने की चिन्ता बढ़ने लगती है। चमचमाते शहर इन्दौर से करीब 160 किमी दूर बसे बड़वानी जिला मुख्यालय तक पहुँचना तो आसान है लेकिन यहाँ से 50 किमी दूर पाटी के बाद से आगे का रास्ता बहुत कठिन है।<br /><br />यहाँ से आगे जाने के लिये बाइक या पैदल ही जाना होता है। कुछ दूरी तक निजी बसें भी चलती हैं, लेकिन आमली जाने के लिये तो आपको पहाड़ों पर चढ़ाई करते हुए पैदल चलना ही जरूरी है। किस्मत अच्छी हो तो पाटी से मतरकुंड तक बस मिल जाती है और वहाँ से फिर 5 किमी खड़ी चढ़ाई पार करते हुए पैदल चलना पड़ता है।<br /><br />आमली फलिया में 80 छोटी-बड़ी झोपड़ियाँ हैं और इनमें करीब चार सौ लोग रहते हैं। गाँव की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि ढलान से होते हुए बारिश का पानी नाले से होते हुए यहाँ से करीब साढ़े 6 किमी दूर गोई नदी में जा मिलता है। गोई नदी कुछ दूरी तक बहने के बाद नर्मदा में मिल जाती है। इस तरह आमली फलिया का पानी तो नर्मदा पहुँच जाता लेकिन यहाँ के लोग प्यासे ही रह जाया करते।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/41067859932/in/dateposted-public/" title="पानी से लबालब भरा कुआँ"><img src="https://farm1.staticflickr.com/875/41067859932_9cc0d3ab59.jpg" width="424" height="300" alt="पानी से लबालब भरा कुआँ" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>गाँव के किनारे पर ही मिले पैंतालीस साल के दुबले-पतले रुखडिया भाई बताते हैं, <b>'बीते दस सालों से गाँव के लोग पीने के पानी को लेकर खासे परेशान थे। यहाँ से तीन किमी दूर नदी की रेत में से झिरी खोदकर घंटो की मशक्कत के बाद घड़े-दो घड़े पानी मिल जाता तो किस्मत। पशुओं को भी इसी से पानी पिलाया जाता। हमारे बच्चे भूखे-प्यासे पानी के इन्तजार में वहीं बैठे रहते। औरतों को मजदूरी करने से पहले पानी की चिन्ता रहती। बरसात में तो जैसे-तैसे पानी मिल जाता लेकिन बाकी के आठ महीने बूँद-बूँद को मोहताज रहते। ज्यादातर लोग पलायन करते तो जो यहाँ रह जाते, उनके लिये पीने के पानी की बड़ी दिक्कत होती।'</b><br /><br />महिलाओं के लिये बड़ी मशक्कत का काम था कि हर दिन तीन किमी दूर जाकर पानी लाएँ, फिर वहाँ भी झिरी में पानी आने के लिये घंटे-दो घंटे इन्तजार करना पड़ता था। इस चक्कर में वे मजदूरी तो दूर, घर का कामकाज भी नहीं कर पाती थी। हारी-बीमारी में तो और भी मुश्किल हो जाती थी। उनके लिये गाँव में पानी का न मिलना सबसे बड़ी समस्या थी।<br /><br />बीते दिनों यहाँ कुपोषण से निपटने के लिये एक सामाजिक संस्था पहल ने जब ये हालात देखे तो कुपोषण से पहले उन्होंने पानी के संकट पर काम करने का विचार किया। टीडीएच की जर्मनी से आई एंजेला ने जब यहाँ की ऐसी स्थिति देखी तो वे फफक पड़ी। कुछ देर के लिये वे बहुत भावुक हो गई। उन्होंने कहा कि <b>कुपोषण की बात कैसे करें, यहाँ तो लोगों को पीने का साफ पानी तक नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में कुपोषण की बात करना तो बेमानी है।</b><br /><br />संस्था के लोगों ने एंजेला की मौजूदगी में गाँव वालों से बात की और इस समस्या का निदान करने पर जोर दिया। पूछा गया कि जल संकट के इन दस सालों से पहले गाँव को पानी कहाँ से मिलता था तो गाँव वालों ने बताया कि पहले नाले के पास एक कच्चा कुआँ हुआ करता था, जिसे बाद में बीस साल पहले 2008 में वन विभाग ने सूखा राहत की मद से पक्का बना दिया गया था। बाद के दिनों में नाले की बाढ़ की गाद उसमें धीरे-धीरे भरती चली गई और अब इसकी ऊपरी पाल ही नजर आती है। <br /><br />'पहल' संस्था ने आदिवासी ग्रामीणों के सामने बात रखी कि यदि वे किसी तरह इस कुएँ को जिन्दा कर सकें तो गाँव फिर से 'पानीदार' बन सकता है। पहले तो इस काम के लिये कोई तैयार नहीं हुआ तब संस्था के सचिव प्रवीण गोखले और अम्बाराम दो लोगों ने यह घोषणा कर दी कि 22 मार्च को जल दिवस के दिन वे खुद सबसे पहले तगारी-फावड़े लेकर कुएँ पर पहुँचेंगे, जो भी चाहे हाथ बँटाने आ सकते हैं।<br /><br />22 मार्च की सुबह प्रवीण और अम्बाराम जब कुएँ पर फावड़े-तगारी लेकर पहुँचे और साफ-सफाई करने लगे तब इस काम में मदद करने के लिये कालूराम, रुखडिया, हीरुसिंह, देविका और कालूसिंह भी आ पहुँचे। उन्हें काम करते देखकर बाकी लोग भी धीरे-धीरे इसमें जुटने लगे। इस तरह दोपहर तक तो पूरा गाँव उमड़ पड़ा। <br /><br />शाम तक करीब पाँच से आठ फीट की खुदाई कर गाद निकाली जा चुकी थी। इसी दौरान गीली मिट्टी आ गई। लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जल दिवस की यह सौगात उनके लिये सबसे अनमोल थी, जिस पानी की उम्मीद में वे तीन किमी दूर जाया करते थे, अब उसी की उम्मीद उनके कुएँ में दिखने लगी थी।<br /><br />दूसरे दिन आगे की खुदाई करने से पहले पानी इतना था कि खुदाई में दिक्कत हो रही थी। पानी उलीचने के बाद फिर खुदाई शुरू हुई। पन्द्रह फीट खोदने के बाद तो हालत यह हो गई कि कुएँ का मटमैला पानी उलीचने के लिये मोटर का इन्तजाम करना पड़ा तब कहीं जाकर हाथ-दो-हाथ खुदाई की जा सकी। इस बात की खबर जब जिले के कलेक्टर तक पहुँची तो उन्होंने तत्काल अधिकारियों की एक टीम गाँव में भेजी, जिन्होंने पानी का परीक्षण कर पाया कि शुरुआती पानी में मिट्टी ज्यादा है, उसे मोटर से बाहर करने पर अब जो साफ पानी कुएँ में जमा होगा, वह पीने लायक रहेगा। उन्होंने कुएँ के पानी की सफाई के लिये ब्लीचिंग पाउडर और अन्य सामग्री भी ग्रामीणों को दी।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/27238402358/in/dateposted-public/" title="झिरी से लेते थे पीने का पानी"><img src="https://farm1.staticflickr.com/814/27238402358_0c494e5015.jpg" width="424" height="300" alt="झिरी से लेते थे पीने का पानी" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>अम्बाराम ने बताया कि <b>उन्हें खुद इसकी कल्पना नहीं थी कि इतनी जल्दी कारगर तरीके से हमारे जल संकट का स्थायी समाधान हो सकेगा। यहाँ लोगों ने कभी इस तरह सोचा ही नहीं। अब हम गाँव के लोग कुएँ और पानी का मोल समझ चुके हैं। अब हम अपने कुएँ को कभी खोने नहीं देंगे।</b><br /><br />'पहल जनसहयोग विकास संस्थान' के कार्यकर्ता इससे खासे उत्साहित हैं। उन्होंने गूँज संस्था के सहयोग से श्रमदान में भाग लेने वाले परिवारों को कपड़े भी वितरित किये। 28 मार्च से रहवासियों ने इस कुएँ से पानी भरना भी शुरू कर दिया है। 'पहल' अब बारिश से पहले यहाँ के लोगों के सहयोग से गाँव के आसपास की पहाडियों पर जल संरचनाएँ (कंटूर ट्रेंच) बनाने का अभियान प्रारम्भ करने का भी मन बना रही है। इससे आने वाली बारिश का कुछ पानी इनमें थमकर गाँव को हरा-भरा कर सकेगा। 'पहल' अगले कुछ सालों में यहाँ से पलायन को रोककर कुपोषण को खत्म करना चाहती है।<br /><br />'पहल' की अनूपा बताती हैं- <b>'बड़वानी जिले के दूरस्थ इलाके में फिलहाल हमने पन्द्रह गाँवों को चयनित किया है, जहाँ कुपोषण की दर सबसे ज्यादा है। कुपोषण को तब तक खत्म नहीं किया जा सकता, जब तक कि लोगों को पीने के लिये साफ पानी नहीं मिल सके। प्रदूषित पानी पीने से लोग बीमार होते हैं तथा उनकी सेहत को नुकसान होता है। हमारी कोशिश है कि इलाके में विभिन्न तरह की जल संरचनाएँ विकसित कर पारम्परिक जल संसाधनों का उपयोग करें और इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बहकर निकल जाने वाले बारिश के पानी को किसी तरह यहाँ रोक सकें। यदि बारिश का पानी रुकने लगे तो पलायन भी रुक सकता है।'</b><br /><br />जल दिवस की सार्थकता इसी में निहित है कि हम अपने पारम्परिक जल संसाधनों को सहेज सकें तथा प्रकृति की अनमोल नेमत बारिश के पानी को धरती की कोख तक पहुँचाने के लिये प्रयास कर सकें। अपढ़ और कम समझ की माने जाने वाले आमली फलिया के आदिवासियों ने इस बार जल दिवस पर पूरे समाज को यह सन्देश दिया है कि बातों को जब जमीनी हकीकत में अमल किया जाता है तो हालात बदले जा सकते हैं।<br /><br />आमला फलिया ने तो अपना खोया हुआ कुआँ और पानी दोनों ही फिर से ढूँढ लिया है लेकिन देश के हजारों गाँवों में रहने वाले लोगों को अभी अपना पानी ढूँढना होगा। तभी हमारा जल दिवस मनाया जाना सार्थक हो सकेगा।<br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=68759&amp;2=comment&amp;3=comment" token="xACvdG_xgA_QaDlhBXdJtPf5Fg7L6h4-pmaja1JdMxg"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Tribal-themselves-find-their-water" data-a2a-title="आदिवासियों ने खुद खोजा अपना पानी"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FTribal-themselves-find-their-water&amp;title=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%96%E0%A5%81%E0%A4%A6%20%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%9C%E0%A4%BE%20%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80"></a></span> Fri, 30 Mar 2018 10:09:46 +0000 RuralWater 68759 at http://hindi.indiawaterportal.org मौर्यकालीन तकनीक से मगध बना पानीदार http://hindi.indiawaterportal.org/Ahar-pyne-in-Bihar <span>मौर्यकालीन तकनीक से मगध बना पानीदार</span> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Sun, 03/25/2018 - 14:52</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">सुभाष पाठक</div> </div> </div> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">हिन्दुस्तान टाइम्स, 4 जनवरी 2018</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">भगीरथ प्रयास का परिणाम बेहतरीन रहा। इससे जमुने-दसईं पईन के आसपास बसे 150 गाँव व बरकी नहर के आसपास बसे 250 गाँवों के खेतों के लिये सिंचाई आसान हो गई। इन गाँवों में खरीफ व रबी की फसल उगाने के साथ ही साग-सब्जियाँ, दलहन व तिलहन की खेती भी की जाती है। पईन व नहर के जीर्णोंद्धार से कृषि संकट भी कम हो गया। आसपास के रहने वाले किसानों में जान आ गई। कई किसान आत्महत्या और पलायन का विचार छोड़कर सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करने में सहयोग करने लग गए।</p> मौर्यकाल में अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि पर आधारित थी। चूँकि कृषि आधार थी, तो सिंचाई के लिये पानी भी जरूरी था।<br /><br />इसे देखते हुए मौर्यकाल में जल संचयन की अपनी पृथक व्यवस्था विकसित की गई थी। इसके अन्तर्गत काफी संख्या में तालाब और आहर-पईन बनाए गए थे।<br /><br />मगध क्षेत्र में जल संचयन की अलग व्यवस्था करने की जरूरत इसलिये भी महसूस की गई क्योंकि इस क्षेत्र में पर्याप्त बारिश नहीं होती है। आहर-पईन और तालाबों का निर्माण बारिश के पानी को संग्रह कर रखने के लिये किया गया था।<!--break--><br /><br />मौर्यकाल की यह व्यवस्था जल संचयन में कारगर थी और यही वजह रही कि मौर्यकाल में अर्थव्यवस्था काफी अच्छी थी। लेकिन, वक्त गुजरने के साथ ही इन व्यवस्थाओं को लोग भूलने लगे। सरकार भी पानी के संग्रह के लिये कोई ठोस योजना नहीं बना सकी। इससे क्षेत्र में पानी की किल्लत बढ़ती चली गई और खेती मुश्किल होती गई।<br /><br />तालाबों को मकान के लिये पाट दिये गए और आहर-पईन में धीरे-धीरे मिट्टी जमने लगी। एक अनुमान के अनुसार गया जिले में कभी 200 तालाब थे जिनमें से 50 तालाबों को पाट दिया गया है।<br /><br />गया शहर की बात करें तो यहाँ आधा दर्जन तालाबों का अस्तित्व खत्म हो चुका है। इन तालाबों की जगह मकान उग आये हैं। गया के अलावा दूसरे इलाकों में भी जल संचयन के माध्यमों को खत्म कर दिया गया।<br /><br />लेकिन, पिछले कुछ वर्षों के लगातार प्रयास से और मौर्यकालीन व्यवस्था को पुनर्जीवित कर कम-से-कम मगध क्षेत्र में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सका है।<br /><br />गौरतलब है कि मगध क्षेत्र में दक्षिण-मध्य बिहार के 10 जिले आते हैं। ये क्षेत्र पिछले एक दशक से जलसंकट से जूझ रहे थे। यहाँ रहने वाले लोगों को खेती छोड़कर दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता था।<br /><br />यहाँ बारिश भी औसत से कम हुआ करती थी और भूजल का दोहन कुछ ज्यादा ही हो रहा था। इससे भूजल स्तर भी काफी नीचे चला गया था।<br /><br /> बताया जाता है कि गया का जलस्तर 200 फीट नीचे चला गया था जिससे ट्यूबवेल भी सूख गए थे। कहा तो यह भी जा रहा है कि जलसंकट के कारण लोग घरों को बेचकर दूसरी जगहों पर भी जाने को मजबूर हो गए थे।<br /><br />यहाँ जलसंकट को देखते हुए सरकार ने कहा था कि 100 किलोमीटर लम्बी नहर खोदकर गंगा से उसे जोड़ा जाएगा लेकिन यह परियोजना विफल हो गई।<br /><br />एक वक्त तो ऐसा भी आया कि लगा यहाँ जल संकट शायद कभी भी खत्म नहीं होगा। लेकिन, अरवल के कॉलेज में पाली व संस्कृत पढ़ाने वाले रवींद्र पाठक को यकीन था कि मौर्यकालीन व्यवस्था में ही इसका समाधान है और इसी रास्ते जल संकट से मुक्ति मिल पाएगी।<br /><br />उन्होंने पुरानी किताबें पढ़नी शुरू कीं, तो अहसास हुआ कि पुराने व बदहाल हो चुके आहर व पईन को पुनर्जीवित करना ही इसका एकमात्र समाधान है।<br /><br />पईन उस चैनल को कहते हैं जिससे होकर नदी का पानी आता है और अहर उस निचले भूखण्ड को कहा जाता है जिनका इस्तेमाल रिजर्वायर के रूप में किया जाता है। इस भूखण्ड को चारों तरफ से बाँध बनाकर घेर दिया जाता है ताकि पानी बाहर न निकल सके।<br /><br />2 हजार वर्ष पहले मौर्यकाल में इन्हीं दो माध्यों से पानी का संचयन कर रखा जाता था।<br /><br />रवींद्र पाठक ने आहर व पईन के जीर्णोंद्धार के लिये वर्ष 2006 में मगध जल जमात का गठन किया। इस संगठन में आम लोगों को शामिल किया गया। रवींद्र पाठक कहते हैं, <b>‘इस क्षेत्र में गहराते जल संकट से मुक्ति पाने का एक ही उपाय था- आहर-पईन का संरक्षण।’</b><br /><br />वह बताते हैं, <b>‘सिंचाई के लिये ट्यूबवेल का बेतहाशा इस्तेमाल और भूजल के रिचार्ज की समुचित व्यवस्था नहीं होने से स्थिति और भी खराब हो गई थी।’</b><br /><br />रवींद्र पाठक ने संगठन तो बना लिया था, लेकिन लोगों को इससे जोड़कर काम करना बहुत कठिन था क्योंकि लोग अपनी एक इंच जमीन भी छोड़ने को राजी नहीं थे।<br /><br />खनेता-पाली गाँव के कंचन मिस्त्री इस सम्बन्ध में कहते हैं, <b>‘शुरुआत में तो गाँव वालों ने आपसी सहयोग से आहर-पईन का जीर्णोंद्धार करने के विचार को ही ठुकरा दिया, क्योंकि उन्हें इस बात का अन्दाजा ही नहीं था कि इसका क्या परिणाम निकल सकता है। असल में उनका विचार था कि सरकार के पास इतने संसाधन होने के बावजूद वह अपनी योजना को सफल नहीं बना सकी, तो मुट्ठी भर लोग यह सब कैसे करेंगे।’</b><br /><br />इसके अलावा स्थानीय माफिया भी थे जिन्हें सरकारी परियोजनाओं का ठेका चाहिए था। स्वेच्छा से शुरू की गई पहल की राह में ये माफिया खतरा थे।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/27132001618/in/dateposted-public/" title="आहर पईन से पानीदार हुआ मगध"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4780/27132001618_4228acab8b.jpg" width="424" height="275" alt="आहर पईन से पानीदार हुआ मगध" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>स्थानीय लोग बताते हैं कि वर्ष 2004 में मगध जल जमात बनने से एक वर्ष पहले सामाजिक कार्यकर्ता सरिता व महेश की हत्या कर दी गई थी। दोनों गया में सिंचाई सिस्टम को लेकर काम कर रहे थे। हत्या की इस घटना से भी लोगों में खौफ था।<br /><br />इन सबके बावजूद पाठक अपने लक्ष्य को लेकर अडिग थे कि उन्हें किसी भी सूरत में क्षेत्र में पानी लाना है।<br /><br />उनकी इस कोशिश में उन्हें सहयोग दिया उनकी पत्नी प्रमिला व एक कारोबारी प्रभात पांडेय ने।<br /><br />उन्होंने कमेटी बनाने के लिये गाँव वालों को भरोसे में लिया और खेत के आकार के अनुसार 100 से 1000 रुपए दान करने को कहा। इस रुपए व लोगों के सहयोग से 125 किलोमीटर लम्बे जमुने-दसईं पईन व 159 किलोमीटर लम्बे बरकी पईन का जीर्णोंद्धार कर दिया।<br /><br />इन दोनों चैनलों का पुनर्निर्माण किया गया और इसमें सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रभूषण ने भी सहयोग किया। इन दोनों पईन में फल्गु नदी से पानी लाया गया।<br /><br />इस भगीरथ प्रयास का परिणाम बेहतरीन रहा। इससे जमुने-दसईं पईन के आसपास बसे 150 गाँव व बरकी नहर के आसपास बसे 250 गाँवों के खेतों के लिये सिंचाई आसान हो गई। इन गाँवों में खरीफ व रबी की फसल उगाने के साथ ही साग-सब्जियाँ, दलहन व तिलहन की खेती भी की जाती है।<br /><br />दोनों पईन व नहर के जीर्णोंद्धार से कृषि संकट भी कम हो गया। आसपास के रहने वाले किसानों में जान आ गई। गया जिले के शाबाजपुर के रहने वाले 45 वर्षीय किसान जयराम भगत ने आत्महत्या करने की ठान ली थी क्योंकि वर्ष 2007 में उनकी धान की फसल खराब हो गई थी, लेकिन जब उन्होंने मगध जल जमात के स्वयंसेवकों से मुलाकात की, तो उन्होंने आत्महत्या करने का विचार छोड़ दिया। जयराम भगत भी उक्त समूह में शामिल हो गए और मजदूरी करने के लिये चंडीगढ़ जाने का निर्णय भी त्याग दिया। वह सिंचाई व्यवस्था मजबूत करने में सहयोग करने लगे।<br /><br />जयराम अकेले किसान नहीं थे, जो मजदूरी करने के लिये बाहर जाते थे। करीब 700 गाँवों के हजारों किसानों के लिये दो जून की रोटी के लिये दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करना मजबूरी थी, क्योंकि खेती के लिये पानी नहीं मिल रहा था और रोजगार का दूसरा कोई विकल्प नहीं था।<br /><br />जयराम अब गाँव में ही रहकर खेती करते हैं और खेती से अच्छी कमाई कर रहे व घर-परिवार को पर्याप्त समय भी दे पाते हैं।<br /><br />मगध जल जमात की कोशिशों का परिणाम ही था कि गया के लोग यह तक कहने लगे कि बुद्ध को ज्ञान मिलने के बाद यह दूसरी बड़ी घटना थी, जो गया में हुई। इस पहल का ही नतीजा था कि गया के स्थानीय लोग, अधिकारी, सेना में कार्यरत लोग व पुलिस इस मिशन से जुड़े और चेकडैम तथा तालाबों की सफाई व उन्हें अतिक्रमण मुक्त करने के लिये काम करने लगे।<br /><br />गया जिले के वकील राजेश क्षितिज कहते हैं, <b>‘गया में पहले पानी की समस्या को लेकर प्रदर्शन आम घटना थी लेकिन अब यह बीते दिनों की बात हो गई है। जो हैण्डपम्प व कुएँ सूख चुके थे, उनमें भी अब पानी आने लगा है।’</b><br /><br />मगध जल जमात के इस प्रयास को राष्ट्रीय स्तर पर सराहना भी मिली। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र व मैग्सेसे अवार्डी राजेंद्र सिंह ने संगठन के कामकाज की तारीफ की।<br /><br />यही नहीं, इस सफल प्रयोग ने बिहार सरकार को भी ऐसे ही मॉडल पर काम करने की प्रेरणा दी। वर्ष 2011 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सिंचाई, जनस्वास्थ्य व अभियांत्रिकी, रेवेन्यू व भूमि सुधार विभागों को मगध जल जमात के मॉडल पर काम करने की सलाह दी।<br /><br />यहाँ यह भी बता दें कि मगध क्षेत्र में बड़े और मझोले को मिलाकर चार सिंचाई परियोजनाएँ हैं जिनमें सोन कनाल भी एक है। इन सभी परियोजनाओं के जरिए गया, अरवल, जहानाबाद, औरंगाबाद, नालंदा और नवादा जिले के महज 30 हजार हेक्टेयर खेत की ही सिंचाई हो पाती है।<br /><br /> वर्ष 1972 और फिर 2006 में झारखण्ड के पलामू और गया के पुनपुन बैराज में उत्तर कोयल रिजर्वायर स्कीम हाथ में ली गई थी, लेकिन यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई।<br /><br />सिंचाई विभाग के गया सर्किल के एग्जिक्यूटिव इंजीनियर अशोक कुमार चौधरी कहते हैं, <b>‘मौजूद कनाल सिस्टम केवल खरीफ या मानसून सीजन में ही काम करता है। लेकिन, पुनर्जीवित किये गए आहर-पईन की मदद से गया जिले के किसान 1,50,000 हेक्टेयर में चावल, 1,00,000 हेक्टेयर में गेहूँ और 10 हजार हेक्टेयर में दहलन व तिलहन की खेती कर लेते हैं।</b><br /><br />उल्लेखनीय है कि गया जिले में जमुने-दसईं पईन के अलावा बरकी पईन, मोरातल पईन, निनसर-शकुराबाद पईन, नाला-करमडीह-पाले पईन समेत आधा दर्जन से अधिक पईन हैं।<br /><br />माओवादी गतिविधियों के चलते गया में सरकार से किसी तरह की मदद नहीं मिलती थी, लेकिन जल जमात ने मौर्यकाल के नेटवर्क पर काम करते हुए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कराई।<br /><br />आहर-पईन की सफलता को देखते हुए ईमामगंज व डुमरिया के करीब 7 गाँवों के लोगों ने बारिश का पानी संग्रह करने के लिये मगध जल जमात से चेकडैम बनाने की अपील की थी। यह क्षेत्र जीटी रोड से 22 किलोमीटर दूर है और वहाँ तक पहुँचना मुश्किल काम था।<br /><br />एक दशक बाद अपने खेत में खेती करने वाले पचमन गाँव के 60 वर्षीय किसान कामेश्वर यादव कहते हैं, <b>‘हमारे स्वयंसेवकों ने करीब 2 महीनों तक काम कर चेकडैम बनाया और पईन को पुनर्जीवित किया। इससे अभी एक दर्जन गाँवों के किसान अपने खेत की सिंचाई करते हैं और साथ ही इसे आहर व पईन का रिचार्ज भी हो जाता है।’</b><br /><br />इस पहल का परिणाम यह निकला कि खेती-किसानी दोबारा यहाँ शुरू हुई और रोजगार के लिये युवाओं का पलायन रुक गया। यहाँ के युवा अब अपने खेत में दलहन व तिलहन की खेती कर अच्छी कमाई कर लेते हैं।<br /><br />दिल्ली की एक दुकान में काम कर रोजी-रोटी चलाने वाले निरंजन यादव अब गाँव लौट आये हैं। वह कहते हैं, <b>‘हमने 2014 में महज 44 हजार रुपए खर्च कर चेकडैम बनाया था। ऐसा ही चेकडैम बनाने के लिये राज्य सरकार 5 लाख रुपए खर्च करती और एक साल का वक्त लगाती।’</b><br /><br />उन्होंने कहा, <b>‘चेकडैम के कारण अब मैं मछलीपालन की भी योजना बना रहा हूँ और उम्मीद है कि इस बार रबी की बम्पर फसल होगी।’</b><br /><br />आम लोगों के प्रयास से सफलता की इबारत लिखने वाला जल संचयन का यह मॉडल जल संकट से ग्रस्त क्षेत्र के लिये एक नजीर हो सकता है।<br /><br /><b>अनुवाद - उमेश कुमार राय</b><br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=68606&amp;2=comment&amp;3=comment" token="E1lhDQ3Q8PTrasaXhS6qQU3tcL_QFpoNz1sBRp-TWvc"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Ahar-pyne-in-Bihar" data-a2a-title="मौर्यकालीन तकनीक से मगध बना पानीदार"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FAhar-pyne-in-Bihar&amp;title=%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%A8%20%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%95%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%A7%20%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0"></a></span> Sun, 25 Mar 2018 09:22:29 +0000 RuralWater 68606 at http://hindi.indiawaterportal.org रंग लाई भेलडुंग के ग्रामीणों की मेहनत http://hindi.indiawaterportal.org/node/68512 <span>रंग लाई भेलडुंग के ग्रामीणों की मेहनत</span> <span><span>Hindi</span></span> <span>Fri, 03/23/2018 - 13:20</span> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">राष्ट्रीय सहारा, 23 मार्च 2018</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">सप्ताह भर पहले सोशल मीडिया के माध्यम से जब सेना में कार्यरत स्थानीय निवासी धर्मेंद्र जुगलान ने गाँव में पानी की किल्लत का समाचार पढ़ा तो वे स्वयं अवकाश लेकर गाँव पहुँच गये और जल संरक्षण कर रहे स्थानीय लोगों के सहयोग में जुट गए। देखते ही देखते मेहनत रंग लाई। वर्ष 2014 में बैरागढ़ आपदा की और बादल फटने की घटना से क्षतिग्रस्त प्राकृतिक जल स्रोतशिला गदन से पानी के तीन पाइपों को जोड़कर एक बड़े पाइप में जोड़ दिया गया।</p>पलायन का पर्याय बने उत्तराखण्ड के युवा अब अपनी पूर्वजों की धरती के संरक्षण को जाग्रत होने लगे हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और पानी की गम्भीर समस्या से जूझते लोगों को जब कोई सहारा नहीं मिला तो ग्रामीणों ने पलायन का रास्ता अपनाया। किन्तु धीरे-धीरे प्रवासियों को अपने पूर्वजों की माटी और उजड़ती तिबारियों की पीड़ा भी सताती रही।<br /><br />ऋषिकेश से मात्र एक घंटे के सफर की दूरी पर बसे गाँव भेलडुंग के मूल निवासी एक माह से जलसंकट से जूझ रहे थे। इसी बीच जल संरक्षण के लिये प्रवासी गाँववासियों ने प्रयत्न कर रहे स्थानीय लोगों के सहयोग में जुट गए।<!--break--> देखते ही देखते मेहनत रंग लाई। वर्ष 2014 में बैरागढ़ आपदा की और बादल फटने की घटना से क्षतिग्रस्त प्राकृतिक जलस्रोत शिला गदन से पानी के तीन पाइपों को जोड़कर एक बड़े पाइप में जोड़ दिया गया और इसके साथ ही पेयजल की समस्या का समाधान हो गया।<br /><br />भेलडुंग के मूल निवासी विनोद जुगलान ने विश्व की नम्बर वन दुपहिया वाहन के पुर्जे बनाने वाली कम्पनी में उच्च प्रबंधन के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर न केवल समाज सेवा का रास्ता अपनाया बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में पूर्ण रूप से समर्पित हो गये। एक सप्ताह पहले उन्होंने अपने गाँव के संरक्षण पर अपने ग्रामीण बन्धुओं से फोन पर सम्पर्क साधा और गाँव बचाने की मुहिम की शुरुआत हो गयी।