तापमान वृद्धि को सीमित करना नहीं है आसान

Submitted by editorial on Sun, 10/21/2018 - 16:50
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Source
द इण्डियन एक्सप्रेस, 08 अक्टूबर, 2018

2017 में ग्रेट बैरियर रीफ से कोरल के नमूने एकत्र करते शोधकर्ता2017 में ग्रेट बैरियर रीफ से कोरल के नमूने एकत्र करते शोधकर्ता (फोटो साभार - इण्डियन एक्सप्रेस)इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (intergovernmental panel on climate change) ने हाल में ही जारी किये गए एक स्पेशल रिपोर्ट में औद्योगीकरण से पूर्व के तापमान की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्तरी का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह क्यों महत्त्वपूर्ण है जबकि ऐसा किया जाना सम्भव है?

जैसाकि आपने पढ़ा होगा इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) द्वारा हाल में ही बहुप्रतीक्षित स्पेशल रिपोर्ट जारी की गई है। रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि पूर्व की तुलना में विश्व के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक की वृद्धि न हो और इसके लिये क्या किये जाने की जरूरत है।

आईपीसीसी एक विश्वस्तर की संस्था है। यह समय-समय पर वैज्ञानिकता के साथ तापमान के सम्बन्ध में उपलब्ध वैश्विक अध्ययनों के मूल्यांकन के साथ ही भविष्य में तापमान वृद्धि के लिये लक्ष्य निर्धारित करती है। आईपीसीसी ने यह रिपोर्ट वर्ष 2015 में हुए पेरिस समझौते (Paris Agreement) में शामिल हुए देशों के अनुरोध पर तैयार की है। इसके लिये संस्था द्वारा एक सप्ताह के लिये एक गम्भीर परिचर्चा का आयोजन किया गया ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि लक्ष्य को हासिल किये जाने के लिये क्या कदम उठाए जाएँ।

1.5 डिग्री का सवाल क्या है?

1990 के दशक से ही विभिन्न देशों जब वातावरण में हो रहे बदलाव को नियंत्रित करने के प्रति सचेत हुए तो इस समस्या से निपटने के लिये वैश्विक समझौते की जरूरत महसूस हुई। उद्देश्य था कि औद्योगिक क्रान्ति के बाद विश्व के औसत तापमान की वृद्धि दर को 2 प्रतिशत तक नियंत्रित रखा जाये। 1850 से 1900 के बीच के काल को औद्योगिक क्रान्ति के पूर्व का काल माना जाता है। इस काल में विश्व में रेल नेटवर्क, गैस, पानी के वितरण, निर्माण और उत्पादन आदि के क्षेत्र में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई थी। विश्व के औसत तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के निर्धारित लक्ष्य के पीछे आईपीसीसी द्वारा समय-समय पर जारी किये गए असेसमेंट रिपोर्ट्स (Assessment Reports) हैं जिनमें कहा गया कि तापमान में इससे अधिक हुई वृद्धि को कम करना सम्भव नहीं होगा और उसका परिणाम विनाशकारी होगा।

हालांकि, तापमान वृद्धि से प्रभावित होने की सम्भावना वाले द्वीपीय देशों और कम विकसित देशों ने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि औद्योगीकरण से पूर्व के तापमान की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस का ही लक्ष्य निश्चित किया जाना चाहिए। तर्क था कि यदि विश्व के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो इनमें से कुछ देशों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इन देशों द्वारा की गई इस माँग से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिये जिम्मेवार बड़े देश खासे प्रभावित होते। अतः शुरुआत में उन्होंने ऐसा करने के प्रति अनिक्षा जाहिर की। इस माँग को पूरा करने का मतलब था वर्तमान तकनीकी में बदलाव लाना जिसके लिये ढेर सारी पूँजी की आवश्यकता होती। लेकिन ये देश द्वीपीय देशों की इस माँग को पूरी तरह नकार नहीं पाये क्योंकि उनकी समस्या वास्तविक थी।

पेरिस समझौता ने इनके बीच सन्तुलन बनाने का काम किया। इसमें विश्व के औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से कम वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किये जाने के साथ ही इसे 1.5 तक सीमित किये जाने के लिये लगातार प्रयास किये जाने की बात पर भी बल दिया गया। पेरिस एग्रीमेंट को अन्तिम रूप दिये जाने से पहले विभिन्न देशों ने आईपीसीसी को औद्योगीकरण के पूर्व की तुलना में वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि होने से पड़ने वाले प्रभावों के बारे में एक स्पेशल रिपोर्ट तैयार करने का आग्रह किया। इसके साथ ही उन्होंने उत्सर्जन सम्बन्धी सुझाव भी देने को कहा जिससे तापमान में वृद्धि हेतु निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। संयोगवश, वैश्विक तापमान में औद्योगीकरण के पूर्व की तुलना में 1 डिग्री सेल्सियस तापमान में वृद्धि दर्ज की जा चुकी है और यह अनुमान है कि इस गति से अगर वृद्धि होती रही तो वह 2040 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस के स्तर को क्रॉस कर जाएगा।

2 डिग्री पर क्या होता जो 1.5 डिग्री सेल्सियस पर नहीं होता?