<br /><br /> सप्ताह भर पहले सोशल मीडिया के माध्यम से जब सेना में कार्यरत स्थानीय निवासी धर्मेंद्र जुगलान ने गाँव में पानी की किल्लत का समाचार पढ़ा तो वे स्वयं अवकाश लेकर गाँव पहुँच गये और जल संरक्षण कर रहे स्थानीय लोगों के सहयोग में जुट गए। देखते ही देखते मेहनत रंग लाई। वर्ष 2014 में बैरागढ़ आपदा की और बादल फटने की घटना से क्षतिग्रस्त प्राकृतिक जल स्रोतशिला गदन से पानी के तीन पाइपों को जोड़कर एक बड़े पाइप में जोड़ दिया गया।<br /><br /> इस कार्ययोजना को अंजाम तक पहुँचाने में जहाँ स्थानीय निवासी रविन्द्र जुगलान ने अहम भूमिका निभाई। वहीं दूसरी ओर पुरानी और जीर्णशीर्ण हो चुकी पानी की डिग्गी की मरम्मत का कार्य धर्मेंद्र जुगलान, जितेंद्र जुगलान, प्यारे लाल जुगलान ने किया। तीन दिन तक चले इस जल ऑपरेशन को युद्ध स्तर पर अंजाम दिया गया। बहुत ही सावधानी पूर्वक किये गए इस जल संरक्षण की कार्य योजना को अंजाम तक पहुँचाने में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन अहमदाबाद के जल संरक्षण विशेषज्ञ दिनेश शर्मा जुगलान, राजेश जुगलान ने मार्गदर्शन किया। क्योंकि जल संरक्षण के समय मूल स्रोत से छेड़छाड़ करने से प्राकृतिक जलस्रोत के सूखने का बड़ा खतरा था। एक माह से चल रही पानी की किल्लत के बाद पुन: पानी लौटने पर गाँव में खुशी का माहौल है। गाँव में स्थापित पुरातन देवी मंदिर में भेली चढ़ाकर गुड़ का प्रसाद वितरित किया गया। भेलडुंग गाँव में मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण अन्य प्रदेशों में प्रवास कर रहे सभी मूल निवासी अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह में गाँव लौटेंगे।<br /><br /> नौ अप्रैल से 15 अप्रैल तक आध्यात्मिक भागवत कथा और रात्रि में ग्राम संरक्षण पर सामाजिक मन्थन होगा। साथ ही भेलडुंग गाँव को <b>“हमारा गाँव, हमारी विरासत”</b> के तहत यमकेश्वर प्रखंड का पहला हरित ग्राम सहित ईको विलेज बनाने के प्रयास किये जा रहे हैं। पर्यावरणविद विनोद जुगलान ने कहा कि देव भूमि पर मदिरा के प्रमोशन और जल संरक्षण पर सरकारी उपेक्षा के कारण पलायन निरन्तर जारी है। पलायन रोकने के लिये मिलजुल कर उपाय करने की आवश्यकता है। वरना पहाड़ों से जीवन समाप्त हो जायेगा।<br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=68512&amp;2=comment&amp;3=comment" token="CHOTrCNisvRCouvAbwPVKGwBVCZiaStWP5d0wxvpJ30"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/node/68512" data-a2a-title="रंग लाई भेलडुंग के ग्रामीणों की मेहनत"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fnode%2F68512&amp;title=%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97%20%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88%20%E0%A4%AD%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%A1%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%97%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%80%E0%A4%A3%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A4%A4"></a></span> Fri, 23 Mar 2018 07:50:01 +0000 Hindi 68512 at http://hindi.indiawaterportal.org हरियाली और पानी लौटने से हरा-भरा हुआ मानर मल्ला गाँव http://hindi.indiawaterportal.org/Manar-malla-village <span>हरियाली और पानी लौटने से हरा-भरा हुआ मानर मल्ला गाँव </span> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Mon, 02/19/2018 - 18:29</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">नमिता</div> </div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p> </p> <p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">आज मानर मल्ला गाँव खूबसूरत घने जंगल से घिर चुका है। गाँव के चार बड़े जलस्रोत भी रिचार्ज हो चुके हैं। अब यहाँ पानी की कोई किल्लत नहीं रही है। गाँव में सिर्फ जल संरक्षण के लिये काम नहीं हुआ बल्कि जंगल को भी पनपाया गया। पेड़ की उपलब्धता के साथ-साथ पानी भी स्वस्फूर्त रिचार्ज होता गया। यही वजह है कि गाँव में पानी की किल्लत भी दूर हुई और हरियाली भी एक लम्बे समय बाद गाँव में लौट आई है।</p> <p>उत्तराखण्ड में पानी त्रासदी को यहाँ की महिलाएँ ही समझ सकती हैं। यही वजह है कि समाधान भी वे महिलाएँ ढूँढ निकालती हैं। यहाँ का इतिहास गवाह है कि प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा बाबत जब-जब महिलाएँ आगे आईं तब-तब सरकारों को निर्णय लेना पड़ा, वह चाहे चिपको हो, रक्षासूत्र आन्दोलन हो या राज्य प्राप्ति का आन्दोलन हो। इन सभी लड़ाइयों में राज्य की महिलाओं की अग्रणी भूमिका रही है। अब ऐसा लग रहा है कि अगली लड़ाई महिलाओं की ‘पानी के संरक्षण’ की होने वाली है।<br /><br /> टिहरी जनपद के पटुड़ी गाँव में पेयजल की समस्या का समाधान, पौड़ी जनपद के रामजीवाला गाँव में जल समाधान और उफरैखाल की जल तलैया बिना महिलाओं के आज एक नजीर नहीं बनती। इसी तरह चम्पावत जनपद के मानर मल्ला गाँव में महिलाओं ने पुरुषों को जता दिया कि पानी संकट का समाधान सामूहिक रूप से ही किया जा सकता है।<br /><br /> बता दें कि नेपाल की सीमा से लगे उत्तराखण्ड के चम्पावत क्षेत्र के मानर मल्ला गाँव में एक सौ परिवार निवास करते हैं। गाँव की संख्या लगभग 1000 बताई जाती है। उत्तर प्रदेश के जमाने से ही यह गाँव पेयजल की समस्या से जूझ रहा था। किन्तु उन्हें विश्वास था कि जब कभी उनका उत्तराखण्ड वजूद में आएगा तो उनके गाँव की यह मूलभूत समस्या वैसे ही समाप्त हो जाएगी। परन्तु पेयजल की यह समस्या वहाँ के लोगों को राज्य बनने के बाद और पीड़ा देने लग गई। राज्य वजूद में आया, मगर वहाँ की इस पेयजल की समस्या पर मौजूद जन-प्रतिनिधियों ने कभी भी नजर डालने की जहमत नहीं उठाई।<br /><br /> गाँव की आबोहवा इतनी बेरुखी बनती जा रही थी कि सरकारी वन निगम के ठेके भी बची-खुची प्रकृति पर प्रहार कर रहे थे। फलस्वरूप इसके गाँव के पास जंगल भी खत्म हो गए। प्राकृतिक जलस्रोत सूख गए। ग्रामीण महिलाओं की कमर पानी ढो-ढोकर टेड़ी हो गई। यही नहीं ये गाँव की महिलाएँ उन दिनों बूँद-बूँद पानी को तरसती ही रहती थीं। हरियाली का दूर-दूर तक गाँव में नामोनिशान न था। भूजल स्तर गर्त में जा समाया था। पानी ढोने की जिम्मेदारी अब सिर्फ-व-सिर्फ महिलाओं के सिर पर आन पड़ी। इसके लिये उन्हें गाँव से लम्बी दूरी तय करनी पड़ती थी।<br /><br /> इस हालात का सबब इतना था कि मानर मल्ला गाँव में पेयजल को लेकर परेशानी दिनों दिन बढ़ती ही जा रही थी और जिसका समाधान करना ग्रामीणों को जरूरी हो गया था। त्रस्त हो उठी मानर मल्ला गाँव की महिलाओं ने मंथन शुरू कर दिया।<br /><br /> इस सामूहिक कार्य में बायफ डेवलपमेंट एंड रिसर्च फाउंडेशन संस्था ने उनका हर पल साथ दिया। उन्होंने अब शहर से गाँव पहुँचने वाले कुछ जानकारों से भी चर्चा करनी आरम्भ कर दी। उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि समस्या का मूल कारण क्या हो सकता है। हरियाली से ही तो रास्ता निकल सकता था। हरियाली लौटाने का संकल्प लिया गया। गाँव की महिलाएँ स्वयं के संसाधनों से वृक्षारोपण की कार्ययोजना पर काम आगे बढ़ाने लग गईं। वर्ष भर का प्लान तैयार हो गया। खाली पड़ी जमीन पर वृक्षारोपण करना आरम्भ कर दिया गया। एक तरफ वृक्षारोपण और दूसरी तरफ बरसाती पानी के एकत्रिकरण का काम भी शुरू हुआ।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <h3>ऐसे किया समाधान</h3> <p><br /> मानर मल्ला गाँव की 80 महिलाएँ एकजुट हो गईं। एक समूह का गठन किया गया। उन्होंने तय किया कि अपने गाँव के इर्द-गिर्द की सारी बंजर भूमि को हरे-भरे जंगल में तब्दील कर देंगी। उन्हें पता चल चुका था कि वृक्षों की मौजूदगी से जलस्तर स्वतः ऊपर आ जाएगा और महिलाएँ पौधरोपण में जुट गईं। यही नहीं उन्होंने प्रतिकूल स्थितियों में भी पौधों की देखरेख करती रहीं। साल 2004 से आरम्भ हुआ जल संरक्षण का काम रंग देता दिखाई दिया। इसी तरह 12 साल बीत गए। संकल्प अन्ततः पूर्ण हुआ।<br /><br /> आज मानर मल्ला गाँव खूबसूरत घने जंगल से घिर चुका है। गाँव के चार बड़े जलस्रोत भी रिचार्ज हो चुके हैं। अब यहाँ पानी की कोई किल्लत नहीं रही है। गाँव में सिर्फ जल संरक्षण के लिये काम नहीं हुआ बल्कि जंगल को भी पनपाया गया। पेड़ की उपलब्धता के साथ-साथ पानी भी स्वस्फूर्त रिचार्ज होता गया। यही वजह है कि गाँव में पानी की किल्लत भी दूर हुई और हरियाली भी एक लम्बे समय बाद गाँव में लौट आई है।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <h3>संगठन के प्रयास का नतीजा</h3> <p><br /> मानर मल्ला गाँव चम्पावत जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर खेतीखान रोड पर पड़ता है। यहाँ कुल 100 परिवारों का बसेरा है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर कार्य करने वाली संस्था बायफ डेवलपमेंट एंड रिसर्च फाउंडेशन ने विपत्ति की उस घड़ी में गाँव का सहयोग किया। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि हरियाली न होने के कारण ही जलस्रोत समाप्त हो गए हैं।<br /><br /> यह बात गाँव वालों को समझ में आ गई। उन्होंने नरसिंह बाबा चारागाह विकास समूह बनाया। जिसका मकसद था वन पंचायत की 11 हेक्टेयर बंजर जमीन को जंगल में तब्दील करना। जिम्मा सम्भाला गाँव की 80 महिलाओं ने। सबसे पहले पौधों की नर्सरी बनाई गई। तैयार पौधों को बंजर जमीन में रोपा जाने लगा। बांज, बुरांश, खरसू, मोरू, भीमल और काफल के अलावा कई अन्य प्रजातियों के करीब 27 हजार पौधे रोपे गए। गाँव में ही जैविक खाद तैयार की जाती रही और पौधों में डाली जाती रही। पौधों के लिये पानी का इन्तजाम बरसाती पानी का संरक्षण कर किया जाने लगा।</p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <p> </p> <h3>बच्चे की तरह पाला</h3> <p><br /> बंजर जमीन को हरियाली में बदलने वाले इस समूह में अब सौ से अधिक महिलाएँ हैं। समूह की वरिष्ठ सदस्या विमला देवी कहती हैं कि 12 साल से इस जंगल को बच्चे की तरह पाल रहे हैं। गाँव की महिलाएँ हर दिन क्रमवार वृक्षों की सुरक्षा का जिम्मा लेती हैं। उनकी देखभाल के साथ-साथ वे समय-समय पर वृक्षों को सिंचने का काम करती रहीं। अब तो उन्हें यह सब नहीं करना पड़ रहा है।<br /><br /> एक समय था जब गाँव में पानी की बहुत समस्या थी, लेकिन आज यहाँ पानी की कोई समस्या नहीं है। वहीं, तुलसी देवी बताती हैं कि जंगल से जलावन लकड़ी काटने के लिये लोगों को महिलाओं के समूह से स्वीकृति लेनी पड़ती है। बेवजह लकड़ी काटने वाले पर 500 रुपए का जुर्माना लगाया जाता है। वे आगे बताती हैं कि हम सब मिलकर इसकी देखरेख करते हैं। यही वजह है कि आज मानर मल्ला गाँव के आस-पास ग्यारह हेक्टेयर में मिश्रित वन तैयार हो चुका है।</p> <p>  </p><p>  </p><p> </p> <p> </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=68106&amp;2=comment&amp;3=comment" token="2gXT78sFEn3P1GkXxTEsx3iOspzco5-knbPv0obXPP0"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Manar-malla-village" data-a2a-title="हरियाली और पानी लौटने से हरा-भरा हुआ मानर मल्ला गाँव "><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FManar-malla-village&amp;title=%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%20%E0%A4%94%E0%A4%B0%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%B2%E0%A5%8C%E0%A4%9F%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%86%20%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B0%20%E0%A4%AE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE%20%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5%20"></a></span> Mon, 19 Feb 2018 12:59:29 +0000 RuralWater 68106 at http://hindi.indiawaterportal.org तालाब सुधारा तो पटरी पर लौटी जिन्दगी http://hindi.indiawaterportal.org/Pond-in-chapra-village <span>तालाब सुधारा तो पटरी पर लौटी जिन्दगी</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Thu, 01/04/2018 - 11:39</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">तालाब को गहरा करते हुए इसकी गाद वाली काली मिट्टी ट्रैक्टरों में भरकर ले जाने की पंचायत ने अनुमति दे दी। देखते-ही-देखते जून के पहले हफ्ते तक गाँव के लोगों ने यहाँ से करीब चार हजार ट्रॉली मिट्टी और मुरम खोद डाली। इससे कई जगह तो तालाब डेढ़ से दो मीटर तक गहरा हो गया। पंचायत ने तालाब तक आने वाली बारिश के पानी की नालियों को गहरा कर साफ-सुथरा करवाया।इससे हुआ यह कि इस साल कम बारिश होने के बाद भी तालाब में पर्याप्त पानी पहुँचा और आमतौर पर हर साल दीवाली तक सूख जाने वाला यह तालाब अब जनवरी के महीने में भी लबालब भरा है।</p> कल्पना कीजिए, उस गाँव के बारे में जहाँ बीते साल ठंड और गर्मियों में एक बोतल पीने का पानी खरीदने के लिये दो से तीन रुपए तक चुकाने पड़ते थे, वहाँ इस बार औसत से भी कम बारिश होने पर क्या हालात बन रहे होंगे। आप यही कहेंगे कि इस साल तो हालत और भी खराब होगी। लेकिन इस साल कम बारिश होने के बावजूद यह गाँव पानीदार बना हुआ है। इसके लिये बीते साल गाँव के लोगों और पंचायत ने बस थोड़ी-सी मेहनत की और अब यह गाँव बाकी गाँवों के लिये पानी की आत्मनिर्भरता के मामले में मिसाल बन चुका है। गाँव के कुएँ-कुण्डियों से लगाकर हैण्डपम्प और ट्यूबवेल भी लगातार पानी उलीच रहे हैं।<br /><br /> अब जानते हैं कि ऐसा क्या हुआ जो कम बारिश होने के बाद भी यह गाँव अब तक पानीदार बन हुआ है... तो आइए चलते हैं इस गाँव की ओर। मध्य प्रदेश में इन्दौर-बैतूल राष्ट्रीय राजमार्ग पर इन्दौर से करीब 60 किमी दूर चापड़ा गाँव पड़ता है। यह गाँव सड़कों के चौराहे पर है और चौबीसों घंटे यहाँ वाहनों की आवाजाही बनी रहती है। इन्दौर और बैतूल के साथ यह गाँव बागली और देवास को भी जोड़ता है। इसलिये इसे चापड़ा चौपाटी भी कहा जाता है।<br /><br /> करीब आठ-दस हजार की आबादी वाले इस छोटे से गाँव में देवास रोड पर बरसों पुराना एक बड़ा तालाब है। पहले यह गाँव से सटा हुआ था, लेकिन अब आबादी बढ़ने से इसके आसपास भी लोग रहने लगे हैं। एक कॉलोनी श्याम नगर तो तालाब के बहुत पास ही बनी है, जिसमें करीब सौ मकान बने हैं। <br /><br />दो-तीन पीढ़ी पहले यहाँ के ग्रामीणों ने इस तालाब को अपने गाँव के लोगों के निस्तारी कामों के लिये जनसहयोग से बनाया था। तालाब में बारिश का पानी भरता और गर्मियों के मौसम तक इसमें पानी भरा रहता। इस तालाब में पानी भरे होने का सबसे बड़ा फायदा यह था कि आसपास के कुएँ-कुण्डियों के तल में गर्मियों के दिनों में भी मीठे पानी के सोते फूटते रहते। गाँव में पानी की कभी कोई किल्लत नहीं रही।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/25619005238/in/dateposted-public/" title="तालाब से आई खुशहाली"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4679/25619005238_4e3c4c5837.jpg" width="424" height="300" alt="तालाब से आई खुशहाली" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>कभी पानी का संकट नहीं था तो किसी ने तालाब की तरफ कुछ खास ध्यान भी नहीं दिया। पंचायत ने भी तवज्जो नहीं दी और तालाब अपनी उपेक्षा के चलते छोटा और उथला होता गया। साल-दर-साल तालाब में गाद जमते जाने से तालाब की गहराई बहुत कम रह गई। ठंड के दिनों में ही पानी सूखने लगा और तालाब का मैदान बच्चों के खेलने के काम आने लगा। दिसम्बर-जनवरी महीने में यहाँ खंड स्तर से लेकर जिला स्तर तक की क्रिकेट प्रतियोगिताएँ होने लगीं।<br /><br /> तालाब की अनदेखी हुई तो गाँव का प्राकृतिक जलस्तर भी लगातार गहराता गया। कुएँ-कुण्डियों में पानी की कमी हुई तो सरकार ने और लोगों ने अपने निजी खर्च से ट्यूबवेल और हैण्डपम्प लगाने शुरू किये, लेकिन धरती में ही पानी नहीं था तो इनमें पानी कहाँ से आता। जलस्तर बहुत गहरे तक चला गया। हजारों रुपए खर्च कर किये जाने वाले ट्यूबवेल बेकार होने लगे। <br /><br />लोगों को पानी के संकट ने परेशान कर दिया। हर सुबह पानी की किल्लत और खाली बर्तनों की खड़खड़ाहट के साथ शुरू होती तो देर रात तक पानी के लिये मारामारी बनी रहती। टैंकर वाले कहीं से पानी का इन्तजाम तो कर देते लेकिन यह पानी आम लोगों को काफी महंगा पड़ रहा था। एक बोतल पानी के लिये दो से तीन रुपए तो एक सामान्य परिवार के लिये महीने भर का पानी का खर्च ही तीन सौ से पाँच सौ रुपए तक हो जाता है। एक सामान्य तथा मजदूरी करने वाले परिवारों के लिये यह काफी बड़ा खर्च था।<br /><br /> गाँव के लोग पानी के संकट से बड़े परेशान थे लेकिन उनके पास इसका कोई यथोचित उपाय नहीं था। बीते तीन सालों से जब लोग इस संकट से बुरी तरह तंग आ गए तो पंचायत में इस पर बात करने के लिये गाँव भर के लोग इकट्ठा हुए। यहाँ काफी विचार-विमर्श के बाद भी जब कोई बात नहीं जँची तो बुजुर्गों ने कहा कि जब तक गाँव से सटे इस तालाब की सुध नहीं लोगे, तब तक गाँव से पानी का संकट दूर नहीं हो सकता। जल संकट से आजिज आ चुके लोगों के लिये यह बात उम्मीद की किरण की तरह थी। <br /><br />यहाँ की महिला सरपंच सौरमबाई को भी लगा कि बात तो सही है। तालाब में किसी तरह गर्मियों तक पानी भरा रह सके तो इसका फायदा गाँव के जलस्तर बढ़ाने में मिल सकता है। लेकिन शुरुआत कहाँ से की जाये और इसके लिये पैसा कहाँ से आएगा... इस पर देर तक बात होती रही। पंचायत के पास इतना पैसा था नहीं तो तय किया गया कि जनभागीदारी से तालाब का गहरीकरण तथा पालबंदी की जाये।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/39458478382/in/dateposted-public/" title="अपने कुएँ के पास खड़ा चापड़ा गाँव का किसान"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4635/39458478382_667cf558b5.jpg" width="424" height="300" alt="अपने कुएँ के पास खड़ा चापड़ा गाँव का किसान" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>सरपंच सौरमबाई की पहल पर बातों-ही-बातों में ऐसे किसानों की सूची बनाई गई, जिन्हें अपने खेतों के लिये मिट्टी की जरूरत थी। कुछ अन्य लोगों ने भी अपने मकान आदि में भराव करने के लिये मिट्टी की आवश्यकता जताई। बीते साल अप्रैल के महीने से किसानों और अन्य लोगों को तालाब को गहरा करते हुए इसकी गाद वाली काली मिट्टी ट्रैक्टरों में भरकर ले जाने की पंचायत ने अनुमति दे दी। देखते-ही-देखते जून के पहले हफ्ते तक गाँव के लोगों ने यहाँ से करीब चार हजार ट्रॉली मिट्टी और मुरम खोद डाली। इससे कई जगह तो तालाब डेढ़ से दो मीटर तक गहरा हो गया। पंचायत ने तालाब तक आने वाली बारिश के पानी की नालियों को गहरा कर साफ-सुथरा करवाया।<br /><br /> इससे हुआ यह कि इस साल कम बारिश होने के बाद भी तालाब में पर्याप्त पानी पहुँचा और आमतौर पर हर साल दीवाली तक सूख जाने वाला यह तालाब अब जनवरी के महीने में भी लबालब भरा है। इसके पानी को सिंचाई में लेने पर प्रतिबन्ध है। फिलहाल तालाब में कई जगह पाँच से नौ फीट तक पानी भरा हुआ है। इतना ही नहीं पूर्व सरपंच नानूराम यादव के कार्यकाल में तालाब की पाल पर जो पौधे रोप गए थे, वे पानी के अभाव में सूखने की कगार पर थे लेकिन तालाब में पर्याप्त पानी होने से अब वे भी पेड़ के आकार में तब्दील हो रहे हैं।<br /><br /> स्थानीय पत्रकार नाथूसिंह सैंधव कहते हैं- <b>'चापड़ा पानी के लिये एक मिसाल बनकर उभरा है। अब आसपास के लोग भी इस साल अपने गाँव के तालाबों को सुधारने की बात कर रहे हैं। गहरीकरण से न सिर्फ यहाँ के तालाब में नीला पानी ठाठे मार रहा है, बल्कि जलस्तर बढ़ जाने से इसके आसपास के कुएँ-कुण्डियों तथा ट्यूबवेल-हैण्डपम्पों में भी अब तक पानी भरा है। उम्मीद है कि गर्मियों तक इसमें पानी भरा रहेगा। इस साल बीते सालों की तरह गाँव में पानी का संकट नहीं है। गाँव भर के जलस्रोत पानी दे रहे हैं। मवेशियों के लिये पानी तालाब से मिल जाता है। पानी होने से किसानों और यहाँ के लोगों के चेहरे भी अब पानीदार हो गए हैं।'</b><br /><br /> सरपंच सौरमबाई कहती हैं- <b>'बीते साल 2016 में हमने जो प्रयोग किया, वह बहुत कारगर साबित हुआ है। पूरे गाँव को इसका फायदा मिला और हम आत्मनिर्भर बन गए। अब इस साल गर्मियों में हम तालाब का बाकी काम भी लगाएँगे। इस बार भी जनभागीदारी से तालाब के गहरीकरण की योजना बनाकर जनपद पंचायत को भेजी है। ग्रामीण इससे खास उत्साहित हैं।'</b><br /><br /> श्याम नगर निवासी प्रेमनारायण शुक्ल कहते हैं- <b>'बीते दस सालों में पानी का संकट बढ़ता ही चला गया। सरकार ने हैण्डपम्प और ट्यूबवेल खुदवाए लेकिन जमीन में ही पानी नहीं तो इनमें पानी कैसे आता... बीते तीन सालों से तो हालात इतने गम्भीर है कि ठंड के दिनों से ही खेतों के कुओं से पानी लाना पड़ता था या मोल खरीदकर। एक बोतल पानी के लिये दो से तीन रुपए तक चुकाना पड़ता था। लेकिन अब ऐसा दिन नहीं आएगा'</b><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/38780297754/in/dateposted-public/" title="तालाब की वजह से कुण्डियों में भी पानी आ गया है"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4686/38780297754_5f56812c8e.jpg" width="424" height="300" alt="तालाब की वजह से कुण्डियों में भी पानी आ गया है" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>बुजुर्ग जगन्नाथ यादव कहते हैं- <b>'गाँव पानी का मोल भूल गया था। तालाब के कारण जलस्तर अच्छा होने से कभी गाँव ने पानी का संकट नहीं झेला तो लोगों ने पानी का अनादर और जलस्रोतों की अनदेखी करनी शुरू कर दी। बीते बीस सालों में तालाब के पानी का उपयोग तो सबने किया लेकिन किसी ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। तालाब गर्मियों से पहले ही सूखने लगा। गाद जमते-जमते तालाब बहुत उथला हो गया। लोगों ने धीरे-धीरे अतिक्रमण कर तालाब को पाटने लगे। अच्छा-भला तालाब गंदले डोबरे में बदलने लगा तो गाँव में भी पानी की हाहाकार सुनाई देने लगी। बीते साल लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ और अब तालाब ने हमें माफ भी कर दिया।'</b><br /><br /> चापड़ा के लोगों ने तो अपनी गलती सुधारकर प्रायश्चित कर लिया, लेकिन देश के हजारों गाँव अब भी अपने जलस्रोतों की उपेक्षा कर रहे हैं। इस बार गर्मियों से पहले ऐसे हजारों गाँवों को अपने जलस्रोतों को सहेजने-सँवारने का संकल्प लेना होगा ताकि बारिश के बाद वे भी पानीदार बन सकें...<br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=67637&amp;2=comment&amp;3=comment" token="GNPvOvFOzwvTWmUnojyf1Qq5diGtUg-Im4WxQcZwtQc"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Pond-in-chapra-village" data-a2a-title="तालाब सुधारा तो पटरी पर लौटी जिन्दगी"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FPond-in-chapra-village&amp;title=%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AC%20%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%A4%E0%A5%8B%20%E0%A4%AA%E0%A4%9F%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%AA%E0%A4%B0%20%E0%A4%B2%E0%A5%8C%E0%A4%9F%E0%A5%80%20%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%97%E0%A5%80"></a></span> Thu, 04 Jan 2018 06:09:51 +0000 RuralWater 67637 at http://hindi.indiawaterportal.org पानी और हरियाली से हरा-भरा गाँव http://hindi.indiawaterportal.org/Lapodia-village-Rajsthan <span>पानी और हरियाली से हरा-भरा गाँव</span> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Tue, 12/26/2017 - 15:00</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">श्रीपद्रे</div> </div> </div> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">द वाटर कैचर्स, निम्बी बुक्स प्रकाशन, 2017</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">कई महीने तक खोजबीन करने और तरह-तरह के उपायों पर विचार करने के बाद लक्ष्मण सिंह ने चौका बनाने का विचार सामने रखा। यह गाँव के वातावरण के अनुकूल था और पानी के साथ-साथ माटी के क्षरण को रोकने में भी कारगर था। चौका, चौकोर आकार का कम गहराई वाला एक उथला गड्ढा होता है। इसकी गहराई नौ इंच के आसपास रखी जाती है। इससे इसमें पानी इकट्ठा होता है और फिर एक तरफ से इसकी ऊँचाई हल्की सी कम कर दी जाती है तो यही पानी धीरे-धीरे रिसकर टाँका की तरफ बह जाता है।</p> लोकभाषा में लापोड़िया का मतलब होता है मूर्खों का गाँव। ऐसा गाँव जहाँ लोग पढ़े लिखे नहीं हैं। अपने साधन और समृद्धि के प्रति उदासीन हैं और शिक्षा संस्कार से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। मूर्खों के इस गाँव में रहने वाले लोग सदा आपस में लड़ते झगड़ते रहते हैं ताकि उनके ग्राम नाम की महिमा कम न हो। लापोड़िया था भी ऐसा ही लेकिन तीस साल पहले तक। आज का लापोड़िया मूर्खों का गाँव नहीं बल्कि ऐसे समझदार लोगों की सभा है जहाँ लोग अपने साधन संसाधन के प्रति संवेदनशील हो गए हैं। वो अब शिक्षा और संस्कार को प्राथमिकता देते हैं और इन सबसे ऊपर वो पानीदार हो गए हैं।<!--break--><br /><br />लापोड़िया के परिवर्तन की कहानी आज से करीब चालीस साल पहले शुरू हुई जब एक नौजवान ने गाँव के लिये कुछ करने की ठान ली थी। वह नौजवान गाँव के दूसरे नौजवानों जैसा ही था जिसने सातवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। वह गाँव के जमींदार का बेटा था इसलिये उसे ज्यादा पढ़ने लिखने की कोई जरूरत भी नहीं थी लेकिन इस नौजवान के मन में एक सवाल अटक गया था कि अभी लापोड़िया जैसा है, उसमें बदलाव कैसे लाया जाये?<br /><br />लापोड़िया जयपुर अजमेर हाइवे से सटा एक गाँव है। यहाँ की भी पहली सबसे बड़ी समस्या वही बन गई थी जो राजस्थान के अधिकांश गाँवों की हो गई है, पानी। पीने के लिये भी खेती के लिये भी पर्याप्त पानी के अभाव ने युवक लक्ष्मण सिंह को प्रेरित किया कि वो इस मूल समस्या के समाधान की दिशा में कोई कदम उठाए। उसी समय 1977 में उन्होंने साथियों के साथ मिलकर ग्रामीण विकास नवयुवक मण्डल लापोड़िया की स्थापना कर दी।<br /><br />संस्था का निर्माण न धन लेने के लिये किया गया था और न ही चन्दा लेने के लिये। यह सिर्फ नौजवानों के समूह को इकट्ठा करने के लिये बनाया गया था जो गाँव में पानी का काम करने जा रहा था। गाँव के सभी दो सौ परिवारों से आग्रह किया गया कि वो सभी लापोड़िया की समस्या के समाधान के लिये श्रमदान करेंगे। लेकिन सवाल तो यह था कि यह श्रमदान वो किस काम के लिये करेंगे?<br /><br />जिस समस्या की पहचान की गई वह था पानी की कमी। पानी की कमी को दूर करने के लिये क्या किया जा सकता है? आसपास नजर दौड़ाई तो पता चला कि जल के स्थानीय स्रोत तो गाँव में पहले से मौजूद हैं लेकिन वो या तो टूट-फूट गए हैं या फिर उपेक्षा के कारण सूख गए हैं। ये स्थानीय जलस्रोत थे तालाब, बावड़ी और तटबन्ध। तालाबों में इतनी गाद जमा हो गई थी कि पानी के लिये कोई जगह न बची थी। पानी का ऐसा घोर संकट था कि गर्मियों में एक लोटा पानी के लिये तलहटी में उतरना पड़ता था।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/19070120389/" title="लापोड़िया गाँव में बना पानी का चौका"><img src="https://farm4.staticflickr.com/3887/19070120389_592cba08ca.jpg" width="424" height="300" alt="लापोड़िया गाँव में बना पानी का चौका" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>लक्ष्मण सिंह ने समस्या की पहचान कर ली और अब समाधान के लिये काम करना था। गाँव वालों के पास पहुँचे और बताया कि हमें अपने जलस्रोतों को साफ करना होगा ताकि उसमें पानी ठहर सके। वह नवयुवक मण्डल जो धन लेने-देने के काम के लिये बनाया ही नहीं गया था उसके सामने पहला सवाल यही उपस्थित हुआ? “पैसा कौन देगा?” लेकिन उन्होंने तो श्रमदान को ही अपना साधन बनाया था इसलिये अकेले ही श्रमदान करने के लिये निकल पड़े। शुरुआत में लोग उनके ऊपर हँसते थे लेकिन लक्ष्मण सिंह की लगन ऐसी थी कि फिर धीरे-धीरे कुछ नौजवान उनसे जुड़े और उन्होंने भी उनके साथ मिलकर श्रमदान करना शुरू कर दिया। जल्द ही गाँव ने भी यह महसूस कर लिया कि उनकी समस्याओं का समाधान श्रमदान ही है।<br /><br />शुरू के कुछ साल तो वो तालाबों और बावड़ियों को ही ठीक करते रहे लेकिन नब्बे के दशक में आकर उन्होंने दो टाँकों का निर्माण शुरू किया। फूल सागर और देव सागर। इसके बाद सिंचाई के लिये विशेष रूप से एक अन्न सागर का भी निर्माण किया गया। आज लक्ष्मण सिंह कहते हैं कि <b>हमने पीछे अकेले जो शुरुआत की थी उसके परिणाम देख लीजिए। आज पूरा गाँव मिलकर काम करे तो 2000 श्रम दिवस का काम हो जाता है।”</b><br /><br />लापोड़िया के पास कुल 1500 हेक्टेयर जमीन है जिसमें से एक चौथाई जमीन की सिंचाई होती है। सिंचाई के लिये टाँका के अलावा कुएँ भी हैं। टाँके के आसपास थोड़ी दूरी पर कुएँ अनायास नहीं बनाए गए हैं। टाँका कुएँ को लबालब करते हैं तो कुआँ टाँका के पानी को सूखने नहीं देता। दोनों एक दूसरे को जलमगन रहने में मदद करते हैं। लक्ष्मण सिंह कहते हैं <b>“अगर एक निश्चित दूरी से टाँकों को रिचार्ज किया जाता है तो वो जल्दी सूखते नहीं हैं। हमारे यहाँ जो टाँका बनाया गया है वह आसपास के पच्चीस किलोमीटर से अपने लिये पानी सोख लाता है।”</b><br /><br />पानी की जरूरत रोज की जरूरत है फिर भी इसे खेतों में रोककर रखना घाटे का सौदा है। इसलिये पानी को गाँव के चारागाह की जमीन पर रोकने की योजना बनाई गई। इससे जहाँ एक तरफ हवा में नमी बनी रहती है वहीं दूसरी तरफ जानवरों के लिये घास की कमी नहीं हो पाती है। लेकिन यहाँ जो पानी इकट्ठा होता था वह छह किलोमीटर दूर एक नाले में बहकर चला जाता था। इस पानी को रोकने के लिये सरकार की तरफ से कंटूर और बाँध बनाने का प्रस्ताव किया गया लेकिन यह हमारी जरूरतों के मुताबिक नहीं था। फिर सरकार ने सुझाव दिया कि आसपास पेड़ लगा दिये जाएँ, यह बात भी हमें जमी नहीं। जिस तरह की गर्मी यहाँ पड़ती है उसमें पौधों का बचना ही मुश्किल हो जाता।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/9581801856/" title="लापोड़िया गाँव का तालाब"><img src="https://farm4.staticflickr.com/3723/9581801856_30dca8c794.jpg" width="424" height="300" alt="लापोड़िया गाँव का तालाब" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>इस तरह कई महीने तक खोजबीन करने और तरह-तरह के उपायों पर विचार करने के बाद लक्ष्मण सिंह ने चौका बनाने का विचार सामने रखा। यह गाँव के वातावरण के अनुकूल था और पानी के साथ-साथ माटी के क्षरण को रोकने में भी कारगर था। चौका, चौकोर आकार का कम गहराई वाला एक उथला गड्ढा होता है। इसकी गहराई नौ इंच के आसपास रखी जाती है। इससे इसमें पानी इकट्ठा होता है और फिर एक तरफ से इसकी ऊँचाई हल्की सी कम कर दी जाती है तो यही पानी धीरे-धीरे रिसकर टाँका की तरफ बह जाता है। इससे पानी बेकार में बहकर नाले में नहीं जाता और जमीन में लम्बे समय तक नमी भी बरकार रहती है। चौका यहाँ पानी रोकने की ऐसी वैज्ञानिक विधि है जिसे बनाने में बड़ी सावधानी की जरूरत होती है। ऊपर से यह चौकोर गड्ढा जितना सरल दिखता है इसे बनाना उतना ही जटिल काम है। चौका बनाते समय गाँव के लोग तय करते हैं कि पानी को किस दिशा में बहाना है। नाले की तरफ या फिर टाँका की तरफ। उसी हिसाब से इसकी ऊँचाई और चौड़ाई निर्धारित की जाती है।<br /><br />आज लापोड़िया की जो समृद्धि है उसमें गोचर जमीन पर बनाए गए इस चौका का बहुत बड़ा योगदान है। लापोड़िया आज मासिक रूप से तीस लाख रुपए का दुग्ध उत्पादन करता है। अगर चौका न होता तो यह कभी सम्भव नहीं होता। चौका के कारण ही गोचर की जमीन संरक्षित हुई और जानवरों को चारा मिलना शुरू हुआ। आज लापोड़िया में अलग-अलग प्रकार की तीस तरह की घास उगती है जो साल भर जानवरों को चारे के काम आती है। यह भी चौका के कारण ही सम्भव हो सका है। अगर चौका की गहराई नौ इंच से ज्यादा रखी जाती है तो कुछ खास किस्म की घास नहीं उगती। लापोड़िया के बगल में सुनदिया गाँव के कान्हाराम बताते हैं कि <b>कुछ खास किस्म की घास होती है जिसे बकरियाँ ही खाती हैं तो कुछ कटीली झाड़ियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें ऊँट खाते हैं। जैसे पसरकटीली। इसे न तो ऊँट खाना पसन्द करते हैं और न ही बकरियाँ इसे खाती हैं। ऊँट ऊँटकटीला घास खाना पसन्द करते हैं। बाकी दूसरे जानवर ऊँटकटीला नहीं खाते हैं। इसी तरह बकरियाँ आकड़ा खाना पसन्द करती हैं।”</b><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/19230178236/" title="लापोड़िया गाँव में बने टाँके के पास ग्रामीण"><img src="https://farm4.staticflickr.com/3791/19230178236_4f57e71512.jpg" width="424" height="300" alt="लापोड़िया गाँव में बने टाँके के पास ग्रामीण" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>अगर साल में तीन बार चौका भर जाये तो साल भर घास चारे की कमी नहीं रहती है। एक बार चौका पूरा हो जाये तो चार से पाँच महीने तक वह जानवरों के चारे की व्यवस्था सुनिश्चित कर देता है। चौका प्रणाली इतनी कारगर हुई कि ग्राम विकास नौयुवक मण्डल ने चौका किट तैयार किया है और दूसरे गाँव के लोगों को भी इसकी ट्रेनिंग देते हैं ताकि वो अपने यहाँ इसी तरह से गोचर तैयार करने के लिये चौका निर्माण कर सकें। एक हेक्टेयर जमीन पर चौका निर्माण करने के लिये 75 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी दी जाये तो करीब 14,000 रुपए का खर्च आता है। लेकिन अगर यही काम श्रमदान से कर लिया तो खर्चा बहुत कम हो जाता है।<br /><br />गोचर में चौका बनाने के साथ-साथ लापोड़िया ने अपने यहाँ गौवंश को भी बेहतर करने का काम किया है। पहले गाँव में जिस नस्ल की गाएँ होती थीं उनसे अच्छी मात्रा में दूध उत्पादन नहीं हो पाता था। तब गाँव के कुछ लोग गुजरात गए और गीर नस्ल के सांड गाँव में लेकर आये। गीर नस्ल के सांडों से प्रजनन कराने का परिणाम यह हुआ है कि आज लापोड़िया में आपको गीर नस्ल की गाएँ दिखती हैं और गाँव प्रतिदिन 1500 लीटर दूध का उत्पादन करता है जिसे जयपुर शहर भेज दिया जाता है। दशकों तक किये गए इस सुधार और नए प्रयोगों की वजह से आज लापोड़िया एक सूखा उजाड़ गाँव नहीं बल्कि पानी और हरियाली से हरा-भरा गाँव है। आज भरे हुए तालाब, लबालब कुएँ और हरा-भरा गोचर लापोड़िया की पहचान है। कभी आदमी के लिये पानी का संकट था लेकिन आज आदमी के साथ-साथ जानवरों और चिड़ियों के भरपूर दाना-पानी लापोड़िया में उपलब्ध है। किसी के लिये कोई कमी नहीं रह गई है।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/19230183756/" title="लापोड़िया गाँव में पानी से लौटी हरियाली"><img src="https://farm1.staticflickr.com/465/19230183756_aaa6aa4d3d.jpg" width="424" height="300" alt="लापोड़िया गाँव में पानी से लौटी हरियाली" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>लक्ष्मण सिंह कहते हैं कि <b>आप सिर्फ आदमी के लिये सोचेंगे तो बात नहीं बनेगी। आपको सबके लिये सोचना पड़ेगा। पशु-पक्षी सबका जीवन सुनिश्चित करना पड़ेगा तभी आपके यहाँ खुशहाली आएगी। आज हम अपने गाँव में सिर्फ मनुष्य की चिन्ता नहीं करते। जितनी चिन्ता इंसान की करते हैं उतनी ही चिन्ता हम पशु-पक्षियों की भी करते हैं और उनके लिये व्यवस्था करते हैं। पशु पक्षियों का हमारे समृद्धि में बड़ा योगदान है। वो जमीन को उर्वर बनाने मेें मदद करते हैं। पशु का गोबर खाद है तो पक्षी हमारी खेतों की पहरेदार हैं जो अनवांछित कीट पतंगों से खेतोंं की रक्षा करती हैं और जितने पेड़ वो लगाती हैं उतना तो इंसान कभी लगा ही नहीं सकता।</b><br /><br />इसीलिये लापोड़िया में पेड़ों को काटने की सजा दो पेड़ लगाने की है। पक्षियों को मारने पर पाँच सौ रुपए का जुर्माना है। गाँव ने जान लिया है उनका भविष्य प्रकृति के बीच और प्रकृति के साथ ही सुरक्षित है इसलिये उन्होंने चार दशक में अपने भविष्य को सुरक्षित कर लिया है। अब आसपास के गाँव उनसे सीखकर अपना वर्तमान बदल रहे हैं।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/indiawater/12200322024/" title="लापोड़िया में शिकार करने पर दंड"><img src="https://farm8.staticflickr.com/7293/12200322024_511cc37272.jpg" width="424" height="300" alt="लापोड़िया में शिकार करने पर दंड" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=67298&amp;2=comment&amp;3=comment" token="VcgYWdbwC1_jMre7-LzPSL9ycMh45MdvNxK8WelL46I"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Lapodia-village-Rajsthan" data-a2a-title="पानी और हरियाली से हरा-भरा गाँव"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FLapodia-village-Rajsthan&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%94%E0%A4%B0%20%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5"></a></span> Tue, 26 Dec 2017 09:30:05 +0000 RuralWater 67298 at http://hindi.indiawaterportal.org पानी के लिये महिलाओं ने चीरा पहाड़ का सीना http://hindi.indiawaterportal.org/Women-for-water <span>पानी के लिये महिलाओं ने चीरा पहाड़ का सीना</span> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Tue, 12/26/2017 - 11:26</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">राधाकिशन शर्मा</div> </div> </div> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">दैनिक जागरण, 26 दिसम्बर 2017</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">महिलाओं की दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे पहाड़ भी नतमस्तक हो उठा। एक हजार फीट की ऊँचाई पर चढ़कर महिलाओं ने पहाड़ की छाती को चीरना शुरू किया। डेढ़ साल तक 70 महिलाओं की टीम ने हाड़तोड़ मेहनत की। पहाड़ की ढलान के साथ-साथ गहरी नालियाँ बनाई गई, जिन्हें बड़े पाइपों से जोड़ा गया, ताकि बारीश का पानी इनके जरिए नीचे चला आये। पाइप लाइन बिछाने के बाद नौ फीट गहरी सुरंग भी खोदी। इसमें भी प्लास्टिक की पाइप लाइन बिछाई। जिसे तालाब पर पहुँचाना था।</p> मस्तूरी ब्लॉक का ग्राम खोंदरा चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा है। पूरा इलाका पानी की किल्लत से जूझता था। बारिश का पानी भी व्यर्थ चला जाता था। पानी न होने से खेती-बाड़ी पर बुरा असर पड़ रहा था। लेकिन गाँव की 70 महिलाओं ने साझा प्रयास कर वर्षाजल के संरक्षण का अनूठा प्रयास किया है। इसके लिये उन्हें पहाड़ का सीना चीरना पड़ा। महिलाओं द्वारा पाँच एकड़ में बनाए गए तालाब ने अब पानी की किल्लत को खत्म कर दिया है।<br /><br />बारिश के पानी को पहाड़ से गाँव में लाने के लिये इन महिलाओं ने तीन साल तक खूब मेहनत की। इसके लिये एक हजार फीट की ऊँचाई पर चढ़कर पहाड़ को काटा और पाइप लाइन बिछाई।<!--break--> 20 फीट गहरी सुरंग भी खोदनी पड़ी। सुरंग खोदने के दौरान कठिनाइयाँ भी आईं, लेकिन हार नहीं मानी। 70 महिलाओं के इस जज्बे ने वर्षों से बंजर पड़े खेतों में हरियाली लहलहा दी है।<br /><br />छत्तीसगढ़ के बिलासपुर क्षेत्र के इस गाँव के रहने वालों के लिये बारिश का मौसम किसी मुसीबत से कम नहीं। यह गाँव चारों तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ है। इसके कारण जब बारिश का पानी पहाड़ से नीचे गिरता तो इसकी रफ्तार भी काफी तेज हो जाती। तब इसे सहेजना काफी मुश्किल काम होता। बारिश का पानी पहाड़ से नीचे उतरता और नालों के जरिए नदी में चला जाता। अभिशाप कहें या फिर ग्रामीणों की नाकामी कि भारी बारिश के बाद भी खेत प्यासे रह जाते थे। अकाल के कारण यहाँ भुखमरी की स्थिति बनी रहती थी।<br /><br />बंजर पड़े खेतों को देखकर महिलाओं ने अपने दम पर कुछ करने की ठानी। बस फिर क्या था। देखते-ही-देखते सखी महिला समूह के बैनर तले महिलाएँ एकजुट हो गईंं। सखी महिला समूह की हेमलता साहू ने एफ्रो नामक संस्था से सम्पर्क किया, जो इस तरह का काम करती है। संस्था के तकनीकी अधिकारियों ने खोंदरा पहुँचकर सर्वे किया। उन्होंने महिलाओं को बताया कि पहाड़ के पानी को किस तरह तालाब में सहेजा जा सकता है। योजना सामने थी। इस काम के लिये जरूरी संसाधन जुटाने थे। महिलाओं ने रोजी-मजदूरी से मिलने वाली राशि में से आधी रकम को जमा करना शुरू किया। सखी बैंक से एक लाख रुपए कर्ज भी मिला।<br /><br />अब बारी थी पहाड़ से लड़ने की। लेकिन महिलाओं की दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे पहाड़ भी नतमस्तक हो उठा। एक हजार फीट की ऊँचाई पर चढ़कर महिलाओं ने पहाड़ की छाती को चीरना शुरू किया। डेढ़ साल तक 70 महिलाओं की टीम ने हाड़तोड़ मेहनत की। पहाड़ की ढलान के साथ-साथ गहरी नालियाँ बनाई गई, जिन्हें बड़े पाइपों से जोड़ा गया, ताकि बारीश का पानी इनके जरिए नीचे चला आये। पाइप लाइन बिछाने के बाद नौ फीट गहरी सुरंग भी खोदी। इसमें भी प्लास्टिक की पाइप लाइन बिछाई। जिसे तालाब पर पहुँचाना था। पाइप लाइन के जरिए एक हजार फीट की ऊँचाई से गिरने वाले पानी को एक जगह पर इकट्ठा करने के लिये पाँच एकड़ का तालाबनुमा गड्ढा खोदा गया। इस बड़े तालाब में पानी को सहेजने के बाद एक दर्जन छोटे तालाब भी बनाए गए। इस पूरे काम में तीन साल का वक्त लग गया। तीन साल बाद अब खोंदरा के बंजर खेतों में हरियाली लौट आई है।<br /><br /><h3>महिलाओं के हाथ में जल प्रबन्धन की जिम्मेदारी</h3><br />यह जल संरक्षण से लेकर खेती किसानी के दौरान खेतों में सिंचाई की व्यवस्था भी महिलाओं की देखरेख में ही होती है। किस खेत में कितना पानी देना है और कब देना है, यह उनके ही जिम्मे है। मवेशियों और निस्तार के लिये अलग-अलग तालाब की व्यवस्था की गई है। दूरस्थ वनांचल ग्राम होने और महिलाओं के कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद यहाँ स्वास्थ्य के प्रति सजगता देखते ही बनती है।<br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=67260&amp;2=comment&amp;3=comment" token="XdZPTusu5u1o7J2QT6WGUeJNhbrBrD4DQMveA2o61lk"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Women-for-water" data-a2a-title="पानी के लिये महिलाओं ने चीरा पहाड़ का सीना"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FWomen-for-water&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%87%20%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82%20%E0%A4%A8%E0%A5%87%20%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%BC%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BE"></a></span> Tue, 26 Dec 2017 05:56:05 +0000 RuralWater 67260 at http://hindi.indiawaterportal.org जल संरक्षण से पानीदार हुआ लुठियाग गाँव http://hindi.indiawaterportal.org/Luthiyag-village <span>जल संरक्षण से पानीदार हुआ लुठियाग गाँव</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80" hreflang="en">प्रेम पंचोली</a></div> </div> </div> <span><span>UrbanWater</span></span> <span>Fri, 09/29/2017 - 15:32</span> <ul class="links inline list-inline"><li class="comment-add"><a href="/Luthiyag-village#comment-form" title="Share your thoughts and opinions." hreflang="en">Add new comment</a></li></ul> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">जिस तरह से लुठियाग गाँव के ग्रामीणों ने 40 मीटर लम्बी और 18 मीटर चौड़ी झील का निर्माण किया इसी तरह ही लोग चाल-खाल का निर्माण करते थे। इस निर्माण में कहीं पर भी सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है। इस चाल को जमीन के अन्दर खोदा गया है। बस इसी में बरसात का पानी एकत्रित होता है, जो निचले स्थानों के प्राकृतिक जलस्रोतों को तरोताजा रखने का यह अद्भुत तरीका लोक ज्ञान मेें ही मिलता है। जिसे लुठियाग गाँव के लोगों ने इतनी बड़ी चाल का निर्माण करके बता दिया कि जल संरक्षण में लोक ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण है।</p><b>Rainwater Harvesting in Luthiyag village Uttarakhand</b><br /><br />उत्तराखण्ड में पानी के संरक्षण के लिये जलागम परियोजना, कृषि विकास कार्यक्रम, वन विभाग, पेयजल एवं सिंचाई विभाग, स्वजल आदि तमाम अन्य कार्यक्रम एवं विभाग हैं जिन्होंने जल संरक्षण की कोई खास तस्वीर इसलिये प्रस्तुत नहीं कर पाई कि उनके कार्यक्रम लोक सहभागिता के कम और व्यावसायिक अधिक थे। आज तक जल संरक्षण, पेयजल संकट का निवारण जैसी जो भी खबरें सामने आ रही हैं वे सभी लोक सहभागिता और लोक ज्ञान को मद्देनजर रखते हुए क्रियान्वित हुई है। जबकि बरसाती पानी के संग्रहण को सरकार की रेनवाटर हार्वेस्टिंग योजना आज तक परवान नहीं चढ़ पा रही है।<br /><br />जल संरक्षण के जो भी उपादान सामने आ रहे हैं वे सभी बिना बजट के तो हैं ही मगर इन कार्यों में बखूबी से लोकसहभागिता और लोक ज्ञान का भरपूर उपयोग स्पष्ट नजर आ रहा है। लोग दान-चन्दा एवं श्रमदान से जल संरक्षण के कामों को क्रियान्वित कर रहे हैं। रुद्रप्रयाग जिले के जखोली ब्लाक अन्तर्गत लूठियाग गाँव के ग्रामीणों ने ऐसा कर दिखाया। बिना सरकारी मदद के पानी का संरक्षण कर सरकारी योजनाओं को आईना दिखाने का यह सफल प्रयास कर डाला।<br /><br />यह कोई अजूबा नहीं बल्कि लुठियाग गाँव के ग्रामीणों ने एक झील को श्रमदान से बनाकर और उसमें 11 लाख लीटर बरसाती पानी का संग्रहण कर एक मिसाल पेश की है। झील लोग इस मायने में कह रहे हैं कि यह थोड़ी बड़ी है। मगर यह ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग पॉण्ड’ की कल्पना को साकार करती है। जबकि पहले लोग इसी लोक ज्ञान के अनुरूप जल संरक्षण करते थे। <br /><br />जिस तरह से लुठियाग गाँव के ग्रामीणों ने 40 मीटर लम्बी और 18 मीटर चौड़ी झील का निर्माण किया इसी तरह ही लोग चाल-खाल का निर्माण करते थे। इस निर्माण में कहीं पर भी सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है। इस चाल को जमीन के अन्दर खोदा गया है। बस इसी में बरसात का पानी एकत्रित होता है, जो निचले स्थानों के प्राकृतिक जलस्रोतों को तरोताजा रखने का यह अद्भुत तरीका लोक ज्ञान मेें ही मिलता है। जिसे लुठियाग गाँव के लोगों ने इतनी बड़ी चाल का निर्माण करके बता दिया कि जल संरक्षण में लोक ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण है।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/37340401696/in/dateposted-public" title="ग्रामीणों द्वरा बनाई गई वर्षाजल संग्रहण प्रणाली"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4340/37340401696_bc4bcbc835_z.jpg" width="424" height="300" alt="ग्रामीणों द्वरा बनाई गई वर्षाजल संग्रहण प्रणाली" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>तीन वर्ष पहलेे रुद्रप्रयाग जनपद का लुठियाग गाँव बूँद-बूँद पानी के लिये मोहताज था, आज वहाँ हर घर को पूरे दिन पर्याप्त पानी ही नहीं मिल रहा है बल्कि साग-सब्जी की भी खूब पैदावार हो रही है। जो ग्रामीणों की आजीविका का भी जरिया बन गई है। लोग पहले सरकारी योजनाओं के भरोसे थे कि उनके गाँव में कोई स्वजल या अन्य पेयजल योजना बनेगी तो उनकी पेयजल की यह समस्या स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। <br /><br />गाँव में सरकारी स्तर पर पेयजल की समस्या को दूर करने के लिये कई कार्य हुए हैं, परन्तु लुठियाग गाँव में पेयजल की समस्या तभी दूर हुई जब लोगों ने खुद ही जल संकट को दूर करने का निर्णय लिया है। उन्होंने अपने पूर्वजों के लोक ज्ञान को महत्त्व दिया और तीन वर्ष पहले गाँव से थोड़ा दूर यानि जहाँ से गाँव का जलागम क्षेत्र बनता है की जगह पर एक विशाल चाल का निर्माण कर डाला। <br /><br />टिहरी और रुद्रप्रयाग जिले की सीमा पर बसा चिरबिटिया-लूठियाग गाँव सबसे अधिक ऊँचाई वाला गाँव है। समुद्र तल से 2170 मीटर की ऊँचाई पर होने से गाँव में पानी का मुख्य स्रोत वर्ष 1991 के भूकम्प में ध्वस्त हो गया था। 104 परिवारों वाले इस गाँव में एक स्रोत ही बचा था, जो बरसात के चार माह को छोड़कर अन्य महीनों में सूख जाता था। ऐसे में ग्रामीण ढाई से तीन किमी दूर से अपने लिये पानी जुटा रहे थे। <br /><br />वर्ष 2014 में ग्रामीणों ने राज राजेश्वरी ग्राम कृषक समिति का गठन कर गाँव के हर घर के लिये पर्याप्त पानी जुटाने का संकल्प लिया। संकल्प के तहत विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून 2014) पर 104 परिवारों की महिलाओं के साथ अन्य ग्रामीण गैती, फावड़ा, कुदाल, सब्बल लेकर पेयजल स्रोत से लगभग सवा किमी ऊपर जंगल क्षेत्र में पहुँचे। यहाँ चाल, खाल (छोटी झील) बनाने का कार्य शुरू किया गया।<br /><br />लगभग एक माह की कड़ी मेहनत के बाद ग्रामीणों ने 40 मीटर लम्बी और 18 मीटर चौड़ी झील का निर्माण किया। तब खूब बारिश होने से चाल-खाल में काफी पानी एकत्रित हुआ, तो लोगों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई कि उनकी मेहनत रंग लाई है। उन्हें विश्वास था कि जब यह चाल एक बार पानी से भर जाएगी उसके बाद तो उनके गाँव के प्राकृतिक जल धारे पुनर्जीवित हो उठेंगे। <br /><br />आज इस पूरे क्षेत्र में इस चाल के निर्माण से खेती की जमीन में अच्छी नमी मिल रही है साथ ही पेयजल स्रोतों के सुर खुल गए हैं। वर्ष 2015 में झील में लगभग पाँच लाख लीटर पानी जमा होने से गाँव के पेयजल स्रोत भी रिचार्ज होने शुरू हो गए। स्रोत से सटे अन्य नम स्थलों पर भी स्रोत फूटने लगे और वर्ष 2016 में झील में आठ लाख लीटर पानी एकत्रित हो गया। इसके बाद रिलायंस फाउंडेशन की मदद से ग्रामीणों ने स्रोत के समीप 50 हजार और 22 हजार लीटर क्षमता के दो स्टोरेज टैंक का निर्माण कराया। टैंक से गाँव के 104 घरों तक 5340 मीटर पाइप लाइन बिछाई गई, जिससे सभी घरों को पानी मिलने लगा। लाइन की देखरेख के लिये भी ग्रामीणों ने अपने खर्चे पर व्यवस्था की है।