आईपीसीसी द्वारा जारी रिपोर्ट में इस सवाल पर विस्तार में चर्चा की गई है। इसके अलावा हाल में प्रस्तुत किये गए कई वैज्ञानिक रिपोर्ट्स में भी 1.5 डिग्री सेल्सियस वृद्धि से पड़ने वाले प्रभाव की विस्तृत चर्चा की गई है। इन अध्ययनों में समुद्र और जमीन के साथ ही इसके सामाजिक-आर्थिक पक्ष जैसे स्वास्थ्य, कुपोषण, खाद्य सुरक्षा के साथ ही रोजगार पर पड़ने वाले प्रभावों की भी चर्चा की गई है। उदाहरणस्वरूप-

1. यूनाइटेड किंगडम के ईस्ट एंग्लिया विश्विद्यालय (University of East Anglia, UK) के शोधकर्ताओं के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री की सीमा में बाँध देने से केवल लैटिन अमरीकी और कैरिबियन देशों में डेंगू के मामलों में हर वर्ष 3.3 मिलियन तक की कमी की जा सकती है (Proceedings of the National Academy of Science (PNAS), May 29, 2018)।

2. वर्ल्ड बैंक (World Bank) द्वारा जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के सम्बन्ध में नवम्बर 2015 में जारी किये गए एक रिपोर्ट के अनुसार 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान में वृद्धि की स्थिति में विश्व में 150 मिलियन अतिरिक्त मलेरिया के मरीजों की वृद्धि होगी।

3. क्लाइमेट चेंज जर्नल में 2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अगर विश्व के औसत तापमान में 1.5 प्रतिशत की औसत वृद्धि होती है तो विश्व में कुपोषित लोगों की संख्या में 25 मिलियन की कमी होगी।

4. अगर तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि दर्ज की जाती है तो पीएनएएस में 2016 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार विश्व में अतिरिक्त 350 मिलियन लोग हीट वेव के शिकार होंगे

5. नेचर क्लाइमेट चेंज (Nature Climate Change) में मार्च 2016 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार 2 डिग्री की तुलना में 1.5 डिग्री तापमान में वृद्धि वर्ष 2100 तक 153 मिलियन लोगों को प्रदूषित हवा के कारण होने वाले समय पूर्व मौत से बचा सकती है।

6. नेचर में इसी साल मई में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान में वृद्धि के स्तर को लागू करने के कारण विश्व की 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। अध्ययन में यह भी दावा किया गया है कि ऐसा होने से सन 2100 तक विश्व की कुल सम्पत्ति में 3 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की जाएगी।

7. यूएनडीपी द्वारा वर्ष 2016 में जारी किये गए एक रिपोर्ट के मुताबिक 1.5 डिग्री की स्तर को बनाए रखने से 2050 तक विश्व में नौकरियों की संख्या दोगुनी हो जाएगी। इसके अलावा 2 डिग्री वृद्धि होने पर मौसम में भारी बदलाव के साथ ही अत्यधिक बारिश, हीटवेव में वृद्धि के साथ ही शुद्ध जल के वितरण में भी गिरावट आने की सम्भावना है।

क्या 1.5 डिग्री के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है?

आईपीसीसी के मुताबिक चीन, अमरीका, यूरोपियन यूनियन, भारत आदि को उन्हें वर्तमान की तुलना में काफी तेजी से उत्सर्जन के स्तर में कमी लानी होगी तभी 1.5 डिग्री के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। हालांकि इन देशों के द्वारा उत्सर्जन को कम करने के लिये घोषित प्लान 2 डिग्री के स्तर को प्राप्त करने के लिये नाकाफी है।

2015 में पेरिस में इन देशों ने स्वीकार किया था कि अगर वे अपने निर्धारित लक्ष्य से ज्यादा तेजी से उत्सर्जन में कमी नहीं लाते हैं तो वर्ष 2030 कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन 55 बिलियन टन के स्तर को पार कर जाएगा। और यह 2 डिग्री के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये जरूरी उत्सर्जन के स्तर से 15 बिलियन टन ज्यादा होगा। इसके अलावा 1.5 डिग्री के स्तर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये अपनाया गया कोई भी रास्ता वैश्विक स्तर पर औसत तापमान को बढ़ाएगा। इस योजना की वैधता कार्बन उत्सर्जन के लिये विकसित की गई नई तकनीक पर निर्भर करेगी जो आने वाले दिनों में बहस का मुद्दा बनेगी।

कार्बन डाइऑक्साइड जो मुख्य ग्रीनहाउस गैस है ग्लोबल वार्मिंग के लिये सबसे अधिक जिम्मेवार है। यह वातावरण में 100 से 150 वर्ष तक रहता है। इसका मतलब हुआ कि यदि सभी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को अचानक ही बन्द कर दिया जाये फिर भी वातावरण में पहले से मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड का प्रभाव वर्षों तक रहेगा। इसीलिये आजकल ऐसे तकनीक पर काफी ध्यान दिया जा रहा है जिसके इस्तेमाल से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड भौतिक रूप से कुछ समय के लिये या स्थायी तौर पर हटा कर किसी अन्य जगह पर स्टोर किया जा सके। अभी तक इस तरह की किसी तकनीक का विकास नहीं किया जा सका है। इसके अलावा अन्य सम्भावनाओं के विकल्प भी ढूँढे जा रहे हैं और सभी के साथ जोखिम के अलावा अनिश्चितताएँ भी जुड़ी हुई हैं।

अंग्रेजी में पढ़ने के लिये लिंक देखें।

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intergovernmental panel on climate change, Paris Agreement, Assessment Reports, University of East Anglia, UK, Proceedings of the National Academy of Science, World Bank, Nature Climate Change, undp, greenhouse gases, emission of carbon dioxide.

 

 

 

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