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/36717654113/in/dateposted-public/" title="लुठियाग गाँव के ग्रामीणों द्वारा बनाई गई चाल खाल"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4390/36717654113_1c9d4e5dbb_z.jpg" width="424" height="300" alt="लुठियाग गाँव के ग्रामीणों द्वारा बनाई गई चाल खाल" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>झील में इस वक्त 11 लाख लीटर पानी संग्रहित है, जिससे गाँव के सभी परिवारों को पर्याप्त पानी मिल रहा है। साथ ही स्टोरेज टैंक भी ओवरफ्लो हो रहे हैं। समिति के अध्यक्ष कुंवर सिंह कैंतुरा, रूप सिंह कैंतुरा, खजानी देवी, अनीता देवी, बसंती देवी ने बताया कि 2014 तक उन्हें बूँद-बूँद पानी के लिये तरसना पड़ता था, लेकिन आज उनके घरों में पर्याप्त पानी है। घरों में साग-भाजी की खूब पैदावार हो रही है, जो ग्रामीणों की आजीविका का भी जरिया बन गई है।<br /><br /><b><i>पिछले दो वर्ष से हम विश्व पर्यावरण दिवस प्रहरी झील में मनाते आ रहे हैं। झील को विस्तार देकर बरसाती पानी के संरक्षण के लिये आगे भी कार्य किया जाएगा। आज गाँव के 204 परिवार झील से पर्याप्त पानी ले रहे हैं।</i><br />-सीता देवी, ग्राम प्रधान लुठियाग</b><br /><br /><b><i>पानी के संरक्षण के क्षेत्र में लुठियाग ने एक नई मिसाल पेश की है। इस गाँव से जिले के अन्य गाँवों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए, ताकि पानी के संरक्षण में हम प्रदेश ही नहीं देश में नया मुकाम हासिल कर सके।</i><br />-मंगेश घिल्डियाल, जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग</b><br /><br /></div> <section> <h2>Comments</h2> <a id="comment-66548"></a> <article data-comment-user-id="0" class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1527052617"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>Anonymous (not verified)</span> on Wed, 11/01/2017 - 15:11</p> <a href="/comment/66548#comment-66548" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/66548#comment-66548" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">hindi portal</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item"><p>ऐसा लग रहा है हिंदी पोर्टल अपडेट नहीं हो रहा है</p></div> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderLinks" arguments="0=66548&amp;1=default&amp;2=en&amp;3=" token="-_I08EepGbuSRmxBY-4k7jR5Mpel9jmpCq81JGc7Xmc"></drupal-render-placeholder> </div> </article> <a id="comment-201670"></a> <article data-comment-user-id="0" class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1554715222"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>AustBreese (not verified)</span> on Mon, 04/08/2019 - 14:50</p> <a href="/comment/201670#comment-201670" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/201670#comment-201670" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">Over Night Presidone JeaInfusy</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item"><p>Propecia For Daily Use Cost Effetti Viagra Cialis <a 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href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FLuthiyag-village&amp;title=%E0%A4%9C%E0%A4%B2%20%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%86%20%E0%A4%B2%E0%A5%81%E0%A4%A0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%97%20%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5"></a></span> Fri, 29 Sep 2017 10:02:31 +0000 UrbanWater 60427 at http://hindi.indiawaterportal.org पुनर्जीवित हुए मुडाला-दोगी के जलस्रोत http://hindi.indiawaterportal.org/Mudala-Dogi-gaanv-ke-jalasrot <span>पुनर्जीवित हुए मुडाला-दोगी के जलस्रोत</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE-%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%9A%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80" hreflang="en">प्रेम पंचोली</a></div> </div> </div> <span><span>UrbanWater</span></span> <span>Sun, 09/24/2017 - 11:30</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">मुडाला-दोगी गाँव में 90 परिवारों की 432 की जनसंख्या पहले भी दो प्राकृतिक जलस्रोतों पर निर्भर थी। साल 2000 के बाद इन जलधारों से पानी की मात्रा तेजी से घटने लगी और 2008 तक इन जलधारों ने लोगों के हलक तर करने में एकदम असमर्थता जता दी। रमेश चौहान ने गाँव का अध्ययन किया तो पाया कि ग्रामीणों के द्वारा ही जाने अनजाने में प्राकृतिक असन्तुलन बनाया गया। खैर ग्रामीणों ने फिर से अपने पर्यावरण को लौटाने का संकल्प लिया और 10 वर्ष बाद मुडाला-दोगी का पर्यावरण पूर्व की भाँति लौट आया।</p> यह ‘धारा’ कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है, बल्कि एक सशक्त सामाजिक विचारधारा है, जिस विचार से लोग स्वस्थ हैं, वह विचार किसी महापुरुष ने भी नहीं गढ़ा, ना ही किसी विद्वान का सन्देश है। यह विचारधारा प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवित करने का एक मजबूत संकल्प है। जैसे कि पहले लोग जल संरक्षण को आध्यात्म, पवित्र और पूजनीय मानते थे। जिसे उत्तराखण्डी समाज में जल संस्कृति कहा जाता था, को मुडाला-दोगी गाँव के ग्रामीणों ने फिर से अपने गाँव के प्राकृतिक जलधारों को संरक्षण करने का संकल्प लिया है। <br /><br />ऐसे जल संरक्षण के कार्य को यहाँ के ग्रामीण पिछले 10 वर्षों से एक पर्व के रूप में मनाते आ रहे हैं। इसकी शुरुआत मार्च 2006 में ‘धारा बचाओ’ आन्दोलन के रूप में टिहरी गढ़वाल के मुडाला-दोगी गाँव के युवा रमेश चौहान ने की।<br /><br />बता दें कि उत्तराखण्ड के टिहरी और पौड़ी जनपद से सर्वाधिक पलायन बताया जाता है। दर्जनों गाँव ऐसे हैं जो एकदम खाली हो चुके हैं। इन गाँवों की भी पेयजल की एक विकट समस्या थी, इस कारण कइयों ग्रामीणों ने गाँव छोड़ दिया। पर यहीं पर पौड़ी जनपद से लगे टिहरी के मुडाला-दोगी गाँव के लोगों ने पलायन को धता बताते हुए कहा कि वे प्रकृति के गोद में रहते हैं, लिहाजा वे अपने गाँव में पूर्व की भाँति प्रकृति-पर्यावरण को वापस लौटाएँगे। आखिर हुआ ऐसा ही और वर्तमान में मुडाला-दोगी गाँव के रमेश चौहान के धार बचाओ अभियान से आस-पास के दो दर्जन से भी अधिक गाँव जुड़ चुके हैं। <br /><br />यही नहीं इस अभियान के कारण अकेले मुडाला-दोगी गाँव में पिछले 10 वर्षों से रोपे गए 10 हजार पेड़ आज एक जंगल का रूप ले रखे हैं, साथ-साथ गाँव के दो प्राकृतिक जलधारे भी फिर से पुनर्जीवित हो गए हैं। यही नहीं इस अभियान के साथ अब तक 1000 से अधिक लोगों ने सदस्यता ले रखी है और वे अपने गाँवों को इस कार्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/36608298033/in/dateposted-public/" title="मुडाला-दोगी गाँव की जलधारा"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4373/36608298033_179d9d56e1_z.jpg" width="710" height="400" alt="मुडाला-दोगी गाँव की जलधारा" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने मौजूदा भौतिकवादी सभ्यता की नब्ज को परखते हुए यह निर्णय लिया कि यदि ग्रामीण जलधारों को बचाने के लिये आन्दोलित होंगे तो वे अपने पर्यावरण को बचाने में भी सफल होंगे। उन्हें सूझा कि वे वृक्षों का रोपण करेंगे तो धरती में नमी रहेगी, धरती में नमी रहेगी तो जलधारों में भी पानी की मात्रा स्वतः ही बढ़ जाएगी। इस हेतु उन्होंने ‘लोक ज्ञान’ को महत्त्व दिया और लोगों का जो रिश्ता पूर्व में पानी और पेड़ से था उस भावना को एक आन्दोलन का रूप दे दिया। ग्रामीणों का काम यहीं पर ठहर नहीं जाता बल्कि उन्होंने अपने गाँव में जल संरक्षण के लिये नियम-कायदे भी तय किये हुए हैं कि गाँव में जो भी शादी, चूड़ाकर्म, मुण्डन जैसे शुभ संस्कार होते हैं, उस अवसर पर अमुक परिवार के सभी सदस्य इस दिन वृक्षारोपण भी करेंगे और जल धारों की साफ-सफाई भी करेंगे। इस तरह इस अभियान से लोग स्वतः ही जुड़ रहे हैं।<br /><br />मुडाला-दोगी गाँव में दुल्हा-दुल्हन शादी की अगली सुबह अपने गाँव के ही जलधारे के पास जाकर संयुक्त रूप से जल देव का स्मरण करते हैं, जलस्रोत (धारे) में पारम्परिक पूजा अर्चना कर अपने सुखमय भविष्य की कामना करते हुए अपने दाम्पत्य जीवन को प्रारम्भ करते हैं। इस तरह से सांस्कृतिक एवं भावनात्मक परम्परा के अनुसार जल दोहन और संरक्षण की इस अभिनव पहल ने क्षेत्र में एक विशाल अभियान का रूप ले लिया है। फलस्वरूप इसके जलस्रोत के जलागम क्षेत्र में इस अनोखी पहल ने अब अपना स्वरूप दिखाना आरम्भ कर दिया है।<br /><br /> मुडाला-दोगी गाँव के लोगों की इस पहल का असर उनके गाँव सहित आस-पास के गाँवों के महिला मंगल दलों, वन पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों एवं पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े कार्यकर्ता पर दिखने लग गया है। इसलिये वे अपने-अपने क्षेत्रों में अपने कार्यक्रमों के साथ ‘धार बचाओ अभियान’ को अनिवार्य कार्यक्रम बना रहे हैं। <br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/37277920851/in/dateposted-public/" title="मुडाला-दोगी गाँव में पौधारोपण करते ग्रामीण व बच्चे"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4368/37277920851_3c2f718b16_z.jpg" width="710" height="400" alt="मुडाला-दोगी गाँव में पौधारोपण करते ग्रामीण व बच्चे" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/37248452962/in/dateposted-public/" title="रमेश चौहान"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4370/37248452962_6f2ee2d391_z.jpg" width="370" height="240" alt="रमेश चौहान" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>गौरतलब हो कि भूमण्डलीकरण के दौर में इस कार्यक्रम के उद्देश्य की पूर्ति के लिये अभियान ने लोक परम्पराओं को महत्त्व दिया है और ‘जल संरक्षण’ के साथ सूख रहे जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। धार बचाओ आन्दोलन को एक जन अभियान बनाने के लिये गाँव-गाँव में धार बचाओ संगठन गठित होने लग गए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि इसके बाद वे उत्तराखण्ड स्तर पर पारम्परिक जल संस्कृति का व्यापक नेटवर्क तैयार करने जा रहे हैं। इसके मार्फत वे भविष्य में ‘एक जलनीति’ की वकालत करेंगे। ताकि उत्तराखण्ड सरकार राज्य की जल संस्कृति के अनुरूप जलनीति बनाने में ऐसे रचनात्मक समूहों का उपयोग कर पाये।<br /><br />धार बचाओ अभियान से जुड़े ग्रामीण मुडाला-दोगी में एकत्रित होकर प्रत्येक वर्ष अगस्त माह के मध्य में अपनी सुविधानुसार तीन दिवसीय धार बचाओ दिवस मनाते हैं। इस अवसर पर वे पौधारोपण, जलस्रोतों की साफ-सफाई, गीत-नृत्य के साथ-साथ वे फिर से अगले वर्ष तक जल व पेड़ संरक्षण का संकल्प लेते हैं कि वे पेड़ व पानी का दोहन एवं संरक्षण ‘लोक विज्ञान’ के अनुरूप ही करेंगे। खास बात यह है कि इस दिवस के अवसर पर गाँव की ‘नव दम्पति’ एकत्रित होकर अभियान को अंजाम देते हैं। <br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/36567971834/in/dateposted-public/" title="गाँव में दुल्हा-दुल्हन शादी की अगली सुबह जलधारे पर जाकर पूजा करते हैं"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4386/36567971834_cbdf4bbb85_z.jpg" width="370" height="300" alt="गाँव में दुल्हा-दुल्हन शादी की अगली सुबह जलधारे पर जाकर पूजा करते हैं" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>इस तरह परम्परा को उत्सवों से जोड़ने का अभिनव प्रयास मुडाला-दोगी गाँव में ही दिखाई देता है। इधर इस ‘लोक ज्ञान’ में पहले से ही ऐसी भावना समाहित है कि दुल्हन को दहेज में गागर इसलिये मिलती है कि ससुराल में प्रवेश करते ही वे इस गागर को लेकर ‘जल धारा’ की पूजा करे। इसके बाद वह गागर में जल भरकर घर की उन्नति की कामना करती है। अर्थात जलधारा पूजन के पीछे जल संरक्षण की सोच यहीं से पैदा हुई है। मुडाला-दोगी गाँव के जैसे यह क्रम चलता रहा तो आने वाले समय में जल संकट से निपटा जा सकता है। यदि धारे/जलस्रोत नहीं रहेंगे तो धार पूजा जैसी परम्पराएँ औचित्यहीन हो जाएँगे। ऐसा यहाँ के लोगों का मानना है।<br /><br /> धार बचाओ आन्दोलन के सूत्रधार रमेश चौहान ने बताया कि 10 वर्ष पहले जब यह अभियान गाँव में आरम्भ किया गया तो लोग इस अभियान को एक ड्रामा समझ रहे थे, परन्तु आज यह स्थिति हो चुकी है कि क्षेत्र में लोग अब धार बचाओ अभियान के कार्यक्रम स्वयं ही अपने व्यक्तिगत और सामूहिक समारोह में अनिवार्य रूप से करने लग गए हैं। <br /><br />शादी के अवसर पर, चूड़ाकर्म व मुण्डन, तमाम शुभ संस्कारों के अवसर पर लोग स्वतः ही पेड़ लगाना और जलधारे की पूजा करना एवं साफ-सफाई करना नहीं भूलते हैं। इसी कारण आज पूरा गाँव शुद्ध पर्यावरण ही नहीं बल्कि पानी की उपलब्धता के साथ-साथ घास, लकड़ी, चारा-पत्ती की समस्या से भी निजात पा गए हैं। गाँव के दोनों प्राकृतिक जलस्रोत पुनः बहाल हो उठे। आस-पास के ग्रामीणों ने भी जब से धार बचाओ आन्दोलन का अनुसरण किया तो इस क्षेत्र की लगभग 10 हजार की जनसंख्या को पेयजल, लघु सिंचाई जैसी समस्या से छुटकारा मिला।<br /><br />उल्लेखनीय हो कि जल संचय एवं संवर्धन के इस ‘लोक ज्ञान’ को सूचना के युग में ग्रामीणों ने चुनौती दी है। जबकि इस अभिनव पहल के कारण अन्य गाँव भी इस अभियान से जुड़े और अभियान को व्यापक स्वरूप दिया जा रहा है। इस रणनीति के कारण गाँव में जनभागीदारी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। और-तो-और गाँव का हर सदस्य जल संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण के प्रति कृत्संकल्प नजर आ रहा है। गाँव में प्रत्येक परिवार घर में होने वाले विवाह, मुंडन संस्कार, जन्म दिवस जैसे आयोजनो में वे अब ‘धार बचाने’ के कार्यक्रम खुद ही निश्चित कर देते हैं।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/37420109875/in/dateposted-public/" title="मुडाला दोगी गाँव की पुनर्जीवित जलधारा"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4391/37420109875_03347e928c_z.jpg" width="710" height="400" alt="मुडाला दोगी गाँव की पुनर्जीवित जलधारा" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/36568018804/in/dateposted-public/" title="गाँव की जलधारे की साफ-सफाई एवं पूजा करते ग्रामीण"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4470/36568018804_edf688b166_z.jpg" width="710" height="400" alt="गाँव की जलधारे की साफ-सफाई एवं पूजा करते ग्रामीण" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=59575&amp;2=comment&amp;3=comment" token="X5WRp3qa4zoZXAhG9QBK9U7cCDPWmLVNX6kuvE92L_g"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Mudala-Dogi-gaanv-ke-jalasrot" data-a2a-title="पुनर्जीवित हुए मुडाला-दोगी के जलस्रोत"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FMudala-Dogi-gaanv-ke-jalasrot&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%8F%20%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A1%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%A4"></a></span> Sun, 24 Sep 2017 06:00:42 +0000 UrbanWater 59575 at http://hindi.indiawaterportal.org पाँच साल से पूरा परिवार पी रहा बरसात का पानी http://hindi.indiawaterportal.org/paanch_saal_se_poora_parivaar_pee_raha_barasaat_ka_paanee <span>पाँच साल से पूरा परिवार पी रहा बरसात का पानी</span> <span><span>Hindi</span></span> <span>Fri, 09/22/2017 - 10:26</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">संदीप हुड़्डा</div> </div> </div> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">राजस्थान पत्रिका, 22 सितम्बर 2017</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><span class="inline inline-left"><img src="https://farm8.staticflickr.com/7322/15777647754_3dccd53bab.jpg" alt="." title="." class="image image-_original" width="200" height="200" /></span><br />संरक्षण के लिये एक ऐसा परिवार है जो पिछले पाँच साल से केवल बरसात का पानी उपयोग में ले रहा है। परिवार के सातों सदस्यों का मानना है कि बारिश का पानी शारीरिक व्याधियों को तो खत्म करता ही है साथ में नई पीढ़ी को जल संरक्षण व इसकी अहमियत को भी दर्शाता है। पानी बचाने और इसके सद्उपयोग का आईना दिखाने वाले ये सरकारी शिक्षक हैं तारपुरा गाँव के ऋषिदेव शर्मा। जोकि राजकीय उच्च प्राथमिक संस्कृत विद्यालय नवलगढ़ में पदस्थापित हैं। <br /><br />इनका मानना है कि आसमान से बरसात का शुद्ध जल बरसता है। इसको व्यर्थ बहने नहीं देना चाहिए। इसके लिये शिक्षक ऋषिदेव शर्मा ने पाँच साल पहले घर के मकान का पूरा नक्शा बदलकर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अपनाया, जो आज भी जारी है।<!--break--> इसके लिये बारिश के पानी को सहेजने के लिये घर में बड़ा कुंड बनवाया। इसके बाद नालों के जरिये बहने वाले बारिश के पानी का कनेक्शन इस कुंड से कर दिया। कुंड को बने 5 साल से ज्यादा हो गए हैं। पीने के पानी के लिये परिवार के लोग इसी का उपयोग करते हैं। सामान्य पानी का तो स्वाद तक भूल बैठे हैं। घर में पेयजल सप्लाई का पानी भी आता है।<br /><br /><h3>गिरता भूजल स्तर, बढ़ा रहा परेशानी</h3><br />जिले में भूजल की स्थिति भयावह हो गई है। जिले के उत्तर पश्चिमी इलाकों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। प्री मानसून सर्वे के आँकड़े बताते हैं कि हर साल औसतन एक मीटर भूजल स्तर में गिरावट दर्ज की जा रही है। पिछले छह साल से जहाँ पानी 40 से 60 मीटर गहराई पर मिल रहा था अब स्थिति ऐसी है कि कई इलाके में 80 से 90 मीटर नीचे तक चला गया है। धोद, दांतारामगढ़, खंडेला, श्रीमाधोपुर ब्लॉक में तो ट्यूबवेल व कुएँ सूख चुके हैं। इसके अलावा पानी के गहराई से आने के कारण लोग पेट सम्बन्धी कई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।<br /><br /><p> </p><div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"><table style="border-width: initial; border-style: none; border-color: initial; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="153" /><col width="276" /></colgroup><tbody><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;text-align: center;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">प्रीमानसून 2017 के दौरान लिये गये आँकड़ों के अनुसार</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">41.30 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> था प्रीमानसून 2011 में श्रीमाधोपुर ब्लॉक का औसत भूजल स्तर।</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">11.88 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> गिर गया। प्रीमानसून 2017 में</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">9.70 मीटर </span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">पिपराली का भूजल स्तर गिर</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">9.54 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> दांतारामगढ़ में गिरा भूजल स्तर</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">8.33 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> धोद में गिरा भूजल स्तर</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">7.20 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> नीमकाथाना में गिरा भूजल स्तर</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">6.95 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> खंडेला ब्लॉक में गिरा भूजल स्तर</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">6.64 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> पाटन ब्लॉक में गिरा भूजल स्तर</span></span></p></td></tr><tr style="height:28pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;background-color:#fff2cc;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-4e8e58e3-ad1b-d489-605c-e6ce7e3c2ae9"><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">5.33 मीटर</span><span style="font-size: 10pt; font-family: Arial; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;"> लक्ष्मणगढ़ ब्लॉक में गिरा भूजल स्तर</span></span></p></td></tr></tbody></table></div><p> </p></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=59245&amp;2=comment&amp;3=comment" token="FsNctKnbVAcaMOloQyDSxyjPRhmBOTB5Wsc232rH4IQ"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/paanch_saal_se_poora_parivaar_pee_raha_barasaat_ka_paanee" data-a2a-title="पाँच साल से पूरा परिवार पी रहा बरसात का पानी"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fpaanch_saal_se_poora_parivaar_pee_raha_barasaat_ka_paanee&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%20%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B2%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%20%E0%A4%AA%E0%A5%80%20%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%BE%20%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80"></a></span> Fri, 22 Sep 2017 04:56:59 +0000 Hindi 59245 at http://hindi.indiawaterportal.org सामुदायिक प्रयासों से किया कुलगाड़ में नौले को पुनर्जीवित http://hindi.indiawaterportal.org/Kulagad-Naula <span>सामुदायिक प्रयासों से किया कुलगाड़ में नौले को पुनर्जीवित</span> <span><span>UrbanWater</span></span> <span>Thu, 07/27/2017 - 16:30</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">डाॅ. मुकेश बोरा</div> </div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">गाँव के उत्तर में एक नौला है, जिसे गाँववासी पनेरा नौला कहते हैं। यह पानी के स्रोत के साथ ग्रामीणों के लिये परम्परा एवं संस्कृति का केन्द्र है। यहाँ के निवासियों की मान्यता है कि नौले के जल में विष्णु का निवास स्थान होता है। शादी के बाद दूल्हा और दुल्हन नौले में जाते हैं और अपना मुकुट वहाँ स्थापित करके आते हैं। दुल्हन नौले के पानी को भरकर सभी परिवार वालों को पिलाती है और जब भी गाँव में कोई कथा, शीर्वाचन होता है उसकी सामग्री का विसर्जन भी वही होता है।</p> कुलगाड़, नैनीताल। नैनीताल जिले के रामगढ़ ब्लाक में स्थित है कुलगाड़ गाँव। स्थानीय निवासियों की माने तो, पहाड़ी गधेरे के किनारे छोटे-छोटे खेतों के बीच बसे होने के कारण गाँव का नाम कुलगाड़ पड़ा। यह गाँव छोटा है, जैसे कि लगभग 80 फीसदी उत्तराखण्ड के गाँव हैं, जहाँ केवल 23 परिवार रहते हैं। हल्द्वानी से अल्मोड़ा जाने वाले नेशनल हाइवे नम्बर 87 से कुलगाड़ गाँव दिखता तो पास में है लेकिन कुछ दूर टेढ़े-मेढ़े रास्ते से पैदल चलकर यहाँ पहुँचा जा सकता है। <br /><br />कुछ साल पहले गाँव के निवासी शहीद मेजर मनोज भण्डारी को श्रद्धांजलि देते हुए गाँव में सड़क पहुँच पाई है, जो अभी कच्ची है। स्थानीय बाजार, सुयालबाड़ी स्थित सड़क से गाँव स्पष्ट दिखाई देता है। जहाँ छोटे-छोटे सीढ़ीनुमा खेतों से ऊपर की ओर बसे गाँव को देखकर पहाड़ी गाँवों को बेहतर समझा जा सकता है।<!--break--><br /><br /><h3>जल समिति</h3><br />कुलगाड़ गाँव की सबसे खास बात है, यहाँ की जल समिति एवं सरस्वती स्वयं सहायता समूह। जो महिला नेतृत्व आधारित है, प्रत्येक में 9-9 सदस्य हैं जिसमें 5 महिलाएँ और 4 पुरुष हैं। जल समिति मूल रूप से गाँव में पानी से जुड़े मुद्दों को लेकर चिराग संस्था के सहयोग से बनाई गई। जो 2013 से इस गाँव में प्राकृतिक जलस्रोतों को लेकर काम कर रही है। कुलगाड़ गाँव की जलसमिति की अध्यक्ष सविता भण्डारी कहती हैं कि <b>हमारे गाँव में समिति 2013 से शुरू हुई और 2014 में काम शुरू किया। जिसमें पाँच महिलाओं के साथ चार पुरूष भी हैं। सभी ने मिलकर नौले के जीर्णोंद्धार का काम किया है।</b><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/35360004874/in/dateposted-public/" title="पनेरा नौला"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4295/35360004874_0523a394b6.jpg" width="424" height="300" alt="पनेरा नौला" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>जलग्रहण क्षेत्र में भी काम हुआ है। जल समिति का अपना आर्थिक माॅडल भी है। समिति की कोषाध्यक्ष कुंती देवी के अनुसार, <b>‘हम सभी सदस्यगण सरस्वती स्वयं सहायता समूह में 50 और जल समिति में 10 रुपए प्रतिमाह जमा करते हैं। इसमें कुल 9 लोग होते हैं। एक और व्यक्ति बाहर से जुड़ जाता है, इस प्रकार कुल 10 लोगों द्वारा प्रतिमाह 100 रुपए जमा किये जाते हैं। इस जमा धन का उपयोग खाल, गड्डों की सफाई, नौले की सफाई आदि कार्यों के लिये किया जाता है।’</b> समिति में पैसा जमा करने का एक ही उद्देश्य होता है ताकि वो पानी के काम को अपना समझ कर करें। इस प्रकार जल समिति ग्रामीणों के बीच आपसी संचार का माध्यम बना है जिसकी सहायता से सामुदायिक कार्यों को संस्था द्वारा अंजाम दिया जाता रहा है।<br /><br /><h3>विकास का चिराग</h3><br />चिराग संस्था मध्य हिमालयी क्षेत्रों में पिछले लगभग 30 सालों से ग्रामीणों के बीच काम कर रहा है जिसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और पेयजल विषयों को लेकर समुदाय को जागरूक करना है। संस्था के मार्गदर्शन में कुलगाड़ के प्राकृतिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का काम हुआ है। जिसकी मुख्य विशेषता पूर्णतः समुदाय आधारित एवं महिला नेतृत्व प्रधान होना है। ग्रामीण जलस्रोतों, जिसे स्थानीय भाषा में नौला, धारा एवं पनेरा कहा जाता है, के रिचार्ज पर काम किया गया है। यह प्रयास जितना वैज्ञानिक है उतना ही इसमें परम्परागत तकनीकों का प्रभाव है, शायद यही वजह थी कि यह सफल भी रहा। चिराग संस्था में डेवलपमेंट असिसटेंट पद पर कार्यरत कृष्ण चंद भण्डारी नौले को समझाते हुए कहते हैं कि <b>आसपास के पानी को एक स्थान पर एकत्रित करने के लिये नाले का निर्माण किया जाता है। हमारे बुजुर्गों ने स्थानीय पत्थरों, मिट्टी की मदद से पानी के स्रोतों को नौले का रूप दिया। किन्हीं स्थानों पर मांस की दाल को पीसकर या फिर लाल मिट्टी के माध्यम से नौले का निर्माण किया गया।</b><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/35359864694/in/dateposted-public/" title="कुलगाड़ गाँव का पनेरा नौला"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4295/35359864694_ef49e39792.jpg" width="424" height="300" alt="कुलगाड़ गाँव का पनेरा नौला" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>स्थानीय दास्तकारों द्वारा नौले की आन्तरिक बनावट में सीढ़ी इसलिये बनाई गई ताकि पानी का तल बाहर की ओर न भागे एवं नौले के अन्दर स्वच्छता भी बनी रहे। कुलगाड़ के पनेरा नौला के उन्नयन के लिये 2013 में अर्घ्यम की मदद से चिराग द्वारा तकनीकी सहयोग एवं भूगर्भीय सर्वेक्षण के लिये एक्वाडैम पुणे ने मदद की। आज पाँच साल बाद भी गर्मियों के मौसम में 5 से 6 लीटर पानी एवं बरसात में 15 लीटर पानी रहता है, जो गाँव वालों के लिये पर्याप्त होता है।<br /><br /><h3>पनेरा नौला</h3><br />गाँव के उत्तर में एक नौला है, जिसे गाँववासी पनेरा नौला कहते हैं। यह पानी के स्रोत के साथ ग्रामीणों के लिये परम्परा एवं संस्कृति का केन्द्र है। यहाँ के निवासियों की मान्यता है कि नौले के जल में विष्णु का निवास स्थान होता है। शादी के बाद दूल्हा और दुल्हन नौले में जाते हैं और अपना मुकुट वहाँ स्थापित करके आते हैं। दुल्हन नौले के पानी को भरकर सभी परिवार वालों को पिलाती है और जब भी गाँव में कोई कथा, शीर्वाचन होता है उसकी सामग्री का विसर्जन भी वही होता है। स्थानीय वरिष्ठ नागरिक श्री शेर सिंह भण्डारी कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन के 95 साल में कभी नौले को सूखते हुए नहीं देखा, हाँ! ये जबसे गाँव में पाइप लाइन आई है यह गर्मी के दिनों में सूख जाता है। शेर सिंह जी की ये बातें जल संस्थान द्वारा लगाई गई पाइप लाइनों की ओर इशारा कर रही हैं जो पहाड़ी गाँवों में पेयजल मुहैया कराने के लिये किये गए अदूरदर्शी सोच है। पाइप लाइनों से किसी-न-किसी जलस्रोत के माध्यम से ही पानी आता है, हर ग्राम प्रधान जब भी पानी के संकट की बात आती है तो पाइप लाइन तो लगवा देता है लेकिन जलस्रोतों के जलस्तर को बढ़ाने की कोई नहीं सोचता है।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/35804725290/in/dateposted-public/" title="गाँव के जल समिति में पाँच महिला और 4 पुरुष सदस्य हैं"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4309/35804725290_812c62d62d.jpg" width="424" height="300" alt="गाँव के जल समिति में पाँच महिला और 4 पुरुष सदस्य हैं" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>हालांकि शुरुआत में कुछ दिन पाइपों में पानी रहता है लेकिन गर्मी आने के साथ ही ये भी सूख जाते हैं। इसी सन्दर्भ में स्थानीय विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर उत्तराखण्ड राज्य में पानी की आपूर्ति के लिये लगाई गई सभी पाइप लाइनों को आपस में जोड़कर चाँद तक पहुँचा जा सकता सकता है। इस बयान में सत्यता हो न हो लेकिन सवाल जरूर है।<br /><br /><h3>सामुदायिक प्रयास</h3><br />इन प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग नहीं उपयोग करना चाहिए यह प्रकृति का शाश्वत नियम है, जिसे आज का मनुष्य नहीं समझ पा रहा है। कुलगाड़ जल समिति की सन्दर्भ व्यक्ति एवं पैराहाइड्रोसाइंटिस्ट प्रेमा भण्डारी कहती हैं कि <b>हमारे गाँव का नौला जो कुछ समय पहले सूख गया था उसके संवर्धन के लिये जल समिति ने काम किया है। एक समय नौले का डिस्चार्ज केवल 4 एलपीएम यानी लीटर प्रति मिनट रह गया था। जिसके लिये हमने सामुदायिक प्रयासों से उसके कैचमेंट के 7.3 हेक्टेयर में काम किया। जिसमें लगभग दो बार में छह हजार से ज्यादा पौधों की बुआई की थी। इसके अतिरिक्त कैचमेंट में कंटूर टैंक, खाल, चेकडैम, परकोलेशन पीड बनाए गए। ये सभी कार्य समिति के माध्यम एवं ग्रामीणों के सहयोग से किया गया। यह काम इतना आसान नहीं था इसमें एक विवाद सामने आया जिसमें गाँव के गधेरे के बीच स्थित नौले के कैचमेंट को लेकर आया। नौला कुलगाड़ गाँव की जमीन में है। लेकिन इसका कैचमेंट एरिया दूसरे गाँव की जमीन में है। आपस में चार-पाँच महीने की मीटिंग के बाद उन्हें हम ये बता पाये की स्रोत कितना जरूरी है। उनको भी लगा ये सही काम कर रहे हैं।</b><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/35359782644/in/dateposted-public/" title="कुलगाड़ गाँव"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4306/35359782644_8194e4820f.jpg" width="424" height="300" alt="कुलगाड़ गाँव" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>कुलगाड़ कैचमेंट एरिया में दो प्रकार के पत्थर हैं। एक है क्वार्टजाइट और दूसरा फ्लाइट एवं यहाँ पत्थरों का उत्तरी पूर्वी ढलान है। क्वार्टजाइट, यह कठोर होता है जो पानी को रोकता है। इसे स्थानीय भाषा में डासी पत्थर बोलते हैं। दूसरा फ्लाइट जिसमें अलग-अलग परतें होती हैं। यह अपनी परतों में पानी को रोककर रखता है और धीरे-धीरे छोड़ता है। फ्लाइट में फैक्चर यानी दरारें हैं जिसके द्वारा पानी धीरे-धीरे नौले की ओर जाता है। पहले नौले में 4 एलपीएम पानी था अब 14 एलपीएम रहता है। इसके साथ प्रतिमाह पानी को नापते हैं और जाँच करते हैं। इसके अम्लीयता और क्षारीयता की जाँच करते हैं। चिराग संस्था के एरिया मैनेजर भीम सिंह नेगी कहते हैं कि <b>समुदाय के माध्यम से इस कुलगाड़ के कैचमेंट एरिया में 2013-15 के बीच हमने खाल-चाल, कंटूर ट्रेंच, वृक्षारोपण का काम किया है। जिसके काफी अच्छे परिणाम आये। ग्रामवासी गर्मी के मौसम मेें आग बुझाने के लिये अपने प्रयास भी करते रहते हैं। आज ग्रामीण पानी, जंगल को लेकर जागरूक हैं यही हमारे काम की सफलता है।</b><br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/35392168053/in/dateposted-public/" title="चिराग संस्था द्वारा लगाया गया बोर्ड"><img src="https://farm5.staticflickr.com/4305/35392168053_59e8c8a629_z.jpg" width="424" height="500" alt="चिराग संस्था द्वारा लगाया गया बोर्ड" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=56636&amp;2=comment&amp;3=comment" token="tX288wir8uPg1tF1G7o5lWBRGHP5FTNVh8LfMvbdBJE"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Kulagad-Naula" data-a2a-title="सामुदायिक प्रयासों से किया कुलगाड़ में नौले को पुनर्जीवित"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FKulagad-Naula&amp;title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BF%E0%A4%95%20%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A5%9C%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%B2%E0%A5%87%20%E0%A4%95%E0%A5%8B%20%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4"></a></span> Thu, 27 Jul 2017 11:00:03 +0000 UrbanWater 56636 at http://hindi.indiawaterportal.org वाटर हार्वेस्टिंग सहेजें बारिश की बूँदें (Rainwater Harvesting Essay In Hindi) http://hindi.indiawaterportal.org/Rainwater-harvesting-in-India <span>वाटर हार्वेस्टिंग सहेजें बारिश की बूँदें (Rainwater Harvesting Essay In Hindi)</span> <span><span>UrbanWater</span></span> <span>Tue, 07/25/2017 - 12:37</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">पूनम नेगी</div> </div> </div> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">राष्ट्रीय सहारा (संडे उमंग), 23 जुलाई, 2017</div> </div> <ul class="links inline list-inline"><li class="comment-add"><a href="/Rainwater-harvesting-in-India#comment-form" title="Share your thoughts and opinions." hreflang="en">Add new comment</a></li></ul> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p> </p> <p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">दुनिया की बड़ी आबादी आज भी पीने के पानी के लिये जद्दोजहद कर रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जल संकट भविष्य में बड़ी समस्या होगी। उस स्थिति से निपटने के लिये अगर अभी से तैयारी नहीं की गई तो परिणाम भयंकर हो सकते हैं। रेन वाटर हार्वेस्टिंग ऐसी ही कोशिश है जिसके जरिए वर्षाजल का संचयन कर उसका इस्तेमाल कर हम अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।</p> <p>आज दुनिया भर में पानी का संकट तेजी से गहराता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थितियाँ न सुधरीं तो 2025-30 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जलसंकट झेलने को मजबूर होगी। जलसंकट से निपटने का सबसे कारगर तरीका है वर्षाजल संचयन। ‘बूँद-बूँद से सागर भरता है’, इस कहावत को सच कर दिखाया है रेनवाटर हार्वेस्टिंग तकनीक से बारिश की बूँदों को सहेजने वाली इन सराहनीय कोशिशों ने-<br /><br /> 63 वर्षीय श्यामजी जाधव राजकोट (गुजरात) के बहुत कम पढ़े लिखे किसान हैं पर जल संरक्षण को लेकर उनके प्रयास अच्छे अच्छों को मात देते हैं। उनकी सौराष्ट्र लोक मंच संस्था ने साधारण वर्षाजल संरक्षण संयंत्रों का प्रयोग कर समूचे गुजरात के लगभग 3 लाख खुले कुओं और बोरवेलों को बारिश के पानी से पुनर्जीवित कर दिया है।<!--break--><br /><br /> राजस्थान में जयपुर के पास लापोड़िया गाँव के लक्ष्मण सिंह ने भी चौका तकनीकी के तहत 10 गुणा 10 फीट के 10 इंच गहरे तालाबों की शृंखला बनाकर खेतों को हरा-भरा कर दिया था। उनके इस कार्य हेतु उन्हें वर्ष 2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा जल संग्रहण पुरस्कार प्रदान किया गया था।<br /><br /> राजस्थान के अलवर और महाराष्ट्र में रालेगाँव सिद्धी (अन्ना हजारे जी के गाँव) में भी लोगों ने अपने साधनों और श्रम से वर्षाजल संग्रह की अनेक छोटी-छोटी योजनाओं को कार्यान्वित करके अपने क्षेत्र की कायापलट कर दी है। उन्होंने जल संग्रह के लिये छोटे-छोटे बाँध और सरोवर बनाकर वर्षा के पानी को व्यर्थ बहने से बचाया और उसका संग्रह किया। आज इस क्षेत्र में हरी-भरी धरती व लहलहाती फसलें उनकी इसी कोशिशों का नतीजा है। पानी के साथ मवेशियों के लिये घास व चूल्हे के ईंधन का भी संकट दूर हो गया है।<br /><br /> इसी तरह मध्य प्रदेश के दतिया प्रखण्ड का हमीरपुर गाँव समेकित जल संसाधन प्रबन्धन तकनीक से वर्षाजल संचित कर जलसंकट से मुक्ति पा चुका है। गाँव वालों ने एक बड़े से तालाब का निर्माण कर उसमें वर्षाजल संचित कर गाँव के चापाकलों तथा भूजल स्रोतों को इतना रीचार्ज कर लिया कि उनकी पानी के लिये अन्य स्रोतों पर निर्भरता खत्म हो गई है।<br /><br /> हमीरपुर की इस जलयात्रा की सफलता से प्रेरित होकर पड़ोसी गाँवों ने भी वर्षाजल संचयन तकनीक को लागू कर जलसंकट से निजात पाई है। वर्षाजल संचयन की इन तकनीकों के सुखद परिणामों से प्रेरित होकर झारखण्ड सरकार ने भी राजधानी राँची समेत राज्य के कई शहरों में वर्षाजल संचयन को अनिवार्य कर दिया है।<br /><br /> कासरागोड (केरल) की जिला पंचायत अध्यक्ष पद्मावती कहती हैं कि केरल के कासरागोड जिले का तीन मंजिला जिला पंचायत भवन पानी की जरूरतों के लिये सिर्फ बारिश से मिले पानी पर निर्भर है। इस जिला पंचायत भवन कार्यालय परिसर में लगभग 100 कर्मचारी काम करते हैं और रोजाना 100 से अधिक आगन्तुक इसके शौचालय का इस्तेमाल करते हैं।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/35309666894/in/dateposted-public/" title="वर्षाजल संग्रहण"><img alt="वर्षाजल संग्रहण" height="424" src="https://farm5.staticflickr.com/4297/35309666894_07e0805212.jpg" width="424" /></a>पहले यह कार्यालय कुएँ और बोरवेल पर निर्भर था। पर वह कुआँ गर्मियों में सूख जाता था और बोरवेल से भी काफी कम पानी निकलता था। दो साल पहले तक इस जिले में रेनवाटर हार्वेस्टिंग को लेकर कोई भी उत्सुक नहीं था पर आज यहाँ के कर्मचारियों का इस पर इतना भरोसा कायम हो गया है कि वे अक्सर पूछते हैं कि इसे उनके घर पर लगवाने के लिये कोई स्कीम है क्या!<br /><br /><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>वर्षाजल संचयन की दिशा में सबसे सराहनीय काम हुआ है तमिलनाडु में। पूरे राज्य में वर्षाजल संरक्षण संयंत्र प्राथमिकता से लगाए गए हैं। चेन्नई के मूल निवासी व भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. शेखर राघवन चेन्नई में रहने वाले रामकृष्णन ने मिलकर ‘आकाश गंगा’ नामक संस्था बनाकर इस काम की शुरुआत की। उन्होंने विज्ञान एवं पर्यावरण केन्द्र विपके के सहयोग से वर्षाजल संरक्षण केन्द्र बनाया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने 21 अगस्त 2002 को उस केन्द्र का उद्घाटन किया था।<br /><br /> उस साल बारिश भले ही कम हुई लेकिन परिणाम चौंकाने वाले थे। इस जल संरक्षण संयंत्र के कारण चेन्नई में कुओं में पानी का स्तर काफी बढ़ चुका था और खारापन कम हो गया था। सड़कों पर पानी का बहाव भी कम था और पहले जो पैसा पानी के टैंकरों पर खर्च होता था, लोगों की जेबों सुरक्षित था। चेन्नई के गोपीनाथ का घर भी वर्षाजल संरक्षण का आदर्श उदाहरण है। उन्होंने टीवीएस समूह के कई कारखाने विम्को, स्टाल, गोदरेज, और बोयस जैसी कम्पनियों में इस संयंत्र को लगवाया है।<br /><br /> इन दिनों कुदरत अपने खजाने से यह नायाब तोहफा हम धरतीवासियों पर दिल खोलकर लुटा रही है। मगर हमारी नादानियों से उसे बर्बाद कर देते हैं। और यही वर्षाजल बाढ़ और जल-भराव के रूप में हमारे लिये मुसीबतों के पहाड़ खड़े कर देता है। आइए भूल सुधारें और इस वर्षाजल को संचित कर जलसंकट के अभिशाप को वरदान में बदलने में योगदान दें।</p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border-width: initial; border-style: none; border-color: initial; border-collapse: collapse; width: 698px;"><colgroup><col width="338" /></colgroup><tbody><tr style="height:0pt"><td style="border-width: 1pt; border-style: solid; border-color: rgb(0, 0, 0); vertical-align: top; background-color: rgb(255, 235, 241); padding: 5pt; width: 684px;"> <p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-694a520e-7898-b020-ba99-8046f2e7ac4e"><span style="font-size: 18pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-weight: 700; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">22 साल से नहीं दिया वाटर टैक्स</span></span></p>   <p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-694a520e-7898-b020-ba99-8046f2e7ac4e"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">कर्नाटक स्टेट काउंसिल फॉर, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, बंगलुरु के वरिष्ठ वैज्ञानिक एआर शिवकुमार ने बीते 22 सालों से पानी के बिल का भुगतान नहीं किया है। चौंकिए मत! कारण यह है कि एआर शिव कुमार बिना पानी का कनेक्शन लिये वर्षाजल से अपने पूरे परिवार की पानी की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि न केवल नहाने धोने के लिये, बल्कि पीने के लिये भी वह बारिश के पानी का ही इस्तेमाल करते हैं। शिव कुमार कहते हैं, ‘बंगलुरु में सूखे वर्षों को छोड़कर प्रतिवर्ष लगभग 900-1000 मिलीमीटर वर्षा होती है। वर्षाजल संचयन के माध्यम से वे सालाना 2.3 लाख लीटर पानी एकत्र कर लेते हैं जो उनके चार-पाँच सदस्यों के परिवार की प्रतिदिन की चार सौ लीटर पानी की जरूरत के हिसाब से काफी होता है, सूखे जैसी आपातकाल की स्थिति में भी उनका आसानी से काम चल जाता है।</span></span></p>   <p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-694a520e-7898-b020-ba99-8046f2e7ac4e"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">विज्ञान काउंसिल के इस वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बीते दो दशकों से घर की छत पर वर्षाजल संचयन का संयंत्र लगा रखा है। उनके परिवार में पानी का इस्तेमाल बहुत सावधानी से किया जाता है। रसोई घर के सिंक से और वॉशिंग मशीन से निकले पानी की रीसाइक्लिंग कर उसका इस्तेमाल शौचालय के फ्लश में किया जाता है। रसोई में भी पानी की बर्बादी न होने का पूरा ध्यान रखा जाता है। दाल चावल व सब्जी फल आदि धोने के बाद उस पानी का इस्तेमाल लॉन के पौधों को सींचने में किया जाता है।</span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> <p> </p> <div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"> <table style="border: none; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="*" /></colgroup><tbody><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(239, 239, 239) rgb(239, 239, 239) rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(207, 226, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">TAGS</span></span></p> </td> </tr><tr style="height:0px"><td style="border-style: solid; border-color: rgb(243, 243, 243); vertical-align: top; padding: 7px; background-color: rgb(243, 243, 243);"> <p dir="ltr" style="line-height:1;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-2fd82eff-42d8-fd22-d538-0ee3b894dd7c"><span style="font-size: 8px; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap; background-color: transparent;">rainwater harvesting wikipedia in hindi, rainwater harvesting article in Hindi, water storage in hindi, water harvesting in hindi wikipedia, model of water harvesting system (information in Hindi), jal sanrakshan in hindi essay, rainwater harvesting in marathi language, how to save rain water at home (information in Hindi), </span></span></p> </td> </tr></tbody></table></div> <p> </p> </div> <section> <h2>Comments</h2> <a id="comment-66457"></a> <article class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1531259772"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>chaitanya Agarwal (not verified)</span> on Tue, 07/25/2017 - 23:26</p> <a href="/comment/66457#comment-66457" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/66457#comment-66457" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">RWH</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item"><p>Due to increasing population, continuous deforestation, diminishing rainfall the average ground water table is continually showing a declining trend.This is more prominent in the urban conglomerates, whereas declining trend has also been seen in the rural area also.The southern belt and part of Rajasthan are the worst affected by the shortage of water, but now for the last one decade, it has been noticed that even the alluvial plain of Ganga _Yamuna is suffering by the lowering trend of Groundwater table.</p><p>    The ultimate solution to fight with this problem is only to save and conserve every drop of rain water by using various recharge techniques, it may be RWH,check dams,drip irrigation,making tanks or ponds or any other.But RWH is the method which can be safely be applied to every part of the country.In applying RWH technique, the most important is the maintenance of the structure.As per recent guidelines of the Ministry of Water Resources ,it has been made mandatory to install RWH structure on every Government building and on every private House having an area more than 200Sq.Mt.</p><p><strong>  But unfortunately, the maintenance is very poor causing a danger of Groundwater pollution.The heaps of garbages can be seen around RWH structures and no cleaning of roofs before the onset of rainy season.The private parties who are installing these structures do not know about this danger.Even the use of pesticides in the fields is also showing a trend of increasing Groundwater pollution. </strong></p><p>  Increasing use of grey water or recycled water can also lead to saving our sweet water for all living being. </p><p>  </p><p> </p></div> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderLinks" arguments="0=66457&amp;1=default&amp;2=en&amp;3=" token="fn-_Kpywl73GqvD_HWAtk3v961oJL_4p0eefLwxW_Dk"></drupal-render-placeholder> </div> </article> <a id="comment-66458"></a> <article data-comment-user-id="0" class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1527052617"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>lalchand jangde (not verified)</span> on Thu, 08/03/2017 - 19:04</p> <a href="/comment/66458#comment-66458" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/66458#comment-66458" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">water harvesting</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item">Kaise kare kaha kaha kare</div> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderLinks" arguments="0=66458&amp;1=default&amp;2=en&amp;3=" token="03bINir3a2MZA_plN1MnEBWW1vJOuMeArYZfpe9G-FQ"></drupal-render-placeholder> </div> </article> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=56593&amp;2=comment&amp;3=comment" token="GWm8WuN5_r0UAYBqy2HopwnhhwV47skhLSsGoThxiE8"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Rainwater-harvesting-in-India" data-a2a-title="वाटर हार्वेस्टिंग सहेजें बारिश की बूँदें (Rainwater Harvesting Essay In Hindi)"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FRainwater-harvesting-in-India&amp;title=%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A4%B0%20%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%97%20%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B6%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%AC%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%82%20%28Rainwater%20Harvesting%20Essay%20In%20Hindi%29"></a></span> Tue, 25 Jul 2017 07:07:09 +0000 UrbanWater 56593 at http://hindi.indiawaterportal.org पहाड़ी हुई हरी–भरी तो सात तालाब लबालब http://hindi.indiawaterportal.org/node/55501 <span>पहाड़ी हुई हरी–भरी तो सात तालाब लबालब</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>Hindi</span></span> <span>Sun, 05/14/2017 - 13:36</span> <ul class="links inline list-inline"><li class="comment-add"><a href="/node/55501#comment-form" title="Share your thoughts and opinions." hreflang="en">Add new comment</a></li></ul> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><br /><span class="inline inline-left"><img alt="." class="image image-_original" height="300" src="https://c1.staticflickr.com/5/4183/34515617641_c1856ba7ea.jpg" title="." width="400" /></span>कुछ गाँव के लोगों ने अपने पड़ोस की एक बंजर पहाड़ी को सहेजने की कोशिश की तो देखते ही देखते गाँवों के आस-पास सात तालाब और करीब 50 से ज़्यादा कुएँ पानी से लबालब हो उठे। ताज़ा–ताज़ा पानीदार हुए इन गाँवों में भीषण गर्मी के दिनों में भी फसलें लहलहा रही है। पहाड़ी पर सीताफल और करौंदे की बहार है। इस साल ही यहाँ के किसानों ने फल और खेती से करीब दो करोड़ रूपये का फायदा लिया है। इलाके के पानीदार होते ही यहाँ के लोगों के चेहरों पर भी रौब और समृद्धि का पानी दमकने लगा है।<br /><br /> यह नजारा है मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले के कुछ गाँवों का। इंदौर–कोटा के चमचमाते हाईवे पर इंदौर से करीब सवा सौ किमी का सफ़र तय करने पर आगर से थोड़ी दूर जाते ही दायीं ओर एक पहाड़ी नजर आती है। इलाके में लोग इसे निपानिया की पहाड़ी के रूप में जानते–पहचानते हैं। हाईवे से निपानिया तक सड़क के किनारे करीब दो किमी लंबी इस पहाड़ी को देखकर यह अनुमान लगाना भी मुश्किल है कि कुछ सालों पहले तक यह इतनी बंजर हुआ करती थी कि दूर–दूर तक साफ़ नजर आती थी, लेकिन आज यह पूरी तरह हरियाली से आच्छादित हो चुकी है। तालाबों में नीला पानी ठाठे मारता है। आस-पास के इलाके में फसलें लहलहा रही है और किसान दोपहिया और चारपहिया वाहनों से आते-जाते हैं। एक और बात, पहाड़ी की हरियाली से चरागाह विकसित हुआ तो गाँव दूध उत्पादन में इलाके भर में अग्रणी बन गया है।<br /><br /> करीब 15-17 साल पहले निपानिया, भानपुरा और देहरिया सहित आस-पास छह–सात गाँवों में पानी की जबर्दस्त किल्लत होने लगी। खेती तो दूर, हालात ऐसे बने कि लोगों को पीने के पानी के लिये भी कोस–कोस भर से इंतजाम करना पड़ा। पानी की कमी से सालभर में एक ही फसल पैदा होने से किसान ना-उम्मीद होने लगे। नौजवान रोजगार की तलाश में उज्जैन–इंदौर की राह पकड़ने लगे। इलाके में मंदी छा गई। लोगों का उत्साह जाता रहा। शादी–ब्याह होते, त्यौहार आते लेकिन सब फीके लगते। सबकी एक ही चिंता। यह साल तो जैसे–तैसे निकल गया, अगले साल क्या होगा। कहाँ से आएगा पानी और पानी नहीं तो अन्न कहाँ से, मवेशियों का क्या होगा। घर का खर्च कैसे चलेगा ...जैसी सैकड़ों चिन्ताएँ। चिन्ताएँ और आशंकाएँ तो सबके जेहन में थी लेकिन इसका उपाय किसी के पास नहीं था। ऐसा क्या करें कि पानी मिल सकें। इससे पहले कई किसान धरती में गहरे से गहरे उतरकर बोरिंग करवा चुके थे। हाड़तोड़ मेहनत का लाखों रुपया गँवा देने के बाद भी धरती से पानी नहीं निकल रहा था। लोग कहते धरती में ही बारिश का पानी नहीं रिसता तो धरती भी कब तक अपनी कोख का पानी दे पाती। ट्यूबवेल में पानी नहीं निकलता और कहीं निकल भी जाता तो हिचकोले भरते हुए बमुश्किल थोड़ा ही पानी मिल पाता।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/33836568413/in/dateposted-public/" title="पहाड़ी"><img alt="पहाड़ी" height="307" src="https://c1.staticflickr.com/5/4156/33836568413_eb447583a9.jpg" width="424" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>ऐसे ही निराशा के वातावरण में एक दिन चौपाल पर बात उठी तो किसी ने कहा कि यदि हम सब मिलकर इस पहाड़ी को हरी–भरी बनाकर पानीदार बना सकें तो गाँव में भी पानी ठहर सकता है। पहले तो कोई इसे मानने को ही तैयार नहीं था कि आधे किमी दूर खड़ी इस पहाड़ी की हरियाली का गाँव के पानी से क्या सम्बन्ध हो सकता है। लेकिन कुछ लोगों को बात जंच गई। तब तक मध्यप्रदेश में चलने वाले जलाभिषेक अभियान के कारण जमीनी पानी का जल स्तर, बारिश के पानी को रिसाने की तकनीक और खेतों में पानी के लिये जंगल और पौधे लगाने की बातें गाँव–गाँव की हवा में तैरने लगी थी।<br /><br /> एक दिन आस-पास के सभी किसानों की एक बैठक बुलाई। इसमें खूब बातें हुई और आखिर में निर्णय हुआ कि हम सब मिलकर 142 हेक्टेयर की इस पहाड़ी को सहेजेंगे और इसे फिर से हरियाली का बाना ओढ़ाकर ही दम लेंगे। काम इतना आसान नहीं था। गाँव वाले मेहनत करे और कोई पेड़ ही काट ले जाए तो। मवेशी पौधे चर जाएँ तो। लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर रास्ता निकला और इसी रास्ते ने गाँवों की दशा ही बदल डाली। सरकार से मदद मिल सकती थी लेकिन समय बहुत लगता और उनके पास अब समय कहाँ बचा था। उन्होंने आपस में सहकारी समिति बनाकर 2001 में इस पहाड़ी को सरकार से 30 साल के लिये लीज पर ले लिया। समिति में 11 रूपये की सदस्यता से साढ़े तीन सौ किसान जुड़े। फिर यहाँ कुल्हाड़ीबंदी लागू की कि कोई भी गीली लकड़ी नहीं काटेगा। अगला काम था–पानी रोकने का। यहाँ बरसाती पानी रोकने के लिये सबसे पहले कन्टूर ट्रेंच खोदी। 20 फीट लंबी, 2 फीट चौड़ी और 2 फीट गहरी खंतियाँ खोदी गई। नालों के प्राकृतिक प्रवाह को सुचारू किया। जगह–जगह बरसाती पानी को छोटे पत्थरों के बाँध से रोका। सात छोटे तालाब बनाए। पौधे लगाए। गाँव वाले इस काम में जुट गए, जिससे जो बनता वही करने लगा। दो तीन सालों में पहाड़ी की रंगत बदलने लगी। कोशिशों से पहाड़ी का पानी धरती में थमने लगा।<br /><br /><a data-context="true" data-flickr-embed="true" data-footer="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/33836567383/in/dateposted-public/" title="पहाड़ी"><img alt="पहाड़ी" height="400" src="https://c1.staticflickr.com/5/4180/33836567383_5e19f018f3.jpg" width="424" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>ग्रामीण नारायण सिंह चौहान कहते हैं–<i> <b>'किसानों ने तय किया है कि इन तालाबों से कोई भी किसान सीधे पंप लगाकर सिंचाई नहीं कर सकेंगे। इन तालाबों में पानी मार्च महीने तक भरा रहता है। इनमें पानी भरे रहने से आस-पास का जलस्तर बना रहता है और किसानों के निजी कुओं में भी पर्याप्त पानी भरा रहता है। इसी पानी से किसान गेहूँ की फसल में पाँच से छह पानी तक दे पा रहे हैं। कुछ किसान अब सब्जियों की खेती कर रहे हैं।'</b></i><br /><br /> ये तालाब आधे से दो हेक्टेयर तक के हैं। इससे करीब 800 लोगों की आबादी वाले भानपुरा के आस-पास इन दिनों कोई खेत सूखा नहीं है। 50 कुएँ पानीदार हैं। करीब एक सौ किसान खुश हैं। इसी तरह डेढ़ हजार की आबादी वाले देहरिया गाँव में भी सवा सौ किसान गेहूँ–चने की फसल कर रहे हैं। यहाँ करौंदे की झाड़ियों के बीच नीम की निम्बौलियाँ डाली। इससे पौधे निकल आए।<br /><br /> तेज़ सिंह बात को आगे बढ़ाते हैं– <i><b>'हम सोच भी नहीं सकते थे कि थोड़े से काम से इतना फायदा होगा। पानी तो हुआ ही। डेरी में दूध भी 60-70 लीटर से बढ़कर 400 लीटर हो गया है। अब हम दूध उत्पादन में भी अग्रणी हैं। पहाड़ी पर जंगली जानवर और पक्षी आने लगे हैं।'</b></i><br /><br /> ग्रामीणों के इस नेक काम में उज्जैन की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलाजी सिक्योरिटी ने तकनीकी और जागरूकता बढ़ाने में ग्रामीणों की मदद की तो आईटीसी ने कुछ वित्तीय मदद की है।<br /><br /> संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलॉजी सिक्योरिटी के सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर सतीश पवार कहते हैं– <i><b>'हमने देखा कि ग्रामीण जोश–खरोश से काम कर रहे हैं तो हमने उन्हें जागरूकता बढ़ाने और तकनीकी मदद की। सच में उनका काम अनुकरणीय है। हमने तो सिर्फ़ दिशा दिखाई पर बड़ी ख़ुशी है कि ग्रामीणों ने उस पर चलकर कड़ी मेहनत से अपने सपने को सच कर दिखाया है।'</b></i><br /><br /> अब यहाँ शीशम, सफ़ेद चंदन, पलाश, नीम महुआ, जामुन, बांस सहित कई प्रजातियों के करीब पाँच हजार से ज़्यादा पौधे 8 से 10 फीट तक हो चुके हैं। इससे इलाके के करीब तीन सौ किसानों की उपज में बढ़ोतरी हुई है। डेढ़ सौ बीघा जमीन में पहले एक ही फसल बरसात के पानी से होती थी पर अब यहाँ दो फसलें और सब्जियाँ होने लगी हैं। इससे लगे छह गाँवों में पीने के पानी की दिक्कत खत्म हुई है। गाँवों के कुएँ इससे रीचार्ज हो रहे हैं।<br /><br /> सीताफल, जामुन और करौंदे की बहार तो ऐसी आती है कि हर साल हजारों रूपये में नीलाम करनी पड़ती है। नीलामी की राशी ग्राम कोष में जमा होती है और इसका उपयोग पहाड़ी को और भी बेहतर बनाने में किया जा रहा है। सीताफल जो इस क्षेत्र से खत्म हो रहे थे, अब बम्पर पैदावार होने लगी है। बीते साल समिति ने छह हजार रुपये के सीताफल नीलाम किए हैं। इसके अलावा खेतीहर अजा वर्ग के 20 परिवारों को करौंदे की पैदावार का फायदा लेने के लिये ग्रामीणों ने तवज्जो दी है। ये लोग मध्यप्रदेश के इंदौर और उज्जैन सहित राजस्थान के कोटा में इन्हें बेचकर मुनाफा कमाते हैं। इस काम में नारायणसिंह चौहान, तेजसिंह, गजेन्द्रसिंह, दरियावसिंह लोहार, रमेशचंद, विजय सिंह, लालजीराम तथा रजाक खान की महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही।<br /><br /> अब सब बहुत खुश हैं और उनके चेहरे पर खोई चमक लौट आई है। यह पहाड़ी अब पूरे इलाके की समृद्धि की नई इबारत रच रही है।<br />  </p> </div> <section> <h2>Comments</h2> <a id="comment-66376"></a> <article data-comment-user-id="0" class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1527052617"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>GOVIND RATHOR (not verified)</span> on Sat, 06/10/2017 - 21:08</p> <a href="/comment/66376#comment-66376" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/66376#comment-66376" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">KHET TALAB</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item"><p>Excellent thinking and conversion of ideas into reality</p></div> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderLinks" arguments="0=66376&amp;1=default&amp;2=en&amp;3=" token="dDwjCkkE6Gubh4NjZSTkoi1IqlzghSvO_DeaREKVy20"></drupal-render-placeholder> </div> </article> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=55501&amp;2=comment&amp;3=comment" token="LojqJbF9s4p3Ni7B_5n3FK3Tvb5pS_YzAbsfKmTAZoQ"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/node/55501" data-a2a-title="पहाड़ी हुई हरी–भरी तो सात तालाब लबालब"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fnode%2F55501&amp;title=%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A5%9C%E0%A5%80%20%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%88%20%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%80%E2%80%93%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%A4%E0%A5%8B%20%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%20%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AC%20%E0%A4%B2%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%AC"></a></span> Sun, 14 May 2017 08:06:32 +0000 Hindi 55501 at http://hindi.indiawaterportal.org तालाबों का गाँव http://hindi.indiawaterportal.org/The-village-of-ponds <span>तालाबों का गाँव </span> <span><span>UrbanWater</span></span> <span>Thu, 04/06/2017 - 11:45</span> <div class="field field--name-field-story-author field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Author</div> <div class="field--items"> <div class="field--item">आशीष तिवारी</div> </div> </div> <ul class="links inline list-inline"><li class="comment-add"><a href="/The-village-of-ponds#comment-form" title="Share your thoughts and opinions." hreflang="en">Add new comment</a></li></ul> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">महोना गाँव में अधिक आबादी होने के कारण यहाँ तालाबों की संख्या भी अन्य गाँवों की अपेक्षा सबसे ज्यादा है। कहावत है कि यहाँ हर बिरादरी के नाम से उनके मोहल्ले में एक तालाब है जिसमें लोग अपना पानी छोड़ते हैं। हर घर से एक-न-एक तालाब आपको जरूर दिखेगा। गाँव के लोगों के लिये ये गर्व की बात है कि उनका इकतौला ऐसा गाँव है जहाँ पर इतने तालाब हैं। गाँव का हर शख्स इस बात की कोशिश में लगा रहता है कि वह अपनी इस विरासत को बचाए रखे।</p> जब शहरों से लेकर गाँवों तक तालाबों पर कब्जे हो रहे हैं। उनको बन्द कर कहीं प्लाटिंग तो कहीं मकान बनाए जा रहे हैं। ऐसे दौर में लखनऊ से चन्द किलोमीटर की दूरी पर बसा गाँव महोना एक अलग ही नजीर पेश कर रहा है। इस गाँव में आज भी दो दर्जन से ज्यादा तालाब हैं। जो न सिर्फ बारहों महीने पानी से लबालब भरे रहते हैं बल्कि ये सूखने न पाएँ इसके लिये बाकायदा जिम्मेदारी तक तय की गई है। <br /><br />इस गाँव की खासियत यह है कि यहाँ के हर घर से एक-न-एक तालाब दिखता है। जो इटौंजा से तकरीबन तीन किलोमीटर दूर कुर्सी रोड पर बसा है। तकरीबन चालीस साल पहले इस गाँव को नगर पंचायत का दर्जा मिला था लेकिन सरकारी बदहाली के चलते प्रदेश के इस खूबसूरत तालाबों वाले गाँवों की ओर सरकार की नजरें इनायत नहीं हुई।<!--break--><br /><br />इस गाँव के अतीक अली ने बताया कि <b>गाँव में हर मोहल्ले में एक बड़ा तालाब होने के कारण और उसमें साल भर पानी भरे रहने के कारण गाँव का वाटर लेबल मात्र 15 फिट पर है। यही वजह है कि इस पूरे इलाके में खेती भी बेहतर होती है।</b> गाँव के ही जगदीश मौर्या ने बताया कि <b>जितना पुराना महोना का इतिहास है उतना ही पुराना इतिहास यहाँ के तालाबों का है।</b> जगदीश के अनुसार <b>महोना ऐसा गाँव है जहाँ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हुए।</b><br /><br />गाँव के लोगों के लिये ये गर्व की बात है कि उनका इकतौला ऐसा गाँव है जहाँ पर इतने तालाब हैं। गाँव का हर शख्स इस बात की कोशिश में लगा रहता है कि वह अपनी इस विरासत को बचाए रखे। महोना के दर्जिन टोला निवासी शब्बो ने बताया कि <b>गर्मियों के मौसम में अगर गरीबों का सबसे हमदर्द है तो ये तालाब ही है।</b> शब्बो के अनुसार <b>भीषण गर्मी में जब पक्की दीवालों की गर्मी बर्दाश्त नही होती तब इन तालाबों के किनारे लगे पेड़ों के नीचे चारपाई डालकर जन्नत का मजा मिलता है।</b> <br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/33828010006/in/dateposted-public/" title="महोना गाँव का तालाब"><img src="https://c1.staticflickr.com/3/2805/33828010006_0f348fa25d.jpg" width="424" height="300" alt="महोना गाँव का तालाब" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>लखनऊ और आस पास के लोग इस गाँव को मायावती के करीबी और बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के गाँव के नाम पर जानते हैं लेकिन किसी को इस बात का अन्दाजा नहीं है कि यह गाँव तालाबों की एक विरासत को भी सम्भाले हुए है। गाँव के बिंदादीन कहते हैं कि <b>वह चाहते हैं कि उनका गाँव पर्यटन के नक्शे पर आये लेकिन सरकारी प्रयासों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि इस गाँव को यह दर्जा मिल सकेगा।</b> गाँव के लोग जरूर मिलकर अपनी विरासत को सम्भालते हैं। गाँव के ही लोगों को जिम्मेदारी दी गई है कि वह इस पर नजर बनाए रखें, ताकि तालाबों में पानी की कोई कमी न रहे। गाँव के लोग इसको मेहनत के साथ पूरा भी करते हैं।<br /><br /><h3>थोड़ा सुधार हो जाये तो बात बने </h3><br />गाँव के अजय मिश्र 'बाबा' ने बताया कि <b>गाँव के अन्दर बने तालाबों में नगर पंचायत द्वारा कोई सफाई से जुड़ा कार्य नहीं करवाया जाता। उन्होंने बताया कि अगर नगर पंचायत द्वारा इन तालाबों के चारों तरफ बाउंड्री वाल बनाकर रखा जाये तो और भी सुन्दरता बढ़ जाएगी।</b> <br /><br />महोना गाँव में अधिक आबादी होने के कारण यहाँ तालाबों की संख्या भी अन्य गाँवों की अपेक्षा सबसे ज्यादा है। कहावत है कि यहाँ हर बिरादरी के नाम से उनके मोहल्ले में एक तालाब है जिसमें लोग अपना पानी छोड़ते हैं। नगर पंचायत अध्यक्ष रेशम देवी का कहना है कि तालाबों के लिये कोई बजट नहीं है। अगर बजट अलग से मिल जाये तो इनका सौन्दर्यीकरण भी हो सकेगा। हमारी कोशिश है कि तालाबों की विरासत को हम बचा सकें।<br /><br /><h3>गोमती का इलाका लेकिन तालाबों की कमी</h3><br />यह पूरा इलाका गोमती का इलाका कहलाता है। इटौंजा और आस-पास के इलाकों से गोमती नदी तो निकलती है लेकिन कहीं पर पोखर और तालाबों की इतनी संख्या नहीं है। हालांकि इटौंजा के पास में ही एक गाँव है पकड़रिया। कभी इस गाँव के किनारे से गोमती बहा करती थी। बाद में गोमती नदी का रुख मोड़ कर गाँव से कुछ किलोमीटर दूर कर दिया। लेकिन नदी का जो पहले का रास्ता था वहाँ पर अभी भी गोमती का पानी नेचुरल रूप से बहता रहता है। <br /><br />इस गाँव में भी कुछ तालाब हैं लेकिन गाँव वालों का कहना है कि नदी के प्राकृतिक स्वरूप के छेड़खानी का असर यह हुआ कि अभी भी बरसात के दिनों में यहाँ पर बाढ़ आ जाती है। गाँव के लोग इलाके छोड़ जाते हैं। उसके बाद जब दोबारा बसाए जाते हैं तो कुछ वक्त लग जाता है इनको सेट होने में। <br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/33828037316/in/dateposted-public/" title="इन तालाबों की वजह से गाँव का भूजल स्तर 15 फीट है"><img src="https://c1.staticflickr.com/4/3829/33828037316_ce6e251f64.jpg" width="424" height="300" alt="इन तालाबों की वजह से गाँव का भूजल स्तर 15 फीट है" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script><h3>अवैध तालाबों पर कब्जे को लेकर प्रशासन ने फटकार भी लगाई</h3><br /> राजधानी के इलाकों में तालाबों के पाटने पर जिला प्रशासन ने फटकार तब लगाई है, जब कइयों के खिलाफ मामले में भी दर्ज किये गए हैं। लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों की सुस्ती का आलम यह है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण जैसे महकमों ने तालाबों को पाटकर लोगों को जमीन दे दी। प्राधिकरण के जनता दरबार में ऐसे आवंटियों ने जब शिकायतें कराईं तो उम्मीद थी कि कुछ कार्रवाई होगी लेकिन अब तक न तो कोई कार्रवाई की गई और न ही कोई कड़ा एक्शन लिया गया।<br /><br /></div> <section> <h2>Comments</h2> <a id="comment-66362"></a> <article data-comment-user-id="0" class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1527052617"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>Etta (not verified)</span> on Thu, 05/11/2017 - 19:13</p> <a href="/comment/66362#comment-66362" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/66362#comment-66362" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">Reply to comment | इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item">Hey there! I just wanted to ask if you ever have any problems with hackers?My last blog (wordpress) was hacked and I ended up losing many months of hard work due to no data backup. Do you have any solutions to protect against hackers?Take a look at my web-site <a href="https://elayzarraga.wordpress.com/tag/martin-rodriguez-celin/">booty</a></div> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderLinks" arguments="0=66362&amp;1=default&amp;2=en&amp;3=" token="XTcRM7vzb4W_L57nyvKFy7rpyNVsfYrDFrn3zeCEYZo"></drupal-render-placeholder> </div> </article> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=55295&amp;2=comment&amp;3=comment" token="VObDy6pysI1Z9apCIBg8qAJeDR0D2e5YISE0drnA21g"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/The-village-of-ponds" data-a2a-title="तालाबों का गाँव "><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FThe-village-of-ponds&amp;title=%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5%20"></a></span> Thu, 06 Apr 2017 06:15:21 +0000 UrbanWater 55295 at http://hindi.indiawaterportal.org 1700 घरों के गाँव में 800 से ज़्यादा कुंडियाँ http://hindi.indiawaterportal.org/node/55232 <span>1700 घरों के गाँव में 800 से ज़्यादा कुंडियाँ</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>Hindi</span></span> <span>Mon, 03/20/2017 - 20:06</span> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><p><br /><span class="inline inline-left"><img alt="." class="image image-_original" height="300" src="https://c1.staticflickr.com/3/2820/33393328742_2057f89b25.jpg" title="." width="400" /></span>क्या आपने कभी ऐसा गाँव देखा या सुना है, जिसके हर दो में से एक घर में पानी से लबालब कुंडियाँ हों। इस जल संकट के दौर में जब पूरे गाँवभर को पानी नसीब नहीं हो पा रहा हो ऐसे में यह पानीदार गाँव बिरला ही हो सकता है। इन्हें अपने रोज के पानी के लिये कहीं बाहर जाने और मशक्कत करने की कोई कवायद ही नहीं करनी पड़ती। देशभर के लाखों गाँवों से अलग इस गाँव ने पानी का बेशकीमती खजाना अपने ही घरों में छुपा रखा है। यहाँ के कुल 1700 घरों में से 800 से ज़्यादा घरों के आँगन में उनकी अपनी कुंडियाँ हैं, जिनमें नीला पानी ठाठे मरता रहता है।<br /><br /> मध्यप्रदेश के चमचमाते भोपाल–इंदौर हाईवे पर देवास से करीब 20 किमी पहले एक छोटा-सा तिराहा पड़ता है। इसे नेवरी फाटा के नाम से ही पहचानते हैं। बस यहाँ से 15 किमी दूरी पर है यह गाँव। देवास जिले की हाटपीपल्या के पास छोटा-सा सात–आठ हजार की आबादी वाला गाँव नेवरी। बीच सड़क पर होने से यह गाँव अब किसी कस्बे से बस गया है। ज्यादातर पक्के मकान, सीमेंट की सडकें और कुछ जगमग करती दुकानें। दूर से देखने पर यह गाँव भी आपको बाकी गाँवों की तरह ही नजर आएगा। लेकिन इसकी खासियत सुनेंगे तो आपको भी हैरत होगी। नए चलन में ढलने के बाद भी इस गाँव ने पानी के लिये अपनाई जाने वाली अपनी अनूठी और बेशकीमती परम्परा को बनाए रखा है, इसीलिये गर्मियों के दिनों में भी यहाँ के लोगों को दूसरे गाँव वालों की तरह जल संकट का सामना नहीं करना पड़ता।<br /><br /> आखिर क्या है यह अनूठी और बेशकीमती परम्परा, क्या आप नहीं जानना चाहेंगे इसे, हमारे पूर्वज पानी को लेकर कितने सजग थे और उस संसाधनविहीन दौर में भी जीवन के लिये सबसे ज़रूरी पानी के प्रति उनकी समझ कितनी साफ़ और समृद्ध थी और उनके समय का पानी के लिये अभियांत्रिकी ज्ञान तो आज की पढ़ी–लिखी पीढ़ी के लिये भी आश्चर्य की बात ही है। इसी बेमिसाल पानी की समझ और उसकी लगातार आपूर्ति के लिये उनके अभियांत्रिकी कौशल का नायाब नमूना है यह छोटा-सा गाँव।<br /><br /> यह अनूठी परम्परा है घर–घर कुंडियाँ बनाने की। दरअसल अपने घर के आँगन में करीब तीस फीट की गहराई और पाँच से सात फीट की चौड़ाई के आकार में ये कुंडियाँ बनाई जाती हैं। ज्यादातर कुंडियाँ गोलाकार ही होती हैं लेकिन कुछ चौकोर या पंचकोणीय भी होती हैं। इन्हें खुदवाने के बाद ईंटों या सीमेंट से पक्का भी किया जाता है। अब ज्यादातर परिवारों ने या तो इनकी मुंडेर बना दी हैं या उन्हें लोहे के मोटे सरियों की जालियों से ढक कर उनमें जल मोटर लगा दी है। कुछ कुंडियाँ अब भी खुली हैं और उनमें बकायदा पुरानी तरह से ही रस्सी डालकर पानी खींचा जाता है। अधिकांश कुंडियों में पूरी गर्मियों के मौसम में जून तक पर्याप्त पानी भरा रहता है और इस तरह गाँव भी पानीदार बना रहता है।<br /><br /> यहाँ की वर्तमान पीढ़ी और पूर्वजों की पीढ़ी इस बात के लिये तारीफ़ के काबिल हैं कि उन्होंने पानी के मोल को समझा और अगली पीढ़ी के लिये अपने गाँव का पानी सहेज–समेट कर रखा। गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि बीते करीब सौ सालों में उन्होंने कभी अपने यहाँ पानी की किल्लत का सामना नहीं किया। कैसा भी समय आया और कितनी ही गर्मी पड़ी लेकिन हमारे अपने ही घरों के आँगन में बनी इन जल संरचनाओं में नीली बूँदे हमें हमेशा ही जीवन रस देती रही। पूर्वजों की पीढ़ी ने अपने आँगनों में ये नायाब तकनीक स्थापित की और वर्तमान पीढ़ी ने नए चलन के साथ चलने और अपने मकानों को पक्का बनवाने की होड़ के बाद भी इन कुंडियों के स्वरूप से कोई छेड़-छाड़ नहीं की। उन्हें यथावत बने रहने दिया। इतना ही नहीं इस विरासत को अब वे आगे भी बढ़ा रहे हैं।<br /><br /> ग्रामीण बताते हैं कि गाँव में अब भी जब कोई नया मकान बनता है तो सबसे पहले कुंडी बनाई जाती है। अभी–अभी रामसिंह चौधरी ने अपना नया मकान बनवाया है और वे भी गाँव की रिवायत के मुताबिक अपने आँगन में कुंडी बनवाना नहीं भूले हैं। कुछ गाँवों में तो घर–घर कुंडियाँ बनाई जाती थी। इसका एक बड़ा फायदा यह भी होता था कि पानी के लिये घर की महिलाओं को दूर जलस्रोतों तक पानी की जुगत में भटकना नहीं पड़ता था।<br /><br /> नेवरी के पूर्व सरपंच देवीसिंह पाटीदार कहते हैं– <b><i>'यहाँ कुंडियों की शुरुआत कब से हुई, यह बताना तो मुश्किल है पर हाँ, यह तय है कि सैकड़ों साल पहले जब यह गाँव हमारे पूर्वजों ने बसाया, करीब–करीब तभी से यहाँ कुंडियाँ बनाने की भी बात सामने आती है। कई घरों में अब भी बहुत पुरानी (सैकड़ों साल की) कुंडियाँ हैं और अब भी वे पानी दे रही हैं। बताते हैं कि यह गाँव करीब बारह सौ साल पहले परमार काल के वक्त से बसा है और तब से अब तक यह परम्परा चली आ रही है।'</i></b><br /><br /> क्षेत्र के सजग पत्रकार नाथूसिंह सैंधव कहते हैं–<b><i> 'यहाँ शुरुआत से पानी की कोई किल्लत नहीं थी फिर भी पूर्वजों ने पानी की लगातार आपूर्ति और पानी को धरती में रिसाने के लिये यह परम्परा शुरू की थी। दरअसल कुंडियों का पानी शुद्ध और पीने के लिये सेहतमंद होता है। घर में कुंडी रहने से पानी की उपलब्धता के साथ–साथ गर्मियों में भी घर ठंडा और वातानुकूलित बना रहता है। पहले के जमाने में धनाढ्य घरों में ही कुंडियाँ बनाई जाती थी लेकिन अब गाँव के सभी वर्गों के लोगों के यहाँ कुंडियाँ देखी जा सकती हैं।'</i></b><br /><br /> भूजलविद बताते हैं कि जिन गाँवों में पानी की किल्लत ज़्यादा नहीं होती थी और भूजल स्तर भी सामान्य हुआ करता था, वहाँ इस तरह की कुंडियों के बनाने का रिवाज़ आम हुआ करता था। इससे लगातार रिचार्ज होते रहने की वजह से भूजल भंडार यथावत बना रहता था। आस-पास नमी और ठंडक रहती थी तथा सबसे बड़ी बात कि धरती के भूजल भंडार के खजाने में भी धीरे–धीरे पानी रिसता रहता और उसके खजाने को समृद्ध करता रहता था। यह बनाने में आसान हुआ करती थी और मकान बनाते वक्त सबसे पहले इसके बन जाने से मकान निर्माण में लगने वाले पानी की समस्या नहीं रहती थी। इसी के पानी से मकान भी बन जाता और बाद में यही पानी परिवार के पीने और अन्य उपयोग में भी आता रहता था।<br /><br /> नेवरी गाँव उन हजारों हजार गाँवों के लिये एक बड़ी मिसाल है, जो साल दर साल धरती का सीना छलनी करते हुए बोरिंग कराते रहते हैं। बावजूद इसके पीने तक के बाल्टी–बाल्टी पानी को मोहताज हुए रहते हैं। इस गाँव ने अपनी विरासत को सहेज कर जल संकट का स्थाई निदान कर लिया है और अच्छी बात यह भी है कि नई पीढ़ी के लोग भी इसका महत्त्व समझ रहे हैं और कुंडियों की विरासत को न सिर्फ़ सहेज रहे हैं बल्कि नई कुंडियाँ बनवाकर इसे आगे भी बढ़ा रहे हैं। आज देश को ऐसे कई गाँवों की ज़रूरत है जो अपना पानी अपने ही आँगन में रोक सके।<br />  </p> </div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=55232&amp;2=comment&amp;3=comment" token="1JVjhRVH5XcOo9fDDuiFIROnMXntc_KCLjauxFjLw40"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/node/55232" data-a2a-title="1700 घरों के गाँव में 800 से ज़्यादा कुंडियाँ"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2Fnode%2F55232&amp;title=1700%20%E0%A4%98%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20800%20%E0%A4%B8%E0%A5%87%20%E0%A5%9B%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81"></a></span> Mon, 20 Mar 2017 14:36:45 +0000 Hindi 55232 at http://hindi.indiawaterportal.org फतेहपुर में सूखे पर फतेह http://hindi.indiawaterportal.org/Resurrecting-a-rivulet <span>फतेहपुर में सूखे पर फतेह</span> <span><span>UrbanWater</span></span> <span>Sat, 03/11/2017 - 13:55</span> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">राइजिंग टू द काल, 2014</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><b>अनुवाद - संजय तिवारी</b><br /><br /><p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 199px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">किसी सरकारी योजना में ऐसा पहली बार हुआ था कि दोहन की बजाय संवर्धन पर सरकारी धन खर्च किया गया था। सरकारें ट्यूबवेल बनाकर धरती का पानी खींचने में सिद्धहस्त होती हैं लेकिन यहाँ इसके उलट किसी छोटी जलधारा को जीवित किया गया ताकि धरती के पेट में पानी भर सके। छोटी जलधाराएँ न केवल स्थानीय भूजल को बनाकर रखती हैं बल्कि जिन नदियों में उनका मिलन होता है उस बड़ी नदी की सेहत के लिये भी ये छोटी नदियाँ वरदायी होती हैं। </p> यह देश के 250 सर्वाधिक पिछड़े हुए जिलों में से एक फतेहपुर की कहानी है जहाँ सरकारी पैसे के समुचित उपयोग और जन भागीदारी से समाज ने अपनी सूखी नदी को जिन्दा कर लिया।<br /><br />39 साल के राम ईश्वर फतेहपुर स्टेशन के सामने रिक्शा चलाते थे। खेती करते थे तब भी वो कोई बड़े किसान नहीं थे लेकिन रोजी रोटी चल जाती थी। छोटी जोत में मेहनत से इतना पैदा कर लेते थे कि जीवन चल जाता था। जब पानी की कमी की वजह से छोटी जोत की पैदावार भी जरूरत से छोटी हो गई तो उन्होंंने रिक्शा चलाने का विकल्प चुना। अगर उद्योग धन्धे का विकल्प मिलता तो शायद मिल फैक्टरी में काम भी करते लेकिन फतेहपुर में रोजी रोटी के बहुत सारे विकल्प नहीं हैं। ऐसे में एक सरकारी योजना राम ईश्वर के लिये वरदान बनकर आई।<br /><br />महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना के तहत फतेहपुर में एक ऐसा काम हाथ में लिया गया जिससे फतेहपुर को सींचने वाली सूखी नदी हरी हो गई। ससुर खदेरी (2) का पुनर्जीवन भारत में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का सफल उदाहरण है जिसने छोटी जोत वाले न जाने कितने किसानों को खेती की तरफ लौटाने का काम किया है।<!--break--><br /><br />केवल डेढ़ महीने के प्रयास ने ससुर खदेरी का दुख दूर कर दिया। वह नदी जो कभी यमुना की संगिनी थी, इतना गाद (मिट्टी) से भर गई थी कि वियोगीनी बनी जी रही थी। 15 अप्रैल 2013 से 31 मई 2015 के बीच मनरेगा के तहत चलाई गई सफाई योजना ने नदी का कायाकल्प कर दिया। करीब चार हजार मजदूरों को रोजाना काम पर लगाकर नदी की गाद को साफ किया गया और साफ होते ही नदी ने आसपास के समाज के माथे पर उभर आये सूखे के दाग को धो दिया। ससुर खदेरी की सरकारी सफलता सरकार के लिये इतनी असरकारी थी कि राज्य के कृषि उत्पादन कमिश्नर आलोक रंजन ने राज्य के बाकी 70 जिलों को निर्देश दिया कि वो भी अपने-अपने जिलों में ऐसे ही प्रयास करें ताकि जमीन का गिरता जलस्तर ऊपर की तरफ उठ सके।<br /><br />किसी सरकारी योजना में ऐसा पहली बार हुआ था कि दोहन की बजाय संवर्धन पर सरकारी धन खर्च किया गया था। सरकारें ट्यूबवेल बनाकर धरती का पानी खींचने में सिद्धहस्त होती हैं लेकिन यहाँ इसके उलट किसी छोटी जलधारा को जीवित किया गया ताकि धरती के पेट में पानी भर सके। छोटी जलधाराएँ न केवल स्थानीय भूजल को बनाकर रखती हैं बल्कि जिन नदियों में उनका मिलन होता है उस बड़ी नदी की सेहत के लिये भी ये छोटी नदियाँ वरदायी होती हैं। और फिर फतेहपुर तो दो दो बड़ी नदियों के रास्ते में पड़ता है, गंगा और यमुना दोनों ही फतेहपुर से होकर गुजरती हैं।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/33215592932/in/dateposted-public/" title="4000 से ज्यादा लोगों ने प्रत्येक दिन ससुर खदेरी के लिये श्रमदान किया"><img src="https://c1.staticflickr.com/4/3773/33215592932_e4f2305f4f.jpg" width="424" height="300" alt="4000 से ज्यादा लोगों ने प्रत्येक दिन ससुर खदेरी के लिये श्रमदान किया" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>गंगा जमुना के इस दोआब में अकाल की आहट सचमुच चौंकाने वाली थी। जिसके एक सिरे पर गंगा और दूसरे सिरे पर यमुना बहती हों, इन नदियों को जोड़ने वाली आधा दर्जन से अधिक छोटी नदियाँ मौजूद हों, उस जिले के किसी एक हिस्से में अकाल की आहट आ जाये तो इससे ज्यादा आश्चर्य और क्या हो सकता है? लेकिन राज्य सरकार की रिमोट सेंसिंग रिपोर्ट ने 2012 में वह आहट सुना दी थी। जिले के छह ब्लाक में भूजल रसातल में चला गया है और सात ब्लाक में जाने के कगार पर है। चार ब्लाक को तो डरावने डार्क जोन में डाल दिया गया था जहाँ अब भूजल को पुनर्जीवन नहीं दिया जा सकता। इस पर भी संकट ये कि छोटी जलधाराओं के सूख जाने से बारिश के दिनों पानी आसपास के इलाकों में जमा हो जाता है और जलभराव का संकट पैदा करता है और सूखे से जूझते इलाकों में बाढ़ राहत कार्यक्रम चलाना पड़ता था।<br /><br />इन समस्याओं की तरफ पहला ध्यान दिया जिलाधिकारी कंचन वर्मा ने। कंचन वर्मा ने महसूस किया कि 46 किलोमीटर लम्बी ससुर खदेरी को अगर पुनर्जीवित कर दिया जाये तो इलाके के बाढ़ सुखाड़ की समस्या से निजात पाई जा सकती है। 42 गाँवों से होकर गुजरने वाली ससुर खदेरी (2) को अवैध निर्माण, गाद का भराव ने खत्म कर दिया था। तिथौरा गाँव की एक झील से निकलने वाली ससुर खदेरी (2) फतेहपुर जिले के ही चार खण्ड से होकर गुजरती है लिहाजा अकेले एक जिले के जिलाधिकारी के लिये काम का निर्णय लेना आसान था।<br /><br />लेकिन अकेले जिलाधिकारी के निर्णय लेने से समस्या का कोई समाधान नहीं होने जा रहा था। ससुर खदेरी की राह में समस्याओं के चट्टान नहीं, पहाड़ खड़े थे। सबसे बड़ी समस्या थी लोगोंं को इस काम के लिये तैयार करना और उन्हें यह भरोसा दिलाना कि ऐसा करने से उनकी पानी से जुड़ी समस्याओं का समाधान हो जाएगा लेकिन उससे भी बड़ी समस्या ये थी कि सरकारी रिकॉर्ड में नदी का कहीं कोई जिक्र ही नहीं था। 2011 में एक आरटीआई के जवाब में जिला प्रशासन ने खुद स्वीकार किया था कि ऐसी किसी नदी का कोई वजूद नहीं है। इसकी वजह से डीएम की इच्छा के बावजूद जिला प्रशासन काम शुरू करने को लेकर कोई खास उत्साहित नहीं था।<br /><br />ऐसे माहौल में गंगा नदी के प्रदूषण के खिलाफ काम कर चुके विज्ञानानंद सहित कुछ और लोगों की कोशिशों ने सरकारी महकमे के हौसले बढ़ाने में मदद की। डीएम की बढ़ती अनिच्छा को देखते हुए विज्ञानानंद ने कृषि उत्पाद कमिश्नर आलोक रंजन से मुलाकात की जिन्होंंने मनरेगा कमिश्नर, डीएम और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक सामूहिक बैठक की जिसके बाद आखिरकार ससुर खदेरी के पुनर्जीवन का काम हाथ में ले लिया गया। पहले चरण में 38 किलोमीटर लम्बी नदी को गाद से मुक्त करने का निर्णय लिया गया। इसके लिये नदी को 38 हिस्सों में बाँट दिया गया। हर किलोमीटर पर काम करने के लिये मजदूरों की टीम तैनात की गई जिसकी निगरानी 38 टेक्निकल असिस्टेंट नियुक्त किये गए। उत्तर प्रदेश पीडब्ल्यूडी के कार्यकारी इंजीनियर अरविन्द जैन बताते हैं कि कैसे हर किलोमीटर पर 20 सेंटीमीटर का ढलान रखा गया ताकि नदी का स्वाभाविक बहाव बना रहे। एक जगह नदी के भीतर एक छोटा सा टापू भी बनाया गया ताकि वहाँ पक्षियों का बसेरा हो सके।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/33371715835/in/dateposted-public/" title="श्रमदान करने से पहले ससुर खदेरी नदी की स्थिति"><img src="https://c1.staticflickr.com/4/3916/33371715835_57e77c5dc6.jpg" width="424" height="300" alt="श्रमदान करने से पहले ससुर खदेरी नदी की स्थिति" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>जिलाधिकारी वर्मा बताते हैं कि कार्य बहुत मुश्किल था। एक तो योजना बहुत बड़ी थी लेकिन उससे भी बड़ी समस्या थी कि अवैध कब्जा हटाने के दौरान कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है। काम को लेकर स्थानीय लोग कितने निरुत्साहित थे इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि काम के पहले दिन केवल सौ मजदूर ही काम पर आये जबकि परियोजना को पूरा करने के लिये रोजाना चार हजार कामगारों की जरूरत थी। इसके बाद जिला प्रशासन ने गाँव-गाँव लोगों को तैयार करने के लिये एक मुहिम चलाई ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग इस काम में शामिल हो सकें। इसका परिणाम यह आया कि इन 42 गाँवों से करीब एक हजार स्कूली बच्चों ने परियोजना को शुरू करने के लिये स्वैच्छिक रूप से अपनी सेवाएँ दीं।<br /><br />लेकिन अभी ससुर खदेरी के राह के सारे रोड़े नहीं हटे थे। अब तिथौरा गाँव के लोगों ने माँग कर दी कि झील का निर्धारण करते समय उनके खेत को उसमें शामिल न किया जाये। गाँव वालों का कहना था कि बजाय उनके खेतों को झील में शामिल किया जाये, बगल के खाली पड़े 23 हेक्टेयर जमीन को झील के लिये इस्तेमाल किया जाये जो कि सरकारी रिकॉर्ड में चारागाह की जमीन के रूप में दर्ज थी। कार्यकारी इंजीनियर जैन बताते हैं कि भौगोलिक रूप से यह जमीन भी कभी झील का हिस्सा रही थी और उसे ले भी सकते थे लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वह जमीन चारागाह की जमीन के रूप में दर्ज थी इसलिये हम कुछ नहीं कर सकते थे। ग्राम पंचायत के सदस्य इस बात से इतने नाराज हो गए कि उन्होंने ग्राम सरपंच प्रेमा देवी के खिलाफ ही अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया कि वो सरकार का साथ दे रही हैं। इससे घबराकर प्रेमा देवी ने डीएम से दखल देने की माँग की और डीएम ने दखल दिया भी और अविश्वास प्रस्ताव रुकवा दिया।<br /><br /><h3>मनरेगा का महाप्रताप</h3><br />ससुर खदेरी के पुनर्जीवन की कहानी मनरेगा के महाप्रताप की कहानी भी है। पहली बार शायद किसी सरकारी प्रोजेक्ट में ऐसा हुआ था जब कई सारे विभागोंं ने मनरेगा के तहत मिल जुलकर काम किया और सफलता हासिल की। 2006 में शुरू की गई मनरेगा योजना दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना है। 2006-11 के बीच मनरेगा के तहत 1,10,000 हजार करोड़ रुपए खर्च किये गए जिसमें 54 हजार करोड़ रुपए पानी के पुनर्जीवन के लिये खर्च किये गए। यह सरकारी विभागोंं की अच्छी पहल है क्योंकि इसका सीधा असर पर्यावरण और पारिस्थितिकीय तंत्र पर पड़ता है। पानी के परम्परागत स्रोतों की सफाई, उनका पुनर्जीवन मनरेगा के काम की मुख्यधारा में है। मनरेगा की इसी मुहिम का फायदा ससुर खदेरी को भी मिला है।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/32988401420/in/dateposted-public/" title="मनरेगा में लोगों द्वारा श्रमदान के बाद ससुर खदेरी नदी की स्थिति"><img src="https://c1.staticflickr.com/1/594/32988401420_7011d6244b.jpg" width="424" height="300" alt="मनरेगा में लोगों द्वारा श्रमदान के बाद ससुर खदेरी नदी की स्थिति" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>ससुर खदेरी को पुनर्जीवित करने के लिये कई विभागों का सहारा लिया गया। सिंचाई विभाग ने तकनीकी मदद की। जिले के राजस्व विभाग ने नदी के आसपास सर्वे का काम पूरा किया ताकि यह पता किया जा सके कि कहाँ-कहाँ अतिक्रमण हुआ है। वन विभाग ने झील के आसपास 3500 नए पेड़ लगाए। जिलाधिकारी वर्मा कहते हैं कि राजस्व विभाग का कम्प्यूटराइज्ड भूमि रिकॉर्ड ने बहुत मदद की। इससे हमें नदी के मूल रास्ते को समझने में मदद मिली और यह पता चला कि कहाँ-कहाँ नदी का अतिक्रमण किया गया है। परियोजना के सुपरवाइजर हरिश्चन्द्र बताते हैं कि इसी तरह सिंचाई विभाग का सहयोग न मिला होता तो हमें बहुत दिक्कत होती। तब हो सकता है यह काम पूरा करने में बहुत ज्यादा वक्त लग जाता।<br /><br />खण्ड विकास अधिकारी, जिला विकास अधिकारी और ग्राम पंचायत प्रमुख सबने अपनी-अपनी भूमिका निभाई ताकि काम करने वाले मजदूरों की कमी न पड़े। हरिश्चन्द्र कहते हैं कि मनरेगा के तहत दूसरे सभी विभागोंं के समन्वय के बिना यह काम करना असम्भव था। जिले के छह खण्डों से ग्रामीणों को इस काम में लगाया गया। कई ग्रामीण लम्बी दूरी तय करके काम करने आते थे। जो दूर से आते थे उनको अतिरिक्त भुगतान किया जाता था। इस तरह ससुर खदेरी की परियोजना ने कार्य के 2,04,000 मानव दिवसोंं का निर्माण किया। इसमें 156,000 कार्य दिवस नदी के पुनर्जीवन के लिये और 48,000 कार्यदिवस झील के पुनर्जीवन पर खर्च किये गए। सरकारी आँकड़ों में यह एक सफल परियोजना साबित हुई क्योंकि पिछले साल जिले में जहाँ औसत तीस दिन का काम मिला था इस साल औसत 90 कार्य दिवस का काम दिया गया। मनरेगा के सभी मानकों का भी ध्यान रखा गया। कामगारोंं के लिये पीने के पानी की व्यवस्था, प्राथमिक चिकित्सा और आराम करने के लिये तंम्बू कनात भी लगवाये गए।<br /><br />परियोजना के सुपरवाइजर हरिश्चन्द्र बताते हैं कि शुरुआत में स्थानीय ग्रामीण लोगों की तरफ से इसलिये भी विरोध किया गया क्योंंकि एक तो अतिक्रमण हटाया जा रहा था वहीं दूसरी तरफ मनरेगा में मजदूरी के दौरान भुगतान बहुत देर से किया जाता है। लेकिन इस परियोजना में बैंक आफ बड़ौदा ने भी बहुत तत्परता दिखाई। बैंक ने हर हफ्ते मजदूरोंं के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर किये। इस परियोजना पर बैंक की तरफ से काम करने वाले अधिकारी निखिल गुप्ता कहते हैं कि जैसे ही हमने सौ मजदूरों के अकाउंट में पैसा ट्रांसफर किया यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। इसके बाद तो हर रोज मजदूरोंं की तादात दोगुनी होने लगी।<br /><br /> परियोजना का असर एक साल में ही दिखने लगा। 2014 के मानसून के बाद सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वे से पता चला कि इस साल बीते साल के मुकाबले कम जल भराव हुआ है। भैरवां और फुलवामऊ जैसे इलाकों में जहाँ पानी की कमी के कारण कभी धान की खेती नहीं होती थी इस साल धान की खेती भी की गई। झील में पानी भरना शुरू हो गया और जुलाई में झील में 90 हजार क्यूबिक मीटर पानी जमा हो गया था। साल भर के भीतर ही स्थानीय लोग अब बाढ़ और सुखाड़ के सामने असहाय नहीं रह गए थे।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/32528077594/in/dateposted-public/" title="फतेहपुर जिला मानचित्र"><img src="https://c1.staticflickr.com/3/2837/32528077594_f0fca0c628.jpg" width="424" height="424" alt="फतेहपुर जिला मानचित्र" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>सुखदेव बताते हैं कि जल भराव की समस्या के कारण वे अपने दो हेक्टेयर खेत में केवल 0.4 हेक्टेयर खेत में ही धान उगा पाते थे लेकिन 2014 में उन्होंंने अपने पूरे खेत में धान की फसल लगाई। रावतपुर के सोमेश बहादुर कहते हैं कि अब वो अपनी जमीन पर खेती कर सकते हैं। यह सब इस परियोजना की देन है। वे बताते हैं कि इस साल पानी है और पम्प लगाकर वो अपने खेतों की सिंचाई कर सकते हैं।<br /><br />तिथौरा में जहाँ झील बनाई गई वहाँ तो और भी कमाल का परिणाम आया है। तिथौरा के धर्मपाल बताते हैं कि गाँव में भूजल स्तर ऊपर आ गया है। वो ग्रामीण जो शुरू में झील का विरोध कर रहे थे अब कहते हैं कि अगर परियोजना को पूरा नहीं किया गया तो वो जिला अधिकारी के सामने प्रदर्शन करेंगे कि इस परियोजना को जल्द-से-जल्द पूरा किया जाये। हालांकि रिपोर्ट लिखे जाने तक जिले के जिलाधिकारी बदल गए थे लेकिन नए जिलाधिकारी अभय कुमार की योजना उनसे भी आगे की है। वे कहते हैं कि वो पड़ोस के इलाहाबाद और कौशाम्बी जिलों में अधिकारियों से बात करेंगे ताकि इसी तरह की योजनाएँ वहाँ भी सफलतापूर्वक चलाई जा सकें।<br /><br /><h3>ससुर खदेरी का सरकार पर असर</h3><br />सिर्फ सरकार ने ही ससुर खदेरी को पुनर्जीवित नहीं किया है बल्कि ससुर खदेरी की सफलता से सरकार में भी योजनाओं का पुनर्जीवन हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार की योजना है कि इसी तरह मनरेगा के तहत राज्य में सूख चुकी नदियोंं और नदी स्रोतोंं को पुनर्जीवित किया जाएगा। आलोक रंजन का कहना है कि इससे सम्बन्धित आदेश विभागों को जारी कर दिये गए हैं। आलोक रंजन कहते हैं कि राज्य के कई जिले हैं जहाँ सूखे की समस्या गहराती जा रही है। कई इलाके या तो डार्क जोन में चले गए हैं या फिर बिल्कुल इसकी कगार पर खड़े हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ ससुर खदेरी के मॉडल पर ही सूखे की समस्या से निपटा जा सकता है। फतेहपुर में जो फतेह हुई है उसे राज्य के दूसरे हिस्सोंं में दोहराया जाएगा।<br /><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> <drupal-render-placeholder callback="comment.lazy_builders:renderForm" arguments="0=node&amp;1=55180&amp;2=comment&amp;3=comment" token="e8WsXGtKnnEDQLjOsBhKxKOPYshZ9bQNg_RxUVYQptA"></drupal-render-placeholder> </section> <span class="a2a_kit a2a_kit_size_20 addtoany_list" data-a2a-url="http://hindi.indiawaterportal.org/Resurrecting-a-rivulet" data-a2a-title="फतेहपुर में सूखे पर फतेह"><a class="a2a_button_facebook"></a> <a class="a2a_button_twitter"></a> <a class="a2a_button_google_plus"></a><a class="a2a_dd addtoany_share_save" href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FResurrecting-a-rivulet&amp;title=%E0%A4%AB%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%20%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%20%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%96%E0%A5%87%20%E0%A4%AA%E0%A4%B0%20%E0%A4%AB%E0%A4%A4%E0%A5%87%E0%A4%B9"></a></span> Sat, 11 Mar 2017 08:25:40 +0000 UrbanWater 55180 at http://hindi.indiawaterportal.org तालाब सँवरा तो गाँव के अच्छे दिन लौटे http://hindi.indiawaterportal.org/Water-work-in-Indore <span>तालाब सँवरा तो गाँव के अच्छे दिन लौटे</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B7-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%AF" hreflang="en">मनीष वैद्य</a></div> </div> </div> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Sun, 02/12/2017 - 15:51</span> <ul class="links inline list-inline"><li class="comment-add"><a href="/Water-work-in-Indore#comment-form" title="Share your thoughts and opinions." hreflang="en">Add new comment</a></li></ul> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">ग्रामीणों द्वारा डेढ़ महीने की मेहनत से तालाब का आकार खुलने लगा और 10 फीट तक गहरीकरण भी हुआ। तय हुआ कि अब कोई कचरा नहीं फेंकेगा। बारिश का पानी मोतियों की तरह तालाब में समाने लगा। बारिश में लबालब भर जाने से ग्रामीणों का उत्साह बढ़ गया। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि गाँव के कुएँ, बावड़ी और ट्यूबवेल रिचार्ज हो गए। गाँव के किसान दावा करते हैं कि गाँव की करीब एक सौ एकड़ जमीन भी इसकी वजह से अब पूरी तरह सिंचित हो गई है।</p> किसी तालाब के गहरे होने से उस गाँव के अच्छे दिन लौट आना आखिर कैसे सम्भव है। कोई एक तालाब कैसे पूरे गाँव की भलाई और उनके अच्छे दिन लौटा पाने में समर्थ हो सकता है। लेकिन यह हुआ है एक गाँव में।<br /><br />मध्य प्रदेश के तेजी से विस्तारित हो महानगर में तब्दील होते जा रहे इन्दौर शहर के पास का एक छोटा-सा गाँव इन दिनों तालाब की सफलता की कहानी सुना रहा है। इस गाँव के लोग तालाब की चर्चा इतने उत्साह से करते हैं कि जैसे अपने ही किसी बुजुर्ग का प्रशस्ति गान सुना रहे हों। उनके चेहरे पर चमक आ जाती है और वे किस्सागोई के अन्दाज में सुनाने लगते हैं।<br /><br />युवा हमें तालाब बताने ले जाते हैं। देखिए, साहब... पहले बस इतना-सा रह गया था यह तालाब। इसका पानी इतना गन्दला उठता था कि इसकी बदबू से इधर रहने वाले परेशान हो उठते थे। बारिश से ठंड का मौसम भी नहीं आता और यह सूख जाया करता था। पर अभी देखिए... जनवरी का महीना है और तालाब में पानी हिलोरें ले रहा है। तालाब में पानी क्या लौटा साहब, हमारे तो जैसे दिन ही फिर गए।<br /><br />कलवार गाँव के तालाब की कहानी सिलसिलेवार बताते हुए यहाँ के सरपंच नरेंद्र कांसल कहते हैं- <b>'हम सोच भी नहीं सकते थे कि एक तालाब हमारी किस्मत पलट सकता है। पर मैंने सरपंच बनते ही यह सोच रखा था कि कैसे भी इस मरते हुए तालाब को फिर से पुनर्जीवित तो करना है। बीते 20 सालों से हम गाँव के लोग पीने और खेती जैसे जरूरी कामों के लिये भी पानी को तरसने लगे थे। गाँव वालों को भी नहीं लगता था कि तालाब जिन्दा होगा तो हमारे लिये इतना फायदेमन्द होगा। पर आज तालाब ने काफी कुछ बदल दिया है। गलती हमारी ही थी कि हमने अपने तालाब को भुला दिया था।'</b><br /><br />गाँव के युवा राजेंद्र पटेल बताते हैं कि <b>इन्दौर से हमारा गाँव कलवार महज 28 किमी दूर है लेकिन पानी की कमी से बीते कुछ सालों से गाँव के लोग बहुत परेशान रहते थे। गाँव में पीने के पानी की किल्लत तो खेतों में सिंचाई के लिये पानी नहीं मिलता था। गाँव के पढ़े-लिखे लड़के खेती-बाड़ी से कतराने लगे थे। किसान परिवारों में पानी की कमी से फसल उत्पादन कम हो गया था। इससे उनका खेती-किसानी में मन नहीं लगता था। कुछ गाँव की खेती छोड़कर शहर जाकर दूसरा काम करने लगे थे तो कुछ खेती की जमीन बेचने की तैयारी में थे। गाँव में खेती के अलावा चारा भी क्या है।</b><br /><br />बारिश तो जैसे-तैसे निकल जाती पर बारिश गुजरते ही पानी का हाहाकार शुरू हो जाता। गाँव की पाँच हजार की आबादी के लिये पानी का इन्तजाम करना पंचायत के बस में कहाँ था। आसपास कोई नदी नहीं, कोई जलस्रोत नहीं। पुरखों का बनाया करीब 50 साल पुराना एक बड़ा तालाब भर था। यह तालाब भी पूरी तरह उपेक्षित। <br /><br />गाँव में नल-जल से घर-घर बिना किसी मेहनत से पानी पहुँचने लगा और खेत-खेत ट्यूबवेल बन गए तो फिर गाँव के तालाब और कुएँ-कुण्डियों को भला कौन याद रखता। लोग इन्हें भुला बैठे। कोई भी इनकी ओर बरसों तक ध्यान ही नहीं दिया। तालाब सिकुड़ने लगा। लोग अपने घरों का कचरा और गन्दगी इसमें डालने लगे। पानी ज्यादा दिन तक ठहरता नहीं था। बारिश के दो महीने बाद ही पानी सूख जाया करता।<br /><br />गाँव वालों को जब कोई उपाय नहीं सूझा तो पंचायत ने पूरे गाँव को चौपाल पर इकट्ठा किया। यहाँ पानी की किल्लत को लेकर चर्चा होने लगी। पहले दिन कोई हल नहीं निकला। दूसरे दिन फिर बैठे। धीरे-धीरे बात बनने और बढ़ने लगी। इस तरह एक महीने तक विचार विमर्श चलता रहता। योजनाएँ बनती और उन पर बात होती। बुजुर्गों ने युवाओं को फटकारा भी कि यह सब हमारी ही लापरवाही का परिणाम है। नई पीढ़ी पानी के परम्परागत संसाधन और संरचनाएँ ही भूल गईं। उन्हें सहेजा जाता तो आज यह नौबत नहीं बनती।<br /><br /><a data-flickr-embed="true" data-footer="true" data-context="true" href="https://www.flickr.com/photos/hindiwater/32473808620/in/dateposted-public/" title="लबालब भरा तालाब"><img src="https://c1.staticflickr.com/3/2253/32473808620_2811ecf37d.jpg" width="424" height="300" alt="लबालब भरा तालाब" /></a><script async="" src="//embedr.flickr.com/assets/client-code.js" charset="utf-8"></script>आखिरकार चौपाल पर तय हुआ कि पानी के लिये काम की शुरुआत सरकारी (सार्वजनिक) तालाब को पुर्नजीवित करने से होगी। अब सवाल पैसों का था तो यह भी निश्चित हुआ कि सरकार से या पंचायत से इसके लिये कोई राशि नहीं ली जाये। तालाब को उपेक्षित करने की गलती हमसे हुई है तो प्रायश्चित भी हम ही करेंगे। हर घर से इसके लिये सहयोग राशि इकट्ठा होने लगी और बातों-ही-बातों में चौपाल पर 32 लाख रुपए का इन्तजाम हो गया। उन दिनों गर्मियों के दिन थे। गाँव के लोगों ने खुद श्रमदान भी किया और काम का सामजिक अंकेक्षण भी। इस तरह डेढ़ महीने की मेहनत से तालाब का आकार खुलने लगा और 10 फीट तक गहरीकरण भी हुआ। तय हुआ कि अब कोई कचरा नहीं फेंकेगा।<br /><br />बारिश का पानी मोतियों की तरह तालाब में समाने लगा। बारिश में लबालब भर जाने से ग्रामीणों का उत्साह बढ़ गया। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि गाँव के कुएँ, बावड़ी और ट्यूबवेल रिचार्ज हो गए। गाँव के किसान दावा करते हैं कि गाँव की करीब एक सौ एकड़ जमीन भी इसकी वजह से अब पूरी तरह सिंचित हो गई है।<br /><br />तालाब की पाल पर हमें मिले रामचंद्र पंडित कहते हैं- <b>'हमारी संस्कृति में पानी को पंचतत्व में गिना जाता है। यानी जिन तत्वों से हमारा शरीर बना है या जो जीवन के लिये सबसे जरूरी है, उनमें पानी सबसे पहले आता है। गाँव हो या मकान, इनके वास्तु में भी पानी का सबसे बड़ा महत्त्व माना गया है। जिस तरह बिना पानी का मटका या घड़ा रखे कोई घर नहीं हो सकता ठीक उसी तरह बिना जल संरचनाओं के भला कोई भी गाँव कैसे हो सकता है। हमारे यहाँ तो हर मांगलिक काम में सबसे पहले पानी से भरे कलश को ही पूजा जाता है। इसका संकेत हमें पानी के पर्यावरण से जोड़कर देखने की जरूरत है। आज जल संरचनाओं की उपेक्षा के कारण ही गाँव और उसकी खेती खत्म होने की कगार तक जा रही है। गाँव में जल संरचनाएँ नहीं रहेंगी तो आदमी के चेहरे पर पानी (चमक) कैसे रहेगा?'</b><br /><br />गाँव में पानी आया तो दूसरे काम भी होने लगे। लोगों में आत्मविश्वास जागा कि वे चाहें तो बिना सरकार की मदद के हम खुद गाँव की दिशा बदल सकते हैं। लोगों को लगा कि गाँव में बरसात और ठंड में शादी और अन्य आयोजन करने में बड़ी परेशानी होती है तो ग्रामीणों ने इसका भी हल आपसी समझ से खोज लिया।<br /><br />सरपंच नरेंद्र कांसल ने अपने खुद मालिकाना हक की करीब पाँच हजार वर्गफीट जमीन गाँव के हित में कम्युनिटी हाल और मेरिज गार्डन के लिये दान कर दी। भवन निर्माण व अन्य सुविधाओं के लिये कुछ तो खुद आपस में सहभागिता की और बाकी 12 लाख रुपए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मंजूर करा लिये। निर्माण काम 75 फीसदी पूरा हो चुका है। दो महीने में यह काम पूरा हो जाएगा।<br /><br />सच ही है, पानी से ही सब कुछ सम्भव है। पानी है तो कुछ भी असम्भव नहीं है।<br /><br /></div> <section> <h2>Comments</h2> <a id="comment-66326"></a> <article data-comment-user-id="0" class="js-comment"> <mark class="hidden" data-comment-timestamp="1527052617"></mark> <footer> <article> </article> <p>Submitted by <span>Monty (not verified)</span> on Mon, 03/06/2017 - 17:33</p> <a href="/comment/66326#comment-66326" hreflang="en">Permalink</a> </footer> <div> <h3><a href="/comment/66326#comment-66326" class="permalink" rel="bookmark" hreflang="en">Reply to comment | इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी)</a></h3> <div class="field field--name-comment-body field--type-text-long field--label-hidden field--item">Thank you, I have just been searching for information approximately this subject for a while and yours is the best I've came upon so far.However, what concerning the bottom line? 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href="https://www.addtoany.com/share#url=http%3A%2F%2Fhindi.indiawaterportal.org%2FWater-work-in-Indore&amp;title=%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AC%20%E0%A4%B8%E0%A4%81%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%BE%20%E0%A4%A4%E0%A5%8B%20%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%B5%20%E0%A4%95%E0%A5%87%20%E0%A4%85%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A5%87%20%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%20%E0%A4%B2%E0%A5%8C%E0%A4%9F%E0%A5%87"></a></span> Sun, 12 Feb 2017 10:21:20 +0000 RuralWater 55028 at http://hindi.indiawaterportal.org एक अनूठी अन्तिम इच्छा http://hindi.indiawaterportal.org/Pond-in-Ujjain <span>एक अनूठी अन्तिम इच्छा</span> <div class="field field--name-field-laekhaka field--type-entity-reference field--label-inline"> <div class="field--label">लेखक</div> <div class="field--items"> <div class="field--item"><a href="/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%9A%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6%E0%A5%80" hreflang="en">क्रांति चतुर्वेदी</a></div> </div> </div> <span><span>RuralWater</span></span> <span>Sun, 12/18/2016 - 11:48</span> <div class="field field--name-field-source field--type-string field--label-inline"> <div class="field--label">Source</div> <div class="field--item">बूँदों के तीर्थ ‘पुस्तक’</div> </div> <div class="field field--name-body field--type-text-with-summary field--label-hidden field--item"><br /><p class="MsoNormal" style="font-size: 14px; background-color: #ffffff; display: block; width: 210px; float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; border-top-style: solid; border-bottom-style: solid; border-width: medium; border-color: #42de20; padding: 10px">लव तालाब में डेढ़ हेक्टेयर के क्षेत्र में पानी भरा है। इस रमणीक संरचना के आस-पास के किसानों ने गर्मियों में सब्जी की फसल सहित तीन-तीन फसलें ली हैं। यहाँ अब गर्मी में भी ट्यूबवेल पानी दे रहे हैं। तालाब के दोनों ओर 25-25 बीघा जमीन सिंचित हो रही है। जबकि, तालाब बनने के पूर्व गाँव के सभी नलकूप सूख जाया करते थे। लव तालाब के पास ही इसका भाई यानी कुश तालाब है। पानी आन्दोलन की जड़ें जमाने में पंचायत की एक पुरानी तलैया की भी सराहनीय भूमिका रही है।</p> हरनावदा यानी जंगलों से भरा गाँव। मोरों की शरण स्थली। लव-कुश नाम के दो तालाबों वाला गाँव। एक ऐसा गाँव जिसने तैंतीस साल पहले ‘पानी रोको’ के दर्शन किये थे। उसके चिन्ह आज भी मौजूद हैं।<br /><br />हरनावदा यानी डबरियों का गाँव। तलैया का गाँव। सूखे में भी रबी की फसल लेने वाला और जिन्दा नलकूप, जिन्दा कुएँ और जिन्दा समाज वाला गाँव।<br /><br />...पूर्व ग्वालियर रियासत का उज्जैन से 21 किमी. दूर नरवर क्षेत्र का प्रमुख गाँव।<br /><br />...लेकिन भाई साहब, इसकी एक और बड़ी पहचान तो हमने आपको अभी बताई ही नहीं है। ...आपने यह तो अवश्य सुना होगा कि मृत्युशैया पर कोई व्यक्ति अपनी अन्तिम इच्छा में प्रियजनों को अपनी सम्पत्ति का बँटवारा करने की बात कह जाता हो। या फिर इसी तरह की कुछ और भी बातें।<br /><br />...लेकिन, यह तो बिरली बातों में ही सुना होगा कि कोई व्यक्ति अपनी अन्तिम इच्छा में अपनी जमीन पर विशाल तालाब बनाने की बात कह दुनिया छोड़कर चला जाये…!! और उसके परिवार वाले सादर भावनाओं के साथ उस तालाब को चन्द ही दिनों में तैयार करवा दें। पुराने जमाने में राजा-महाराजाओं ने तो इस तरह के कार्य सम्भव हो, कराए होंगे- परन्तु एक किसान ऐसा कुछ कार्य करवा कर अमर हो जाये- यह तो अपने आप में बेमिसाल ही माना जाएगा।<br /><br />जी हाँ, हरनावदा की एक बड़ी पहचान यह भी हो गई है। यहाँ के चिरौंजीलाल पण्ड्या ने अपनी अन्तिम इच्छा में यही जाहिर किया था। पानी आन्दोलन में इस जज्बे ने उत्प्रेरक का काम किया और हरनावदा अब पानीदार हो गया है। यहाँ की आर्थिक स्थिति में एक व्यापक बदलाव आ रहा है।<br /><br />हरनावदा की कहानी बड़ी दिलचस्प है। श्री एम. एल. वर्मा और उदयराज पँवार हैं- <b>“उज्जैन में पानी आन्दोलन के फैलाव के लिये स्थान-स्थान पर जल-सम्मेलन किये गए थे। घटिया के एक जल सम्मेलन में पानी-संवाद से श्री पण्ड्या इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सबके बीच में खड़े होकर पूछा कि मैं अपने ट्यूबवेल को रिचार्ज करना चाहता हूँ तथा साथ ही अपनी स्वयं की जमीन पर एक तालाब भी बनाना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे तकनीकी मदद कौन उपलब्ध कराएगा।”</b> परियोजना अधिकारी श्री नरेरा और श्री वर्मा ने अपनी मंजूरी दी और हरनावदा आकर तालाब के लिये जमीन देखी।<br /><br />विधि को कुछ और ही मंजूर था! कुछ दिनों बाद चिरौंजीलाल पण्ड्या का स्वर्गवास हो गया। मृत्यु के पहले उन्होंने अपने घर के सभी परिजनों को एकत्रित किया और कहा कि मेरा सपना था कि गाँव के पानी आन्दोलन में खुद अपनी जमीन पर एक बड़ा तालाब बनवाऊँ। अतः मेरी इस इच्छा को अवश्य पूरा करना। उनके छोटे भाई गणेशीलाल पण्ड्या ने इस सपने को साकार करके ही दम लिया।<br /><br />...यह एक विशाल तालाब है। इसके पास पानी के अलावा किसी आत्मा के पर्यावरण-गाँव और जल प्रेम की भी अनुभूति का अहसास भी आप कर सकते हैं। गणेशीलाल पण्ड्या कहते हैं- <b>“मोटे तौर पर यह तालाब पौने दो लाख रुपए में बना है। साधन सब हमारे पास मौजूद थे। केवल जेसीबी मशीन और कुछ श्रमिक बाहर से बुलाये गए थे। यह तालाब 22 बीघा जमीन पर बना हुआ है। 50 हजार प्रति बीघा के हिसाब से इस जमीन की कीमत ही 11 लाख रुपए के करीब है।”</b><br /><br />...इस तालाब से 4 नलकूप चालू हो गए, जो बरसात के बाद ही बोल जाया करते थे। ये समीप के ही हैं। हो सकता है, कुछ आगे भी और नलकूप रिचार्ज हो रहे हों। इन नलकूपों से जुड़े किसान अपनी जमीन से अब तीन-तीन फसलें ले रहे हैं। रबी, खरीफ के अलावा गर्मी में इन ट्यूबवेल वालों ने सब्जियों की भी भरपूर फसल ली है। इसके पहले ये किसान केवल खरीफ की ही फसल ले पाते थे। इन नलकूपों से करीब 30 एकड़ क्षेत्र में सिंचाई हो रही है।<br /><br />हरनावदा में आपको चारों ओर मोर नजर आएँगे। वृक्षों की संख्या भी इस गाँव के सौभाग्य का एक हिस्सा है। पण्ड्या जी के तालाब के आस-पास झाड़ों के झुण्ड में गाँव के सारे मोर विचरण करते हैं।<br /><br />हरनावदा के समीप के गाँव पिपलौदा द्वारकाधीश में आपको - तालाबों में राम-दरबार के दर्शन कराए थे।<br /><br />अब यहाँ आपको भगवान राम के पुत्र लव-कुश से मिलवाएँगे। ये भी तालाब के रूप में मौजूद हैं।<br /><br /> लव तालाब में डेढ़ हेक्टेयर के क्षेत्र में पानी भरा है। इस रमणीक संरचना के आस-पास के किसानों ने गर्मियों में सब्जी की फसल सहित तीन-तीन फसलें ली हैं। यहाँ अब गर्मी में भी ट्यूबवेल पानी दे रहे हैं। तालाब के दोनों ओर 25-25 बीघा जमीन सिंचित हो रही है। जबकि, तालाब बनने के पूर्व गाँव के सभी नलकूप सूख जाया करते थे। लव तालाब के पास ही इसका भाई यानी कुश तालाब है। पानी आन्दोलन की जड़ें जमाने में पंचायत की एक पुरानी तलैया की भी सराहनीय भूमिका रही है। व्यवस्था और समाज ने मिलकर इसकी सफाई, दुरुस्तीकरण और गहरीकरण किया। इससे मवेशियों को पानी मिला, साथ ही आस-पास के नलकूप भी जिन्दा हो उठे। पानी आन्दोलन के अध्ययन के दौरान एक बात अवश्य सामने आई कि गाँव में जल संवर्धन का एक ही बेहतर कार्य और उससे फसल उत्पादन से लेकर तो समस्त सामाजिक-आर्थिक बदलाव यदि समाज के सामने आते हैं तो जल संचय अभियान गति पकड़ने लगता है।<br /><br />हरनावदा में डबरी निर्माण ने भी अनेक परचम लहराए हैं। यहाँ अभी तक 70 डबरियाँ बन चुकी हैं। श्री गणेशीलाल पण्ड्या के अलावा सर्वश्री नागेश्वर, दयाराम, शिवनारायण जागीरदार, अतुल, दशरथ और बाबूलाल पण्ड्या प्रमुख डबरी निर्माता हैं। यहाँ आँकड़ा जल्दी ही सौ की संख्या पार करने जा रहा है।<br /><br />श्री गणेशीलाल पण्ड्या की डबरी से बीस बीघा जमीन में सिंचाई हो रही है। इससे रबी की फसल ली जा रही है। डबरी के आस-पास के सभी नलकूप चल रहे हैं। पहले यहाँ रबी के सन्दर्भ में स्थिति शून्य थी। बकौल पण्ड्या- <b>“हम गाँव के लोग तो यही कहते हैं कि उज्जैन में निजी क्षेत्र में शुरू हुए डबरी आन्दोलन ने किसानों की आर्थिक समृद्धि के लिये संजीवनी का काम किया है।”</b> स्वयं पण्ड्या अपनी उसी डबरी से शरबती गेहूँ की फसल ले रहे हैं। यह प्रति बीघा दो क्विंटल के हिसाब से उत्पादित होगा। मोटे अनुमान के अनुसार प्रति बीघा दो हजार रुपए के हिसाब से रबी में खाली पड़ी रहने वाली जमीन से आय सम्भव हो सकेगी। आपका अनुभव है कि एक डबरी यदि दो बीघे में है तो वह कम-से-कम 10 बीघे के लिये पानी की व्यवस्था कर देती है। किसान डबरी बनाने में जितना पैसा खर्च करता है वह आसानी से तुरन्त ही निकल जाता है। सरकारी मदद भी बेकार नहीं गई है।<br /><br />गाँव में दयाराम और उनके बेटे द्वारा बनाई गई डबरियों की भी धूम मची हुई है। इनसे बहुत अच्छा पानी रिचार्ज हुआ है। इनके आस-पास के बीस ट्यूबवेल जिन्दा हो गए। पिछले साल यहाँ कुछ नहीं था। सभी दूर सूखा ही सूखा था, लेकिन इस बार सूखे के बावजूद ट्यूबवेल का यूँ जिन्दा होना सुखद आश्चर्य की बात है। इन ट्यूबवेलों से मोटे अनुमान के मुताबिक 300 बीघा जमीन सिंचित हो सकती है। अधिकांश क्षेत्र में रबी की फसल भी ली जा रही है।<br /><br />...आपको याद होगा, हमने शुरू में भी आपको कहा था- कोई तैंतीस साल पहले यह गाँव ‘पानी रोको’ से रूबरू हो चुका है! सन 1968 में राज्य शासन ने हरनावदा गाँव का चयन मध्य प्रदेश के उन गाँवों के लिये किया था, जहाँ पानी व मिट्टी के संरक्षण के लिये मेड़बन्दी का सरकारी अभियान चलाया जा रहा था। हरनावदा में कुछ समय के लिये इस कार्य के लिये एक दफ्तर की भी व्यवस्था की गई थी। स्व. मोतीलाल पण्ड्या (गणेशीलालजी के पिता) ने इस कार्य में महती भूमिका अदा की थी। गाँव में बाद में तो अनेक लोगों ने अपनी मेड़बन्दी तोड़ दी, लेकिन पण्ड्या परिवार के खेतों में यह अभी भी मौजूद है।<br /><br />...उज्जैन के पानी आन्दोलन में हरनावदा का नाम एक और वजह से भी जाना जाता है। पण्ड्या परिवार की निजी जमीन पर बने इस तालाब को देखकर एक कार्यक्रम में जिला पंचायत अध्यक्ष महेश पटेल ने घोषणा की कि निजी भूमि पर उज्जैन जिले में बनाए गए सर्वश्रेष्ठ तालाब को एक लाख रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा।<br /><br />...मोरों के इस गाँव में, डबरियों और वृक्षों के इस गाँव में - 100 ट्यूबवेल में से 60 जिन्दा हो गए हैं। मोटे तौर पर रबी की फसल का रकबा सूखे के बावजूद पानी आन्दोलन की वजह से पचास फीसदी बढ़ गया है।<br /><br />...आप भूल गए, हमने कहा था- गाँव का जिन्दा समाज भी इसकी एक और पहचान है।<br /><br />...कभी आप हरनावदा जाएँगे तो खुद महसूस करेंगे कि क्यों नहीं मेहमान बनेंगी यहाँ पानी की बूँदें। गाँव से जल्दी न जाने का आग्रह, किसी आग्रह के कच्चे इनसान को तो मुसीबत में डाल दे!<br /><br />...फिर भला बूँदें किस खेत की मूली हैं, जो रुकने के आग्रह को टाल दें!<br /><br />...और चलते-चलते आपको एक और बात बता दें।<br /><br />...पानी आन्दोलन के सेहरे में एक और ‘मोर-पंख’ की भाँति श्री गणेशीलाल पण्ड्या अपनी निजी जमीन पर एक और तालाब बनाने का सपना जल्दी ही साकार करने जा रहे हैं।<br /><br /><p> </p><div dir="ltr" style="margin-left:0pt;"><table style="border-width: initial; border-style: none; border-color: initial; border-collapse: collapse;"><colgroup><col width="31" /><col width="412" /></colgroup><tbody><tr style="height:21pt"><td colspan="2" style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Arial; background-color: transparent; font-weight: 700; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों के तीर्थ</span></span></p><br /><p dir="ltr" style="line-height:1.44;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)</span></span></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">1</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Drops-whereabouts" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों के ठिकाने</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">2</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Ram-Darbar-ponds" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">तालाबों का राम दरबार</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">3</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Pond-in-Ujjain" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">एक अनूठी अन्तिम इच्छा</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">4</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Worship-drops" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों से महामस्तकाभिषेक</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">5</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/boondon-ka-jankshan" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों का जंक्शन</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">6</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Devdungri-offerings" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">देवडूंगरी का प्रसाद</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">7</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Queen-drops" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों की रानी</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">8</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Water-yoga" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">पानी के योग</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">9</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/boondon-ke-taraane" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों के तराने</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">10</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Military-village-drops" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">फौजी गाँव की बूँदें</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">11</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Village-of-Jhirion" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">झिरियों का गाँव</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">12</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/jangal-kee-peeda" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">जंगल की पीड़ा</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">13</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/gaanv-kee-jeevan-rekha" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">गाँव की जीवन रेखा</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">14</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/boondon-kee-bairak" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों की बैरक</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">15</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Ramdevji-Nala" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">रामदेवजी का नाला</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">16</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/paanee-ke-pahaad" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">पानी के पहाड़</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">17</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/boondon-ka-svaraaj" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों का स्वराज</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">18</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Devaji-ka-Ota" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">देवाजी का ओटा</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">18</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Drops-hidden-treasures" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">बूँदों के छिपे खजाने</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">20</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/Sweet-drops-of-Khirnion" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">खिरनियों की मीठी बूँदें</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">21</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/node/68060" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">जल संचय की रणनीति</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">22</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/node/68061" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">डबरियाँ : पानी की नई कहावत</span></span></a></p></td></tr><tr style="height:0pt"><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.2;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 12pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">23</span></span></p></td><td style="border-left:solid #000000 1pt;border-right:solid #000000 1pt;border-bottom:solid #000000 1pt;border-top:solid #000000 1pt;vertical-align:top;padding:5pt 5pt 5pt 5pt;"><p dir="ltr" style="line-height:1.38;margin-top:0pt;margin-bottom:0pt;"><a href="http://hindi.indiawaterportal.org/vasundhara-ka-dard" target="_blank"><span id="docs-internal-guid-172cafb8-4058-1713-b791-8dcdd94c8577"><span style="font-size: 14pt; font-family: Kokila; background-color: transparent; font-variant-numeric: normal; font-variant-east-asian: normal; vertical-align: baseline; white-space: pre-wrap;">वसुन्धरा का दर्द</span></span></a></p></td></tr></tbody></table></div><p> </p><br /></div> <section> <h2>Add new comment</h2> 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